आस्थावादी दृष्टि का विस्तार एवं धर्मवीर भारती का काव्य

आस्थावादी दृष्टि का विस्तार एवं धर्मवीर भारती का काव्य

(आधारशिला सहित्यम पत्रिका के अक्तूबर-दिसम्बर, २०२२ अंक में..)


डॉ. धर्मवीर भारती प्रयोगवादी और नई कविताओं की संक्रांतिकालीन बेला के साक्षी रहे हैं। तत्कालीन परिस्थितियाँ जहाँ एक ओर युद्ध जनित त्रासदियों की शिकार मानवता है, तो दूसरी ओर अंधकारमय वातावरण में भी जीवन के प्रति उत्कट भाव प्रवणता। इस संधिकालीन समय में कवि भारती के मन में दुविधा, संशय और भय के साथ-साथ आस्था का स्वर भी अंकुरित होता है। ‘ठंडा लोहा’, ‘अंधायुग’, ‘कनुप्रिया’, ‘सात गीत वर्ष’ जैसी कृतियाँ डॉ. भारती की एक दशक की ऐसी रचनाएँ हैं, जहाँ वे नवीन भाव और विचार बोध को जन्म तो देते हैं, परंतु संपूर्ण कृतित्व में आस्था और अनास्था का द्वंद्व निरंतर जारी रहता है। 


डॉ. भारती की आरंभिक रचनाओं में गहरी भावुकता, स्वप्निल उड़ान, प्रणय भावना के साथ सामाजिक संघर्ष के स्वर मिलते हैं। इन रचनाओं में किशोरावस्था का प्रणय, रूपासक्ति, आत्मसमर्पण की भावना और अहं का शमन कर जीवन की व्यापक सच्चाई को ग्रहण किया गया है। डॉ. धर्मवीर भारती के शब्द हैं- “किशोरावस्था के प्रणय, रूपासक्ति, और आकुल निराशा से एक आत्मसमर्पणमयी वैष्णव भावना और उसके माध्यम से अपने मन के अहं का शमन कर अपने से बाहर की व्यापक सच्चाई को हृदयंगम करते हुए संकीर्णताओं और कट्टरता से ऊपर एक जनवादी भाव-भूमि की खोज, मेरी इस छंद-यात्रा के यही प्रमुख मोड़ रहे हैं।”1 वस्तुतः धर्मवीर भारती ने धर्म, दर्शन, समाज की शोषित करने वाली रूढ़ि, मृत परम्परा व सड़े-गले मूल्यों को चुनौती दी है, अशिव को जन्म देने वाली मान्यताओं के प्रति अनास्था बरती है, किंतु मानवतावादी पक्षों को ध्यान में रखकर आस्था व विश्वास को भी उसी निष्ठा से सृजित किया। 


डॉ. भारती अपनी प्रखर मेधा का परिचय देते हुए ‘अंधायुग’ में महाभारत के मिथकीय आवरण में समकालीन युद्धजनित समस्याओं का बखूबी चित्रण ही नहीं किया, बल्कि निजी अनुभूति को व्यापक सत्य के रूप में प्रकट किया । ‘अंधायुग’ कृति के रचनागत उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए वे लिखते हैं- “......... इस कृति का पूरा जटिल वितान जब मेरे अंतर में उभरा तो मैं असमंजस में पड़ गया । थोड़ा डर भी लगा । लगा कि इस अभिशप्त भूमि पर एक कदम भी रक्खा कि फिर बचकर नहीं लौटूँगा।”2 परन्तु रचनाकार अपने दायित्व से विमुक्त नहीं हो सकता, इसीलिए वे आगे लिखते हैं- “पर एक नशा होता है- अन्धकार के गरजते महासागर की चुनौती को स्वीकार करने का, पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने को सारे खतरों में डालकर आस्था के, प्रकाश के, सत्य के, मर्यादा के कुछ कणों को बटोर कर, बचाकर, धरातल तक ले आने का।”3 

 

कविवर डॉ. भारती प्राचीनता के अर्वाचीन शिल्पी माने जाते हैं। ‘कनुप्रिया’ में राधा के चरित्र को व्यापक व्यक्तित्व का रूप प्रदान कर युगीन संदर्भों में ढालकर प्रस्तुत किया है; जहाँ समस्याओं का समाधान है। दूसरी ओर ‘सातगीत वर्ष’ की कविताओं में आधुनिक जीवन का यथार्थ, जिसमें टूटन, घुटन, निराशा, निरर्थकता, पराजय आदि भावों का स्वाभाविक चित्रण तो हुआ है, पर आशा, उत्साह, दृढ़ता व साहस के साथ सृजनधर्मी रहने का संदेश भी है। कवि की मान्यता यह रही है- “साहित्य में शब्द तभी समर्थ, प्रेषणीय और प्राणवान बनते हैं, जब उनमें मानवीय मूल्य आन्तरिक रूप से प्रतिष्ठित रहता है।”4 यही आस्था भाव कवि को सृजनात्मक धर्म की ओर प्रेरित तो करता है, पर अंतस् में निहित व्याकुलता द्वंद्व को जन्म देती है । जो कवि संक्रमणकालीन परिस्थितियों और विसंगतियों का द्रष्टा हो, वह अपने भावों को निश्चित रूप से इन्हीं शब्दों में प्रकट करेगा-

तुमने कब झेली संक्रांति / तुम क्या समझोगे ओ प्रभु !

इन गत्यवरोधों का दर्द / कैसे तरूणाई में ही /

घुट भर जाते हैं विश्वास / प्राणों की समिधाएँ

जमकर हो जाती हैं सर्द!”5

 

अंधायुग’ में ‘कृष्ण’ का चरित्र जिस रूप में प्रकट हुआ है, उस बारे में कतिपय आलोचकों का मत है कि भारती जी ने भारतीय संस्कृति में कृष्ण के प्रति आस्था को कम कर दिया है, किंतु गहराई से दृष्टिपात करें तो यह प्रकट होता है कि कृष्ण की मृत्यु अश्वत्थामा के अनास्था भाव को समाप्त कर देती है । उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

सुनो मेरे शत्रु, कृष्ण सुनो

मरते समय क्या तुमने इस नर पशु अश्वत्थामा को

अपने ही चरणों पर धारण किया

अपने ही शोणित से मुझे अभिव्यक्त किया?”6

 

भारती के कवि से ‘ध्वंस में पड़ मूर्च्छित जिंदगी’ को बहुत आशाएँ हैं। कवि ने आस्था, सृजन, उत्थान व विश्वास के इतने सहानुभूतिपूर्ण गीत गाये कि अन्तर आलोकित कर देते हैं। कवि की मानवतावादी चेतना भी क्रियात्मक एवं रचनात्मक शक्ति रखती है। कुंठा, आकुलता, हिंसा, विकृति, रक्तपात और बर्बरता में भी कृष्ण का यह आश्वासन सृजन का संदेश देता है, यथा-

मर्यादायुक्त आचरण में / नित नूतन सृजन में /

निर्भयता के / साहस के / ममता के / रस के /

क्षण में / जीवन और सक्रिय हो उठूंगा मैं बार-बार।7

 

सात गीत वर्ष’ में संकलित ‘प्रमथ्यु गाथा’ का नायक अग्निवाहक, अकेला चलने वाला, कांतिकारी और हुतात्मा है, परंतु जनसाधारण भीरू, भाग्यवादी और शक्तिहीन है। उनके कल्याण के लिए प्रमथ्यु अपने प्राणों की बाजी लगा देता है, उसका यह कर्तृत्व आशावादी दृष्टि पर ही आधारित है, यथा- 

उनमें से एक-एक के अन्दर /

मूर्च्छित प्रमथ्यु कहीं बन्दी है।

अवसर जिसे मिला नहीं साहस कर पाने का /

कोई तो ऐसा दिन होगा / जब मेरे ये पीड़ा-सिक्त स्वर /

उसके मन को वेध मुर्च्छित प्रमथ्यु को जगायेंगे।8

 

कौन चरण’ नामक कविता में कवि उस आधार की तलाश कर रहा है, जहाँ वह अपने टूटे मन के तारों को जोड़ सके । आस्था भाव उसे अभी तक अप्राप्य है । उसको पाने की आकुलता भी स्पष्ट है । आरंभ में कवि ‘ऐसे कोई भी नहीं चरण’ कहकर निराशा व अनास्था से अपने मन को भर लेता है, किंतु अंत में वह फिर अपने लक्ष्य भ्रष्ट मन को आस्था भाव से भर लेता है और कहता है-

आखिर होंगे वे यही चरण

जिसमें इस लक्ष्य भ्रष्ट मन को

मिल पाएगी अन्त में शरण ।’9

 

महाभारत की कथा में वर्णित अभिमन्यु के रथ का ‘टूटा पहिया’ कवि की दृष्टि में टूटे हुए मन का प्रतीक बन गया है । आधुनिक संदर्भ में वह व्यक्ति जो अन्याय के सामने नतमस्तक है, शौर्यहीन है, उसके लिए यह टूटा व्यक्ति भी नवीन युग के निर्माण का आश्रय बन सकता है, इन संभावनाओं के मध्य कवि की आस्थावादी दृष्टि इस तरह प्रकट की है-

मैं रथ का टूटा पहिया हूँ / लेकिन मुझे फेंको मत /

क्या जाने कब इस दुरूह चक्रव्यूह में / अक्षौहिणी

सेनाओं को चुनौती देता हुआ / कोई दुस्साहसी अभिमन्यु

आकर घिर जाये / बड़े-बड़े महारथी / अपने पक्ष

को असत्य जानते हुए भी / निहत्थी अकेली आवाज़को /

 अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें /

 तब मैं रथ का टूटा हुआ पहिया / उनके हाथों में ब्रह्मास्त्रों से

लोहा ल सकता हूँ ।”10

 

कनुप्रिया’ में राधा-कृष्ण का प्रेम शाश्वत नर-नारी का प्रेम बन गया है, जो काल की सीमा से परे है । पौराणिक होते हुए भी यह प्रणय-गाथा आधुनिक मन की दिव्यताओं और तन्मयताओं को अभिव्यक्ति देती है । कवि का निष्कर्ष यह है कि प्रेम की दुनिया को उजाड़ने वाला, अमानुषिक घटनाओं को जन्म देने वाला ‘युद्ध’ कभी भी मानव-जाति का भला नहीं कर सकता। कनुप्रिया अपने ‘कनु’ से प्रश्न करती है-

धारा में बह-बह कर आते हुए, टूटे रथ / जर्जर पताकाएँ किसकी हैं? /

हारी हुई सेनाएँ, जीती हुई सेनाएँ / नभ को कँपाते हुए,

युद्ध घोष, क्रन्दन-स्वर / भागे हुए सैनिकों से सुनी हुई ।

अकल्पनीय अमानुषिक घटनाएँ युद्ध की / क्या ये सब सार्थक हैं ?”11

 

अंधायुग’ में प्रभु अपने अवसान के क्षणों में जब ध्वंस का दायित्व अपने ऊपर लेते हैं तो भविष्य की कल्पना भी रखते हैं। आस्था का प्रश्न संजय, युयुत्सु और अश्वत्थामा के माध्यम से कवि ने प्रस्तुत किया है और अनास्था को आस्था की भूमिका के रूप में स्वीकार किया है। विदुर का निवेदन इसी का प्रमाण है-

यह कटु निराशा की / उद्धत अनास्था है / क्षमा करो प्रभु। /

यह कटु अनास्था भी अपने / चरणों में स्वीकार करो । /

आस्था तुम लेते हो / लेगा अनास्था कौन ?”12

 

आस्था और अनास्था के द्वंद्व में भी कवि का समष्टि भाव ही अधिक मुखर रहा है। ‘अंधायुग’ में युयुत्सु का चरित्र आस्था के प्रति अनास्था भाव को प्रकट करने वाला है, वहीं कृष्ण की मृत्यु पर अश्वत्थामा का आस्थावान् बन जाना अपूर्व है। ‘प्रमथ्यु गाथा’ में प्रमथ्यु का आत्मबलिदान जनसाधारण को चेतनावान बनाने का संदेश देता हे, तो ‘कनुप्रिया’ युद्ध के ध्वंस का विरोध करती है । आम आदमी की पीड़ा, संत्रास, तिरस्कार और उपेक्षा के बीच कवि का स्वर लघु मानव की शक्ति को आस्थावादी दृष्टि से देखने का रहा है। कवि की उक्त पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

हम मनुष्य बौना है, लेकिन / मैं बौनों में बौना ही बनकर

रहता हूँ / हारो मत, साहस मत छोड़ो / इससे भी अथाह शून्य में /

बौनों ने ही तीन पगों में धरती नापी ।”13

 

समग्रतः डॉ. धर्मवीर के काव्य में युगीन विद्रुपताओं, वेदना व पीड़ा की गाथाओं, युद्ध जनित विषमताओं, मानवता को त्रास पहुँचाने वाली कई घटनाओं के चित्रण के बावजूद वे अपनी आस्था का स्वर कभी ‘लघुमानव’ में तलाश करते हैं, तो कभी अश्वत्थामा के हृदय परिवर्तन में। ‘कनुप्रिया’ के कांत सम्मित उपदेश में यही दृष्टि दिखाई देती है । इस संपूर्ण रचना-प्रक्रिया में आस्था और अनास्था के द्वंद्व में आस्थावादी दृष्टि का आकर्षण- पाठकों को सदैव आकर्षित करता है और भावी मूल्यों के निर्माण की प्रेरणा भी देता है । 

 

संदर्भ

  1. ठंडा लोहा,  भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, सं. 1998, भूमिका
  2. अंधायुग, किताब महल, नई दिल्ली, सं. 1914, भूमिका
  3. वही, भूमिका
  4. मानव मूल्य और साहित्य, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, सं. 1999, पृ.177
  5. सात गीत वर्ष, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, वाराणसी, सं. 1956, पृ.43
  6. अंधायुग, किताब महल, नई दिल्ली, सं. 1914, पृ.123
  7. वही, पृ.128
  8. सातगीत वर्ष, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, वाराणसी, सं. 1956,  पृ.24
  9. वही, पृ.82
  10. वही, पृ. 79-80
  11. कनुप्रिया, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, सं. 2013, पृ.73-74
  12. अंधायुग, किताब महल, नई दिल्ली, सं.1914, पृ.19
  13. सात गीत वर्ष, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, वाराणसी, सं. 1956,  पृ.124


 

भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य का आतंरिक-प्रवाह

 

भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य का आतंरिक-प्रवाह


भारत वर्ष भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विविधता युक्त रहा है, उसी अनुरूप भाषायी विविधता भी विद्यमान रही। एक ओर भारोपीय परिवार से जन्म लेने वाली भाषाएँ यथा- संस्कृत, हिंदी, मराठी, बांग्ला, उड़िया, असमिया, गुजराती आदि में साहित्य रचना हुई तो दूसरी ओर द्रविड़ परिवार की भाषाओं- तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़ आदि में विपुल साहित्य रचा गया। अपने प्रादेशिक वैशिष्ट्य एवं सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखते हुए समग्र साहित्य ने अनंत विस्तार ग्रहण किया, परन्तु उसके व्यक्तित्व में एक­दूसरे का प्रभाव अवश्य रहा। यही आत्म­तत्त्व भाषायी विविधता के बाद भी भावात्मक एकता का आधार बना, जो अद्वितीय है। यह गौरव का विषय है कि भारतीय भाषाओं में रचा गया साहित्य अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए हुए है, यह उसका प्रखर वैशिष्ट्य भी है और प्रादेशिक संस्कृति के प्रभाव से निर्मित उसका व्यक्तित्व भी। परन्तु एक­दूसरे की सीमाएँ कब लयबद्ध हो जाती है, पता ही नहीं चलता, जैसे - बांग्ला, असमिया व उड़िया, तमिल व तेलगू, मराठी व गुजराती, कन्नड़ तथा मलयालम, पंजाबी और सिंधी, विशेष रूप से हिन्दी में इन सभी भाषाओं से गृहीत शब्दावली। यही तत्त्व भारतीय साहित्य की अन्तः धारा को रसमय बनाए हुए हैं।

आचार्य कहते हैं- संस्कृति मनुष्य के चित्त की खेती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने संस्कृति को मनुष्य के चिन्तन की उपज कहा है। वस्तुतः सम्यक् कृति ही संस्कृति है। बाबू गुलाबराय के अनुसार, “संस्कृति के मूलाधारों में- आध्यात्मिक दृष्टिकोण,सांस्कृतिक चेतना, धार्मिकता, सजीव सत्यों का संकलन, सहन शक्ति, सामाजिक चेतना आदि है।1 संस्कृति के मूलभूत तत्त्व नैतिकता, सदाशयता, सहनशीलता, शरणागत की रक्षा, आचरण की पवित्रता और समभाव की उच्चत्ता में इसकी शक्ति निहित है। चिंतन की स्वतंत्रता और उपास्य की अनेकता, वेश-भूषा और खान-पान की विविध स्वरूप के बावजूद अनेकता में एक तत्त्व की प्रधानता ही आर्यावर्त की संस्कृति का सबसे बड़ा सम्बल है। हमारा चिंतन मात्र देह तक सीमित नहीं है। स्थूल जगत् से परे हम यह विचार करते हैं कि मैं कौन हूँ? हमारा प्रत्यभिज्ञा दर्शन स्वयं की पहचान पर बल देता है। हम आत्मतत्त्व की खोज में लगे रहे। जयशंकर प्रसाद के शब्दों में हम कह सकते हैं किएक तत्त्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन2 

महादेवी वर्मा ने राष्ट्र के स्वरूप को अपने शब्दों में व्यक्त करते हुए लिखा, “राष्ट्र केवल पर्वत-नदी,या समतल का सवाल नहीं होता, उसमे उस भूमिखंड में निवास तथा विकास करने वाले मानव-समूह का जीवन अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहता है।3 राष्ट्रवादी चिन्तक श्रीराम परिहार लिखते हैं, ”राष्ट्र क्या है? उसकी संस्कृति क्या है? वस्तुतः ये दोनों मिलकर ही तो समूचे विश्व में अपनी पहचान स्थापित करते हैं, अन्यथा छह अरब की दुनिया की भीड़ में खोने के अलावा क्या है? राष्ट्र का निजत्व होता है, गुणधर्म होता है, उसकी पहचान, आकृति, अस्मिता और भूगोल होता है।4 भारतीय राष्ट्रीयता के लिए वन्देमातरम् का उद्घोष, शंकराचार्य का एकात्मभाव, विवेकानंद की विराट दृष्टि ने ही तो आने वाली पीढ़ियों को चमत्कृत कर दिशा दी। भारतीय साहित्य की पारस्परिक अन्तः संबद्धता तथा आधारभूत एकता को प्रतिबिम्बित करने वाले अनेक तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं, उनमें प्रमुख हैं - भाषाओं का जन्मकाल, विकास के चरण, सांस्कृतिक आन्दोलनों का प्रभाव, प्राचीन ग्रंथों का आधार ग्रहण आदि में समानता। यह विवेचना का एक पक्ष हो सकता है।

उर्दू और तमिल भाषा को छोड़कर समस्त भारतीय भाषाओं का जन्मकाल प्रायः समान रहा है, जैसे- कन्नड़ का प्रथम उपलब्ध ग्रंथ कविराजमार्गराष्ट्रकूट वंश के नरेश नृपतुंगद्वारा नवीं शती में रचा गया, गुजराती का आदिग्रंथ शालिभद्र सूरि रचित भरतेश्वर बाहुबलि रासबारहवीं शती की रचना है। मलयालम की प्रथम कृति रामचरितमतेरहवीं शती में रचित हुई, तो मराठी का आदिम साहित्य भी बारहवीं शती का है। तेलगू साहित्य के प्रथम ज्ञात कवि नन्नयका समय भी ग्यारहवीं शती है। असमिया साहित्य में हेम सरस्वती की रचनाएँ प्रह्लाद चरित्रतथा हरि गौरी संवादतेरहवीं शती में रचित हैं। बांग्ला में चर्यागीतों की रचना का समय दसवीं और बारहवीं शती के मध्य का माना जाता है। उड़िया के व्यास सारलादास का समय भी चैदहवीं शती का है। इसी प्रकार हिन्दी का आदिकालीन साहित्य भी ग्यारहवीं शती के आसपास का है। अतः समस्त भारतीय भाषाओं का जन्मकाल एक निश्चित अवधि में हुआ, जो इसका अन्तः वैशिष्ट्य है।

भारत की विभिन्न भाषाओं का विकास क्रम भी लगभग समान रहा है। सभी भाषाओं का आदिकाल पन्द्रहवीं शती तक का है, पूर्व मध्यकाल सत्रहवीं शती के मध्य तक, जो मुगल­शासन के वैभव तक सीमित है। उत्तर मध्यकाल अंग्रेजी शासन की स्थापना अर्थात् उन्नीसवीं शती के आरंभ तक है। उसके बाद का समय सभी भाषाओं के साहित्य में आधुनिक काल के रूप में माना गया है। यह समानांतर विकास क्रम यह इंगित करता है कि इन भाषाओं के विकास के राजनीतिक एवं सास्कृतिक आधार समान रहे हैं।

भारतीय भाषाओं को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला समान कारक रहा- धार्मिक आन्दोलन। बौद्धधर्म के पतन पश्चात् जो संप्रदाय पल्लवित हुए, उनमें नाथपंथ उल्लेखनीय है। इसका प्रभाव तिब्बत से लेकर महाराष्ट्र और दक्षिण से पूर्वी घाट के प्रदेशों तक फैला हुआ था। नाथ­पंथ के सिन्द्धान्त- हठयोग, जीवन का साधना पक्ष, आत्माभिव्यक्ति व जीवन­शैली का प्रभाव भारतीय भाषाओं के विकास के प्रथम चरण में व्याप्त रहा। इनके बाद वेदांत दर्शन से प्रभावित इनके उत्तराधिकारी संत­संप्रदाय व नवागत सूफी­संतों का प्रभाव सभी भाषाओं के साहित्य पर रहा।

संत और सूफी काव्य के उपरांत देश में वैष्णव आन्दोलन का तीव्र वेग से प्रचार हुआ। हिन्दी­काव्य में रामकाव्य और कृष्णकाव्य धारा में साहित्य रचा गया तो तमिल प्रांत में आलवार साहित्यउल्लेखनीय है। वैष्णव आन्दोलन भी द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्धैत आदि शाखाओं में विभक्त होकर बंगाल में चैतन्य संप्रदाय तक पहुँच गया। समस्त भारतीय भाषाओं में राम और कृष्ण की मधुर उपासना के गीत गाए गए और पूरा भारत वर्ष सगुण ईश्वर लीला गान से गुंजरित हो उठा। उसके बाद ईरानी संस्कृति से अनेक आकर्षक तत्त्व- वैभव­विलास, अलंकरण, सज्जा, राग­रंग, भोग आदि विकसित हुए, जिसे दरबारी संस्कृति कहा जा सकता है। साहित्य भी इससे प्रभावित हुआ और शृंगारिक विलास युक्त रचनाएँ विकसित हुईं। हिन्दी साहित्य का रीतिकाल इसी से प्रभावित है। इसके पश्चात् अंग्रेजों का आगमन, स्वतंत्रता आन्दोलन आदि में सभी भाषाओं के रचनागत विषय में आधारभूत समानता विद्यमान रही।

यह अचरज का विषय है कि भारत की भाषाओं का परिवार एक नहीं होते हुए भी उनके साहित्य की आधारभूमि समान रही है। भारतीय भाषाओं के साहित्य पर प्राचीन ग्रंथ- रामायण, महाभारत, उपनिषद् पुराण, भागवत् का आधार रहा है, परवर्ती संस्कृत ग्रंथों ने भी साहित्य की धारा को प्रभावित किया। उसमें कालिदास, बाण, भवभूति, जयदेव आदि का साहित्य केन्द्र में रहा। प्राकृत, अपभ्रंश-साहित्य पूर्व में ही सभी भारतीय भाषाओं के उत्तराधिकार में था। काव्यशास्त्र से संबंधित ग्रंथों ने सभी का पोषण किया, जैसे- भरत का नाट्य शास्त्र‘, आनंदवर्द्धन का ध्वन्यालोक‘, मम्मट का काव्य­प्रकाश‘, विश्वनाथ का साहित्य दर्पणआदि ग्रंथ सभी भाषाओं के मूल में रहे।

विश्व साहित्य की प्रथम पुस्तक, जिसे यूनेस्को ने भी स्वीकार किया है, वह है- ऋग्वेद। उसमें कहा गया है- मनुर्भवः, अर्थात् मनुष्य बनो। मनुष्यता का बोध ही भारतीय संस्कृति का मूल है, जो वर्तमान और भविष्य के लिए भी जरूरी है व रहेगी। हमें यह समझना होगा कि भारतवर्ष पूर्वी-पश्चिमी सभ्यताओं का समूह नहीं, वरन मानवता का संस्कार देने के लिए ईश्वरीय योजनानुरूप इस राष्ट्र का उदय हुआ। यजुर्वेद में कहा गया कि हम राष्ट्र के पुरोहित हैं। हम भोग में भी त्याग के समान आचरण करते हैं। विश्व के सभी प्राणी सुखी हों, ऐसी उदात्त भावना है। हम प्रकृति के सहचर हैं, जिससे हम रस ग्रहण कर जीवन को गति प्रदान करते हैं, दूसरी ओर पश्चिमी दृष्टि की धारणा है कि मनुष्य का प्रकृति पर आधिपत्य है और वह भोग के लिए है। भारतीय परम्परा का ज्ञान हमारे साहित्य ने करवाया। राम, कृष्ण, वाल्मीकि, वेदव्यास का व्यक्तित्व हमारी विरासत में साहित्य की देन है। शरीर नश्वर है, कर्म ही जीवन है, ज्ञान, इच्छा और क्रिया का समन्वय होना चाहिए यह सब हमारे साहित्य में लिखा गया और अपने-अपने समय के अनुकूल लिखा गया। शंकराचार्य ने आठ साल की उम्र में वेदों की ऋचाओं का अध्ययन किया और बारह वर्ष की आयु में वेदान्त की पुनर्व्याख्या कर वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना कर दी।

भारत की विशालता और विविधता के बावजूद उसे परस्पर जोड़ने में संस्कृत-साहित्य का अन्यतम महत्त्व हैं। वेद, उपनिषद, स्मृति, ब्राह्मण ग्रन्थ, रामायण, महाभारत, चरक, सुश्रुत इत्यादि में सांस्कृतिक चेतना का ऐसा युग-युगीन सेतु बन चुका है, जिसमें पूरा भारत वर्ष एक बना हुआ है। कालिदास का रघुवंश, महाकाव्य, भवभूति और अश्वघोष का साहित्य, माघ और भाष का चिंतन हमें जिस संस्कृति का आसव परोसता है, वही हमारी राष्ट्रीयता का सबसे बड़ी खुराक है। संस्कृति की इस चेतना को बलवती बनाने में कश्मीर के पंडितों व आचार्यों का सराहनीय महत्त्व है। आचार्य कल्हण द्वारा लिखित राजतरंगिणी इतिहास का महाभारत के बाद पहला ग्रन्थ माना जाता है। इसी प्रकार विल्हण का योगदान कम नहीं है। जिस कश्मीर में आतंक का ताण्डव चक्र रहा है वहां कभी- 8वीं से 12 वीं शती तक भिज्ञा दर्शन का साम्राज्य था, जिसमें शैवोपासना की संस्कृति का उज्ज्वल प्रकाश बिखरता रहता था। इसी काल के दसवीं से ग्यारहवीं शती मे आचार्य अभिनवगुप्त ने ध्वनि में रस और रस में जीवन तलाशने का भगीरथ प्रयास किया था।

डॉ. विनीता राय लिखती हैं, “जीवन के मूल्य वास्तव में संस्कृति के अंगभूत हुआ करते हैं। हम अपने मूल्यों के माध्यम से राष्ट्र और संस्कृति का परिचय देते हैं।5  विवेकानंद ने 30 वर्ष की उम्र में अपने ज्ञान से दुनिया को पागल कर दिया था। उन्होंने 1200 वर्ष बाद शंकराचार्य की परम्परा को संवाहित किया। यह स्पष्ट किया कि मनुष्य श्रेष्ठ है। मनुष्य का अस्तित्व मानवता की पराकाष्ठा है एवं आत्म तत्त्व को पहचानना है। डॉ. देवराज ने मानव मूल्यों को सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हुए कहा, ”किसी व्यक्ति की संस्कृति वह मूल्य चेतना है, जिसका निर्माण उसके सम्पूर्ण बोध के आलोक में होता है।6 यही कारण है कि पश्चिम के विज्ञान और पूर्व के ज्ञान के समन्वय पर बल देने वाला व्याख्यान भारत को दुनिया में सिरमौर बनाता है। 1913 में गीतांजलि पर टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिलता है। मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में जन चेतना को जाग्रत करती है। 1915 मेंउसने कहा थाकहानी उस शाश्वत वचन को प्रमाणित करती हैं, जिसमें कहा गया है किरघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई। साकेत का यह कथन विचारणीय है-संदेश नहीं मैं यहाँ स्वर्ग का लाया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।यह साहित्य समकाल में लिखा गया, जो हमारी परम्परा से प्रभावित था। 1936 मेंराम की शक्ति पूजाभी अपने अन्दर रामत्व को जगाने का प्रयास है। कामायनी अथवा दिनकर, अज्ञेय अथवा धर्मवीर भारती सबने उस भारतीय परम्परा को आगे बढ़ाया, जिसके सूत्र वैदिक ऋषियों से प्राप्त हुए थे। अतः राष्ट्र को सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नत बनाने में साहित्य का योगदान अतुल्य है। 

भारत की संस्कृति का निर्माण, सौ दो सौ वर्ष में नहीं, हिमालय की तरह हजारों वर्ष में हुआ है। उसके निर्माण के कई कारक हैं। साहित्य का अवदान उसमें अन्यतम है। यह साहित्य लोकभाषाओं से संस्कृत भाषा का व्याप्त है। यद्यपि यह कहना अर्धसत्य होगा कि संस्कृति का निर्माण साहित्य ही करता है पर साहित्य का संबल धारण कर संस्कृति शक्तिमान  बनती है। भारत के विभिन्न अंचलों में व्याप्त बोलियों का एक विशाल साहित्य है। उस विशाल लोक साहित्य में संस्कृति की अनेक तरंगे प्रस्फुटित हुई हैं। हिन्दी की तमाम उपबोलियों में, पंजाबी जुबान के साहित्य में, बंगला, उड़िया, असमिया, मलयालम, कन्नड़, तेलगू, तमिल भाषाओं में व्याप्त भारतीय संस्कृति के विविध रंग मिलते हैं- पर उन रंगों का आस्वाद एक जैसा है। राजस्थानी लोकगीतों के प्रवाह में संस्कृति का रत्न छिपा है। कहना न  होगा कि भारत की इन भाषाओं-उपभाषाओं में संस्कृति की समझ बड़ी समृद्ध है। अनेक भावों की अंतर तरंगे अध्यात्म के महाभाव में मिलकर एक महातरंग को जन्म देती हैं। भाषा-उपभाषा में लिखित और मौखिक साहित्य की लिपि भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, उच्चारण में भेद हो सकते हैं, भौगोलिक विभिन्नताएँ हो सकती हैं, कहीं रेगिस्तान, कहीं हरियाली, कहीं मैदान तो कहीं पहाड़ हो सकते है- पर सबका भाव एक ही होता है- जीवन में अध्यात्म का चटकीला रंग। काव्य-महाकाव्य, खंडकाव्य, गद्यकाव्य, चम्पूकाव्य शैली की दृष्टि से भले ही पृथक-पृथक हों पर भाव की दृष्टि से उनकी एकात्मकता की संस्कृति का प्राण-तत्त्व बनता है। 

अपनी संस्कृति का सीधा संवाद साहित्य से होता है। नदी, नारी और संस्कृति का प्रवाह शाश्वत होता है। नारी का एक प्रकृष्ट रूप माँ होती है। वह शास्त्र से बड़ी और गुरु से भी अधिक पूज्य होती है। शास्त्र जब निःशब्द हो जाते है तब माँ की बात ही अंतिम होती है। वह संस्कृति की प्रतीक होती है। नदी भी उसी का रूप है। न नारी वृद्ध होती है और न संस्कृति। इन दोनों का अविरल प्रवाह साहित्य में दिखता है। पं. विद्यानिवास मिश्र साहित्य और संस्कृति के अन्तः सम्बन्ध को इस प्रकार व्याख्यायित करते हैं-इस देश की संस्कृति सीता है, जो धरती से जनक के हल के नोक से पैदा हुई हैं। इस देश की संस्कृति गंगा है, जिन्हें भगीरथ ने अपने परिश्रम से पहाड़ खोदकर निकाला था। इस देश की संस्कृति गौरी है, जिन्होंने अपने प्रियतम को सौन्दर्य से नहीं तम से प्राप्त किया था। इस देश की संस्कृति असंख्य ग्रामीण बन्धु और वनवासी हैं, जो असंख्य बाधाओं को राम की धनुही से तोड़ने का विश्वास रखते है

 भारतीय चिंतन परम्परा व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित है। हमारे जीवन का कोई पक्ष ऐसा नहीं है, जिस पर हमारी परंपरा ने विचार नहीं किया। हमारे शास्त्रों ने जीवन के उज्ज्वल उदात्त पक्ष को ग्रहण करने पर सदैव बल दिया। यह प्रयास भारतीय साहित्य में निरंतर विद्यमान रहा कि नवनीत छूट न जाए, उसी के कारण वैश्विक पटल पर भारतीय साहित्य अप्रतिम गहराई के साथ खड़ा है।

सहायक ग्रन्थ सूची 

1. बाबू गुलाबराय, भारतीय संस्कृति की रूपरेखा, ज्ञानगंगा प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2008, पृष्ठ-26 

2. जयशंकर प्रसाद, कामायनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2014, पृष्ठ-1

3. धर्मवीर भारती (सं.), धर्मयुग, फरवरी,1987, पृष्ठ-

4. डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष (सं.)राष्ट्रबोध, संस्कृति एवं साहित्य, अंकुर प्रकाशन, उदयपुर, सं. 2019 पृष्ठ-33

5. डॉ. विनीता राय, मूल्य और मूल्य संक्रमण, अनिल प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 2005 पृष्ठ-15 

6. डॉ. देवराज, संस्कृति का दार्शनिक विवेचन, सू.प्र.विभाग,उ.प्र.,लखनऊ सं.1957, पृष्ठ-175

7. डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष (सं.),राष्ट्रबोध, संस्कृति एवं साहित्य, अंकुर प्रकाशन, उदयपुर, सं. 2019 पृष्ठ-34

 

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 (संगम विश्वविद्यालय, भीलवाड़ा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत एवं प्रकाशित)

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