कविता की रचना प्रक्रिया


कविता की रचना प्रक्रिया 



             आचार्य शुक्ल के अनुसार जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती हैउसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा  कहलाती है,हृदय की  इसी  मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है,उसे कविता कहते हैं। अर्थात आत्म की अभिव्यक्ति ही रचना की प्रथम प्रक्रिया है, लेकिन जब तक यह संवेदना से नहीं जुड़ती तब तक संपूर्ण सृष्टि से नहीं जुड़ पाती ।

        वाचिक परंपरा के रूप में जन्म लेने वाली कविता वर्तमान में लिखित रूप में मौजूद है। सारी जटिलता के बावजूद कविता हमारी संवेदना के निकट होती हैI संवेदना ही कविता का मूल है। इसे राग-तत्व भी कहा जाता हैI यही संवेदना समस्त चराचर जगत से जुड़ने और उसे अपना लेने का सार्थक प्रयास करती है।

      तीव्र संवेदना के कारण ही क्रौंच युगल की मृत्यु के बाद महाकवि वाल्मीकि का आदिकाव्य प्रकट होता है।पक्षी की पीड़ा के साथ कवि की संवेदना जाग्रत होकर इस प्रकार प्रकट होती है-

मा निषाद ! प्रतिष्ठाम त्वंगम: शाश्वती समाः ।
यत्क्रौंच मिथुनादेकमवधी: काममोहितम ।।

     वस्तुतः रचनाकार जगत में घटित घटनाओं को देखता है और अपनी  तीव्र संवेदना से वह उन्हें आयत्त कर लेता है, उसी के धरातल पर खड़ा होकर जब वह अपनी वाणी प्रकट करता है, तो वे विचार आम हो जाते हैं।

      आचार्य भरतमुनि के रस सूत्र को अभिनवगुप्त ने स्पष्ट करते हुए कहा कि रस अभिव्यक्त होता है, अर्थात कवि की वाणी को सुनकर सहृदय के  मन में स्थित स्थायी भाव जाग्रत होकर रस रूप में परिणत हो जाते हैं, ऐसी स्थिति में रचनाकार की क्षमता श्रोता के हृदय  में भाव जगाने की होनी चाहिए,जो कि  राग तत्त्व से ही संभव है।

       कविता एक ऐसी कला है जिसमें किसी भी  उपकरण की मदद नहीं ली जा सकती, उसे मात्र  भाषा की मदद मिलती है। इस प्रकार कविता की दुनिया का पहला उपकरण है-शब्द। शब्दों का मेलजोल कविता की पहली शर्त हैI जब रचनाकार कविता की दुनिया में प्रवेश करता है,तो उसे पहले शब्दों से खेलना पड़ता है, इससे नाद और ध्वनि से संगीतात्मकता प्राप्त होती है। शब्दों का यह खेल धीरे धीरे उसे आगे ले जाता है और एक व्यवस्था निर्मित करता है,जिससे कविता रचना आसान होता जाता है।

       कविता की  दूसरी अनिवार्य शर्त है-बिम्ब निर्माण I हमारे पास दुनिया को जानने का एकमात्र सुलभ साधन इन्द्रियाँ  ही हैं। बाहरी संवेदना मन के स्तर पर बिम्ब  के रूप में बदल जाती हैI जब कुछ विशेष शब्दों को सुनकर अनायास मन के भीतर कुछ चित्र उभर आते हैं यह स्मृति चित्र ही शब्दों के सहारे कविता का बिम्ब  निर्मित करते हैं । कविता में बिम्बों का विशिष्ट महत्व है। जयशंकर प्रसाद प्रकृति का मानवीकरण करते हुए बिम्ब प्रस्तुत करते हुए उषा का चित्र खींच देते हैं-

बीती विभावरी जाग री
अम्बर पनघट में डुबो रही ,
ताराघट उषा नागरी ।

        कविता में चित्रों या बिम्बों का प्रभाव अधिक पड़ता है Iकवि ने यहाँ उषाकालीन वेला को पनघट पर जल भरती हुई स्त्री के रूप में चित्रित किया है। अतः कविता कि रचना करते समय दृश्य और बिम्ब कि सम्भावना तलाश करनी चाहिए।  ये बिम्ब सभी को आकर्षित करते हैं । बिम्ब हमारी ज्ञानेन्द्रियों को केंद्र में रखकर निर्मित होते हैं ,जैसे- चाक्षुष, घ्राण, आस्वाद्य, स्पर्श्य और श्रव्य । चाक्षुष बिम्ब का उदाहरण द्रष्टव्य है –

है अमानिशा ,उगलता गगन घन अन्धकार ,
खो रहा दिशा का ज्ञान ,स्तब्ध है पवन-चार ,
अप्रतिहत गरज रहा,पीछे अम्बुधि विशाल,
भूधर ज्यों ध्यानमग्न,केवल जलती मशाल ।

          इन पंक्तियों में वातावरण की भयंकरता के साथ राम के मन कि दशा का भी बिम्ब उभर आता है ।

        आधुनिक कविताएँ  अतुकांत होती है, परंतु उसमें भी आतंरिक लय  होना जरूरी है। मुक्त छंद की कविता लिखने के लिए भी अर्थ की लय  निर्वाह जरूरी हैI कवि को भाषा के संगीत की पहचान होनी चाहिए। आधुनिक कविता में आंतरिक लय का निर्वाह इन पंक्तियों में द्रष्टव्य है –

वह तोड़ती पत्थर,
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर,
वह तोड़ती पत्थर I

           यहाँ पर कोई छंद न होते हुए भी ‘र’ की आवृत्ति से लय उत्त्पन्न हो गई है।

            परिवेश के साथ-साथ कविता के सभी घटक परिवेश के सन्दर्भ  से परिचालित होते हैंI नागार्जुन की  कविता ‘अकाल और उसके बाद’ में परिवेश को नई भाषा ,बिम्ब छंद और संरचना के साथ प्रस्तुत किया गया है ,यथा-

कई दिनों तक चूल्हा रोया ,चक्की रही उदास ,
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास ,
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त ,
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।

         यहाँ चूल्हा,चक्की ,कुतिया,भीत आदि शब्दों में ग्रामीण परिवेश की हालत प्रकट होती है । ‘कई दिनों तक’ के बार–बार दोहराव से अकाल की गंभीरता ध्वनित होती है । इसी प्रकार ‘गश्त’और ‘शिकस्त’ शब्द में भाषागत आकर्षण है ।

        कवि की  वैयक्तिक  सोच ,दृष्टि और दुनिया को देखने का नजरिया कविता की भाव-संपदा बनती है। कवि की इस वैयक्तिकता में  भी सामाजिकता मिली होती है।  इसी कारण उसकी निजी अनुभूतियाँ  भी सामाजिक अनुभूतियाँ  बन जाती है। इन्हीं तत्त्वों  को उजागर करने का कार्य प्रतिभा करती है। इसे कविता का मूल हेतु माना गया है ,जिसके माध्यम से कवि अपनी रचना कर पाता हैI अतः कविता की रचना एक प्रक्रिया से गुजरने के बाद प्रभावकारी बन जाती है।

मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा

मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा




राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986 की भूमिका में शिक्षा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए लिखा गया है- “शिक्षा मानव इतिहास के आदिकाल से ही उद्विकसित होती रही है तथा विविध भाँति विकसित होकर अपनी पहुँच तथा आवरण बढ़ाती रही है। प्रत्येक देश अपनी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को प्रकट करने, बढ़ावा देने के लिए और चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी शिक्षा प्रणाली विकसित करता है।” इस दृष्टिकोण से समग्र भारतीय अवधारणा को केन्द्र में रखकर शिक्षा नीति लागू हुई। इसकी परिकल्पना में संविधान के सिद्धान्त, सामाजिक परिदृश्य, वैज्ञानिक दृष्टि और भविष्य की चुनौतियों का सामना करना मुख्य अभिप्रेत था।

शिक्षा वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का अनुपम साधन है। यही राष्ट्रीय शिक्षानीति का आधारभूत सिद्धान्त भी है। राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के अनुसार 10$2$3 के ढाँचे को व्यापक विचार-विमर्श पश्चात् पूरे देश में स्वीकार किया गया। पाठ्यचर्या में समान बिन्दुओं की राष्ट्रीय स्तर पर रूपरेखा भी निर्मित हुई और यह तय किया कि भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन, संवैधानिक जिम्मेदारियों तथा राष्ट्रीय पहचान से संबंधित अनिवार्य तत्त्व शिक्षा-व्यवस्था में रहेंगे। विभिन्न स्तरों पर शिक्षा के तौर-तरीके भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत हुएI बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा को बेहतर बनाने की दृष्टि से विशेष प्रयत्न इस नीति के अनुरूप हुए । प्राथमिक शिक्षा ऐसा आधार है, जिस पर देश तथा इसके प्रत्येक नागरिक का विकास निर्भर करता है। भारत में संसद द्वारा 2009 में ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ पारित किया गया। इसके प्रावधान अनुसार 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया।

प्रारंभिक शिक्षा की प्रथम आवश्यकता है- शिक्षण की सहजता। आशय यह है कि बच्चे तक जो कुछ भी पहुँचे, वह बहुत इत्मीनान और सहजता से पहुँचे। शुरू से ही उसे सिखाने के लिए बाल-केन्द्रित और क्रियात्मक प्रक्रियाओं को सहारा लिया जाना चाहिए। इस हेतु सर्वप्रथम विधार्थी के भाषायी कौशलों को विकसित किए जाने पर बल दिया गया। वस्तुतः मनुष्य के ज्ञानात्मक, मानसिक, भावात्मक एवं सामाजिक विकास का सशक्त माध्यम भाषा है। उच्च प्राथमिक स्तर पर विधार्थी तीन भाषाओं का अध्ययन करता है। प्रथम भाषा में उच्च प्राथमिक स्तर पर सुनना, बोलना, पढ़ना एवं लिखना आदि कौशलों को सीखने के साथ ही शिक्षार्थी उस भाषा के साहित्य से परिचित होता है। द्वितीय एवं तृतीय भाषा के अंतर्गत शिक्षार्थियों में भाषायी कौशलों का सामान्य विकास, अर्थग्रहण एवं विचाराभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करना है, साथ ही तार्किक क्षमता, संवेदनात्मकता आस्वादन, सृजनात्मक अभिव्यक्ति तथा भाषागत मानवीय व्यवहार की गरिमा का विकास करना है। स्पष्ट है कि प्रथम भाषा, जिसे मातृभाषा कहा जाता है, उसे शिक्षण में प्राथमिकता का उद्देश्य निहित रहा।

जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है, उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं। मातृभाषा, किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषायी पहचान भी होती है। विश्व में विगत 40 वर्षों में लगभग 150 अध्ययनों का निष्कर्ष यह है कि प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिए। भारत में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 में भी इसी बात पर बल दिया गया। इस दृष्टि से इस बात पर विचार होना आवश्यक है कि हमारे देश में प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम क्या है? और मातृभाषा को माध्यम क्यों बनाया जाना चाहिए?

यह सर्वविदित है कि मातृभाषा के बिना किसी भी देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है। मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश-प्रेम की भावना उत्प्रेरित करती है। मातृभाषा आत्मा की आवाज़ है। माँ के आँचल में पल्लवित हुई भाषा बालक के मानसिक विकास को शब्द व प्रथम संप्रेषण देती है। इसके माध्यम से ही मनुष्य सोचता-समझता और व्यवहार करता है। इसीलिए मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा बालक का प्राकृतिक अधिकार भी है। बच्चे का शैशव जहाँ व्यतीत है, जिस परिवेश में यह गढ़ा जा रहा है, जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएँ सीख रहा है, जहाँ विकसित हो रहा है, उस महत्त्वपूर्ण पहलू की उपेक्षा नहीं की जा सकती । 

शिक्षा का अधिकार बालक का संवैधानिक अधिकार है, ऐसी स्थिति में यह अधिकार स्वतः ही मातृभाषा से जुड़ जाता है। अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करना बच्चे का अधिकार है, उस पर दूसरी भाषा को जबरन थोप देना, उसके स्वाभाविक विकास को रोकना उसके अधिकारों का हनन है। मातृभाषा सीखने, समझने एवं ज्ञान की प्राप्ति में सरल है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने स्वयं के अनुभव के आधार पर कहा कि मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना, क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का कथन है- “यदि विज्ञान को जन-सुलभ बनाना है तो मातृभाषा के माध्यम से विज्ञान की शिक्षा दी जानी चाहिए।” इसी प्रकार महात्मा गांधी का मत है- “विदेशी माध्यम ने बच्चों की तंत्रिकाओं पर भार डाला है, उन्हें रट्टू बनाया है, वह सृजन के लायक नहीं रहे.......... विदेशी भाषा ने देशी भाषाओं के विकास को बाधित किया है।”

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में कहा गया कि अधिकांश बच्चे स्कूल जाने से इसलिए कतराते हैं कि शिक्षा का माध्यम वह नहीं है, जो भाषा घर में बोली जाती है। भाषा भावनाओं और संवेदनाओं को मूर्तरूप दिए जाने का माध्यम है न कि प्रतिष्ठा का प्रतीक। विश्व के अन्य देशों में मातृभाषा की क्या स्थिति है, इसका वैचारिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि विविध राष्ट्रों की समृद्धि और स्वाभिमान की जड़ें मातृभाषा से सिंचित हो रही हैं। राष्ट्र की क्षमता और राष्ट्र के वैभव की समृद्धि करती हैं और न हीं राष्ट्रीयता के भाव को जाग्रत करती है। संस्कार, साहित्य, संस्कृति, सोच, समन्वय, शिक्षा, सभ्यता का निर्माण, विकास एवं वैशिष्ट्य मातृभाषा में ही संभव है।

प्रो0 रामदेव भारद्वाज, पूर्व कुलपति अटलबिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल ने मातृभाषा को राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ते हुए लिखा- “मातृभाषा मात्र संवाद ही नहीं, अपितु संस्कृति और संस्कारों की संवाहिका है। भाषा और संस्कृति केवल भावनात्मक विषय नहीं, अपितु देश की शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी विकास से जुड़ा है। मातृभाषा के द्वारा ही मनुष्य ज्ञान को आत्मसात् करता है, नवीन सृष्टि का सृजन करता है तथा मेधा, पौरुष और ऋतंभरा प्रज्ञा का विकास करता है। किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा और उसकी संस्कृति से होती है। यह मानवीय सभ्यता की धरोहरों की तरह एक धरोहर है।” 

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव श्री अतुल कोठारी का अभिमत है- “यह तर्क आधारहीन है कि अंग्रेजों के बिना व्यक्ति और देश का विकास संभव नहीं है। विश्व के आर्थिक और बौद्धिक दृष्टि से संपन्न देशों- अमेरिका, रूस, चीन जापान, कोरिया, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इजराइल में गणित और विज्ञान की पढ़ाई, शिक्षा एवं शासन-प्रशासन की भाषा उनकी मातृभाषा ही है।” 1949 तक भूखमरी की प्रताड़ना भोग रहा चीन आज प्रभावशाली ढंग से विश्व में अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है। जिस तीव्रगति से चीन ने विकास किया, उसका प्रमुख कारण मातृभाषा में शिक्षण ही है। यह भी एक प्रमाणित तथ्य है कि विश्व जी.डी.पी. का प्रथम पंक्ति में जो 20 राष्ट्र हैं, उनके समग्र कार्य उस देश की मातृभाषा में ही संपादित होते हैं तथा साथ ही जो सबसे पिछड़े 20 देश हैं उनमें अध्ययन-अध्यापन एवं शोध कार्य विदेशी आयातीत भाषा में होते हैं। इससे मातृभाषा का महत्त्व स्वयमेव उजागर हो जाता है।

वर्तमान भारतीय शैक्षिक परिदृश्य का अवलोकन करें तो जो तथ्य उभरकर आते हैं, वे दुर्भाग्यपूर्ण और चिन्ताजनक हैं। प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों को मातृभाषा से विमुख कर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित करने की होड़ प्रारंभ हो गई है। गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय उग आए हैं, इससे यही संकेत मिलता है। परिणाम जो उभर कर आ रहे हैं, वे और भी घातक हैं। अब शिक्षार्थी न तो अंग्रेजी भाषा जान पा रहा है और न ही मातृभाषा। लोक भाषाओं और राष्ट्रीय भाषाओं को स्रोत सूखते जा रहे हैं और भाषा-संस्कार से हामारी आने वाली पीढ़ी विमुख भी होती जा रही है। भौतिकता और अंग्रेजी मानसिकता की अंधी दौड़ में बच्चों के बचपन का सर्वाधिक क्षरण हुआ है। 

अबोध बालक अपने शैक्षणिक जीवन के प्रथम कदम पर एक ओर विद्यालय में अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा का श्रवण करता है तो परिवार व समाज में मातृभाषा में संवाद करता है । अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति के लिए उसका मानसिक संघर्ष केवल भाषायी अनुवाद में उलझकर रह जाता है। एक तरह से वह अपने आपको कृत्रिम वातावरण में महत्त्वपूर्ण क्षणों को खो देता है, यह स्थिति विद्यार्थी के लिए और भावी नागरिक निर्माण की दृष्टि से कितनी भयावह है? इसकी कल्पना की जा सकती है। यही विभ्रम बालक के व्यक्तित्व उन्नयन और राष्ट्रीय विकास में बाधा बनकर उपस्थित हुआ है। इसी भ्रम में वैश्वीकरण की दौड़ में मातृभाषा का तिरस्कार करने एवं भाषायी विभ्रम को सच मानकर प्रतिष्ठा का सूचक विदेशी भाषा को मान लिया है। यह मिथ्या प्रचार राष्ट्रीय-संस्कृति के पतन की शुरूआत तो है ही साथ ही वैज्ञानिक चिन्तन का स्थान भी अंधानुकरण ने ले लिया, हमारी भाषा के प्रति हीनता बोध ने भाषायी उपनिवेशवाद को जन्म दे दिया है। अन्ततः हमें यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति और विकास का स्रोत मात्र पूंजी और तकनीक नहीं, अपितु उस राष्ट्र की संकल्प-शक्ति होती है और इसका जन्म मातृभाषा से होता है।

भारतवर्ष, जिसकी आबादी 125 करोड़ से अधिक है। यह देश अभूतपूर्व साहित्य, वैज्ञानिक चिन्तन, समृद्ध प्राकृतिक धरोहर और विराट चिन्तन आधारित सांस्कृतिक दृष्टि संपन्न है, परन्तु मातृभाषा में अध्ययन और शोध की दृष्टि से सर्वाधिक पिछड़ा है। यहाँ तक तो ठीक, लेकिन भारतीय भाषाओं के वनिस्पत विदेशी भाषा अंग्रेजी के प्रति अत्यधिक व्यामोह चिंताजनक है। भारत एक बहुभाषी देश है। सभी भारतीय भाषाएँ समान रूप से हमारी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता की अभिव्यक्ति करती है। यद्यपि बहुभाषी होना एक गुण है, किन्तु मातृभाषा में शिक्षण वैज्ञानिक दृष्टि से व्यक्तित्व विकास के लिए परम आवश्यक है। प्रारंभिक शिक्षण किसी विदेशी भाषा में करने पर जहाँ व्यक्ति अपने परिवेश, परम्परा, संस्कृति व जीवन-मूल्यों से करता है, वहीं पूर्वजों से प्राप्त होने वाले ज्ञान, शास्त्र, साहित्य आदि से अनभिज्ञ रहकर अपनी पहचान खो देता है।

  महामना मदनमोहन मालवीय, महात्मागांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, डॉ. राधाकृष्णन जैसे मूर्धन्य चिन्तकों से लेकर चन्द्रशेखर वेंकटरमन, प्रफुल्ल चन्द्र रॉय, जगदीश चन्द्र बसु जैसे वैज्ञानिकों, प्रमुख शिक्षाविदों तथा मनोवैज्ञानिकों ने मातृभाषा में शिक्षण को ही नैसर्गिक व वैज्ञानिक बताया है। राधाकृष्णन आयोग और कोठारी आयोग की अनुशंसाएँ भी मातृभाषा के पक्ष में रही हैं। अतः भारत के समुचित विकास, राष्ट्रीय एकात्मकता एवं गौरव को बढ़ाने हेतु शिक्षण एवं लोक व्यवहार में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा दिया जाना परम आवश्यक है। इस दृष्टि से केन्द्र व राज्य सरकारों को अपनी भाषा नीति का पुनरावलोकन कर प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा अथवा संविधान स्वीकृत प्रादेशिक भाषा में देने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही शिक्षा के साथ प्रशासन और न्याय निष्पादन की भाषा भी भारतीय हों, इसकी समुचित पहल होनी चाहिए। 

संदर्भः
1. जे.सी. अग्रवाल, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, प्रभात प्रकाशन दिल्ली।
2. डॉ.रामनाथ शर्मा, प्रमुख भारतीय शिक्षा दार्शनिक, एटलांटिक पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली। 
3. डॉ.लक्ष्मीलाल ओड़,शिक्षा की दार्शनिक  पृष्ठभूमि, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर।
4. सुभाष कश्यप,हमारा संविधान, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली।
5. प्रो.रामदेव भारद्वाज,आलेख- मातृभाषा, राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय स्वाभिमान, बंसल न्यूज,छत्तीसगढ़ ।
6. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली ।
7. शिक्षाक्रम-2002, राजस्थान राज्य पाठ्य पुस्तक मंडल, जयपुर।
- - -

Search This Blog

मेरी रचनाएं अपने ई-मेल पर नि:शुल्क प्राप्त करें