छ्ठा संस्करण : सामान्य हिन्दी

छठा संस्करण 
पुस्तक: सामान्य हिन्दी
प्रकाशक: राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर
 मुद्रित मूल्य : 175/-

प्रियप्रवास का महाकाव्यत्व

प्रिय-प्रवास  का महाकाव्यत्व
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ललित काव्य की एक विधा का रूप धारण कर महाकाव्य ‘साहित्यशास्त्र‘ का विषय बन गया और आचार्यों ने इसे भी लक्षण बद्ध कर दिया। भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-शास्त्रीय परम्परा में इसका पर्याप्त विवेचन हुआ है। आधुनिक संदर्भों में ‘महाकाव्य‘ पद में ‘महा‘ विशेषण कृति के विपुल-व्यापक आकार, महान् कलेवर, उत्कृष्ट विषय-वस्तु तथा प्रतिपाद्य विषय की रचनात्मक गरिमा का द्योतक है। महाकाव्य की कथावस्तु, नायकत्व, चरित्र-चित्रण, युगीन परिवेश, वस्तुवर्णन, भाव एवं रस, निरूपण तथा शैली की उन्नत गरिमा रहती है। इस दृष्टि से ‘प्रिय प्रवास‘ खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। अप्रतिम वस्तु सौन्दर्य, उत्कृष्ट रचना-विधान एवं परम औदात्य का निर्वहन होनेसे ‘हरिऔध‘ की यह कृति उनकी अद्भुत प्रतिभा एवं गहन अनुभूति का प्रमाण है। महाकाव्यत्व की विशेषताओं के आधार पर ‘प्रिय-प्रवास‘ का मूल्यांकन निम्नानुसार है -
महाकाव्य में आकार की व्यापकता होती है। अर्थात् उसमें जीवन का सर्वांग चित्रण रहता है। महान् पुरूष का जीवन-चरित्र होने से अनायास ही वह देश-काल की सीमा से विस्तारित हो जाता है। अंततः महत्तर मानव-मूल्यों की प्रतिस्थापना करने में महाकाव्य की सफलता निश्चित होती है। सत्रह सर्गों में विभक्त ‘प्रिय प्रवास‘ की कथावस्तु श्रीकृष्ण के मथुरा गमन के वृतान्त पर आधारित है। विरह-व्यथित ब्रजवासियों ने श्रीकृष्ण का गुणगान करते हुए उनके कर्तृत्व का वर्णन भी किया है, जैसे - पूतना वध, शकठासुर वध, कालिया नाग वध, बकासुर वध आदि। इससे कथानक सुसंगठित रूप में प्रकट होता है। कथा-संधियों, अर्थ-प्रकृतियों एवं कार्यावस्थाओं के विधान से प्रिय-प्रवास ने यशोदा-विलाप, पवन-दूती प्रसंग, राधा-उद्धव संवाद आदि के माध्यम से कथावस्तु में मार्मिक-स्थलों की पहचान भी की है। कथानक के नायक ‘श्रीकृष्ण‘ की महानता लौकिक पुरुष के रूप में चित्रित है, जिसमें आदर्श, नैतिकता, लोकसेवा एवं मानवता का कल्याण परम उद्देश्य है। श्रीकृष्ण के चरित्र का युगीन चित्रण विलक्षण है। ‘विश्वम्भर मानव‘ के अनुसार - ‘‘ ‘प्रिय प्रवास‘ भारतीय नव-जागरण काल का ही महाकाव्य नहीं, वह जीवन के श्रेष्ठतम मानव-मूल्यों का कीर्ति-स्तंभ भी है। वैज्ञानिक युग की विभीषिका में मानवतावाद का विजयघोष है। कृष्ण को केन्द्र बनाकर इसमें जो कथा वर्णित है, उससे मनुष्य की महत्ता, जीवन की सुन्दरता, प्रेम की शक्ति और सबसे अधिक मानवीय संबंधों की अनुपम कोमलता पर प्रकाश पड़ता है।‘‘
महाकाव्य परम्परानुसार प्रिय प्रवास के नायक-नायिका श्रीकृष्ण एवं राधा हैं, जो पौराणिक काल के आदर्श हैं। श्रीकृष्ण महान् पुरूष एवं राधा उदात्त नायिका के रूप में चित्रित हैं। मौलिकता यह है कि राधा-कृष्ण परम ब्रह्म न होकर मानव-मानवी हैं। श्रीकृष्ण लोक सेवक एव ंराधा लोक सेविका है। इन दोनों के माध्यम से कवि ने मानवीय प्रेम को धीरे-धीरे इतनी उच्च भूमि पर ले जाकर प्रतिष्ठित किया है कि वह व्यक्ति, परिवार, ग्राम और समाज की सीमाओं को पार करता हुआ विश्व-प्रेम में परिवर्तित हो जाता है। श्रीकृष्ण के लोकसेवक रूप का चित्रण द्रष्टव्य है -

जो  होता  निरत तप  में मुक्ति की कामना से।
आत्मार्थी है, न कह सकते हैं उसे  आत्मत्यागी।
जी से प्यारा जगत-हित औ लोक-सेवा जिसे है।
प्यारी सच्चा अवनि-तल में आत्म त्यागी वही है।।

राधा सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति, मृदुभाषिणी एवं श्रीकृष्ण की अनन्य प्रेयसी है। लोक सेवा के लिए वह प्रिय-वियोग को स्वीकार कर लेती हैं। सामान्य मानव-जनित उद्गार प्रकट करने में भी वह संकोच नहीं करती। वह नारी की मनोव्यथा को प्रकट करती हुई स्पष्ट रूप से कहती है -

मेरे  प्यारे,  पुरुष, पृथिवी-रत्न और शान्त-धी हैं।
सन्देशों  में   तदपि  उनकी, वेदना व्यंजिता है।
मैं  नारी हूँ,   तरल-उर हूँ, प्यार से व्यंचिता हूँ।
जो होती हूँ विकल विमना, व्यस्त वैचित्र्य क्या है ?

राधा-कृष्ण के अतिरिक्त नन्द, यशोदा, उद्धव आदि का चरित्रांकन भी यथानुकूल हुआ है। यशोदा का मातृत्व और नछ की आदर्शमय भूमिका दर्शनीय है। अपने पुत्र के वियोग में यशोदा का निरन्तर अश्रुपात भाव-विह्वल करने वाला है -

सहकर कितने ही कष्ट औ संकटों को।
बहु यजन  कराके पूज के निर्जरों को।
यक सुअन मिला है जो मुझे यत्न द्वारा।
प्रियतम! वह मेरा कृष्ण प्यारा कहाँ है ?

प्रिय, प्रवास का अंगी रस ‘वियोग-शृंगार‘ है। साथ ही वात्सल्य रस का भी सुन्दर चित्रण हुआ है। वीर, रौद्र, भयानक रस भी कथा अनुरूप हैं। रस-व्यंजना में महाकाव्य के लक्षणों का सम्यक् निर्वाह हुआ है। विरोधी रसों से बचने का प्रयास है। भाव-शांति, भाव-शबलता के साथ भाव-निरूपण भी सफलता पूर्वक है। राधा का श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम ‘वियोग शृंगार‘ की रसमयता के साथ व्यंजित हुआ है -

रो-रो चिन्ता सहित दिन को राधिका थीं बिताती।
आँखों को थीं सजल रखतीं उन्मना थीं दिखाती।
शोभावाले जलद-वपु की,  हो रही चातकी  थीं।
उत्कंठा थी परम प्रबला,  वेदना  वर्द्धिता  थीं।।

प्रिय-प्रवास का प्रकृति-चित्रण अपूर्व है। प्राणी-प्रकृति के अटूट संबंधों को प्रथम सर्ग से ही व्यक्त कर दिया, जहाँ ब्रजवासी प्रकृति के साथ सहज भाव से पले-बढ़े। ‘पवन-दूत‘ के माध्यम से राधिका का संदेश प्रकृति के साथ गहरे तादात्म्य का प्रमाण है। प्रकृति का आलम्बन, उद्दीपन, अलंकार एवं भाव-प्रकटीकरण की दृष्टि से सुन्दर निरूपण हुआ है। विषाद, खिन्नता, शोक आदि भावों को प्रकृति-चित्रण के साथ प्रकटीकरण अत्यन्त मोहक रूप में व्यक्त होता है, जैसे -

समय  था  सुनसान निशीथ का,
अटल  भूतल में  तम राज्य था।
प्रलय काल  समान   प्रसुप्त हो,
प्रकृति - निश्चल नीरव शांत थी।।

प्रिय-प्रवास का मूल लक्ष्य विश्व-मैत्री, विश्व-प्रेम, विश्व-कल्याण है। श्रीकृष्ण के चरित्र को मानवीय रूप देकर लोकसेवा में तत्पर दिखाया है। इसके साथ स्थायी मानव-संबंधों का सम्यक विवेचन हृदय तत्त्व के साथ किया है, जहाँ माता-पिता, प्रेमी-प्रेमिका, सखा-सखी निरन्तर सुख-दुःख में साथ देते हैं और पथ की बाधा नहीं बनते, वरन् लोकसेवा को परम उद्देश्य मानते हुए सहभागी बनते हैं। आधुनिक मानव में मानवीय मूल्यों का संचार हों तथा स्वयं के लिए नहीं बल्कि लोक के लिए जीने की अमूल्य प्रेरणा है। श्रीकृष्ण का यह कथन इसी उद्देश्य को प्रकट करता है -

है आत्मा का न सुख किसको विश्व के मध्य प्यारा।
सारे  प्राणी  स-रूचि  इसकी माधुरी  में बँधे हैं।
जो  होता है  न वश इसके  आत्म-उत्सर्ग द्वारा।
ऐ  कान्ते हैं सफल  अवनी-मध्य  आना उसी का।

कला-विधान में कुछ नवीनता भी है। मंगला चरण के स्थान पर ‘प्रकृति-वर्णन‘ से काव्य का आरंभ है। नायक-नायिका आधुनिक मानव-मानवी हैं। काव्य-ग्रंथ का नाम ‘चरित्र प्रधान‘ न होकर ‘घटना-प्रधान‘ है। भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा में चित्रमयता व बिम्ब विधान आकर्षक है, यथा-

दिवस का अवसान  समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला।
तरुशिखा  पर थी अब राजती,
कमलिनी कुल बल्लभ की प्रभा।

‘प्रिय-प्रवास‘ में सर्वत्र वर्णिक छन्द प्रयुक्त हुए हैं, वे हैं - द्रुत विलम्बित, वंशस्थ, मालिनी, मन्दाक्रांता, शार्दूल विक्रीड़ित, वसन्ततिलका, शिखरिणी आदि। संस्कृत काव्य ग्रंथों की भाँति अतुकांत और अन्त्यानुप्रास रहित है।
अलंकार सशक्त, स्वाभाविक एवं भावों की अभिव्यक्ति करने वाले हैं। शब्दालंकारों व अर्थालंकारों का उचित आधान, अनुप्रासिक लालित्य, कोमलकांत पदावलियाँ अत्यधिक प्रभावोत्पादक बन पड़ी हैं। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टांत, निदर्शन, संदेह, प्रतीप, उत्प्रेक्षा, अपह्नुति, व्यतिरेक आदि अलंकार यत्र-तत्र प्रयुक्त हैं। आलंकारिक विधान, कोमलकांत पदावली व आनुप्रासिक भाषा का निदर्शन द्रष्टव्य है -


‘रूपोद्यान-प्रफुल्ल   प्राय  कलिका, राकेन्दु-बिंबानना।
तन्वंगी,  कलहासिनी, सुरसिका, क्रीड़ा-कला पुत्तली।।
शोभा-वारिधि की अमूल्य मणि-सी, लावण्य लीलामयी।
श्री राधा मृदुभाषिणी, मृगदृगी,  माधुर्य-सन्मूर्त्ति  थीं।।

वस्तुतः 1914 ई. में रचित हिन्दी खड़ी बोली का प्रथम काव्य युगान्तरकारी घटना है। महत् विषय, उदात्त चरित्र, महान् उद्देश्य, खड़ी बोली, संस्कृत छंद, भिन्न तुकान्त में महाकाव्य की रचना विलक्षण है। भक्तिकालीन-रीतिकालीन प्रवृत्ति का चिह्न दिखाई नहीं देता, बल्कि युगानुकूल संदेश के साथ भारतीय नव जागरण की दिशा में श्रेष्ठतम मानव-मूल्यों का वर्जन करने वाला है। वैज्ञानिक युग की विभीषिका में मानवतावाद का जयघोष है। यह मनुष्य की महत्ता, जीवन की सुन्दरता, प्रेम की शक्ति, मानवीय संबंधों की तरलता एवं भारतीय सांस्कृतिक विरासत को गति प्रदान करने वाली रचना है।

संदर्भ ग्रंथ सूची -
प्रिय-प्रवास, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध‘, कविताकोश।
हिन्दी साहित्य का सर्वेक्षण, विश्वंभर मानव, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1979 प्रथम संस्करण।
हिन्दी के आधुनिक प्रतिनिधि कवि, डॉ. सुरेश अग्रवाल, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, 1998।
आधुनिक काव्य सोपान, डॉ. सत्येन्द्र पारीक, पुनीत प्रकाशन, जयपुर, 2014।
काव्यांग परिचय, डॉ. राजेन्द्र सिंघवी, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, 2017।

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