हिन्दी भाषा : उद्भव, विकास एवं मानक रूप


प्रथम संस्करण :2019

हिंदी भाषा : उद्भव ,विकास एवं मानक रूप 

प्रथम संस्करण : 2019
http://www.rajhga.com
प्रकाशक : राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर
मुद्रित मूल्य : ₹125

निराला की रचनाधर्मिता


 निराला की रचनाधर्मिता 



बीसवीं सदी के काव्य-रचनाकारों में हिन्दी कविता को सबसे अलग व नई ऊर्जा से संपृक्त करने वाले महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने जो सृजन किया, वह काव्य-जीवन और साहित्य के श्रेष्ठतम मूल्यों से अनुप्राणित है । अपने रचना संसार में कवि का व्यक्तित्व काव्य के विराट आयामों के साथ तादात्म्य का अनुभव करके प्रेरणा की समाधि में कुछ ऐसा उठ गया है कि वहां से वाणी की जो भी झंकार उठती है वह सत्य, शिव और सुन्दर की पर्यायवाची बन जाती है । सम्भवतः इसी कारण से उन्हें महाप्राणसम्बोधन मिला । महाप्राण निराला की रचनाओं में अनुभूति की पूरी ऊष्मा जीवन का पूरा आवेग है । उसमें कवि की सृजन कल्पना कला की पूरी ऊँचाई से रम्यतम सौन्दर्य प्रसाधनों का चयन करके उद्भूत हुई है । फलतः निराला रचित काव्य की प्रासंगिकता वर्तमान में उन्मेष मूलक अर्थवत्ता प्रदान करने में सक्षम है । 

निराला काव्य में छायावादी प्रेमगीत, राष्ट्रप्रेम की अभिव्यंजना करने वाले गीत हैं, मातृभूमि की वंदनाएँ व उद्बोधन हैं, शोषण मुक्त समाज की संकल्पना है तथा आध्यात्मिक चेतना, रहस्य व निच्छल भक्ति से पूरित भावुक भक्तिगीत भी हैं । इनके अतिरिक्त सांस्कृतिक आलोक को बिखेरने वाली उनकी लम्बी कविताओं यथा राम की शक्ति पूजा’, ‘तुलसीदास’, ‘शिवाजी का पत्र’, विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । इसी प्रकार जीवन, कर्म और मृत्यु सभी के प्रति उदात्त भाव अभिव्यक्त करने वाली रचना सरोज स्मृतिहै । राष्ट्रीयता, देश की मिट्टी के प्रति प्रेम, उसकी विरासत के प्रति प्रणत भावना, उसके जन और संस्कृति के प्रति प्रेम और निष्ठा, अतीत की गरिमामय संस्कृति की गाथा, वीर पुरूषों के प्रति श्रद्धा, वर्तमान स्थिति का विश्लेषण और भविष्य के प्रति उज्ज्वल आकांक्षा आदि में प्रकट होती है ।

महाकवि निराला ने युगीन आवश्यकता को दृष्टिगत रखकर राष्ट्रीयता को संस्कृति के स्वरूप में ढ़ालकर चित्रित किया । ‘भारती वंदना’, यमुना के प्रति’, मातृवन्दना’, जागो फिर एक बार’, दिल्ली’, खण्डहर के प्रति’, छत्रपति शिवाजी का पत्र’, राम की शक्ति पूजा’, तुलसीदास’ आदि में राष्ट्रीयता का भव्य स्वरूप दृष्टिगोचर होता है । भारत भूमि को माता मानकर स्तुति करते हुए लिखते हैं-

भारति, जय विजय करे
कनक-शस्य-कमल धरे
लंका पद-तल-शत दल
गर्जितोर्मि सागर जल
धोता शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु अर्थ भरे ।­1

भारत की गरिमामय संस्कृति की उपेक्षा एवं तिरस्कार करके पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध के मोहजाल में आत्म विस्मृत हो अंधाधुंध दौड़ती भारतीय पीढ़ी को चेतावनी देते हुए उसे सर्व संहारक बताया है-

तुम ने मुख फेर लिया,
सुख की तृष्णा से अपनाया है सरल,
ले बसे नव छाया में
नव स्वप्न ले जगे
भूले वे मुक्तगान, सामगान, सुधापान ।2

महाप्राण निराला की युग चेतना से अनुप्राणित कविता में भारत की राजनैतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को आत्मसात करने वाली मिली है । तुलसीदासमें इतिहास पर नयी दृष्टि डालते हुए कवि ने कुसंस्कारों के वशीभूत हो पतन के कगार पर खड़ी भारतीय संस्कृति की तुलना को तत्कालीन स्थिति से करके भारत के सांस्कृतिक वैभव के सूर्य के अस्त होने का चित्रण कर सावधान किया-

भारत के नभ का प्रभा पूर्य
शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूर्य
अस्तमित आज के – तमस्तूर्य दिडमंडल ।3

संसार में असत की शक्ति प्रबल है और वह सत् को आच्छादित करने के लिए सभी प्रकार के साधनों से काम लेती है । विजय का निश्चय साधन करते हैं । यह स्थिति वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आतंकवादी परिदृश्य से मेल खाती है । निराला ने राम की शक्ति पूजाके माध्यम से संदेश दिया कि यदि असत् शक्तिशाली है, तो सत् को भी शक्ति का संधान करना चाहिए-

वह एक ओर मन रहा राम का जो न थका,
जो नहीं जानता दैन्य नहीं जानता विजय
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय ।4

निराला जी ने साम्राज्यवादी शक्तियों की पशुता व अत्याचार को निकट से देखा । उनकी लूट खसोट की प्रवृत्ति व मानवता पर अत्याचार करने की वृत्ति पर तीव्र प्रहार करते हुए कहा-

अबे सुन बे गुलाब
भूल मत जो पाई खुशबू रंगो आब
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
डाल पर इतर रहा है केपिटलिस्ट ।5

सरोज स्मृति को निराला की आत्मपरक रचना माना गया । इस कविता की निर्वैयक्तिकता की ओर ध्यान देते हुए डॉ. रमेश मिश्र के अनुसार  सरोज स्मृति में समाज की अव्यवस्था ओर उसके फलस्वरूप जीवन की घुटन का भी ऐसा स्वरूप व्यक्त किया गया है जो मानवीय धरातल पर निराला की आवाज सरोज के प्रति न होकर जीवन चेतना का वह स्वर है जो मानवीयता के नाते लाजिमी और अनुकूल है । निराला अपने गहन अवसाद की भूमिका से उठकर विद्रोह के स्वर में सामाजिक चेतना सम्पन्न होकर मानवीय हक और मनुष्यत्व की सार्थकता की माँग करता हुआ संवेदना से विद्रोह तक पहुँच जाता है ।निराला ने सामाजिक रूढ़ियों का विद्रोह कर सामाजिक चेतना को जाग्रत किया । समाज में व्याप्त दहेज प्रथा का विरोध करते हुए उन्होंने लिखा-

जो कुछ है मेरा अपना धन,
पूर्वज से मिला, करूँ अर्पण
यदि महाजनों को, तो विवाह
कर सकता हूँ, पर नहीं चाह
मेरी ऐसी, दहेज देकर
मैं मूर्ख बनूँ, यह नहीं सुघर ।6


निराला काव्य में भक्ति की अजस्र धारा बही है, जो मूलतः वेदान्त दर्शन से प्रभावित है। यह दर्शन निराला के स्पर्श से और रामकृष्ण परमहंस व विवेकानंद के माध्यम से अधिकाधिक पुष्ट, परिमार्जित व परिवर्द्धित होता गया । भक्ति के इस स्रोत से उन्होंने भारतीय जनमानस को व्यावहारिक अद्वैत से परिचित कराया, वहीं विनयपूरक भक्ति से लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग भी दिया । मानवता की मुक्ति हेतु संघर्षरत राम को जब शक्ति का दिग्दर्शन होता है, तो वह सत्य की विजय का पूर्वाभास होता है । शक्ति का उज्ज्वल रूप द्रष्टव्य है-

देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर स्कंध पर, रही दक्षिण हरि पर,
ज्योतिर्मय रूप, हस्तदश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्दस्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित ।7

निराला ने साहित्य कर्म को ज्ञान योग की साधना के रूप में स्वीकारा और कहा कि एक ही प्रकार के विचारों की नेमि में चक्कर काटता हुआ साहित्य भी निर्जीव हो जाता है । निराला ने वाद की सीमा से परे रहकर युग की चेतना को आत्मसात कर आवश्यकतानुरूप साहित्य का निर्माण किया । पण्डित नंद दुलारे वाजपेयी के अनुसार महान कवि वह है जो आस्था नहीं खोता, पराजित नहीं होता और अपने को कठिन परिस्थितियों में रखकर भी मानववादी भूमि पर बना रहता है । निःसंदेह निराला ऐसे ही कवि हैं ।

निराला का जीवन खण्डित चित्रों की विवश प्रदर्शनी है, उनकी तुलना एक ऐसे उत्कृष्ट देशभक्त राजकुमार से की जा सकती है, जिसे राजधानी के चौराहे पर फाँसी दे दी गई हो । जीवन की विषमताएँ जिस तरह निराला के समक्ष उपस्थित हुई, परन्तु उनकी जितनी तीव्र प्रतिक्रिया इस सरल, उदार और अति संवेदनशील मानव के मानस पर हुई, ऐसे उदाहरण दुर्लभ हैं । निराला इन संघर्षों में अपराजेय योद्धा की तरह खड़े रहकर अपनी प्रतिभा व परिश्रम से रचनाधर्मिता को समृद्ध करते रहे ।


भावना द्वारा अनुभूति का सहयोग मिलता है, काव्य के लिए वहीं दार्शनिकता अभीष्ट एवं ग्राह्य है । निरालाजी का भक्ति से परिपूर्ण साहित्य अनुभूति पर आधारित होने से हृदय का संगीत प्रतीत होता है । सर्व खलु इदं ब्रह्म की वेदान्तिक विराटता का स्वर निराला के काव्य में आद्यन्त भरा है । पंथ या सम्प्रदाय से परे निश्छल भक्ति का स्रोत निराला काव्य की पहचान है । निराला ने समय की गति को पहचानकर काव्य लिखा, फलतः वह कालजयी हो गया ।

हिन्दी साहित्य का वर्तमान समय संक्रमणकालीन वेला से गुजर रहा है, नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञास्फोट की प्रतिध्वनि में बौद्धिकता साहित्य के मस्तिष्क पर विलास कर रही है । हृदय पक्ष अमा-निशा के गर्त में दुबक कर बैठा है । पुरुषार्थ चतुष्ट्य की आंकाक्षी भारतीय साहित्यिक विरासत विद्रुपताओं से ग्रस्त होती जा रही है । आस्था, अनास्था, नव्य-पुरातन, पौर्वात्य-पाश्चात्य के द्वन्द्व में फँसा साहित्य पटल स्वयं अर्थ-वलयसे ग्रसित है । भक्ति के अजस्र स्रोत विलुप्त हो रहे हैं, ऐसे समय में महाप्राण निराला की स्मृति हमें गंतव्य का बोध करायेंगी –

विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण ।
हे पुरूष सिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण ।।
आराधना का दृढ़ आराधन से दो उत्तर ।
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर ।।8

 निरालाजी ने अपने काव्य को जो विशिष्टता प्रदान की उसका प्रमुख कारण उनकी वह दिव्य दृष्टि थी, जिससे उन्होंने युग की अर्थवत्ता को पहचाना, फलतः कालजयी साहित्य रचा । वह साहित्य वर्तमान समय की समस्याओं को हल करने में सक्षम ही नहीं, बल्कि नई दिशा प्रदान करने वाला है, प्रतीत होता है कि निराला सांस्कृतिक नवजागरण व सांस्कृतिक पुनरूत्थान के कवि हैं, पर वे अतीत की ओर लौटने वाले कवि नहीं, बल्कि अतीत को वर्तमान में जोड़कर भविष्य की दिशा तय करने वाले कवि थे । अतः युगीन अर्थवत्ता में निराला सदैव प्रासंगिक रहेंगे । 

सन्दर्भ ग्रंथ सूची-
1. निराला रचनावली -1,राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली, सं 1983,पृष्ठ सं. 232
2. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, ‘अपरा’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं.1946,पृष्ठ सं. 11
3. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, ‘तुलसीदास’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं.2009,पृष्ठ सं.11
4. निराला रचनावली -1,राजकमल प्रकाशन ,नई दिल्ली, सं 1983,पृष्ठ सं. 318
5. लक्ष्मी पाण्डेय, निराला का साहित्य, अनुज्ञा बुक्स,दिल्ली,सं.2017, पृष्ठ सं.86
6. निराला रचनावली -1,राजकमल प्रकाशन ,नई दिल्ली, सं. 1983,पृष्ठ सं 303
7. वही, पृष्ठ सं 319
8. वही, पृष्ठ सं 316



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