सांस्कृतिक विमर्श के पथ पर राजेन्द्र कुमार सिंघवी

सांस्कृतिक विमर्श के पथ पर डॉ. सिंघवी

(हिंदी आलोचना कोश-दशम खंड में प्रकाशित)

डॉ. प्रवीण कुमार जोशी 
सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग 
माणिक्यलाल वर्मा राजकीय महाविद्यालय, 
भीलवाड़ा (राज.) पिन-311001 
ई मेल- praveenkumarjoshi561@gmail.com
मोबाइल- 9829250561

    इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य तीव्र गति से वैश्विक धरातल पर अपनी पहचान बनाने में सफल रहा है। साहित्य-रचना के मानक अब परम्परागत साँचे में नहीं है, उन पर तात्कालिकता का प्रभाव अधिक है। साहित्य अब भूमण्डलीकरण के साथ अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में आलोचना भी साहित्यिक वातावरण के साथ कदमताल कर रही है, जहाँ किसी सैद्धान्तिक परिमाप से रचना का मूल्यांकन न करके रचनाशीलता की पहचान पर बल है। ऐसे विरल समय में जब भारतीय सांस्कृतिक मूल्य वैश्विक दिशाबोध की ओर गतिमान हैं और सम्पूर्ण मानव जाति के लिए वरेण्य हैं, तब आलोचना में भारतीय सांस्कृतिक प्रतिमान केंद्रित विवेचना आकर्षित करती है। वर्तमान समय में जब वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद नई सांस्कृतिक चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, तब सांस्कृतिक समालोचना साहित्य की सामाजिक उपयोगिता और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का सशक्त माध्यम बन गई है।

सांस्कृतिक समालोचना वह आलोचनात्मक दृष्टिकोण है, जिसके माध्यम से साहित्य को उस समाज और संस्कृति के संदर्भ में देखा जाता है, जिसमें वह उत्पन्न हुआ है। इसका दृष्टिकोण है कि साहित्य किसी निर्जन सौंदर्यलोक का नहीं, बल्कि जीवित संस्कृति का हिस्सा है। यह आधुनिक साहित्यिक आलोचना की एक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति है, जिसमें साहित्य को केवल सौंदर्यबोध या रचनात्मक आनंद की दृष्टि से नहीं, बल्कि उसके सांस्कृतिक, सामाजिक, वैचारिक और ऐतिहासिक संदर्भों में समझा जाता है। यह आलोचना की वह दृष्टि है जो साहित्य को जीवन से जोड़ती है और संस्कृति को शक्ति-संरचना के रूप में देखती है। इसका मूल उद्देश्य यह समझना है कि साहित्य केवल कल्पना की उपज नहीं, बल्कि किसी समाज की संस्कृति, परंपरा और जीवन मूल्यों का प्रतिबिंब है।

विगत दो दशकों से सक्रिय लेखन में संलग्न डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी की आलोचनात्मक दृष्टि सांस्कृतिक विमर्श केंद्रित रही है। ‘आचार्य तुलसी की काव्य-साधना’ (2005), ‘साहित्य का सांस्कृतिक पक्ष’ (2018), ‘राष्ट्रबोध, संस्कृति एवं साहित्य’ (2019), ‘हिन्दी आलोचना: निकष एवं प्रतिमान’ (2020), ‘कबीर: दृष्टि एवं आधार’ (2022), ‘साहित्यिक निबंध’ (2023) आदि पुस्तकों में इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय-सांस्कृतिक भावबोध आधारित साहित्य की व्याख्या करना, सिद्धान्त निर्माण करना, रचना को मानकता की कसौटी पर परखना और युग-सापेक्षता तय करते हुए भारतीय सांस्कृतिक प्रतिमानों पर आधारित मूल्यांकन किया है। इसके  अतिरिक्त समकालीन साहित्य, गवेषणा, गगनांचल, साक्षात्कार, अक्षरा, वीणा, मधुमती, हिन्दी अनुशीलन, आधुनिक साहित्य, समवेत, शब्दघोष, तुलसी प्रज्ञा, विविधा, मीरायन, अपनी माटी, जनकृति, कला समय, भावक, साहित्य परिक्रमा, जागती जोत, आधारशिला साहित्यम् जैसी प्रतिनिधि साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित आलोचनात्मक लेखों, समीक्षाओं, ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाओं, संपादित पुस्तकों में प्रकाशित अध्यायों तथा साहित्यिक संगोष्ठियों दिए गए व्याख्यानों में डॉ. सिंघवी की प्रतिभा हिन्दी आलोचना के सांस्कृतिक विमर्श को सुदृढ़ करती है। 

साहित्य समाज की संस्कृति, परंपरा और मानसिकता को अभिव्यक्त करता है। एकात्म जीवन-दर्शन भारतीय संस्कृति का प्राण है। भिन्न-भिन्न विचार समूहों के प्रवाह को गांगेय प्रवाह का रूप दे देना ही भारतीय संस्कृति के टिकने का सबसे बड़ा आधार रहा है। संस्कृति मनुष्य के चित्त की खेती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने संस्कृति को मनुष्य के चिन्तन की उपज कहा है। संस्कृति के मूलभूत तत्त्व नैतिकता, सदाशयता, सहनशीलता, शरणागत की रक्षा, आचरण की पवित्रता और समभाव की उच्चत्ता में इसकी शक्ति निहित है। ‘सांस्कृतिक एकात्म एवं भारतीय चिंतन’ विषय पर डॉ. सिंघवी ने भारतीय संस्कृति के एकात्म भाव को रेखांकित करते हुए लिखा, “चिंतन की स्वतंत्रता और उपास्य की अनेकता, वेश-भूषा और खान-पान के विविध स्वरूप के बावजूद अनेकता में एक तत्त्व की प्रधानता ही आर्यावर्त की संस्कृति का सबसे बड़ा सम्बल है। हमारा चिंतन मात्र देह तक सीमित नहीं है। स्थूल जगत् से परे हम यह विचार करते हैं कि मैं कौन हूँ? हमारा प्रत्यभिज्ञा दर्शन स्वयं की पहचान पर बल देता है।“[1] वस्तुतः सम्यक् कृति ही संस्कृति है। विराट मूल्यों पर आधारित यह सांस्कृतिक वैभव भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर है। अतः आलोचना के केंद्र में सांस्कृतिक विमर्श ही समग्रता को प्रकट कर सकता है। 

भारतवर्ष भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विविधता युक्त रहा है, उसी अनुरूप भाषायी विविधता भी विद्यमान रही। एक ओर भारोपीय परिवार से जन्म लेने वाली भाषाएँ यथा- संस्कृत, हिंदी, मराठी, बांग्ला, उड़िया, असमिया, गुजराती आदि में साहित्य रचना हुई तो दूसरी ओर द्रविड़ परिवार की भाषाओं- तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ आदि में विपुल साहित्य रचा गया। इसी वैशिष्ट्य को उजागर करते हुए सिंघवी जी ‘भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य का आतंरिक-प्रवाह’ आलेख में समान आधारभूमि की पहचान करते हैं। वे लिखते हैं, “यह अचरज का विषय है कि भारत की भाषाओं का परिवार एक नहीं होते हुए भी उनके साहित्य की आधारभूमि समान रही है। भारतीय भाषाओं के साहित्य पर प्राचीन ग्रंथ- रामायण, महाभारत, उपनिषद् पुराण, भागवत् का आधार रहा है, परवर्ती संस्कृत ग्रंथों ने भी साहित्य की धारा को प्रभावित किया। उसमें कालिदास, बाण, भवभूति, जयदेव आदि का साहित्य केन्द्र में रहा। काव्यशास्त्र से संबंधित ग्रंथों ने सभी का पोषण किया, जैसे- भरत का ‘नाट्यशास्त्र‘, आनंदवर्द्धन का ‘ध्वन्यालोक‘, मम्मट का ‘काव्यप्रकाश‘, विश्वनाथ का ‘साहित्य दर्पण‘ आदि ग्रंथ सभी भाषाओं के मूल में रहे।“[2] इससे स्पष्ट होता है कि अपने प्रादेशिक वैशिष्ट्य एवं सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखते हुए समग्र साहित्य ने अनंत विस्तार ग्रहण किया, परन्तु उसके व्यक्तित्व में एक-दूसरे का प्रभाव अवश्य रहा। यही आत्मतत्त्व साहित्यिक विमर्श को भव्य बनाता है। 

साहित्य के माध्यम से संस्कृति की अभिव्यक्ति सर्वप्रथम वाल्मीकि रामायण में हुई है। वाल्मीकि कृत रामायण से आधुनिक हिन्दी साहित्य तक राम काव्य की सुदीर्घ परम्परा रही है। छान्दस वाङ्मय से निःसृत होने वाली रामकाव्य की धारा संस्कृत वाङ्मय को पार करती हुई प्राकृत वाङ्मय में प्रवेश करती है। ‘सांस्कृतिक मूल्यों के पुनरुत्थान का काव्य: आधुनिक हिन्दी राम काव्य’ विषय पर विवेचना करते हुए सिंघवी जी ने आधुनिक हिन्दी रामकथा धारा  में संस्कृति के तत्त्वों को नवीन आलोक में देखा है। उनका मत है, “मानवता के चरम विकास में इस काव्य का अमूल्य योगदान रहा है। आधुनिक रामकाव्य परम्परा की अनुभूति नहीं है, उसमें नवीन युगानुकूल जीवन के प्रतिमानों, मूल्यों को वहन करने की शक्ति भी है।“[3] सांस्कृतिक मूल्यों को समकालीन समय की आवश्यकता अनुरूप परिष्कृत रूप में प्रस्तुति विमर्श को प्रगति पथ पर आरूढ़ करती है। इस दृष्टि से सामाजिक कुरीतियों का खंडन, सामाजिक समानता का पोषण, पारिवारिक आदर्शों की प्रतिस्थापना, नारी की प्रतिष्ठा, आर्थिक समानता, श्रम का महत्त्व आदि परम्परित मूल्यों को नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रतिस्थापित किया गया। साथ ही शोषण की निंदा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राष्ट्रप्रेम, पाश्चात्य भोगवादी, साम्राज्यवादी नीति की निंदा, अधिकार चेतना जैसे नवीन मूल्यों की भी प्रतिष्ठा आधुनिक हिन्दी राम काव्य में की गई है।

भारतीय संस्कृति सनातन, समृद्ध और जीवन्त है। इसकी परम विशेषता रही है कि उसने पदार्थ को आवश्यक माना पर उसे आस्था का केन्द्र नहीं, शस्त्र-शक्ति का सहारा लिया, लेकिन उसमें त्राण नहीं देखा। यहाँ जीवन का लक्ष्य विलासिता नहीं, आत्म-साधना रहा, लोभ-लालसा नहीं, त्याग-तितिक्षा रहा। ‘सांस्कृतिक प्रतिमान और अज्ञेय की  दृष्टि’ विषय पर अज्ञेय के निबंधों पर विचार करते हुए डॉ. सिंघवी ने लिखा, “अज्ञेय ने मार्क्सवाद को एक सीमा तक ही महत्त्व दिया। वे उसे पूर्ण जीवन-दर्शन नहीं मानते। वे मनुष्य की निर्भयता, विवेक और स्वतंत्रता के विश्वासी हैं। ‘वे वैदिक आर्यों की ‘अभीता नो स्याम’ अथवा ‘एषा में प्राण या विभेः' को मनुष्य की चरम आकांक्षा का प्रतीक मानते हैं। वे संपूर्ण सत्य को ग्रहण करना चाहते हैं और उसे रागदीप्त करके कला का रूप देना चाहते हैं।“[4] इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दी आलोचना में अज्ञेय के साहित्य का विवेचन सांस्कृतिक विमर्श आधारित होना अपेक्षित है अन्यथा पाश्चात्य आलोक में एकांगी दृष्टि ही प्रस्तुत होगी।

भारतीय चिन्तन को हिन्दी-साहित्य में प्रसारित करने एवं उसे जीवन-दृष्टि का अंग बनाने में जैन धर्म एवं उसमें रचित साहित्य का विशेष योगदान रहा है। जिसका प्रामाणिक, साहित्यिक एवं गरिमायुक्त रूप वर्तमान में हिन्दी-साहित्य की निधि है। ‘आचार्य तुलसी के काव्य में भारतीय सांस्कृतिक मूल्य‘ विषय पर लिखित आलेख में डॉ. सिंघवी कहते हैं, “आचार्य तुलसी का चिन्तन है कि भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन ही नहीं, समृद्ध भी है, अतः किसी भी राष्ट्रीय समस्या का हल हमें अपने सांस्कृतिक तत्वों के द्वारा ही खोजना चाहिए क्योंकि हमारा अतीत अत्यन्त वैभवशाली रहा है।“[5] जैन आचार्य तुलसी ने कहा था कि हिन्दू संस्कारों की जमीन छोड़कर आयातित संस्कृति के आसमान में उड़ने वाले लोग दो-चार लम्बी उड़ानों के बाद जब अपनी जमीन पर उतरने या चढ़ने का सपना देखेगें, तो उनके सामने अनेक प्रकार की मुसीबतें खड़ी हो जाएँगी। वस्तुतः जैन साहित्य में सत्यं, शिवं व सुन्दरं को रूपायित करने वाले विषय-वस्तुओं को आधारभूमि में रखा, गिरते सांस्कृतिक मूल्यों को पुनः प्रतिस्थापित किया, जीवन मूल्यों को साहित्य के माध्यम से लोक-जीवन में संचारित किया तथा हिन्दी साहित्य के कोष को निरंतर समृद्ध किया है।

साहित्य के नाम से प्राचीनतम सर्जनाएँ प्रकृति से ही आरंभ होती है। ऋग्वेद के अनेक सूक्त, रामायण एवं महाभारत के आख्यान, सम्पूर्ण संस्कृत वाङ्मय और उसके पश्चात् समकालीन साहित्य परम्परा विद्यमान है। आदिकवि वाल्मीकि ने जब प्रकृति के दो निर्द्वन्द्व प्राणियों को मुक्त विहार करते देखा तो उनकी आत्मा भाव-विह्वल हो उठी, जब दूसरे ही क्षण एक को व्याध के बाण से आहत देखा तो करुणा का क्रन्दन फूट पड़ा। ‘प्रकृति एवं भारतीय साहित्य’ विषयक आलेख में इस घटना को सिंघवी जी भारतीय संस्कृति के मूल आधार में प्रकृति के महत्त्व को उजागर करते हैं। वे लिखते है, “विशिष्टता यह है कि प्रकृति के स्निग्ध रूप पर कवि मोहित है तो भाव-विह्वल होकर रचना करता है और यदि उस पर संकट है तो वह आभास ही नहीं देता, वरन् उसकी संरक्षा के लिए अपने रचनाकर्म को समर्पित कर देता है।“[6] प्रकृति के प्रति यह कवि-प्रेम अनादि काल से अनवरत जारी है। यह वर्णन कभी स्वतंत्र आलंबन रूप में, कभी हृदयगत भावों को उद्दीप्त करने अथवा आगे की घटनाओं की पृष्ठभूमि के रूप में होता है। कई बार यह वर्णन बिम्ब-प्रतिबिम्ब, उपदेश, रहस्य या मानवीकरण रूप में दृष्टिगोचर होता है।

नदी, नारी और संस्कृति का प्रवाह शाश्वत होता है। नारी का एक प्रकृष्ट रूप माँ होती है। वह शास्त्र से बड़ी और गुरु से भी अधिक पूज्य होती है। शास्त्र जब निःशब्द हो जाते है तब माँ की बात ही अंतिम होती है। वह संस्कृति की प्रतीक होती है। नदी भी उसी का रूप है। न नारी वृद्ध होती है और न संस्कृति। इन दोनों का अविरल प्रवाह साहित्य में दिखता है। लोक और संस्कृति के अनन्य संबंधों को सांस्कृतिक परिधि में बांधते हुए ‘मिथकीय चेतना एवं लोकमन’ आलेख में भारतीय समाज का नदियों के साथ सांस्कृतिक सम्बन्ध लोकगीतों सहित लोककथाओं के महत्त्व को प्रकट करता है। वे लिखते हैं, “लोककथाएँ वाचिक परम्परा का साहित्य है। ये पीढ़ी दर पीढ़ी यात्रा करती हुई अपना अस्तित्व कायम रखती हैं। मौखिक परम्परा ने अपने श्रुत-कौशल और विवेक से इसे आगे बढ़ाया है।“[7] ‘रेणु की कहानियों में लोकतत्त्व’ की पड़ताल करते हुए उसमें जीवन की सहजता और उसमे छिपे मूल्यों की खोज करते हैं। सिंघवी जी लिखते हैं, “रेणु एक ऐसे कथाकार के रूप में हिन्दी साहित्य का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ लोक के आदर्श और लोक के यथार्थ दोनों समंजित रूप में प्रकट होते हैं। जीवन के केन्द्रीय तत्त्व और मूल्य कहीं पर विचलित नहीं होते। तमाम विसंगतियों के बावजूद उन्हें यह लगता है कि लोक जीवन में अभी भी मूल्य शेष हैं, जिन्हें वे लगभग हर कहानी में सहेजते नज़र आते हैं।“[8] यहाँ स्पष्ट होता है कि  स्थान के अनुसार भी लोक कथाओं में पात्र और परिस्थितियाँ स्थानीय रूप धारण कर लेते हैं। इन कथाओं में सम्पूर्ण समाज के मंगल का विधान निहित होता है। सामाजिक विश्वास, मान्यताएँ और आस्थाएँ इनमें आसानी से ढूँढी जा सकती हैं। जो हमारी धरोहर है।

फादर बुल्के को तुलसी की भक्ति में जो एक विशेषता विशेष रूप से आकर्षित करती है वह है-परहित भावना। आचार्य शुक्ल ने इसे 'लोकमंगल' के रूप में निरूपित किया, लेकिन कामिल बुल्के इस दृष्टिकोण को तुलसी की महत्त्वपूर्ण  उपलब्धि मानते हैं। उनकी दृष्टि में यह महाकवि तुलसी की मौलिकता है, जिसमें मनुष्य की सेवा महत्त्वपूर्ण  है। ‘फ़ादर डॉ. कामिल बुल्के की दृष्टि में रामचरित मानस की सार्वकालिकता’ विषय पर विचार करते हुए डॉ. सिंघवी विवेचना करते हैं, “तुलसी का प्रभु-भक्त न केवल नैतिक आचरण करने वाला और परहित निरत व्यक्ति है, बल्कि वह प्रपत्ति और आत्मदैन्य भावापन्न व्यक्ति भी है। वह पूरी श्रद्धा से भगवान का विधान स्वीकार करता है और भरत की तरह यह मानता है कि प्रभु की आज्ञा के पालन से बढ़कर उसकी और कोई सेवा नहीं है।“[9] वस्तुतः कामिल बुल्के की दृष्टि में रामचरितमानस की प्रासंगिकता सार्वकालिक है। उसके दो बड़े कारण हैं- तुलसी की भक्ति और उनका कवित्व। उनकी भक्ति केवल वर्णाश्रम धर्म तक सीमित न होकर विश्वजनीन है। वह मानव मात्र को समान निरूपित करने वाले और जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर प्रत्येक मनुष्य की सेवा को परम धर्म मानने वाले 'परहित' को अपने विचार व्यवस्था में जो महत्त्व देते हैं, वह इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। 

डॉ. धर्मवीर भारती प्रयोगवादी और नई कविताओं की संक्रांतिकालीन बेला के साक्षी रहे हैं। तत्कालीन परिस्थितियों में जहाँ एक ओर युद्धजनित त्रासदियों की शिकार मानवता है, तो दूसरी ओर अंधकारमय वातावरण में भी जीवन के प्रति उत्कट भाव-प्रवणता भी है। इस संधिकालीन समय में कवि भारती के मन में दुविधा, संशय और भय के साथ-साथ आस्था का स्वर भी अंकुरित होता है। ‘आस्थावादी दृष्टि का विस्तार एवं धर्मवीर भारती का काव्य’ विषय पर शोधपरक टिप्पणी करते हुए सिंघवी जी लिखते हैं, “डॉ. धर्मवीर के काव्य में युगीन विद्रुपताओं, वेदना व पीड़ा की गाथाओं, युद्ध जनित विषमताओं, मानवता को त्रास पहुँचाने वाली कई घटनाओं के चित्रण के बावजूद वे अपनी आस्था का स्वर कभी ‘लघुमानव’ में तलाश करते हैं, तो कभी अश्वत्थामा के हृदय परिवर्तन में। ‘कनुप्रिया’ के कांत सम्मित उपदेश में यही दृष्टि दिखाई देती है । इस संपूर्ण रचना-प्रक्रिया में आस्था और अनास्था के द्वंद्व में आस्थावादी दृष्टि का आकर्षण- पाठकों को सदैव आकर्षित करता है और भावी मूल्यों के निर्माण की प्रेरणा भी देता है।“[10] यहाँ स्पष्ट होता है कि मूल्य-विहीन होने पर पतनशीलता निश्चित है। धर्मवीर भारती ने धर्म, दर्शन, समाज की शोषित करने वाली रूढ़ि, मृत परम्परा व सड़े-गले मूल्यों को चुनौती दी है, अशिव को जन्म देने वाली मान्यताओं के प्रति अनास्था बरती है, किंतु मानवतावादी पक्षों को ध्यान में रखकर आस्था व विश्वास को भी उसी निष्ठा से सृजित किया। 
सम्पूर्ण सृष्टि में कोई एक चिरन्तन निर्विकार सत्ता है, जो प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है। उसी की आत्मगत अनुभूति को ‘ब्रह्म’ कहा गया है। इसके तीन रूप लोक में हैं-आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक। पश्चिमी सभ्यता ने ब्रह्म को ‘आधिभौतिक’ रूप में ही स्वीकार किया, फलतः संपूर्ण चिन्तन पदार्थवादी रहा। ‘कबीर का ब्रह्म-रहस्य’ विषय पर सिंघवी जी लिखते हैं, “कुछ विद्वानों ने कबीर की एकेश्वरवादी धारणा को देख करके यह विचार या अभिमत व्यक्त किया कि कबीर इस्लाम के एकेश्वरवाद से प्रभूत रूप से प्रभावित थे, लेकिन तत्त्वतः विचार करने पर यह निराधार प्रतीत होता है। कबीर का एकेश्वर वाद मूलतः अद्वैतवादी है। क्योंकि उपनिषद् में स्पष्ट घोषणा की है कि ‘एकमेव द्वितीयोनास्ति।‘[11] इस प्रकार कबीर की वाणी देश काल की सीमा से परे, सार्वकालिक एवं समकालीन समाज को दिशा प्रदान करने वाली रही है। कबीर का जीवन-दर्शन जिसमें युगानुकूल कवि-धर्म निर्वाह, प्रखर व्यक्तित्व और विराट कवि-हृदय का दिग्दर्शन होता है।

सन् 1920 ई. के लगभग भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन जनव्यापी बन रहा था, किन्तु जातीय भेद, साम्प्रदायिक वैमनस्य, भाषायी विविधता आदि ऐसे कई तत्त्व थे, जो राष्ट्रीय-एकता में बाधक थे। इन विभेदक तत्त्वों को पहचानते हुए हिन्दी की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा के कवियों ने राष्ट्रीय-भावना को मुखरित किया। उनमें राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखन लाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, पं. सोहन लाल द्विवेदी के नाम उल्लेखनीय हैं। इनकी पहचान राष्ट्रीयता के कवि के रूप में हैं, उसका कारण यह है कि उन्होंने समय को पहचान कर जनमानस की मौन वाणी को मुखर रूप में व्यक्त किया। ‘सोहनलाल द्विवेदी की कविता में राष्ट्रबोध’ विषय पर विवेचना करते हुए सिंघवी जी पं द्विवेदी जी के बारे में लिखते हैं, “कवि की वाणी समाज, राष्ट्र, संस्कृति, मानवता इत्यादि के व्यापक फलक को चेतनावान बनाने में सफल रही है। यथार्थ रूप से देखा जाए तो आज भारतीय जन-मन सांस्कृतिक परतंत्रता से मुक्ति चाहता है, सशक्त राष्ट्र के साथ स्वाभिमान पूर्वक जीवन की अभिलाषा रखता है। उस दृष्टि से कवि की रचनाएँ नया मार्ग निर्मित करती हैं।“[12] इसी तरह बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के रचना संसार पर टिप्पणी करते हुए उनका कथन है, “नवीन जी की इतिहास दृष्टि में भी राष्ट्रीय-सांस्कृतिक बोध भरा हुआ है। वे मानते थे कि समाज जिस भौतिकवादी उन्माद में आगे बढ़ रहा है, उसका विनाश निश्चित है। यदि मनुष्य ने अपने हृदय की बात नहीं सुनी तो बुद्धिवाद की प्रचंड अग्नि उसे भस्मीभूत कर देगी। कवि की यह धारणा उन युवाओं और तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए थी, जिन्होंने सिर्फ स्वयं की उन्नति को ही अपने जीवन का हेतु मान लिया था।“[13] सांस्कृतिक चेतना को जाग्रत करने की दृष्टि से यदि अवलोकन किया जाय तो ज्ञात  होता है कि इन कवियों ने भारतीय सांस्कृतिक गौरव का गुणगान करते हुए सनातन भारतीय चिंतन को विशेष महत्त्व दिया, मूल्यों के परिष्करण और हस्तांतरण पर जोर दिया और भारतीय जीवन मूल्यों से अनुप्राणित जीवन-शैली निर्मित करने का आह्वान किया।

औपनिवेशिक शक्तियाँ सर्वप्रथम प्राचीन संस्कृति के उद्धार के बहाने उसकी रचनात्मकता, सनातनता और प्रेरक परम्पराओं को निशाना बनाती है तथा अपने ज्ञान-विज्ञान से शासित वैचारिक नेतृत्व प्रदान करती है। यह मानसिक उपनिवेशीकरण सांस्कृतिक प्रभुत्व में परिवर्तित होकर बुद्धिजीवियों की समझ को भी कुंद कर देता है। अन्ततः पराधीन जन-मानस उसकी ही वाणी में बोलकर गर्व  का अनुभव करता है और औपनिवेशिक प्रभाव में स्वयं का विलयन कर तदनुसार ही व्यवहार करने लग जाता है। आलोचनात्मक संदर्भ में ‘कविता का वर्तमान एवं औपनिवेशिकता’ विषय पर समकालीन हिन्दी कविता मे व्यक्त इस भाव दृष्टि पर सिंघवी जी ने अपना मत दिया है, “औपनिवेशिक दासता से मुक्ति में राष्ट्रवाद एकमात्र विकल्प प्रतीत होता है। यह अतीत से ऊर्जा ग्रहण कर वर्तमान संदर्भों में उसकी पुनर्व्याख्या करता है। साथ ही महान् सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन मूल्यों के सहारे चेतना का निर्माण कर अपने सांस्कृतिक औजारों से कुचक्रों को नष्ट करता है।“[14] अतः इस पुनीत कार्य में साहित्य की भूमिका अनिर्वचनीय है।

औपनिवेशिकता का दंश भारतीय समाज अच्छी तरह से जानता है, परन्तु आदिवासियों ने इसका जिस तरह से सामना किया है, वह एक दारुण यथार्थ है। ‘नई सदी के हिंदी उपन्यासों में आदिवासी जीवन के अनुत्तरित प्रश्न’ विषय पर डॉ. सिंघवी टिप्पणी करते हैं, “आदिवासी जीवन आधारित हिन्दी उपन्यासों का जब अध्ययन करते हैं तो स्पष्ट होता है कि उपन्यासकारों ने उन पहलुओं को उजागर किया है, जिन पर अब तक किसी ने प्रकाश नहीं डाला था। हिंदी उपन्यासकार स्पष्ट करते हैं कि आजादी के बाद भी इन्हें उपेक्षितों का जीवन जीना पड़ रहा है। उन्हें यहाँ की समाज व्यवस्था ने हाशिये पर रखकर आज भी आदिम रूप में जंगलों में रहने के लिए बाध्य किया है। आदिवासी लेखन में उपन्यासकारों ने कुछ ऐसे चित्र उपस्थित किए हैं, जो सभ्य समाज के विपरीत है। जब कभी मानव सभ्यता चाँद को छूने के लिए ब्रह्मांड को चीरती है तब ये चित्र मानव को आदिम युग में ले जाते है, जो शर्मनाक है। मनुष्यता के कलंक से विमुक्ति का प्रयास आदिवासी जीवन के प्रति एकात्म भाव से ही संभव है, अन्यथा विकास की गति केवल छलावा है।“[15] हिन्दी उपन्यास परम्परा का अवदान इस दृष्टि से स्तुत्य है। यह एक सुखद संयोग है कि आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर भारतीय गणतन्त्र के सर्वोच्च पद पर आदिवासी प्रतिनिधित्व है, इससे यह प्रतीत होता है कि यह वर्ग अब मुख्यधारा में स्थान पा रहा है। इससे सिद्ध होता है कि यह सांस्कृतिक चेतना के मूल्यांकन का समय है। 

भारत में भाषाओं के सर्वेक्षण करने वाले प्रथम भाषा-वैज्ञानिक सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन हिन्दी जगत् में अमर हैं। भारत की संस्कृति से अगाध श्रद्धा रखने वाले ग्रियर्सन ने नव्य भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया और उन्हें वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया, इस दृष्टि से उन्हें बीम्स, भांडारकर और हार्नली के समकक्ष माना जाता है। ‘ग्रियर्सन का हिंदी को अवदान’ विषयक आलेख में डॉ. सिंघवी का अभिमत है, “ग्रियर्सन ने जिस तटस्थता व प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर हिन्दी भाषा तथा साहित्य का अवगाहन किया, वह अतुल्य है। लगभग तीस वर्षों की अनवरत साधना से हिन्दी भाषा का स्वरूप निर्धारित किया और उसके साहित्य को भारतीय आस्था की दृष्टि से देखा। यहाँ तक कि लोक-संस्कृति में डूबकर उसे भी गौरवान्वित किया। हिन्दी साहित्य का इतिहास और भाषा-सर्वेक्षण ने ‘नींव के पत्थर’ की तरह कार्य किया, जिस पर आज हिन्दी का महल खड़ा है।“[16]  इसी तरह ‘आचार्य शिवपूजन सहाय की दृष्टि में हिन्दी-उर्दू का रिश्ता’ आलेख में हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओँ को भारत की आत्मा बताते हुए वे टिप्पणी करते हैं, “जब गिलक्राइस्ट ने भारतीय भाषा-शब्दावली को दो वर्गों में बाँटा था, उस समय अनजाने में ही हिन्दी और उर्दू को धार्मिक पहचान दे दी। धीरे-धीरे सांप्रदायिक रंग में रंगती हुई दो पृथक् भाषाओं के रूप में दिखाई देने लगी, परन्तु आत्मा की दृष्टि से देनों की अंतरंगता आज भी विद्यमान है। आचार्य शिवपूजन सहाय ने दोनों भाषाओं के रिश्तों को याद करते हुए भारतीयता के दृष्टिकोण को उजागर किया है।“[17] भाषाई संदर्भ में हिन्दी के विस्तार की चर्चा करते हुए ‘हिन्दी का वैश्विक धरातल एवं विस्तार’ विषयक लेख में सिंघवी जी लिखते हैं, “हिन्दी में साहित्य-सृजन परम्परा एक हजार वर्ष से भी पूर्व की है। आठवीं शताब्दी से निरन्तर हिन्दी भाषा गतिमान है। पृथ्वीराज रासो, पद्मावत, रामचरित मानस, कामायनी जैसे महाकाव्य अन्य भाषाओं में नहीं हैं। संस्कृत के बाद सर्वाधिक काव्य हिन्दी में ही रचा गया। हिन्दी का विपुल साहित्य भारत के अधिकांश भू-भाग पर अनेक बोलियों में विद्यमान है, लोक-साहित्य व धार्मिक साहित्य की अलग संपदा है और सबसे महत्त्वपूर्ण यह महान् सनातन संस्कृति की संवाहक भाषा है, जिससे दुनिया सदैव चमत्कृत रही है।“[18] देखा जाए तो उन्नीसवीं शती के पश्चात् आधुनिक गद्य विधाओं में रचित साहित्य दुनिया की किसी भी समृद्ध भाषा के समकक्ष माना जा सकता है। साथ ही दिनों-दिन हिन्दी का फलक विस्तारित हो रहा है, जो इसकी महत्ता को प्रमाणित करता है। 

रचनागत मूल्यांकन में भारतीय मूल्यों की गहनता प्रकट हो रही है, तो पश्चिमी अवधारणाएँ इसे नया कलेवर दे रही हैं। रचनाओं की विपुल मात्राओं, विविध वैचारिक पक्षों के उदय से आलोचना की गंभीरता बढ़ती जा रही हैं। ऐसे समय में डॉ. हरेराम पाठक जी ने हिन्दी आलोचना कोश के ग्यारह खंडों का संपादन कर हिन्दी के अध्येताओं को हिन्दी आलोचना के विविध आयामों से तार्किक ढंग से परिचित कराने, आलोचना की प्रक्रिया एवं दिशा से अवगत होने तथा पूर्ववर्ती आलोचकों के समृद्ध योगदान से प्रेरणा ग्रहण करने का अवसर प्रदान किया है। इसकी समीक्षा करते हुए सिंघवी जी लिखते हैं, “आज का लेखन साम्प्रदायिकता के दौर से गुजर रहा है। अपने सीमाबद्ध खेमों में आबद्ध लेखक निहित स्वार्थों को साहित्य के माध्यम से प्रकट कर रहा है। अत. साहित्य की सार्वकालिकता और सर्वजनहिताय की मंगलकामना बाधित हो रही है, न्याय कहीं दब-सा रहा है। ऐसी स्थिति में संपादक ने आलोचना के लिए महर्षि गौतम के न्याय सूत्र को आधार बनाकर उसके व्यावहारिक पक्ष को केंद्र में रखते हुए कृतियों की आलोचना करने की बात उठाई है।“[19] स्वयं संपादक की दृष्टि यह रही है कि वेद, उपनिषद, भर्तृहरि, पतंजलि एवं बौद्ध भाषा-चिंतन के विभिन्न सूत्रों को नये संदर्भ में व्याख्यायित किया जाए और शास्त्रीय आलोचना के निरंतर कमजोर होते जा रहे पहलुओं को मजबूती प्रदान की जाए। यह दृष्टि सांस्कृतिक विमर्श को गतिमान बनाती है। 

समकालीन हिन्दी आलोचना बहुमुखी धाराओं के साथ आगे बढ़ रही है। आलोचना की मात्रा तो बहुत अधिक है, परन्तु उसके लेखन के प्रतिमान निश्चित नहीं हैं। रचना के तथ्यों का आलोचक वर्णन करके आगे बढ़ जाता है, जहाँ रचना की प्रशंसा तो है, परन्तु मूल्यांकन नहीं। इस बारे में डॉ. सिंघवी का मत है, “हिन्दी आलोचना में आज सर्वाधिक आवश्यकता समकालीन रचनाशीलता की प्रवृत्तियों की पहचान कर आलोचना के प्रतिमान निर्मित किए जाने की है, ताकि आलोचना की भावी दिशा सही गंतव्य की ओर बढ़ सके। इससे भारतेन्दुकाल से जन्मी, शुक्ल काल में विकसित और शुक्लोत्तर काल में चरम तक पहुँची हिन्दी आलोचना वैश्विक साहित्यिक आलोचना के समकक्ष स्तर को प्राप्त कर सके।“[20] अतः यह चिंतन का विषय है कि हमारी सांस्कृतिक परिधि में रचनागत मूल्यांकन सभ्यता के विकास के साथ श्रेयकारी रहेगा।

समग्रतः मानवीय चेतना भाव और तथ्य के किनारों को स्पर्श करती हुई प्रवाहित होती है। जब वह ‘भाव’ को स्पर्श करती है तब काव्य और कला की सृष्टि होती है और जब यह तथ्य को स्पर्श करती है तो दर्शन और विज्ञान का विकास होता है। साहित्य के इतिहास को मनुष्य-जीवन के अखंड प्रवाह का इतिहास माना है। काव्य, साहित्य, ज्ञान, विज्ञान, कला, दर्शन के मूल में मानवीय चेतना को लक्षित किया जाना अपेक्षित है। आलोचना में सांस्कृतिक बोध विषय पर गंभीर चिंतन आवश्यक है। डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी जी ने अपनी आलोचनात्मक दृष्टि को उस ओर उन्मुख किया है। अतः सांस्कृतिक विमर्श को आधुनिक आलोचना में समृद्ध करने का यह प्रयास स्तुत्य है।

संदर्भ 
1. समवेत, उदयपुर, जुलाई-दिसम्बर, 2021
2. हिंदी अनुशीलन, प्रयागराज, अक्टूबर-दिसंबर, 2023
3. राष्ट्रबोध, संस्कृति एवं साहित्य, पृष्ठ 55
4. साहित्यिक निबंध, पृष्ठ 84 
5. आचार्य तुलसी की काव्य-साधना, पृष्ठ 236 
6. साहित्य का सांस्कृतिक पक्ष, पृष्ठ 118 
7. समवेत, उदयपुर, जुलाई-दिसम्बर, 2025 
8. मधुमती, उदयपुर, मार्च, 2021 
9. गगनांचल, नई दिल्ली, जनवरी-अप्रैल, 2024 
10.भावक, आगरा, अक्तूबर-दिसम्बर, 2022 
11.कबीर: दृष्टि एवं आधार, पृष्ठ 57 
12.अपनी माटी, चित्तौड़गढ़, जनवरी-मार्च, 2024
13.साक्षात्कार, भोपाल, जनवरी, 2018 
14.साहित्यिक निबंध, पृष्ठ 126  
15.वही, पृष्ठ 133 
16.गवेषणा, आगरा, अक्टूबर-दिसंबर, 2020 
17.हिन्दी अनुशीलन, प्रयागराज, जनवरी-मार्च, 2018
18.मधुमती, उदयपुर, सितंबर, 2024  
19.शब्दघोष, जयपुर, जुलाई-सितंबर, 2024
20.हिन्दी आलोचना: निकष एवं प्रतिमान, पृष्ठ 1 
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भक्ति साहित्य का पाठालोचन और डॉ. ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल

भक्ति साहित्य का पाठालोचन और डॉ. ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल


पाठालोचन वह शास्त्र है जिसके माध्यम से किसी प्राचीन या मध्यकालीन ग्रंथ के मूल रूप को खोजकर पुनर्निर्मित करने का प्रयास किया जाता है। प्रतियों की प्राचीनता, उनकी लिपि, लेखक का समय और जिस स्थान पर प्रति मिली है, उसके महत्त्व को रेखांकित करते हुए आलोचक का दायित्व लेखक की भाषा-शैली, व्याकरण, छंद-योजना और उस समय की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के साथ पाठ की संगति का अध्ययन करना भी आवश्यक होता है। शुद्ध पाठ तक पहुँचने के लिए उपलब्ध प्रतियों का वर्गीकरण करना और यह देखना कि कौन सी प्रति किस 'वंश' की है। उसके बाद पाठ-परीक्षण करते हुए विभिन्न प्रतियों के अंतर को समझना और यह तय करना कि कहाँ लेखक की भूल है और कहाँ प्रतिलिपिकार की। फिर तर्क सहित पाठ शोधन करते हुए विषय-वस्तु के ज्ञान के आधार पर मूल पाठ का अनुमान लगाना महत्त्वपूर्ण कार्य है। वस्तुतः यह वैज्ञानिक विश्लेषण और साहित्यिक सूझ-बूझ का संगम है। इस दृष्टि से हिन्दी आलोचना में एक सुदीर्घ परंपरा रही है, जिसमें बाबू श्यामसुंदर दास, डॉ. माताप्रसाद गुप्त, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, परशुराम चतुर्वेदी, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, धीरेन्द्र वर्मा, मुनि जिनविजय आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इसी परंपरा में डॉ. ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल वर्तमान हिन्दी पाठालोचन की विधा को प्रामाणिक रूप में आगे बढाते हुए निरंतर नवीन स्थापनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। 

ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल का जन्म 23 नवम्बर, 1956 को गंगापुरसिटी, जिला सवाईमाधोपुर, राजस्थान में हुआ। वे निर्गुणी सन्त-साहित्य, विशेषकर रामस्नेही सम्प्रदाय और दादूपंथ  सहित अनेक सन्त-भक्त सम्प्रदायों के साहित्य और इतिहास तथा प्राग्‌आधुनिक हिन्दी साहित्य के अधिकारी विद्वान हैं। उन्होंने संस्कृत साहित्य,  सन्त-वाणियों और वेदान्त-ग्रंथों का विशेष अध्ययन किया है। उनकी शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें प्रमुख हैं- श्रीरामचरण चरितामृत, श्रीसुरतराम चरितामृत श्रीसुरतरामवाणी पूर्वार्द्ध (सटीक), श्रीरामप्रतापवाणी (पूर्वार्द्ध), रामस्नेही मत-सिद्धान्त-दर्पण (पूर्वार्द्ध), श्रीरामनिवास-वाणी, आचार्य हरिदास-वाणी, आचार्य हिम्मतराम ग्रन्थावली (सटीक), श्रीरामसेवकवाणी, श्रीपोहकरदास वाणी, श्रीमुरलीरामवाणी, श्रीजगन्नाथ-ग्रंथावली (सभूमिका), श्रीहरिराम-वाणी, मीरां -चरितामृत, वषनांवाणी (सटीक), टीला पदावली (सटीक), नाम-प्रतीत-भगतमाला (सटीक), नरसीजी रो माहेरो, ग्रंथ संतोष सुरतरु (सटीक), कन्हड्दास वाणी, सूफी दरवेश बाबा शेख फरीद जीवन और वाणी (सटीक), कान्हा-ग्रंथावली (सटीक), रज्जब की सरबंगी (सभूमिका), ब्रह्मदास (भगतराम शिष्य), वाणी (सटीक), मारवाड़ी दरियावसाहब जीवनी और वाणी, ब्रह्मदास (रामजन-शिष्य) वाणी राजस्थान में नरसी मेहता पर रचित साहित्य (नरसीजी रो माहेरी) आदि। इनके अतिरिक्त दो सौ से अधिक शोध-लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. सिंहल के इस योगदान का रेखांकन कतिपय उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया जा रहा है- 

मीरांबाई का साहित्य लंबे समय तक मौखिक परंपरा में रहा, जिस कारण उनमें बहुत अधिक क्षेपकों की संभावना थी। सिंहलजी द्वारा मीरांबाई के पदों के पाठालोचन में प्राचीनतम प्रतियों की खोज की  गई जो राजस्थान, गुजरात, ब्रज में बिखरी  हुईं  थी । उन्होंने केवल उन प्रतियों को आधार बनाया जो ऐतिहासिक रूप से प्राचीन थीं। उन्होंने हस्तलिखित ग्रंथों की खोज कर उन पाठों को वरीयता दी जो मीरां  के कालखंड के सबसे निकट थे। मीरांबाई की मूल भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रज थी। सिंहलजी ने पाठालोचन करते समय उन पदों को संदिग्ध माना जिनमें आधुनिक शब्दावली या ऐसी भाषा का प्रयोग था जो मीरां  के समय (16वीं शताब्दी) में प्रचलित नहीं थी। उन्होंने राजस्थानी के प्राचीन व्याकरणिक रूपों को ही प्रामाणिक माना।

‘मीरा’ अथवा ‘मीरां’ नामकरण की भ्रांतियों का निवारण करते हुए वे लिखते हैं, “नाभाजी का भक्तमाल, उसकी प्रियादास व बालकराम की टीकाएँ, राघवदासजी का भक्तमाल, उसकी चतुरदास की टीका, ये सभी ब्रज-भाषा में हैं। इन सभी में मीरां शब्द 'मीरां ' ही लिखा मिला है। नैणसी री ख्यात में भी 'मीरां' शब्द ही लिखा मिला है। राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार कविराजा श्यामलदास, मुंशी देवीप्रसाद, गौ.ही. ओझा, जगदीशसिंह गेहलोत, डॉ. गोपीनाथ शर्मा, रायबहादुर हरविलास सारदा, पं. विश्वेश्वरनाथ रेउ आदि अनेक विद्वानों ने मीरां को 'मीरां ' ही लिखा है। अतः राजस्थानी मीरां का वास्तविक नाम ‘मीरा’  न होकर 'मीरां ' ही है। इसे 'मीरां' ही लिखा, पढ़ा और बोला जाना चाहिये।“ यह कथन पाठ-परीक्षण करते हुए लेखकीय भूलों को भी उजागर करता है जो कि पाठालोचन की अनिवार्य शर्त है। 

इसी तरह मीरां के गुरु रैदास थे अथवा नहीं, इस संबंध में अलग-अलग मत हैं। डॉ. सिंहल ने  अनेक ग्रंथों का संदर्भ देते हुए अपना मत दिया है कि रैदास मीरां के गुरु नहीं थे-“सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात, मीरां को मेवाड़ में अनेक कष्ट दिये गये। प्रारंभ में वह उन कष्टों से विचलित नहीं हुई किन्तु जब राणा कष्ट दर कष्ट देता ही चला गया तब उसका धैर्य टूट गया और उसने मेवाड़ को छोड़ने का निर्णय कर लिया। यदि रैदास या रैदासपंथी कोई संत-महंत मीरां के गुरु होते तो वह ब्रजक्षेत्र और ब्रजक्षेत्र से द्वारका न जाकर सीधे काशी जाती जहाँ रैदासियों का मठ, गद्दी तथा महंताई की परंपरा है किन्तु मीरां तो पूरे जीवनभर कभी काशी गई ही नहीं। इस तर्क से भी यही सिद्ध होता है कि मीरां का रैदास या रैदासपंथी किसी भी संत से कोई सम्बन्ध नहीं था।”[2] डॉ. सिंहल ने आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के मत की विवेचना भी की है जिसमें भक्तमाल के पद के आधार पर रैदासपंथी विट्ठलदास से मीरां को दीक्षित  होना बताया गया है-

"बिठलदास हरि भक्ति के दुहू हाथ लाडू लिया॥ 

आदि अंत निर्वाह भक्त पद रज सिर धारी। 

रह्यौ जगत से ऐंड तुच्छ जानें संसारी॥ 

प्रभुता पति की पधति प्रगट कुल दीप प्रकासी॥ 

महंत सभा में मान जगत जानें रैदासी।

पद पढत भई परलोक गति गुरु गोविन्द जुग फल दिया।

बिठलदास हरि भक्ति के दुह हाथ लाडू लिया॥[3]

डॉ. सिंहल के अनुसार इस छप्पय से बिठ्ठलदास की निम्न विशेषताएँ ज्ञात होती हैं जिनसे सिद्ध होता है कि विठ्ठलदास ‘रैदासी’ मीरां के गुरु नहीं थे ---  (क) वे साधु संतों की चरण-धूलि को अपने मस्तक पर रखते थे अर्थात् वे संत मात्र को पूज्य और वंदनीय मानकर उनकी तन-मन से अभ्यर्थना करते थे। (ख) वे भगवद्विग्रह के समक्ष पद गाते हुए नृत्य करते थे। (ग) वे रैदासी-रैदास की जाति में उत्पन्न हुए थे जिसके कारण वे रैदासी कहलाते थे। (घ) वे संसार से सर्वथा और सर्वदा उदासीन ही रहे क्योंकि उन्होंने संसार को असत्य जान लिया था। (ङ) वे साधुओं की बड़ी-बड़ी सभाओं में भी सम्मान पाते थे। (च) प्रभुता (लक्ष्मी) के पति विष्णु अर्थात् लक्ष्मीनारायण की पद्धति वाले संप्रदाय रूपी कुल को प्रकाशित करने वाले कुलदीपक थे। (छ) भगवद्विग्रह के समक्ष पद गाते समय भगवद्भावापन्न होकर वहीं निज इष्ट में लीन हो गये। इस तरह अपने मत का तर्क के साथ प्रस्तुतीकरण इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करता है और इसे स्वीकार्य बनाता है।

नाथ-सम्प्रदाय भारत का एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक पंथ है जिसका उदय मध्ययुग में हुआ। हठयोग की साधना-पद्धति पर आधारित इस पंथ में बौद्ध, शैव तथा योग परम्पराओं का अद्भुत समन्वय है। गुरु गोरखनाथ के पूर्व यद्यपि अनेक गुरु हुए किन्तु इस पंथ के मुख्य आराध्य के रूप में गोरखनाथ की ही प्रतिष्ठा है। उन्हें यह श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने सम्प्रदाय की योग-विद्याओं का एकत्रीकरण किया। ब्रजेंद्र कुमार सिंहल ने गोरखनाथ और नाथ साहित्य के पाठालोचन पर अत्यंत गंभीर और मौलिक विचार व्यक्त किए हैं। उनका मानना है कि गोरखनाथ का साहित्य हिंदी भाषा के क्रमिक विकास को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।

डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने 'गोरखबानी' का संपादन किया था, लेकिन सिंहलजी ने इसमें पाठालोचन की और अधिक सूक्ष्म पद्धतियों के प्रयोग पर बल दिया। उनका मानना है  कि गोरखनाथ के नाम से प्रचलित बहुत सी रचनाएँ परवर्ती काल की हैं। उन्होंने आंतरिक साक्ष्य के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि गोरखनाथ के वास्तविक पाठों में 'योग' की पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग अत्यंत सटीक और संयमित है। सिंहलजी मानते हैं कि गोरखनाथ का साहित्य केवल धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि वह 'अनुभव की कविता' है। उन्होंने कहा कि गोरखनाथ ने हठयोग के कठिन सिद्धांतों को जनभाषा में जिस तरह ढाला, वह उनके उच्च कोटि के कवि और संपादक होने का प्रमाण है। गोरखनाथ का साहित्य सदियों तक जोगियों द्वारा गाकर सुरक्षित रखा गया। 

‘जाग मछंदर गोरख आया’- पंक्ति लोक में प्रसिद्ध है। गोरखनाथ और उनके गुरु मछिंद्रनाथ से जुड़ी एक पौराणिक और आध्यात्मिक पंक्तियाँ हैं। यह गोरखनाथ द्वारा अपने गुरु को सांसारिक मोह से जगाने के लिए कही गई उक्ति है। इसकी प्रामाणिकता को सिद्ध करते हुए डॉ. सिंहल स्पष्ट रूप से लिखते हैं, “अन्तः साक्ष्यों से स्पष्ट है कि गुरु मछिन्द्रनाथ कामिनियों के व्यामोह में फँसकर एक बार वृद्धावस्था में पथ-भ्रष्ट हुए थे जिनको गोरखनाथ ज्ञानोपदेश देकर उनको, उनके अतीत को बताकर, पुनः 'शैव-सिद्धामृत-योगमार्ग' में लौटा लाए। अतः गोरख द्वारा मछिन्द्रनाथ को चेतन करने की घटना शत-प्रतिशत सही व प्रामाणिक है।“[4] इस कथन में पूर्व के शोध को मान्यता प्रदान करने का भाव है, जो आलोचना धर्म का निर्वाह है तथा पाठालोचन की गंभीरता को व्यक्त करता है। 

चार युगों में चार स्थानों पर गोरखनाथ के अवतरित होने की बात को स्पष्ट करते हुए  डॉ. सिंहल इसकी मौलिक अवधारणा प्रस्तुत करते हैं, “बहुत सम्भव है, यह चार युगों की बात न होकर, गोरखनाथ के जीवन के चार पड़ावों की गाथा है। वे जन्मे टिल्ला, पेशावर पंजाब में, प्रकट हुए गोरखपुर में अर्थात् यहाँ आकर उनका योगमार्गी साधक का रूप परिपक्व रूप में सामने आया। तत्पश्चात् वे हुरमुज में जाकर अपने सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार में और भी ज्यादा तीव्रता से अग्रसर हुए और अन्त में काठियावाड़ सौराष्ट्र की धरती में रहे। यह क्षेत्र संयुक्त पंजाब सिंध से ज्यादा दूर नहीं। आज भी कच्छ काठियावाड़ में सिंधियों की अच्छी बसावट है। सम्भव है, गोरखनाथ इसीलिए अन्तिम समय में काठियावाड़ के क्षेत्र में रहे हों।“[5] यह प्रकटीकरण भविष्य के शोध को आधारभूमि प्रदान करता है।

डॉ. सिंहल गोरखनाथ का काल निर्णय करते समय अपना मत प्रामाणिक रूप से लिखते हुए नई स्थापना प्रदान करते हैं। वे स्पष्ट रूप से लिखते हैं, “आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ऐसी हो दो-तीन मोटी-मोटी गल्तियाँ लिख गए हैं जिनको परवर्तियों ने बिना ऐतिहासिक ग्रंथों को पढे  व जाने यथारूप अपनी उस्तकों में उद्धृत किया है जबकि ऐतिहासिक पुस्तकों में उनके सम्बन्ध में पुष्कल चर्चाएँ बीसवीं शताब्दी के प्रथम द्वितीय चरण से ही हिन्दी- अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं।  एक उदाहरण राजेन्द्र चोल के समय के सम्बन्ध में है। दूसरा उदाहरण प्रबन्ध-चिन्तामणि के आधार पर कंथड़ी व मूलराज सोलंकी सम्बन्धी विवरण है। आश्चर्य है कि प्रबन्ध-चिन्तामणि के अनुवादक स्वयं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं।“[6]

चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास' ग्रंथ को पूर्व में भी अन्यान्य बिंदुओं की चर्चा करते समय उद्धृत कर चुके हैं। यह ग्रंथ अभी तक नाथ-पंथ के अध्येताओं के नोटिस में नहीं आया। यह ग्रंथ अनेक वर्षों तक चूरू-मंडल के गाँव-गाँव, ढाणी-ढाणी, जगह-जगह का कई-कई बार सर्वेक्षण करके विलक्षण प्रतिभा के धनी श्रीगोविन्द अग्रवाल के द्वारा लिखा जाकर 'लोक-संस्कृति-शोध संस्थान, नगरश्री चूरू द्वारा सन् 1974 में प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक के पृष्ठ-389 पर एक शिलालेख, जो लेखक व उनके अग्रज श्रीसुबोधकुमार अग्रवाल स्वयं ने नाथपंथी नोहर-मठ में जाकर देखा व जिसकी फोटो भी 28.08.1971 को उतारकर लाए और पुस्तक के उक्त पृष्ठ पर यथारूप छापा, नाथ-सम्प्रदाय के अध्येताओं के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और इससे गोरखनाथ का समय निश्चित् करने में महनीय प्रामाणिक सहायता मिलती है। यह शिलालेख नाथपंथ के मठ जो नोहर नामक गाँव,  गंगानगर जिले, हनुमानगढ़ तहसील में पड़ता है, में है।

डॉ. सिंहल का मत है, “मुझे ऐसा लगता है कि अमरनाथ, गोरखनाथ के साक्षात् शिष्य न होकर परम्परया शिष्य रहे होंगे. कम से कम 1-2 पीढी बाद के, तब ही तो शिलालेख पूरी परम्परा याद न होने के कारण नहीं लिखी गई और केवल नाथैक्य होने वाल नाथ व गुमट चढ़ाने वाले नाथ का तिथि मिति युक्त उल्लेख किया गया है। अतः हमारे पास इस शिलालेख के आधार पर यह निश्चित् प्रमाण है कि गोरखनाथ वि.सं. 1102 के बाद के ही नहीं, लगभग संवत 1075 के बाद के भी किसी कीमत पर नहीं हो सकते। यह समय सीमा रेखा गोरखनाथ के समय को निर्धारित करने के लिये अन्तिम सीमा है। इसके आगे जाने का कोई आधार नहीं है। इस बिन्दु को सबसे प्रथम लिखने का उद्देश्य भी यही है कि गोरखनाथ का समय हमको यदि वि.सं. 1075 के बाद का किसी आधार पर ज्ञात हो तो वह किसी भी स्थिति में मान्य नहीं हो सकता।“[7] यह स्पष्ट स्वीकारोक्ति पाठालोचन को स्वीकार्य बनाती है। 

ब्रजेंद्र कुमार सिंहल ने दादूदयाल और उनके द्वारा स्थापित 'दादू पंथ' के साहित्य पर जो कार्य किया है, वह हिंदी पाठालोचन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। सिंहल जी दादू दयाल को राजस्थान का सबसे बड़ा "समन्वयकारी संत" मानते हैं । सिंहल जी ने यह रेखांकित किया कि दादू ने अपने पंथ का नाम पहले 'परब्रह्म संप्रदाय' रखा था, जो उनकी निर्गुण उपासना का प्रतीक था। उनका मत है  कि दादू कबीर की तुलना में अधिक "मृदु" और "उदार" थे। जहाँ कबीर की भाषा में 'फटकार' है, वहीं दादू की वाणी में 'पुकार' और 'अनुरोध' है। उपलब्ध ग्रंथों का वर्गीकरण करते हुए अन्य लेखकीय प्रतियों का स्पष्ट उल्लेख करते हुए निरपेक्ष भाव से प्रकट किया। जगन्नाथ कृत ‘मोह-मर्द-राजा की कथा’ कृति पर अपना मत प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं- “मेरे पास उपलब्ध कई हस्तलेखों सहित दादूपंथ के अनेक हस्तलेखों में यह ग्रंथ लिखा मिलता है। जब ग्रंथांत को पढते हैं, तब ज्ञात होता है कि यह ग्रंथ बनाया तो संत जगन्नाथजी ने ही है, किन्तु ये जगन्नाथजी, दादू-शिष्य जगन्नाथजी न होकर, 'तुरसीदासजी' के शिष्य 'जन जगन्नाथजी' हैं।“[8] ये तुलसीदासजी व जन जगन्नाथजी रामानंदी संप्रदाय के संत थे। यह तटस्थ दृष्टि उनके पाठ आलोचना को समृद्ध बनाती है। 

ब्रजेंद्र कुमार सिंघल का रज्जब के पदों पर आधारित 'सरबंगी'  पाठालोचन की दृष्टि से एक अमूल्य कोश है। उनका विचार है  कि रज्जब ने केवल अपनी रचनाएँ ही नहीं लिखीं, बल्कि अपने समय के अन्य संतों की वाणियों का भी जिस कुशलता से संपादन और संग्रह किया, वह उन्हें मध्यकाल का एक महान 'संपादक' सिद्ध करता है। उन्होंने रज्जब के पाठालोचन के दौरान यह रेखांकित किया कि उनके पदों में अन्य कवियों की तुलना में पाठ-विकृति कम है, क्योंकि रज्जब की शिष्य-परंपरा ने उनकी वाणियों को लिखित रूप में सुरक्षित रखने पर विशेष बल दिया था। 

रज्जब के निवास और साधना स्थल के भ्रम का निवारण करते हुए वे स्पष्ट करते हैं, ”दादूदयाल को साँगानेर में निमंत्रित करने वालों के नाम उक्त वर्णन में (१) चाटसू निवासी हरिदास (२) ऊधौदास (३) नारायनदास (४) कारू (५) कुंभा व (६) दूसरा नारायण आये हैं। इनमें संत रज्जब का नाम कहीं भी नहीं आया है। यदि रज्जब सांगानेर में स्थाई रूप से रहते होते तो उनका व उनके शिष्यों का नाम उक्त विवरण में अवश्य आता। इससे भी हमारे उस कथन को बल मिलता है जिसमें हमनें कहा है कि रज्जब संतप्रवर दादूदयाल की संनिधि में आमेर में ही रहे। सांगानेर में नहीं रहे। मारवाड़ की रामत प्रारम्भ हो जाने पर रज्जब संतप्रवर दादूदयाल के साथ रामत में ही रहे। नरायना आ जाने पर नरायना आ गए। अंततः वि०सं० १६६२ के मेले में सन्त सुन्दरदास 'बूसर' के प्रसंग में गरीबदासजी से विवाद हो जाने पर इन्होंने नरायना सदा-सदा के लिए छोड़ दिया और ये पूरे ३० वर्ष पश्चात् १६९२ विक्रमसम्वत् में सन्त सुन्दरदास बूसर, पं० जगजीवनदास दौसा वालों के साथ नरायना पुनः गए जिसकी परिणति वि०सं० १६९३ में आचार्य गरीबदासजी के ब्रह्मलीन होने के रूप में सामने आई। जैसा हम पूर्व में लिख आये हैं, डॉ० कलेवर्ट की यह स्थापना निराधार है, जिसमें उन्होंने रज्जब को साँगानेर में ही रहकर साधना करते हुए दर्शाया है और मारवाड़ की रामत के समय दादूदयाल का शिष्य बनना लिखा है। उक्त विवरण से यह निष्कर्ष स्पष्ट तौर पर निकलता है कि स्वामीजी से साँगानेर आने के लिए निवेदन करने में हरिदास चाटसू निवासी तथा जनगोपाल के शिष्य चैनदास आदि का ही महत्वपूर्ण हाथ था।“[9] यह अन्वेषण पाठालोचन की सार्वकालिकता सिद्ध करता हैं, जहाँ आक्षेपों का स्थान नहीं रहता। 

डॉ. सिंहल ने रामस्नेही संप्रदाय के साहित्य और उसकी पांडुलिपियों के संरक्षण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। चूंकि यह संप्रदाय राजस्थान की धरती से उपजा और इसकी परंपरा मुख्य रूप से हस्तलिखित ग्रंथों और मौखिक गायन पर आधारित रही, इसलिए सिंहल  जी का कार्य यहाँ और भी चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण हो जाता है। रामस्नेही संप्रदाय की चार प्रमुख शाखाएँ हैं: शाहपुरा, रेण, सींथल और खेड़ापा। सिंहल जी ने इन चारों केंद्रों के 'वाणी-संग्रहों' का गहराई से अध्ययन किया। उनका मत है  कि शहपुरा के  रामस्नेही संतों ने अपनी रचनाओं को व्यवस्थित रखने के लिए 'वाणीजी' के रूप में जो संकलन तैयार किए, वे पाठालोचन की दृष्टि से बहुत शुद्ध हैं क्योंकि इस संप्रदाय में गुरु-शिष्य परंपरा अत्यंत अनुशासित रही है। रामस्नेही संप्रदाय में 'राम' नाम निर्गुण निराकार का प्रतीक है। सिंहलजी ने पाठालोचन के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि संप्रदाय के कवियों (जैसे स्वामी रामचरणजी) के पाठों में जहाँ 'राम' शब्द आता है, वहाँ उसका अर्थ दशरथ-पुत्र राम से भिन्न है। उन्होंने पाठ-शोधन करते समय उन प्रतियों को अधिक महत्व दिया जिनमें निर्गुण दर्शन की स्पष्टता है । उनका मानना है  कि 'अणभै वाणी' केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं है, बल्कि यह राजस्थानी और हिंदी के शब्द-सामर्थ्य का खजाना है।

शाब्दिक अर्थ की लाक्षणिकता को स्पष्ट किए बिना पाठालोचन को पूर्णता प्राप्त नहीं होती। इसी क्रम में एक स्थान पर उन्होंने पद्धति का अर्थ ‘पीढ़ी’ का समर्थन करते हुए तुलनात्मक विवरण देकर अपना मत प्रस्तुत किया- 'पीढ़ी' अर्थ लेने पर स्पष्टतः श्रीस्वामी रामानंदाचार्य, श्रीस्वामी रामानुजाचार्य की शिष्य-परंपरा में आ जाते हैं जबकि 'अर्चना-पद्धति', 'सिद्धान्त-पद्धति' अर्थ लेने से 'श्रीरामानुजाचार्य जैसे सिद्धान्त वाले श्रीरामानंदाचार्य हुए' शिष्य-परंपरा से अलग भी माने जा सकते हैं तथा परंपरा में भी माने जा सकते हैं। व्यक्ति किसी से सम्बद्ध अथवा असम्बद्ध विचारों से माना जाता है, वेश-भूषा से माना जाता है, आचार-व्यवहार से माना जाता है। श्रीरामानुजाचार्य एवं श्रीरामानंदाचार्य का विचार-दर्शन तथा आचार-दर्शन समान है। अतः हमारे विचार से पद्धति का अर्थ पीढ़ी ही करना समीचीन किम्वा न्यायोचित है। हमारे द्वारा यहाँ उपस्थित विस्तृत विवेचन से भी यही सिद्ध होता है कि पद्धति का तात्पर्य पीढ़ी ही होना चाहिये क्योंकि श्रीरामानंदाचार्य, श्रीरामानुजाचार्य की शिष्य-परंपरा में ही आते हैं।“[10] इससे शब्द की सार्थकता विषय-सापेक्ष प्रकट होती है, जो कि पाठ की आलोचना का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। 

हस्तलिखित प्रतियों का सम्पादन करते हुए पूर्व के लेखन की समीक्षा आवश्यक होती है। कई बार नवीन प्रति हाथ में आने पर आलोचक का विस्मित होना स्वाभाविक है। सूफी रचनाकार श्री रोहेल साहब की हस्तलिखित प्रतियों का सम्पादन करते हुए उनकी टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है- “यह आश्चर्य का विषय है कि धुर सिंधु-देश के रहने वाले, इन मुस्लिम धर्मानुयायी परिवार में जन्मे दरवेशों ने सिंधी-प्रभावित ब्रजभाषा के छन्दों सहित सिन्धु-देश में प्रचलित काफी, रेखते एवं विभिन्न रागों के पदों में अपनी रचनाएँ लिखी हैं। इनकी भाषा प्रायः ब्रजी, मारवाड़ी और सिंधी है। कुछ सी-हरफियाँ व एक-दो काफियाँ पंजाबी-भाषा में भी हैं। लिपि अरेबिक-सिंधी है और यही कारण है कि वर्तमान समय तक इनकी रचनाएँ न तो हिन्दी क्षेत्र के विद्वानों के संज्ञान में आईं और न सिंधी विद्वान् ही अभी तक इनकी समग्र रचनाओं की खोजबीन कर इनको प्रकाशित कर सके। संभवतः इसका प्रधान कारण यही है कि इनकी रचनाओं की सीमित हस्तलिखित प्रतियों का मिलना व आजकल हस्तलेखों को पढ़कर पाठ-सम्पादन करने वालों का प्रायः अभाव-सा होता जा रहा है।“[11] इस कथन से यह भाव प्रकट होता है कि लेखन और समालोचना दोनों पूरक हैं। 

उक्त विवेचन से यह भाव प्रकट होता ही कि डॉ. सिंहल ने पाठ की आलोचना के क्षेत्र में नए मानदंड स्थापित करते हुए परिश्रमपूर्वक साक्ष्यों को जुटाकर प्रमाणपुष्ट कार्य सम्पन्न किया है। भाग, प्रभाग, कंडिका, उपकंडिका जैसे उपनामों से संबोधित विषय-सामग्री को प्रखंडों में विभाजित कर विवेचना सुग्राह्य बनाया है। सोपानीकरण के आधार पर निर्मित इस वृहद् कार्य को सुलभ कराने में लेखक ने सम्पूर्ण कार्य में एक आन्तरिक अन्विति की संरचना की है। विश्लेषण को प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत कर निष्कर्ष निरूपण जैसी शैलियों का आश्रय लिया है, जिससे पाठालोचन में वैज्ञानिक दृष्टि समाविष्ट हुई है।

संदर्भ ग्रंथ 

[1] मीरांबाई: प्रामाणिक जीवनी एवं मूल पदावली, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, सं. 2025, पृष्ठ, 21

[2] मीरांबाई: प्रामाणिक जीवनी एवं मूल पदावली, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, सं. 2025, पृष्ठ, 72-73

[3] नाभा कृत भक्तमाल का छप्पय क्रमांक 177 

[4] महायोगिराज गोरखनाथ, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2024, पृष्ठ, 137

[5] महायोगिराज गोरखनाथ, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2024, पृष्ठ, 237

[6] महायोगिराज गोरखनाथ, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2024, पृष्ठ, 202-203

[7] महायोगिराज गोरखनाथ, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2024, पृष्ठ, 204

[8] गुणगंजनामा, श्री दादूपंथी साहित्य शोध संस्थान, जयपुर सं. 2021, पृष्ठ 65

[9] रज्जब की सरबंगी, प्रकाशक ब्रजमोहन साँवड़िया, रायगढ़, सं. 2010, पृष्ठ, 15

[10] आचार्य परंपरा, अंतरराष्ट्रीय राम सनेही संप्रदाय, शाहपुरा, सं. 2076 वि. 

[11] रोहल साहब ग्रंथावली, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, भोपाल, भूमिका


जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान

 


जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान

साहित्य परिक्रमा के जनवरी-मार्च, 2026 अंक में प्रकाशित

राजस्थान की समृद्ध साहित्यिक विरासत में जैन साहित्य का एक विशिष्ट स्थान है। यह साहित्य केवल धार्मिक उपदेशों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के इतिहास, उसकी सामाजिक संरचना और भाषायी परम्परा को समझने के लिए एक अमूल्य स्रोत के रूप में कार्य करता है। जैन मुनियों, आचार्यों और श्रावकों द्वारा रचित इस साहित्य ने जैन धर्म के सिद्धांतों, तीर्थंकरों की महिमा, मंदिरों के उत्सवों और संघ यात्राओं का विस्तृत वर्णन किया है। इसकी विशालता और विविधता उल्लेखनीय है। जैन समुदाय की ज्ञान-संरक्षण और साहित्य सृजन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के कारण इसने अन्य समकालीन साहित्यिक परंपराओं की तुलना में अधिक मात्रा में साहित्य का निर्माण करने में सक्षम बनाया। जैन समुदाय की संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण है कि चातुर्मास में साधुओं द्वारा चिंतन, मनन और प्रवचन के साथ-साथ लेखन-पठन के कार्य पर दिए गए महत्व के कारण विपुल साहित्यिक धरोहर प्राप्त हुई। भारतीय परंपरा में जैन दर्शन और संस्कृति अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है। यह स्थिति प्राकृत, संस्कृत, राजस्थानी और विभिन्न स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध विपुल जैन साहित्य से प्रमाणित होती है। यह साहित्य आगम, पुराण, कथा, चरित्र, काव्य और निबंध जैसे विविध रूपों में उपलब्ध है, जो इसकी बहुआयामी प्रकृति को दर्शाता है ।

राजस्थानी जैन साहित्य में समालोचनात्मक लेखन की एक सुदृढ़ परंपरा रही है, जिसमें 'टीका', 'बालावबोध' और 'टब्बा' जैसे शब्द प्रमुखता से प्रयुक्त होते हैं। इन तीनों का मूल उद्देश्य ग्रंथों को स्पष्ट करना था, किंतु उनकी प्रकृति और विस्तार में भिन्नता थी। टीकाएँ मूलतः संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश जैसी भाषाओं में रचित जटिल धार्मिक और उपदेशात्मक ग्रंथों को जनसाधारण के लिए सुगम बनाने के उद्देश्य से लिखी गईं। जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति और नैतिक उत्थान आदि को प्राप्त करने के उद्देश्य से इन टीकाओं का विकास हुआ। यह ज्ञान की सर्वव्यापकता और जटिल दार्शनिक अवधारणाओं को सरल एवं व्यावहारिक रूप में जन सामान्य तक पहुँचाने की एक अनुपम पहल थी, जिससे धर्म अधिक प्रभावशाली और उपयोगी बन सके।

‘टीका’ मूलतः किसी संस्कृत, प्राकृत या अपभ्रंश ग्रंथ पर लिखी गई एक विस्तृत व्याख्या या भाष्य होती थी। इसका लक्ष्य मूल पाठ के गहन अर्थों, दार्शनिक अवधारणाओं और संदर्भों को विश्लेषित करना था, जो प्रायः विद्वानों और गंभीर अध्येताओं के लिए होती थी। ‘बालावबोध’ बालकों या सामान्य गृहस्थों के लिए मूल रचना का विस्तृत और सरल स्पष्टीकरण होता था। जैन कवियों का उद्देश्य जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति पैदा करना था और तत्त्वज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती का समाधान करने के लिए बालावबोध एक सरल, सरस, सहज और बोधगम्य शैली में लिखा जाता था, जिससे जैन धर्म के सिद्धांतों को जनसाधारण तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सके। ‘ टब्बा’ मूल रचना के स्पष्टीकरण के लिए पत्र के किनारों पर लिखी गई संक्षिप्त टिप्पणियाँ होती थीं। ये त्वरित संदर्भ और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में सहायक होती थीं।

वस्तुतः मूल जैन आगम ग्रंथ प्रायः प्राकृत या संस्कृत में थे, जो सामान्य जन के लिए कठिन थे। इस कठिनाई को दूर करने के लिए, विभिन्न स्तरों की व्याख्याएँ आवश्यक थीं। टीकाएँ विद्वानों की सन्दर्भ सहायिका थीं, बालावबोध जटिल दार्शनिक और धार्मिक अवधारणाओं को सरल बनाकर व्यापक जनता तक पहुँचाते थे और टब्बा त्वरित स्पष्टीकरण प्रदान करते थे। इन विविध व्याख्यात्मक पद्धतियों का प्रयोग यह दर्शाता है कि जैन विद्वानों ने ज्ञान के प्रसार के लिए एक बहु-स्तरीय और समावेशी दृष्टिकोण अपनाया। यह केवल एक प्रकार की व्याख्या नहीं थी, बल्कि विद्वानों से लेकर सामान्य पाठकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक सुविचारित शैक्षणिक संरचना थी, जिससे जैन दर्शन की गहराई और व्यापकता सभी स्तरों पर समझी जा सके। यह दृष्टिकोण जैन विद्वानों समालोचना दृष्टि को दर्शाता है, जिसने धार्मिक ज्ञान को केवल एक विशिष्ट वर्ग तक सीमित न रखकर साहित्यिक उपागम बनाकर जनव्यापी बनाया।

राजस्थानी जैन टीका साहित्य का विकास विभिन्न शताब्दियों में अनेक प्रतिभाशाली विद्वानों और संतों के योगदान से हुआ। इन टीकाकारों ने न केवल जैन धर्म के सिद्धांतों को स्पष्ट किया, बल्कि अपने लेखन के माध्यम से तत्कालीन समाज, संस्कृति और इतिहास का भी महत्त्वपूर्ण चित्रण किया। जैन संस्कृति की दृष्टि से राजस्थान में अभूतपूर्व साहित्य लिखा गया। 5वीं शती में आचार्य सिद्धसेन ने जैन-दर्शन पर आधारित ग्रंथ ‘सम्मई सूत्र’ की रचना की। यह ग्रंथ राजस्थान का प्राकृत भाषा में रचित प्रथम ग्रंथ है। उद्योतन सूरि ने 835 विक्रम संवत में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ की रचना की। यद्यपि यह ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखा गया था,  इसमें ‘मरुभाषा’  अर्थात् राजस्थानी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मरुभाषा का यह प्रारंभिक उल्लेख यह दर्शाता है कि राजस्थानी भाषा का साहित्यिक उपयोग बहुत प्रारंभिक काल से ही हो रहा था और जैन विद्वान इसके विकास में अग्रदूत थे। यह भाषा और धर्म के बीच एक अन्योन्याश्रित संबंध स्थापित करता है, जहाँ धार्मिक उपदेशों के प्रसार ने स्थानीय भाषा के साहित्य का मानकीकरण किया।

इसी तरह षटखंडागम’ ग्रंथ पर आधारित आचार्य वीरसेन रचित ‘धवला’ नामक टीका अद्वितीय है। इसमें 72000 श्लोक संस्कृत और प्राकृत भाषा में है। आठवीं शती के जैन आचार्य हरिभद्रसूरि ने कथाउपदेशयोगदर्शन आदि से संबंधित 1444 ग्रंथों की रचना की तथा संस्कृत-प्राकृत में एक लाख पचास हजार श्लोक लिखे। प्रमुख ग्रंथों में समराइच्च कहा’, ‘शास्त्र वार्ता समुच्चय’, ‘धूर्ताख्यान’, ‘योग शतक’, ‘योग बिंदु, ‘योग दृष्टि समुच्चय’, ‘संबोध प्रकरण’ आदि उल्लेखनीय हैं। 10वीं शताब्दी में सिद्धर्षि नामक संत कवि ने भीनमाल में ‘उपमिति भव प्रपंच कहा’ नामक एक महत्वपूर्ण रूपक ग्रंथ की रचना की। इसके अतिरिक्त  जिनप्रभ सूरि द्वारा प्रणित ‘तीर्थकल्प’ और मुनि चन्द्र का ‘अमर अरित’ भी राजस्थानी जैन साहित्य की सुदृढ़ नींव निर्मित करती है।

यह साहित्य मुख्यतः धार्मिक और नैतिक होने के बावजूद, इसका व्यापक प्रभाव केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। इसमें तत्कालीन सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों को भी इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षित किया गया। यह दर्शाता है कि धार्मिक साहित्य केवल उपदेशात्मक नहीं होता, बल्कि अपने समय के जीवन का एक महत्वपूर्ण दर्पण भी बन जाता है, जिससे शोधकर्ताओं को बहुआयामी अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए, ‘जयधवला टीका’, ‘गद्य कथामृतक’ और ‘उत्तर पुराण’ जैसे ग्रंथों में प्राचीन राष्ट्रकूट या राठौड़ वंश के शासकों का इतिहास मिलता है। इसी प्रकार समराइच्च कहा में पृथ्वीराज चौहान कालीन प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था का उल्लेख है और ‘कुवलय माला’ में प्रतिहार शासक वत्सराज के शासन और समाज का वर्णन है। इस प्रकार जैन विद्वानों ने, अपने धार्मिक लेखन के माध्यम से, अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक जीवन का एक मूल्यवान अभिलेख प्रस्तुत किया जिससे यह साहित्य इस प्रकार धार्मिक और लौकिक ज्ञान की अनुपम छटा प्रस्तुत करता है।

12वीं शताब्दी से राजस्थानी जैन साहित्य में प्रबंध-काव्य, फागु और चौपाई जैसे नए काव्य रूप प्रमुखता से उपलब्ध होने लगे। इस काल में साहित्यिक प्रयोगशीलता बढ़ी, और जैन कवियों ने विभिन्न शैलियों में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। 13वीं शताब्दी में ‘जिनदत्त चौपई’ (सं.1354) जैसी हिंदी पद्य रचनाएँ भी मिलती हैं, जो इस काल में भाषायी विविधता को दर्शाती हैं। मध्यकाल (विक्रम संवत 1600 से 1900) राजस्थानी जैन साहित्य के लिए अत्यंत उर्वर काल था। इस युग में कुशललाभ, हीरकलश, समयसुंदर, हेमरत्न, जटमल, लब्धोदय, मोहनविजय, विनय-लाभ, दामोदर, लाभवर्धन, विनयप्रभ, भतिकुशल, राजविजय, कल्याण कलश, रामचंद, रिखसाधु, वीरविजय, उत्तमविजय और हुलासचंद जैसे शताधिक जैन कवियों ने महत्वपूर्ण रचनाएँ कीं। इन कृतियों का महत्त्व राजस्थानी साहित्य के लिए ये मूल्यवान हैं ।

पार्श्वचंद्र सूरि (16वीं शताब्दी) के एक प्रमुख जैन संत टीकाकार के रूप में ख्यातिप्राप्त हुए। उन्होंने ही सबसे पहले राजस्थानी गद्य में भाषा टीकाएँ लिखना प्रारंभ कीं, जिसका आगे चलकर बहुत प्रचार हुआ। यह एक युगांतरकारी कदम था जो जैन साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण  भाषायी और शैलीगत परिवर्तन को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति केवल अनुवाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह जटिल आगम ग्रंथों को सीधे और सरल राजस्थानी गद्य में व्याख्यायित करके ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने की एक सचेत पहल थी, जिससे मौखिक परंपराओं से लिखित, व्याख्यात्मक गद्य की ओर उन्मुख हुआ। इस नवाचार ने धार्मिक ज्ञान का लोकतंत्रीकरण किया तथा इसे विद्वानों की व्याख्या या काव्यात्मक प्रस्तुति के दायरे से निकालकर स्थानीय भाषा में स्पष्टीकरण के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाया, जिससे राजस्थानी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिला। इसी कालखंड में खरतरगच्छ के संत कवि महोपाध्याय पुण्यसागर ने वि. सं. 1604 में ‘सुबाहु संधि’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें 89 पद्य हैं। उनके शिष्य पद्मराज की ‘अभयकुमार चौपई’ एक प्रसिद्ध रचना है, जो वि.सं. 1650 में में लिखी गई थी।

इसी परम्परा में दौलतराम काजीवाल, टोडरमल, गुमानीराम, दीपचन्द्र कासलीवाल, जयचन्द्र शांघड़ा, सदासुख कासलीवाल का नाम जैन टीकाकारों में उल्लेखनीय हैं। ये 18वीं और 19वीं शताब्दी के प्रमुख विद्वान थे, जिन्होंने टीका लेखन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से अधिकांश हिंदी के विद्वान थे। 18वीं-19वीं शताब्दी में इन विद्वानों का उदय यह दर्शाता है कि जैन टीका लेखन परंपरा भाषायी रूप से गतिशील और अंतर-क्षेत्रीय थी। यह केवल राजस्थानी तक सीमित नहीं थी, बल्कि हिंदी के माध्यम से एक व्यापक बौद्धिक संवाद का हिस्सा थी। यह प्रवृत्ति जैन विद्वानों की बहुभाषी दक्षता और उनके ज्ञान को विभिन्न भाषायी समुदायों तक पहुँचाने की प्रतिबद्धता को उजागर करती है, जिससे जैन साहित्य की पहुँच और प्रभाव का विस्तार हुआ।

जैन विद्वानों ने न केवल धार्मिक ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं, बल्कि व्याकरण, छंद, अलंकार, काव्य, वैद्यक और गणित जैसे विविध धर्मेतर शास्त्रों पर भी महत्वपूर्ण समालोचनात्मक कार्य किया। व्याकरण-शास्त्र अंतर्गत 'बाल शिक्षा', 'उक्ति रत्नाकर', 'पंच-सन्धि बालावबोध', 'हेम व्याकरण भाषा टीका', 'सारस्वत बालावबोध'; छंद शास्त्र में 'पिंगल शिरोमणि', 'दुहा चन्द्रिका', 'राजस्थानी गीतों का छन्द ग्रंथ', 'वृत्त रत्नाकर बालावबोध' और अलंकार-शास्त्र सम्बंधित 'वाग्मट्टालंकार बालावबोध', 'विदग्ध मुखमंडन बालावबोध', 'रसिक प्रिया बालावबोध'; काव्य टीकाओं में 'भर्तृहरिशतक-भाषा टीका त्रय', 'अमरुशतक', 'लघुस्तव बालावबोध', 'किसन-रुक्मणी की टीकाएँ', 'धूर्ताख्यान कथासार', 'कादम्बरी-कथा सार'; वैद्यक-शास्त्र आधारित 'माधवनिदान टब्बा', 'सन्निपात कलिका टब्बाद्वय', 'पथ्यापथ्य टब्वा', 'वैद्य जीवन टब्बा', 'शतश्लोकी टब्बा' तथा गणित-शास्त्र पर 'लीलावती भाषा चौपाई', 'गणित सार चौपाई' आदि टीकाएँ राजस्थानी समालोचना की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

राजस्थानी जैन टीका साहित्य की विशालता और महत्व को देखते हुए, इसकी पांडुलिपियों का संरक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। राजस्थान में जैन शास्त्र भंडारों की संख्या सर्वाधिक है, जो लगभग सभी प्रमुख नगरों और कस्बों में पाए जाते हैं। इन भंडारों में संस्कृत, अपभ्रंश, हिंदी और राजस्थानी भाषाओं में सैकड़ों अज्ञात और दुर्लभ ग्रंथ प्राप्त हुए हैं। यद्यपि इन भंडारों की पूरी सूची अभी तक तैयार नहीं हो पाई है, अनुमान है कि राजस्थान में दिगंबर और श्वेतांबर शास्त्र भंडारों की संख्या 200 से अधिक हैं। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर एवं  जैन विश्व भारती, लाडनूं का योगदान स्मरणीय है। इसके अतिरिक्त जयपुर  और जैसलमेर के जैन शास्त्र भण्डार में  सैकड़ों अज्ञात ग्रंथ और पांडुलिपियाँ शोध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

जैन टीका साहित्य का महत्त्व एक साहित्यिक विधा के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार आंदोलन के रूप में भी स्थापित करता है। यह साहित्य अपने समय में एक प्रभावी माध्यम था जिसने जैन सिद्धांतों को जनसाधारण के नैतिक आचरण और जीवनशैली में एकीकृत किया। 'जन-शैलीऔर 'सरल, सरस, सहज एवं बोधगम्य शैलीको अपनाने का निर्णय एक सचेत प्रयास था ताकि जटिल सिद्धांतों को लोगों के दैनिक जीवन में आत्मसात किया जा सके। इस व्यावहारिक अनुप्रयोग और व्यापक पहुँच ने एक विशिष्ट 'जैन शैली' का विकास किया, जो स्पष्ट, नैतिक और सुलभ धार्मिक प्रवचन का पर्याय बन गई।

समग्रतः राजस्थानी भाषा में लिखित जैन टीका साहित्य एक असाधारण रूप से समृद्ध और बहुआयामी साहित्यिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इस साहित्य ने न केवल जैन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को संरक्षित और प्रसारित किया, बल्कि राजस्थानी भाषा के विकास, स्थानीय लोक संस्कृति के संरक्षण और तत्कालीन सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भों के दस्तावेजीकरण में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैन विद्वानों ने विविध काव्य रूपों जैसे-रास, चौपाई, फागु का उपयोग करके धार्मिक ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पार्श्वचंद्र सूरि जैसे अग्रदूतों द्वारा राजस्थानी गद्य में टीका लेखन की शुरुआत ने भाषायी नवाचार को प्रेरित किया और स्थानीय बोलियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में विकसित किया। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास, प्रशासन और सामाजिक जीवन के लिए ये ग्रन्थ अमूल्य प्राथमिक स्रोत प्रदान करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक लेखन भी अपने समय के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य का एक मूल्यवान अभिलेख बन सकता है।

आधार ग्रन्थ

1.      पं. अम्बालाल प्रे. शाह, जैन साहित्य का वृहद् इतिहास, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संसथान, वाराणसी, सं. 1969

2.      डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन शास्त्र भंडारों की ग्रन्थ सूची, भारतीय श्रुति-दर्शन केंद्र, जयपुर, सं. 1957

3.      डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन संत, श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, महावीरजी, जयपुर, सं. 1967

4.      डॉ. नरेन्द्र भानावत (सं.), जैन संस्कृति और राजस्थान, जिनवाणी विशेषांक, सम्यग्ज्ञान प्रचारक में डल, जयपुर, सं. 1975

5.   डॉ. नरेन्द्र भानावत, जैन दर्शन तथा साहित्य का भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा पर प्रभाव, श्री जिनदत्तसूरि में डल, दादावाडी, अजमेर, सं.1980

6.      नाथूराम प्रेमी, जैन साहित्य और इतिहास, हिंदी ग्रन्थ रत्नाकर लिमिटेड, बम्बई, सं. 1956

7.      नाहटा, कासलीवाल, भानावत एवं सेठिया, राजस्थान का जैन साहित्य, प्राकृत भारती, जयपुर, सं. 1977

8.      डॉ. मनमोहनस्वरूप माथुर, राजस्थानी जैन साहित्य, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, सं.1999

9.      डॉ. हीरालाल जैन, भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान, मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद्, भोपाल, सं. 1962


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कवित्व


'मधुमती' फरवरी-2026 में प्रकाशित 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कवित्व

भारतीय साहित्य परम्परा में अनेक ऎसे साहित्यकार हैं, जिनकी प्रतिभा बहुमुखी रही है किन्तु किसी एक पक्ष के मूल्यांकन के आधार पर विख्यात हो गए हैं । उक्त क्रम में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम उल्लेखनीय हैं । आचार्य शुक्ल आलोचना विधा के आधार स्तंभ हैं तथा एक आलोचक के रूप में विख्यात है ।काव्यके प्रति आचार्य शुक्ल की आलोचना दृष्टि परवर्ती रचनाकारों के लिए सदैव आदर्श रही। आचार्य शुक्ल एक आलोचक तो हैं ही वरन एक कवि हृदय भी हैं ।  आलोचना विधा के महानायक आचार्य शुक्ल का कवि-हृदय भी उन्नत कोटि का रहा है। यद्यपि वे आलोचक तो हैं ही, तथापि उनका विपुल काव्य उनके कवि होने का प्रमाण  हैं। उनके विपुल काव्य का संकलन मधुस्रोतनामक काव्य-संग्रह में है । मधुस्रोतमें आचार्य शुक्ल रचित 31 कविताओं का संकलन है। जिसका प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा  द्वारा 1971 .(वि.सं.2028) में किया गया। 1901 . से 1929 . तक लिखित ये कविताएँ तत्कालीन प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं- सरस्वती, आनंदकादंबिनी, बालप्रभाकर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, लक्ष्मी, इन्दु, बाल हितैषी, माधुरी, सुधा आदि में प्रकाशित हुई।  मधुस्रोतनामक काव्य-संग्रह की सम्यक् विवेचन आचार्य शुक्ल की काव्य-प्रतिभा का निदर्शन, परवर्ती आलोचक का बीजग्रंथ और समय की अनुगूँज में प्रखर व्यक्तित्व का प्रमाण देता है। प्रस्तुत शोध पत्र में समीक्षा पद्धति के आधार पर मधुस्रोत नामक काव्यसंकलन का विश्लेषण करते हुए आचार्य शुक्ल के कवित्व का मूल्यांकन किया जा रहा है । 
 
मधुस्रोतमें आचार्य शुक्ल रचित 31 कविताओं का संकलन है। जिसका प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 1971 .(वि.सं.2028) में किया गया। 1901 . से 1929. तक लिखित ये कविताएँ तत्कालीन प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं- सरस्वती, आनंदकादंबिनी, बालप्रभाकर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, लक्ष्मी, इन्दु, बाल हितैषी, माधुरी, सुधा आदि में प्रकाशित हुई। ब्रज और खड़ी बोली में रचित इन कविताओं में अपने समय की साहित्यिक चेतना का निर्वाह है, वहीं ब्रज से खड़ी बोली का काव्य-भाषा के रूप में विकास का प्रमाण भी है। 1904. में रचितबसंतमें ठेठ ब्रजभाषा का संस्कार है, तो 1913 . में प्रकाशितविरह सप्तकमें ब्रज और खड़ी बोली का मिश्रित रूप प्रकट होता है। इसके बाद की रचनाओं में खड़ी बोली का प्रयोग है। 1929 . में रचितमधुस्रोतमें परिष्कृत खड़ी बोली है, जिसे आधुनिक काव्यभाषा का रूप माना जा सकता है।

            आचार्य शुक्ल ने कविता कोहृदय की मुक्तावस्थाकहा है।कविता क्या है?’ निबंध में वे कहते हैं- “ जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।”1 कविता के मर्म को उद्घाटित करने वाली इन पंक्तियों में आचार्य शुक्ल की आलोचक-दृष्टि प्रकट होती है, वहीं इसका रूप-विधानमधुस्रोतमें दिखाई पड़ता है।मधुस्रोतमें संकलित कविताओं का वर्गीकरण वण्र्य-विषय के आधार पर निम्नानुसार किया जा सकता है-

1.         प्रकृति प्रेम-         मनोहर छटा’, ‘प्रेम-प्रताप’, ‘विरह-सप्तक’, ‘प्रकृति-प्रबोध’, ‘हर्षोद्धार’,
                                    आमंत्रण’, ‘वसन्त-पथिक’, ‘रूपमय हृदयआदि।
2.         लोक-संस्कृति-   हृदय का मधुर भार’, ‘शिशिर-पथिक’, ‘मधुस्रोतआदि।
3.         कर्म-सौन्दर्य-       गोस्वामीजी और हिन्दू जाति’, ‘आशा और उद्योग’, ‘पाखंड-प्रतिषेधआदि।
4.         राष्ट्र प्रेम-            भारत और वसन्त’, ‘रानी दुर्गावती’, ‘भारत’, ‘फूट’, ‘देशद्रोही को दुत्कार
                                    आदि।
5.         श्रद्धा भाव-         भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’, ‘भारतेन्दु जयन्ती’, ‘श्री युत बाबू देवकीनंदन खत्री का
                                    वियोग’, याचना आदि।
6.         विविध-             बाल विनय’, ‘विनती’, ‘अन्योक्तियाँ’’, ‘वन्दना’, ‘हमारी हिन्दी’, ‘सुमन-
                                    संगीत’, झलक 1-2-3 इत्यादि।
संकलित कविताओं के वर्ण्य-विषय पर टिप्पणी करते हुए डॉ.रामचंद्र तिवारी ने लिखा- “प्रकृति के रम्य चित्रों से अलग अन्य कविताओं का महत्त्व इस दृष्टि से भी मान्य है कि उनमें शुक्लजी के समय के इतिहास की अनुगूँजे सुनाई पड़ती हैं और उनके प्रति उनकी निजी प्रतिक्रियाओं की झलक भी मिलती है।”2 इससे स्पष्ट होता है कि आचार्य शुक्ल की कविताओं में भारतेन्दु युगीन प्रवृत्ति- प्रकृति-प्रेम, ग्राम्य-संस्कृति, ब्रजभाषा प्रयोग;द्विवेदी- युगीन प्रवृत्ति- राष्ट्र प्रेम, इतिवृत्तात्मकता, खड़ी बोली प्रयोग और परवर्ती छायावादी काव्य-प्रवृत्ति- परिनिष्ठित काव्य भाषा का रचनागत निर्वाह स्पष्टतः प्रकट होता है। इसी दृष्टि से आचार्य शुक्ल की रचनाओं का काव्य संग्रहमुधस्रोतके साहित्यिक सौन्दर्य का अवगाहन करना समीचीन होगा।

प्रकृति-प्रेमकवियों का सदैव प्रिय विषय रहा है। आचार्य शुक्ल की कविताओं में प्रकृति की रम्य छटा सहज प्रसन्न शैली में व्यक्त हुई है। रीतिकालीन काव्य में प्रकृति उद्दीपन रूप में प्रकट हुई, परन्तु आचार्य शुक्ल ने इसे आलंबन रूप में ही ग्रहण किया। वे प्रकृति की सत्ता को स्वतंत्र मानते थे। प्रकृति के शुद्ध रूप की उपासना के कारण उन्होंने आरोपित भावों को स्वीकार नहीं किया।मनोहर छटा’, ‘आमंत्रण’, ‘रूपमय हृदयआदि कविताओं में प्रकृति का रम्य चित्रण इसी रूप में बिम्बित है। प्रकृति के आलम्बन रूप का दृश्य-विधान इन पंक्तियों में अवलोकनीय हैं-

नव दल-गुंथित पुष्प हास यह!
शशि रेख सुस्मित विभास यह!
नभ चुवित नग निविड़-नीलिमा उठी अवनि उर की उमंग सी।
कलित विरल घन पटल-दिगंचल-प्रभा पुलकमय राग-रंग सी।3
                                                            (रूपमय हृदय)

इसी प्रकारमनोहर छटामें प्रकृति को चित्रकार की गति के रूप में अंकित कर उसमें पल्लवित जीवन और सूर्य, चंद्र, नभ, जल, पर्वत आदि की भूमिका को भी चित्रित करते हुए कवि ने कहा-

नीचे पर्वत थली रम्य रसिकन मन मोहन ।
ऊपर निर्मल चन्द्र नवल आभायुत सोहत।।4
(मनोहर छटा)

            प्राकृतिक सुषमा के साथ लोक संस्कृति की शाश्वत सौन्दर्य कवि को मुग्ध करता है। ग्राम्य-जीवन में उसे सनातन संस्कृति के प्राण दिखाई देते हैं, जहाँ समस्त चराचर जगत के प्रति स्निग्ध स्नेह भाव है। नगर से दूर, कृत्रिम सभ्यता से विरत ग्राम्य-जीवन के खुले द्वार का रेखांकन कवि को आकर्षित करता है। हरे-भरे खेत, पेड़-पौधों पर लहराते पत्ते, गाँवों के खपरैल वाले घर और श्वेत छज्जे आदि भारतीय ग्राम्य-जीवन के बिम्ब हैं। यथा-

नगर से दूर कुछ गाँव की सी बस्ती एक,
हरे भरे खेतों के समीप अति अभिराम ।
जहाँ पत्राजाल अंतराल से झलकते हैं,
लाल खपरैल, श्वेत छज्जो के सँवारें धाम।।5
(हृदय का मधुर भार)

            ग्राम्य-संस्कृति में कवि का मन इतना रम गया है कि वहाँ की सुषमा उन्हें देवलोक के समान प्रतीत होती है। यहाँ प्रकृति का खुला प्रसार है, जहाँ पशु, पक्षी, मानव सब एकात्म भाव से रहते हैं।ग्रामको खुला स्वप्न मानते हुए कवि मनुष्य जीवन में इसे मधु के समान मानकर प्रेरणा लेने का भी आह्वान करता है, यथा-

कहीं हृदय अपना समेटकर,
कोश-कीट बन जाय न तू नर।
इसी हेतु अविरल मधुधारा,
द्वार-द्वार पर टकराती है।
$  $  $
तुम भी ग्राम! खुले सपने हो,
रूप रंग में वही बने हो।6
(मधुस्रोत)

आचार्य शुक्ल ने अपने निबंधउत्साहमें कर्म सौन्दर्य के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- “कर्म में आनन्द अनुभव करने वालों ही का नाम कर्मण्य है। धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनंद भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फल-स्वरूप लगते है। अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और तुष्टि होती है, वही लोकोपकारी कर्म-वीर का सच्चा सुख है।”7वस्तुतः कर्म सौन्दर्य वह बीज है जोक्षात्रधर्मकी प्रतिष्ठा करता है। आचार्य शुक्ल ने अपने युग की ध्वनि को पहचान लिया था और स्वाधीनता आन्दोलन में रचनाकार की भूमिका को भी निर्धारित कर दिया।

            भारत और बसंतमें वंदे मातरम् का शंखनाद, ‘रानी दुर्गावतीमें नारी के शौर्यपूर्ण चरित्र का गुणगान, ‘देशद्रोही को दुत्कारमें अभिव्यक्त विचार स्वाधीनता आन्दोलन की छाया में पल्लवित हुए। राष्ट्रधर्म से विमुख लोगों को कवि ने अपने हृदय से ही निकालने की घोषणा कर दी है-

जा दूर हो अधम सन्मुख से हमारे,
हैं पाप-पुंज तब पूरित अंग सारे,
जो देश से न हट तो हृद-देश से ही,
देते निकाल हम आज तुझे भले ही।8
(देशद्रोही को दुत्कार)

            आचार्य शुक्ल ने राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मानकर अन्याय का प्रतिकार करने का आह्वान किया। अपने युग की पदचाप अनुसार उन्होंने निष्काम भाव से आगे बढ़ने का निश्चय किया। शत्रु चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, कवि अपना उद्योग छोड़ने को तैयार नहीं। अन्यायी को दण्ड देने का भाव प्रकट करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

देश, दुःख अपमान जाति का बदला मैं अवश्य लूँगा।
अन्यायी के घोर पाप का, दण्ड उसे अवश्य दूँगा ।
यद्यपि मैं हूँ एक अकेला, बैरी की सेना भारी ।
पर उद्योग नहीं छोडूँगा, जगदीश्वर हैं सहकारी।।9
(आशा और उद्योग)

            तुलसी की भक्ति को स्पष्ट करते हुए आचार्य शुक्ल ने लिखा- “वह केवल व्यक्तिगत एकांत साधना के रूप में नहीं है, व्यवहार क्षेत्र के भीतर लोक-मंगल की प्रेरणा करने वाली है।”10 वस्तुतः शील-निरूपण की दृष्टि से उन्होंने तुलसी को हिन्दी का श्रेष्ठ कवि माना। आचार्य शुक्ल नेलोगमंगल की साधनावस्थाको आगे बढ़ाया। तुलसी ने प्रभु श्री राम के लोकरक्षक रूप का चित्रण किया तो आचार्य शुक्ल ने भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हुए नैराश्य के वातावरण में प्रभु के लोक रक्षक  रूप का वर्णन किया-

जिस दंडक वन में प्रभु  की, को दंड-चंड-ध्वनि भारी।
सुनकर कभी हुए थे कंपित, निशिचर अत्याचारी।
वहीं शक्ति वह झलक उठी, झंकार सहित भयहारी।
दहल उठा अन्याय, उठो फिर मरती जाति हमारी ।।11
(गोस्वामी और हिन्दू जाति)


आचार्य शुक्ल ने काव्य में रहस्यवाद को उचित नहीं माना। काव्य दृष्टि और रहस्यवाद के संबंध में उनके विचार हैं- “अब विचारने की बात है कि किसी अगोचर और अज्ञात के प्रेम में आँसुओं की आकाश-गंगा में तैरने, हृदय की नसों का सितार बजाने, प्रियतम असीम के संग नग्न प्रलय-सा ताण्डव मरने या मुँदे नयन-पलकों के भीतर किसी रहस्य का सुखमय चित्र देखने को ही- ‘भीतक तो कोई हर्ज न था- कविता कहना, कहाँ तक ठीक है? छोटे-छोटे कनकौवों पर भला कविता कब तक टिक सकती है? असीम और अनन्त की भावना के लिए अज्ञात  या अव्यक्त की ओर झूठे इशारे करने की कोई जरूरत नही।”12
            यद्यपिकाव्य में रहस्यवादपुस्तिका 1929 . में प्रकाशित हुई, किन्तु उनके काव्य में रहस्यवाद पर आलोचनात्मक आक्रमण पहले ही आ गया था।रूपमय हृदयमें ज्ञात के  महत्त्व को स्थापित किया तोहृदय के मधुर भारमेंरहस्यके वर्णन का विरोध किया। इसके बादपाखंड-प्रतिषेधमें काव्य में रहस्यवाद के विरूद्ध आक्रामक प्रहार किया और तत्कालीन छायावादी कवियों पर पैनी शाखा में कटाक्ष भी किया-
काव्यमेंरहस्यकोईवादहै न ऐसा, जिसे,
लेकरनिरालाकोई पंथ ही खड़ा करे।
यह तो परोक्ष रूचि-रंग की ही झाई है, जो
पड़ती है व्यक्त में अव्यक्त-बिम्बता धरे ।।13
(पाखंड-प्रतिषेध)

मर्यादावादी आचार्य शुक्ल ने इसी कविता में विलियम ब्लेक केकल्पनावादपर भी कठोर टिप्पणी करते हुएआंग्ल की भूमि बीच ब्लेक ने जो ढोंग रचारहस्य-कल्पना का विरोध किया। यद्यपि यह अलग विषय है किसुधापत्रिका में प्रकाशन के बाद ठीक अगले अंक मार्च, 1928 . में पं.मातादीन शुक्ल ने उक्त कविता के विरोध मेंपाखंड-परिच्छेदकविता लिखी, जिसमें रहस्यवाद को महिमा मंडित किया गया।निरालाने भी अपने व्यंग्य-बाणों से आचार्य शुक्ल को निशाना बनाया। यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि आचार्य शुक्ल रहस्यवादी कविताओं में भाव और व्यंजना की अत्यधिक कृत्रिमता से खिन्न थे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रत्यक्ष संघर्ष में बाधा मानते थे। उनकी रहस्यवाद के विषय में कठोर टिप्पणियों को इसी भाव से देखना चाहिए, क्योंकि छायावादी कवियों से उनके संबंध अत्यधिक मधुर थे।

आचार्य शुक्ल की आलोचना भाषा में शब्द, नाद और बिम्ब का अपूर्व संयोजन दिखाई देता है। यह उनकी काव्यात्मक भाषा से प्रभावित प्रतीत होता है। इस संदर्भ में डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी ने आचार्य शुक्ल की भाषा का विश्लेषण करते हुए लिखा- “सावधान शब्द-प्रयोग, नाद-सौंदर्य और बिम्ब-विधानसाधारणतः काव्यभाषा के ये गुण रामचंद्र शुक्ल की आलोचना भाषा में पाए जाते हैं। यथा, एक उदाहरण द्रष्टव्य है- “पर्वतों की दरी कंदराओं में, प्रभात के प्रफुल्ल पद्मजाल में, छिटकी चांदनी में, खिली कुमुदिनी में हमारी आँखें कालिदास, भवभूति आदि की आँखों में जा मिलती है। पलाश, इंगुटी, अंकोट के वनों में अब भी खड़े हैं, सरोवरों में कमल अब भी खिलते हैं, तालाबों में कुमुदिनी अब भी चाँदनी के साथ हँसती है, वनीर शाखाएँ अब भी झुककर तीर का नीर चूमती है, पर हमारी आँखें उनकी ओर भूलकर भी नहीं जाती, हमारे हृदय से मानो उनका कोई लगाव ही नहीं रह गया।”14 उपर्युक्त पंक्तियों के भाव आचार्य शुक्ल कीमधुस्रोतकविता में इस प्रकार ढले-

दिक् दिक् की आँखें मतवाली
धरती हैं किंशुक की लाली
जहाँ जहाँ ये रूप खड़े हैं
जहाँ जहाँ ये दृश्य अड़े हैं
कालिदास, भवभूति आदि के
हृदय वहाँ पर मिल जाते हैं।15
(मधुस्रोत)

हिन्दी की आरंभिक खड़ी बोली में भाषा सहनता एवं सुबोध प्रस्तुति में भी बिम्ब-विधान आकर्षित करता है। प्रकृति की रमणीयता का चाक्षुष-बिम्बमय वर्णन द्रष्टव्य है-

भूरी, हरी घास आस पास, फूली सरसों हैं,
पीली पीली बिन्दियों का चारों ओर है पसार;
कुछ दूर विरल, सघन फिर, और आगे,
एक रंग मिला चला गया पीत पारावर ।16
(हृदय का मधुर भार)

आचार्य शुक्ल की कविताओं में जहाँ एक ओर  प्रकृति-प्रेम, ग्राम्य-संस्कृति, ब्रजभाषा प्रयोग है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्र प्रेम, इतिवृत्तात्मकता, खड़ी बोली का प्रयोग देखने को मिलता है । आचार्य शुक्ल का काव्य न केवल परिनिष्ठित काव्य भाषा का रचनागत निर्वाह मात्र है  अपितु लोकमंगल की साधना, शब्द, नाद और बिम्ब का अपूर्व संयोजन भी है । उनके काव्य की विशेषता यह है कि हिन्दी कविता को संस्कृत काव्य-परम्परा के अनावश्यक निर्वाह और पाश्चात्य शैली के अंधानुकरण से मुक्त करने का प्रयास किया। हिन्दी में मौलिक लेखन का पंथ-निर्मित कर आगे की राह को सुगम किया।मधुस्रोतका भाव एवं कला सौन्दर्य निर्धारित प्रतिमानों से भिन्न तत्कालीन आवश्यकता के परिप्रेक्ष्य में विवेचनीय है। उक्त निष्कर्ष से निगमित होता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल का न केवल एक आलोचक है वरन् उन्नत कोटि के कवि भी हैं 


संदर्भ-ग्रंथ -
1.         आचार्य रामचंद्र शुक्लः चिन्तामणि भाग प्रथम, अशोक प्रकाशन, दिल्ली-6, सं.2004 पृ.सं.70
2.         रामचंद्र तिवारीः भारतीय साहित्य के निर्माता- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं. 2005, पृ.सं.29
3.         रामचंद्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि., पृ.57
4.         वही, पृ.सं.23
5.         वही, पृ.सं.30
6.         वही, पृ.सं.5
7.         आचार्य रामचंद्र शुक्लः चिन्तामणि भाग प्रथम, अशोक प्रकाशन, दिल्ली-6, सं.2004, पृ.सं.8
8.         रामचंद्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि., पृ.सं.71
9.         वही, पृ.सं.76
10.       उद्धृत, रामचंद्र तिवारीः भारतीय साहित्य के निर्माता- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं.2005, पृ.सं.29
11.       रामचंद्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 19, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि., पृ.सं.98
12.       नामवर सिंहः रामचंद्र शुक्ल संचयन, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं.2017 पृ.सं.56-57
13.       रामचन्द्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि0, पृ.सं.93
14.       रामस्वरूप चतुर्वेदीः आचार्य शुक्ल की आलोचना भाषा, आलेख, आलोचना अप्रेल-जून 1985, पृ.सं.115
15.       रामचन्द्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि.,पृ.सं.5
16.       वही, पृ.सं.30
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