रांगेय राघव की कहानियों में मानवता के पीड़ित पक्ष
जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान
जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान
साहित्य परिक्रमा के जनवरी-मार्च, 2026 अंक में प्रकाशित
राजस्थान की समृद्ध साहित्यिक विरासत में जैन साहित्य का एक विशिष्ट स्थान है। यह साहित्य केवल धार्मिक उपदेशों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के इतिहास, उसकी सामाजिक संरचना और भाषायी परम्परा को समझने के लिए एक अमूल्य स्रोत के रूप में कार्य करता है। जैन मुनियों, आचार्यों और श्रावकों द्वारा रचित इस साहित्य ने जैन धर्म के सिद्धांतों, तीर्थंकरों की महिमा, मंदिरों के उत्सवों और संघ यात्राओं का विस्तृत वर्णन किया है। इसकी विशालता और विविधता उल्लेखनीय है। जैन समुदाय की ज्ञान-संरक्षण और साहित्य सृजन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के कारण इसने अन्य समकालीन साहित्यिक परंपराओं की तुलना में अधिक मात्रा में साहित्य का निर्माण करने में सक्षम बनाया। जैन समुदाय की संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण है कि चातुर्मास में साधुओं द्वारा चिंतन, मनन और प्रवचन के साथ-साथ लेखन-पठन के कार्य पर दिए गए महत्व के कारण विपुल साहित्यिक धरोहर प्राप्त हुई। भारतीय परंपरा में जैन दर्शन और संस्कृति अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है। यह स्थिति प्राकृत, संस्कृत, राजस्थानी और विभिन्न स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध विपुल जैन साहित्य से प्रमाणित होती है। यह साहित्य आगम, पुराण, कथा, चरित्र, काव्य और निबंध जैसे विविध रूपों में उपलब्ध है, जो इसकी बहुआयामी प्रकृति को दर्शाता है ।
राजस्थानी जैन साहित्य में समालोचनात्मक लेखन की एक सुदृढ़ परंपरा रही है, जिसमें 'टीका', 'बालावबोध' और 'टब्बा' जैसे शब्द प्रमुखता से प्रयुक्त होते हैं। इन तीनों का मूल उद्देश्य ग्रंथों को स्पष्ट करना था, किंतु उनकी प्रकृति और विस्तार में भिन्नता थी। टीकाएँ मूलतः संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश जैसी भाषाओं में रचित जटिल धार्मिक और उपदेशात्मक ग्रंथों को जनसाधारण के लिए सुगम बनाने के उद्देश्य से लिखी गईं। जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति और नैतिक उत्थान आदि को प्राप्त करने के उद्देश्य से इन टीकाओं का विकास हुआ। यह ज्ञान की सर्वव्यापकता और जटिल दार्शनिक अवधारणाओं को सरल एवं व्यावहारिक रूप में जन सामान्य तक पहुँचाने की एक अनुपम पहल थी, जिससे धर्म अधिक प्रभावशाली और उपयोगी बन सके।
‘टीका’ मूलतः किसी संस्कृत, प्राकृत या अपभ्रंश ग्रंथ पर लिखी गई एक विस्तृत व्याख्या या भाष्य होती थी। इसका लक्ष्य मूल पाठ के गहन अर्थों, दार्शनिक अवधारणाओं और संदर्भों को विश्लेषित करना था, जो प्रायः विद्वानों और गंभीर अध्येताओं के लिए होती थी। ‘बालावबोध’ बालकों या सामान्य गृहस्थों के लिए मूल रचना का विस्तृत और सरल स्पष्टीकरण होता था। जैन कवियों का उद्देश्य जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति पैदा करना था और तत्त्वज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती का समाधान करने के लिए बालावबोध एक सरल, सरस, सहज और बोधगम्य शैली में लिखा जाता था, जिससे जैन धर्म के सिद्धांतों को जनसाधारण तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सके। ‘ टब्बा’ मूल रचना के स्पष्टीकरण के लिए पत्र के किनारों पर लिखी गई संक्षिप्त टिप्पणियाँ होती थीं। ये त्वरित संदर्भ और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में सहायक होती थीं।
वस्तुतः मूल जैन आगम ग्रंथ प्रायः प्राकृत या संस्कृत में थे, जो सामान्य जन के लिए कठिन थे। इस कठिनाई को दूर करने के लिए, विभिन्न स्तरों की व्याख्याएँ आवश्यक थीं। टीकाएँ विद्वानों की सन्दर्भ सहायिका थीं, बालावबोध जटिल दार्शनिक और धार्मिक अवधारणाओं को सरल बनाकर व्यापक जनता तक पहुँचाते थे और टब्बा त्वरित स्पष्टीकरण प्रदान करते थे। इन विविध व्याख्यात्मक पद्धतियों का प्रयोग यह दर्शाता है कि जैन विद्वानों ने ज्ञान के प्रसार के लिए एक बहु-स्तरीय और समावेशी दृष्टिकोण अपनाया। यह केवल एक प्रकार की व्याख्या नहीं थी, बल्कि विद्वानों से लेकर सामान्य पाठकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक सुविचारित शैक्षणिक संरचना थी, जिससे जैन दर्शन की गहराई और व्यापकता सभी स्तरों पर समझी जा सके। यह दृष्टिकोण जैन विद्वानों समालोचना दृष्टि को दर्शाता है, जिसने धार्मिक ज्ञान को केवल एक विशिष्ट वर्ग तक सीमित न रखकर साहित्यिक उपागम बनाकर जनव्यापी बनाया।
राजस्थानी जैन टीका साहित्य का विकास विभिन्न शताब्दियों में अनेक प्रतिभाशाली विद्वानों और संतों के योगदान से हुआ। इन टीकाकारों ने न केवल जैन धर्म के सिद्धांतों को स्पष्ट किया, बल्कि अपने लेखन के माध्यम से तत्कालीन समाज, संस्कृति और इतिहास का भी महत्त्वपूर्ण चित्रण किया। जैन संस्कृति की दृष्टि से राजस्थान में अभूतपूर्व साहित्य लिखा गया। 5वीं शती में आचार्य सिद्धसेन ने जैन-दर्शन पर आधारित ग्रंथ ‘सम्मई सूत्र’ की रचना की। यह ग्रंथ राजस्थान का प्राकृत भाषा में रचित प्रथम ग्रंथ है। उद्योतन सूरि ने 835 विक्रम संवत में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ की रचना की। यद्यपि यह ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखा गया था, इसमें ‘मरुभाषा’ अर्थात् राजस्थानी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मरुभाषा का यह प्रारंभिक उल्लेख यह दर्शाता है कि राजस्थानी भाषा का साहित्यिक उपयोग बहुत प्रारंभिक काल से ही हो रहा था और जैन विद्वान इसके विकास में अग्रदूत थे। यह भाषा और धर्म के बीच एक अन्योन्याश्रित संबंध स्थापित करता है, जहाँ धार्मिक उपदेशों के प्रसार ने स्थानीय भाषा के साहित्य का मानकीकरण किया।
इसी तरह ‘षटखंडागम’ ग्रंथ पर आधारित आचार्य वीरसेन रचित ‘धवला’ नामक टीका अद्वितीय है। इसमें 72000 श्लोक संस्कृत और प्राकृत भाषा में है। आठवीं शती के जैन आचार्य हरिभद्रसूरि ने कथा, उपदेश, योग, दर्शन आदि से संबंधित 1444 ग्रंथों की रचना की तथा संस्कृत-प्राकृत में एक लाख पचास हजार श्लोक लिखे। प्रमुख ग्रंथों में ‘समराइच्च कहा’, ‘शास्त्र वार्ता समुच्चय’, ‘धूर्ताख्यान’, ‘योग शतक’, ‘योग बिंदु, ‘योग दृष्टि समुच्चय’, ‘संबोध प्रकरण’ आदि उल्लेखनीय हैं। 10वीं शताब्दी में सिद्धर्षि नामक संत कवि ने भीनमाल में ‘उपमिति भव प्रपंच कहा’ नामक एक महत्वपूर्ण रूपक ग्रंथ की रचना की। इसके अतिरिक्त जिनप्रभ सूरि द्वारा प्रणित ‘तीर्थकल्प’ और मुनि चन्द्र का ‘अमर अरित’ भी राजस्थानी जैन साहित्य की सुदृढ़ नींव निर्मित करती है।
यह साहित्य मुख्यतः धार्मिक और नैतिक होने के बावजूद, इसका व्यापक प्रभाव केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। इसमें तत्कालीन सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों को भी इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षित किया गया। यह दर्शाता है कि धार्मिक साहित्य केवल उपदेशात्मक नहीं होता, बल्कि अपने समय के जीवन का एक महत्वपूर्ण दर्पण भी बन जाता है, जिससे शोधकर्ताओं को बहुआयामी अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए, ‘जयधवला टीका’, ‘गद्य कथामृतक’ और ‘उत्तर पुराण’ जैसे ग्रंथों में प्राचीन राष्ट्रकूट या राठौड़ वंश के शासकों का इतिहास मिलता है। इसी प्रकार ‘समराइच्च कहा’ में पृथ्वीराज चौहान कालीन प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था का उल्लेख है और ‘कुवलय माला’ में प्रतिहार शासक वत्सराज के शासन और समाज का वर्णन है। इस प्रकार जैन विद्वानों ने, अपने धार्मिक लेखन के माध्यम से, अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक जीवन का एक मूल्यवान अभिलेख प्रस्तुत किया जिससे यह साहित्य इस प्रकार धार्मिक और लौकिक ज्ञान की अनुपम छटा प्रस्तुत करता है।
12वीं शताब्दी से राजस्थानी जैन साहित्य में प्रबंध-काव्य, फागु और चौपाई जैसे नए काव्य रूप प्रमुखता से उपलब्ध होने लगे। इस काल में साहित्यिक प्रयोगशीलता बढ़ी, और जैन कवियों ने विभिन्न शैलियों में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। 13वीं शताब्दी में ‘जिनदत्त चौपई’ (सं.1354) जैसी हिंदी पद्य रचनाएँ भी मिलती हैं, जो इस काल में भाषायी विविधता को दर्शाती हैं। मध्यकाल (विक्रम संवत 1600 से 1900) राजस्थानी जैन साहित्य के लिए अत्यंत उर्वर काल था। इस युग में कुशललाभ, हीरकलश, समयसुंदर, हेमरत्न, जटमल, लब्धोदय, मोहनविजय, विनय-लाभ, दामोदर, लाभवर्धन, विनयप्रभ, भतिकुशल, राजविजय, कल्याण कलश, रामचंद, रिखसाधु, वीरविजय, उत्तमविजय और हुलासचंद जैसे शताधिक जैन कवियों ने महत्वपूर्ण रचनाएँ कीं। इन कृतियों का महत्त्व राजस्थानी साहित्य के लिए ये मूल्यवान हैं ।
पार्श्वचंद्र सूरि (16वीं शताब्दी) के एक प्रमुख जैन संत टीकाकार के रूप में ख्यातिप्राप्त हुए। उन्होंने ही सबसे पहले राजस्थानी गद्य में भाषा टीकाएँ लिखना प्रारंभ कीं, जिसका आगे चलकर बहुत प्रचार हुआ। यह एक युगांतरकारी कदम था जो जैन साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण भाषायी और शैलीगत परिवर्तन को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति केवल अनुवाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह जटिल आगम ग्रंथों को सीधे और सरल राजस्थानी गद्य में व्याख्यायित करके ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने की एक सचेत पहल थी, जिससे मौखिक परंपराओं से लिखित, व्याख्यात्मक गद्य की ओर उन्मुख हुआ। इस नवाचार ने धार्मिक ज्ञान का लोकतंत्रीकरण किया तथा इसे विद्वानों की व्याख्या या काव्यात्मक प्रस्तुति के दायरे से निकालकर स्थानीय भाषा में स्पष्टीकरण के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाया, जिससे राजस्थानी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिला। इसी कालखंड में खरतरगच्छ के संत कवि महोपाध्याय पुण्यसागर ने वि. सं. 1604 में ‘सुबाहु संधि’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें 89 पद्य हैं। उनके शिष्य पद्मराज की ‘अभयकुमार चौपई’ एक प्रसिद्ध रचना है, जो वि.सं. 1650 में में लिखी गई थी।
इसी परम्परा में दौलतराम काजीवाल, टोडरमल, गुमानीराम, दीपचन्द्र कासलीवाल, जयचन्द्र शांघड़ा, सदासुख कासलीवाल का नाम जैन टीकाकारों में उल्लेखनीय हैं। ये 18वीं और 19वीं शताब्दी के प्रमुख विद्वान थे, जिन्होंने टीका लेखन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से अधिकांश हिंदी के विद्वान थे। 18वीं-19वीं शताब्दी में इन विद्वानों का उदय यह दर्शाता है कि जैन टीका लेखन परंपरा भाषायी रूप से गतिशील और अंतर-क्षेत्रीय थी। यह केवल राजस्थानी तक सीमित नहीं थी, बल्कि हिंदी के माध्यम से एक व्यापक बौद्धिक संवाद का हिस्सा थी। यह प्रवृत्ति जैन विद्वानों की बहुभाषी दक्षता और उनके ज्ञान को विभिन्न भाषायी समुदायों तक पहुँचाने की प्रतिबद्धता को उजागर करती है, जिससे जैन साहित्य की पहुँच और प्रभाव का विस्तार हुआ।
जैन विद्वानों ने न केवल धार्मिक ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं, बल्कि व्याकरण, छंद, अलंकार, काव्य, वैद्यक और गणित जैसे विविध धर्मेतर शास्त्रों पर भी महत्वपूर्ण समालोचनात्मक कार्य किया। व्याकरण-शास्त्र अंतर्गत 'बाल शिक्षा', 'उक्ति रत्नाकर', 'पंच-सन्धि बालावबोध', 'हेम व्याकरण भाषा टीका', 'सारस्वत बालावबोध'; छंद शास्त्र में 'पिंगल शिरोमणि', 'दुहा चन्द्रिका', 'राजस्थानी गीतों का छन्द ग्रंथ', 'वृत्त रत्नाकर बालावबोध' और अलंकार-शास्त्र सम्बंधित 'वाग्मट्टालंकार बालावबोध', 'विदग्ध मुखमंडन बालावबोध', 'रसिक प्रिया बालावबोध'; काव्य टीकाओं में 'भर्तृहरिशतक-भाषा टीका त्रय', 'अमरुशतक', 'लघुस्तव बालावबोध', 'किसन-रुक्मणी की टीकाएँ', 'धूर्ताख्यान कथासार', 'कादम्बरी-कथा सार'; वैद्यक-शास्त्र आधारित 'माधवनिदान टब्बा', 'सन्निपात कलिका टब्बाद्वय', 'पथ्यापथ्य टब्वा', 'वैद्य जीवन टब्बा', 'शतश्लोकी टब्बा' तथा गणित-शास्त्र पर 'लीलावती भाषा चौपाई', 'गणित सार चौपाई' आदि टीकाएँ राजस्थानी समालोचना की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।
राजस्थानी जैन टीका साहित्य की विशालता और महत्व को देखते हुए, इसकी पांडुलिपियों का संरक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। राजस्थान में जैन शास्त्र भंडारों की संख्या सर्वाधिक है, जो लगभग सभी प्रमुख नगरों और कस्बों में पाए जाते हैं। इन भंडारों में संस्कृत, अपभ्रंश, हिंदी और राजस्थानी भाषाओं में सैकड़ों अज्ञात और दुर्लभ ग्रंथ प्राप्त हुए हैं। यद्यपि इन भंडारों की पूरी सूची अभी तक तैयार नहीं हो पाई है, अनुमान है कि राजस्थान में दिगंबर और श्वेतांबर शास्त्र भंडारों की संख्या 200 से अधिक हैं। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर एवं जैन विश्व भारती, लाडनूं का योगदान स्मरणीय है। इसके अतिरिक्त जयपुर और जैसलमेर के जैन शास्त्र भण्डार में सैकड़ों अज्ञात ग्रंथ और पांडुलिपियाँ शोध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।
जैन टीका साहित्य का महत्त्व एक साहित्यिक विधा के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार आंदोलन के रूप में भी स्थापित करता है। यह साहित्य अपने समय में एक प्रभावी माध्यम था जिसने जैन सिद्धांतों को जनसाधारण के नैतिक आचरण और जीवनशैली में एकीकृत किया। 'जन-शैली' और 'सरल, सरस, सहज एवं बोधगम्य शैली' को अपनाने का निर्णय एक सचेत प्रयास था ताकि जटिल सिद्धांतों को लोगों के दैनिक जीवन में आत्मसात किया जा सके। इस व्यावहारिक अनुप्रयोग और व्यापक पहुँच ने एक विशिष्ट 'जैन शैली' का विकास किया, जो स्पष्ट, नैतिक और सुलभ धार्मिक प्रवचन का पर्याय बन गई।
समग्रतः राजस्थानी भाषा में लिखित जैन टीका साहित्य एक असाधारण रूप से समृद्ध और बहुआयामी साहित्यिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इस साहित्य ने न केवल जैन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को संरक्षित और प्रसारित किया, बल्कि राजस्थानी भाषा के विकास, स्थानीय लोक संस्कृति के संरक्षण और तत्कालीन सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भों के दस्तावेजीकरण में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैन विद्वानों ने विविध काव्य रूपों जैसे-रास, चौपाई, फागु का उपयोग करके धार्मिक ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पार्श्वचंद्र सूरि जैसे अग्रदूतों द्वारा राजस्थानी गद्य में टीका लेखन की शुरुआत ने भाषायी नवाचार को प्रेरित किया और स्थानीय बोलियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में विकसित किया। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास, प्रशासन और सामाजिक जीवन के लिए ये ग्रन्थ अमूल्य प्राथमिक स्रोत प्रदान करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक लेखन भी अपने समय के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य का एक मूल्यवान अभिलेख बन सकता है।
आधार ग्रन्थ
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3. डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन संत, श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, महावीरजी, जयपुर, सं. 1967
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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कवित्व
नासिरा शर्मा के उपन्यासों में संवेदना का धरातल
नासिरा शर्मा के उपन्यासों में संवेदना का धरातल
'विविधा' जनवरी-मार्च,2025 में प्रकाशित
साहित्य संसार के प्रति मानसिक प्रक्रिया अर्थात् विचारों व भावों की अभिव्यक्ति है। यह ‘हित का साधन’ भी करता है, अतः संरक्षणीय भी है। इसे समाज का उत्पादन भी कहा जाता है, जिससे विशाल मानव जाति की आत्मा का स्पन्दन ध्वनित होता है। साहित्य जीवन की व्याख्या भी करता है, इसी कारण उसमें जीवन देने की शक्ति भी आती है। इस प्रकार साहित्य व समाज का अन्योन्याश्रयत्व चिरकाल से रहा है। स्वप्निल श्रीवास्तव के अनुसार- “आज का यथार्थ मारक और अविश्वसनीय है। वह फैंटेसी के आगे का यथार्थ है। आज के यथार्थ का चेहरा रक्तरंजित और अमानवीय है। यथार्थ हमारे सामने विस्मयकारी दृश्य प्रस्तुत करता है, जो कल्पनातीत है।”[1] विस्मयकारी यथार्थ का जो दृश्य नई सदी के दो दशकों में दिखाई देता है, वह उपनिवेशवादी प्रभाव का परिणाम है। फलतः जो कारक हमारे समक्ष उपस्थित हैं, उनमें प्रमुख हैं- वैश्वीकरण, मुक्तबाजारवाद, विकृत उभोक्तावाद, राजनीतिक अधिनायकवाद, मूल्यहीनता, सांस्कृतिक संघर्ष, भ्रष्ट आचार, हिंसक वर्चस्व आदि। यद्यपि ये कारक वैश्विक हैं, किन्तु भारतीय मन इससे ज्यादा प्रभावित है।
नासिरा शर्मा हिंदी कथा साहित्य की एक सशक्त हस्ताक्षर है। उनकी कृतियों में समाज और संस्कृति का कैनवास विराट रूप में मिलता है। उनके उपन्यासों में रिश्तों की दास्तान, लुप्त होती संवेदनाओं की पड़ताल, वैश्विक परिदृश्य में इंसानियत तथा समकालीन परिवेश में संघर्षशील समाज का बहुआयामी पक्ष बखूबी उभरता है। उन्होंने बाजार और तकनीक के मकड़जाल में फँसी युवा पीढ़ी को भी सावचेत करने का प्रयास किया है। उनके प्रत्येक उपन्यास में समाज के विविध पक्षों को लेकर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं। ‘सात नदियाँ: एक समंदर’ ईरानी क्रांति पर लिखा गया दुनिया का पहला उपन्यास है। ‘शाल्मली’ स्वतंत्रता के बाद महिला विमर्श की चेतना को इंगित करने वाला उपन्यास है तो ‘ठीकरे की मंगनी’ एक संघर्षशील युवती की दास्तान है। ‘जिंदा मुहावरे’ में भारत विभाजन का दर्द छलकता है। ‘अक्षयवट’ में युवा पीढ़ी का संघर्ष दिखाई देता है, वहीं ‘कुइयां जान’ में शुष्क होती संवेदनाओं का प्रकटीकरण है। ‘जीरो रोड’ में देश के सामयिक यथार्थ का अंकन है तो ‘पारिजात’ में संस्कृति और परंपरा में नए सूत्र को खोजने की कोशिश है। ‘अजनबी जजीरा’ में इराक की दारुण स्थितियों का अंकन है। ‘कागज के नाव में बेरोजगारी और पलायन की विसंगतियों को उजागर करने की कोशिश है। ‘शब्द पखेरू’ में बाजार का परिदृश्य तो ‘दूसरी जन्नत’ में आधुनिकता की तेज रफ्तार पर फिसलती जिंदगी का सजीव चित्रण है। इस प्रकार मानव जीवन के समग्र पक्षों को नासिरा शर्मा ने अपने उपन्यासों की विषय-सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया है।
भारत ने अथक संघर्ष के उपरांत 15 अगस्त, 1947 को आजादी तो प्राप्त कर ली, किन्तु विभाजन की त्रासदी के दंश के आघात को भी झेला। जहाँ धर्म और संप्रदाय के आधार पर मानवता का विभाजन हुआ और मनुष्यता के पतन का रक्तस्नात् चेहरा भी प्रकट हुआ। हजारों लोग बेघर, दंगे, अकाल मृत्यु, विध्वंस, द्वेष के दृश्य के साथ संवेदना का अवसान भी देखने को मिला। नासिरा शर्मा ने उन विभीषिकाओं का केवल ब्यौरा प्रस्तुत न कर उस मानसिकता को नंगा किया है, जो संकटकालीन स्थितियों में भी सब कुछ छीनने और मौके का फायदा उठाने की मनोवृत्ति से ग्रस्त है। नासिरा शर्मा का 'जिंदा मुहावरे' उपन्यास भारत विभाजन की त्रासदी के आधार पर लिखा गया है। धर्म के नाम पर हुए कत्लेआम और इंसानियत के मर जाने का वीभत्स चित्रण करता हुआ यह उपन्यास हिंदी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। फैजाबाद गाँव में रहने वाला रहीमुद्दीन का छोटा बेटा निजाम उपन्यास का केंद्रीय पात्र है, वह पाकिस्तान का ख्वाब देखते हुए करांची चला जाता है और सोचता है "जहाँ जात है अब वही हमारे वतन कहल इहे। नया ही सही अपना तो होइहे। जहां रोज-रोज ओकी खुद्दारी को कोई ललकारिए तो नाहीं।"[2] परंतु पाकिस्तान जाकर वह अपनी जन्मभूमि की गंध के लिए तड़पता है, क्योंकि उसके माँ-बाप, भाई-बहन तो अपनी पैतृक जमीन भारत में ही हैं। वह भारत लौटने के लिए लालायित रहता है, परंतु सियासत उसे ऐसा नहीं करने देती। उसकी तड़प मर्म को हिला देती है। इससे यह प्रकट होता है कि विभाजन का दर्द हमारे समय का घातक सच है।
वैश्विक धरातल पर यदि हम अवलोकन करें तो किसी भी समाज में महिलाओं को समान स्तर प्राप्त नहीं हुआ। पुरुष की परंपरागत मानसिकता में नारी की संघर्ष गाथा है। यह विश्व के प्रत्येक देश में देखी जा सकती है। ईरान की क्रांति पर आधारित उपन्यास ‘सात नदियां: एक समंदर’ में अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठती स्त्रियों की संघर्ष गाथा है। इस उपन्यास की सारी प्रमुख पात्र स्त्रियां हैं, जहां खुमेनी शासन के आने पर उनकी उम्मीदें टूट जाती है। शासन के विरोध में बोलने का नतीजा यह होता है कि पहले तो वह अपने वैवाहिक जीवन से दूर हो जाती है और तैयब अपनी कलम को खुमेनी शासन के विरुद्ध चलाती है तो अंततः शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देते हुए उसे गोली से उड़ा दिया जाता है। यहां नासिरा शर्मा लिखती है, “ईरान की क्रांति पर लिखा मेरा यह उपन्यास उन अनुभवों का लेखा-जोखा है जो पिछले नौ वर्ष में मुझे ईरान की धरती पर हुए इन नौ वर्षों के पीछे लगभग नब्बे वर्षों का अतीत सांस ले रहा था जिसमें 5000 वर्ष पुराने ईरान की सभ्यता संस्कृति का वैभव अपनी ऐतिहासिक गाथा गुनगुना रहा था।“[3] वास्तव में युद्ध हो या क्रांति, स्त्रियों का संघर्ष अपने लिए कुछ पा न सका।
आर्थिक नाकाबंदी में इराक की जनता जिस गरीबी और महंगाई से जूझ रही थी, उसी में अमेरिकन बमबारी, सद्दाम का तख्ता पलट और आम आदमी किस तरह सियासी खबरों के पीछे छुप जाता है उसका सुख-दुख ‘अजनबी जजीरा’ में प्रकट हुआ है। युद्ध ग्रस्त विभीषिका में औरतों की स्थिति का सत्य और भी भीषण है। लेखिका ने इस सत्य को इस उपन्यास की पात्र समीरा के मुँह से कहलवाया है, "युद्धग्रस्त समाज की कठिनाइयाँ कितनी नई परेशानियों से हमारा परिचय कराती है, तब पेट के आगे बदन बेचना यहां तक की अपने बच्चे तक को बेचना मुश्किल काम नहीं लगता, बल्कि मौत को नजदीक पाकर जीने की तमन्ना ज्यादा बढ़ जाती है। मुझे ही देखो जवान बेटियों की भूख के आगे मैं अपनी भूख को दबा नहीं पाती..।"[4] समीरा का यह कथन मानवीय त्रासदी की पराकाष्ठा है। जब वह कहती है, “जिस्मफरोशी से मुझे हालात ने महफूज रखा वरना वह भी मुझे करना पड़ता.. हालात अच्छाई और बुराई के मायने कैसे बदल कर रख देते हैं.. पेट भरे लोगों के लिए उंगली उठाना कितना आसान होता है मगर भूखे के लिए रोटी हर फलसफे से बढ़कर अहम हो उठती है।“[5] सभ्य कहलाने वाले इस आधुनिक विश्व में विध्वंस का यह मूर्त रूप पाठकों को स्तब्ध कर देता है। ऐसे परिदृश्य में मान्यता तारतार होती है और स्त्री विमर्श के समूचे निहित अर्थ बदल जाते हैं।
पेट की आग व्यक्ति को कुछ भी करने कोई वश कर देती है उसे समय उसके सामने नैतिकता का मायने बदल जाते हैं। विदेशी सेना के आक्रमण और बम हमले से इराक पूरी तरह नष्ट हो गया है। फौजी शासन के तले लोगों को जरूरत की चीजों के लिए घरेलू सामान बेचना पड़ रहा है। अधिकांश इराक के समर्थक मारे जा चुके हैं। ऐसे भीषण समय में एक बूढी औरत जो अपने दो छोटे नवासों की एकमात्र संरक्षक है। बच्चों की भूख को शांत करने के लिए बाजार में दो रोटी छुपाने के आरोप पकड़ी जाती है। वह अपना दुखड़ा समीरा के समक्ष कहती है, "मेरे दो नवासे हैं, कल से भूखे हैं। चारा क्या था मेरे पास?"[6] यह सच मानवता के नाम पर कलंक है।
धर्म के नाम पर हमारा सामाजिक ताना-बाना आज के समय में छिन्न-भिन्न दिखाई देता है। 'जीरो रोड' उपन्यास में धार्मिक कट्टरता के नाम पर इंसानियत को तबाह करने का दृश्य दिखाई देता है। कई ऐसे दृष्टांत है जिसके माध्यम से पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है। उपन्यास का पात्र मुन्ना हाफिज का घर राम प्रसाद व जगत रामजी के मोहल्ले में है। वह चौक में मजहबी किताबों की दुकान लगाकर परिवार का पालन पोषण करता है। अपनी ईमानदारी व उदार दृष्टिकोण के कारण अपने ही मजहब के कट्टर व संकुचित मानसिकता वाले लोगों को चुभने लगता है। उनके उकसाने पर वह तबलीगी जमात वालों को जवाब देते हुए कहता है, "कान खोल कर सुन लें आप सभी साहेबान! मैं किसी के ना खिलाफ कोई काम करता हूँ ना किसी मजहब की तब्लीग पर। मैं गैर मुसलमान को गाली नहीं देता हूँ, बल्कि उन बातों की शिकायत करता हूँ, जो हमें खलती है, जिससे हमें नुकसान पहुँचता है।"[7] उसके इस उदार मनोवृति का परिणाम यह होता है कि एक दिन अचानक रात के दो-तीन बजे उसकी दुकान में आग लगा दी जाती है। लगभग दो लाख की किताबें जलकर खाक हो जाती हैं। इस घटना को लेकर उनके ही जमात के लोग तरह-तरह के आशंकाएं व्यक्त करते हैं और कोशिश करते हैं कि इसे सांप्रदायिक रूप दिया जाए।
जब भी दुनिया में सांस्कृतिक एकता के इतिहास की बात होती है तो भारत का जिक्र होना लाजमी ही है। यहाँ के संस्कारों में दो संस्कृतियाँ यूँ घुली-मिली हैं मानो दोनों एक दूसरे की पूरक हों। ‘पारिजात’ उपन्यास नासिरा शर्मा की एक ऐसी ही कृति है, जो भारत की समावेशी संस्कृति को परत-दर-परत खोलती और मानवीय रिश्तों की बुनावट को भाषा के एहसासों से पाठक के अंदर जीवंत करती है। ‘पारिजात’ आज की पीढ़ी के सपनों, उसके निर्णय, माता-पिता के प्रेम, स्त्री की भारतीय और पाश्चात्य छवि के साथ गुरु-शिष्य के संबंधों और एक समुदाय विशेष के प्रति पाश्चात्य पूर्वाग्रह से घायल समाज जैसी संवेदनाओं को एक नए फलक में तर्कों के साथ बयां करता है, वहीं ‘अक्षयवट’ उपन्यास में लेखिका ने इलाहाबाद से जुड़ी अपनी स्मृतियों के बहाने मानवीय संवेदना में आए बदलाव को रेखांकित किया है। इस उपन्यास के केंद्र में इलाहाबाद शहर के पत्थर गली, नखास कोना, रानी मुंडी, दरियाबंद, हिम्मत गंडा, बताशा वाली गली आदि भागों में रहने वाले लोगों की जिंदगी को दर्शाया है।
यहाँ हम देखते हैं कि उपभोक्ता संस्कृति ने उत्सवों में छिपे सार तत्त्वों को सोख लिया है। स्वयं लेखिका कहती है, "परंपरा के निर्वाह के लिए रावण के पुतले में आग लगाना और बुराई को सदा के लिए मिटा देने का संकल्प हर दिल में होता, मगर व्यावहारिक रूप से मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनने की जिज्ञासा किसी में ना जगती। क्योंकि त्याग करने पर आज के दौर में कोई राजी ना था, उल्टे त्याग की जगह पैसा कमाने की नई-नई तरकीबों में सबका मन मस्तिष्क रमता। रावण को ना करते हुए भी रावण- कृत्य को अपनाने की छुपी लालसा आज का सबसे कड़वा यथार्थ था।"[8] वस्तुतः इलाहाबाद की धमनियों में अक्षयवट के समान अविराम भाव धारा विरासत के रूप में सदैव विद्यमान रही, लेकिन समय के साथ उसमें भी व्यवस्था की सड़ांध और अवसाद भरी जिंदगी के चिह्न नजर आने लगे हैं।
आर्थिक उदारीकरण के दौर में शहरीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई है और इस प्रक्रिया में सर्वाधिक नुकसान ‘संवेदना’ का हुआ है। जहाँ व्यक्ति अपने घर को बचाने के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है। हमने भावनाओं को केन्द्रित करना सीखा है और रिश्तों को भी ताक पर रख दिया है। हम सवालों से डरने लग गए हैं और अपेक्षा करते हैं कि जैसा चल रहा है उसे घर का हर सदस्य स्वीकार कर ले। 'शब्द पखेरू' उपन्यास हमें आगाह करता है कि कैसे नई पीढ़ी अनजाने में ही साइबर क्राइम का हिस्सा बन जाती है। आम जीवन में बढ़ते इंटरनेट के इस्तेमाल और सामाजिक संबंधों में आए बदलावों को हमारे समक्ष बखूबी उपस्थित करता है, दूसरी और मध्यमवर्गीय परिवार की घुटन, संवादहीनता और सीमित संसाधनों के साथ बड़े सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगे बच्चों की कथा यह उपन्यास बारीकी से कहता है। आज के मध्यमवर्गीय परिवारों में यह दृश्य सामान्यतया दिखाई दे सकता है।
आज की पीढ़ी बुजुर्गों के बजाय गूगल से मिलने वाले ज्ञान पर ज्यादा सहज है। "मनीषा शैलजा में बढ़ता विश्वास देख रही थी जो कभी-कभी उसे बाद आक्रामक लगता। हरदम लैपटॉप की स्क्रीन पर आंखें गाड़ी रहती। एक दिन उसने ईर्ष्या वश उसका नाम 'इंटरनेट बेबी' रख दिया था, मगर उसे इस पर कोई फर्क नहीं पड़ा। फेसबुक पर हर फ्रेंड रिक्वेस्ट को कंफर्म कर देना जैसे उसके लिए जरूरी था। किताब या नोटबुक खुली है, सामने मैटर ढूँढने के बहाने चैट चल रही है। दिखावा ऐसी करती है जैसे बेचारी पढ़ाई को लेकर हलकान हो रही है। इंटरनेट के विस्तृत आकाश पर देखने पढ़ने और खोजने के लिए बहुत कुछ था। उसने गूगल को 'ग्रैंडपा' का नाम दे रखा था।"[9]
समग्रतः यह कहा जा सकता है कि जब कभी मानव सभ्यता चाँद को छूने के लिए ब्रम्हांड को चीरती है तब ये चित्र मानव को आदिम युग में ले जाते है, जो शर्मनाक है। मनुष्यता के कलंक से विमुक्ति का प्रयास मानव जीवन के प्रति एकात्म भाव से ही संभव है, अन्यथा विकास की गति केवल छलावा है। विश्व साहित्य की प्रथम पुस्तक, जिसे यूनेस्को ने भी स्वीकार किया है, वह है- ऋग्वेद। उसमें कहा गया है- मनुर्भवः, अर्थात् मनुष्य बनो। मनुष्यता का बोध ही भारतीय संस्कृति का मूल है, जो वर्तमान और भविष्य के लिए भी जरूरी है व रहेगी। हिन्दी उपन्यास परम्परा में नासिरा शर्मा का अवदान मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर इस दृष्टि से स्तुत्य है।
संदर्भ-
1. आलोचना, अप्रैल-जून,2003, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.32
2. जिंदा मुहावरे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2017, पृष्ठ 11
3. सात नदियां: एक समंदर, अभिव्यंजना प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 1984, पृष्ठ 7
4. अजनबी जजीरा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 2017, पृष्ठ 78
5. अजनबी जजीरा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 2017, पृष्ठ 120
6. अजनबी जजीरा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 2017, पृष्ठ 24
7. जीरो रोड, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, सं. 2003 पृष्ठ 286
8. अक्षयवट, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, सं. 2003 पृष्ठ 42
9. शब्द पखेरू' वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2017, पृष्ठ 40
आधुनिक हिन्दी काव्य-धारा में मेवाड़
1. रामकुमार वर्मा, चित्तौड़ की चिता, परिचय, चाँद कार्यालय, चंद्रलोक, इलाहाबाद, सं. 1929, पृ. 1
2. मैथिलीशरण गुप्त, भारत भारती, साहित्य सदन, चिरगांव, सं. 1984, पृ. 79
3. श्यामनारायण पांडेय, जौहर, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, सं. 2012, पृ. 13
4. वही, पृ. 4
5. वही, पृ. 5
6. रामकुमार वर्मा, चित्तौड़ की चिता, परिचय, चाँद कार्यालय, चंद्रलोक, इलाहाबाद, सं. 1929, पृ. 111
7. श्यामनारायण पांडेय, हल्दीघाटी, सर्ग-3, कविताकोश वेबपेज
8. वही, सर्ग-1 कविताकोश वेबपेज
9. महाराणा का महत्त्व, जयशंकर प्रसाद, भारती भण्डार, बनारस, सं. 1985 पृ. 21-22
10. श्यामनारायण पांडेय, हल्दीघाटी, सर्ग-12, कविताकोश वेबपेज
11. वही, सर्ग-12, कविताकोश वेबपेज
12. जयशंकर प्रसाद, पेशोला की प्रतिध्वनि, (सं.) सत्येन्द्र पारीक, आधुनिक काव्य सोपान, पुनीत प्रकाशन, जयपुर, सं. 2004, पृ. 50-51
13. श्यामनारायण पांडेय, जौहर, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, सं. 2012, पृ. 42
14. लाला भगवानदीन, वीर पंचरत्न, आदर्श ग्रन्थ माला, कलकत्ता, सं. 1920, पृ. 190
15. वही, पृ. 190
16. हरीश, महीयषी मीरा, कृष्णा ब्रदर्स, अजमेर, सं. 1998, पृ. 15
17. वही, पृ. 92
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