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रांगेय राघव की कहानियों में मानवता के पीड़ित पक्ष



रांगेय राघव की कहानियों में मानवता का पीड़ित पक्ष

(अपनी माटी, जनवरी-मार्च, 2026 अंक में प्रकाशित)

रांगेय राघव की कहानियों का रचना-समय मनुष्यता के भयावह स्वप्नों का साक्षी है। जहाँ एक तरफ भारतीय समाज औपनिवेशिक परतंत्रता से मुक्ति का संघर्ष करते-करते यकायक विभाजनकारी षड्यंत्रों का शिकार बन स्वयं को फाँस लेता है, तो दूसरी तरफ ‘बंगाल का अकाल’ प्राकृतिक विभीषिका का चरम माना जा सकता है, जहाँ मानवता को रक्षित रखना चुनौती है। वैश्विक परिदृश्य में भारत से इतर पूरी दुनिया परमाणु त्रासदी के आतंक से विस्मित और मानवता की तलाश में व्याकुल दिखाई देती है। ऐसे अनास्थामय समय को रांगेय राघव ने अपनी कहानियों में चित्रित कर मानवता के पीड़ित स्वर को आने वाली पीढ़ियों के सामने रखा। ‘साम्राज्य का वैभव’(1947), ‘देवदासी’(1947), ‘समुद्र के फेन’(1947), ‘अधूरी मूरत’(1949), ‘जीवन के दाने’(1949), ‘अंगारे न बुझे’(1951), ‘ऐयाश मुर्दे’(1953), ‘इन्सान पैदा हुआ’(1957), ‘पाँच गंधे’(1960) तथा ‘एक छोड़ एक’(1963) कहानी-संग्रह अपने समय के सच को मानव-मूल्यों के साँचे में मूल्यांकित करते हैं।

  यह सच है कि रांगेय राघव ने अपनी कहानियों में मानवीय बर्बरता, भुखमरी, अंतहीन गरीबी, लाचारी और बेबसी को जिस प्रखरता से सामने रखा, वह मनुष्यता के नैतिक प्रतिमानों को विचलित करती है। अशोक शास्त्री लिखते हैं- “रांगेय राघव के कहानी-लेखन का मुख्य दौर भारतीय इतिहास की दृष्टि से बहुत हलचल भरा विरल कालखंड है; कम मौकों पर भारतीय जनता ने इतने स्वप्न और दुःस्वप्न एक साथ देखे थे- आशा और हताशा ऐसे अड़ोस-पड़ोस में खड़ी देखी थी।”1 ऐसे विकट समय में रांगेय राघव ने हिन्दी कहानी में उन वेदनाओं, अवसादों एवं पतित मनुष्यता की गूँज को स्थान देकर दुर्गम और कँटीले पथ की यात्रा हिन्दी जगत को करवाई। वस्तुतः इन कहानियों में मनुष्यता के प्रतिमानों से केवल टकराव नहीं, बल्कि अपने ढंग से प्रत्युत्तर है।

  रांगेय राघव के लेखन की शुरूआत पाँचवें दशक से होती है, जब दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका देख चुकी है। देश में भारत छोड़ो आन्दोलन, मजदूरों की देशव्यापी हड़तालें, विभाजन के कारण सांप्रदायिक उन्माद और ब्रिटिश साम्राज्यवादी कहर से जनता त्रस्त है। उपनिवेशवादी बर्बरता के विरोध में चेतना का स्वर उनकी कहानी ‘यह ग्वालियर है’, ‘चंगेज़ की तलवार’, ‘उपचेतना का ताण्डव’, ‘धूल की आँधी’ आदि में प्रकट होता है। ‘यह ग्वालियर है’ कहानी में मजदूरों पर बेरहमी से गोलियाँ चलाकर साम्राज्यवादी ताकतों के कहर को चित्रित करते हुए वे मजदूरों की शक्ति को चिह्नित करते हैं। मजदूरों की गरीबी में भी शक्ति को प्रकट करते हुए वे लिखते हैं- “.... यह सच है कि गरीब के पास जब तक एक ही बण्डी है तब तक जूँ उसमें रेंगती ही रहेगी। लेकिन मजदूर की उँगलियों को भूल जाना क्या ठीक होगा, जिसके बीच में कैसी भी जूँ पीस दी जा सकती है।”2

  भारत ने अथक संघर्ष के उपरांत 15 अगस्त, 1947 को आजादी तो प्राप्त कर ली, किन्तु विभाजन की त्रासदी के दंश के आघात को भी झेला। जहाँ धर्म और संप्रदाय के आधार पर मानवता का विभाजन हुआ और मनुष्यता के पतन का रक्तस्नात् चेहरा भी प्रकट हुआ। हजारों लोग बेघर, दंगे, अकाल मृत्यु, विध्वंस, द्वेष के दृश्य के साथ संवेदना का अवसान भी देखने को मिला। रांगेय राघव ने उन विभीषिकाओं का केवल ब्यौरा प्रस्तुत न कर उस मानसिकता को नंगा किया है, जो संकटकालीन स्थितियों में भी सब कुछ छीनने और मौके का फायदा उठाने की मनोवृत्ति से ग्रस्त है। ‘तबेले का धुँधलका’ कहानी तबेले में शरण के बदले अपनी बहन के कौमार्य का सौदा करने की विवशता और अपनी लाचारी का चीत्कार विघटित मानव-मूल्यों को सामने रख देती है। जब उसकी स्त्री कहती है- “ किसी को क्या मालूम? रहने को तो जगह मिल ही जाएगी।” फिर जैसे उसने मुझे सांत्वना दी- “अब पगड़ी नहीं देनी होगी। परदेश में अपनी क्या इज्जत?”3 कहानी में धुँधलका केवल उस तबेले में ही नहीं है, जो उसे अपनी बहन की अस्मत पर मिला है, बल्कि पूरा देश तबेले की भाँति जी रहा है।
मूल्यों का पतन मनुष्यता का पराभव है। 

प्रगति के रथ पर आरूढ़ भारतीय समाज में पुरातन नैतिक मूल्य निरन्तर विघटित होते देखे जा सकते हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ तत्कालीन समाज के आदर्श को बिम्बित करती है, जो भारतीय नैतिक मूल्यों का उज्जवल पक्ष है। इसी क्रम में रांगेय राघव की ‘पंच परमेश्वर’ कहानी हमें उस सामयिक यथार्थ से परिचित कराती है, जहाँ भ्रष्ट आचरण और अनैतिकता की जुगलबंदी अट्टहास करती दिखाई देती है। इस कहानी में ‘कन्हाई’ अपने सौतेले भाई चन्दा की बहू को अपने घर बिठा देता है। जब चन्दा पंचायत बुलाता है तो कन्हाई शराब की बोतल से न्याय को खरीद लेता है। इसके बाद फैसला यह होता है कि औरत मर्द की होती है। अपराधी को ‘मर्द’ कहकर महिमा मण्डित करना पतित व्यवस्था का एक दृश्य है। यहाँ तक कि फूलो का विश्वासघात भी बदलते समय का यथार्थ है। उसने जब पंचों के समक्ष कहा- “चौधरी भगवान है। पंच परमेसुर हैं। लुगाई मरद की है, मगर जो मरद ही न हो, उसकी कोई लुगाई नहीं है।”4 यह कथन समाज को विस्मित करता है। समाज भी यह मान लेता है कि ब्याह हो जाने मात्र से क्या होता है? पुरुषार्थहीन पुरुष का कोई अधिकार नहीं कि वह स्त्री को दास बना कर रखे। यह चित्र भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के पतन का है, जिसे रांगेय राघव ने चित्रित किया है।

  इसी तरह ‘भय’ कहानी में भी पंचायत अपराधी और अपराध के शिकार को एक तराजू में तौल देती है। इस कटु यथार्थ में पीड़िता ‘रतनी’ अपनी संस्कारगत जड़ता के कारण मौन और भयग्रस्त है। न्याय का आलम यह है कि सब कुछ जानकर भी पंचायत सभी पर जुर्माना डालकर अपने हाथ झाड़ लेती है। यही स्थिति नेतृत्व की है, जहाँ सुविधानुसार व्यवस्था का संचालन होता है। ‘भय’ कहानी में पंचों का न्याय द्रष्टव्य है- सरपंच ने चौधरी से कहा- “धूपो ने पाँच खरच किए, दस का दंड देगी; कुंदन ने बूढ़े और औरत को मारा सो पचास रूपये दंड देगा और तुरसी मामले को पुलिस तक ले गया जिसमें दोनों का खरचा हुआ, सो तीस रुपये दंड भरेगा और पंचों का फैसला है कि मामला यहीं खत्म हुआ।”5 यह उदाहरण पीड़ित के साथ छलावा मात्र नहीं, बल्कि उस अन्तर्चेतना का दहन है, जिसने मानवता को सहेज कर रखा था।
 
आजादी के संघर्ष में महात्मा गांधी का नायकत्व महत्त्वपूर्ण रहा। वे भारतीय जन-मानस के आदर्श बन गए थे, लेकिन आजादी प्राप्त करते ही गांधीजी को विस्मृत कर उनके नाम का दुरुपयोग राजनेता करने लग गए। ऐसे वर्ग का उभार हुआ, जिसने गांधी टोपी का उपयोग अपनी भ्रष्ट विकृतियों को ढँकने के लिए किया। ‘ईमान की फसल’, ‘बाप का दोस्त’ जैसी कहानियों के माध्यम से रांगेय राघव ने हमारी राजनीति के अवसरवादी चरित्र को उजागर किया, जो भ्रष्ट आचरण को जीवन-शैली का पर्याय मानने लगे हैं। ‘ईमान की फसल’ कहानी में कथन है- “गांधी के नाम की सफेदी उनके लिए एक नायाब चादर साबित हुई है जो उनकी भ्रष्टता और विकृतियों को ढँकने के काम आती है ..... भीतर की काली करतूत छिपाने को सफेदी चाहिए। ये लोग सफेद टोपी लगाते हैं।”6 यह आचरण आने वाले समय का चरित्र भी इंगित करता है, जहाँ निरीह और भोली जनता को ठगने के लिए किस तरह लोग आवरण बदलकर हमारे सामने आते हैं। गांधी के रूप का यह सांकेतिक दृश्य आज भी भारतीय राजनीति का हिस्सा बना हुआ है, जिसे लेखक ने पाँच दशक पूर्व प्रकट किया था।

  यह विदित है कि महत्त्वाकांक्षाओं की ऊँची उड़ान व्यक्ति को स्वार्थी बना देती है। जब तात्कालिक लाभ के व्यामोह में व्यक्ति स्वयं के साथ अपनी विरासत और भविष्य को बड़े ही भोलेपन के साथ हिंसक शक्तियों को सौंप देता है। भारतीय सांस्कृतिक चरित्र में इस बदलाव का रेखांकन रांगेय राघव ने ‘मृगतृष्णा’ कहानी में प्रतीकों के माध्यम से बखूबी किया है। कहानी में ‘मृगी’ अपनी उच्च महत्त्वाकांक्षाओं के कारण ‘मृग’ की संघर्षशीलता को मूर्खता समझती है। व्यवस्था का व्याघ्र शिकारी कुत्तों के रूप में जब उसे दबोच लेता है तो मृत्यु के समय उसे पश्चाताप होता है। उसे अपना अतीत याद आता है, जो स्वार्थ व उद्दाम आकांक्षाओं की बलि चढ़ गया है। उसे अपना पति और बच्चे याद आते हैं, जिन्हें उसने मृत्यु की दहलीज पर पहुँचा दिया है। दूसरी ओर ‘मृग’ की मृत्यु अपनों को बचाते हुए, संघर्ष करते हुए होती है। वह स्वयं मरकर भी अपने बच्चों को बचाने की कोशिश करता है, वह उम्मीद रखता है कि संघर्ष की परम्परा उसके बच्चे आगे बढायेंगे। लेकिन एक कड़वे सच से उसका सामना होता है। जब वह मरते समय अपने बच्चे से ‘मृगी’ के बारे में पूछता है तो जो कुछ भी उसे पता चलता है, वह यातनामय है। मृग का आर्तनाद इन शब्दों में प्रकट होता है- “ओ देव! यह मैं क्या सुन रहा हूँ- तू मेरा पुत्र क्यों हुआ? अभागे, जन्म लेते ही क्यों न मर गया। बिना सिखाये ही चपल सिंह तक का बच्चा जानता है कि उसे घास नहीं खानी है, चाहे प्राण भले ही चले जायें, परन्तु तू ही नहीं सीख पाया कि जाति का गौरव कैसे रखा जाय।”7 यह दृश्य तत्कालीन भारतीय समाज का है, जहाँ एक पीढ़ी साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष कर रही है तो दूसरी पीढ़ी अपने मूल्यों का नाश कर उन्हीं शक्तियों के हाथों का खिलौना बन रही है। यह हमारे पारिवारिक यथार्थ का उदाहरण भी है। ऐसी स्थिति में हमारे पूर्वजों का वह त्याग किस पीड़ा से गुज़रा होगा, इसे महसूस किया जा सकता है।

  रांगेय राघव की दृष्टि में साहित्य युगीन और सामयिक होना आवश्यक है, लेकिन वे मानते हैं कि कोई साहित्यकार सार्थक, स्थायी और महत्त्वपूर्ण साहित्य की रचना तभी कर पाता है, जब वह उसे सार्वभौम रूप देता है। अपनी कहानी ‘कुत्ते की दुम और शैतान’ की रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए वे लिखते हैं- “... यह मनुष्य के बाह्य पर जाकर सीमित नहीं हो जाती। यह युग-युग का सत्य है, क्योंकि यह उसकी भीतर की निकृष्टता को बाहर खींच लाती है। जब युग का सत्य युग-युग के सत्य से तादात्म्य करता है, तब कला का जन्म होता है।”8 यही युगीन सत्य जब रांगेय राघव ने अपनी आँखों से देखा तो उसे अपनी रचनाधर्मिता की वस्तु बनाया। रांगेय राघव की कहानियों की संख्या चाहे अधिक न हो, लेकिन उनमें अपने युग का सत्य है, जिसमें सामयिकता की रक्षा करते हुए मानवता की पृष्ठभूमि को स्थायित्व देने का प्रयास किया है। अपने लेखन की प्रासंगिकता को उन्होंने बनाये रखा है और अल्पकालीन लेखन समय की संपूर्णता को कहानियों के माध्यम से व्यक्त किया। यदि कहानी के परम्परागत चौखटों की बात करें तो रांगेय राघव ने उन्हें तोड़कर रख दिया और केवल मानव-सभ्यता के जीवन्त पक्ष को बिना किसी आग्रह के बनाये रखा, जो विलक्षण है। मानवता के विषाद पक्ष को रखने के बहाने रांगेय राघव ने नैतिक मूल्यों के पतन का बिम्ब रखते हुए भारतीय समाज को आने वाले भीषण समय की आहत से भी परिचय करवा दिया था, जिसका चित्र न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में पनप रहे विद्वेष के रूप में उपस्थित है।  

संदर्भ-
1. अशोक शास्त्री (सं.), प्रतिनिधि कहानियाँः रांगेय राघव, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2,  सं. 2017, पृ.17
2. मधुरेश, विनिबंध रांगेय राघव, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं.1987, पृ.60
3. अशोक शास्त्री (सं.), प्रतिनिधि कहानियाँः रांगेय राघव, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, सं. 2017, पृ.90
4. पूर्ववत्, पृ.29
5. पूर्ववत्, पृ.138
6. रांगेय राघव, इन्सान पैदा हुआ, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली-66, सं.1957, पृ.85
7. रांगेय राघव, पाँच गधे, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली-66, सं.1960, पृ.166
8. मधुरेश, विनिबंध रांगेय राघव, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं.1987, पृ. 63
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जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान

 


जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान

साहित्य परिक्रमा के जनवरी-मार्च, 2026 अंक में प्रकाशित

राजस्थान की समृद्ध साहित्यिक विरासत में जैन साहित्य का एक विशिष्ट स्थान है। यह साहित्य केवल धार्मिक उपदेशों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के इतिहास, उसकी सामाजिक संरचना और भाषायी परम्परा को समझने के लिए एक अमूल्य स्रोत के रूप में कार्य करता है। जैन मुनियों, आचार्यों और श्रावकों द्वारा रचित इस साहित्य ने जैन धर्म के सिद्धांतों, तीर्थंकरों की महिमा, मंदिरों के उत्सवों और संघ यात्राओं का विस्तृत वर्णन किया है। इसकी विशालता और विविधता उल्लेखनीय है। जैन समुदाय की ज्ञान-संरक्षण और साहित्य सृजन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के कारण इसने अन्य समकालीन साहित्यिक परंपराओं की तुलना में अधिक मात्रा में साहित्य का निर्माण करने में सक्षम बनाया। जैन समुदाय की संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण है कि चातुर्मास में साधुओं द्वारा चिंतन, मनन और प्रवचन के साथ-साथ लेखन-पठन के कार्य पर दिए गए महत्व के कारण विपुल साहित्यिक धरोहर प्राप्त हुई। भारतीय परंपरा में जैन दर्शन और संस्कृति अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है। यह स्थिति प्राकृत, संस्कृत, राजस्थानी और विभिन्न स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध विपुल जैन साहित्य से प्रमाणित होती है। यह साहित्य आगम, पुराण, कथा, चरित्र, काव्य और निबंध जैसे विविध रूपों में उपलब्ध है, जो इसकी बहुआयामी प्रकृति को दर्शाता है ।

राजस्थानी जैन साहित्य में समालोचनात्मक लेखन की एक सुदृढ़ परंपरा रही है, जिसमें 'टीका', 'बालावबोध' और 'टब्बा' जैसे शब्द प्रमुखता से प्रयुक्त होते हैं। इन तीनों का मूल उद्देश्य ग्रंथों को स्पष्ट करना था, किंतु उनकी प्रकृति और विस्तार में भिन्नता थी। टीकाएँ मूलतः संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश जैसी भाषाओं में रचित जटिल धार्मिक और उपदेशात्मक ग्रंथों को जनसाधारण के लिए सुगम बनाने के उद्देश्य से लिखी गईं। जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति और नैतिक उत्थान आदि को प्राप्त करने के उद्देश्य से इन टीकाओं का विकास हुआ। यह ज्ञान की सर्वव्यापकता और जटिल दार्शनिक अवधारणाओं को सरल एवं व्यावहारिक रूप में जन सामान्य तक पहुँचाने की एक अनुपम पहल थी, जिससे धर्म अधिक प्रभावशाली और उपयोगी बन सके।

‘टीका’ मूलतः किसी संस्कृत, प्राकृत या अपभ्रंश ग्रंथ पर लिखी गई एक विस्तृत व्याख्या या भाष्य होती थी। इसका लक्ष्य मूल पाठ के गहन अर्थों, दार्शनिक अवधारणाओं और संदर्भों को विश्लेषित करना था, जो प्रायः विद्वानों और गंभीर अध्येताओं के लिए होती थी। ‘बालावबोध’ बालकों या सामान्य गृहस्थों के लिए मूल रचना का विस्तृत और सरल स्पष्टीकरण होता था। जैन कवियों का उद्देश्य जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति पैदा करना था और तत्त्वज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती का समाधान करने के लिए बालावबोध एक सरल, सरस, सहज और बोधगम्य शैली में लिखा जाता था, जिससे जैन धर्म के सिद्धांतों को जनसाधारण तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सके। ‘ टब्बा’ मूल रचना के स्पष्टीकरण के लिए पत्र के किनारों पर लिखी गई संक्षिप्त टिप्पणियाँ होती थीं। ये त्वरित संदर्भ और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में सहायक होती थीं।

वस्तुतः मूल जैन आगम ग्रंथ प्रायः प्राकृत या संस्कृत में थे, जो सामान्य जन के लिए कठिन थे। इस कठिनाई को दूर करने के लिए, विभिन्न स्तरों की व्याख्याएँ आवश्यक थीं। टीकाएँ विद्वानों की सन्दर्भ सहायिका थीं, बालावबोध जटिल दार्शनिक और धार्मिक अवधारणाओं को सरल बनाकर व्यापक जनता तक पहुँचाते थे और टब्बा त्वरित स्पष्टीकरण प्रदान करते थे। इन विविध व्याख्यात्मक पद्धतियों का प्रयोग यह दर्शाता है कि जैन विद्वानों ने ज्ञान के प्रसार के लिए एक बहु-स्तरीय और समावेशी दृष्टिकोण अपनाया। यह केवल एक प्रकार की व्याख्या नहीं थी, बल्कि विद्वानों से लेकर सामान्य पाठकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक सुविचारित शैक्षणिक संरचना थी, जिससे जैन दर्शन की गहराई और व्यापकता सभी स्तरों पर समझी जा सके। यह दृष्टिकोण जैन विद्वानों समालोचना दृष्टि को दर्शाता है, जिसने धार्मिक ज्ञान को केवल एक विशिष्ट वर्ग तक सीमित न रखकर साहित्यिक उपागम बनाकर जनव्यापी बनाया।

राजस्थानी जैन टीका साहित्य का विकास विभिन्न शताब्दियों में अनेक प्रतिभाशाली विद्वानों और संतों के योगदान से हुआ। इन टीकाकारों ने न केवल जैन धर्म के सिद्धांतों को स्पष्ट किया, बल्कि अपने लेखन के माध्यम से तत्कालीन समाज, संस्कृति और इतिहास का भी महत्त्वपूर्ण चित्रण किया। जैन संस्कृति की दृष्टि से राजस्थान में अभूतपूर्व साहित्य लिखा गया। 5वीं शती में आचार्य सिद्धसेन ने जैन-दर्शन पर आधारित ग्रंथ ‘सम्मई सूत्र’ की रचना की। यह ग्रंथ राजस्थान का प्राकृत भाषा में रचित प्रथम ग्रंथ है। उद्योतन सूरि ने 835 विक्रम संवत में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ की रचना की। यद्यपि यह ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखा गया था,  इसमें ‘मरुभाषा’  अर्थात् राजस्थानी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मरुभाषा का यह प्रारंभिक उल्लेख यह दर्शाता है कि राजस्थानी भाषा का साहित्यिक उपयोग बहुत प्रारंभिक काल से ही हो रहा था और जैन विद्वान इसके विकास में अग्रदूत थे। यह भाषा और धर्म के बीच एक अन्योन्याश्रित संबंध स्थापित करता है, जहाँ धार्मिक उपदेशों के प्रसार ने स्थानीय भाषा के साहित्य का मानकीकरण किया।

इसी तरह षटखंडागम’ ग्रंथ पर आधारित आचार्य वीरसेन रचित ‘धवला’ नामक टीका अद्वितीय है। इसमें 72000 श्लोक संस्कृत और प्राकृत भाषा में है। आठवीं शती के जैन आचार्य हरिभद्रसूरि ने कथाउपदेशयोगदर्शन आदि से संबंधित 1444 ग्रंथों की रचना की तथा संस्कृत-प्राकृत में एक लाख पचास हजार श्लोक लिखे। प्रमुख ग्रंथों में समराइच्च कहा’, ‘शास्त्र वार्ता समुच्चय’, ‘धूर्ताख्यान’, ‘योग शतक’, ‘योग बिंदु, ‘योग दृष्टि समुच्चय’, ‘संबोध प्रकरण’ आदि उल्लेखनीय हैं। 10वीं शताब्दी में सिद्धर्षि नामक संत कवि ने भीनमाल में ‘उपमिति भव प्रपंच कहा’ नामक एक महत्वपूर्ण रूपक ग्रंथ की रचना की। इसके अतिरिक्त  जिनप्रभ सूरि द्वारा प्रणित ‘तीर्थकल्प’ और मुनि चन्द्र का ‘अमर अरित’ भी राजस्थानी जैन साहित्य की सुदृढ़ नींव निर्मित करती है।

यह साहित्य मुख्यतः धार्मिक और नैतिक होने के बावजूद, इसका व्यापक प्रभाव केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। इसमें तत्कालीन सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों को भी इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षित किया गया। यह दर्शाता है कि धार्मिक साहित्य केवल उपदेशात्मक नहीं होता, बल्कि अपने समय के जीवन का एक महत्वपूर्ण दर्पण भी बन जाता है, जिससे शोधकर्ताओं को बहुआयामी अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए, ‘जयधवला टीका’, ‘गद्य कथामृतक’ और ‘उत्तर पुराण’ जैसे ग्रंथों में प्राचीन राष्ट्रकूट या राठौड़ वंश के शासकों का इतिहास मिलता है। इसी प्रकार समराइच्च कहा में पृथ्वीराज चौहान कालीन प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था का उल्लेख है और ‘कुवलय माला’ में प्रतिहार शासक वत्सराज के शासन और समाज का वर्णन है। इस प्रकार जैन विद्वानों ने, अपने धार्मिक लेखन के माध्यम से, अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक जीवन का एक मूल्यवान अभिलेख प्रस्तुत किया जिससे यह साहित्य इस प्रकार धार्मिक और लौकिक ज्ञान की अनुपम छटा प्रस्तुत करता है।

12वीं शताब्दी से राजस्थानी जैन साहित्य में प्रबंध-काव्य, फागु और चौपाई जैसे नए काव्य रूप प्रमुखता से उपलब्ध होने लगे। इस काल में साहित्यिक प्रयोगशीलता बढ़ी, और जैन कवियों ने विभिन्न शैलियों में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। 13वीं शताब्दी में ‘जिनदत्त चौपई’ (सं.1354) जैसी हिंदी पद्य रचनाएँ भी मिलती हैं, जो इस काल में भाषायी विविधता को दर्शाती हैं। मध्यकाल (विक्रम संवत 1600 से 1900) राजस्थानी जैन साहित्य के लिए अत्यंत उर्वर काल था। इस युग में कुशललाभ, हीरकलश, समयसुंदर, हेमरत्न, जटमल, लब्धोदय, मोहनविजय, विनय-लाभ, दामोदर, लाभवर्धन, विनयप्रभ, भतिकुशल, राजविजय, कल्याण कलश, रामचंद, रिखसाधु, वीरविजय, उत्तमविजय और हुलासचंद जैसे शताधिक जैन कवियों ने महत्वपूर्ण रचनाएँ कीं। इन कृतियों का महत्त्व राजस्थानी साहित्य के लिए ये मूल्यवान हैं ।

पार्श्वचंद्र सूरि (16वीं शताब्दी) के एक प्रमुख जैन संत टीकाकार के रूप में ख्यातिप्राप्त हुए। उन्होंने ही सबसे पहले राजस्थानी गद्य में भाषा टीकाएँ लिखना प्रारंभ कीं, जिसका आगे चलकर बहुत प्रचार हुआ। यह एक युगांतरकारी कदम था जो जैन साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण  भाषायी और शैलीगत परिवर्तन को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति केवल अनुवाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह जटिल आगम ग्रंथों को सीधे और सरल राजस्थानी गद्य में व्याख्यायित करके ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने की एक सचेत पहल थी, जिससे मौखिक परंपराओं से लिखित, व्याख्यात्मक गद्य की ओर उन्मुख हुआ। इस नवाचार ने धार्मिक ज्ञान का लोकतंत्रीकरण किया तथा इसे विद्वानों की व्याख्या या काव्यात्मक प्रस्तुति के दायरे से निकालकर स्थानीय भाषा में स्पष्टीकरण के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाया, जिससे राजस्थानी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिला। इसी कालखंड में खरतरगच्छ के संत कवि महोपाध्याय पुण्यसागर ने वि. सं. 1604 में ‘सुबाहु संधि’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें 89 पद्य हैं। उनके शिष्य पद्मराज की ‘अभयकुमार चौपई’ एक प्रसिद्ध रचना है, जो वि.सं. 1650 में में लिखी गई थी।

इसी परम्परा में दौलतराम काजीवाल, टोडरमल, गुमानीराम, दीपचन्द्र कासलीवाल, जयचन्द्र शांघड़ा, सदासुख कासलीवाल का नाम जैन टीकाकारों में उल्लेखनीय हैं। ये 18वीं और 19वीं शताब्दी के प्रमुख विद्वान थे, जिन्होंने टीका लेखन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से अधिकांश हिंदी के विद्वान थे। 18वीं-19वीं शताब्दी में इन विद्वानों का उदय यह दर्शाता है कि जैन टीका लेखन परंपरा भाषायी रूप से गतिशील और अंतर-क्षेत्रीय थी। यह केवल राजस्थानी तक सीमित नहीं थी, बल्कि हिंदी के माध्यम से एक व्यापक बौद्धिक संवाद का हिस्सा थी। यह प्रवृत्ति जैन विद्वानों की बहुभाषी दक्षता और उनके ज्ञान को विभिन्न भाषायी समुदायों तक पहुँचाने की प्रतिबद्धता को उजागर करती है, जिससे जैन साहित्य की पहुँच और प्रभाव का विस्तार हुआ।

जैन विद्वानों ने न केवल धार्मिक ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं, बल्कि व्याकरण, छंद, अलंकार, काव्य, वैद्यक और गणित जैसे विविध धर्मेतर शास्त्रों पर भी महत्वपूर्ण समालोचनात्मक कार्य किया। व्याकरण-शास्त्र अंतर्गत 'बाल शिक्षा', 'उक्ति रत्नाकर', 'पंच-सन्धि बालावबोध', 'हेम व्याकरण भाषा टीका', 'सारस्वत बालावबोध'; छंद शास्त्र में 'पिंगल शिरोमणि', 'दुहा चन्द्रिका', 'राजस्थानी गीतों का छन्द ग्रंथ', 'वृत्त रत्नाकर बालावबोध' और अलंकार-शास्त्र सम्बंधित 'वाग्मट्टालंकार बालावबोध', 'विदग्ध मुखमंडन बालावबोध', 'रसिक प्रिया बालावबोध'; काव्य टीकाओं में 'भर्तृहरिशतक-भाषा टीका त्रय', 'अमरुशतक', 'लघुस्तव बालावबोध', 'किसन-रुक्मणी की टीकाएँ', 'धूर्ताख्यान कथासार', 'कादम्बरी-कथा सार'; वैद्यक-शास्त्र आधारित 'माधवनिदान टब्बा', 'सन्निपात कलिका टब्बाद्वय', 'पथ्यापथ्य टब्वा', 'वैद्य जीवन टब्बा', 'शतश्लोकी टब्बा' तथा गणित-शास्त्र पर 'लीलावती भाषा चौपाई', 'गणित सार चौपाई' आदि टीकाएँ राजस्थानी समालोचना की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

राजस्थानी जैन टीका साहित्य की विशालता और महत्व को देखते हुए, इसकी पांडुलिपियों का संरक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। राजस्थान में जैन शास्त्र भंडारों की संख्या सर्वाधिक है, जो लगभग सभी प्रमुख नगरों और कस्बों में पाए जाते हैं। इन भंडारों में संस्कृत, अपभ्रंश, हिंदी और राजस्थानी भाषाओं में सैकड़ों अज्ञात और दुर्लभ ग्रंथ प्राप्त हुए हैं। यद्यपि इन भंडारों की पूरी सूची अभी तक तैयार नहीं हो पाई है, अनुमान है कि राजस्थान में दिगंबर और श्वेतांबर शास्त्र भंडारों की संख्या 200 से अधिक हैं। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर एवं  जैन विश्व भारती, लाडनूं का योगदान स्मरणीय है। इसके अतिरिक्त जयपुर  और जैसलमेर के जैन शास्त्र भण्डार में  सैकड़ों अज्ञात ग्रंथ और पांडुलिपियाँ शोध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

जैन टीका साहित्य का महत्त्व एक साहित्यिक विधा के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार आंदोलन के रूप में भी स्थापित करता है। यह साहित्य अपने समय में एक प्रभावी माध्यम था जिसने जैन सिद्धांतों को जनसाधारण के नैतिक आचरण और जीवनशैली में एकीकृत किया। 'जन-शैलीऔर 'सरल, सरस, सहज एवं बोधगम्य शैलीको अपनाने का निर्णय एक सचेत प्रयास था ताकि जटिल सिद्धांतों को लोगों के दैनिक जीवन में आत्मसात किया जा सके। इस व्यावहारिक अनुप्रयोग और व्यापक पहुँच ने एक विशिष्ट 'जैन शैली' का विकास किया, जो स्पष्ट, नैतिक और सुलभ धार्मिक प्रवचन का पर्याय बन गई।

समग्रतः राजस्थानी भाषा में लिखित जैन टीका साहित्य एक असाधारण रूप से समृद्ध और बहुआयामी साहित्यिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इस साहित्य ने न केवल जैन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को संरक्षित और प्रसारित किया, बल्कि राजस्थानी भाषा के विकास, स्थानीय लोक संस्कृति के संरक्षण और तत्कालीन सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भों के दस्तावेजीकरण में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैन विद्वानों ने विविध काव्य रूपों जैसे-रास, चौपाई, फागु का उपयोग करके धार्मिक ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पार्श्वचंद्र सूरि जैसे अग्रदूतों द्वारा राजस्थानी गद्य में टीका लेखन की शुरुआत ने भाषायी नवाचार को प्रेरित किया और स्थानीय बोलियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में विकसित किया। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास, प्रशासन और सामाजिक जीवन के लिए ये ग्रन्थ अमूल्य प्राथमिक स्रोत प्रदान करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक लेखन भी अपने समय के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य का एक मूल्यवान अभिलेख बन सकता है।

आधार ग्रन्थ

1.      पं. अम्बालाल प्रे. शाह, जैन साहित्य का वृहद् इतिहास, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संसथान, वाराणसी, सं. 1969

2.      डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन शास्त्र भंडारों की ग्रन्थ सूची, भारतीय श्रुति-दर्शन केंद्र, जयपुर, सं. 1957

3.      डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन संत, श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, महावीरजी, जयपुर, सं. 1967

4.      डॉ. नरेन्द्र भानावत (सं.), जैन संस्कृति और राजस्थान, जिनवाणी विशेषांक, सम्यग्ज्ञान प्रचारक में डल, जयपुर, सं. 1975

5.   डॉ. नरेन्द्र भानावत, जैन दर्शन तथा साहित्य का भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा पर प्रभाव, श्री जिनदत्तसूरि में डल, दादावाडी, अजमेर, सं.1980

6.      नाथूराम प्रेमी, जैन साहित्य और इतिहास, हिंदी ग्रन्थ रत्नाकर लिमिटेड, बम्बई, सं. 1956

7.      नाहटा, कासलीवाल, भानावत एवं सेठिया, राजस्थान का जैन साहित्य, प्राकृत भारती, जयपुर, सं. 1977

8.      डॉ. मनमोहनस्वरूप माथुर, राजस्थानी जैन साहित्य, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, सं.1999

9.      डॉ. हीरालाल जैन, भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान, मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद्, भोपाल, सं. 1962


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कवित्व


'मधुमती' फरवरी-2026 में प्रकाशित 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कवित्व

भारतीय साहित्य परम्परा में अनेक ऎसे साहित्यकार हैं, जिनकी प्रतिभा बहुमुखी रही है किन्तु किसी एक पक्ष के मूल्यांकन के आधार पर विख्यात हो गए हैं । उक्त क्रम में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम उल्लेखनीय हैं । आचार्य शुक्ल आलोचना विधा के आधार स्तंभ हैं तथा एक आलोचक के रूप में विख्यात है ।काव्यके प्रति आचार्य शुक्ल की आलोचना दृष्टि परवर्ती रचनाकारों के लिए सदैव आदर्श रही। आचार्य शुक्ल एक आलोचक तो हैं ही वरन एक कवि हृदय भी हैं ।  आलोचना विधा के महानायक आचार्य शुक्ल का कवि-हृदय भी उन्नत कोटि का रहा है। यद्यपि वे आलोचक तो हैं ही, तथापि उनका विपुल काव्य उनके कवि होने का प्रमाण  हैं। उनके विपुल काव्य का संकलन मधुस्रोतनामक काव्य-संग्रह में है । मधुस्रोतमें आचार्य शुक्ल रचित 31 कविताओं का संकलन है। जिसका प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा  द्वारा 1971 .(वि.सं.2028) में किया गया। 1901 . से 1929 . तक लिखित ये कविताएँ तत्कालीन प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं- सरस्वती, आनंदकादंबिनी, बालप्रभाकर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, लक्ष्मी, इन्दु, बाल हितैषी, माधुरी, सुधा आदि में प्रकाशित हुई।  मधुस्रोतनामक काव्य-संग्रह की सम्यक् विवेचन आचार्य शुक्ल की काव्य-प्रतिभा का निदर्शन, परवर्ती आलोचक का बीजग्रंथ और समय की अनुगूँज में प्रखर व्यक्तित्व का प्रमाण देता है। प्रस्तुत शोध पत्र में समीक्षा पद्धति के आधार पर मधुस्रोत नामक काव्यसंकलन का विश्लेषण करते हुए आचार्य शुक्ल के कवित्व का मूल्यांकन किया जा रहा है । 
 
मधुस्रोतमें आचार्य शुक्ल रचित 31 कविताओं का संकलन है। जिसका प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 1971 .(वि.सं.2028) में किया गया। 1901 . से 1929. तक लिखित ये कविताएँ तत्कालीन प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं- सरस्वती, आनंदकादंबिनी, बालप्रभाकर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, लक्ष्मी, इन्दु, बाल हितैषी, माधुरी, सुधा आदि में प्रकाशित हुई। ब्रज और खड़ी बोली में रचित इन कविताओं में अपने समय की साहित्यिक चेतना का निर्वाह है, वहीं ब्रज से खड़ी बोली का काव्य-भाषा के रूप में विकास का प्रमाण भी है। 1904. में रचितबसंतमें ठेठ ब्रजभाषा का संस्कार है, तो 1913 . में प्रकाशितविरह सप्तकमें ब्रज और खड़ी बोली का मिश्रित रूप प्रकट होता है। इसके बाद की रचनाओं में खड़ी बोली का प्रयोग है। 1929 . में रचितमधुस्रोतमें परिष्कृत खड़ी बोली है, जिसे आधुनिक काव्यभाषा का रूप माना जा सकता है।

            आचार्य शुक्ल ने कविता कोहृदय की मुक्तावस्थाकहा है।कविता क्या है?’ निबंध में वे कहते हैं- “ जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।”1 कविता के मर्म को उद्घाटित करने वाली इन पंक्तियों में आचार्य शुक्ल की आलोचक-दृष्टि प्रकट होती है, वहीं इसका रूप-विधानमधुस्रोतमें दिखाई पड़ता है।मधुस्रोतमें संकलित कविताओं का वर्गीकरण वण्र्य-विषय के आधार पर निम्नानुसार किया जा सकता है-

1.         प्रकृति प्रेम-         मनोहर छटा’, ‘प्रेम-प्रताप’, ‘विरह-सप्तक’, ‘प्रकृति-प्रबोध’, ‘हर्षोद्धार’,
                                    आमंत्रण’, ‘वसन्त-पथिक’, ‘रूपमय हृदयआदि।
2.         लोक-संस्कृति-   हृदय का मधुर भार’, ‘शिशिर-पथिक’, ‘मधुस्रोतआदि।
3.         कर्म-सौन्दर्य-       गोस्वामीजी और हिन्दू जाति’, ‘आशा और उद्योग’, ‘पाखंड-प्रतिषेधआदि।
4.         राष्ट्र प्रेम-            भारत और वसन्त’, ‘रानी दुर्गावती’, ‘भारत’, ‘फूट’, ‘देशद्रोही को दुत्कार
                                    आदि।
5.         श्रद्धा भाव-         भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’, ‘भारतेन्दु जयन्ती’, ‘श्री युत बाबू देवकीनंदन खत्री का
                                    वियोग’, याचना आदि।
6.         विविध-             बाल विनय’, ‘विनती’, ‘अन्योक्तियाँ’’, ‘वन्दना’, ‘हमारी हिन्दी’, ‘सुमन-
                                    संगीत’, झलक 1-2-3 इत्यादि।
संकलित कविताओं के वर्ण्य-विषय पर टिप्पणी करते हुए डॉ.रामचंद्र तिवारी ने लिखा- “प्रकृति के रम्य चित्रों से अलग अन्य कविताओं का महत्त्व इस दृष्टि से भी मान्य है कि उनमें शुक्लजी के समय के इतिहास की अनुगूँजे सुनाई पड़ती हैं और उनके प्रति उनकी निजी प्रतिक्रियाओं की झलक भी मिलती है।”2 इससे स्पष्ट होता है कि आचार्य शुक्ल की कविताओं में भारतेन्दु युगीन प्रवृत्ति- प्रकृति-प्रेम, ग्राम्य-संस्कृति, ब्रजभाषा प्रयोग;द्विवेदी- युगीन प्रवृत्ति- राष्ट्र प्रेम, इतिवृत्तात्मकता, खड़ी बोली प्रयोग और परवर्ती छायावादी काव्य-प्रवृत्ति- परिनिष्ठित काव्य भाषा का रचनागत निर्वाह स्पष्टतः प्रकट होता है। इसी दृष्टि से आचार्य शुक्ल की रचनाओं का काव्य संग्रहमुधस्रोतके साहित्यिक सौन्दर्य का अवगाहन करना समीचीन होगा।

प्रकृति-प्रेमकवियों का सदैव प्रिय विषय रहा है। आचार्य शुक्ल की कविताओं में प्रकृति की रम्य छटा सहज प्रसन्न शैली में व्यक्त हुई है। रीतिकालीन काव्य में प्रकृति उद्दीपन रूप में प्रकट हुई, परन्तु आचार्य शुक्ल ने इसे आलंबन रूप में ही ग्रहण किया। वे प्रकृति की सत्ता को स्वतंत्र मानते थे। प्रकृति के शुद्ध रूप की उपासना के कारण उन्होंने आरोपित भावों को स्वीकार नहीं किया।मनोहर छटा’, ‘आमंत्रण’, ‘रूपमय हृदयआदि कविताओं में प्रकृति का रम्य चित्रण इसी रूप में बिम्बित है। प्रकृति के आलम्बन रूप का दृश्य-विधान इन पंक्तियों में अवलोकनीय हैं-

नव दल-गुंथित पुष्प हास यह!
शशि रेख सुस्मित विभास यह!
नभ चुवित नग निविड़-नीलिमा उठी अवनि उर की उमंग सी।
कलित विरल घन पटल-दिगंचल-प्रभा पुलकमय राग-रंग सी।3
                                                            (रूपमय हृदय)

इसी प्रकारमनोहर छटामें प्रकृति को चित्रकार की गति के रूप में अंकित कर उसमें पल्लवित जीवन और सूर्य, चंद्र, नभ, जल, पर्वत आदि की भूमिका को भी चित्रित करते हुए कवि ने कहा-

नीचे पर्वत थली रम्य रसिकन मन मोहन ।
ऊपर निर्मल चन्द्र नवल आभायुत सोहत।।4
(मनोहर छटा)

            प्राकृतिक सुषमा के साथ लोक संस्कृति की शाश्वत सौन्दर्य कवि को मुग्ध करता है। ग्राम्य-जीवन में उसे सनातन संस्कृति के प्राण दिखाई देते हैं, जहाँ समस्त चराचर जगत के प्रति स्निग्ध स्नेह भाव है। नगर से दूर, कृत्रिम सभ्यता से विरत ग्राम्य-जीवन के खुले द्वार का रेखांकन कवि को आकर्षित करता है। हरे-भरे खेत, पेड़-पौधों पर लहराते पत्ते, गाँवों के खपरैल वाले घर और श्वेत छज्जे आदि भारतीय ग्राम्य-जीवन के बिम्ब हैं। यथा-

नगर से दूर कुछ गाँव की सी बस्ती एक,
हरे भरे खेतों के समीप अति अभिराम ।
जहाँ पत्राजाल अंतराल से झलकते हैं,
लाल खपरैल, श्वेत छज्जो के सँवारें धाम।।5
(हृदय का मधुर भार)

            ग्राम्य-संस्कृति में कवि का मन इतना रम गया है कि वहाँ की सुषमा उन्हें देवलोक के समान प्रतीत होती है। यहाँ प्रकृति का खुला प्रसार है, जहाँ पशु, पक्षी, मानव सब एकात्म भाव से रहते हैं।ग्रामको खुला स्वप्न मानते हुए कवि मनुष्य जीवन में इसे मधु के समान मानकर प्रेरणा लेने का भी आह्वान करता है, यथा-

कहीं हृदय अपना समेटकर,
कोश-कीट बन जाय न तू नर।
इसी हेतु अविरल मधुधारा,
द्वार-द्वार पर टकराती है।
$  $  $
तुम भी ग्राम! खुले सपने हो,
रूप रंग में वही बने हो।6
(मधुस्रोत)

आचार्य शुक्ल ने अपने निबंधउत्साहमें कर्म सौन्दर्य के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- “कर्म में आनन्द अनुभव करने वालों ही का नाम कर्मण्य है। धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनंद भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फल-स्वरूप लगते है। अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और तुष्टि होती है, वही लोकोपकारी कर्म-वीर का सच्चा सुख है।”7वस्तुतः कर्म सौन्दर्य वह बीज है जोक्षात्रधर्मकी प्रतिष्ठा करता है। आचार्य शुक्ल ने अपने युग की ध्वनि को पहचान लिया था और स्वाधीनता आन्दोलन में रचनाकार की भूमिका को भी निर्धारित कर दिया।

            भारत और बसंतमें वंदे मातरम् का शंखनाद, ‘रानी दुर्गावतीमें नारी के शौर्यपूर्ण चरित्र का गुणगान, ‘देशद्रोही को दुत्कारमें अभिव्यक्त विचार स्वाधीनता आन्दोलन की छाया में पल्लवित हुए। राष्ट्रधर्म से विमुख लोगों को कवि ने अपने हृदय से ही निकालने की घोषणा कर दी है-

जा दूर हो अधम सन्मुख से हमारे,
हैं पाप-पुंज तब पूरित अंग सारे,
जो देश से न हट तो हृद-देश से ही,
देते निकाल हम आज तुझे भले ही।8
(देशद्रोही को दुत्कार)

            आचार्य शुक्ल ने राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मानकर अन्याय का प्रतिकार करने का आह्वान किया। अपने युग की पदचाप अनुसार उन्होंने निष्काम भाव से आगे बढ़ने का निश्चय किया। शत्रु चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, कवि अपना उद्योग छोड़ने को तैयार नहीं। अन्यायी को दण्ड देने का भाव प्रकट करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

देश, दुःख अपमान जाति का बदला मैं अवश्य लूँगा।
अन्यायी के घोर पाप का, दण्ड उसे अवश्य दूँगा ।
यद्यपि मैं हूँ एक अकेला, बैरी की सेना भारी ।
पर उद्योग नहीं छोडूँगा, जगदीश्वर हैं सहकारी।।9
(आशा और उद्योग)

            तुलसी की भक्ति को स्पष्ट करते हुए आचार्य शुक्ल ने लिखा- “वह केवल व्यक्तिगत एकांत साधना के रूप में नहीं है, व्यवहार क्षेत्र के भीतर लोक-मंगल की प्रेरणा करने वाली है।”10 वस्तुतः शील-निरूपण की दृष्टि से उन्होंने तुलसी को हिन्दी का श्रेष्ठ कवि माना। आचार्य शुक्ल नेलोगमंगल की साधनावस्थाको आगे बढ़ाया। तुलसी ने प्रभु श्री राम के लोकरक्षक रूप का चित्रण किया तो आचार्य शुक्ल ने भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हुए नैराश्य के वातावरण में प्रभु के लोक रक्षक  रूप का वर्णन किया-

जिस दंडक वन में प्रभु  की, को दंड-चंड-ध्वनि भारी।
सुनकर कभी हुए थे कंपित, निशिचर अत्याचारी।
वहीं शक्ति वह झलक उठी, झंकार सहित भयहारी।
दहल उठा अन्याय, उठो फिर मरती जाति हमारी ।।11
(गोस्वामी और हिन्दू जाति)


आचार्य शुक्ल ने काव्य में रहस्यवाद को उचित नहीं माना। काव्य दृष्टि और रहस्यवाद के संबंध में उनके विचार हैं- “अब विचारने की बात है कि किसी अगोचर और अज्ञात के प्रेम में आँसुओं की आकाश-गंगा में तैरने, हृदय की नसों का सितार बजाने, प्रियतम असीम के संग नग्न प्रलय-सा ताण्डव मरने या मुँदे नयन-पलकों के भीतर किसी रहस्य का सुखमय चित्र देखने को ही- ‘भीतक तो कोई हर्ज न था- कविता कहना, कहाँ तक ठीक है? छोटे-छोटे कनकौवों पर भला कविता कब तक टिक सकती है? असीम और अनन्त की भावना के लिए अज्ञात  या अव्यक्त की ओर झूठे इशारे करने की कोई जरूरत नही।”12
            यद्यपिकाव्य में रहस्यवादपुस्तिका 1929 . में प्रकाशित हुई, किन्तु उनके काव्य में रहस्यवाद पर आलोचनात्मक आक्रमण पहले ही आ गया था।रूपमय हृदयमें ज्ञात के  महत्त्व को स्थापित किया तोहृदय के मधुर भारमेंरहस्यके वर्णन का विरोध किया। इसके बादपाखंड-प्रतिषेधमें काव्य में रहस्यवाद के विरूद्ध आक्रामक प्रहार किया और तत्कालीन छायावादी कवियों पर पैनी शाखा में कटाक्ष भी किया-
काव्यमेंरहस्यकोईवादहै न ऐसा, जिसे,
लेकरनिरालाकोई पंथ ही खड़ा करे।
यह तो परोक्ष रूचि-रंग की ही झाई है, जो
पड़ती है व्यक्त में अव्यक्त-बिम्बता धरे ।।13
(पाखंड-प्रतिषेध)

मर्यादावादी आचार्य शुक्ल ने इसी कविता में विलियम ब्लेक केकल्पनावादपर भी कठोर टिप्पणी करते हुएआंग्ल की भूमि बीच ब्लेक ने जो ढोंग रचारहस्य-कल्पना का विरोध किया। यद्यपि यह अलग विषय है किसुधापत्रिका में प्रकाशन के बाद ठीक अगले अंक मार्च, 1928 . में पं.मातादीन शुक्ल ने उक्त कविता के विरोध मेंपाखंड-परिच्छेदकविता लिखी, जिसमें रहस्यवाद को महिमा मंडित किया गया।निरालाने भी अपने व्यंग्य-बाणों से आचार्य शुक्ल को निशाना बनाया। यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि आचार्य शुक्ल रहस्यवादी कविताओं में भाव और व्यंजना की अत्यधिक कृत्रिमता से खिन्न थे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रत्यक्ष संघर्ष में बाधा मानते थे। उनकी रहस्यवाद के विषय में कठोर टिप्पणियों को इसी भाव से देखना चाहिए, क्योंकि छायावादी कवियों से उनके संबंध अत्यधिक मधुर थे।

आचार्य शुक्ल की आलोचना भाषा में शब्द, नाद और बिम्ब का अपूर्व संयोजन दिखाई देता है। यह उनकी काव्यात्मक भाषा से प्रभावित प्रतीत होता है। इस संदर्भ में डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी ने आचार्य शुक्ल की भाषा का विश्लेषण करते हुए लिखा- “सावधान शब्द-प्रयोग, नाद-सौंदर्य और बिम्ब-विधानसाधारणतः काव्यभाषा के ये गुण रामचंद्र शुक्ल की आलोचना भाषा में पाए जाते हैं। यथा, एक उदाहरण द्रष्टव्य है- “पर्वतों की दरी कंदराओं में, प्रभात के प्रफुल्ल पद्मजाल में, छिटकी चांदनी में, खिली कुमुदिनी में हमारी आँखें कालिदास, भवभूति आदि की आँखों में जा मिलती है। पलाश, इंगुटी, अंकोट के वनों में अब भी खड़े हैं, सरोवरों में कमल अब भी खिलते हैं, तालाबों में कुमुदिनी अब भी चाँदनी के साथ हँसती है, वनीर शाखाएँ अब भी झुककर तीर का नीर चूमती है, पर हमारी आँखें उनकी ओर भूलकर भी नहीं जाती, हमारे हृदय से मानो उनका कोई लगाव ही नहीं रह गया।”14 उपर्युक्त पंक्तियों के भाव आचार्य शुक्ल कीमधुस्रोतकविता में इस प्रकार ढले-

दिक् दिक् की आँखें मतवाली
धरती हैं किंशुक की लाली
जहाँ जहाँ ये रूप खड़े हैं
जहाँ जहाँ ये दृश्य अड़े हैं
कालिदास, भवभूति आदि के
हृदय वहाँ पर मिल जाते हैं।15
(मधुस्रोत)

हिन्दी की आरंभिक खड़ी बोली में भाषा सहनता एवं सुबोध प्रस्तुति में भी बिम्ब-विधान आकर्षित करता है। प्रकृति की रमणीयता का चाक्षुष-बिम्बमय वर्णन द्रष्टव्य है-

भूरी, हरी घास आस पास, फूली सरसों हैं,
पीली पीली बिन्दियों का चारों ओर है पसार;
कुछ दूर विरल, सघन फिर, और आगे,
एक रंग मिला चला गया पीत पारावर ।16
(हृदय का मधुर भार)

आचार्य शुक्ल की कविताओं में जहाँ एक ओर  प्रकृति-प्रेम, ग्राम्य-संस्कृति, ब्रजभाषा प्रयोग है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्र प्रेम, इतिवृत्तात्मकता, खड़ी बोली का प्रयोग देखने को मिलता है । आचार्य शुक्ल का काव्य न केवल परिनिष्ठित काव्य भाषा का रचनागत निर्वाह मात्र है  अपितु लोकमंगल की साधना, शब्द, नाद और बिम्ब का अपूर्व संयोजन भी है । उनके काव्य की विशेषता यह है कि हिन्दी कविता को संस्कृत काव्य-परम्परा के अनावश्यक निर्वाह और पाश्चात्य शैली के अंधानुकरण से मुक्त करने का प्रयास किया। हिन्दी में मौलिक लेखन का पंथ-निर्मित कर आगे की राह को सुगम किया।मधुस्रोतका भाव एवं कला सौन्दर्य निर्धारित प्रतिमानों से भिन्न तत्कालीन आवश्यकता के परिप्रेक्ष्य में विवेचनीय है। उक्त निष्कर्ष से निगमित होता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल का न केवल एक आलोचक है वरन् उन्नत कोटि के कवि भी हैं 


संदर्भ-ग्रंथ -
1.         आचार्य रामचंद्र शुक्लः चिन्तामणि भाग प्रथम, अशोक प्रकाशन, दिल्ली-6, सं.2004 पृ.सं.70
2.         रामचंद्र तिवारीः भारतीय साहित्य के निर्माता- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं. 2005, पृ.सं.29
3.         रामचंद्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि., पृ.57
4.         वही, पृ.सं.23
5.         वही, पृ.सं.30
6.         वही, पृ.सं.5
7.         आचार्य रामचंद्र शुक्लः चिन्तामणि भाग प्रथम, अशोक प्रकाशन, दिल्ली-6, सं.2004, पृ.सं.8
8.         रामचंद्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि., पृ.सं.71
9.         वही, पृ.सं.76
10.       उद्धृत, रामचंद्र तिवारीः भारतीय साहित्य के निर्माता- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं.2005, पृ.सं.29
11.       रामचंद्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 19, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि., पृ.सं.98
12.       नामवर सिंहः रामचंद्र शुक्ल संचयन, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं.2017 पृ.सं.56-57
13.       रामचन्द्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि0, पृ.सं.93
14.       रामस्वरूप चतुर्वेदीः आचार्य शुक्ल की आलोचना भाषा, आलेख, आलोचना अप्रेल-जून 1985, पृ.सं.115
15.       रामचन्द्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि.,पृ.सं.5
16.       वही, पृ.सं.30
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नासिरा शर्मा के उपन्यासों में संवेदना का धरातल

 

नासिरा शर्मा के उपन्यासों में संवेदना का धरातल

'विविधा' जनवरी-मार्च,2025 में प्रकाशित

साहित्य संसार के प्रति मानसिक प्रक्रिया अर्थात् विचारों व भावों की अभिव्यक्ति है। यह ‘हित का साधन’ भी करता है, अतः संरक्षणीय भी है। इसे समाज का उत्पादन भी कहा जाता है, जिससे विशाल मानव जाति की आत्मा का स्पन्दन ध्वनित होता है। साहित्य जीवन की व्याख्या भी करता है, इसी कारण उसमें जीवन देने की शक्ति भी आती है। इस प्रकार साहित्य व समाज का अन्योन्याश्रयत्व चिरकाल से रहा है। स्वप्निल श्रीवास्तव के अनुसार- “आज का यथार्थ मारक और अविश्वसनीय है। वह फैंटेसी के आगे का यथार्थ है। आज के यथार्थ का चेहरा रक्तरंजित और अमानवीय है। यथार्थ हमारे सामने विस्मयकारी दृश्य प्रस्तुत करता है, जो कल्पनातीत है।”[1] विस्मयकारी यथार्थ का जो दृश्य नई सदी के दो दशकों में दिखाई देता है, वह उपनिवेशवादी प्रभाव का परिणाम है। फलतः जो कारक हमारे समक्ष उपस्थित हैं, उनमें प्रमुख हैं- वैश्वीकरण, मुक्तबाजारवाद, विकृत उभोक्तावाद, राजनीतिक अधिनायकवाद, मूल्यहीनता, सांस्कृतिक संघर्ष, भ्रष्ट आचार, हिंसक वर्चस्व आदि। यद्यपि ये कारक वैश्विक हैं, किन्तु भारतीय मन इससे ज्यादा प्रभावित है।

नासिरा शर्मा हिंदी कथा साहित्य की एक सशक्त हस्ताक्षर है।  उनकी कृतियों में समाज और संस्कृति का कैनवास विराट रूप में मिलता है। उनके उपन्यासों में रिश्तों की दास्तान, लुप्त होती संवेदनाओं की पड़ताल, वैश्विक परिदृश्य में इंसानियत तथा समकालीन परिवेश में संघर्षशील समाज का बहुआयामी पक्ष बखूबी उभरता है। उन्होंने बाजार और तकनीक के मकड़जाल में फँसी युवा पीढ़ी को भी सावचेत करने का प्रयास किया है। उनके प्रत्येक उपन्यास में समाज के विविध पक्षों को लेकर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं। ‘सात नदियाँ: एक समंदर’ ईरानी क्रांति पर लिखा गया दुनिया का पहला उपन्यास है। ‘शाल्मली’ स्वतंत्रता के बाद महिला विमर्श की चेतना को इंगित करने वाला उपन्यास है तो ‘ठीकरे की मंगनी’ एक संघर्षशील युवती की दास्तान है। ‘जिंदा मुहावरे’ में भारत विभाजन का दर्द छलकता है। ‘अक्षयवट’ में युवा पीढ़ी का संघर्ष दिखाई देता है, वहीं ‘कुइयां जान’ में शुष्क होती संवेदनाओं का प्रकटीकरण है। ‘जीरो रोड’ में देश के सामयिक यथार्थ का अंकन है तो ‘पारिजात’ में संस्कृति और परंपरा में नए सूत्र को खोजने की कोशिश है। ‘अजनबी जजीरा’ में इराक की दारुण स्थितियों का अंकन है। ‘कागज के नाव में बेरोजगारी और पलायन की विसंगतियों को उजागर करने की कोशिश है। ‘शब्द पखेरू’ में बाजार का परिदृश्य तो ‘दूसरी जन्नत’ में आधुनिकता की तेज रफ्तार पर फिसलती जिंदगी का सजीव चित्रण है। इस प्रकार मानव जीवन के समग्र पक्षों को नासिरा शर्मा ने अपने उपन्यासों की विषय-सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया है।

भारत ने अथक संघर्ष के उपरांत 15 अगस्त, 1947 को आजादी तो प्राप्त कर ली, किन्तु विभाजन की त्रासदी के दंश के आघात को भी झेला। जहाँ धर्म और संप्रदाय के आधार पर मानवता का विभाजन हुआ और मनुष्यता के पतन का रक्तस्नात् चेहरा भी प्रकट हुआ। हजारों लोग बेघर, दंगे, अकाल मृत्यु, विध्वंस, द्वेष के दृश्य के साथ संवेदना का अवसान भी देखने को मिला। नासिरा शर्मा ने उन विभीषिकाओं का केवल ब्यौरा प्रस्तुत न कर उस मानसिकता को नंगा किया है, जो संकटकालीन स्थितियों में भी सब कुछ छीनने और मौके का फायदा उठाने की मनोवृत्ति से ग्रस्त है। नासिरा शर्मा का 'जिंदा मुहावरे' उपन्यास भारत विभाजन की त्रासदी के आधार पर लिखा गया है। धर्म के नाम पर हुए कत्लेआम और इंसानियत के मर जाने का वीभत्स चित्रण करता हुआ यह उपन्यास हिंदी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। फैजाबाद गाँव में रहने वाला रहीमुद्दीन का छोटा बेटा निजाम उपन्यास का केंद्रीय पात्र है, वह पाकिस्तान का ख्वाब देखते हुए करांची चला जाता है और सोचता है "जहाँ जात है अब वही हमारे वतन कहल इहे। नया ही सही अपना तो होइहे। जहां रोज-रोज ओकी खुद्दारी को कोई ललकारिए तो नाहीं।"[2] परंतु पाकिस्तान जाकर वह अपनी जन्मभूमि की गंध के लिए तड़पता है, क्योंकि उसके माँ-बाप, भाई-बहन तो अपनी पैतृक जमीन भारत में ही हैं। वह भारत लौटने के लिए लालायित रहता है, परंतु सियासत उसे ऐसा नहीं करने देती। उसकी तड़प मर्म को हिला देती है। इससे यह प्रकट होता है कि विभाजन का दर्द हमारे समय का घातक सच है।

वैश्विक धरातल पर यदि हम अवलोकन करें तो किसी भी समाज में महिलाओं को समान स्तर प्राप्त नहीं हुआ। पुरुष की परंपरागत मानसिकता में नारी की संघर्ष गाथा है। यह विश्व के प्रत्येक देश में देखी जा सकती है। ईरान की क्रांति पर आधारित उपन्यास ‘सात नदियां: एक समंदर’ में अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठती स्त्रियों की संघर्ष गाथा है। इस उपन्यास की सारी प्रमुख पात्र स्त्रियां हैं, जहां खुमेनी  शासन के आने पर उनकी उम्मीदें टूट जाती है। शासन के विरोध में बोलने का नतीजा यह होता है कि पहले तो वह अपने वैवाहिक जीवन से दूर हो जाती है और तैयब अपनी कलम को खुमेनी शासन के विरुद्ध चलाती है तो अंततः शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देते हुए उसे गोली से उड़ा दिया जाता है।  यहां नासिरा शर्मा लिखती है, “ईरान की क्रांति पर लिखा मेरा यह उपन्यास उन अनुभवों का लेखा-जोखा है जो पिछले नौ वर्ष में मुझे ईरान की धरती पर हुए इन नौ वर्षों के पीछे लगभग नब्बे वर्षों का अतीत सांस ले रहा था जिसमें 5000 वर्ष पुराने ईरान की सभ्यता संस्कृति का वैभव अपनी ऐतिहासिक गाथा गुनगुना रहा था।“[3] वास्तव में युद्ध हो या क्रांति, स्त्रियों का संघर्ष अपने लिए कुछ पा न सका।

आर्थिक नाकाबंदी में इराक की जनता जिस गरीबी और महंगाई से जूझ रही थी, उसी में अमेरिकन बमबारी, सद्दाम का तख्ता पलट और आम आदमी किस तरह सियासी खबरों के पीछे छुप जाता है उसका सुख-दुख ‘अजनबी जजीरा’ में प्रकट हुआ है। युद्ध ग्रस्त विभीषिका में औरतों की स्थिति का सत्य और भी भीषण है। लेखिका ने इस सत्य को इस उपन्यास की पात्र समीरा के मुँह से कहलवाया है, "युद्धग्रस्त समाज की कठिनाइयाँ कितनी नई परेशानियों से हमारा परिचय कराती है, तब पेट के आगे बदन बेचना यहां तक की अपने बच्चे तक को बेचना मुश्किल काम नहीं लगता, बल्कि मौत को नजदीक पाकर जीने की तमन्ना ज्यादा बढ़ जाती है। मुझे ही देखो जवान बेटियों की भूख के आगे मैं अपनी भूख को दबा नहीं पाती..।"[4]  समीरा का यह कथन मानवीय त्रासदी की पराकाष्ठा है। जब वह कहती है, “जिस्मफरोशी से मुझे हालात ने महफूज रखा वरना वह भी मुझे करना पड़ता.. हालात अच्छाई और बुराई के मायने कैसे बदल कर रख देते हैं.. पेट भरे लोगों के लिए उंगली उठाना कितना आसान होता है मगर भूखे के लिए रोटी हर फलसफे से बढ़कर अहम हो उठती है।“[5] सभ्य कहलाने वाले इस आधुनिक विश्व में विध्वंस का यह मूर्त रूप पाठकों को स्तब्ध कर देता है। ऐसे परिदृश्य में मान्यता तारतार होती है और स्त्री विमर्श के समूचे निहित अर्थ बदल जाते हैं।

पेट की आग व्यक्ति को कुछ भी करने कोई वश कर देती है उसे समय उसके सामने नैतिकता का मायने बदल जाते हैं। विदेशी सेना के आक्रमण और बम हमले से इराक पूरी तरह नष्ट हो गया है। फौजी शासन के तले लोगों को जरूरत की चीजों के लिए घरेलू सामान बेचना पड़ रहा है। अधिकांश इराक के समर्थक मारे जा चुके हैं। ऐसे भीषण समय में एक बूढी औरत जो अपने दो छोटे नवासों की एकमात्र संरक्षक है। बच्चों की भूख को शांत करने के लिए बाजार में दो रोटी छुपाने के आरोप पकड़ी जाती है। वह अपना दुखड़ा समीरा के समक्ष कहती है, "मेरे दो नवासे हैं, कल से भूखे हैं। चारा क्या था मेरे पास?"[6] यह सच मानवता के नाम पर कलंक है।

धर्म के नाम पर हमारा सामाजिक ताना-बाना आज के समय में छिन्न-भिन्न दिखाई देता है। 'जीरो रोड' उपन्यास में धार्मिक कट्टरता के नाम पर इंसानियत को तबाह करने का दृश्य दिखाई देता है। कई ऐसे दृष्टांत है जिसके माध्यम से पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है। उपन्यास का पात्र मुन्ना हाफिज का घर राम प्रसाद व जगत रामजी  के मोहल्ले में है। वह चौक में मजहबी किताबों की दुकान लगाकर परिवार का पालन पोषण करता है। अपनी ईमानदारी व उदार दृष्टिकोण के कारण अपने ही मजहब के कट्टर व संकुचित मानसिकता वाले लोगों को चुभने लगता है। उनके उकसाने पर वह तबलीगी जमात वालों को जवाब देते हुए कहता है, "कान खोल कर सुन लें आप सभी साहेबान! मैं किसी के ना खिलाफ कोई काम करता हूँ ना किसी मजहब की तब्लीग पर। मैं गैर मुसलमान को गाली नहीं देता हूँ, बल्कि उन बातों की शिकायत करता हूँ, जो हमें खलती है, जिससे हमें नुकसान पहुँचता है।"[7] उसके इस उदार मनोवृति का परिणाम यह होता है कि एक दिन अचानक रात के दो-तीन बजे उसकी दुकान में आग लगा दी जाती है। लगभग दो लाख की किताबें जलकर खाक हो जाती हैं। इस घटना को लेकर उनके ही जमात के लोग तरह-तरह के आशंकाएं व्यक्त करते हैं और कोशिश करते हैं कि इसे सांप्रदायिक रूप दिया जाए।

जब भी दुनिया में सांस्कृतिक एकता के इतिहास की बात होती है तो भारत का जिक्र होना लाजमी ही है। यहाँ के संस्कारों में दो संस्कृतियाँ यूँ घुली-मिली हैं मानो दोनों एक दूसरे की पूरक हों। ‘पारिजात’ उपन्यास नासिरा शर्मा की एक ऐसी ही कृति है, जो भारत की समावेशी संस्कृति को परत-दर-परत खोलती और मानवीय रिश्तों की बुनावट को भाषा के एहसासों से पाठक के अंदर जीवंत करती है। ‘पारिजात’ आज की पीढ़ी के सपनों, उसके निर्णय, माता-पिता के प्रेम, स्त्री की भारतीय और पाश्चात्य छवि के साथ गुरु-शिष्य के संबंधों और एक समुदाय विशेष के प्रति पाश्चात्य पूर्वाग्रह से घायल समाज जैसी संवेदनाओं को एक नए फलक में तर्कों के साथ बयां करता है, वहीं ‘अक्षयवट’ उपन्यास में लेखिका ने इलाहाबाद से जुड़ी अपनी स्मृतियों के बहाने मानवीय संवेदना में आए बदलाव को रेखांकित किया है। इस उपन्यास के केंद्र में इलाहाबाद शहर के पत्थर गली, नखास कोना, रानी मुंडी, दरियाबंद, हिम्मत गंडा, बताशा वाली गली आदि भागों में रहने वाले लोगों की जिंदगी को दर्शाया है।

यहाँ हम देखते हैं कि उपभोक्ता संस्कृति ने उत्सवों में छिपे सार तत्त्वों को सोख लिया है। स्वयं लेखिका कहती है, "परंपरा के निर्वाह के लिए रावण के पुतले में आग लगाना और बुराई को सदा के लिए मिटा देने का संकल्प हर दिल में होता, मगर व्यावहारिक रूप से मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनने की जिज्ञासा किसी में ना जगती। क्योंकि त्याग करने पर आज के दौर में कोई राजी ना था, उल्टे त्याग की जगह पैसा कमाने की नई-नई तरकीबों में सबका मन मस्तिष्क रमता। रावण को ना करते हुए भी रावण- कृत्य को अपनाने की छुपी लालसा आज का सबसे कड़वा यथार्थ था।"[8] वस्तुतः इलाहाबाद की धमनियों में अक्षयवट के समान अविराम भाव धारा विरासत के रूप में सदैव विद्यमान रही, लेकिन समय के साथ उसमें भी व्यवस्था की सड़ांध और अवसाद भरी जिंदगी के चिह्न नजर आने लगे हैं।

आर्थिक उदारीकरण के दौर में शहरीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई है और इस प्रक्रिया में सर्वाधिक नुकसान ‘संवेदना’ का हुआ है। जहाँ व्यक्ति अपने घर को बचाने के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है। हमने भावनाओं को केन्द्रित करना सीखा है और रिश्तों को भी ताक पर रख दिया है। हम सवालों से डरने लग गए हैं और अपेक्षा करते हैं कि जैसा चल रहा है उसे घर का हर सदस्य स्वीकार कर ले। 'शब्द पखेरू' उपन्यास हमें आगाह करता है कि कैसे नई पीढ़ी अनजाने में ही साइबर क्राइम का हिस्सा बन जाती है। आम जीवन में बढ़ते इंटरनेट के इस्तेमाल और सामाजिक संबंधों में आए बदलावों को हमारे समक्ष बखूबी उपस्थित करता है, दूसरी और मध्यमवर्गीय परिवार की घुटन, संवादहीनता और सीमित संसाधनों के साथ बड़े सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगे बच्चों की कथा यह उपन्यास बारीकी से कहता है। आज के मध्यमवर्गीय  परिवारों में  यह दृश्य सामान्यतया दिखाई दे सकता है।

आज की पीढ़ी बुजुर्गों के बजाय गूगल से मिलने वाले ज्ञान पर ज्यादा सहज है। "मनीषा शैलजा में बढ़ता विश्वास देख रही थी जो कभी-कभी उसे बाद आक्रामक लगता। हरदम लैपटॉप की स्क्रीन पर आंखें गाड़ी रहती। एक दिन उसने ईर्ष्या वश उसका नाम 'इंटरनेट बेबी' रख दिया था, मगर उसे इस पर कोई फर्क नहीं पड़ा। फेसबुक पर हर फ्रेंड रिक्वेस्ट को कंफर्म कर देना जैसे उसके लिए जरूरी था। किताब या नोटबुक खुली है, सामने मैटर ढूँढने के बहाने चैट चल रही है। दिखावा ऐसी करती है जैसे बेचारी पढ़ाई को लेकर हलकान हो रही है। इंटरनेट के विस्तृत आकाश पर देखने पढ़ने और खोजने के लिए बहुत कुछ था। उसने गूगल को 'ग्रैंडपा' का नाम दे रखा था।"[9]

समग्रतः यह कहा जा सकता है कि जब कभी मानव सभ्यता चाँद को छूने के लिए ब्रम्हांड को चीरती है तब ये चित्र मानव को आदिम युग में ले जाते है, जो शर्मनाक है। मनुष्यता के कलंक से विमुक्ति का प्रयास मानव जीवन के प्रति एकात्म भाव से ही संभव है, अन्यथा विकास की गति केवल छलावा है। विश्व साहित्य की प्रथम पुस्तकजिसे यूनेस्को ने भी स्वीकार किया हैवह है- ऋग्वेद। उसमें कहा गया है- मनुर्भवःअर्थात् मनुष्य बनो। मनुष्यता का बोध ही भारतीय संस्कृति का मूल हैजो वर्तमान और भविष्य के लिए भी जरूरी है व रहेगी। हिन्दी उपन्यास परम्परा में नासिरा शर्मा का अवदान मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर इस दृष्टि से स्तुत्य है।

संदर्भ-

1.      आलोचना, अप्रैल-जून,2003, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.32

2.      जिंदा मुहावरे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2017, पृष्ठ 11

3.      सात नदियां: एक समंदर, अभिव्यंजना प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 1984, पृष्ठ 7

4.      अजनबी जजीरा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 2017, पृष्ठ 78

5.      अजनबी जजीरा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 2017, पृष्ठ 120

6.      अजनबी जजीरा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 2017, पृष्ठ 24

7.      जीरो रोड, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, सं. 2003 पृष्ठ 286

8.    अक्षयवट, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, सं. 2003 पृष्ठ 42

9.      शब्द पखेरू' वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2017, पृष्ठ 40

 


आधुनिक हिन्दी काव्य-धारा में मेवाड़

आधुनिक हिन्दी काव्य-धारा में मेवाड़ 
अपनी माटी पत्रिका जनवरी-मार्च,२०२५ में प्रकाशित

शोध सार : 
मेवाड़ का नाम स्वातंत्र्य चेतना की श्रेणी में बड़े आदर से लिया जाता है। इसी कारण आधुनिक हिंदी कविता में मेवाड़ का ऐतिहासिक गौरव स्वाधीनता संग्राम का पदचिह्न बना। यहाँ का शौर्य साहित्यकारों के लिए विस्मयकारी रहा। लेखन की विषय-वस्तु में अत्याचारों के विरुद्ध नहीं झुकने का संदेश, मातृभूमि की आन-बान-शान पर कर्तव्य निभाते हुए युद्ध करना, सतीत्व की रक्षा के मर मिटना, प्रताप का मातृभूमि प्रेम, पन्ना का पुत्र-बलिदान जैसे कई कथानक मेवाड़ की माटी के माध्यम से साहित्य की धरोहर बने। दासता के विरुद्ध संघर्ष के प्रेरणा स्रोत रहे इन उदात्त चरित्रों को लेकर महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्तक काव्य लिखे गए, जिसमें मेवाड़ का शौर्य प्रखर रूप में प्रदीप्त हुआ। इस अनुपम अवदान में श्यामनारायण पांडेय रचित ‘जौहर’ और ‘हल्दीघाटी’, रामकुमार वर्मा की रचना ‘चित्तौड़ की चिता’, जयशंकर प्रसाद कृत ‘महाराणा का महत्त्व’, लाला भगवानदीन की ‘वीर पंचरत्न’ जैसी प्रबंध रचनाओं के साथ प्रसाद रचित ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’ जैसी अमर कविता उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त वाचिक परम्परा में गाए जाने वाली स्तुतियों की संख्या अपार हैं। कालांतर में शांति की कामना का स्वर भी डॉ. हरीश का खंडकाव्य ‘महीयषी मीरा’ में मुखरित हुआ है। 
बीज शब्द : मेवाड़ का गौरव, जौहर, सतीत्व की रक्षा, शौर्य, स्वामिभक्ति, स्वातंत्र्य-बोध, आत्मोत्सर्ग-भाव, औदात्य, युद्ध की भीषणता, वाचिक परम्परा, भक्ति-भाव।

मूल आलेख :
राजस्थान शूरवीरों की भूमि के रूप में विख्यात है। मेवाड़ का इतिहास स्वातंत्र्य-चेतना का सदैव आदर्श प्रतीक बनकर उपस्थित रहा। वीर गाथाओं में महाराणा प्रताप का शौर्य स्वाधीन मातृभूमि का प्रेरणा-स्रोत बनकर प्रकट हुआ तो पन्नाधाय का मातृभूमि के लिए पुत्र का बलिदान अपूर्व है। पद्मिनी-कर्मवती का जौहर, गोरा-बादल की वीरता को समय की अबाध गति में भी अविस्मरणीय बनाए रखने का स्तुत्य कार्य कवियों ने किया है। मेवाड़ की भूमि जो भारतीय ललनाओं के रक्त से लाल है। उन्होंने अपने सुकुमार हाथों से अपने लिए चिता सजाई थी। प्रचंड आग और कोमल शरीर कैसा विचित्र संयोग था? उस बलिदान में कांति और गौरव की चिंगारियाँ भरी हैं। 
डॉ. रामकुमार वर्मा लिखते हैं, “चित्तौड़ की चिता की ज्वालाएँ अब भी इतिहास के पृष्ठों पर चमकती हैं। वासना में डूबे मुसलमानों की आँखों में अक्षम्य अपराध था। किसी हिंदू के घर में सौंदर्य का फूल खिलना, उसकी नियति- यवनों की वासना की भीषण अग्नि थी, अत्याचार, निर्दयता, शासन और वासनामयी प्रवृत्ति थी। चित्तौड़ भूमि में गौरव और सम्मान की भावना बची थी। चित्तौड़ ने जागृत रखा- सम्मान युक्त सूखी रोटी खाकर क्रूर शासकों से लड़कर, मिटकर भी गौरव को बचाना। वे टूट गए पर चित्तौड़ की आत्मा को, गौरव को कोई कुचल नहीं सका।“ [1] यह भूमि सम्पूर्ण भारतवर्ष में क्यों पूजनीय है, उसका उत्तर मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत भारती' में मिलता है। यह रचना स्वाधीनता आन्दोलन की कंठ-हार बनी, उसमें मेवाड़ की धरा के लिए व्यक्त उक्त पंक्तियाँ सभी कवियों के लिए प्रेरणास्पद मानी गई, जिसमें वर्णित है-

चित्तौड़ चंपक ही रहा यद्यपि यवन अलि हो गए,
धर्मार्थ हल्दीघाटी में कितने सूभट बली हो गए।
कुलमान जब तक प्राण तब तक, यह नहीं तो वह नहीं,
मेवाड़ भर में वक्तृताएँ गूंजती ऐसी रही।। [2]

श्री श्यामनारायण पांडेय ने जौहर की भूमिका में लिखा, "जौहर अपनी आर्य संस्कृति के 
संरक्षण में सहायक होगा और संस्कृति के पुजारियों की कमी नहीं, इसलिए इसका प्रचार स्वयंसिद्ध है। इस संघर्ष काल में आर्य संस्कृति के रक्षकों को जौहर के छंदों ने मंत्रों से भी अधिक बल दिया है, जो सर्वत्र स्पष्ट है।” [3] श्यामनारायण पांडे ‘जौहर’ में इस भूमि के माहात्म्य का परिचय एक संन्यासी के कथन के माध्यम से देते हैं जब कवि प्रश्न करता है कि संन्यासी तुम कहाँ पर पूजन करने के लिए जा रहे हो-

थाल सजाकर किसे पूजने चले प्रात ही मतवाले?
कहाँ चले तुम राम नाम का पीतांबर तन पर डाले?
कहाँ चले ले चंदन अक्षत, बगल दबाए मृगछाला?
कहाँ चली यह सजी आरती, कहाँ चली जूही माला?
इधर प्रयाग न गंगासागर, इधर ना रामेश्वर काशी।
कहाँ किधर है तीर्थ तुम्हारा, कहाँ चले तुम संन्यासी ? [4]

कवि संन्यासी से प्रश्न करता है और पूछता है कि तुम उपवीत, मेखला, जल से भरा कमंडल लेकर किसे नहलाओगे? मौलसिरी का गजरा किसके गले में पहनाओगे? कहाँ दीप जलाकर माला-फूल चढ़ाओगे? सारे प्रश्नों को सुनकर संन्यासी उत्तर देता है-
 मुझे न जाना गंगासागर, मुझे न रामेश्वर काशी।
 तीर्थराज चित्तौड़ देखने को, मेरी आँखें प्यासी।। [5] 

राजपूतों का युद्ध के लिए प्रस्थान करना, केसरिया वस्त्र धारण करना, क्षत्राणियों का जौहर करने का व्रत लेना, चिता के समीप फूलों की रेखाएँ सुसज्जित होना, फूलों से द्वार बनाने, आर्य ललनाओं का पूजन करना, धर्म हित मरण हेतु जौहर करना, दुर्गा देवी का पूजन करना कहना और अपनी भूलों के लिए क्षमायाचना करते हुए मरण-पथ पर प्रस्थान करना कितना लोमहर्षक है- 

देवी यह है अंतिम पूजन, क्षमा करना सब की सब भूल,
रहे सब पर सदैव अनुकूल, न करना हमसे निष्ठुरपन। [6]

मेवाड़ धरा के गौरव, राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक एवं मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले शूरवीर महाराणा प्रताप का व्यक्तित्व सदैव प्रेरणास्पद रहा है। श्याम नारायण पांडेय रचित खंडकाव्य ‘हल्दीघाटी’ प्रताप के जीवन-चरित्र को अमरत्व प्रदान करने वाली कृति है। हल्दीघाटी नामकरण राजस्थान की वीरभूमि के उस स्थल का नाम है, जहाँ राणा प्रताप और अकबर के मध्य भीषण संग्राम हुआ, परन्तु अकबर की मेवाड़ विजय की कामना अधूरी रही। श्याम नारायण पांडेय ने अपनी ओजस्वी प्रस्तुति से इस कृति को जनव्यापी बना दिया।  ‘हल्दीघाटी’ के नायक राणाप्रताप हैं और प्रतिनायक हैं- अकबर। प्रताप राजपूताना की छोटी-सी रियासत के राणा हैं, जबकि अकबर मुगल साम्राज्य का सम्राट। उसने संपूर्ण भारत पर एकाधिकार कर लिया, परन्तु प्रताप को झुकाने में विफल रहा। यह दंश उसे रह-रहकर सालता रहता। रत्नजटित महलों में अकबर की मनःदशा का चित्रण कवि ने इस प्रकार किया-

स्वर्णिम घर में शीत प्रकाश, जलते थे मणियों के दीप।
धोते आँसू-जल से चरण, देश-देश के सकल महीप ।
तो  भी कहता  था सुल्तान, पूरा  कब होगा अरमान ।
कब  मेवाड़ मिलेगा  आन, राणा  का होना अपमान ।। [7]

दूसरी तरफ राणा प्रताप तनिक भी विचलित नहीं और अकबर से किसी प्रकार का भय नहीं। अरावली की उपत्यकाओं में अपना दरबार सजाए हुए हैं । उन्हें पता है कि मानसिंह की अवज्ञा से अब रण अनिवार्य है, परन्तु मातृभूमि की अस्मिता अक्षुण्ण रहे, उसकी रक्षा का प्रण अटल है। अपनी छोटी सी सेना, भील सरदारों के प्रण और स्वाभिमानी गौरव के साथ भावी रण की तैयारियाँ वीरोचित गरिमा के साथ प्रस्तुत हुआ है-

शुचि  सजी शिला  पर राणा भी, बैठा  अहि-सा फुंकार लिए।
फर-फर  झंडा  था  फहर  रहा,  भावी  रण का  हुंकार लिए।
+++ +++ +++
तरकस  में  कस कस तीर भरे, कंधों  पर कठिन कमान लिए।
सरदार  भील भी  बैठ गए, झुक-झुक रण  के अरमान  लिए। [8]

अकबर द्वारा अब्दुर्रहीम खानखाना को जब मेवाड़ विजय के लिए भेजा, तब महाराणा प्रताप के व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अकबर को जाकर जो वर्णन किया, वह स्वयमेव रोमांचित करता है। जयशंकर प्रसाद रचित ‘महाराणा का महत्त्व’ कविता में बताया गया कि इस घटना को सुनकर अकबर ने प्रताप से भविष्य में युद्ध करने का विचार ही त्याग दिया-

जिस दिवस मुझे कर सैनप भेजा आपने, 
वीरभूमि मेवाड़ विजय के हेतु, हाँ-
उस दिन सचमुच मुझे असीम प्रसन्नता 
हुई, कि मैं भी देखूँगा उस वीर को,
जो अब तक होकर अबाध्य सम्राट का
करता है सामना बड़े उत्साह से। 
सचमुच शहंशाह एक ही शत्रु वह
मिला है आपको है कुछ ऊँचे भाग्य से;
पर्वत की कंदरा महल है, बाग है-
जंगल ही आहार-घास, फल-फूल है।
सच्चा हृदय सहायक उसके साथ है। [9]

प्रताप की प्रतिज्ञा कि उनके जीवित रहते हुए मेवाड़ कभी भी पराधीन नहीं होगा। इसके लिए विशाल मुगल सेना से भिड़ने का अदम्य साहस अकल्पनीय है। राणा का महान् चरित्र तत्कालीन वातावरण में उनके अटल प्रण के साथ प्रकट होकर अथाह ऊर्जा का संचार करता है। माँ भवानी का आशीष लेकर जब हल्दीघाटी के मैदान में भीषण रण हुआ, तब मानसिंह के पैर उखड़ गए। राणा की सेना के अदम्य उत्साह से भीषण प्रहार हुआ, मुगल सेना में हाहाकार मच गया। युद्ध की भीषणता का अनुमान कवि की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- 

हयरुण्ड गिरे, गजमुण्ड गिरे, कट-कट अवनि पर शुण्ड गिरे।
लड़ते-लड़ते  अरिझुण्ड गिरे, भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे।
क्षण महाप्रलय की बिजली-सी, तलवार हाथ की तड़प-तड़प।
हय-गज-रथ, पैदल भगा-भगा, लेती थी बैरी वीर हड़प।। [10]

 हल्दीघाटी का युद्ध यदि राणा प्रताप के तेज को कालजयी बनाता है तो स्वामिभक्त चेतक के अद्भुत रण-कौशल को भी अमर कर देता है। चेतक का शौर्य कवि की दृष्टि में विस्मयकारी था। रण-क्षेत्र में स्वामी के आदेश पर चौकड़िया भरकर अरि मस्तक को रौंद रहा था। हवा से बातें करने वाला चेतक दुश्मनों पर कहर बनकर टूट रहा था, कवि ने चेतक के कौशल को इन शब्दों में प्रकट किया है-

रणबीच चौकड़ी भर-भरकर, चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से, हवा का पड़ गया पाला था।
गिरता न कभी चेतक तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था।
वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था। [11]

भारतीय जनता जब स्वाधीनता संग्राम की वेला में अपनी विरासत को भूल चुकी थी, तब प्रसाद  ने ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’  कविता में कवि ने महाराणा प्रताप सिंह की उत्तराधिकारी की आस का वर्णन किया है कि किस प्रकार वह अपने अंतिम समय में अपनी आस को पूरा होते देखना चाहते थे। कवि आधुनिक प्रतीकों के माध्यम से भारतीय जन मानस में दासता के विरुद्ध चेतना का संचार कर रहे हैं-

फिर भी पुकार सी है गूँज रही व्योम में -
"कौन लेगा भार यह ?
कौन विचलेगा नहीं ?
दुर्बलता इस अस्थिमांस की -
ठोंक कर लोहे से,परख कर वज्र से,
प्रलयोल्का खंड के निकष पर कस कर
चूर्ण अस्थि पुंज-सा हँसेगा अट्टहास कौन?
साधना पिशाचों की बिखर चूर-चूर होके
धूलि सी उड़ेगी किस दृप्त फूत्कार से? [12]

महारानी पद्मिनी भारतीय जन-मानस में अप्रतिम सौन्दर्य और औदात्य की प्रतिमूर्ति के रूप में बिम्बित है। वीरभूमि मेवाड़ के गौरव को अक्षुण्ण रखते हुए पद्मिनी ने भारतीय नारी की गरिमा और तेजस्विता को आने वाली पीढ़ियों के समक्ष आदर्श रूप में प्रस्तुत किया। मेवाड़ और दिल्ली सल्तनत के संघर्ष में महारानी पद्मिनी का व्यक्तित्व तत्कालीन राजनीति और आत्मोत्सर्ग की प्रबल भावना को प्रकट करता है, वहीं एक आदर्श नारी प्रतीक के रूप में समकालीन समाज को भी सनातन सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराता है। कामांध अल्लाउद्दीन खिलजी जब पद्मिनी की चाह में व्याकुल है, तब एक सरदार उसके व्यक्तित्त्व को इस प्रकार वर्णित करता है- 
साध्वी परम पुनीता है वह, रामचंद्र की सीता है वह,
अधिक आपसे और कहूँ क्या, रामायण है गीता है वह।
खुद आग में जल जाएगी, गिरी से गिरकर मर जाएगी, 
मेरा कहना मान लीजिए, पर न हाथ में आएगी।
नभतारों को ला सकते हैं, अंगारों को खा सकते हैं, 
गिरह बाँध ले मैं कहता हूँ, लेकिन उसे न पा सकते हैं। [13]

लाला भगवानदीन साहित्य में बहुत बड़ा नाम है। वे लक्ष्मी पत्रिका के संपादक रहे। वीर क्षत्राणी, वीर बालक, वीर प्रताप शीर्षक से इनकी कविताएँ पुस्तकार में प्रकाशित हुई है। फिर वीर माता तथा वीर पत्नी शीर्षक से दो और पुस्तकें तैयार कर समग्रत: ‘वीर पंचरत्न’ प्रकाश में आई जिसमें- वीर प्रताप, वीर बालक, वीर क्षत्राणी, वीरमाता, वीर पत्नी को समर्पित कविताएँ हैं। ‘वीराबाई’ शीर्षक में चित्तौड़ के राणा उदयसिंह की पत्नी का वीर क्षत्राणी के रूप में कविता में अंकन किया गया है। अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण करने का निश्चय किया। वह विकट फौज लेकर चित्तौड़ का घेरा डालकर वीरा को पकड़कर निज कंठ से लगाने का सोचता था। राणा भयभीत हो गए तब वीरा ने बीड़ा उठाया-

कैसी है यह मेवाड़ धरा जग को दिखा दूँ,
वीरत्व के इतिहास में निज नाम लिखा दूँ,
नारी के विकट क्रोध का परसाद चखा दूँ,
इस दुष्ट मुगल जोद को कुछ सिखा दूँ। [14]
उसके वीरोचित उद्बोधन ने राणा को छुड़ाया और चित्तौड़ का सम्मान बचाया-
वीरा की थी तलवार, कि हनुमान की थी लूम,
जिस ओर को फिर जाती, मचाती थी वहीं धूम। [15]                   

‘महीयषी मीरा’ खंडकाव्य में पथिक पात्र काल्पनिक है जो बंगाल से चलकर मीरा का आख्यान सुनने चित्तौड़ आया है। वह मीरा मंदिर पर वृद्ध वाचक पुजारी से उसकी भव्य जीवन गाथा का पान करता है। इसमें मीरा के जीवन के ऐतिहासिक सत्यों को उजागर करते हुए सामाजिक प्रभावों को दर्शाया गया है। साथ ही माँ की विराटता, प्रेम की असाधारणता और मेवाड़ का गौरव अंकित है। कवि की दृष्टि में मीरा जनकल्याण और मानव प्रेम की उपासिका रही है। मीरा के पदों में लोक व लोक दर्शन दोनों हैं। इसी करण भावविभोर होकर पथिक पूछता है-
दूर से आया सुना, इस द्वार प्रभु का वास,
भक्ति और अनुराग में डूबा यहाँ हर सांस।
प्रीति का सरगम जहाँ बनता अटल आधार,
कृष्ण औ मां का जहाँ होता सदैव विहार।। [16]

मीरा का अमर संदेश- मानव प्रेम, नारी जागरण, भक्ति गान का संगम है। इस खंडकाव्य के माध्यम से देश की वर्तमान दशा का यथार्थ चित्रण, शिक्षा, जीवन मूल्य, आस्थाएँ, आस्तिकता, वर्तमान नारियाँ, युवामन, व्यक्ति स्वार्थ, सृजन में अतीत का गौरव, सांस्कृतिक उन्मुखता, जन कल्याण के भाव का स्वर प्रधान रहा है। इस खंडकाव्य की अंतिम पंक्तियाँ मेवाड़ को गौरव प्रदान करती है-
आज भी चित्तौड़ के उस दुर्ग पर साकार,
प्रणयिनी की प्रीति ममता के खुले हैं द्वार,
कीर्ति का वह स्तंभ, गौरव की लिए मुस्कान,
प्रणयिनी की साधना से अमर राजस्थान। [17]

निष्कर्ष :
मातृभूमि को प्रणम्य बनाने का संकल्प और उसके लिए प्राणों का अर्पण की भावाभिव्यंजना पराधीन राष्ट्र के लिए चेतना की संवाहक होती है। राष्ट्रीय-चिंतन का उद्देश्य समष्टि में आत्म-गौरव की भावना का निर्माण कर उसे उन्नति के पथ पर अग्रसर करने में है। इसी राष्ट्रीय-भावना से ओतप्रोत आधुनिक हिन्दी साहित्य में मेवाड़ के चरित-नायकों का वर्णन इस दृष्टि से हुआ कि  राष्ट्र के जनमानस में  सामूहिक रूप में अपनी तथा अपने देश को उन्नत बनाने की इच्छा प्रबल हों तथा अपने देश के लिए अगाध भक्ति, अपनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति गौरव की भावना जाग्रत हों। स्वाधीन भारत में भी मेवाड़ प्रेरणा का केंद्रबिंदु बना रहे, रचनाकारों का यही अभीष्ट है।  

सन्दर्भ :

1.  रामकुमार वर्मा, चित्तौड़ की चिता, परिचय, चाँद कार्यालय, चंद्रलोक, इलाहाबाद, सं. 1929, पृ. 1

2.   मैथिलीशरण गुप्त, भारत भारती, साहित्य सदन, चिरगांव, सं. 1984, पृ. 79

3.   श्यामनारायण पांडेय, जौहरविश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, सं. 2012, पृ. 13

4.   वही, पृ. 4

5.   वही, पृ. 5

6.   रामकुमार वर्मा, चित्तौड़ की चिता, परिचय, चाँद कार्यालय, चंद्रलोक, इलाहाबाद, सं. 1929, पृ. 111

7.   श्यामनारायण पांडेय, हल्दीघाटी, सर्ग-3, कविताकोश वेबपेज

8.   वही, सर्ग-1 कविताकोश वेबपेज

9. महाराणा का महत्त्व, जयशंकर प्रसाद, भारती भण्डार, बनारस, सं. 1985 पृ. 21-22

10. श्यामनारायण पांडेय, हल्दीघाटी, सर्ग-12, कविताकोश वेबपेज

11. वही, सर्ग-12, कविताकोश वेबपेज

12. जयशंकर प्रसाद, पेशोला की प्रतिध्वनि, (सं.) सत्येन्द्र पारीक, आधुनिक काव्य सोपान, पुनीत प्रकाशन, जयपुर, सं. 2004,  पृ. 50-51

13. श्यामनारायण पांडेय, जौहरविश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, सं. 2012, पृ. 42

14. लाला भगवानदीन, वीर पंचरत्नआदर्श ग्रन्थ माला, कलकत्ता, सं. 1920, पृ. 190

15. वहीपृ. 190

16. हरीश, महीयषी मीरा, कृष्णा ब्रदर्स, अजमेर, सं. 1998, पृ. 15

17. वहीपृ. 92

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