ग्रियर्सन का हिंदी को अवदान

ग्रियर्सन का हिंदी को अवदान
         ग्रियर्सन

भारत में भाषाओं के सर्वेक्षण करने वाले प्रथम भाषा-वैज्ञानिक सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन हिन्दी जगत् में अमर हैं। भारत की संस्कृति से अगाध निष्ठा रखने वाले ग्रियर्सन ने नव्य भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया और उन्हें वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया, इस दृष्टि से उन्हें बीम्स, भांडारकर और हार्नली के समकक्ष माना जाता है। ग्रियर्सन 1870 में आई.सी.एस. के रूप में भारत आए और 1899 तक रहे। प्रारंभ में ही भारतीय भाषाओं के प्रति लगाव से इन्होंने अपना अधिकांश अतिरिक्त समय संस्कृत, प्राकृत, पुरानी हिन्दी, बिहारी और बंगला भाषाओं और साहित्य-पठन में व्यतीत किया। वे अधिकारी के रूप में जहाँ भी नियुक्त हुए, उन्होंने वहीं की भाषा, बोली, साहित्य और लोक जीवन को समझने का प्रयास किया। 

सन् 1888 में ऐशियाटिक सोसायटी ऑफ  बंगाल की पत्रिका के विशेषांक के रूप में जॉर्ज ग्रियर्सन का शोध ‘द मॉडर्न वर्नेक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान’ प्रकाशित हुआ, जिसे सोसायटी ने 1889 में स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया। यद्यपि यह नाम से इतिहास-ग्रंथ प्रतीत होता है, परन्तु सच्चे अर्थ में हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास कहा जा सकता है। इस ग्रंथ का हिन्दी अनुवाद डॉ. किशोरी लाल गुप्त ने ‘हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास’ शीर्षक से किया है। इस पुस्तक को समर्पित करते हुए उन्होंने सम्पादकीय टिप्पणी में लिखा- “श्री ग्रियर्सन जी, आपने विदेशी होते हुए भी, हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास लिखा। अनुवाद तो आपका ही है, उसे क्या समर्पित करूँ? हाँ टिप्पणियाँ मेरी हैं, उन्हें स्वीकार करें।”1 

       इस ग्रंथ में ग्रियर्सन ने कवियों और लेखकों का कालक्रमानुसार वर्गीकरण किया। हिन्दी साहित्य के प्रथम काल विभाजन का श्रेय इन्हें ही है, जो इस प्रकार है- 1. चारण काल, 2. धार्मिक पुनर्जागरण, 3. जायसी की प्रेम कविता, 4. कृष्ण संप्रदाय, 5. मुगल दरबार, 6. तुलसीदास, 7. प्रेमकाव्य, 8. तुलसी के अन्य परवर्ती, 9.18वीं शताब्दी, 10. कम्पनी के शासन में हिन्दुस्तान और 11. विक्टोरिया के शासन में हिन्दुस्तान। उक्त काल विभाजन में व्यवस्था का अभाव एक अलग विवेचना का विषय हो सकता है, परन्तु हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के स्वरूप एवं विकास के संबंध में जिस दृष्टिकोण का परिचय ग्रियर्सन ने दिया है, वह परवर्ती इतिहासकारों के लिए भी पथ प्रदर्शक सिद्ध हुआ। 

इस ग्रंथ का महत्त्व दो दृष्टियों से बहुत अधिक हैं- भाषा-नीति तथा आधार स्रोत। हिन्दी साहित्य का भाषा की दृष्टि से क्षेत्र निर्धारित करते हुए उन्होंने संस्कृत, प्राकृत और उर्दू को पृथक् रखा। उक्त ग्रंथ की भूमिका में लिखा- “ .... मैं आधुनिक भाषा साहित्य का ही विवरण प्रस्तुत करने जा रहा हूँ। अतः मैं संस्कृत में ग्रंथ-रचना करने वाले लेखकों का विवरण नहीं दे रहा हूँ। प्राकृत में लिखी पुस्तकों को भी विचार के बाहर रख रहा हूँ। भले ही प्राकृत कभी बोलचाल की भाषा रही हो, पर आधुनिक भाषा के अंतर्गत नहीं आती। मैं न तो अरबी-फारसी के भारतीय लेखकों का उल्लेख कर रहा हूँ और न ही विदेश से लायी गयी साहित्यिक उर्दू के लेखकों का ही- मैंने इस अंतिम को, उर्दू वालों को, अपने इस विचार से जानबूझ कर बहिष्कृत कर दिया है, क्योंकि इन पर पहले ही गार्सा द तासी ने पूर्ण रूप से विचार कर लिया है।”2 

माडर्न वर्नाक्यूलर लिट्रेचर ऑफ हिन्दुस्तान के दो अध्याय-मुगल दरबार और तुलसीदास में ग्रियर्सन ने तत्कालीन सामाजिक अव्यवस्थाओं, विकृतियों और विसंगतियों का उल्लेख किया, परन्तु अकबर के दरबार की तुलना महारानी एलिजाबेथ से करते हैं। इसके पीछे उनकी दृष्टि यह थी कि इन दोनों ने साहित्यिक प्रतिभाओं का सम्मान किया। वे लिखते हैं- “यह देखा जा सकता है कि अकबर बादशाह का शासनकाल और एलिजाबेथ का शासनकाल प्रायः एक ही है और इन दोनों शासकों के शासनकाल साहित्यिक प्रतिभाओं के एक असाधारण एवं अभूतपूर्व स्फुरण से परिपूर्ण हैं और यदि तुलसीदास और सूरदास की शेक्सपीयर और स्पेंसर के साथ सचमुच तुलना की जाये, तो ये भारतीय कवि बहुत पीछे नहीं रहेंगे।”3

ग्रियर्सन ने रामचरित मानस का श्रेष्ठ अंश किष्किंधा कांड के वर्षा वर्णन को मानते हुए वे लिखते हैं- “यहाँ तुलसीदास ने सन्तुलित और विरोधात्मक वाक्यों की शृंखला प्रस्तुत की है। हर पंक्ति में एक तथ्य का कथन और एक उपमा है, उपमान प्रायः धार्मिक हैं।”4 यहाँ ग्रियर्सन ने उपमानों को धार्मिक माना, जिसे उचित नहीं माना जा सकता, क्योंकि वर्षा-वर्णन में धर्म की व्याख्या नहीं है। फिर भी रस प्रसंग में संशयग्रस्त राम की मनःस्थिति, वर्षा-वर्णन से उम्मीद का अंकुरण, हनुमान की सेवकाई आदि प्रसंग की पहचान उन्होंने की। इसे स्वाकार करना चाहिए कि ग्रियर्सन के बाद ही तुलसी की ओर विद्वान आकृष्ट हुए।

उक्त ग्रंथ के आधार-स्रोत के रूप में गार्सा द तासी, शिवसिंह सेंगर के अतिरिक्त भक्तमाल, गोसाईं  चरित्र, हज़ारा काव्य-संग्रह सहित सत्रह ग्रंथों का मूलाधारों सहित संदर्भ दिया है, जो उनके व्यापक अध्ययन, प्रामाणिकता, तटस्थता आदि का प्रमाण है। उन्होंने ग्रंथ को कालखंड में विभक्त कर गौण कवियों का उल्लेख भी अध्याय विशेष के अंत में किया। विभिन्न युगों की काव्य-प्रवृत्तियों की व्याख्या करते हुए उनसे संबंधित सांस्कृतिक परिस्थितियों और प्रेरणा-स्रोतों के उद्घाटन का प्रयास भी उल्लेखनीय है। भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्ण-युग घोषित करना भी इसी ग्रंथ की देन है।

1894 से 1927 तक ग्रियर्सन ने ‘लिग्विंस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ अर्थात् भारतीय भाषाओं के सर्वेक्षण का कार्य किया। ग्यारह बड़े-बड़े वोल्यूम में यह विशाल ग्रंथ भारत सरकार के केन्द्रीय प्रकाशन विभाग, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित किया गया। पहला खंड बड़े महत्त्व का है, इसमें तुलनात्मक भाषा-विज्ञान की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ है। इस ग्रंथ की भूमिका में उन्होंने लिखा- “It is a comparative vocabulary of 168 selected words. In about 368 different languages and dialects. …… gramophone records are available in this country and in Paris.”5  ​इस भाग के अंत में ग्रियर्सन ने लिखा है कि भारत वस्तुतः विरोधी तत्त्वों की भूमि है और भाषाओं के संबंध में विचार करते समय तो यह तत्त्व और भी दृष्टिगोचर होते हैं। यहाँ अनेक ऐसी भाषाएँ हैं जिनके ध्वनि-संबंधी-नियमों के कारण केवल गौण और साधारण विचारों को ही प्रकट किया जा सकता है। वस्तुतः 179 भाषाओं और 544 बोलियों के इस देश में ध्वनिगत भिन्नताओं का होना कोई आश्चर्य नहीं है। ग्रियर्सन ने इस खंड की भूमिका में देश का भाषिक प्रशिक्षण और उसकी क्षमता को भी स्वीकार किया है। 

इसमें भारतीय भाषाओं, उप-भाषाओं और बोलियों के उदाहरण भी संकलित हैं। तिब्बती, चीनी, बर्मी, ईरानी भाषा-परिवारों को सम्मिलित कर उन्होंने भारतीय आर्य भाषाओं के इतिहास का सबसे अधिक प्रामाणिक और क्रमबद्ध वर्णन किया। इस अथक परिश्रम का संकेत भूमिका में उल्लिखित इस टिप्पणी से मिल जाता है- “ Finish a work extending over thirty years, that after writing this Preface, the pen will be laid down …. I plead guilty to a vain boast whom I claim that what has been done in it for India has been done for no other country in the world.”6 ग्रियर्सन की यह मान्यता थी कि मैं इसको एक ऐसे सामग्री संग्रह के रूप में भेंट कर रहा हूँ जो नींव का काम दे सके। जिन लेखकों का नाम हम जानते तक नहीं, किन्तु वे जनता के हृदयों में जीवित वाणी बनकर बचे हुए हैं, क्योंकि उन्होंने जन की सत्य और सुन्दर भावना को प्रभावित किया।

ग्रियर्सन की एक मौलिक कृति है- ‘बिहार पीजेण्ट्स लाइफ’ बिहार के ग्रामीण जीवन का चित्रण उन्होंने इसमें किया, वह अद्वितीय है। उस समय हिन्दी अथवा भारतीय भाषाओं में संकलन का कार्य नगण्य था। यह पुस्तक एक प्रकार से हिन्दी भाषी समाज का कोश माना जा सकता है, जहाँ हिन्दी प्रदेश को जोड़ने में हिन्दी की महत्ता प्रकट होती है। इस पुस्तक में ग्रियर्सन ने बिहार के प्राकृतिक वैभव का वर्णन नहीं करके वहाँ के कृषि उत्पाद के उपकरणों, मिट्टी के प्रकारों, गंगा की पवित्रता और सामाजिक रिवाजों का चित्रण है। ग्रियर्सन इस पुस्तक में लिखते हैं- “ मुकदमों और दो परस्पर विरोधी दलों के बीच पंचैती के समय ‘गंगा की सौगंध’ का प्रमाण दिया जाता था। गंगा जल को एक पात्र में (ताँबा) रखकर और तुलसी-दल सहित कहा जाता है, “बेटा का सिर पर हाँथ धै कँ।” इसी तरह ‘वसंता भवानी’, ‘कुल देवता’, ‘गंगा माई’ आदि शब्द भारतीय सांस्कृतिक आदर्श की अभिव्यंजना करते हैं तो सांस्कृतिक व्याप्ति की गहराई को भी प्रतिबिम्बित करते हैं। ग्रियर्सन ने आँचलिक शब्दों का प्रयोग करते हुए उनके सामाजिक सरोकारों को भी पहचाना। कई पर्यायवाची शब्द भी पहचाने। जैसे- पत्नी के लिए इस्तिरी, माउग, मौगी, बहू, बह, बौह, जन्नी आदि। यहाँ तक कि इन शब्दों का उन्होंने क्षेत्रानुसार वर्गीकरण भी किया। जैसे, बहू और बौह केवल चम्पारण में प्रचलित हैं। जोरू, कबिला, जनाना, मेहरारू शब्द केवल मुस्लिम समुदाय में हैं तो इस्त्री, पत्नी, बहू जैसे शब्द पूरे बिहार में प्रचलित रहे हैं। ग्रियर्सन ने लोक साहित्य अध्ययन में परम्परा से प्रचलित और लोकप्रिय गीतों का भी उल्लेख किया। ‘बिजमेल के गीत’, सहलेस और दीना-भद्री के कथा-गीतों के धार्मिक महत्त्व को उजागर किया। 

ग्रियर्सन के इस प्रयास का परिणाम यह हुआ कि लोक-साहित्य की ओर भारतीय विद्वानों का ध्यान गया। माना जाता है कि इसी प्रभाव से रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मन में बांग्ला के लोकगीतों का संकलन करने की बात मन में आई और वे कलकत्ता के पार्श्ववर्ती गाँवों की यात्रा पर निकले।यह बिहारी लोक जीवन का विश्वकोश है। नागरी और रोमन दोनों लिपियों में उपलब्ध इस ग्रंथ में सचित्र व्याख्या होने से उपयोगी बन गया है। सन् 1885 में बंगाल सेक्रेटरिएट प्रेस द्वारा यह पुस्तक प्रकाशित की गई। लोक-साहित्य के क्षेत्र में ग्रियर्सन द्वारा लिखित शोध पत्र है, जो 1884 में ‘सम बिहारी फोक सोंग्स’ तथा 1886 में ‘सम भोजपुरी सोंग्स’ के नाम से प्रकाशित हुए। द्वितीय शोध आलेख भोजपुरी लोकगीतों का प्रथम संग्रह माना जाता है। इसके अतिरिक्त 1885 में ‘द सांग ऑफ आल्हाज मैरेज’ आलेख ‘इंडियन एंटीक्वेटी’ पत्रिका में छपा। 1889 में ‘टू वर्शन्स ऑफ़ दि सांग ऑफ गोपीचंद’  को संकलित किया। उन्होंने ग्राम-गीतों को भी साहित्य का हिस्सा माना। इतिहास लेखन की भूमिका में उन्होंने स्वीकार किया कि अगणित एवं अज्ञात कवियों द्वारा विरचित स्वतंत्र महाकाव्यों एवं ग्राम गीतों जैसे- कजरी, जँतसार आदि अन्य गीत, जो संपूर्ण उत्तरी भारत में प्रचलित हैं, मैंने इसमें सम्मिलित करने से अपने को रोका है।

ग्रियर्सन ने तुलसीदास का वैज्ञानिक अध्ययन किया। तुलसी की उदार दृष्टि से वे सम्मोहित थे। वे लिखते हैं कि तुलसी ने चिर सौरभ की माला गूँथी और जिस देवता की भक्ति वे करते थे, उसके चरणों पर उसे दीनता पूर्वक चढ़ा दी। ‘द मॉडर्न वर्नेक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान’ में तुलसी के बारे में उनका कथन है- “As a father and mother delight to hear the lisping practice of their little one.”7 तुलसीदास के बारे में ग्रियर्सन की स्पष्ट मान्यता है कि ''भारत के इतिहास में तुलसीदास का महत्व जितना भी अधिक आँका जाता है वह अत्यधिक नहीं है। इनके ग्रंथ के साहित्यिक महत्व को यदि ध्यान में न रखा जाए, तो भी भागलपुर से पंजाब और हिमालय से नर्मदा तक के विस्तृत क्षेत्र में, इस ग्रंथ का सभी वर्ग के लोगों में समान रूप से समादर पाना निश्चय ही ध्यान देने के योग्य है। ...पिछले तीन सौ वर्षों में हिंदू समाज के जीवन, आचरण और कथन में यह घुल-मिल गया है और अपने काव्यगत सौंदर्य के कारण वह न केवल उनका प्रिय एवं प्रशंसित ग्रंथ है, बल्कि उनके द्वारा पूजित भी है और उनका धर्म ग्रंथ हो गया है। यह दस करोड़ जनता का धर्मग्रंथ है और उनके द्वारा यह उतना ही भगवत्प्रेरित माना जाता है, अँग्रेज पादरियों द्वारा जितना भगवत्प्रेरित बाइबिल मानी जाती है।''8 

भारतीय जनजीवन और साहित्य में तुलसी के प्रभाव को ग्रियर्सन ने अच्छी तरह से समझ लिया था। उन्होंने लिखा- “ वेद और उपनिषद पंडितों के बीच चर्चा के विषय हो सकते हैं, पुराणों में कुछ लोगों की निष्ठा हो सकती है, परन्तु तुलसीकृत  रामायण भारत वर्ष की अपार जनता के शिक्षित एवं अशिक्षित वर्गों के आचार का मूलाधार है।"9 उक्त कथन में रामचरित मानस की महत्ता के साथ तत्कालीन जन-भावना की उक्त रचना के प्रति श्रद्धाभाव प्रकट होता है। इससे रामचरित मानस का औदात्य स्वतः स्पष्ट हो जाता है। ग्रियर्सन की दृष्टि में तुलसी की लोकप्रियता का बड़ा कारण शैवमत और उससे जनित अश्लीलता का खंडन था। और दूसरा कारण है- तुलसी की विनम्रता। तुलसी की विनम्रता में अटल दृढ़ता भी है, जो रत्नावली के प्रतिबोध और उसके बाद के निर्णय से प्रकट हो जाता है।

ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक में तुलसीदास और रत्नावली के संवाद का उल्लेख करते हुए दोनों के चरित्र को भी उजागर किया। तुलसी की दृढ़ता और रत्नावली की सहज चतुराई का टिप्पणी सहित उल्लेख किया-"कई वर्षों बाद तुलसीदास चित्रकूट से लौटते हुए अपने ससुराल पहुँचे। स्मार्त वैष्णव के अनुसार तुलसीदास अपना भोजन स्वयं बनाते थे। उन्हें पत्नी तुरंत नहीं पहचानी। एक-दो बार उनका कंठ-स्वर फूटा, गोस्वामीजी पहचान में आ गए। “मिर्च लाऊँ, अचार लाऊँ, कपूर लाऊँ, सबका एक ही उत्तर” मेरे थैले में थोड़ी सी है।”10 ग्रियर्सन ने लिखा है  कि रत्नावली रातभर यही सोचती रही कि क्या किया जाए कि पति और परमेश्वर दोनों मिल जाएँ। प्रातःकाल कई बार के अनुनय-विनय के बाद रत्नावली बोली-

खरिया खरी कपूर लो, उचित न प्रिय तिय त्याग।
कै खरिया मोहि मेलि कै अचल करौ अनुराग।।11

यहाँ रत्नावली ने चतुराई से अपने मंतव्य को तुलसी के पास पहुँचाते हुए कहा कि है प्रिय, यदि तुम्हारे थैले में खड़िया से लेकर कपूर तक सभी वस्तुएँ हो सकती हैं तो अपनी पत्नी का त्याग उचित नहीं है। मुझे भी अपने थैले में रख लें या परित्याग कर के सर्वशक्तिमान प्रभु में अपने को निःशेष भाव से समर्पित कर दे। फिर भी तुलसी नहीं माने। यह संवाद भावपूर्ण तो है लेकिन चरित्र का उद्घाटन भी करता है। जिसे ग्रियर्सन की सूक्ष्म अन्वेषण दृष्टि ने पहचानते हुए वर्णित किया।

ग्रियर्सन ने तुलसी की भाषा पर भी विचार किया। बिहारी और देव की भाषा से इसे भिन्न बताया। ‘कवितावली’ पर विचार करते समय उन्होंने इसमें काव्य-सौन्दर्य के चमत्कार के साथ नाद-सौन्दर्य को तुलसीकृत काव्य का ऐश्वर्य माना। तुलसी की भक्ति पर विचार करते हुए ग्रियर्सन ने उनकी विनयशीलता को रेखांकित किया। आचार्य शुक्ल ने भी आगे चलकर तुलसीदास की भक्ति को लोक धर्मरक्षक बताया। ग्रियर्सन के शब्दों में- “उन्होंने अत्यन्त सरल एवं उदात्त धर्म तथा ईश्वर में अखंड विश्वास का उपदेश दिया। अनैतिकता के उस युग में, जब मुगल साम्राज्य संगठित और परिपुष्ठ हो रहा था, उनके द्वारा उपदिष्ट धर्म की सर्वाधिक विशिष्टता थी उसकी कठोर नैतिकता, जिसे उसकी पूरी अर्थ-व्यंजकता के साथ ग्रहण किया गया था।"12 आचार्य शुक्ल पर इस ग्रियर्सन के इस विचार का गहरा प्रभाव पड़ा था।

ग्रियर्सन ठेठ हिन्दुस्तानी को साहित्यिक उर्दू तथा हिन्दी की जननी मानते थे। इतिहास को लिखते समय शिवसिंह सरोज को आधार माना, जिसका उल्लेख आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में भी किया है। इसके अतिरिक्त आचार्य शुक्ल के अनुसार - “मैथिल कोकिल विद्यापति की ‘कीर्तिलता’ और कीर्तिपताका’ नामक दो ग्रंथों का परिचय साहित्य जगत् को करवाने वाले ग्रियर्सन ही थे।”13

इस प्रकार ग्रियर्सन ने जिस तटस्थता व प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर हिन्दी भाषा तथा साहित्य का अवगाहन किया, वह अतुल्य है। लगभग तीस वर्षों की अनवरत साधना से हिन्दी भाषा का स्वरूप निर्धारित किया और उसके साहित्य को भारतीय आस्था की दृष्टि से देखा। यहाँ तक कि लोक-संस्कृति में डूबकर उसे भी गौरवान्वित किया। हिन्दी साहित्य का इतिहास और भाषा-सर्वेक्षण ने ‘नींव के पत्थर’ की तरह कार्य किया, जिस पर आज हिन्दी का महल खड़ा है। डॉ. नगेन्द्र के मतानुसार- “वस्तुतः उन्नीसवीं शती के अंतिम चरण में, जबकि हिन्दी साहित्य-क्षेत्र में आलोचना एवं अनुसंधान की परम्पराओं का श्रीगणेश भी सूक्ष्म एवं प्रामाणिक ऐतिहासिक व्याख्या प्रस्तुत कर देना, ग्रियर्सन की अद्भुत प्रतिभा-शक्ति एवं गहन अध्ययनशीलता को प्रमाणित करता है; यह दूसरी बात है कि उनका ग्रंथ अंगरेजी में रचित होने के कारण हिन्दी के अध्येताओं की दृष्टि का केन्द्र नहीं बन सका, जिससे परवर्ती युग के अनेक इतिहासकार, जो उनकी धारणाओं और स्थापनाओं को पल्लवित करके हिन्दी माध्यम से प्रस्तुत कर सके और उस यश के भागी बने, जो वस्तुतः ग्रियर्सन का दाय था।”14

संदर्भ ग्रंथ सूची-
1. द मॉडर्न व वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान (अनुवाद-किशोरी लाल गुप्त), हिन्दी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, 1957, भूमिका
2. पूर्ववत्, पृ.41
3. ग्रियर्सनः भाषा और साहित्य चिन्तन, अरुण कुमार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018 पृ.77
4. पूर्ववत्, पृ.83
5 Linguistic survey of India Vol-1, G.A. Grierson, Govt. press, Kolkata, reprint Motilal Banarsidas, patna, 1966, Preface.
6 पूर्ववत्, Preface.
7. Notes on Tulsi Das, Grierson, उद्धृत, तुलसीदास: रचना एवं सन्दर्भ, सं. भगवती प्रसाद सिंह, राजकमल प्रकाशन, 1975, पृ.1    
8. ग्रियर्सनः भाषा और साहित्य चिन्तन, अरुण कुमार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018 पृ.75
9. पूर्ववत, पृ.76
10. पूर्ववत, पृ.76
11. पूर्ववत, पृ.72
12. पूर्ववत, पृ.73
13. द मॉडर्न व वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान (अनुवाद-किशोरी लाल गुप्त), हिन्दी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, 1957, पृ.15 
14. हिन्दी साहित्य का इतिहास, डॉ. नगेन्द्र, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली, 2009, पृ.27
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हिन्दी आलोचना : निकष एवं प्रतिमान



पुस्तक : हिन्दी आलोचना : निकष एवं प्रतिमान 
प्रकाशक : रजत प्रकाशन, नई दिल्ली 
संपर्क : 09811484973
मुद्रित मूल्य : 495/-

आत्म-सत्य की लयात्मक अभिव्यक्ति

पुस्तक समीक्षा

आत्म-सत्य की लयात्मक अभिव्यक्ति

(सन्दर्भ : रथ के धूल भरे पाँव)



कविता मनुष्यता की मातृभाषा है, इसीलिए का ‘आत्म’ जब व्यक्त होता है तो ‘मानवता’ का चित्त भी समय के सच के साथ मुखरित होता है। वर्तमान समय विस्मयकारी दृश्य के साथ ‘मनुष्य’ को आतंकित कर रहा है, जो फैंटेसी से भी आगे का यथार्थ है। इसका चेहरा रक्तस्नात और हृदयहीन है, जो मारक और अविश्वसनीय रूप में हमारे समय का सच है। नई सदी ने भूमंडलीकरण की पदचाप के साथ गंतव्य आरंभ किया। देखते-देखते मात्र दो दशकों में अर्थ-जगत की व्याधियाँ मानव-जीवन के फलक को लील गई, तब कला-जगत अपनी संवेदना को कहाँ तक बचाता?  अजित कुमार राय का काव्य-संग्रह ‘रथ के धूल भरे पाँव’ में इसी आत्म-सत्य की अभिव्यक्ति हुई है।

कवि का यह आत्म-सत्य जीवन का वह रजत-पाश है, जो मध्यमवर्गीय जीवन की करुण गाथा है। यह वर्ग अपने अतीत के मूल्यों से मुक्त नहीं होना चाहता और स्वप्नों के खंडहरों को पुननिर्मित भी नहीं कर सकता। शीर्षक ‘रथ’ अतीत का वह मोहभरा आकर्षण है, जो भारतीय वैभव का पुरूषार्थ है; जहाँ अदम्य उत्साह की गर्जना है तो ‘धूल भरे पाँव’ वर्तमान समय की मूल्यहीनता और वैचारिक भटकाव का बिम्ब है। यह बिम्ब काव्य-संग्रह की चवहत्तर कविताओं में रह-रहकर उद्दीप्त होता है। सुखद पहलू यह है कि कवि ने उन कारकों को पहचान लिया है और अपने शब्द बाणों से सांस्कृतिक संघर्ष की औपनिवेशिक मनोवृत्ति पर जमकर प्रहार किया है। 

कवि का रचना समय दो सदियों का संधिकाल है। वह उस समय का साक्षी है, जहाँ संवेदना और मूल्यों की परिधि में भारतीय समाज पल्लवित है। यह कवि का बचपन है। तरुणाई में स्नेह का विस्तार मिला, पर संस्कार ने जीवन-वृत्त का निर्धारण किया। इस बीच जीवन की गति के साथ विषाद भरा यथार्थ से साक्षात्कार और फिर उससे संघर्ष करते-करते हृदय की स्फोट ध्वनियाँ निकल पड़ी और कविता बन गई। संकलन की प्रथम कविता ‘नरमेध’ कवि का आत्म-बिम्ब है, जिसे उन्होंने ‘एक नया दलित सौन्दर्य-शास्त्र’ कहा। ‘नरमेध’ स्वयमेव भीषण आक्रोश को प्रकट कर देने वाला शब्द है, जहाँ शिक्षक को बंधुआ मजदूर बनाकर बाजारवादी शक्तियों के हाथों में फेंक दिया है। शिक्षा के निजीकरण की भयानक आत्मपीड़ा संभवतः कवि की अनुभूत अभिव्यक्ति जान पड़ती है। इसीलिए वह कहता है-

“हे संस्था के पुरोहितो!
आज राजनीति के ‘पाठ्यक्रम’ रोज बदलते हैं,
समय के ‘पंचांग’ पिघलते हैं,
सत्ता की संपूर्ण सुविधाओं पर कुंडली मार बैठे
अजगर ‘मनुष्य’ को निगलते हैं।
हम संस्था के ‘अंडे’ को मुर्गी सा सेते हैं-
किन्तु जब उसमें ‘पंख’ आते हैं
तो वह हमारी ‘पकड़’ से बहुत दूर निकल जाती है।”
(नरमेध,पृ.30) 

इस वेदना में ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं जीवन की समग्रता में मनुष्यों के स्थान पर वस्तुओं में निवेश कर दिया। इस लम्बी कविता में ‘जूते’ की तरह शिक्षक बदलना, कंधे पर पैर रखकर चलना आदि ऐसे अनेक बिम्ब सच्चाई के निकट ले जाने में सक्षम हैं।

आत्म की अभिव्यक्ति के साथ कविता का संवेदना तत्त्व संपूर्ण जगत से जुड़ता है। सारी जटिलताओं के होते हुए भी कविता हमारी संवेदना के निकट होती है, यही राग तत्त्व है। इससे कवि की पीड़ा साधारणीकृत हो जाती है और जगत की पीड़ा उसकी वाणी बन जाती है। किसान और स्त्री वर्तमान समय के सबसे नरम शिकार बने हैं, जो बाजारवादी शक्तियों के हाथ का खिलौना बन गए हैं। उपभोग की पराकाष्ठा ने नारी को बाजार में ‘विज्ञापन’ के रूप में खड़ा कर दिया है-

स्त्रियों के ग्लैमरस चित्र?
क्या स्त्री चित्रों के फ्रेम से बाहर आना चाहेगी,
क्षण-प्रतिक्षण बदलती जीवन्त-मुद्राओं
एवं नई भंगिमाओं के साथ?
चन्द्रमा दूर से ही अच्छा लगता है।
नारी-सौन्दर्य को ‘नजर’ लग गई है,
विज्ञापन बाजार की।
(स्त्री-विमर्श, पृ.54)

यही स्वर किसान का प्रतिवेदन, दासता, बाजार-भाव, होम लोन, दूसरा विस्थापन आदि कविताओं में हैं, जहाँ कवि ने आने वाले समय के भीषण यथार्थ को पहचान लिया है और सावचेत करते हुए लिखा-
वस्त्र बदलती स्त्री एक दिन खुद
वस्त्र की तरह बदल दी जाएगी।
(बाजार-भाव, पृ.72)

नई सदी की सर्वाधिक ज्वलंत चुनौती वैश्वीकरण है, जिसमें सांस्कृतिक मूल्यों का विलोपन अधिक है। विकृत उपभोक्तावादी दृष्टि का प्रसार है। इसका सर्वाधिक प्रभाव चेतनावान संवेदनशील कला जगत पर पड़ता है। अपने मूल तत्त्व से वह विमुख नहीं हो सकता, अतः विद्रोही स्वर में प्रतिरोध करता है। बहुलतावादी भारतीय समाज में सांस्कृतिक मूल्यहीनता को वह स्वीकार नहीं कर सकता, वह कह उठता है-

आम्रवन की नीलिमा क्या हो गई?
मंजरी की गंध मल्टीफ्लेक्स में क्यों खो गई?
वृश्चिकों के बिस्तरे पर जाग करके भोर में,
जिसे बाबा ने सँजोया था समय के शोर में।
वृत्त बदला बिन्दु में, मन व्यास मेरा हो गया है।
आँवले की छाँव में भोजन कसैला हो गया है।।
(संस्कृति के सीमांत, पृ.86)

अतिक्रमण, पृथ्वी की कक्षा के बाहर, बढ़ने दो अक्षरों का आकार, अस्तित्व की प्रज्ञा आदि कविताएँ हमारे मन पर औपनिवेशिक प्रभाव को व्यक्त करती हैं, जो हमें मानसिक दासता से मुक्त नहीं होने का संकेत देती है। गांधी आज हमारी चेतना में नहीं है, पश्चिमी चकाचैंध में हम अपना सर्वस्व लुटा चुके हैं। हम स्मृति और इतिहास की संधि-रेखा पर हैं। कवि जड़ों की ओर लौटने का आह्वान करते हैं-

स्मृति और इतिहास की संधि-रेखा पर
पड़ी गांधी की लाश कौन उठाए?
‘राजघाट’ पर बार-बार दफनाई जाती हैं
गांधी की लाश।
कब होगा हमारे भीतर
उनका पुनर्जन्म?
(अस्तित्व की प्रज्ञा, पृ.57)

काव्य-संग्रह में उन सभी अवांछित विद्रुपताओं का उल्लेख हुआ है, जो नई सदी की वास्तविकता है। भारतीय-सांस्कृतिक मूल्यों का स्खलन, भाषा, विचार, जीवन-शैली में बदलाव के परिणामों को भी कवि ने पहचाना है। वह केवल आक्रोश व्यक्त कर चुप नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था-परिवर्तन के लिए मुखर भी हो उठता है और कहता है-

कृष्ण केवल ‘बाँसुरी’ नहीं बजाता
वह ‘चक्र’ उठाना भी जानता है।
(नरमेध, पृ.26)

महाराणा सुनो, सेतुबंध, कालांकित कविता में कवि की सकारात्मक दृष्टि है तो कई स्थलों पर  स्पष्टवादिता से कवि ने अपने समय के यथार्थ को स्वर दिए हैं। विश्व शांति का मिथक, नोटबंदी पर गुलाबी नोट, तीन तलाक को तलाक, जे.एन.यू. में खड़े होकर, सर्जिकल स्ट्राइक-1, सर्जिकल स्ट्राइक-2 राष्ट्रवाद के मंच पर राष्ट्रपति, अभयारण्य बकरों के लिए आदि कविताओं में कवि के विचार बिना किसी आग्रह के प्रकट हुए हैं। निर्भीकता और ईमानदारी से अपनी बात कहने का साहस यहाँ दिखाई देता है। जिन विषयों पर समकालीन कवि मौन हैं, वहाँ उनकी लेखनी चली है। युग-धर्म को निर्वाह की दृष्टि से यह उत्तम है। सामयिक घटनाओं पर कवि का राष्ट्रनायकों को सम्बोधन ‘युगचारण’ की भूमिका में दिखाई देता है।

ओ धूमिल!
धूमिल नहीं हुआ है संसद का रक्त-चरित्र।
देवदूतों की भाषा है अब भी पवित्र।
मुकुट की रोटियाँ 
रोटियों की मुकुट के लहू से गुंथी है।।
(दूसरा विस्थापन, पृ.192)

कविता में बिम्ब और लय की उपस्थिति आवश्यक है। मुक्त छंद का आशय ‘आन्तरिक लय’ की भी समाप्ति कर देना नहीं है, अन्यथा कविता का मूल ‘संगीत-तत्त्व’ ही नष्ट हो जाएगा। कवि ने सभी कविताओं में लयात्मक स्वर और बिम्ब विधान पूर्ण उत्कर्ष के साथ आए हैं। संगीतमय स्वर-साधना के साथ शब्दों का संयोजन और लयात्मक अभिव्यक्ति का लालित्य दर्शनीय है-

शीशे की रंगीन गोलियों का वह टूटा प्रिज्म कहाँ ? 
लट्टू नहीं, नाचती धरती का वह ग्लोबल रिद्म कहाँ !
खलिहानों के गंध - पिरामिड टूट गया।
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पेड़ों पर वह ओल्हा पाती, शाख आज भी काँप रही है ।
मर - मर कर जीने का दर्शन कहाँ कबड्डी भाँप रही है ?
आज कैरियर सपने सारे लूट गया।
(छन्दांतर47)
           
कवि ने कविता को ‘असाध्यवीणा’ माना है, वह स्वयं प्रियंवद केशकाम्बली की तरह सर्जना के किरीटी-तरु को समर्पित है, अतः शब्द-स्वर की वीणा बोल उठी है। पाठक अपनी-अपनी दृष्टि से उसे तौल रहा है। अपने आत्मसत्य की लयात्मक अभिव्यक्ति देते हुए कवि को किसी वाद की परिधि में नहीं है। वैचारिक संतुलन के साथ दासता का प्रतिनिधि नहीं होना अच्छा संकेत है, इससे चाहे वह किसी धारा में न बहे, स्वतंत्र दीप की भांति टिमटिमाता अवश्य रहेगा और अंधकार की चीरने में सफल भी होगा।

पुस्तक का कलेवर प्रसिद्ध कवि विजेन्द्र ने तैयार किया है, भूमिका वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति ने लिखी है। इससे कृति का महत्त्व बढ़ गया है। बोधि प्रकाशन ने इसे सुन्दर ढंग से मुद्रित किया है और संतोष का विषय है कि कृति का मूल्य पुस्तक के आकार अनुसार है।पुस्तक की समस्त कविताएँ पाठकों को बहा जाने में सक्षम है।

पुस्तक : रथ के धूल भरे पाँव
लेखक : अजित कुमार राय
आवरण : विजेंद्र
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर, पृ.192, मूल्य-250/-
(जनसंदेश टाइम्स,लखनऊ में दिनांक 21.10.2020 को प्रकाशित)


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हिन्दी आलोचना : भाषा, प्रतिमान एवं विचारधारा

 हिन्दी आलोचना : भाषा, प्रतिमान एवं विचारधारा

(म.प्र. साहित्य अकादमी द्वारा 'साक्षात्कार' जुलाई, 2020 अंक में प्रकाशित)

इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य तीव्र गति से वैश्विक धरातल पर अपनी पहचान बनाने में सफल रहा है। साहित्य-रचना के मानक अब परम्परागत साँचे में नहीं है, उन पर तात्कालिकता का प्रभाव अधिक है। साहित्य अब भूमण्डलीकरण के साथ अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में आलोचना भी साहित्यिक वातावरण के साथ कदमताल कर रही है, जहाँ किसी सैद्धान्तिक पैरामीटर से रचना का मूल्यांकन न करके रचनाशीलता की पहचान पर बल है। इस नवीन परिदृश्य में आलोचना का वर्तमान और भविष्य की दिशा का मूल्यांकन भाषा, विचारधारा एवं प्रतिमान की दृष्टि से किया जाना समीचीन होगा-

1.     भाषा

भाषा विचार-विनिमय का साधन है, जिसके माध्यम से मनुष्य स्वयं को अभिव्यक्त करता है। इसके द्वारा ही वह सामाजिक संरचना का हेतु बनता है। इसलिए भाषायी संरचना को समझना आवश्यक है। भाषा स्वयमंव ऐसी प्रक्रिया है जहाँ परम्परा, परिवेश, व्यक्तित्व, विचार और अनुभव को सर्जनात्मक बनाती है। प्रसिद्ध आलोचक डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी की मान्यता है कि उन्नीसवीं शती में विज्ञान के विकास ने परम्परागत धार्मिक आस्था को विघटित कर दिया था। बीसवीं शती में दो महायुद्धों ने मानवीय संवेदना को झकझोर कर रख दिया। परम्परागत सारे नैतिक-सांस्कृतिक मूल्य विघटित हो गए और व्यापक मानवतावाद की प्रतिष्ठा हुई।

वर्तमान परिदृश्य में रचना की भाषायी सर्जनशीलता का बारीकी से विश्लेषण किया जाने लगा है। नये आलोचकों की मान्यता है कि किसी विचार या अनुभव को दूसरे व्यक्ति में इस रूप में संक्रमित करना कि वहाँ उसका नया विकास संभव हो, सर्जन-प्रक्रिया का आरंभिक चरण है। इस अनुभव या विचार का संक्रमण भाषा से ही संभव है। इस हेतु भाषा और अनुभूति के अद्वैत को समझना होगा। अतः आने वाले समय में आलोचना में रूप तत्त्वको प्रश्रय मिलता दिखाई दे रहा है। जहाँ रचना को भाषिक-संरचना के आलोक में विवेचित करने का प्रयास हो रहा है। उत्तर संरचनावाद, उत्तर आधुनिकतावाद ने इस दृष्टि को और व्यापकता प्रदान की है। फलतः रचना की आलोचना में भाषा के विविध अंग- शब्द-चयन, छंद, ध्वनि-समूह, बिम्ब-विधान, प्रतीक-योजना, लय, कथन-भंगिमा, वाक्य-वक्रता, पद-विन्यास आदि के विश्लेषण पर ध्यान दिया जाने लगा है।

भाषा का स्वरूप भी आलोचना को नई धार दे रहा है। भूण्डलीकरण ने हिन्दी को वैश्विक स्वरूप प्रदान किया है। अब यह भारतीय उपमहाद्वीप के साथ मारीशस, इण्डोनेशिया, यूरोप एवं अन्य देशों में प्रवासी भारतीयों में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त कर चुकी है। भारत में भी हिन्दी को सर्वग्राह्य मान्यता मिली है। फिल्म, टी.वी., बाजार, विज्ञापन आदि में हिन्दी का प्रचलन बढ़ गया है, जहाँ हिन्दी का शास्त्रीय रूप, तत्समनिष्ठता अथवा परिष्कृत रूप न रहकर संप्रेषणीय व्यावहारिक रूप प्रकट हुआ है। नवीन रचनाओं में नई हिन्दी का रूप दिखाई दे रहा है। आलोचक भी इसकी महत्ता को स्वीकार कर तदनुरूप मूल्यांकन कर रहा है।

उत्तर-आधुनिक चिंतन व भारतीय संवैधानिक मूल्यों के निरन्तर प्रसार से अस्मिताओं के आधार पर भाषायी-चिंतन आलोचनात्मक विमर्श के केन्द्र में आया है। स्त्री, दलित, आदिवासी, किसान आदि की सामान्य बोलचाल की शब्दावली को साहित्य में प्रश्रय मिलने लगा है, जिससे उनकी सभ्यता, परम्परा व अनुभूतिजन्य पीड़ा को अभिव्यक्ति मिल सके। आलोचना में विमर्श केन्द्रित मूल्यांकन में भाषा का मूल्यांकन भी संबंधित परिवेश के संदर्भ में किया जाने लगा है।

परम्परागत साहित्य में लोकभाषा को सदैव दूसरे दर्जे पर रखा गया, किन्तु अब लोक भाषा अपना स्वाभाविक आकार गढ़ने लगी है। आँचलिक भाषाओं का साहित्य अब रचनाशीलता में स्थान बना रहा है और परम्परागत प्रतिमानों को ध्वस्त कर रहा है। सुखद पहलू यह है कि आँचलिक भारतीय भाषाओं के साहित्यिक उदय से हिन्दी और समृद्ध हो रही है। लोकगीत, लोक नाट्य, लोक वाणी की स्वीकार्यता से स्वाभाविक प्रस्तुति हो रही है।

समकालीन साहित्य में एक तरफ लोक वृत्त उभर रहा है, वहीं दूसरी तरफ रचनाएँ वैश्विक फलक पर पाँव भी प्रसार रही है। दोनों की दिशा पृथक् होते हुए भी महत्त्व भी है। एक पक्ष अपने अस्तित्व को स्थापित कर हिन्दी को समृद्ध कर रहा है, तो दूसरा पक्ष हिन्दी को वैश्विक परिदृश्य में स्थापित कर रहा है। दोनों की शृंखला नई आलोचना का विवेच्य विषय है। आज के समय में भाषायी प्रतिमान निश्चित नहीं किए जा सकते, क्योंकि उसकी दीवारें ही गिर रही हैं।

 रचना की इस भाषा के अनुरूप आलोचना की भाषा में परिवर्तन का आग्रह करते हुए नामवर सिंह लिखते हैं- भाषा को जब तक हिन्दी आलोचना नहीं तोड़ेगी, तब तक वह एक ही जगह पर कवायद करती रहेगी। इसलिए रचनाकारों से हाथ जोड़कर मैं निवेदन करूँगा कि मित्रो, तुम लोगों ने तो अपनी भाषा तोड़ी है, हम आलोचकों को भी बताओ कि भाषा कैसे तोड़ी जाती है? जिस दिन यह भाषा तोड़कर हम नई भाषा बनाएंगे, आलोचना पढ़ने लायक होगी, अन्यथा यह चारों की या उनके गिरोहों की एक कूट भाषा बनेगी, जिसमें खग बोलेगा और खग ही सुनेगा।

2. प्रतिमान

विगत दो दशकों से हमारे सामाजिक जीवन में भी व्यापक बदलाव आए हैं। वैश्विक समाज सूचना क्रांति से बहुत छोटा प्रतीत होने लगा है। परम्परागत विचार, प्रतिबद्धताएँ एवं मूल्य लगभग अप्रासंगिक होते गए व उन्मुक्त सोच की तरफ दुनिया बढ़ रही है। साहित्य भी इससे अलग नहीं है। आलोचना भी तात्कालिक समस्याओं के संदर्भ में होने लगी है, जिसे किसी घेरे में बन्द भी नहीं रखा जा सकता है। आज सोश्यल मीडिया पर हर व्यक्ति अपने विचार प्रकट करने के लिए स्वतंत्र है, अतः वहाँ साहित्यिक प्रतिमान स्थिर रहें, यह संभव भी नहीं है। देश-विदेश में घटित किसी भी घटना पर किसी रचना का जन्म और उस पर त्वरित प्रतिक्रियाओं से आलोचना के संदर्भ भी बदलते जा रहे हैं।

जहाँ तक आलोचना के प्रतिमानों की वस्तु-स्थिति का प्रश्न है, वे परम्परागत रूप में अब दिखाई नहीं दे रही है। आचार्य शुक्ल, राम विलास शर्मा, डॉ. नगेन्द्र अथवा आचार्य द्विवेदी की तरह उद्देश्यनिष्ठता एवं सैद्धांतिकी का स्वरूप नहीं दिखाई देता। विगत शताब्दी की आलोचनाओं में पहले उद्देश्य निर्धारित होता था, उसके बाद सिद्धान्त निर्मित किए जाते, फिर उन सिद्धांतों के आधार पर कृति की परख की जाती थी। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर अनेक आलोचना प्रणालियों का जन्म हुआ, लेकिन विगत कुछ वर्षों से यह तकनीक भी अब स्वरूप बदल रही है। आलोचना में किसी निश्चित फलक का उपयोग दिखाई नहीं देता।

आलोचना की समकालीन परिस्थितियाँ बदलते हुए परिवेश के अनुरूप ही हैं। जहाँ ठहराव और अवकाश तो बिल्कुल भी नहीं है। अब सिद्धांतों की कसौटी पर कृति को कसने के स्थान पर सर्वप्रथम कृति के मूल कथ्य को ध्यान में रखकर सिद्धांत निर्मित किए जाते हैं, फिर एक सिरे से पुस्तक की व्याख्या या समीक्षा कर दी जाती है। सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों को समझकर रचना की संपूर्णता को परखने की प्रवृत्ति अब लुप्त होती जा रही है। कतिपय आलोचनाएँ अपवाद हो सकती हैं, किन्तु यही सामान्य प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।

आलोचना की मात्रा तो बहुत अधिक है, परन्तु उसके लेखन के प्रतिमान निश्चित नहीं हैं। रचना के तथ्यों का आलोचक वर्णन करके आगे बढ़ जाता है, जहाँ रचना की प्रशंसा तो है, परन्तु मूल्यांकन नहीं। यह कटु सत्य है कि आलोचना अब रचना केन्द्रित होने के स्थान पर रचनाकार केन्द्रित होने लगी है। आलोचक भी इसी भ्रम में हैं कि उसकी चर्चा से लेखक स्थापित हो रहे हैं और उपेक्षा से वे नगण्य, तो स्पष्टतः आलोचना के मूल्य ही विस्थापित हो रहे हैं।

एक प्रश्न उठता है कि क्या पुराने प्रतिमानों के आधार पर नई रचनाओं की समीक्षा संभव है? इस दृष्टि से तो सही उत्तर यही होगा कि पुराने प्रतिमानों के आलोक में अद्यतन रचना का मूल्यांकन संभव नहीं है। लेकिन रचना के बदलते स्वरूप के साथ आलोचना के नवीन प्रतिमान तय किए जाने अपेक्षित हैं, जो चिंता का विषय भी है। आज अनेक विमर्श केन्द्रित रचनाएँ सामने आ रही हैं, परन्तु नई आलोचना प्रणालियाँ विकसित नहीं होने से प्रतिमान भी स्थापित नहीं हो पा रहे हैं।

समकालीन रचनाओं का मूल्यांकन सम-सामयिक संदर्भों में ही किया जा सकता है और रचनाशीलता के समानांतर ही आलोचना के प्रतिमानों का निर्माण होता है। प्रत्येक समय की चुनौतियाँ होती है और उसके समाधान तात्कालिक रचनाओं में तलाशने का कार्य आलोचक का है। आलोचक ही अपनी प्रखर दृष्टि से पुराने प्रतिमानों को नया रूप दे सकता है और समय के अनुकूल प्रतिमान निर्मित भी कर सकता है। मैनेजर पांडेय ने इस संदर्भ में लिखा है- हिन्दी में पाँच प्रकार की आलोचनाएँ प्रचलित हैं, पहली है अखबारी आलोचना, दूसरी पुस्तक समीक्षा, तीसरी अध्यापकीय आलोचना, चौथी आस्वादपरक आलोचना, जो पत्रिकाओं से लेकर व्याख्याओं तक में पायी जाती है और पाँचवीं है- पराआलोचना या साहित्य सिद्धांत। हिन्दी में जिसे साहित्य की मुख्यधारा कहा जाता है, उसमें साहित्य-सिद्धांत का पूरी तरह अकाल ही है। पहले उपनिवेशवाद के कारण और अब भूमण्डलीकरण के प्रभाव में, जैसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उधार से काम चलाने की हमारी आदत बन गई है, उसका विस्तार साहित्य की आलोचना में है और साहित्य-सिद्धांत में भी।

हिन्दी आलोचना में आज सर्वाधिक आवश्यकता समकालीन रचनाशीलता की प्रवृत्तियों की पहचान कर आलोचना के प्रतिमान निर्मित किए जाने की है, ताकि आलोचना की भावी दिशा सही गंतव्य की ओर बढ़ सके। इससे भारतेन्दुकाल से जन्मी, शुक्ल काल में विकसित और शुक्लोत्तर काल में चरम तक पहुँची हिन्दी आलोचना वैश्विक साहित्यिक आलोचना के समकक्ष स्तर को प्राप्त कर सके। गंभीरता, अध्ययन-निष्ठता, पैनी दृष्टि और साहित्यिक वातावरण इस दृष्टि से निर्मित करना वर्तमान समय की प्रमुख आवश्यकता प्रतीत हो रही है।

3. विचारधारा

विचारधारा रचना तथा आलोचना की रीढ़ होती है, जिसके आधार पर उसकी महत्ता, उपयोगिता एवं प्रासंगिकता सिद्ध होती है। हिन्दी आलोचना अपने आरंभ से किसी न किसी आधार को लेकर चली है, चाहे वह सैद्धांतिक हो या व्यावहारिक; किसी वाद के सिद्धान्तों के परिप्रेक्ष्य में हो अथवा विमर्श केन्द्रित अवधारणाओं पर आधारित। यह क्रम बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक किसी न किसी रूप में विधमान रहा। यहाँ तक कि आलोचक को भी किसी निश्चित पक्ष का विचारक मानकर निर्णय किया जाता रहा। नई सदी की आलोचना उत्तर-आधुनिक दौर में हैं, जहाँ विचारधाराओं से मुक्ति की बात कही जा रही है। यहाँ तक कि विचारधारा शब्द आलोचना में शत्रुता अथवा आतंक का प्रतीक समझा जाने लगा है।

समकालीन आलोचना में विचार की जगह सूचना ने ले ली है। रचना का मूल्यांकन सतही स्तर पर होने लगा है। कई बार तो आलोचना में मूल्यांकन कम विज्ञापन अधिक प्रतीत होने लगता है। सूचना के विनिमय में रचना में वर्णित घटनाओं की पृष्ठभूमि उभर नहीं पाती। इसी कारण आलोचक रचना के पक्ष अथवा विपक्ष में खड़ा होने के बजाय किसी सुरक्षित कोने की तलाश में रहता है। गंभीर आलोचना का स्थान परिचयात्मक आलोचना ने ले लिया है। विचार और इतिहास से विमुख होकर आलोचकों में समझौतावादी लेखन करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

विचारधारा साहित्यिक कृति का आन्तरिक पक्ष है, जिससे उसका व्यक्तित्व प्रतिबिम्बित होता है। यह एक प्रकार का दृष्टिकोण भी है, जो समय और परिस्थिति के संघर्ष में जन्म लेता है। इसे लेखक की चेतना का आधार कहना समीचीन होगा। विचारधारा के अभाव में वह कृति के साथ कभी न्याय नहीं कर पाएगा। वैसे विचारधारा किसी न किसी रूप में रचना में विद्यमान रहती है, जिसका सही मूल्यांकन विचारधारा के अनुसार ही हो सकता है। लेकिन वैचारिक आग्रह की प्रबलता में लेखक को अन्य पक्ष के मतों का भी सम्मान करना चाहिए। वैचारिक आग्रह कहीं दुराग्रह के कारण अच्छी कृति का भी उपहास न उड़ाए, यह आवश्यक है। विचारधारा स्वयं की दृष्टि है, दूसरों पर थोपने का विषय नहीं।

एक समर्थ आलोचक वर्तमान की आँख से समकालीन रचना को देखता-समझता है, लेकिन अतीत की स्मृतियाँ वर्तमान को पुष्ट करती है। अतः प्रत्येक युग का दायित्व है कि वह कृति का मूल्यांकन इतिहास और समकाल के संदर्भों में करे। मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं- हिन्दी आलोचना का वर्तमान अगर संकटग्रस्त है तो इसके कारणों की पहचान होनी चाहिए। इस संकट का सबसे बड़ा कारण है- आलोचना में साहित्यिक को सामाजिक से अलग समझने और मानने की प्रवृत्ति। इसी प्रवृत्ति के कारण आलोचनात्मक व्यवहार के दौरान राजनीति, विचारधारा और सभ्यता के सवालों को साहित्य की आलोचना से बाहर कर दिया गया है।

भूमण्डलीकरण में जो चुनौतियाँ साहित्यिक दृष्टि से उभर रही हैं उनमें प्रमुख हैं- मुक्त बाज़ारवाद, विकृत उपभोक्तावाद, राजनीतिक अधिनायकवाद, सांस्कृतिक परिष्करण, मूल्य-संक्रमण, हिंसक वर्चस्व, धार्मिक कट्टरता, भ्रष्ट आचरण, वैचारिक दुराग्रह आदि। समकालीन रचनाओं में इन बिन्दुओं पर बहुत कुछ लिखा भी जा रहा है। लेकिन आलोचना में अभी इन परिस्थितियों के कारकों की खोज नहीं हो पाई, जिससे रचनाएँ जन्म ले रही हैं। ऐसी स्थिति में सतही पुस्तक समीक्षाही आलोचना-मार्ग बनती जा रही है। हिन्दी आलोचना में अब पूर्ण गंभीरता नए परिवेश के अनुरूप आवश्यक है, जहाँ परम्परागत मूल्यों का आश्रय व विरासत के साथ नवीन प्रतिमानों का निर्धारण भी हों।

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स्मरण : प्रेमचंद

स्मरण : प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद Munshi Premchand - Photos | Facebookप्रेमचंद भारतीय स्वाधीनता-संग्राम काल के लेखक हैं। प्रेमचंद की दृष्टि में वह स्वतंत्रता अधूरी है, जब तक कि भारतीय समाज में किसान, मजदूर और नारी शोषण की शिकार हैं। अंध-रूढ़ियाँ मानव-मात्र को पराधीन किए हुए हैं तथा हमारी विलासी मानसिकता धरोहर को खो रही हैं । इसी दृष्टि से उनके लेखन के आयाम बने। उनका उपन्यास 'सेवासदन' नारी की पराधीनता और झूठी नैतिकता के तले शोषण की पराकाष्ठा को उजागर करता है, तो 'निर्मला' अनमेल विवाह और स्त्री के प्रति अनुदार दृष्टि को प्रकट करता है। 'प्रेमाश्रम' और 'गोदान' किसानों के जीवन की त्रासदी को मार्मिक ढंग से व्यक्त करता है, वहीं सामाजिक ताने-बाने की मर्मान्तक गाथा भी है। 'रंगभूमि' वैश्वीकरण और पूंजीवादी दृष्टि की भयावहता को प्रकट करते हुए कृषि जीवन की द्वंद्वात्मकता को भी अभिव्यक्त करता है। प्रेमचंद की कहानियाँ भारतीय समाज की यथार्थपरक सच्चाई को उजागर करती हैं, वही उन मूल्यों का भी संरक्षण करती है जो किसी न किसी रूप में भारत की आत्मा में हैं। उनकी दृष्टि में ग्राम्य जीवन ही प्रधान रूप से भारत का वास्तविक चित्र है, क्योंकि जिस देश के अस्सी फ़ीसदी लोग गांवों में बसते हों तब साहित्य में उनका चित्रण होना स्वाभाविक है, उनका सुख राष्ट्र का सुख और उनका दुःख राष्ट्र का दु:ख है।

 प्रेमचंद एक शताब्दी बाद भी प्रासंगिक हैं, कतिपय कारक अवलोकनीय हैं-

 

1.  1  प्रेमचंद के पाठक प्रत्येक वर्ग में हैं। वे हिंदी साहित्य के ऐसे लेखक हैं, जो पहली कक्षा से पीएच.डी तक पढे जाते हैं। रामविलास शर्मा लिखते हैं कि पुस्तकालय की पुस्तकों पर अचार और हल्दी के धब्बे इस बात का सूचक हैं कि वे गृहिणियों द्वारा भी पढ़े जाते थे।

2.    2. प्रेमचंद पूर्व उपन्यास तिलस्म और काल्पनिक कथाओं पर आधारित थे अथवा इतिहास की घटनाओं पर आधारित। उन्होंने जीवन के यथार्थ के धरातल पर उतर कर कथानकों का निर्माण किया। उपन्यास और कहानी के पात्र आज भी भारतीय समाज में हमारे सामने दिखाई दे जाते हैं, इस दृष्टि से वे कालजयी लेखक के रूप में उपस्थित होते हैं।

3.    3. प्रेमचंद का संपूर्ण कथा-साहित्य यथार्थ दृष्टि पर होते हुए भी आदर्श की ओर उन्मुख रहा। उन्होंने हिंसा का सहारा लेकर क्रांति का घोष  नहीं किया, बल्कि सामाजिक विसंगति का चित्र प्रस्तुत कर मानवता को झकझोर दिया। वे चाहते थे कि समाज अपने किए हुए पर आत्मग्लानि महसूस करे और नए समाज का निर्माण करे। 'ठाकुर का कुआँ' जैसी कहानी इसका उदाहरण है।

4.   4.  प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में भारतीय परिवार को बहुत महत्व दिया। 'बड़े घर की बेटी', 'ईदगाह', 'बूढ़ी काकी' आदि कहानियाँ भारतीय परिवारों की संरचना को और प्रगाढ़ करती है। हामिद की परवरिश तीसरी पीढ़ी के हाथों होना और उसका लगाव आज भी भारतीय समाज की आवश्यकता है।

5.    5. वैश्वीकरण का चित्र खींचते हुए उन्होंने एक शताब्दी पूर्व ही बाजार का दृश्य हमारे सामने रख दिया। बाजार किस प्रकार ललचाता है, 'ईदगाह' कहानी उसका एक अच्छा उदाहरण है। उस बाजार में भी व्यक्ति बच सकता है, परन्तु उसके लिए हामिद जैसा कलेजा चाहिए।

 प्रेमचंद की विशिष्टता इस बात में है कि उन्होंने पहली बार अपने कथानक के नायक होरी, जालपा, और सूरदास जैसे सामान्य व्यक्तियों को बनाया। एक शताब्दी बाद भी प्रेमचंद प्रासंगिक हैं।  मेरा मत है कि जब भी समाज किसी राह पर उलझन में होगा, प्रेमचंद वहाँ उसका समाधान देते नजर आ जाएँगे।

 

-डॉ.राजेंद्र कुमार सिंघवी

 

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