भारतीय परिवार:यथार्थ एवं भविष्य

भारतीय परिवार:यथार्थ एवं भविष्य


                                  परिवार समाज की आधारभूत इकाई है।परिवार संस्कारित है तो समाज उन्नत राष्ट्र सशक्त है।एक सशक्त राष्ट्र की आधार शिला पर ही धर्म और संस्कृति सुरक्षित रहती है।अतः परिवार को व्यक्तित्व विकास का केंद्र बनाए रखना परम आवश्यक है।भारतीय जीवन पद्धति में इस हेतु संयुक्त परिवार शैली को अपनाया था, इसमें परिवार का केंद्र बिंदु था - बालक।माता- पिता ,दादा- दादी व अन्य सदस्य उसकी परिधि थे। माता -पिता का दायित्व आर्थिक समृद्धि का था तो दादा-दादी सांस्कृतिक हस्तांतरण का पुनीत कार्य कर रहे थे।इस जीवनशैली में अपनेपन का सामूहिक आभास था , जहां समरसता का प्रवाह था।परिणाम स्वरुप सदियों से हमारे संस्कार विद्यमान रहे चिरकालीन दासता के क्षणों में भी हमारी संस्कृति सुरक्षित रहीं।                               
              भूमंडलीकरण के प्रभाव से एकांगी दृष्टि का तीव्रतम प्रसार हुआ, जिसका करारा प्रहार भारतीय पारिवारिक जीवन पर हुआ।व्यक्ति की मानसिक कुंठा, आर्थिक लालसा, असीमित आकांक्षा, असहिष्णुता और व्यक्तिवादी सोच से परिवार टूटने शुरू हो गए।इस बिखराव के दौर में हम देखते हैं कि आज व्यक्ति केंद्र में है। उसके एक तरफ संतान के पोषण का दायित्व है तो दूसरी तरफ माता-पिता की अपेक्षाएं।वह दोनों जिम्मेदारियां उठाने में असमर्थ है. फलतः संतान संस्कार हीनता की तरफ बढ़ रही है और माता-पिता उपेक्षित हो रहे हैं। वह स्वयं मानसिक अशांति से ग्रस्त होकर अकेलेपन की समस्या से जूझ रहा है। 
                       वस्तुतः रिश्ते हैं तो जिंदगी है. परिवार को तोड़ना कोई नहीं चाहता परंतु कतिपय कारक उन्हें बाध्य कर रहे है, यथा- 1. व्यक्तिवादी दृष्टिकोण से अहंकार चरम पर है। यह शिक्षा जनित , अर्थ जनित और उम्र जनित है । स्वार्थ एवं स्वयं का एकांगी विकास इसका मूल है. इससे अवचेतन में पारस्परिक स्नेह के स्थान पर वैमनस्य ने घर कर लिया है. आज प्रतिस्पर्धा अपने ही परिवार के सदस्यों से आरंभ हो गई है, तब विकार ग्रस्तता तो होगी ही।
                                2. समय के साथ रिश्तो में टकराव का दूसरा कारण है- भावनाओं का केंद्रीयकरण। हमारे पास डिग्रियां है,धन है,धरोहर है,पर रिश्ते समाप्त होने के कगार पर है। जो व्यक्ति अपनी 40 से 50 वर्ष की आयु में अपने बच्चों के खातिर रिश्तो से दूर भागता है वही 60 वर्ष के बाद अपने बच्चों से उपेक्षित होकर फिर रिश्तो की तलाश करता है, लेकिन तब तक समय गुजर चुका होता है। 
                                 3. हम अंधी प्रगति का सपना बुन रहे हैं। एक व्यक्ती गांव से शहर में, शहर से महानगर में और महानगर से विदेश पलायन कर रहा है। सिर्फ भागना और अहम् की तुष्टि ही उसके जीवन का उद्देश्य बनकर रह गया है आज शहरों की कॉलोनियां बुजुर्गों से शोभित है, जहां बच्चों की किलकारियों का संगीत नहीं है। यह सब हमारे समय का सच है। 
                                     4.दो पीढ़ियों के मध्य संतुलन का अभाव होने से पीढ़ीगत अंतराल बढ़ता जा रहा है ।पुरानी पीढ़ी के पास यही अनुभव हैै तो नई पीढ़ी के पास प्रतिभा। दोनों में टकराव बढ़ रहा है । एक ओर परंपराओं का अत्यधिक आग्रह है तो दूसरी ओर समय के साथ तेज गति से बढ़ना। यह अलगाव को जन्म दे रहा है। इन परिस्थितियों में हम न तो अपने आदर्शों से विमुख हो सकते हैं और न ही इस कड़वे सच से अलग। मौन होकर दर्शक की भूमिका निभाना हमारी विवशता हो गई है। फिर भी समृद्धिमय पारिवारिक जीवन के बीज हमें आयातीत संस्कृति में कदापि नहीं मिल सकते।
                              यदि हम भारतीय जीवन दृष्टि का गहराई से अवलोकन करें तो कुछ आशा के बिंदुओं पर कराते हैं जिन पर ध्यान दिया जाना वर्तमान की आवश्यकता है, जैसे-
                         1. पारिवारिक समरसता के लिए चार गुण अनिवार्य हैं,वे हैं- सहनशीलता, स्नेहशीलता,श्रमशीलताऔर पारस्परिक विश्वास। इन गुणों को सहेजकर पारिवारिक बिखराव को रोका जा सकता है। 
                                          2. मैकेंजी के अनुसार, “परिवार यदि छोटा राज्य है तो शिशु उसका वास्तविक सम्राट।” संयुक्त परिवार में बालक का संपूर्ण व्यक्तित्व निखर सकता है। अब हमें सोचना है कि हम अपनी संतति को किस दिशा में ले जाएं?
                                            3. भारतीय परिवारों में नारी ममता,समता और क्षमता की त्रिवेणी है। ममता से वह नई पीढ़ी का पोषण करती है ,समता से परिवार का संचालन करती है, वहीं क्षमता से विपरीत परिस्थितियों में भी घर को बचा लेती है। अतः नारी के आंतरिक गुणों का सम्मान होना अपेक्षित है। 
                               4. आज परिवार में युवा उपेक्षित है। वह न तो बड़ो की श्रेणी में है और न बच्चों की। माता-पिता की असीमित महत्वकांक्षाएं उसका दम घोंट रही है। वह विद्रोही होता जा रहा है। परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को यह समझना होगा की युवा पीढ़ी आने वाले समय की संपदा है। इनके स्वप्नों को अपने विचारों को गुलाम नहीं बना कर इनकी मौलिक सोच को प्रोत्साहन व अपनापन दे। यह युवा कंधे अपने पिता के सबसे मजबूत साथी होंगे। 
                            5. बुजुर्ग हमारी विरासत है। उनका सम्मान अपनी सांस्कृतिक धरोहर की अक्षुण्णता को बनाए रखेगा। उनका दायित्व है कि वह परंपराओं का सामाजिक परिवेश में अवलोकन करें। मृत रूढ़ियों का स्वयं विरोध करें। ऐसी स्थिति में नई पीढ़ी का ममत्व उन्हें जीवन की संपूर्णता का बोध करवाएगा।
                       6. पारिवारिक सदस्य एक-दूसरे की गरिमा का सम्मान रखते हुए सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करे। एकांगी वृत्ति का परित्याग कर समरसीदृष्टि अपनाएं। तब ना तो परिवार में अशांति का वातावरण होगा और ना ही अतार्किक बहस होगी। 
                    7. जहां तक अर्थ की उपयोगिता का प्रश्न है तो यह स्पष्ट है कि सामाजिक जीवन में धन विनियोग का साधन है। जीवन चलाने का माध्यम धन हो सकता है परंतु यही जीवन का एक मात्र साध्य नहीं है। कभी-कभी यह शोषण, उत्पीड़न और भ्रष्ट आचरण का पर्याय बन जाता है। अतः जीवन को अर्थकेंद्रित न रखकर उसे जीवन केंद्रित बनाने का प्रयास करना चाहिए। अभी हमारे पास समय शेष है । पाश्चात्य भोगवादी दृष्टि से प्रभावित होकर हमें अपने विरासत के मूल गुणों को नहीं भूलना चाहिए। ऐसी स्थिति में अपनी समृद्धि के साथ पारिवारिक समरसता भी लौट आएगी, जिसकी चाह हमारे हृदय में कई बार कसक बन कर उभर आती है। -डॉ. राजेंद्र कुमार सिंघवी

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