“ कबीर के राम ”


“ कबीर के राम ”

[ उर्वशी' पत्रिका  के अप्रैल-2020 अंक में प्रकाशित ]

कबीर भया है केतकी, भँवर भये सब दास ।
जहाँ-जहाँ भक्ति कबीर की, तहँ-तहँ राम-निवास ।।

अर्थात् कबीर के ‘राम’ महान् भारतीय संस्कृति के न केवल पर्याय मात्र, वरन् आस्था के विराट स्रोत हैं । महात्मा कबीर ने श्रीराम का आश्रय लेकर तद्युगीन भारतीय जन-मानस को विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव से बचाये हीं नहीं रखा, बल्कि भारत-भूमि की सांस्कृतिक धरोहर को अक्षुण्ण भी रखा । यही कारण है कि यवनों से त्रस्त भारतीय समाज व हिन्दू-संस्कृति संक्रांतिकालीन वेला को सहजता से पार कर गई । 

युगद्रष्टा कबीर ने जब इस भूमि पर अवतरण लिया, वह युग हिन्दुओं के लिए घोर निराशा का था । उनकी संस्कृति व राष्ट्र दोनों ही पद-दलित हो रहे थे । समाज दिशाविहीन था तो संक्रमणकाल में महात्मा कबीर ने भारत-भूमि के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय आदर्श को कायम रखने के लिए लोक-मानस का नेतृत्व किया और अपने प्रखर  व्यक्तित्व से घोर-निराशा के दलदल में फँसी भारतीय जनता को नव-जीवन प्रदान किया, अतः उन्हें सांस्कृतिक विरासत के संवाहक की संज्ञा से अभिहित किया जाये, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं ।

संस्कृति और राष्ट्र ये दोनों शब्द किसी भी जाति के गौरव के परिचायक होते हैं ।  समाज केवल व्यक्तियों का समूह ही नहीं, वरन् एक सावयव सत्ता है और भूमि विशेष के प्रति रागात्मक भाव रखकर चलने वाले  समाज से राष्ट्र बनता है । इस प्रकार भूमि, जन और संस्कृति राष्ट्ररूपी त्रिभुज की तीन भुजाएँ हैं । डॉ. सुधीन्द्र के अनुसार “ भूमि, जन और जन-संस्कृति ही राष्ट्र की आत्मा का विधान करते हैं ।”1 राष्ट्र की आधारशिला सांस्कृतिक वैभव से पुष्ट होती है, क्योंकि संस्कृति के बिना राष्ट्र का अस्तित्व नहीं होता । प्रखर चिन्तक दीनदयाल उपाध्याय ने इस तथ्य का विश्लेषण करते हुए लिखा है, “संस्कृति किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है और कोई भी राष्ट्र तभी तक जीवित माना जा सकता है, जब तक उसकी आत्मा उसके भीतर विद्यमान है, केवल बाह्य उपकरणों से राष्ट्र जीवित नहीं रहता ।”2 

महात्मा कबीर एक ऐसे महामानव थे, जिन्होंने मध्ययुग के तमसाच्छन्न वातावरण में ज्ञानाभा प्रदान करने वाले धर्म-सूर्य की तरह तेजोमयी रश्मियों द्वारा मानवता के मार्ग का निर्देशन किया । डॉ. बैजनाथ प्रसाद शुक्ल के मतानुसार कबीर का युग महान् संघर्षों से गुजर रहा था । समाज विशृंखलित था । हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य चरम पर था।विधर्मी शासकों की तलवारें हिन्दू खून की प्यासी रहती थी, क्योंकि यह युग तुर्कों का था । हिन्दू इस समय नैराश्यता के सिन्धु में डूब-उतरा रहे थे, परन्तु राष्ट्र धर्म के प्रति उनके हृदय में स्नेह बढ़ता ही गया।3 

भारतीय जन मानस अपनी संस्कृति के प्रति निष्ठावान था, तो बाह्याडम्बरों से उसमें विकृतियाँ भी व्याप्त हो गई थी । आचरण की अपेक्षा उपासना पद्धति महत्त्वपूर्ण हो गई थी । महात्मा कबीर ने सर्वप्रथम सरल-जीवन के महत्त्व को रूपायित करते हुए कहा-

सहज सहज सबहीं कहे, सहज न चीन्हें कोय ।
जो कबिरा विषया तजै, सहज कही जै सोय ।।

विधर्मियों के उपहास से आहत भारतीय लोक मानस को अपने आन्तरिक आचरण को शुद्ध करने पर बल दिया और आत्म-ज्योति को जाग्रत करने का आह्वान करते हुए कहा कि इस मन को मथुरा, दिल को द्वारका और काया को काशी समझो । दस द्वारों वाला देवालय रूपी शरीर तुम्हारे पास है, उसी में आत्म-ज्योति को तलाश करो, यथा-

मन मथुरा, दिल द्वारिक, काश कासी जाँनि ।
दस द्वारे का देहरा, तामें जोति पिछांनि ।।

इन पंक्तियों में महात्मा कबीर ने जनता की उपासना पद्धति को परिष्कृत कर उसे भारतीय मूल्यों की ओर अग्रसर किया, जिसमें आत्म-ज्योति का अवलोकन महत्त्वपूर्ण तत्त्व है । हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक गत्यात्मकता ने रूढ़ियों को तोड़कर परम्पराओं को परिष्कृत किया । जातिगत दुर्व्यवहार से त्रस्त हिन्दू समाज को मुक्ति दिलाने में महात्मा कबीर का अद्वितीय योगदान रहा । वर्णाश्रम धर्म की मर्यादा के नाम पर जब हिन्दू समाज अस्पृश्यता के दलदल में फँस गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा-

काहै को कीजै पांडे छोति विचारा, छोति हि ते उपजा संसारा ।
हमारे कैसे लोहू, तुम्हारे कैसे दूध, तुम कैसे ब्राह्मन पांडे, हम कैसे सूद ।।

संस्कृति का अस्तित्व परम्पराओं पर ही निर्भर करता है । अपसंस्कृति  में रूढ़ियाँ निवास करती हैं । इस स्थिति में सांस्कृतिक चेतना अवरूद्ध होती है । महात्मा कबीर के समय में धर्म एवं आचार का वास्तविक रूप कृत्रिमता के कारण दब गया । डॉ. द्वारिकाप्रसाद सक्सेना ने लिखा कि उस समय कोई शैव मत का अनुयायी था,तो कोई नाथ-पंथी था, तो कोई तांत्रिक। ये सभी दुराचारों में लीन थे, मांसाहारी थे, मदिरा-पान करते थे, व्यभिचारी थे, अनाचारी थे और अपनी-अपनी धुन में मस्त रहकर दूसरों को दोषी बताया करते थे ।4 जब महात्मा कबीर को यह लगा कि कतिपय धर्म के ठेकेदार सनातन धर्म की परम्पराओं को विकृत रूप में प्रस्तुत कर आमजन को न केवल भ्रमित कर रहे हैं, बल्कि हमारे आध्यात्मिक गौरव को भी चोट पहुँचा रहे हैं । तब उन्होंने अपनी पैनी दृष्टि से उन सबके कृत्यों का पर्दाफाश किया और कहा कि-

इक दूँहि दीन इक देहि दान, इक करै कलापी सुरापान ।
सब मदमाते, कोऊ न जागै, संग ही चोर घेरे मुसन लागै ।।

 भारतीय संस्कृति अखिल विश्व के समस्त संस्कारों, परम्पराओं, सभ्यता के विभिन्न तत्त्वों, लौकिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक मान्यताओं को समाविष्ट किए हुए हैं । इसलिए मनीषियों ने इसे ‘सा प्रथमा संस्कृति विश्वधारा’ के रूप में बोधित किया है ।5 इसी सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय मनीषा ने राष्ट्र को भी परिभाषित किया है । उनके अनुसार राष्ट्र एक जीवन्त, जाग्रत इकाई है । राष्ट्र स्वयंभू है, सृष्टि की रचना ही इस बात का निर्धारण करती है कि किस राष्ट्र का सृजन, अभ्युदय, पतन अथवा पुनरूत्थान हो, क्योंकि राष्ट्र का भी जीवनोद्देश्य होता है । अतः प्रत्येक राष्ट्र में अस्तित्व बोध होना सहज स्वाभाविक है ।६

भारत में कबीर का जन्म ऐसे समय हुआ जब यवनों का आक्रमण, विदेशियों का भारत में प्रवेश एवं हिन्दू जनता पर अत्याचारों  का बोलबाला था । तुगलकों के भीषण अत्याचारों को यहाँ की जनता झेल ही नहीं पाई थी कि तैमूर का भारत पर आक्रमण होता है । इस युद्ध ने हिन्दुओं की बची-खुची प्रतिष्ठा एवं शान्ति को नष्ट किया तथा नर हत्याओं के द्वारा ऐसी रक्त की नदियाँ बहाई कि धैर्य की धनी भारतीय जनता की आत्मा सिसक-सिसक कर रो उठी । तैमूर ने तो स्पष्ट शब्दों में यह स्वीकार करते हुए लिखा है कि भारत पर आक्रमण करने का मेरा लक्ष्य काफिरों को दण्ड देना, बहुदेववाद और मूर्तिपूजा का विनाश करके गाजी और मुबाहिद बनाना है ।७

ऐसे विकट समय में भारतीय जनता को ऐसे कर्णधार की आवश्यकता थी जो उसका नेतृत्व कर उसकी आन-बान और मर्यादा को बचा सके । संभवतः युग ने ऐसे महान कार्य के लिए ‘राम-दीवाने’ कबीर को प्रेरित किया, जिसने इस राष्ट्र के गौरव को बनाये रख लिया । महात्मा कबीर ने विधर्मी राष्ट्र-विध्वंसकों का प्रत्युत्तर देने हेतु जन-जन की आस्था के केन्द्र ‘राम’ को जाग्रत किया और उनकी दृढ़ता को निर्गुण ब्रह्म में रूपायित कर दिया, जिससे कि उनका विश्वास बना रहे । उन्होंने कहा-

कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउँ ।
गलै राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाऊँ ।।

इस प्रकार के आह्वान से भारतीय लोक-मानस की घोर निराशा व दारिद्रय की मनःप्रवृत्ति को राजनीति से विलग किया और उन्हें समझाया कि ‘राम पत्थर में नहीं, वरन् तुम्हारे भीतर है’ अतः निराश होने की आवश्यकता नहीं है ।

राष्ट्रवाद में ‘जन’ की आत्माभिव्यक्ति महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है, क्योंकि इसी पर राष्ट्र के भव्य रूप का निर्माण संभव है । सन्त कबीर ने उनके रोग-शोक को दूर करने का प्रयास किया । उन्हें स्वयं से और मानवता से प्रेम करने का पाठ पढ़ाया । उन्होंने कहा-

पोथि पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का, पढै सो पंडित होय ।।

समग्र विवेचन से यह भाव प्रकट होता है कि देश जिन विषम परिस्थितियों में गुजर रहा था, उस समय संस्कृति और राष्ट्र को कायम रखना महात्मा कबीर की पहली प्राथमिकता थी । मस्त मौला सन्त को ये विषम परिस्थितियाँ ही वरदान बनकर अनुकूल हो गई और अपने युग के पुरोधा के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन किया । हमारा प्राचीन गौरव यदि उस समय विशेष में विद्यमान रहा, तो उसका श्रेय महात्मा कबीर को जाता है ।

संदर्भ- 
1. हिन्दी कविता में युगांतर, पृ.167
2. उद्धृत, साहित्य परिक्रमा, अप्रेल-जून 2005, पृ.54
3. कबीर एक नव्य बोध, पृ.58
4. हिन्दी के प्राचीन प्रतिनिधि कवि, पृ.107
5. दिवाकर वर्मा, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: एक तात्त्विक अवधारणा, उद्धृत, साहित्य परिक्रमा, अप्रेल-जून, 2005, पृ.55
6. वही, पृ.55
7. एलियस एण्ड डाउसन, पृ.397, उद्धृत, कबीर एक नव्य बोध, पृ.10

शैक्षिक आलेख:रचनात्मक अधिगम



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अनुभव/पूर्वज्ञान                                =परस्थिति निर्माण

चिंतन/विचार                                    = अवलोकन

अनुप्रयोग/सहसंबंध                          =संदर्भीकरण

विश्लेषण-संश्लेषण /वर्गीकरण             =संज्ञानात्मक शिक्षार्थन
                                                          सहयोग

समेकन (नए ज्ञान का निर्माण )         =निर्वचन -सृजन
                                                          बहुविध व्याख्याएं
                                                          बहुविध अभिव्यक्तियाँ


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ये आलेख जुलाई में शिविरा पत्रिका में छप चुका  है।

''किसी खास विचारधारा से कवि का लगाव एक अच्छी बात हो सकती है, लेकिन अनिवार्य नहीं । ''- डॉ. सत्यनारायण व्यास


   “ वह यात्रा जो कभी समाप्त नहीं होगी । ”

डॉ. सत्यनारायण व्यास का प्रथम कविता संग्रह ‘मेरी असमाप्त यात्रा’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ । उक्त शीर्षक कवि के निरन्तर गतिशील व्यक्तित्व को उजागर करता है, जहाँ सृजन कभी समाप्त नहीं होगा । प्रस्तुत कृति में 44 कविताएँ संगृहीत हैं, जो सन् अस्सी के बाद की हैं । इन कविताओं की खासियत यह है कि ये विचारधारा की अपेक्षा मनुष्य को केन्द्र में रखकर लिखी गई हैं । स्वयं डॉ. व्यास का मानना है कि किसी खास विचारधारा से कवि का लगाव एक अच्छी बात हो सकती है, लेकिन अनिवार्य नहीं । विचारधारा पर सवारी गाँठना एक बात है, तो उसी का वाहन बन जाना दूसरी । यह कथन प्रमाणित करता है कि कोई दूसरा पक्ष भी आपकी अन्तःयात्रा का साक्षी हो सकता है, अतः पूर्वाग्रहों से विमुक्त हो जाना चाहिए ।इस कृति की प्रमुख रचनाएँ हैं- वेदना का भीलनृत्य, शब्द के प्रति, सबसे बड़ा सत्य, शिव की बारात, आत्म चिंतन, कौन सी माँ, चिल्लाओ मत, सर्च लाइट, महान पाठक, मनुष्य के पक्ष में, असमाप्त यात्रा आदि । विषयों की विविधता से संपृक्त इन रचनाओं को पाठक की दृष्टि से व्यक्त करना आवश्यक समझता हूँ-

जिसका क्षरण नहीं होता, उसे अक्षर कहा गया है अतः अक्षर ईश्वर के समतुल्य है । अक्षर से शब्द बनते हैं और हमारे शास्त्रों में शब्द को ब्रह्म कहा गया है । जब यही ब्रह्म कवि के कंठ में उतरता है तो वह कभी फूल तो कभी अंगार नजर आता है । कवि अपनी श्रद्धा एवं कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए शब्द को संबोधित करता है-

शब्द

कभी तू कंठ से झरता है निर्झर-सा
तो कभी फूल-सा खिलता है
तो कभी धधकता है,
क्रांति के अंगार पथ-सा
कितना बहुरंगी शरीर तेरा ।

(शब्द के प्रति)

असंतोष, अस्वीकृति और विद्रोह का स्वर साठोत्तरी कविता का केन्द्रीय स्वर रहा है, कारण स्पष्ट है कि आजादी के बाद हमारे स्वप्न नष्ट हो गए । जहाँ अराजकता को ‘व्यवस्था’ का नाम दिया जाये, वैसी राजनीति  में विचारशील प्राणी

आत्मग्लानि महसूस करता है, यथा-
गिद्धों को माँस की रखवाली सौंपना
मेरे देश का हो गया है स्वभाव,
अराजकता का अर्थ
अब हो गया है “व्यवस्था” ।
-  -  -

सत्य, अहिंसा और मानवता की सुन्दर परियाँ
विश्व के झरोखों पर बैठीं
हम पर थू-थू करती है ।

                                    (शिव की बारात)

कवि की द्दष्टि भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र पर बहुत तीखी है । जब आम जिन्दगी इस विडम्बना को अपनी नियति मान ले और उसकी आवाज को दबाने का प्रयास किया जाता है, तब संवेदनशील रचनाकार का आक्रोश व्यंग्य की वृष्टि करता है-

मेरे भूखे-प्यासे देशवासियों,
इतना चिल्लाते क्यों हो?
कुछ बरसों इन्तजार करो-
पीने का पानी आता-आता ही आएगा
और रोटी?
रोटी तो तुम्हें
तुम्हारा पुनर्जन्म ही दिला पाएगा ।

                                    (चिल्लाओ मत)

शोषण की जब पराकाष्ठा हो, मानव स्वार्थी हो गया हो, अधिकार लोलुपता के दंभ में इंसानियत भूल गया हो । तब कवि की ‘सर्चलाइट’ ऐसे शोषकों को ढूँढ़ने निकल पड़ती है और आक्रोश का लावा फूट पड़ता है । कवि की उक्त पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

बहुमंजिली इमारत के वातानुकूल कमरे में
दो-दो हजार की नरम चेयर्स पर बैठे मवेशी
घास नहीं, मेहनत चबाते हैं,
पसीना पीते हैं,
और फिर पैसा हंगते हैं ।
वैसे कोई ज्यादा नहीं,
करोड़पति हों या अरबपति
हर देश में मुट्ठी भर मंगते हैं ।

                                    (सर्चलाइट)

आधुनिक मानव का व्यक्तित्व देवता-सा नजर आता है, किंतु कर्तृत्व जानवर-सा । इन दोनों के बीच उसका मुनष्य होना गायब हो गया है । वस्तुतः देवता बनने के नाटक में उतना ही पशुवत् व्यवहार करता है और सही मायने में मनुष्य भी नहीं रह पाता । कवि उसी ‘मनुष्यता’ को ढूँढ़ने की बात कहता हुआ एक शाश्वत सत्य को उजागर करता है-

हमारे बढ़ते नाखून साक्षी हैं
उस संक्रमण के
जो भेड़िए से मनुष्य होने की
भयानक प्रक्रिया है
खून में छिपा भेड़िया
नाखून बढ़ाता है
किंतु मनुष्य का सजग विवके
बराबर उसे काटता जाता है ।

                                    (मनुष्य के पक्ष में)

पदार्थवादी दुनिया के व्यामोह में हमने अपना मौलिक चरित्र खो दिया है, भीतर का खोखलापन हमें दिखाई नहीं देता । अतीत की स्वर्णिम यादों को भी आधुनिकता की वीभत्स आकांक्षाओं में विलुप्त कर दिया है । ‘माँ’ जैसा चरित्र किस तरह आधुनिकता का शिकार हुआ है, द्रष्टव्य है-

हाथ में सिगरेट लिए
टाइट-सी जिन्स पहने
आधुनिक ‘मदर’ को देख
जाने क्यों मुझे-
हर दो मिनिट बाद
सिर का आँचल संभालती
वह माँ याद आ जाती है ।

आधुनिक बुद्धिजीवी मन महत्त्वाकांक्षा का मोती पाने हेतु स्वार्थों की सीपी तैयार करता है। वह समाज की विसंगतियों को मौन होकर स्वीकार कर लेता है, तब उसका सृजनधर्मी हृदय विविध पक्षों में सामंजस्य की गणना करता स्वयं निर्वासन भोगता है । जीवन में उत्कृष्टता को प्राप्त करने की लालसा में पीड़ा को स्वीकारता उसका बेचैन हृदय अभिव्यक्ति देता है-

अभिव्यक्ति की ब्रह्मराक्षस से
निर्णायक युद्ध लड़ने को
लाश के भीतर अपनी
रीढ़ की हड्डी ढूँढ़ता हूँ
ताकि शब्दों का वज्र निर्मित हो ।

                                    (वेदना का भील नृत्य)

मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी मन अपने दायित्व के प्रति सदैव सजग रहता है, वह प्रतिरोध की आकांक्षा भी रखता है, किंतु व्यवस्थाओं ओर बंधनों से मुक्त नहीं हो पाता । परिणामस्वरूप निर्णायक सफलता भी प्राप्त नहीं कर पाता । तब उसका निराश मन अवचेतन की कुंठा से बाहर आने का असफल प्रयास करता है और यथार्थ को स्वीकार करते हुए कहता है-

उल्लू भी ज्यादा खुशनसीब है,
जो अमावस की स्याह रात में
अपना लक्ष्य ढूँढ़ लेता है ।
-   -  -

हम तो बस खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं,
और गाते हैं सपने में,
चन्द गीत मादा के नाम ।
और अंत में-
मटके-सा सर लटका अरथी पर
मरघट तक चले जाते हैं ।

                                    (असमाप्त यात्रा)

समग्रतः डॉ व्यास की ‘मेरी असमाप्त यात्रा’ कविता-संग्रह में आक्रोश, सामाजिक बदलाव की चाहत तथा विसंगतियों पर प्रहार के साथ जीवन के प्रति आस्थावादी द्दष्टि विद्यमान है । कविताओं में कहीं ‘मुक्तिबोध’ का आदर्शवादी मन स्वयं को धिक्कारता है, तो कहीं ‘धूमिल’ की तरह राजनीतिक चक्रव्यूह को स्वयं भेदन करता हुआ अभिमन्यु की तरह प्रकट होता है । कविताओं में विचारधारा का अनुसरण नजर नहीं आता, बल्कि डॉ. व्यास के विचार ही धारानुमा प्रतीत होते हैं । उक्त कृति में मानव-मन से लेकर समाज के विशाल फलक पर व्याप्त विसंगति को उजागर कर समाधान देने का प्रयास हुआ है अतः यह यात्रा कभी समाप्त नहीं होगी, ऐसी आशा है ।
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'असमाप्त यात्रा' के लेखक 


डा. सत्यनारायण व्यास,जिनकी पहचान ख़ास तौर पर आलोचक और कवि के रूप में रही है.मूल रूप से राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में हमीरगढ़ के वासी पिछले कई सालों से चित्तौड़गढ़ में रहते हैं.जीवनभर में तेरह नौकरिया की.घुमक्कड़ी का पूरा आनंद.कोलेज शिक्षा से हिंदी प्राध्यापक पद से सेवानिवृत.आचार्य हजारी प्रसाद द्विबेदी पर पीएच.डी.,दो कविता संग्रह,एक प्रबंध काव्य,पीएच.दी. शोध पुस्तक रूप में प्रकाशित है.इसके अलावा कई पांडुलिपियाँ छपने की प्रतीक्षा में.कई विद्यार्थियों के शोध प्रशिक्षक रहे.अपनी बेबाक टिप्पणियों और सदैव व्यवस्था विरोध के लिए जाने जाते हैं.कई सेमिनारों में पढ़े/सुने गए हैं.आकाशवाणी से लगातार प्रसारित हुए हैं.उनकी मुख्य कविताओं में शंकराचार्य का माँ से संवाद, कथा हमारे उस घर की सीता की अग्नि परीक्षा हैं.उनका संपर्क पता 29,नीलकंठ कालोनी, मोबाइल- 09461392200 चित्तौड़गढ़, राजस्थान उनका ब्लॉग लिंक है .
पुस्तक समीक्षक  का परिचय :-

डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी
(अकादमिक तौर पर डाईट, चित्तौडगढ़ में वरिष्ठ व्याख्याता हैं,आचार्य तुलसी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर ही शोध भी किया है.निम्बाहेडा के छोटे से गाँव बिनोता से निकल कर लगातार नवाचारी वृति के चलते यहाँ तक पहुंचे हैं.शैक्षिक अनुसंधानों में विशेष रूचि रही है.)

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राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005


शैक्षिक वार्ता
विषयः- राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005
सम्पादन- डॉ.राजेन्द्र सिंघवी,प्रभागाध्यक्ष सी.एम.डी.ई.

विषय प्रवेश:-
1. यह विद्यालयी शिक्षा का अब तक का नवीनतम राष्ट्रीय दस्तावेज है ।
2. इसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के के शिक्षाविदों,वैज्ञानिकों,विषय विशेषज्ञों व अध्यापकों ने मिलकर तैयार किया है ।
3. मानव विकास संसाधन मंत्रालय की पहल पर प्रो0 यशपाल की अध्यक्षता में देश के चुने हुए 23 विद्वानों ने           शिक्षा को नई राष्ट्रीय चुनौतियों के रूप में देखा ।

मार्गदर्शी सिद्धान्तः-
1. ज्ञान को स्कूल के बाहरी जीवन से जोडा जाय ।
2. पढाई को रटन्त प्रणाली से मुक्त किया जाय ।
3. पाठ्यचर्या पाठ्यपुस्तक केन्द्रित न रह जाय ।
4. कक्षाकक्ष को गतिविधियों से जोडा जाय ।
5. राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति आस्थावान विद्यार्थी तैयार हो ।

प्रमुख सुझावः-

1. शिक्षण सूत्रों जैसे-ज्ञात से अज्ञात की ओर, मूर्त से अमूर्त की ओर,आदि का अधिकतम प्रयोग हो ।
2. सूचना को ज्ञान मानने से बचा जाय ।
3. विशाल पाठ्यक्रम व मोटी किताबें शिक्षा प्रणाली की असफलता का प्रतीक है ।
4. मूल्यों को उपदेश देकर नहीं वातावरण देकर स्थापित किया जाय।
5. अच्छे विद्यार्थी की धारणा में बदलाव आवश्यक है अर्थात् अच्छा
 विद्यार्थी वह है जो तर्क पूर्ण बहस के द्वारा अपने मौलिक विचार
 शिक्षक के सामने प्रस्तुत करता है ।
6. अभिभावकों को सख्त सन्देश दिया जाय कि बच्चों को छोटी उम्र
 में निपुण बनाने की आकांक्षा रखना गलत है ।
7. बच्चों को स्कूल से बाहरी जीवन में तनावमुक्त वातावरण प्रदान
 करना ।
8. “कक्षा में शान्ति” का नियम बार-बार ठीक नहीं अर्थात् जीवन्त कक्षागत वातावरण को प्रोत्साहित किया         जाना चाहिए ।
9. सहशैक्षिक गतिविधियों में बच्चों के अभिभावकों को भी जोडा जाय ।
10. समुदाय को मानवीय संसाधन के रूप में प्रयुक्त होने का अवसर दें ।
11. खेल आनन्द व सामूहिकता की भावना के लिए है, रिकार्ड बनाने व तोडने की भावना को प्रश्रय न दे ।
12. बच्चों की अभिव्यक्ति में मातृ भाषा महत्वपूर्ण स्थान रखती है । शिक्षक अधिगम परिस्थितियों में इसका उपयोग करें ।
13. पुस्तकालय में बच्चों को स्वयं पुस्तक चुनने का अवसर दे ।
14. वे पाठ्यपुस्तकें महत्वपूर्ण होती है जो अन्तःक्रिया का मौका दे ।
15. कल्पना व मौलिक लेखन के अधिकाधिक अवसर प्रदान करावें ।
16. सजा व पुरस्कार की भावना को सीमित रूप में प्रयोग करना चाहिए ।
17. बच्चों के अनुभव और स्वर को प्राथमिकता देते हुए बाल केन्द्रित शिक्षा प्रदान की जाय ।
18. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मनोरंजन के स्थान पर सौन्दर्यबोध को प्रश्रय दे ।
19. शिक्षक प्रशिक्षण व विद्यार्थियों के मूल्यांकन को सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाया जाय ।
20. शिक्षकों को अकादमिक संसाधन व नवाचार आदि समय पर पहुंचाये जाये ।



डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

(अकादमिक तौर पर डाईट, चित्तौडगढ़ में वरिष्ठ व्याख्याता हैं,आचार्य तुलसी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर ही शोध भी किया है.निम्बाहेडा के छोटे से गाँव बिनोता से निकल कर लगातार नवाचारी वृति के चलते यहाँ तक पहुंचे हैं.वर्तमान में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की चित्तौड़ शाखा के जिलाध्यक्ष है.शैक्षिक अनुसंधानों में विशेष रूचि रही है.'अपनी माटी' वेबपत्रिका के सम्पादक मंडल में बतौर सक्रीय सदस्य संपादन कर रहे हैं.)


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