“ महादेवी वर्मा की दृष्टि में भारतीय नारी ”


“ महादेवी वर्मा की दृष्टि में भारतीय नारी ”

छायावादी प्रकृति, तरल, सरल सौन्दर्य पर प्रेम, विरह और वेदना का स्वर संधान कर, उस विरह वेदना को रहस्यमयी अध्यात्म चेतना की अंतरंग अनुभूतियों से सजा-संवार कर, अपने काव्यमय स्वरों में जिसने महनीय, काम्य एवं ग्राह्य बना दिया, उस महान् विभूति का नाम है - श्रीमती महादेवी वर्मा ।1 इनका साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है, क्योंकि वह काव्य, रेखाचित्र, निबंध और आलोचना साहित्य से निर्मित हुआ है । वस्तुतः इनके द्वारा सृजित साहित्य की दो धुरियाँ हैं । एक धुरी उनका काव्य है, जिसमें करूणा और वेदना की अजस्र धारा प्रवाहित हुई है । दूसरी धुरी गद्य साहित्य है, जिसमें उनकी सामाजिक यथार्थ दृष्टि एवं सामाजिक चिंतनधारा है । उनके सामाजिक चिंतन का उत्कर्ष ‘शृंखला की कड़ियाँ’ (1942) निबंध संग्रह में संगृहीत निबंधों में देखा जा सकता है, जिसमें भारतीय नारी विषयक चिंतन व्यवस्थित है । 

इन निबंधों में प्रमुख हैं - हमारी शृंखला की कड़ियाँ, युद्ध और नारी, नारीत्व का अभिशाप, आधुनिक नारी, हिन्दू स्त्री का पत्नीत्व, स्त्री के अर्थ स्वातंत्र्य का प्रश्न आदि । इनमें भारतीय नारी की परवशता का रेखांकन दृष्टिगोचर होता है, किन्तु उन्होंने जिन सवालों को उठाया है, वहां आक्रोश नहीं है, वरन् एक प्रकार की शालीनता है । इसलिए कि वे सृजन पर विश्वास करती हैं और उनका ध्वंस के द्वारा पुनर्सृजनपर विश्वास नहीं है । इससे स्पष्ट होता है कि वे भारतीय समाज की विकृतियों को सृजन के द्वारा मिटाना चाहती हैं, जिनसे  भारतीय नारी प्रारंभ से ही अनेक कठिनाइयों का सामना कर रही है ।२

महादेवी वर्मा का नारी चिंतन समाज केन्द्रित है, फलतः तटस्थ और निष्पक्ष है । वे नारी जीवन की विडम्बनाओं के लिए पुरूषों को ही दोषी नहीं ठहराती, बल्कि महिलाओं को भी समान रूप से उत्तरदायी ठहराती है । ‘अपनी बात’ में वह कहती है, “समस्या का समाधान समस्या के ज्ञान पर निर्भर करता है और यह ज्ञान ज्ञाता की अपेक्षा रखता है । अतः अधिकार के इच्छुक व्यक्ति को अधिकारी भी होना चाहिए । सामान्यतः भारतीय नारी में इसी विशेषता का अभाव मिलेगा ।”3 भारतीय नारी की अदृष्ट विडम्बना को उजागर करते हुए उन्होंने लिखा कि एक ओर तो वह देवी के प्रतिष्ठापूर्ण पद पर शोभित है तो दूसरी ओर परवश भी । उनका कथन है, “ वह पवित्र देव मन्दिर की अधिष्ठात्री देवी भी बन चुकी है और अपने गृह के मलिन कोने की बन्दिनी भी ।”4 

श्रीमती वर्मा ने समाज की पूर्णता हेतु पुरूष एवं नारी के स्वतंत्र व्यक्तित्व को आवश्यक माना । उनकी दृष्टि में नारी को पुरूष की छाया मात्र मानना नारी जाति के लिए अभिशाप है। प्राचीन भारती की विदुषी मैत्रेयी, सीता, यशोधरा आदि के साथ महाभारतकालीन स्त्रियों के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए लिखा, “महाभारत के समय की कितनी ही स्त्रियाँ अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व तथा कर्तव्यबुद्धि के लिए स्मरणीय रहेंगी । उनमें से प्रत्येक संसार पथ में पुरूष की संगिनी है, छाया मात्र नहीं ।”5 उन्होंने नारियों को पुरूषोचित अनुकरण वृत्ति को उचित नहीं माना, क्योंकि इससे सामाजिक शृंखला शिथिल तथा व्यक्तिगत बंधन और संकुचित होते हैं । इसीलिए वे भारतीय समाज में नारी की दयनीय स्थिति के लिए नारी के अर्थहीन अनुसरण और अनर्थमय अनुकरण को जिम्मेदार ठहराती है- “पुरूष के अन्धानुकरण ने स्त्री के व्यक्तित्व को अपना दर्पण बनाकर उसकी उपयोगिता को सीमित कर ही दी, साथ ही समाज को भी अपूर्ण बना दिया ।”6 दोनों की तुलना करते हुए वह कहती हैं- “पुरूष समाज का न्याय है, स्त्री दया, पुरूष प्रतिशोधमय क्रोध है, स्त्री क्षमा, पुरूष शुष्क कर्त्तव्य है, स्त्री सरस सहानुभूति और पुरूष बल है, स्त्री हृदय की प्रेरणा ।”7 इस प्रकार उनकी दृष्टि में स्त्री-पुरूष के प्राकृतिक मानसिक वैपरीत्य द्वारा ही समाज  सामंजस्यपूर्ण व अखण्ड हो सकता है । 

श्रीमती वर्मा ने सामाजिक बंधनों को उनके वैयक्तिक विकास में बाधक माना । चूंकि वह भी समाज का आधा हिस्सा है, अतः उसकी उपेक्षा के प्रति सचेत करते हुए लिखा, “ जो देश के भावी नागरिकों की विधाता हैं, उनकी प्रथम और परम गुरू हैं, जो जन्म भर अपने आपको मिटाकर, दूसरों को बनाती रहती हैं, वे केवल तभी तक आदरहीन मातृत्व तथा अधिकार शून्य पत्नीत्व स्वीकार करती रह सकंगी, जब तक उन्हें अपनी शक्तियों का बोध नहीं होता । बोध होने पर वे बन्दिनी बनाने वाली शंृखलाओं को स्वयं तोड़ फेकेंगी ।”8 ‘युद्ध ओर नारी’ विषयक लेख में उन्होंने नारी को अहिंसा प्रिय बताया तथा युद्ध को नारी के विकास में भी बाधक बताया”, स्त्री केवल शारीरिक और मानसिक दृष्टि से ही युद्ध के अनुपयुक्त नहीं रही, वरन् युद्ध उसके विकास में भी बाधक रहा है ।’9 

नारी के महान् से महान् त्याग को भी संसार ने उच्च दृष्टि से स्वीकार न कर उसे उसकी दुर्बलता माना । ‘नारीत्व के अभिशाप’ विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा, “क्या नारी के बड़े से बड़े त्याग को, आत्मनिवेदन को, संसार ने अपना अधिकार नहीं, किंतु उसका अद्भुत दान समझकर नम्रता से स्वीकार किया है? कम से कम इतिहास तो नहीं बताता कि उसके किसी बलिदान को पुरूष ने उसकी दुर्बलता के अतिरिक्त कुछ और समझने का प्रयत्न किया ।”10 उन्हें इस बात का भी क्षोभ है कि नारी ने अपनी शक्ति को समझने का कभी प्रयास ही नहीं किया । वह स्वयं अपनी वेदना के कारणों को नहीं जानती और न अपने असह्य कष्ट के प्रतिकार की भावना से परिचित है । वे नारी की कोमलताजनित दुर्बलता को भी अभिशाप मानती हैं, जिसके कारण वह उसे जीवन की स्वाभाविकता मान लेती है- “वह अपनी प्रकृति-जनित कोमलता को त्रुटि चाहे मानती हो, परन्तु उसे स्वाभाविक अवश्य समझती है, अन्यथा उसके इतने प्रयास का कोई अर्थ न होता ।”11 
आधुनिक नारियों की स्वच्छन्द प्रवृत्ति व निरूद्देश्य गंतव्य को अनुचित ठहराते हुए उन्होंने प्राचीन नारियों के योगदान को तुलनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया । आधुनिक नारी ओर प्राचीन नारी के बारे में वे कहती हैं, “आज की सुन्दर नारी भी पुरूष के निकट और कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती । उसे स्वयं भी इस कटु सत्य को बोध होता है, परंतु वह उसे परिस्थिति का दोषमात्र समझती है ।.........  पहले की नारी जाति केवल रूप और वय का पाथेय लेकर संसार यात्रा के लिए नहीं निकली थी । उसने संसार को वह दिया जो पुरूष नहीं दे सकता था, अतः उसके अक्षय वरदान का वह आज तक कृतज्ञ है ।”12 

महादेवी जी ने नारी के घर और बाहर के कर्त्तव्यों एवं अधिकारों की कठिनाइयों पर भी चिंतन किया है । उनका मानना है कि युगों से नारी का कार्यक्षेत्र घर तक सीमित रहा है, किंतु आधुनिक काल में उसके कर्त्तव्यों का विस्तार हुआ है । वे कहती हैं, “वास्तव में स्त्री भी अब केवल रमणी या भार्या नहीं रही, वरन् घर के बाहर भी समाज का एक विशेष अंग तथा महत्त्वपूर्ण नागरिक है, अतः उसका कर्त्तव्य भी अनेकाकार हो गया है, जिसके पालन में कभी-कभी ऐसे संघर्ष के अवसर आ पड़ते हैं, जिसमें किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाना पड़ता है ।”13 महादेवी जी ने पुरूषों की इस धारणा को नकार दिया है कि आधुनिक शिक्षा प्राप्त स्त्रियाँ अच्छी गृहणियों का बाहर आकर इस क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता देनी होगी । वे लिखती हैं, “जब तक हम अपने यहाँ गृहणियों को बाहर आकर इस क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता न देंगे, तब तक हमारी शिक्षा में व्याप्त विष बढ़ता ही जाएगा ।”14 

महीयसी महादेवी जी ने हिन्दू स्त्री के पत्नीत्व की भी चर्चा की है और बताया है कि हमारे समाज में उसके जीवन का प्रथम लक्ष्य पत्नीत्व तथा अंतिम मातृत्व समझा जाता रहा है ।  यहाँ वे समाज से प्रश्न करती हैं- “समाज की स्थिति के लिए मातृत्व पूज्य हैं, व्यक्ति की पूर्णता के लिए सहधर्मिणीत्व भी श्लाघ्य है, परंतु क्या यह माना जा सकता है कि सौ में से सौ स्त्रियों की शारीरिक तथा मानसिक स्थिति केवल इन्हीं दो उत्तरदायित्वों के उपयुक्त होगी? ”15 शिक्षा की दृष्टि से नारियों की सामाजिक यथार्थ की स्थिति का सटीक चित्रण करते हुए कहा, “प्रथम तो माता-पिता कन्या की शिक्षा के लिए कुछ व्यय ही नहीं करना चाहते, दूसरे यदि करते भी हैं तो विवाह की हाट में उनका मूल्य बढ़ाने के लिए, कुछ उनके विकास के लिए  नहीं ।”16 किन्तु उनका मानना है कि स्त्री के विकास की चरम सीमा उसके मातृत्व में हो सकती है, बशर्ते कि उसकी इच्छा-अनिच्छा, योग्यता-अयोग्यता का पूरा ध्यान रखा गया हो । 

महादेवी जी ने वार-वनिताओं की विडम्बनाओं पर भी गहरा चिंतन किया है । उनका मानना है कि गर्वित समाज, जिन्हें पतित नारी की संज्ञा देता है, वस्तुतः ऐसी नारियों ने पुरूष वासना की वेदी पर घोरतम बलिदान किया है । वे कहती हैं, “उनके नारीत्व को दूसरों के मनोरंजन मात्र का ध्येय मिला है तथा उनके जीवन का तितली जैसे कच्चे रंगों से शृंगार हुआ है, जिसमें मोहकता है, परंतु स्थायित्व नहीं ।”17 दूसरी ओर साधारणतः महान् दुराचारी पुरूष भी परम सती स्त्री के चरित्र का आलोचक ही नहीं, न्यायकर्ता भी बना रहता है । ऐसी स्थिति में पतित स्त्रियों के जीवन में परिवर्तन लाने का स्वप्न सत्य नहीं हो सकता ।

महादेवी वर्मा ने आदिम युग से लेकर सभ्यता के विकास तक भारतीय समाज में स्त्री की दयनीय दशा का वर्णन किया है । उनकी दृष्टि में इसका कारण स्त्री और पुरूष के अधिकारों की विचित्र विषमता है । वे कहती है, “पुरूष ने उसके अधिकार अपने सुख की तुला पर तोले, उसकी विशेषता पर नहीं, अतः समाज की  सब व्यवस्थाओं में उसके और पुरूष के अधिकारों में एक विचित्र विषमता मिलती है ।... एक ओर सामाजिक व्यवस्थाओं ने स्त्री को अधिकार देने में पुरूष की सुविधा का विशेष ध्यान रखा है, दूसरी ओर उसकी आर्थिक स्थिति भी परावलम्बन से रहित नहीं रही । भारतीय स्त्री के संबंध में पुरूष का भर्ता नाम जितना यथार्थ है, उतना संभवतः और कोई नाम नहीं ।”18 इसीलिए वे अपनी बात स्पष्ट रूप से कहती हैं कि आर्थिक रूप से जो स्थिति स्त्री की प्राचीन समाज में थी, उसमें अब तक परिवर्तन नहीं हो सका है । 

वास्तव में स्त्री केवल पत्नी के रूप में समाज का अंग नहीं है । महादेवी जी की दृष्टि में उसके भिन्न-भिन्न रूपों में व्यापक तथा सामान्य गुणों द्वारा ही समझना समाज के लिए आवश्यक तथा उचित हे । वे लिखती हैं, “आज की हमारी सामाजिक परिस्थिति कुछ और ही है । स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर प्राण-प्रतिष्ठा चाहती है ।... आज उसके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरूष को चुनौती देकर अपनी शक्ति की परीक्षा देने का प्रण किया है और उसी में उतीर्ण होने को जीवन की चरम सफलता समझती है ।”19 वर्तमान समाज में नारी के साथ होने वाले व्यवहार पर उन्होंने बेबाक टिप्पणी की है- “ जैसे-जेसे हमारा समाज अपने आधे सदस्यों से अधिकारहीन बलिदान ओर आत्म-समर्पण लेता जा रहा है, वैसे-वैसे वह भी अपने अधिकार खोता जा रहा है, यह समाज के असंतोषपूर्ण वातावरण से प्रकट है ।”20 
वस्तुतः साठोत्तरी चिंतन में नारी चिंतन की दिशा बदल सी गई है । जहाँ भारतीय समाज की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए एक आधुनिक एवं पुरूष से परे तथा उसके समानांतर स्त्री की छवि गढ़ी जा रही है, इसके विपरीत महादेवी वर्मा का लेखन भारतीय संस्कृति की परिधि में स्त्रियों की महत्ता की प्रतिस्थापना है, साथ ही स्त्री की सामाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता पर चिंतन भी है । ‘शृंखला की कड़ियाँ’ पुस्तक में स्त्री समाज की समस्याओं पर विचार के बहाने उन संदर्भों और संकेतों का सामाजिक रूप भी प्रस्तुत किया गया है, जिनसे स्त्री-समाज के अंदर हो रहे परिवर्तन और विकास की प्रक्रियाओं को समझा जा सकता है । देवेन्द्र चौबे के मतानुसार, ‘शृंखला की कड़ियाँ’ मात्र एक पुस्तक नहीं है, बल्कि इसमें स्त्री के सामाजिक इतिहास लेखन के से स्रोत मौजूद हैं, जो स्त्री विषयक इतिहास लेखन की दशा और दिशा को तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं ।”21 

महादेवी वर्मा ने 1935 में ‘चाँद’ पत्रिका के विदुषी अंक का संपादन किया था । पत्रिका के संपादकीय में आधुनिक महिला जगत् की स्थिति पर उनकी टिप्पणी थी, “अवश्य ही आज की नारी प्राचीन नारी जगत् की वंशज नहीं जान पड़ती, इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि वह स्वयं अपनी शक्ति और दुर्बलता दोनों से अनभिज्ञ है ।”22 विश्वंभर मानव के अनुसार, “भारतीय नारी का मुख्य दोष महादेवी जी ने यह बतलाया है कि उसमें व्यक्तित्व का अभाव है। उसे न अपने स्थान का ज्ञान है, न कर्त्तव्य का । जो लोग उसकी सहायता करना चाहते हैं, वह उन्हीं का विरोध करती है ।”23 डॉ. रामचन्द्र तिवारी ने लिखा है, “महादेवी ने नारी को केन्द्र में रखकर ही समस्याओं पर दृष्टिपात किया है । इन निबंधों में उनका भारतीय नारी के प्रति सहानुभूति से भरा हुआ मन उन सामाजिक तत्वों के प्रति क्षुब्ध है जो नारी के लिए ‘शृंखला की कड़ियाँ’ बन गए हैं । महादेवी शृंखला की कड़ियों को काट फेंकने के लिए नारी को उद्बुद्ध करना चाहती हैं, किंतु वे यह भी चाहती हैं कि विद्रोहिणी नारी अपने नारीत्व के मूलभूत आधारों को भी सुरक्षित रखे ।”24 

वस्तुतः महादेवी जी का नारी चिंतन कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है । क्योंकि यह उस समय का है जब भारतीय नारी का 90 प्रतिशत हिस्सा निरक्षर था तथा सामाजिक चेतना नही ंके बराबर थी । आज तो नारी साहित्य लेखन के भी केन्द्र में आ गई है । ‘नारी-विमर्श’ के नाम पर अंतहीन बहसें भी हो रही है, जहां कभी देहवाद की चर्चा होती है तो कहीं उसे स्वैराचार की अनुमति दी जाती है । कहीं उसकी पुरूषों से तुलना कर उसकी मौलिकता को खतरे में डाला जा रहा है, फिर भी ऐसा नहीं लगता है कि भारतीय समाज में नारी की स्थिति में कोई विशेष सुधार आया है । भले ही आज सरकारी आरक्षण से नारी की सामाजिक गति बढ़ी है, किंतु अपने परिवार के भीतर उसकी स्थिति पूर्ववत् ही है । ‘स्त्री-विमर्श’ के इस दौर में नारी जाति के गौरव को पुनः दिलाना तो दूर, बल्कि उसके स्वाभाविक गुणों को भी नेस्तनाबूद किया है । यह सब पाश्चात्य-मानसिकता का फल है । 

परंतु महादेवी जी का नारी-चिंतन भारतीय परिवेश को ध्यान में रखकर है, अतः कई अर्थ भी रखता है । यह किसी प्रकार की प्रभुता की आकांक्षा नहीं करता, बल्कि इसका स्वर नपा-तुला और सामंजस्यपूर्ण है ओर उन बुनियादी सवालों को उठाता है, जिसका परिवार से लेकर राष्ट्र निर्माण में महत्त्व असंदिग्ध है ।उनका चिंतन परम्परा के बंधनों से जकड़ी नारी के लिए देह की मुक्ति की बजाय सत्ता को चुनौती देता है । इसीलिए यह चिंतन आधी नागरिक जाति को अपने अधिकारों और कर्त्तव्यों की याद दिलाता है और उन्हें पाने और दिलाने के लिए संघर्ष की प्रेरणा देता है, जिसका अंतिम ध्येय सभ्य और सुसंस्कृत समाज का पुनर्निर्माण करना है । इस तरह उनका नारी विषयक चिंतन स्त्री विषयक इतिहास लेखन की दशा और दिशा को तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.यदि आज के ‘नारी-विमर्श’ के केन्द्र में महादेवी का चिंतन भी सम्मिलित कर लिया जाए तो उस विमर्श के सार्थक परिणाम आ सकते हैं । 

संदर्भ ग्रंथ-
1. हिन्दी के आधुनिक प्रतिनिधि कवि-डॉ. सुरेश अग्रवाल, अशोक प्रकाशन, दिल्ली सं.1998, पृष्ठ 251
2. आजकल, मार्च 2007, पृष्ठ 68
3. शृंखला की कड़ियाँ- महादेवी वर्मा लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं.2004 पृ.10
4. पूर्ववत्, पृष्ठ 11
5. पूर्ववत्, पृष्ठ 13
6. पूर्ववत्, पृष्ठ 15
7. पूर्ववत्, पृष्ठ 15
8. पूर्ववत्, पृष्ठ 24
9. पूर्ववत्, पृष्ठ 32-33
10. पूर्ववत्, पृष्ठ 36
11. पूर्ववत्, पृष्ठ 44
12. पूर्ववत्, पृष्ठ 46
13. पूर्ववत्, पृष्ठ 56
14. पूर्ववत्, पृष्ठ 66
15. पूर्ववत्, पृष्ठ 77
16. पूर्ववत्, पृष्ठ 85
17. पूर्ववत्, पृष्ठ 88
18. पूर्ववत्, पृष्ठ 99-100
19. पूर्ववत्, पृष्ठ 121
20. पूर्ववत्, पृष्ठ 140
21. आजकल, मार्च 2007, सं. प्रवीण उपाध्याय, पृ.56
22. पूर्ववत्, पृष्ठ 22
23. हिन्दी साहित्य का सर्वेक्षण, सं. विश्वंभर मानव, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद,पृ..सं.1977, पृ.155
24. हिन्दी का गद्य साहित्य, सं. रामचन्द्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, पुनमुर्द्रण,1999, पृ.630

“ निराला काव्य की युगीन अर्थवत्ता ”


 “ निराला काव्य की युगीन अर्थवत्ता ” 

बीसवीं सदी के काव्य-रचनाकारों में हिन्दी कविता को सबसे अलग व नई ऊर्जा से संपृक्त करने वाले महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने जो सृजन किया, वह काव्य-जीवन और साहित्य के श्रेष्ठतम मूल्यों से अनुप्राणित है । अपने रचना संसार में कवि का व्यक्तित्व काव्य के विराट आयामों के साथ तादात्म्य का अनुभव करके प्रेरणा की समाधि में कुछ ऐसा उठ गया है कि वहां से वाणी की जो भी झंकार उठती है वह सत्य, शिव और सुन्दर की पर्यायवाची बन जाती है । सम्भवतः इसी कारण से उन्हें ‘महाप्राण’ सम्बोधन मिला । महाप्राण निराला की रचनाओं में अनुभूति की पूरी ऊष्मा जीवन का पूरा आवेग है । उसमें कवि की सृजन कल्पना कला की पूरी ऊँचाई से रम्यतम सौन्दर्य प्रसाधनों का चयन करके उद्भूत हुई है । फलतः निराला रचित काव्य की प्रासंगिकता वर्तमान में उन्मेष मूलक अर्थवत्ता प्रदान करने में सक्षम है । 

निराला काव्य में छायावादी प्रेमगीत है, राष्ट्रप्रेम की अभिव्यंजना करने वाले गीत हैं, मातृभूमि की वंदनाएँ व उद्बोधन हैं, शोषण मुक्त समाज की संकल्पना है तथा आध्यात्मिक चेतना, रहस्य व निच्छल भक्ति से पूरित भावुक भक्तिगीत भी हैं । इनके अतिरिक्त सांस्कृतिक आलोक को बिखेरने वाली उनकी लम्बी कविताओं यथा ‘राम की शक्ति पूजा’, ‘तुलसीदास’, ‘शिवाजी का पत्र’, विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । इसी प्रकार जीवन, कर्म और मृत्यु सभी के प्रति उदात्त भाव अभिव्यक्त करने वाली रचना ‘सरोज स्मृति’ है । राष्ट्रीयता, देश की मिट्टी के प्रति प्रेम, उसकी विरासत के प्रति प्रणत भावना, उसके जन और संस्कृति के प्रति प्रेम और निष्ठा, अतीत की गरिमामय संस्कृति की गाथा, वीर पुरूषों के प्रति श्रद्धा, वर्तमान स्थिति का विश्लेषण और भविष्य के प्रति उज्ज्वल आकांक्षा आदि में प्रकट होती है । छायावादी काव्य में यह राष्ट्रीयता मुख्यतः सांस्कृतिक धरातल पर प्रतिष्ठित हुई है । कविवर पंत ने इस ओर संकेत करते हुए लिखा है ‘छायावादी युग में हिन्दी काव्य भारतीय पुनर्जागरण की चेतना तथा लोक जागरण के आह्वान के साथ सांस्कृतिक परम्पराओं को भी युगबोध के अनुरूप नवीन वाणी दे सका है और उसका सृजन अपना एवं महत्व रखता है’।1 

महाकवि निराला ने युगीन आवश्यकता को दृष्टिगत रखकर राष्ट्रीयता को संस्कृति के स्वरूप में ढ़ालकर चित्रित किया । भारती वंदना, यमुना के प्रति, मातृवन्दना, जागो फिर एक बार, दिल्ली, खण्डहर के प्रति, छत्रपति शिवाजी का पत्र, राम की शक्ति पूजा, तुलसीदास आदि में राष्ट्रीयता का भव्य स्वरूप दृष्टिगोचर होता है । भारत भूमि को माता मानकर स्तुति करते हुए लिखते हैं-

भारति, जय विजय करे
कनक-शस्य-कमल धरे
लंका पद-तल-शत दल
गर्जितोर्मि सागर जल
धोता शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु अर्थ भरे ।2

भारत की गरिमामय संस्कृति की उपेक्षा एवं तिरस्कार करके पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध के मोहजाल में आत्म विस्मृत हो अंधाधुंध दौड़ती भारतीय पीढ़ी को चेतावनी देते हुए उसे सर्व संहारक बताया है-

तुम ने मुख फेर लिया,
सुख की तृष्णा से अपनाया है सरल,
ले बसे नव छाया में
नव स्वप्न ले जगे
भूले वे मुक्तगान, सामगान, सुधापान ।3

महाप्राण निराला की युग चेतना से अनुप्राणित कविता में भारत की राजनैतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को आत्मसात करने वाली मिली है । ‘तुलसीदास’ में इतिहास पर नयी दृष्टि डालते हुए कवि ने कुसंस्कारों के वशीभूत हो पतन के कगार पर खड़ी भारतीय संस्कृति की तुलना को तत्कालीन स्थिति से करके भारत के सांस्कृतिक वैभव के सूर्य के अस्त होने का चित्रण कर सावधान किया-

भारत के नभ का प्रभा पूर्य
शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूर्य
अस्तमित आज के - तमस्तूर्य दिड़मंडल ।4

संसार में असत की शक्ति प्रबल है और वह सत् को आच्छादित करने के लिए सभी प्रकार के साधनों से काम लेती है । विजय का निश्चय साधन करते हैं । यह स्थिति वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आतंकवादी परिदृश्य से मेल खाती है । निराला ने ‘राम की शक्ति पूजा’ के माध्यम से संदेश दिया कि यदि असत् शक्तिशाली है, तो सत् को भी शक्ति का संधान करना चाहिए-

वह एक ओर मन रहा राम का जो न थका,
जो नहीं जानता दैन्य नहीं जानता विजय
गर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय ।5

निराला जी ने साम्राज्यवादी शक्तियों की पशुता व अत्याचार को निकट से देखा । उनकी लूट खसोट की प्रवृत्ति व मानवता पर अत्याचार करने की वृत्ति पर तीव्र प्रहार करते हुए कहा-

अबे सुन बे गुलाब
भूल मत जो पाई खुशबू रंगो आब
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
डाल पर इतर रहा है केपटलिस्ट ।6

‘सरोज स्मृति’ को निराला की आत्मपरक रचना माना गया । इस कविता की निर्वैयक्तिकता की ओर ध्यान देते हुए डॉ. रमेश मिश्र ने लिखा है कि , “सरोज स्मृति में समाज की अव्यवस्था ओर उसके फलस्वरूप जीवन की घुटन का भी ऐसा स्वरूप व्यक्त किया गया है जो मानवीय धरातल पर निराला की आवाज सरोज के प्रति न होकर जीवन चेतना का वह स्वर है जो मानवीयता के नाते लाजिमी और अनुकूल है । निराला अपने गहन अवसाद की भूमिका से उठकर विद्रोह के स्वर में सामाजिक चेतना सम्पन्न होकर मानवीय हक और मनुष्यत्व की सार्थकता की माँग करता हुआ संवेदना से विद्रोह तक पहुँच जाता है ।”7 निराला ने सामाजिक रूढ़ियों का विद्रोह कर सामाजिक चेतना को जाग्रत किया । समाज में व्याप्त दहेज प्रथा का विरोध करते हुए उन्होंने लिखा-

जो कुछ है मेरा अपना धन,
पूर्वज से मिला, करूँ अर्पण
यदि महाजनों को, तो विवाह
कर सकता हूँ, पर नहीं चाह
मेरी ऐसी, दहेज देकर
मैं मूर्ख बनूँ, यह नहीं सुघर ।8

भारत के स्वाभिमान को जाग्रत कर भारतीयों को अपने इतिहास से परिचित कराना और उसके अनुकूल आचरण का संदेश देना निराला की अन्यतम विशेषता रही है । यथा-

क्या यह वही देश है 
भीमार्जुन आदि का कीर्ति क्षेत्र,
चिरकुमार भीष्म की पताका ब्रह्मचर्य दीप्त
उड़ती है आज भी जहां के वायु मण्डल में
उज्ज्वल, अधीर और चिर जीवन ।9

निराला काव्य में भक्ति की अजस्र धारा बही है, जो मूलतः वेदान्त दर्शन से प्रभावित है। यह दर्शन निराला के स्पर्श से और रामकृष्ण परमहंस व विवेकानंद के माध्यम से अधिकाधिक पुष्ट, परिमार्जित व परिवर्द्धित होता गया । भक्ति के इस स्रोत से उन्होंने भारतीय जनमानस को व्यावहारिक अद्वैत से परिचित कराया, वहीं विनयपूरक भक्ति से लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग भी दिया । मानवता की मुक्ति हेतु संघर्षरत राम को जब शक्ति का दिग्दर्शन होता है, तो वह सत्य की विजय का पूर्वाभास होता है । शक्ति का उज्ज्वल रूप द्रष्टव्य है-

देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर स्कंध पर, रही दक्षिण हरि पर,
ज्योतिर्मय रूप, हस्तदश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्दस्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित ।10

निराला ने साहित्य कर्म को ज्ञान योग की साधना के रूप में स्वीकारा और कहा कि एक ही प्रकार के विचारों की नेमि में चक्कर काटता हुआ साहित्य भी निर्जीव हो जाता है ।11 निराला ने वाद की सीमा से परे रहकर युग की चेतना को आत्मसात कर आवश्यकतानुरूप साहित्य का निर्माण किया । पण्डित नंद दुलारे वाजपेयी के शब्दों में ‘महान कवि वह है जो आस्था नहीं खोता, पराजित नहीं होता और अपने को कठिन परिस्थितियों में रखकर भी मानववादी भूमि पर बना रहता है । निःसंदेह निराला ऐसे ही कवि हैं ।12

निराला का जीवन खण्डित चित्रों की विवश प्रदर्शनी है, उनकी तुलना एक ऐसे उत्कृष्ट देशभक्त राजकुमार से की जा सकती है, जिसे राजधानी के चौराहे पर फाँसी दे दी गई हो । जीवन की विषमताएँ जिस तरह निराला के समक्ष उपस्थित हुई, परन्तु उनकी जितनी तीव्र प्रतिक्रिया इस सरल, उदार और अति संवेदनशील मानव के मानस पर हुई, ऐसे उदाहरण दुर्लभ हैं । निराला इन संघर्षों में अपराजेय योद्धा की तरह खड़े रहकर अपनी प्रतिभा व परिश्रम से रचनाधर्मिता को समृद्ध करते रहे । संघर्ष में सृजन की धारा अधिक वेगवती हो गई-

बाहर मैं कर दिया गया हूँ ।
भीतर पर भर दिया गया हूँ ।।

भावना द्वारा अनुभूति का सहयोग मिलता है, काव्य के लिए वहीं दार्शनिकता अभीष्ट एवं ग्राह्य है । निरालाजी का भक्ति से परिपूर्ण साहित्य अनुभूति पर आधारित होने से हृदय का संगीत प्रतीत होता है । सर्व खलु इदं ब्रह्म की वेदान्तिक विराटता का स्वर निराला के काव्य में आद्यन्त भरा है । पंथ या सम्प्रदाय से परे निश्छल भक्ति का स्रोत निराला काव्य की पहचान है । निराला ने समय की गति को पहचानकर काव्य लिखा, फलतः वह कालजयी हो गया । डॉ. जुयाल के शब्दों में ‘समय आयेगा जब तुलसीदास का उद्बोधन लिखने वाले कवि-शिरोमणि निराला को वहीं स्थान प्राप्त होगा जो भक्तकालीन महाकवि तुलसीदास को है।’ 

हिन्दी साहित्य का वर्तमान समय संक्रमणकालीन वेला से गुजर रहा है, नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञास्फोट की प्रतिध्वनि में बौद्धिकता साहित्य के मस्तिष्क पर विलास कर रही है । हृदय पक्ष अमा-निशा के गर्त में दुबक कर बैठा है । पुरूषार्थ चतुष्ट्य की आंकाक्षी भारतीय साहित्यिक विरासत विद्रुपताओं से ग्रस्त होती जा रही है । आस्था, अनास्था, नव्य-पुरातन, पौर्वात्य-पाश्चात्य के द्वन्द्व में फँसा साहित्य पटल स्वयं ‘अर्थ-वलय’ से ग्रसित है । भक्ति के अजस्र स्रोत विलुप्त हो रहे हैं, ऐसे समय में महाप्राण निराला की स्मृति हमें गंतव्य का बोध करायेंगी । 

विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण ।
हे पुरूष सिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण ।।
आराधना का दृढ़ आराधन से दो उत्तर ।
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर ।।13

वस्तुतः निरालाजी ने अपने काव्य को जो विशिष्टता प्रदान की उसका प्रमुख कारण उनकी वह दिव्य दृष्टि थी, जिससे उन्होंने युग की अर्थवत्ता को पहचाना, फलतः कालजयी साहित्य रचा । वह साहित्य वर्तमान समय की समस्याओं को हल करने में सक्षम ही नहीं, बल्कि नई दिशा प्रदान करने वाला है, प्रतीत होता है कि निराला सांस्कृतिक नवजागरण व सांस्कृतिक पुनरूत्थान के कवि हैं, पर वे अतीत की ओर लौटने वाले कवि नहीं, बल्कि अतीत को वर्तमान में जोड़कर भविष्य की दिशा तय करने वाले कवि थे । अतः युगीन अर्थवत्ता में निराला सदैव प्रासंगिक रहेंगे । 

सन्दर्भ ग्रंथ सूची-
1. सुमित्रानंदन पंत, साठ वर्ष एक रेखांकन, पृष्ठ 56
2. अपरा, पृष्ठ 11
3. अपरा, पृष्ठ 133
4. तुलसीदास, पृष्ठ 11
5. राम की शक्ति पूजा, पृष्ठ 17
6. कुकुरमुत्ता, पृष्ठ 1
7. डॉ. रमेश मिश्र, निराला काव्य में मानवीय चेतना, पृष्ठ 129
8. निराला रचनावली, पृष्ठ 303
9. अनामिका, पृष्ठ 58
10. राम की शक्ति पूजा, पृष्ठ 18
11. निराला ग्रंथावली, भाग-5, पृष्ठ 441
12. पण्डित नन्द दुलारे वाजपेयी, कवि निराला, कुछ प्रश्न ।
13. राम की शक्ति पूजा, पृ.18

'मेरी असमाप्त यात्रा' पर मेरे विचार

 संभावना की संगोष्ठी की रिपोर्ट चित्तौड़गढ़ । 

साहित्य के इस दौर में कठिन भाषा में लिखना सरल है पर सरल भाषा में लिखना कठिन है, आमजन मानस में सहजता व सरलता से उतरने वाली भाषा ही कालजयी होती हैं ।

संभावना द्वारा आयोजित एकल कविता पाठ में आलोंचक व कवि डा. सत्यनारायण व्यास ने अपनी कविताओं के पाठ की शुरुआत में कहा कि संघर्ष से कविता बनती है और वही आदमी को विपरित परिस्थितियों मे जिन्दा रखती है। सारा जीवन पढ़ते-पढ़ाते गुज़र गया और यही ज़रूरी बात जान पाया कि हिन्दी का पाठक अगर संस्कृत,राजस्थानी  और उर्दू का भी जानकार हो जाए तो सही मायने में एक अध्येता की भूमिका अदा कर सकता है.वेद,पुराण पढ़े और उनके साथ ही मैंने लोक जीवन को भी असल में अनुभव किया है मैं आखिर में किसी एक को चुनने के मसले पर लोक जीवन चुनुँगा.क्योंकि शास्त्र भी लोक से ही उपजा है.

डॉ. व्यास ने तीन अलग-अलग पडावो के साथ अपनी कविताएँ पढ़ी,नगर के रुचिशील पाठकों के बीच संपन्न इस आयोजन ने नगर में पाठकीयता को फिर से जाग्रत किया है.खुद को कभी भी कवि नहीं मानने वाले डॉ. व्यास ने पहले दौर में संन्यास जैसी दर्शनपरक कविता श्रोताओं को सुनाई.उसी के ठीक बाद डाईट चित्तौड़ के प्राध्यापक डॉ. राजेन्द्र सिंघवी ने उनके कविता संग्रह 'मेरी असमाप्त यात्रा' पर पिछले दौर के तमाम बड़े रचनाकारों की पंक्तियों के उदाहरण देते हुए अपनी समालोचकीय प्रतिक्रया रखी.

दुसरे पडाव पर डॉ. व्यास ने देशज शब्दों से पूरित आमजन जनजीवन के करीब की कविताएँ सुनाई जिसमें उनके आदिवासी  बहुल  क्षेत्र  में बिताएं समय की गंध साफ़ तौर पर अनुभव की गयी.यहीं पाठकों को उन्होंने अपने दूसरे कविता संग्रह 'देह के उजाले में' से भी कुछ महत्वपूर्ण रचनाएं सुनाई.इस बीच डॉ. रेणू व्यास ने एक बेटी के रूप में अपने पिता के साहित्यिक जीवन के समानान्तर रही परिस्थितियों को प्रभावी रूप से सामने रखा,उन्होंने डॉ. व्यास की कविता को जीवन के विभिन्न परिप्रेक्षों में विवेचित किया.


आखिर में डॉ. व्यास ने अपने साठ की उम्र के आसपास की नई और चुनी हुई रचनाएं सुनाई जिन्हें सबसे ज्यादा पसंद किया गया.उन्होंने पाठ का अंत राजनीति और हमारे वर्तमान समाज को केन्द्रित करते मुक्तकों से किया .इस अवसर पर संभावना की मुख पत्रिका 'बनास जन' का लोकार्पण राजस्थानी दोहाकार शिवदान सिंह कारोही और  डॉ. व्यास ने किया ,साथ ही इस अंक में निहित डॉ. माधव हाड़ा के लम्बे आलेख 'मीरा का समाज' पर एम्.एल.डाकोत ने संक्षिप्त टिप्पणी की.आयोजन के सहभागी पहल संस्थान के संयोजक जे.पी.दशोरा और व्याख्याता डॉ.राजेंश चौधरी ने अतिथियों का माल्यार्पण किया.आभार माणिक ने दिया.संगोष्ठी का संचालन डॉ. कनक जैन ने किया वहीं सूत्रधार की भूमिका में संतोष शर्मा,विकास अग्रवाल और अजय सिंह थे.

आयोजन में संभागी-इस संगोष्ठी में नगर के लगभग तमाम साहित्य प्रेमी मौजूद थे.हिन्दी की छात्रा शीतल पुरोहित,स्वतंत्र लेखक नटवर त्रिपाठी,गीतकार रमेश शर्मा,डॉ.रमेश मयंक,नन्द किशोर निर्झर,द्विलाल दमामी,आकाशवाणी उदघोषक अब्दुल सत्तार,डॉ. अखिलेश चाष्टा,शारदा चाष्टा,हेमंत शर्मा,डॉ.विनय शर्मा,एम्.इकराम अजमेरी,संजय कुमार जैन,बाबू खान मंसूरी,डी.के.गर्ग,अश्रलेश कुमार दशोरा,राव नारायण सिंह,डॉ. आरके. दशोरा,डॉ.राजेश चौधरी,चन्द्रकान्ता व्यास,अब्दुल जब्बर,अमृत 'वाणी',आभा मेहता,हरीश लड्ढा,गुणमाला जैन  आदि शामिल थे.

आयोजन के बाकी फोटो यहाँ देखिएगा.
 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ.कनक जैन

चित्तौडगढ की साहित्यिक संस्था संभावना के सह संयोजक और बनास जन जैसी लघु पत्रिका के प्रबध सम्पादक है.यादवेन्द्र चन्द्र के साहित्य और कृतित्व पर शोध किया है.वर्तमान में स्कूले शिक्षा में हिन्दी के प्राध्यापक हैं.नगर में संचालित ठीक-ठाक विचारों की सामाजिक/सांस्कृतिक संस्थाओं के आयोजनों में आपका आना जाना है.मूल रूप से विज्ञान के छात्र है मगर हिन्दी के नाम से ख़ास पहचान है.

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