राष्ट्रीय चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' का काव्य।

राष्ट्रीय चिंतन के परिप्रेक्ष्य में बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' का काव्य 

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साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश द्वारा  'साक्षात्कार' पत्रिका में प्रकाशित

                             आधुनिक हिन्दी कविता में द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मकता, आदर्शवादिता, स्थूलता की परिणति छायावादी आत्मनिष्ठता, ऐन्द्रियता और सूक्ष्मता में हुई। इसी कालखंड में दो धाराएँ समानांतर रूप से विकसित हुई, जिन्हें राष्ट्रीय­सांस्कृतिक काव्यधारा और प्रणयवादी धारा के नाम से जाना जाता है। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की मूल चेतना और व्यक्तित्व छायावादी आत्मनिष्ठता के अनुकूल नहीं था, अतः उनकी वाणी में राष्ट्रप्रेम का स्वर मुखर रूप में व्यक्त हुआ, जो कि मैथिलीशरण गुप्त, सियाराम शरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर दिनकर की परम्परा में प्रकट होता है। ‘नवीन’ की रचनाओं का मूल्यांकन इसी दृष्टि से पूर्णता को प्राप्त करता है।

                               बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की प्रमुख काव्य-रचनाओं में ‘उर्मिला’(1934 ई.) स्वच्छंदतावादी गीति प्रधान काव्य है, जो आचार्य द्विवेदी की प्रेरणा का प्रतिफल है। ‘कुंकुम’ (1936 ई.) का मूल स्वर ‘राष्ट्रप्रेम’ है, जहाँ कवि का रक्त उबलता हुआ ओजस्वी स्वर में प्रकट होता है। ‘रश्मिरेखा’(1951 ई.) में प्रणय­विरह की अनुभूतियाँ हैं तो ‘अपलक’ और ‘क्वासि’ में भक्ति­भावना का मूल स्वर है। कविताओं में विविधताओं के होते हुए भी ‘नवीन’ की पहचान राष्ट्रीयता के कवि के रूप में हैं, उसका कारण यह है कि उन्होंने समय को पहचान कर जनमानस की मौन वाणी को मुखर रूप में व्यक्त किया। उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता ही है कि जो राष्ट्रप्रेम के संस्कार उन्हें मिले, वैसा ही उनके जीवन का संघर्ष, वैसा ही कार्य क्षेत्र, वैसा ही जीवन और वैसी ही कविता भी। विप्लव गान, हम अनिकेतन, प्राप्तव्य, असिधारापथ शीर्षक युक्त कविताएँ स्वाधीनता­आन्दोलन की ऊर्जा को घनीभूत करने में सफल रहीं।

                        ‘नवीन’ जी की कविताओं में स्वदेश धर्म का निर्वाह, कारागार के शून्य जीवन में भी सार्थकता, मातृभूमि के प्रति अपार लगाव, कवि की अन्तर्चेतना तक जागरण की ध्वनि पहुँचाने की क्षमता और राष्ट्र के प्रति एकनिष्ठ प्रेम से उन्हें कालजयी बनाने का अवसर प्राप्त होता है। ‘नवीन’ जी के बारे में राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ लिखते हैं- “जब उस नर­शार्दूल के बोलने की बारी आती तो बादलों में दरारें पड जातीं, छतें चरमराने लगतीं और सत्य का प्रकाश खुलकर अपने स्वाभाविक रूप में सामने आ जाता।” राष्ट्रीयता से ओत प्रोत निडर वाणी से उनका कवि­व्यक्तित्व अमर हो गया। उन्होंने अपने समय को पहचाना, तदनुरूप रचना­कर्म का निर्वाह किया, जो तत्कालीन युगीन परिवेश को सार्थकता प्रदान करने वाला था, यही प्रखरता, चिरकाल तक स्मरणीय है।

                                                राष्ट्रधर्म की रक्षा तत्कालीन समय की मांग थी। अंग्रेजों के समक्ष निडरता से हृदय की अभिव्यक्ति को प्रकट करना साहस भरा कार्य था। ‘नवीन’ जी ने राष्ट्रीय भावों को काव्य का विषय बनाकर भारतीय जनता की स्वातंत्र्य  चेतना को विकसित किया। विदेशी दासता के विरूद्ध शंखनाद करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

                       कोटि­कोटि कंठों से निकली, आज यही स्वर­धारा है।
                       भारत वर्ष हमारा है यह, हिन्दुस्थान हमारा है



                                   मातृभूमि को प्रणम्य बनाने का संकल्प और उसके लिए प्राणों का अर्पण की भावाभिव्यंजना पराधीन राष्ट्र के लिए चेतना की संवाहक होती है। ‘नवीन’ जी स्वाधीनता आंदोलन के मात्र व्याख्याता नहीं, बल्कि सेनानी हैं। दासता की शृंखलाओं के विरूद्ध संघर्ष करते हुए कई बार जेल­यात्रा ने उनके व्यक्तित्व को निखार दिया। किसी कवि के जीवन में इतनी लम्बी जेल­यात्राओं का दुर्लभ संयोग दिखाई नहीं देता। जेल को ही अपना घर मानते हुए उन्होंने लिखा-

                             हम संक्राति काल के प्राणी बदा नहीं सुख भोग।
                                 घर उजाड़ कर जेल बसाने का हमको है रोग।।



                              अंग्रेजी अत्याचारों से  निडरता पूर्वक सामना करना, प्रतिकार करना और यहाँ तक कि उन्हें क्षणिक आतंक की संज्ञा दे देना ‘नवीन’ जी के ओजस्वी व्यक्तित्व का ही परिणाम था। भारतीय दर्शन की अनश्वरता विषयक विचारों को सामने रखकर अंग्रेजों को ललकारा और कहा कि तुम्हारा क्षणिक आतंक भी भय की भीत्ति पर टिका है, तुम कितने ही शक्तिवान् हो, पर अनश्वर नहीं। वे अंग्रेजों को स्पष्ट शब्दों में कहते हैं-


                                   क्या बिगाड़ेगा तुम्हारा यह क्षणिक आतंक?
                                   क्या समझते हो कि होंगे नष्ट तुम अकलंक?
                                       यह निपट आतंक भी है भीति­ओत­प्रोत।
                                  और तुम? तुम हो चिरंतन अभयता के स्रोत।



                      कवि ‘नवीन’ जी ने गांधीजी के प्रत्येक आन्दोलन में सक्रियता से भाग लिया। असहयोग आन्दोलन नमक सत्याग्रह फिर भारत छोड़ो आन्दोलन में संघर्षमयी जीवन यात्रा रही। यह भी विलक्षण संयोग है कि उनकी श्रेष्ठतम रचनाएँ जेलों में ही रची गईं। कारागार के शून्य कक्ष में कवि की आत्मोत्सर्ग करने की भावना उद्वेलनकारी है। जीवन के मादक क्षणों को उन्होंने राष्ट्रप्रेम पर न्योछावर कर दिया था, फलतः स्वयं को जन्म से ही ‘विषपायी’ कहकर अपने आपको प्रेरित किया-


सरद जुन्हाई अब कहाँ, कहाँ बसंत उछाह।
जीवन में अब बीच रह्यौ चिर निदाघ कौ दाह।
हम विषपायी जनम के सहैं अबोल-कुबोल।
मानत नैंकु न अनख हम, जानत अपनो मोल

                                               मानव जीवन सर्वोपरि है। मनुष्य अपने कर्मों से महान बनता है। उसके पुरुषार्थ के समक्ष स्वर्ग  का वैभव तुच्छ है। कवि का दृष्टिकोण है कि मनुष्य अपार क्षमतावान है, स्वर्ग की लालसा उसका उद्देश्य नहीं हो सकता। उसकी सामर्थ्य उससे अधिक है। उसे तो इस धरती को ही स्वर्ग बनाने का स्वप्न देखना चाहिए। मनुष्य यदि चाहे तो धरती को ही मोक्ष­स्थल बना सकता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। मनुष्य की क्षमता को रेखांकित करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

और स्वर्ग तो भोग­लोक है
तदुपरांत बस रोग­शोक है
हमें भूमि को योग­लोक का
नव अपवर्ग बनाना है।
जो कि देव दुर्लभ है, उसको इस धरती पर लाना है।

                        सैनिक राष्ट्र के प्रहरी होते हैं। उनके देश की सीमाएँ व हम सुरक्षित रहते हैं। देश के नागरिकों के मन में उनके प्रति श्रद्धाभाव सदैव विद्यमान रहना चाहिए। कवि ने सैनिकों को भी अपनी क्षमताओं से अवगत कराते हुए कहा कि यदि उसकी रगों में बहता शोणित ठण्डा हो गया, तो पराजय निश्चित है। कवि अपने सैनिकों की आँखों में निराशा भाव नहीं देख सकता। वह प्रबोधन देते हुए कहता है-
सैनिक बोल, रगों में तेरी शोणित है या ठंडा पानी।
लुंज बुढौती या कि जवानी। 
यदि तेरी नस नस में बहती, वेगवती शोणित की धारा।
राख हुआ है नहीं अभी यदि, तेरे यौवन का अंगारा।
तो क्यों झाँक रही है तेरे, नयनों से यह निपट निराशा।।

                                 राष्ट्रीय आन्दोलन में यायावर की भाँति घर का सुख छोड़कर भटकते रहना ही कवि की नियति बन गया था। उसके लिए सांसारिक विलास, महल, धन-संपदा इत्यादि कुछ मूल्य नहीं रखते। कवि स्वयं स्वीकार करता है कि कभी भी सांसारिक आकर्षण उन्हें अपने लक्ष्य से विमुख नहीं कर सका। ‘हम अनिकेतन’ कविता में अपनी फकीरी का कुछ ऐसा ही वर्णन करते हैं-


देखे महल, झोंपड़े देखे, हास­विलास मजे के।
संग्रह के सब विग्रह देखे, जँचे नहीं कुछ अपने लेखे।

लालच लगा कभी पर हिय में, मच न सका शोणित उद्वेलन।

हम अनिकेतन, हम अनिकेतन ।

                                          बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का जीवन मातृभूमि की स्वाधीनता में लगा था, वहीं उनका कवि­कर्म इसमें लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग बना रहा था। वे केवल स्वयं ही नहीं, बल्कि अन्य रचनाकारों को भी संदेश दे रहे थे कि युगीन सत्य की उपेक्षा न करें। वर्तमान समय संघर्ष का है तो कवि की वाणी में भी उथल­पुथल भरी भावाभिव्यक्ति आवश्यक है, क्योंकि उसकी वाणी से ही जनता जाग्रत होगी और स्वाधीनता की हिलोंरें उठने लगेगी। कवि मन को संबोधित करते हुए वे कहते हैं-


कवि कुछ ऐसी तान सुनाओे, जिससे उथल-पुथल मच जाए।
शांति दंड टूटे उस महारुद्र का सिंहासन थर्राए।

उसकी श्वासोच्छवास दाहिका, विश्व के प्रांगण में घहराए।

नाश! नाश! हा महानाश! की प्रलयंकारी आँख खुल जाए।

                                       बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की सक्रियता स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी यथावत रही। वे पत्रकारिता से जुडे हुए थे, ऐसी परिस्थितियों में उनके ओजस्वी शब्दावली  युक्त लेख भी लोगों को प्रेरित करते थे। ‘शिमला समझौते में निराशा का अवतरण’, ‘मुसलमान भाइयों की खिदमत में’, ‘तुम्हारे उपवास की चिन्ता’, ‘एक ही थैली के चट्टे-बट्टे’ आदि शीर्षकों से अनेक लेख ‘प्रताप’, ‘प्रभा’ आदि पत्रों के माध्यम से प्रकाशित होकर जनता को जाग्रत कर रहे थे। गणेशशंकर विद्यार्थी की ओजस्वी शैली का उन पर बड़ा प्रभाव पड़ा था। संपादन का दायित्व निर्वहन करते हुए ‘प्रभा’ का झंडा अंक द्वारा राष्ट्रीय जागरण करते हुए पत्रकारिता को भी राष्ट्रीयता के रंग में रंग दिया। ‘नवीन’ जी का संदेश स्पष्ट था-


भारतखंड के तुम, हे जन-गण।
चमक रहे हैं तब शोणित में, इस भारत माता के रज-कण।

                                       ‘नवीन’ जी की इतिहास दृष्टि में भी राष्ट्रीय -सांस्कृतिक बोध भरा हुआ है। वे मानते थे कि समाज जिस भौतिकवादी उन्माद में आगे बढ़ रहा है, उसका विनाश निश्चित है। यदि मनुष्य ने अपने हृदय की बात नहीं सुनी तो बुद्धिवाद की प्रचंड अग्नि उसे भस्मीभूत कर देगी। कवि की यह धारणा उन युवाओं और तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए थी, जिन्होंने सिर्फ स्वयं की उन्नति को ही अपने जीवन का हेतु मान लिया था। मनुष्यता के पतन को रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा-


आ पहुँचा है जिस और मनुष्य, उस ठौर आज है सर्वनाश।
यदि वह अपने हिय को मथकर, कर ले न आज अपना विकास।।

                                     वस्तुतः बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ एक सिद्धान्तवादी-राष्ट्रवादी रचनाकार थे। आदर्शवाद उनके संस्कारों में था। राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभाषा प्रेम और राष्ट्रीय-संस्कृति प्रेम उनके जीवन में सबसे बड़ा मूल्य था। उन्हें जीवन में जनता का प्यार मिला। ‘पदमभूषण’ सम्मान भी मृत्युशय्या पर पड़े महारथी के सम्मान की औपचारिकता मात्र थी। फिर भी जन-जन के कंठहार बनकर ‘नवीन’ जी की वाणी वर्तमान संदर्भों में भी चेतना की संवाहक बनी हुई है।
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