कन्हैया लाल सेठिया का दार्शनिक चिंतन

कन्हैया लाल सेठिया का दार्शनिक चिंतन
(मधुमती, जनवरी-2020 में प्रकाशित)


“दृश्यतेऽनेनेति दर्शनम्‘ या‘ दृश्यते ज्ञायतेऽनेनेति दर्शन मित्यु च्यमाने”1 अर्थात् जिसके द्वारा देखा जाए, जाना जाए, उसे दर्शन कहते हैं । यह दर्शन की अनुभूति सापेक्ष परिभाषा है । दर्शन का सीधा और सरल अर्थ है- साक्षात्कार करना अर्थात् वस्तु स्वरूप का बोध करना । दूसरे शब्दों में वह सत्यानुभूति या सत्य का साक्षात्कार है ।2 

दृश्य तो सभी देखते हैं पर दृष्टि भिन्न होती है । यही दृष्टि एक सामान्य व्यक्ति से एक कवि को और एक सामान्य कवि से एक विशिष्ट कवि को अलग करती है । सेठिया जी ने जीवन को उसके मूल से शिखर तक अथ से इति तक देखा और अनुभव किया । उसमें रमे और एकाकार हुए, फलतः उनका काव्य जीवन की समग्रता का काव्य बन गया । डॉ. भगवती लाल व्यास का उक्त कथन अवलोकनीय है, “सेठिया जी के संपूर्ण काव्य पर यदि एक वाक्य में समाहारात्मक टिप्पणी का साहस किया जाय तो मेरी विनम्र मति में वह वाक्य होगा - सेठियाजी जीवन की समग्रता के दार्शनिक कवि हैं ।”३

विगत सात दशकों से निरंतर साहित्य साधना में रत कविवर सेठिया जी ने राजस्थानी और हिन्दी दोनों भाषाओं में न केवल उत्कृष्ट साहित्य का सृजन किया, बल्कि अपने जीवन में जिया भी है । अपनी आरंभिक कृतियों में, यथा- ‘वनफूल‘,‘अग्निवीणा‘, ‘आज हिमालय बोला‘, ‘मेरा युग‘ आदि के गीतों में कवि ने खण्डित समस्याओं को सामाजिक चेतना प्रदान की और राष्ट्रप्रेम का स्वर मुखरित किया । ‘दीपकिरण‘ प्रेम की पवित्रता को अभिव्यंजित करती है, जिसमें छायावादी पृष्ठभूमि का दिग्दर्शन होता है ।

‘प्रणाम‘, ‘मर्म‘ एवं ‘अनाम‘ कविताओं में कवि की आध्यात्मिक चेतना दार्शनिक गहराई के साथ प्रकट हुई है, इनमें जीवन का सत्य शाश्वत सा प्रतीत होता प्रकट हो रहा है ं उनकी दार्शनिक चेतना का भव्य रूप ‘निर्ग्रन्थ’ और ‘त्रयी‘ में बिम्बित होता है, जिसमें कवि ईश्वर से साक्षात्कार करता हुआ दृष्टिगोचर होता है । ‘स्वगत’ में कवि अन्तर्जगत की ओर उन्मुख होते हुए दिखाई देते हैं, वहीं ‘देह-विदेह’, ‘आकाश-गंगा’, ‘वामन-विराट’, निष्पत्ति’, ‘श्रेयस’ आदि रचनाओं में विराट सत्य की छवि प्रतिभासित होती है ।

श्री सेठिया जी का कवि-मन भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि से आकर्षित रहा है । उनके काव्य में समस्त भारतीय दर्शनों के मूल तत्त्व यत्र-तत्र दृष्टि में आते हैं, फिर भी उनका कवि - हृदय उनके जीवन-संस्कारों से सर्वाधिक प्रभावित हुआ है । कवि प्रवर सेठिया जी का जन्म जैन परिवार में होने से स्वाभाविक रूप से जैन-दर्शन के आध्यात्मिक तत्त्वों का प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देता है । जैन परम्परा में ‘आचारांग सूत्र’ जैसे अति प्राचीन ग्रंथ में दर्शन शब्द सामान्यतया अनुभूति के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । जैन कर्म सिद्धांत में दर्शन शब्द का प्रयोग आज भी अनुभूति के अर्थ में ही किया जाता है । सेठिया जी की काव्य-दृष्टि भी इसी रूप में प्रतिबिम्बित होती है । जिसका सम्यक् विवेचन द्रष्टव्य है । 

जैन दर्शन में मूलतः ‘तत्त्व’ दो ही माने गए हैं- 1.जीव तत्त्व, 2.अजीव तत्त्च ।4 एकांगी दृष्टि से इनके स्परूप को समझना आसान नहीं । इसी कारण ऋषियों ने इसे समझते हुए भी ‘नेति-नेति’ कह दिया और वैज्ञानिक जड़-चेतन के ऊहापोह में खो गए । जैन दर्शन की ‘अनेकांतवादी’ दृष्टि से ‘जीव-अजीव’ को समझा जा सकता है । कवि की पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

पीछे के पीछे भी कुछ हैं
आगे के आगे भी कुछ हैं ।
समझ लिया ऋषियों ने लेकिन
नेति नेति कह मौन हो गये,
जो वैज्ञानिक जड़-चेतन के
ऊहापोह के बीच खो गये,
-   -  -
आग्रह मुक्त हुए जो उन ने
अनेकांत को दर्शन माना ।
          (त्रयी)


‘मोक्ष’ जीव की उस अवस्था का नाम है, जहाँ न जन्म है न मरण । जन्म-मरण से रहित यह अवस्था बंध के कारणों के अभाव और कर्मों की पूर्ण निर्जरा से प्राप्त होती है । तत्त्वार्थ सूत्रकार ने समस्त कर्मों के क्षय का नाम मोक्ष बतलाया है ।5 कवि-मन भी जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति चाहता है, यथा-

बन न सका नवनीत, मथ रहा
कब से जाने तक्र ?
कर समग्र अब छूटे मेरा 
जन्म मरण का चक्र,
मुझे सताते हैं भव-भव के
बाँधे कर्म अनन्त !
(निर्ग्रंथ)
श्रमण के मूलगुणों में पाँच महाव्रत प्रमुख हैं । श्रमण के समस्त आचार-विचार एवं व्यवहार का नियंत्रक तत्त्व उसके महाव्रत हैं । प्राणातिपात विरमण व्रत अर्थात् अहिंसा को प्रथम महाव्रत माना गया है । दशवैकालिक सूत्र में कहा गया है, कि जगत में जितने भी त्रस और स्थावर जीव हैं, श्रमण उनकी हिंसा से विरत रहता है ।6 अहिंसा को कवि ने समग्र दर्शन का पर्याय माना है-

है अहिंसा / अपने आप में / समग्र दर्शन,
नहीं बचाने का / बचने का / निर्देशन,
दया, प्रेम, करूणा / मात्र दैहिक बोध
अनुकम्पा आत्मा का / परिशोध ।
(श्रेयस)
‘सत्य’ महाव्रत के अन्तर्गत श्रमण मन, वचन और काया तथा कृतकारित और नवकोटियों सहित असत्य का परित्याग करता है । आचारांग सूत्र में सत्य के अनुसार प्रवृत्ति करने की प्रेरणा दी गई है ।7 कवि ने सत्य का परिधान रत्न-त्रयी (चारित्र,दर्शन व ज्ञान) को माना है-

नहीं होता सत्य
किसी का अनुयायी
वह अपने में पूर्ण इकाई
वह दिगम्बर/उसका परिधान
चारित्र - दर्शन -ज्ञान ।

(त्रयी)
पाँचों इन्द्रियों के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध- ये पाँच प्रकार के विषय हैं । इनमें राग-द्वेष नहीं करना- ये ‘अपरिग्रह’ महाव्रत की भावनाएँ हैं ।8 कवि ने अपरिग्रह को ‘कैवल्य’ की भूमिका के रूप में स्वीकार किया है-

ज्ञान का नवनीत
दर्शन का अमृत
चरित्र की कौस्तुभ मणि
तप की उपलब्धि
भूति की विभूति
कैवल्य की भूमिका
अपरिग्रह ।
(निर्ग्रंथ)
जैन-दर्शन अनेकांतवादी दर्शन है । एक ही वस्तु में अनेक विरोधी धर्मों को स्वीकार करने वाले सिद्धान्त के निरूपण की पद्धति है- स्याद्वाद । अस्ति-नास्ति, नित्य-अनित्य, एक-अनेक, सम-विषय, वाच्य-अवाच्य ये वस्तु में निश्चित रूप से पाये जाने वाले विकल्प हैं । इन विरोधी युगलों को समझकर स्याद्वाद का स्वाद चखा जा सकता है ।9 कवि ने भी इसी   दृष्टि को अपनी कविता में प्रकट किया है- 

अस्ति - नास्ति हैं जुड़वाँ दोनों
सहज सत्य यह द्वन्द्व नहीं है,
नीड़ नहीं कारा है खग की 
पंखों पर प्रतिबंध नहीं है ।।
(त्रयी)
‘द्वैत-अद्वैत’ पर विचार करते हुए कवि ने अभिव्यक्ति और अनुभूति से उसका संबंध व्यक्त करते हुए स्मृति-विस्मृति का पर्याय बताया-

अभिव्यक्ति / दिवस की / जला हुआ दीप,
अनुभूति / निशा की / बुझा हुआ दीप,
स्मृति द्वैत / विस्मृति अद्वैत ।।
(आकाश गंगा)
जैन-दर्शन में ‘कैवल्य’ को चरम ज्ञान माना गया है । इस हेतु ‘रत्नत्रय’ की साधना पद्धति है । रत्नत्रय की साधना से अभिप्राय है- सम्यग्दर्शन, सम्यक् ज्ञान ओर सम्यक् चारित्र की आराधना । इसे उमास्वाति ने मोक्ष मार्ग भी बताया है ।10 कवि-प्रवर सेठियाजी ने भी कैवल्य को प्रज्ञा की क्रिया के रूप में स्पष्ट किया-

नहीं / बुद्धि की / प्रतिक्रिया
कैवल्य / वह क्रिया
प्रज्ञा की !
(आकाश गंगा)

रत्न त्रय / हुये उद्भासित
दिव्य अतिशय में
आत्मा के
अनंत चतृष्ट्य !
(निर्ग्रंथ)
‘णमोकार’ मंत्र को जैन-दर्शन में महामंत्र माना गया है । जिसमें अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय व लोक के समस्त साधुओं की वन्दना है । कवि ने भी इस मंत्र के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की है- 

नहीं किसी / याचक की प्रार्थना
कि देवता / पूरी करें कामना
-  -  -
केवल नमन / उनको
जो अरिहंत / जो संत
भले ही उनका
कोई धर्म / कोई पंथ
मात्र समर्पण की / वर्णपासना
णमोकार मंत्र !
(निर्ग्रंथ)
जैन-दर्शन के अनुसार ईश्वर विशुद्ध आत्मा है । प्रत्येक आत्मा में परमात्मा रूप बनने की शक्ति है । विष्णु, परम ब्रह्म, ईश्वर, सुगत, शिव और जिन इत्यादि सभी उसके ही नाम हैं।11 कविवर सेठिया जी के कवि मन में उस परम तत्त्व की कल्पना अवश्य है, इसी कारण वे लिखते हैं-

मैं अनादि हूँ मुझे व्यापता,
कभी नहीं इति-अथ का संशय,
मैं अरूप अनुभूत चिरंतन,
पूर्ण मात्र ही मेरा परिचय ।
(प्रणाम)
‘द्वन्द्व’ यदि जीवन का अभिशाप है, तो उससे ‘निर्द्वन्द्व’ होने का मार्ग भी दिखाई देता है। अर्थात् द्वन्द्व परमानंद का माध्यम भी बन सकता है । मुक्ति का द्वार भी कारा से अलग नहीं है, यथा-

मुक्ति / का / द्वार
अभिन्न अंग है
कारा
का !
(अनाम)
समग्रतः सेठियाजी कवित्व दार्शनिक पृष्ठभूमि पर उतर कर रहस्यमय सा हो गया है, परन्तु यह अनुभूत सत्य है, उससे विस्मृत होना संभव नहीं । कवि प्रवर का दार्शनिक मन न केवल जीवन की अर्थवत्ता सिद्ध कर रहा है, बल्कि जीवन के उस पार की भी मधुमय कल्पना कर रहा है । इसकी आधारभूमि में जैन-दर्शन की समग्रता भी उनके चिंतन का केन्द्र बन गई है, फलतः कविता की रस-धारा में दर्शन अथवा दर्शन के शुष्क धरातल पर काव्य की रसधारा प्रवाह मान है, यह निर्णय करना भी अकल्पनीय है । यह अवश्य कहना समीचीन होगा कि ‘जीवन’ व ‘मनुष्य’ के साथ ‘भारतीय संस्कार’ उनके काव्य के चरम विषय हैं, जो कि दर्शन की पृष्ठभूमि पर भारतीय ऋषि-परम्परा की भाँति मानवता के पथ का संधान कर रहे हैं । इसी कारण वे मनुष्य की नियति को रेखांकित कर पाते हैं और जीवन का गंतव्य निर्दिष्ट कर देते हैं, यथा-

नहीं / जा सकेंगे
शब्द / और आगे
करनी होगी । अकेले
सतोपंथ की यात्रा 
नहीं रहेगा साथ
लेने परीक्षा
कोई श्वान
नहीं आएगा स्वर्ग से
कोई रथ
होगा / वहाँ पहुँच
अनुभूत
केवल / असंग !
(निष्पत्ति)

-संदर्भ ग्रंथ सूची-
1. षड़दर्शन समुच्चय- हरिभद्र सूरि, पृ. 2/18, उद्धृत जैनेन्द्र सिद्धांत कोश, भाग-2, पृ. 405-406
2. डॉ. सिसोदिया, सुरेश, जैन धर्म संप्रदाय,पृ. 121
3. उद्धृत- कन्हैया लाल सेठिया, समग्र भाग-2, संपादक- जुगल किशोर जैथलिया, पृ.660 
4. (क) स्थानांग सूत्र, 2/1  (ख) प्रवचन सार, 2/35
5. तत्त्वार्थ सूत्र- 10/3
6. दशवैकालिक सूत्र- 4/42, 6/9
7. आचारांग सूत्र-1/3/3/127
8. डॉ. सिसोदिया, सुरेश, जैन धर्म संप्रदाय,पृ. 168
9. डॉ. राजेन्द्र, आचार्य तुलसी की काव्य-साधना, पृ.228
10. “सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्ष मार्ग”- तत्त्वार्थ सूत्र- 1/2
11. वृहद् द्रव्य संग्रह, संस्कृत टीका, गाथा- 14

“ रमेश उपाध्याय की कहानियों का सामाजिक यथार्थ ”

यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हुयी है वहीं से साभार यहाँ भी।

हालांकि इधर रमेश उपाध्याय जैसे सजग हस्ताक्षर के लेखन में 'त्रासदी...माई फुट!', 'प्राइवेट पब्लिक', 'ग्लोबल गाँव के अकेले' और 'हम किस देश के वासी हैं' जैसी और भी कहानियां भी बाद में आयी है है मगर उनके आने से पहले तक के सफ़र पर एक नज़र में डॉ राजेन्द्र सिंघवी ने एक आलेख हमारे पाठकों के हित लिखा है फिलहाल तो उसी का स्वागत है -सम्पादक ,'अपनी माटी डॉट कॉम' 

“ रमेश उपाध्याय की कहानियों का सामाजिक यथार्थ ”
डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी


रमेश उपाध्याय(वरिष्ठ साहित्यकार)


(एक दशक तक पत्रकार रहने के बाद तीन दशकों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन तथा साहित्य और संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका ‘कथन’ के साथ-साथ ‘आज के सवाल’ नामक पुस्तक शृंखला का संपादन। संप्रति स्वतंत्र लेखन, विविध विषयों का अध्ययन-मनन और साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन। चौदह कहानी संग्रह, पाँच उपन्यास, तीन नाटक, कई नुक्कड़ नाटक, चार आलोचनात्मक पुस्तकेंऔर अंग्रेजी तथा गुजराती से अनूदित कई पुस्तकें प्रकाशित)



साहित्य संसार के प्रति मानसिक प्रक्रिया अर्थात् विचारों व भावों की अभिव्यक्ति है । यह ‘हित का साधन’ भी करता है, अतः संरक्षणीय भी है । इसे समाज का उत्पादन भी कहा जाता है, जिससे विशाल मानव जाति की आत्मा का स्पन्दन ध्वनित होता है । साहित्य जीवन की व्याख्या भी करता है, इसी कारण उसमें जीवन देने की शक्ति भी आती है । इस प्रकार साहित्य व समाज का अन्योन्याश्रयत्व चिरकाल से रहा है । 

डॉ. रमेश उपाध्याय की कहानियों में सामाजिक यथार्थ की बिम्बमय अभिव्यक्ति हुई है । सामाजिक न्याय की अवधारणा को साहित्य में उठाया और कहा- “हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि भारतीय समाज से कुछ चीज़ें एकदम गायब हैं । उसमें से एक चीज है-बराबरी । ....... अगर हम लम्बी अवधि तक बराबरी को नकारते रहेंगे, तो एक दिन हमारा जनतंत्र खतरे में पड़ सकता  है ।”

(पहल-51, सं. ज्ञानरंजन, पृ.253)

हिन्दी के दलित लेखन में तो यह अक्सर कहा जाता है कि जाति एक वास्तविकता है और उसे स्वीकार करना ही होगा, लेकिन इस बात पर विचार नहीं किया जाता कि यदि जाति-व्यवस्था सामाजिक अन्याय की जड़ है, तो वह समाप्त कैसे होगी? इसीलिए रमेश उपाध्याय कहते हैं- “जो साहित्य सामाजिक अन्याय का विरोधी है, उसे उस भविष्य की चिंता करनी ही चाहिए ।”

(शेष इतिहास, पृ.4)

रमेश उपाध्याय जानते हैं कि नवधनिकों की उपभोक्तावादी अपसंस्कृति का परिणाम यह हुआ है कि सामाजिक विरूपता और आगे बढ़ रही है । शादी का एक दृश्य- “कारों का काफिला होते हुए भी दूल्हा घोड़ी पर चढ़ेगा । नशे में धुत्त लोग घोड़ी के सामने ‘नाच’ नामक उछलकूद करेंगें, जिसमें नृत्य की न कोई लय-ताल होगी न सार्थक भाव मुद्रा । ......... धक्का-मुक्की करते हुए लोग खाने पर इस तरह टूट पडें़गे, जैसे खाना कभी देखा नहीं ।”

(शेष इतिहास, पृ.24)

साहित्य से मनुष्य की भावनाएँ कोमल बनती हैं । उसके भीतर मानवीय गुणों का विकास होता है, शिष्टता और सभ्यता आती है । इससे समाज का विकास होता है । समय के साथ इसमें उत्तरोत्तर ह्रास हो रहा है, जिसके मूल में है- उदारवादी अर्थनीति व भूमण्डलीकरण का दौर । इसका दुष्प्रभाव यह हुआ है कि हम दिन-प्रतिदिन रिश्तों को खोते जा रहे हैं । हमारे पास डिग्रियाँ, पैसा, ऐश्वर्य सब-कुछ हैं, लेकिन रिश्ते टूट रहे हैं । हमारे समाज का आम आदमी पहले तो अपने बच्चों की परवरिश के लिए रिश्तों से दूर भागता है, परन्तु जब बच्चे बड़े होकर उन्हें छोड़ जाते हैं, तब रिश्ते याद आते हैं । बुजुर्गों से भरी कॉलोनियाँ किलकारियों की उम्मीद में तरसती रह जाती  हैं । रमेश उपाध्याय की कहानी ‘शेष इतिहास’ का यह अंश द्रष्टव्य है- “एक गरीब किसान बाप जो दूसरों के खेतों पर मजूरी करता है । एक नंगा भूखा परिवार जो सहुआ से एक बार कर्ज लेकर ब्याज चुकाते-चुकाते ही मर खप जाता है, उसका बेटा जो थोड़ा-सा पढ़ लिख गया है, शहर चला आता है ।” 

परम्परा समाज को जोड़ती है और परम्परा में जब अपसंस्कृति का मिश्रण होता है तो आडम्बर स्थान लेते हैं । आडम्बर रूढ़ि का रूप ग्रहण कर समाज को जर्जर बना देते हैं, अतः समयानुकूल परिवर्तन के लिए तैयार रहना चाहिए । डॉ. उपाध्याय की कहानी ‘शंख ध्वनि की कथा’ बताती है कि कोरे उपदेश से क्रांति संभव नहीं है । ‘राष्ट्रीय राजमार्ग’ कहानी में बताया गया कि दलित के लिए आरक्षण की सुविधा के बावजूद गरीब होने के कारण उसके लिए नौकरी प्राप्त करना दुर्लभ है और आरक्षण का लाभ भी अमीर ही उठा ले जाते हैं ।” यहाँ तक कि संस्कृति का आधार भी अर्थतंत्र हो गया है । ‘अर्थतंत्र’ कहानी में राघवन कहता है- “हमारे सामाजिक संबंध ही नहीं, सूक्ष्म और कोमल भावनाएँ भी बदल गई है । प्रेम, करूणा, सहानुभूति, सेवा और पूजा, प्रार्थना तक में अर्थतंत्र घुस गया है ।

आधुनिक युवा संक्रांतिकालीन वेला से गुजर रहा है । माता-पिता की असीम इच्छाएँ उसे कई बार विचलित कर देती हैं दूसरी ओर वह पारिवारिक सामंजस्य भी नहीं बिठा पा रहा है । रमेश उपाध्याय का मत है कि युवा पीढ़ी को अपने विचारों का गुलाम न बनाएँ । वह आपसे उतना ही स्नेह करता है, जितना आप उससे । ‘अर्थतंत्र’ कहानी में सतीश का कथन- “मैं अपना हिस्सा तो चाहता था, लेकिन परिवार से अपना संबंध समाप्त करके नहीं । अभी मैं दूर मद्रास में रहता हूँ, लेकिन यह अहसास बना रहता है कि दिल्ली में मेरा घर है ।” 

समाज का महत्त्वपूर्ण घटक ‘व्यक्ति’ वर्तमान समय में किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में है । तेल बिन्दु की भाँति समस्त जल पर छाना चाहता है । एकांगी दृष्टि के कारण वह एक-दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण कर रहा है । परिणाम स्वरूप वह स्वयं सहज नहीं, समाज सहज नहीं और जीवन में समरसता की जगह बिखराव आ रहा है । डॉ. रमेश उपाध्याय की दृष्टि में इसका समाधान साहित्य में ही है । वे लिखते हैं- “यह सच है कि सिर्फ साहित्य से दुनिया को नहीं बदला जा सकता, लेकिन मानवता के भविष्य से संबंधित नये प्रश्नों को उठाना, उनसे टकराना और उनके उत्तर खोजना उस सृजनशील कल्पना के बिना संभव नहीं है, जो साहित्य में है।”

(सम्पादकीय, कथन- जुलाई-सितम्बर,2007)

समाज की बुनियादी इकाई परिवार है। डॉ. रमेश उपाध्याय कहते हैं- “परिवार साहित्य का सबसे बड़ा सरोकार है । ......... परिवार को अच्छे ढंग से चलाने के लिए आवश्यक है कि  काम कर सकने लायक लोगों को काम मिले, बच्चों को स्वस्थ, सुपोषित, सुशिक्षित और सुसंस्कृत बनाने के साधन मिलें और वृद्धों को मानवीय गरिमा के साथ जीने के साधन उपलब्ध हों ।
   
(डॉक्यूड्रामा और अन्य कहानियाँ, पृ.47)

परिवार के केन्द्र में नारी की भूमिका को विस्मृत नहीं किया जा सकता । उसे ममता, समता व क्षमता की त्रिवेणी माना गया है । ममता से वह नई पीढ़ी का निर्माण करती है, समता से परिवार का संचालन करती है और क्षमता से विपरीत परिस्थितियों में घर की रक्षक बन जाती है । वर्तमान में उसका शोषण किसी से छिपा नहीं है । 'दर्म्यानासिंह'  कहानी में मीनाक्षी कहती है- “दरअसल इस समाज-व्यवस्था में हम स्त्रियों की बड़ी भीषण समस्या है । पूँजीवाद और सामंतवाद दोनों मिलकर हमें ऐसा पीसते हैं कि मित्रता, प्रेम, परिवार हर चीज़ में हमारा शोषण, दमन और अपमान होता है । 

रमेश उपाध्याय सामाजिक यथार्थ को प्रस्तुत कर चुप नहीं हो जाते, बल्कि समाधान की दिशा में काम करते हैं । वे कहते हैं- “यथार्थवाद के प्रथम दौर (प्रगतिशील साहित्यिक आन्दोलन) में हिन्दी कहानी समाज की एक तस्वीर पेश करती थी और पाठक को इस नतीजे पर पहुँचाती थी कि यह समाज अच्छा नहीं है, इसलिए इसे बदला जाना चाहिए । यथार्थवाद का दूसरा दौर (जनवादी साहित्यिक आन्दोलन) में कहानी समाज की ऐसी तस्वीर तो दिखाती ही है, साथ ही समाज के मूल ढाँचे को भी उघाड़कर सामने लाने की कोशिश करती है ताकि वह अपने पाठकों को यह सोचने के लिए प्रेरित कर सके कि समाज को किस तरह बदला जा सकता है।

“ महावीर को मोक्ष गौतम को ज्ञान ”


“ महावीर को मोक्ष गौतम को ज्ञान ”
डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

संपूर्ण भारत वर्ष दीपोत्सव अत्यंत हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाता है । जैनियों के लिए यह पर्व विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसी दिन भगवान महावीर का निर्वाण हुआ और गौतम गणधर को केवल्य ज्ञान हुआ । अतः जिन धर्म में यह पर्व निर्वाणोत्सव के रूप में मनाया जाता है । 

आज से लगभग 2500 वर्ष पुरानी घटना है । कार्तिक मास की काली अमावस्या, चारों ओर अंधकार का साम्राज्य ओर उस दिन भगवान महावीर विहार के पश्चात पावापुरी पहुंचे थे । उस समय एक अलौकिक घटना हुई । सूर्य की किरण प्रस्फुटित होने से पूर्व ही भगवान महावीर निर्वाण पद के अनुगामी हो गए । महावीर को जब यह मोक्ष पद प्राप्त हुआ तो संपूर्ण पावापुरी धन्य हो गई। अमावस्या की काली रात्रि दीपों के प्रकाश से जगमगा उठी । चारों दिशाओं में हर्ष का वातावरण छा गया । तब से यह दीपोत्सव ‘महावीर निर्वाणोत्सव’ के रूप में मनाया जाने लगा ।  

जनता शोक-मिश्रित हर्ष का अनुभव कर रही थी । एक तरफ महावीर को खोने का दुःख था तो निर्वाण प्राप्ति का समाचार उन्हें सुखद अनुभूति प्रदान कर रहा था । संपूर्ण दृश्य हर्षमय शोक और शोकमय हर्ष का स्वरूप लिये हुए था । दीपमालाओं से संपूर्ण जगत उसी दिन आलोकित हो रहा था । अतः प्रकाश पर्व भी कहा जाता है । महावीर का निर्वाण दिवस होने से इसी दिन ‘वीर संवत्’ भी आरंभ हुआ । 

तीर्थंकर भगवान महावीर को प्रातः मोक्ष पद प्राप्त हुआ और उसी दिन सांयकाल उनके प्रमुख शिष्य इन्द्रभूति गौतम को केवल ज्ञान प्राप्त हो गया । इस तरह यह दिवस द्विगुणित महिमामय हो गया । लोगों के हर्ष की सीमा नहीं रही । भगवान महावीर के वियोग से दुखी धर्म प्रजा को केवली गौतम प्राप्त हुए, इससे उन्हें कुछ सांत्वना मिली । इस तरह महावीर को मोक्ष एवं गौतम को ज्ञान प्राप्ति के समाचारों ने संपूर्ण जगत् को आलोकित कर दिया । जैनी दीपमालाएं सजाकर यह निर्वाणोत्सव मनाते हैं । दीप ज्ञान का प्रतीक है जो अज्ञान रूपी अंधकार का विनाश करता हैं । 

समीक्षा “ डॉ. अम्बेडकर की नारी-चेतना विषयक दृष्टि ”

  • पुस्तक  समीक्षा
  • “ डॉ. भीमराव अम्बेडकर की नारी-चेतना विषयक दृष्टि ”
  • डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

डॉ. अम्बेडकर ‘दलित उत्थान’ की दृष्टि से स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात् सर्वाधिक प्रभावशाली विचारक रहे हैं, परन्तु ‘दलित उत्थान’ की विवेचना अधिकांश आलोचकों ने बहुत ही सीमित दृष्टि से की है और उसमें भी मात्र ‘वर्णव्यवस्था’ पर ही ध्यान दिया है । वस्तुतः ‘दलित’ शब्द का तात्पर्य समाज के उस वर्ग से है, जिसकी सदियों से उपेक्षा की गई है तथा जिसकी इच्छा शक्ति को पनपने न देकर बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया । डॉ. अम्बेडकर के विचारों में ‘दलित’ शब्द भी अति व्यापकता के साथ आया है, जिसमें स्त्रियों सहित प्रत्येक वह व्यक्ति जो समाज के तथाकथित ठेकेदारों द्वारा उसके बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रखा गया । ‘भारतीय नारी’ के बारे में भी बाबा साहब का चिन्तन प्रगतिशील रहा । इस दृष्टि से डॉ. (सुश्री) शरद सिंह तथा गुलाबचंद के संयुक्त लेखन में प्रकाशित पुस्तक ‘डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श’ नई चेतना को जाग्रत करने वाली प्रतीत होती है । 

इस पुस्तक में सात अध्याय हैं, जिसमें क्रमशः बाबा साहब का जीवन परिचय, उनके जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियाँ, जाति प्रथा और असमानता के बीज, स्वतंत्रता पूर्व भारत में स्त्रियों की दशा, स्वतंत्रतापूर्व स्त्री उद्धार के प्रयास, डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श तथा स्त्री उद्धार हेतु हिन्दू कोड बिल आदि का पर्याप्त विवेचन के साथ बाबा साहब के संपूर्ण व्यक्तित्व को उजागर किया गया है । डॉ. भीमराव अम्बेडकर के स्त्री-विमर्श को व्यापक अर्थ में तार्किक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास लेखकद्वय ने किया है ।

‘नारी विमर्श’ शब्द हिन्दी कथा साहित्य के केन्द्र में पर्याप्त रूप से चर्चित रहा है, इसकी अभिव्यक्ति का मूल स्वर नारियों की आत्मनिर्भरता एवं नारी-पुरूष की समानता के आस-पास घूमता हुआ दिखाई देता है । आर्थिक स्वावलम्बन के अभाव में नारी अपने ही परिवार में शोषित होती रहती है और अपने बुनियादि अधिकारों से वंचित भी रहती है । स्त्री को आर्थिक अधिकार, पुरूषों के बराबर न होने के कारण विवाहिताएँ अपने पति द्वारा छोड़ दिए जाने के भय से ग्रसित रहती हैं । वे जानती हैं कि परित्यक्ता स्त्री को समाज सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता है । 

प्रस्तुत पुस्तक में यह रेखांकित किया गया है कि स्वतंत्र भारत के कानून मंत्री के रूप में डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में एक महत्त्वपूर्ण विधेयक तैयार किया गया था, जिसके द्वारा विवाह की आयु-सीमा बढ़ाना, स्त्रियों को विवाह-विच्छेद का अधिकार देने, विरासत का अधिकार देने, भरण-पोषण के लिए धन देने तथा दहेज को स्त्री-धन माने जाने का प्रस्ताव दिया गया था । यद्यपि यह विधेयक ज्यों का त्यों पारित नहीं हो सका, तथापि चार पृथक् कानूनों के रूप में आज काफी सीमा तक स्त्रियों को आर्थिक व सामाजिक स्वतंत्रता दिलाने में मददगार रहा है ।(पृ.80)

भारतीय समाज में नारी और पुरूष के लिए अलग-अलग प्रतिमान देखे जा सकते हैं । स्त्रियों की शिक्षा भी इस दोहरे मापदण्ड का शिकार है । डॉ. अम्बेडकर जानते थे कि जब तक स्त्रियों का ध्यान शिक्षा की ओर नहीं जाएगा, तब तक स्त्रियों का उद्धार संभव नहीं है । ‘महाड़’ में चर्मकार समुदाय की स्त्रियों को सम्बोधित करते हुए उनहोंने कहा था- “तुम्हारे पति और पुत्र शराब पीते हैं तो उन्हें खाना मत दो । अपने बच्चों को स्कूल भेजो ।”(पृ.81)

समाज की प्रगति नारी-प्रगति के अभाव में अधूरी है, क्योंकि वह समाज का आधा हिस्सा होती है । 19 जुलाई, 1972 को नागपुर में सम्पन्न “दलित वर्ग परिषद्” की सभा में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का उक्त कथन अवलोकनीय है- “नारी जगत् की प्रगति जिस अनुपात में हुई होगी, उसी मानदण्ड से मैं उस समाज की प्रगति को आँकता हूँ” (पृ.82) उन्होंने गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली स्त्रियों से आग्रह किया था “आप सफाई से रहना सीखो, सभी अनैतिक बुराइयों से बचो, हीन भावना को त्याग दो, शादी-विवाह की जल्दी मत करो और अधिक संताने पैदा मत करो ।”(पृ.82) लेखकद्वय ने उनके विचारों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है ।

नारी-चेतना की दृष्टि से स्त्रियों में आत्मचेतना का विकास आवश्यक है । पुरूष और नारी जीवन-रथ के दो पहिए हैं, दोनों को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए । डॉ. अम्बेडकर का स्पष्ट कथन है- “पत्नी को चाहिए कि वह अपने पति के कार्य में एक मित्र, एक सहयोगी के रूप में दायित्व निभाए । लेकिन यदि पति गुलाम के रूप में बर्ताव करे तो उसका खुल कर विरोध करें । उसकी बुरी आदतों का खुलकर विरोध करना चाहिए और समानता का आग्रह करना चाहिए ।” (पृ.82)

इसी प्रसंग में लेखक द्वय का यह कथन समीचीन है कि स्त्री-पुरूष की जिस समानता की कल्पना डॉ. अम्बेडकर ने की थी, वह बहुसंख्यक परिवारों में आज भी नहीं है । पुरूष घर का मुखिया है, स्त्री को बराबरी का आर्थिक अधिकार भी नहीं है, भले ही वह कमाऊ स्त्री हो ।” (पृ.83) साफगोई के साथ ये विचार भी द्रष्टव्य है- “आज स्त्रियों का बड़ा प्रतिशत साक्षर है, फिर भी अंधविश्वास से पूरी तरह उबर नहीं पाया है । आज भी ग्रामीण अथवा मध्यमवर्गीय शहरी युवती मनचाहे युवक से विवाह नहीं कर पाती है । ....................पुत्र की लालसा में पुत्रियाँ पैदा करते हुए संतानों की संख्या बढ़ाने अन्यथा कन्या भ्रूण को मारने के उदाहरण भी समाज में बहुसंख्यक है । ..........दहेज जैसे प्रकरणों में पढ़े लिखे तथा सवर्ण वर्ग की स्त्रियाँ भी दलितों-सा जीवन जीने को विवश है ।” (पृ.84-85) 

समग्रतः उक्त कृति डॉ. अम्बेडकर के नारी विषयक दृष्टिकोण को पूरी ईमानदारी से उजागर करती है साथ ही डॉ. शरद सिंह तथा गुलाबचन्द के मौलिक विचारों को भी अभिव्यक्ति प्रदान करती है, जिसमें उनका दृष्टिकोण है- “यह ठीक है कि आज गाँव की पंचायतों से लेकर देश के सर्वोच्च पद तक स्त्री मौजूद हैं, लेकिन इसे देश की सभी स्त्रियों की प्रगति मान लेना ठीक उसी प्रकार होगा जैसे किसी प्यूरीफायर के छने पानी को देखकर गंगा नदी के पानी को पूरी तरह स्वच्छ मान लिया जाए ।” (पृ.85) 

पुस्तक पठनीय, संग्रहणीय एवं विवेचनीय है । संदर्भ- ग्रथों के आधार से प्रामाणिकता पर प्रश्नचिहन भी नहीं है । मुद्रण कार्य त्रुटिरहित व कलेवर आकर्षक है ।

कार्यक्रम-प्रताप गौरव 
शीर्षक-पुस्तक समीक्षा :अम्बेडकर और स्त्री विमर्श 
दिन और दिनांक-6 नवम्बर,2012
समय-शाम सात बजाकर पैंतीस मिनट पर 
प्रस्तुतकर्ता-समीक्षक डॉ राजेन्द्र कुमार सिंघवी
लेखकद्वय:-डॉ. (सुश्री) शरद सिंह तथा गुलाबचंद के संयुक्त लेखन में  
ये कार्यक्रम सुनने हेतु आकाशवाणी चितौड़ का मीरा चैनल
(102.9 Mgz) पर करके सुनिएगा

सामूहिक क्षमापना एंव सम्मान समारोह का आयोजन


     सामूहिक क्षमापना एंव सम्मान समारोह का आयोजन 
             
निम्बाहेड़ा 

जैन धर्म एक धर्म ना होकर जीवन जीने की पद्वति है, जिस पर चलकर समय की मांग के अनुरूप परिवार व समाज में सौहार्द एंव शांति स्थापित हो सकती है। यह विचार प्रखर चिन्तक व वक्ता प्रो.ए.एल.जैन ने जैन श्योशल ग्रुप निम्बाहेडा द्वारा कम्युनिटी हॉल में आयोजित सामुहिक क्षमापना एंव सम्मान समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए रखे। ग्रुप उपाध्यक्ष मनीश खेरोदिया के अनुसार समारोह में अतिथि मुख्य वक्ता डॉ.राजेन्द्र सिंधवी ने क्षमापना के सही अर्थ को जैन धर्म व सांस्कृतिक परम्परा से जोड़ते हुए विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की। प्रारम्भ में ग्रुप अध्यक्ष डॉ. कमल नाहर ने स्वागत उदबोधन प्रस्तुत किया तथा ग्रुप महासचिव दिलीप हिंग्गड ने गतिविधियों की संक्षिप्त रूप रेखा प्रस्तुत की। समारोह में महावीर जंयती के अवसर पर आयोजित शिविर में रक्त दान करने वाले 31 रक्तदाताओं एंव चार्तुमास में तप करने वाले 21 तपस्वियों का बहुमान व सम्मान किया। 
          
ग्रुप अध्यक्ष डॉ. कमल नाहर के अनुसार समर्पण व सेवा भाव से कार्य कर उत्कृष्ट मुकाम प्राप्त करने वाले जैन रत्नों का सम्मान किया गया। इसमें साहित्य के क्षैत्र में डॉ. राजेन्द्र सिंधवी, नेत्र दान के क्षैत्र में डॉ. जे.एम. जैन तथा जे.के.सीमेण्ट के युनिट हेड के.के. जालोरी का सम्मान किया गया। मनीश खेरोदिया ने बताया कि  समारोह के विशिष्ट अतिथि डॉ. जे.एम. जैन व अध्यक्षता के.के. जालोरी ने की। समारोह में अशोक  नवलखा, रोशनलाल खेरोदिया, शांति लाल मारू, विजयसिंह लोढा, शांति लाल छाजेड़, शांति चन्द्र मेहता एवं अशोक मारू सहित कई जैन समाज के गणमान्य सदस्य उपस्थित थे। गु्रप के सुनील डूंगरवाल, सत्यमेव सेठिया,  शीतल  नागोरी, वी.के. जैन, अखिलेश जैन, गोतम विराणी, मनीश जैन, अनिल सालेचा, एस. एस. बक्षी आदि ने अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया।     समारोह का संचालन ग्रुप के पूर्व अध्यक्ष दिलीप पामेचा ने किया तथा आभार ग्रुप अध्यक्ष डॉ. कमल नाहर ने व्यक्त किया। समारोह में गु्रप के सदस्य, अतिथि व नागरिक उपस्थित थे।

   

डॉ. धर्मवीर भारती के काव्य में आस्था और अनास्था का द्वंद्व

         

धर्मवीर भारती 
डॉ. धर्मवीर भारती प्रयोगवादी और नई कविताओं की संक्रांतिकालीन बेला के साक्षी रहे हैं। तत्कालीन परिस्थितियाँ जहाँ एक ओर युद्ध जनित त्रासदियों की शिकार मानवता है, तो दूसरी ओर अंधकारमय वातावरण में भी जीवन के प्रति उत्कट भाव प्रवणता । इस संधिकालीन समय में कवि भारती के मन में दुविधा, संशय और भय के साथ-साथ आस्था का स्वर भी अंकुरित होता है। ‘ठंडा लोहा’, ‘अंधायुग’, ‘कनुप्रिया’, ‘सात गीत वर्ष’ जैसी कृतियाँ डॉ. भारती की एक दशक की ऐसी रचनाएँ हैं, जहाँ वे नवीन भाव और विचार बोध को जन्म तो देते हैं, परंतु संपूर्ण कृतित्व में आस्था और अनास्था का द्वंद्व निरंतर जारी रहता है । 

डॉ. भारती की आरंभिक रचनाओं में गहरी भावुकता, स्वप्निल उड़ान, प्रणय भावना के साथ सामाजिक संघर्ष के स्वर मिलते हैं । इन रचनाओं में किशोरावस्था का प्रणय, रूपासक्ति, आत्मसमर्पण की भावना और अहं का शमन कर जीवन की व्यापक सच्चाई को ग्रहण किया गया है। डॉ. धर्मवीर भारती के शब्द हैं- “किशोरावस्था के प्रणय, रूपासक्ति, और आकुल निराशा से एक आत्मसमर्पणमयी वैष्णव भावना और उसके माध्यम से अपने मन के अहं का शमन कर अपने से बाहर की व्यापक सच्चाई को हृदयंगम करते हुए संकीर्णताओं और कट्टरता से ऊपर एक जनवादी भाव-भूमि की खोज, मेरी इस छंद-यात्रा के यही प्रमुख मोड़ रहे हैं।”1 

डॉ. रामदरश मिश्र का विचार है कि असंगतियों को अनावृत्त करना ही सृजनधर्मिता है। वे लिखते हैं- “इन मान्य फारमूलों को, मूल्य की विघातक विसंगतियों को अनावृत्त करना सर्जनात्मकता से असम्बद्ध नहीं है । कितनी बड़ी विडम्बना है कि उच्च संस्कृतियों और मूल्यों का ताज पहने हुए मानव ही मानव आत्मा के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाता ।”2 

वस्तुतः धर्मवारी भारती ने धर्म, दर्शन, समाज की शोषित करने वाली रूढ़ि, मृत परम्परा व सड़े-गले मूल्यों को चुनौती दी है, अशिव को जन्म देने वाली मान्यताओं के प्रति अनास्था बरती है, किंतु मानवतावादी पक्षों को ध्यान में रखकर आस्था व विश्वास को भी उसी निष्ठा से सृजित किया । 

डॉ. भारती अपनी प्रखर मेधा का परिचय देते हुए ‘अंधायुग’ में महाभारत के मिथकीय आवरण में समकालीन युद्धजनित समस्याओं का बखूबी चित्रण ही नहीं किया, बल्कि निजी अनुभूति को व्यापक सत्य के रूप में प्रकट किया । ‘अंधायुग’ कृति के रचनागत उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए वे लिखते हैं- “......... इस कृति का पूरा जटिल वितान जब मेरे अंतर में उभरा तो मैं असमंजस में पड़ गया । थोड़ा डर भी लगा । लगा कि इस अभिशप्त भूमि पर एक कदम भी रक्खा कि फिर बचकर नहीं लौटूँगा ।”3 परन्तु रचनाकार अपने दायित्व से विमुक्त नहीं हो सकता, इसीलिए वे आगे लिखते हैं- “पर एक नशा होता है- अन्धकार के गरजते महासागर की चुनौती को स्वीकार करने का, पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने को सारे खतरों में डालकर आस्था के, प्रकाश के, सत्य के, मर्यादा के कुछ कणों को बटोर कर, बचाकर, धरातल तक ले आने का ।”4 


कविवर डॉ. भारती प्राचीनता के अर्वाचीन शिल्पी माने जाते हैं । ‘कनुप्रिया’ में राधा के चरित्र को व्यापक व्यक्तित्व का रूप प्रदान कर युगीन संदर्भों में ढालकर प्रस्तुत किया है; जहाँ समस्याओं का समाधान है । दूसरी ओर ‘सातगीत वर्ष’ की कविताओं में आधुनिक जीवन का यथार्थ, जिसमें टूटन, घुटन, निराशा, निरर्थकता, पराजय आदि भावों का स्वाभाविक चित्रण तो हुआ है, पर आशा, उत्साह, दृढ़ता व साहस के साथ सृजनधर्मी रहने का संदेश भी है ।कवि की मान्यता यह रही है- “साहित्य में शब्द तभी समर्थ, प्रेषणीय और प्राणवान बनते हैं, जब उनमें मानवीय मूल्य आन्तरिक रूप से प्रतिष्ठित रहता है ।”5 

यही आस्था भाव कवि को सृजनात्मक धर्म की ओर प्रेरित तो करता है, पर अंतस् में निहित व्याकुलता द्वंद्व को जन्म देती है । जो कवि संक्रमणकालीन परिस्थितियों और विसंगतियों का द्रष्टा हो, वह अपने भावों को निश्चित रूप से इन्हीं शब्दों में प्रकट करेगा-
तुमने कब झेली संक्रांति / तुम क्या समझोगे ओ प्रभु !
इन गत्यवरोधों का दर्द / कैसे तरूणाई में ही /
घुट भर जाते हैं विश्वास / प्राणों की समिधाएँ
जमकर हो जाती हैं सर्द!”6

‘कवि और अनजान पग ध्वनियाँ’, ‘थके हुए कलाकार से’, ‘कविता की मौत’ आदि आरंभिक कविताओं में ही कवि का आस्था और अनास्था का द्वंद्व उभरता हुआ दिखाई देता है । एक ओर वे कहते हैं-

मेरी मोती-सी उपमाओं पर धूल जमी /
मेरी पलकों पर स्वप्न नहीं / मकड़ी का
भूरा जाला है .................... (अनजान पगध्वनियाँ)

वहीं दूसरी ओर कविता को सृजन की आवाज बताते हुए वे कहते हैं-

भूख खूँरेज़ ग़रीबी हो मगर / आदमी के सृजन की ताकत
इन सबों की शक्ति के ऊपर / और कविता सृजन की आवाज़ हौ ।
     (कविता की मौत)

कवि की इस मनः स्थिति पर टिप्पणी करते हुए द्वारकाप्रसाद सांचीहर लिखते हैं- “भारती के कवि से ‘ध्वंस में पड़ मूर्च्छित जिंदगी’ को बहुत आशाएँ हैं । कवि ने आस्था, सृजन, उत्थान व विश्वास के इतने सहानुभूतिपूर्ण गीत गाये कि अन्तर आलोकित कर देते हैं ।”7 

वे मध्यमवर्गीय संघर्ष, आर्थिक झंझावातों में डूबा जीवन और वेतन-भत्तों के लिए इन्तज़ार मध्यमवर्गीय जीवन की सच्चाई है, यथा-

‘यह कामकाज, दफ़्तर-फाइल, उचटा-सा जी
भत्ता-वेतन / ये सब सच है ।
     (फूल, मोमबत्तियाँ, सपने)

‘अंधायुग’ में ‘कृष्ण’ का चरित्र जिस रूप में प्रकट हुआ है, उस बारे में कतिपय आलोचकों का मत है कि भारती जी ने भारतीय संस्कृति में कृष्ण के प्रति आस्था को कम कर दिया है, किंतु गहराई से दृष्टिपात करें तो यह प्रकट होता है कि कृष्ण की मृत्यु अश्वत्थामा के अनास्था भाव को समाप्त कर देती है । उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

सुनो मेरे शत्रु, कृष्ण सुनो
मरते समय क्या तुमने इस नर पशु अश्वत्थामा को
अपने ही चरणों पर धारण किया
अपने ही शोणित से मुझे अभिव्यक्त किया?”8

कवि की मानवतावादी चेतना भी क्रियात्मक एवं रचनात्मक शक्ति रखती है । कुंठा, आकुलता, हिंसा, विकृति, रक्तपात और बर्बरता में भी कृष्ण का यह आश्वासन सृजन का संदेश देता है, यथा-

मर्यादायुक्त आचरण में / नित नूतन सृजन में /
निर्भयता के / साहस के / ममता के / रस के /
क्षण में / जीवन और सक्रिय हो उठूंगा मैं बार-बार ।9

‘सात गीत वर्ष’ में संकलित ‘प्रमथ्यु गाथा’ का नायक अग्निवाहक, अकेला चलने वाला, कांतिकारी और हुतात्मा है, परंतु जनसाधारण भीरू, भाग्यवादी और शक्तिहीन है । उनके कल्याण के लिए प्रमथ्यु अपने प्राणों की बाजी लगा देता है, उसका यह कर्तृत्व आशावादी दृष्टि पर ही आधारित है, यथा- 

उनमें से एक-एक के अन्दर /
मूर्च्छित प्रमथ्यु कहीं बन्दी है । /
अवसर जिसे मिला नहीं साहस कर पाने का /
कोई तो ऐसा दिन होगा / जब मेरे ये पीड़ा-
सिक्त स्वर / उसके मन को वेध मुर्च्छित प्रमथ्यु को जगायेंगे ।10

‘कौन चरण’ नामक कविता में कवि उस आधार की तलाश कर रहा है, जहाँ वह अपने टूटे मन के तारों को जोड़ सके । आस्था भाव उसे अभी तक अप्राप्य है । उसको पाने की आकुलता भी स्पष्ट है । आरंभ में कवि ‘ऐसे कोई भी नहीं चरण’ कहकर निराशा व अनास्था से अपने मन को भर लेता है, किंतु अंत में वह फिर अपने लक्ष्य भ्रष्ट मन को आस्था भाव से भर लेता है और कहता है-

‘आखिर होंगे वे यही चरण
जिसमें इस लक्ष्य भ्रष्ट मन को
मिल पाएगी अन्त में शरण ।’11

महाभारत की कथा में वर्णित अभिमन्यु के रथ का ‘टूटा पहिया’ कवि की दृष्टि में टूटे हुए मन का प्रतीक बन गया है । आधुनिक संदर्भ में वह व्यक्ति जो अन्याय के सामने नतमस्तक है, शौर्यहीन है, उसके लिए यह टूटा व्यक्ति भी नवीन युग के निर्माण का आश्रय बन सकता है, इन संभावनाओं के मध्य कवि की आस्थावादी दृष्टि इस तरह प्रकट की है-

“मैं रथ का टूटा पहिया हूँ / लेकिन मुझे फेंको मत /
क्या जाने कब इस दुरूह चक्रव्यूह में / अक्षौहिणी
सेनाओं को चुनौती देता हुआ / कोई दुस्साहसी अभिमन्यु
आकर घिर जाये / बड़े-बड़े महारथी / अपने पक्ष
को असत्य जानते हुए भी / निहत्थी अकेली आवाज़
को / अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें / तब
मैं रथ का टूटा हुआ पहिया / उनके हाथों में ब्रह्मास्त्रों से 
लोहा ल सकता हूँ ।”12

‘कनुप्रिया’ में राधा-कृष्ण का प्रेम शाश्वत नर-नारी का प्रेम बन गया है, जो काल की सीमा से परे है । पौराणिक होते हुए भी यह प्रणय-गाथा आधुनिक मन की दिव्यताओं और तन्मयताओं को अभिव्यक्ति देती है । कवि का निष्कर्ष यह है कि प्रेम की दुनिया को उजाड़ने वाला, अमानुषिक घटनाओं को जन्म देने वाला ‘युद्ध’ कभी भी मानव-जाति का भला नहीं कर सकता । कनुप्रिया अपने ‘कनु’ से प्रश्न करती है-

अपनी जमुना में / जहाँ घंटों अपने को निहारा करती थी मैं /
वहाँ अब शस्त्रों से लदी हुई / अगणित नौकाओं की पंक्ति
रोज-रोज कहाँ जाती है? / धारा में बह-बह कर
आते हुए, टूटे रथ / जर्जर पताकाएँ किसकी हैं? /
हारी हुई सेनाएँ, जीती हुई सेनाएँ / नभ को कँपाते हुए,
युद्ध घोष, क्रन्दन-स्वर / भागे हुए सैनिकों से सुनी हुई ।
अकल्पनीय अमानुषिक घटनाएँ युद्ध की / क्या ये सब
सार्थक हैं ?”13

‘अंधायुग’ में प्रभु अपने अवसान के क्षणों में जब ध्वंस का दायित्व अपने ऊपर लेते हैं तो भविष्य की कल्पना भी रखते हैं । डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी का कथन है- “आस्था का प्रश्न संजय, युयुत्सु और अश्वत्थामा के माध्यम से कवि ने प्रस्तुत किया है और अनास्था को आस्था की भूमिका के रूप में स्वीकार किया है ।”14

विदुर का निवेदन इसी का प्रमाण है-
यह कटु निराशा की / उद्धत अनास्था है / क्षमा करो प्रभु। /
यह कटु अनास्था भी अपने / चरणों में स्वीकार करो । /
आस्था तुम लेते हो / लेगा अनास्था कौन ?”15

आस्था और अनास्था के द्वंद्व में भी कवि का समष्टि भाव ही अधिक मुखर रहा है । ‘अंधायुग’ में युयुत्सु का चरित्र आस्था के प्रति अनास्था भाव को प्रकट करने वाला है, वहीं कृष्ण की मृत्यु पर अश्वत्थामा का आस्थावान् बन जाना अपूर्व है । ‘प्रमथ्यु गाथा’ में प्रमथ्यु का आत्मबलिदान जनसाधारण को चेतनावान बनाने का संदेश देता हे, तो ‘कनुप्रिया’ युद्ध के ध्वंस का विरोध करती है । आम आदमी की पीड़ा, संत्रास, तिरस्कार और उपेक्षा के बीच कवि का स्वर लघु मानव की शक्ति को आस्थावादी दृष्टि से देखने का रहा है । कवि की उक्त पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-



“हम मनुष्य बौना है, लेकिन / मैं बौनों में बौना ही बनकर
रहता हूँ / हारो मत, साहस मत छोड़ो / इससे भी अथाह शून्य में /
बौनों ने ही तीन पगों में धरती नापी ।”16

समग्रतः डॉ. धर्मवीर के काव्य में युगीन विद्रुपताओं, वेदना व पीड़ा की गाथाओं, युद्ध जनित विषमताओं, मानवता को त्रास पहुँचाने वाली कई घटनाओं के चित्रण के बावजूद वे अपनी आस्था का स्वर कभी ‘लघुमानव’ में तलाश करते हैं, तो कभी अश्वत्थामा के हृदय परिवर्तन में । ‘कनुप्रिया’ के कांत सम्मित उपदेश में यही दृष्टि दिखाई देती है । इस संपूर्ण रचना-प्रक्रिया में आस्था और अनास्था के द्वंद्व में आस्थावादी दृष्टि का आकर्षण- पाठकों को सदैव आकर्षित करता है और भावी मूल्यों के निर्माण की प्रेरणा भी देता है । 

संदर्भ
  1. भूमिका, ठंडा लोहा
  2. हिन्दी कविता - तीन दशक, पृ.121
  3. भूमिका, अंधायुग
  4. वही
  5. मानव मूल्य और साहित्य - डॉ. भारती, पृ.177
  6. सात गीत वर्ष, पृ.43
  7. नई कविता और डॉ. धर्मवीर भारती, पृ.67
  8. अंधायुग, पृ.123
  9. वहीं, पृ.128
  10. सातगीत वर्ष, पृ.24
  11. वही, पृ.82
  12. वही, पृ. 79-80
  13. कनुप्रिया, पृ.73-74
  14. हिन्दी नव लेखन, पृ.60
  15. अंधायुग, पृ.19
  16. सात गीत वर्ष, पृ.124

“ आचार्य तुलसी के काव्य में भारतीय सांस्कृतिक मूल्य ”


“ आचार्य तुलसी के काव्य में भारतीय सांस्कृतिक मूल्य ”

संस्कृति किसी भी राष्ट्र की उत्कृष्टतम निधि होती है । राष्ट्र-विशेष का जीवन-स्मरण, उसकी उन्नति-अवनति, प्रतिष्ठा आदि तथ्य उसकी संस्कृति पर ही आधारित रहते हैं । जिस राष्ट्र की संस्कृति जितनी उदात्त होती है, वह राष्ट्र उतना ही गौरवशाली बनता है । डॉ.रामजी उपाध्याय के शब्द हैं “ संस्कृति वह प्रक्रिया है जिससे किसी देश के सर्वसाधारण का व्यक्तित्व निष्पन्न होता है । इससे मानव समाज की उस स्थिति का बोध होता है, जिससे उसे सुधारा हुआ, ऊँचा, सभ्य आदि आभूषणों से आभूषित किया जाता है ।”1 

आधुनिक परिवेश निःसंदेह भौतिकवादी रंगत से प्रभावित है, परिणाम-स्वरूप हिन्दी साहित्य की दिशा भी पदार्थवाद की ओर गमन करती प्रतीत होती है । संत्रांस, आत्मकेन्द्र, व्यष्टिवादिता, निराशा, अवचेतन मन के क्रिया-कलाप एवं नकारात्मक दृष्टिकोण पर आधारित विषय साहित्यिक परिधि में सम्मिलित हो रहे है । परन्तु सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य में उक्त पाश्चात्य-प्रभाव से युक्त चिन्तन का प्रभाव क्षणिक है, क्योंकि दूसरी ओर हिन्दी-साहित्य में भारतीय चिन्तन की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चरित्र रूपी धाराएँ भी निर्बाध गति से प्रवाहित हो रही है, जिसका श्रेय संत साहित्यकारों को दिया जा सकता है ।

इस दृष्टि से भारतीय चिन्तन को हिन्दी-साहित्य में प्रसारित करने एवं उसे जीवन-दृष्टि का अंग बनाने में जैन धर्म एवं उसमें रचित साहित्य का विशेष योगदान रहा है । जिसका प्रामाणिक, साहित्यिक एवं गरिमायुक्त रूप वर्तमान में हिन्दी-साहित्य की निधी है । वस्तुतः जैन साहित्य में सत्यं, शिवं व सुन्दरं को रूपायित करने वाले विषय-वस्तुओं को आधारभूमि में रखा, गिरते सांस्कृतिक मूल्यों को पुनः प्रतिस्थापित किया, जीवन मूल्यों को साहित्य के माध्यम से लोक-जीवन में संचारित किया तथा हिन्दी साहित्य के कोष को निरंतर समृद्ध किया है । इस कार्य में जैनयतियों, मुनियों और आचार्यो की विशेष भूमिका रही । 

वर्तमान में जैन धर्म में मूल रूप से दो सम्प्रदाय-श्वेताम्बर और दिगम्बर विद्यमान है । जैन धर्म के श्वेताम्बर सम्प्रदाय अन्तर्गत ‘तेरापंथ’ शाखा ने आचार्य भिक्षु, जयाचार्य, आचार्य तुलसी एवं आचार्य महाप्रज्ञ जैसे यशस्वी मनीषियों को जन्म दिया व विपुल मात्रा में साहित्य-वैभव प्रदान किया । यह साहित्य केवल अध्यात्म केन्द्रित ही नहीं वरन् साहित्यिक मूल्यों का भी निर्वहन करता है ।

‘तेरापंथ’ के नवम् आचार्य ‘श्री तुलसी’ हुए । वे प्रकृति-प्रदत्त मेधा, विराट् कवित्व-शक्ति, दार्शनिक विद्वता, संगीत मर्मज्ञता, कुशल प्रवचन शैली एवं साहित्य-साधना के बल पर साहित्य तथा अध्यात्म जगत् में समान रूप से अभिनन्दनीय बने । वे बहुभाषाविद् तथा षड्दर्शन ज्ञाता थे । उन्होंने संस्कृत, प्राकृत, अंग्रेजी, हिन्दी एवं राजस्थानी भाषा में प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा । केवल हिन्दी साहित्य में ही गद्य एवं पद्य की विधि विधाओं में शताधिक ग्रंथो की रचना कर उन्होंने अपना अद्वितीय योगदान हिन्दी-संसार को प्रदान कर दिया । 
आचार्य तुलसी इस दृष्टि से सृजन् के साक्षात् बिम्ब थे । उनका काव्य प्रतिभा, निपुणता और अभ्यास से ओत-प्रोत है, जिसमें वास्तव में हृदय मुक्त होकर रस दशा को प्राप्त करना प्रतीत होता है । आचार्य तुलसी रचित प्रमुख काव्य-कृतियों को विषय-वस्तु के आधार पर चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) चरित्र काव्य: कालूयशोविलास, डालिम चरित्र, मगन चरित्र, माणक-महिमा, माँ 
    वदना, सेवाभावी ।
(2) पौराणिक काव्य: अग्नि परीक्षा, भरत-मुक्ति ।
(3) नीति काव्य: तेरापंथ-प्रबोध, नन्दन-निकुंज, शासन-सुषमा, श्रावक-सम्बोध,
    सम्बोध, सोमरस, सुधारस, आषाढ़भूति ।
(4) आख्यान-व्याख्यान काव्य: चन्दन की चुटकी भली, मैं तिरूं म्हारी नाव तिरै 
   इत्यादि।

आचार्य तुलसी भारतीय संस्कृति के गौरव से अभिभूत थे । उनका मानना था कि जिस राष्ट्र ने अपनी संस्कृति को भुला दिया, वह राष्ट्र जीवित या जाग्रत राष्ट्र नहीं हो सकता । देशवासियों को उन्होंने सदैव विराट् सांस्कृतिक मूल्यों से अवगत कराया तथा उसके संरक्षण पर जोर दिया । वे सांस्कृतिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्त्यिों के विकास पर जोर देते थे । 

भारतीय संस्कृति के गौरव को व्यक्त करने वाली आचार्य तुलसी की उक्त पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं- “जो लोग पदार्थ में विश्वास करते हैं, वे असहिष्णु हो सकते हैं । जो लोग शस्त्र-शक्ति में विश्वास करते हैं, वे निरपेक्ष हो सकते हैं । जो लोग अपने लिए दूसरों के अनिष्ट को क्षम्य मानते है, वे अनुदार हो सकते हैं । परन्तु भारतीय संस्कृति की यह विलक्षणता रही है कि उसने पदार्थ को आवश्यक माना एवं शस्त्र शक्ति का सहारा लिया पर उसमें त्राण नहीं देखा । अपने लिये दूसरों का अनिष्ट हो गया, पर उसे क्षमय्य नहीं माना । यहाँ जीवन का लक्ष्य विलासिता नहीं आत्म-साधना रहा । लोभ-लालसा नहीं, त्याग तितिक्षा रहा ।”2

आचार्य तुलसीकृत काव्य में भारतीय सांस्कृतिक तत्वों का पर्याप्त मात्रा में अनुशीलन हुआ है । उनके काव्य में भारतीय अतीत के गौरव का गुणगान हुआ है, विराट् भारतीय चिन्तन को समर्थन दिया है, सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षण प्रदान किया है, संस्कार-निर्माण पर बल दिया है, आदर्श जीवनशैली का परिचय दिया है तथा समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी है ।3 

ये समस्त बिन्दु हमारे सांस्कृतिक विकास के कारक रहे है, इनका संक्षिप्त विवेचन यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है-

आचार्य तुलसी का चिन्तन है कि भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन ही नहीं, समृद्ध भी है, अतः किसी भी राष्ट्रीय समस्या का हल हमें अपने सांस्कृतिक तत्वों के द्वारा ही खोजना चाहिए क्योंकि हमारा अतीत अत्यन्त वैभवशाली रहा है । उन्होंने कहा- “हिन्दू संस्कारों की जमीन छोड़कर आयातित संस्कृति के आसमान में उड़ने वाले लोग दो-चार लम्बी उड़ानों के बाद जब अपनी जमीन पर उतरने या चढ़ने का सपना देखेगें, तो उनके सामने अनेक प्रकार की मुसीबतें खड़ी हो जाएँगी ।”4 

अपने काव्य-साहित्य में उन्होंने भारतीय अतीत के वैभवशाली गौरव का गुणगान किया। अनुशासित जीवन से युक्त, अध्यात्म की समृद्धि के साथ भारत विश्व का पथ-प्रदर्शन बना । उक्त विचार निम्न पंक्तियों में दर्शनीय हैं-

जिस विद्या से भारत ने आध्यात्मिक गौरव पाया,
अखिल विश्व का एकमात्र जो पथ-दर्शक कहलाया,
पा अनुशासन की छाया ।5

भारत वर्ष महापुरूषों की तपोभूमि रही है । यहाँ पर कई महापुरूषों का जन्म हुआ है । इसका गौरव वर्णन उक्त पंक्तियों में दृष्टव्य है-

प्राप्त हुआ है महापुरूषों की, जन्मभूमि बनने का श्रेय ।
जिसकी अवनि में अवतरित, हो गए हैं अगणित श्रद्धेय ।
अनुपम नैसर्गिक सुषमा से, जिसका गौरव निखर रहा ।
प्रकृति-नटी के कौशल से, सौन्दर्य सहज ही बिखर रहा ।6

आचार्य तुलसी ने अपने साहित्य के माध्यम से भारतीय जनता के सोए आत्म-विश्वास एवं अध्यात्म शक्ति को जगाने का उपक्रम किया । वे पाश्चात्य-संस्कृति की अच्छाई ग्रहण करने के विरोधी नहीं थे, परन्तु सभी बातों में उनका अनुकरण राष्ट्र के हित में नहीं मानते थे । भारतीयों को संयम और समता का संदेश देते हुए उन्होंने कहा, “जब तक मानव संयम की आर नहीं मुड़ेगा, पिशाचिनी की तरह मुँह बाँए खड़ी विषम समस्याएँ उसका पीछा नहीं छोड़ेगी ।”7

कवि का दृष्टिकोण भारतीय-चिन्तन के अनुरूप विश्व बंधुत्व पर आधारित रहा । संकीर्ण वृत्ति से दूर रहकर समतामयी जीवन की अभिलाषा और समस्याओं का हल अनेकान्तवादी दृष्टिकोण में तलाश करने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा-

विश्व-बंधुत्व, समता, सहअस्तित्व धर्म ने गाया,
फिर किसने उसमें संकीर्ण-वृति का विष फैलाया,
अनेकांत को समझ करें हम, संयम का संधान ।8

समता रस में भरा हुआ भारतीय चिन्तन का समर्थन करते हुए कवि के आध्यात्ममय निर्मल-जीवन जीने की प्रेरणा दी है, उक्त पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-

समता रस में पीना हो, लहलीना भीना भव स्यूं,
दृढ़सीना अध्यात्म रमण रै हित ।
झंकृत अंतर हो, स्वर झीणा शिव अनुराग में,
ते लाखीणा लहसी विमल निकेत ।9

सत्य, अहिंसा, क्षमा, सहिष्णुता, संयम इत्यादि हमारे सांस्कृतिक मूल्य रहे हैं । उन्होंने भारतीय संस्कृति को विदेशी लोगों से उतना खतरा नहीं, जितना इस संस्कृति में रहने वालों से है । उन्होंने भारतीय संस्कृति को प्रतिपादित करते हुए कहा- ‘अणुव्रतों के द्वारा अणुबमों की भयंकरता का विनाश हो, अभय के द्वारा भय का विनाश हो, त्याग के द्वारा संग्रह का ह्रास हो, ये घोष सभ्यता ओर संस्कृति के प्रतीत बनें, तभी जीवन की दिशा बदल सकती है ।10

भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों में क्षमा, धर्म, शास्त्र एवं अध्यात्मवाणी का महत्वपूर्ण स्थान है। इसे जीवन में उतारने का संदेश और समरसता-मूलक जीवन-पद्धति को अपनाने का आग्रह किया, यथा-

क्षमा-खड्ग कर धर सुभग,
धर्म-ढाल दृढ़ डाल 
शास्त्र-शस्त्र जिन-वच-कवच,
प्रत्याक्रमण कराल ।11

आचार और विचार की रेखाएँ बनती हैं और मिटती हैं । जो बनता है वह मिटता भी है, किन्तु मिटकर भी जो अमिट रहती है, वह है-संस्कृति । आचार्य तुलसी की दृष्टि में शिक्षा संस्कृति को परिष्कृत करने का एक अंग है । शिक्षा का सम्बन्ध आचरण के परिष्कार के साथ होना चाहिए । यदि आचरण परिष्कृत नहीं है तो संस्कृति का संरक्षण, हस्तान्तरण व विस्तार संभव नहीं है ।12 

आचार्य तुलसी की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है- जिस शिक्षा के साथ अनुशासन, धैर्य, सहअस्तित्व आदि जीवन-मूल्यों का विकास नहीं होता, उस शिक्षा की जीवन-दृष्टि के आगे प्रश्न-चिन्ह उभर जाता है । अतः शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है- जीवन मूल्यों को समझना, यथार्थ को जानना तथा उसे पाने की योग्यता हासिल करना ।13 

कवि ने जीवन में संस्कारों को जागरण का आयाम बताया और उसे सर्वोच्च स्थान का अधिकारी बताया, क्योंकि व्यक्तित्व का सम्यक् विकास संस्कारों पर ही निर्भर है, यथा-

जीवन में संस्कारों का, सबसे ऊँचा स्थान,
करता संस्कारी श्रमण, अपना अनुसंधान,
संस्कारों का जागरण, होता जहाँ प्रकाम,
खुलते रहते हैं, वहां, नये-नये आयाम ।14

आचार्य तुलसी ने सांस्कृतिक संधान पर आधारित शिक्षा-पद्धति का समर्थन किया, जहाँ बुद्धि के साथ हृदय का विकास हो व सर्वांगीण विकास का ध्येय बने । कवि के उक्त विचार इन पंक्तियों में दृष्टव्य हैं-

शिक्षा का नव अभियान हो 
बौद्धिकता के सरांगण में, भावों का सम्मान हो ।
सर्वांगीण विकास व्यक्ति का, विद्यार्जन का ध्येय बने ।
शारीरिक बल और बुद्धिबल, मानसबल आदेय बने ।
भावात्मक बल पर आधारित, संस्कृति का संधान हो ।15

तुलसी आचार्य ने आदर्श जीवन-शैली को अपनाने पर बल दिया, जिसमें सांस्कृतिक मूल्य विद्यमान रहें, आस्था ओर विश्वास में कमी न आए और नागरिक श्रद्धावान्, सहनशील, विचारशील, कर्मशील, व चरित्रवान् हों । इस हेतु उन्होंने अणुव्रत आन्दोलन का सूत्रपात किया। वर्तमान समय की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा- “मनुष्य असत् आचरण करता है, यह चिन्ता का विषय है । इससे भी बड़ी चिन्ता की बात यह है कि सदाचार से उसकी आस्था हिल गई है । इस प्रकम्पित आस्था को पुनः स्थिर करने के लिये नैतिकता और चरित्र-निष्ठा में विश्वास से ही आज की विषम समस्याओं से उत्पीड़ित जन-जीवन राहत पा सकता है ।16

आदर्श जीवन में समग्र का हित रखने वाला दृष्टिकोण आवश्यक है, क्योंकि एकाँगी चिन्तन स्वार्थ-पूर्ति तो करता है, परन्तु घातक होता है । इस मंतव्य को कवि ने निम्न पंक्तियों में प्रकट किया-

अपना ही वर्चस्व रहे,
एकांगी चिन्तन घाटक है ।
तेल-बिन्दु जल पर छाये,
वैसे छा जाना पातक है ।
क्षीर-नीर सम मिलना जाने,
वही सचेतन चातक है ।17

कवि ने ऐसी जीवन-शैली का परिचय दिया है जिसमें भेदभाव को स्थान न हो, वर्ण, लिंग, रंग, जाति, धन इत्यादि के आधार पर विभेद न हो । पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

वर्ण जाति का भेद न जिसमें,
लिंग, रंग का छेद न जिसमें,
समता-शासन सत्य-धर्म की ।18

आचार्य तुलसी-साहित्य में नवीनता और प्राचीनता का, आस्था और तर्क का, धर्म और विज्ञान का जीवन मूल्य और सामयिक का समन्वय हुआ है । उनका स्पष्ट कथन है- “प्राचीनता में अनुभव, उपयोगिता, दृढ़ता और धैर्य का एक लम्बा इतिहास छिपा है, तो नवीनता में उत्साह, आकांक्षा, क्रियाशक्ति ओर प्रगति की प्रचुरता है । अतः अनावश्यक प्राचीनता को समेटते हुए आवश्यक नवीनता को पचाते जाना विकास का मार्ग है ।”19
कविवर आचार्य तुलसी ने आदर्श और यथार्थ पर आधारित नव-निर्माण पर जोर दिया, जिससे समाज व राष्ट्र प्रगति-पथ पर अग्रसर हो सकें । उक्त संदेश को व्यक्त करती ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

शुद्धाचार विचार-भित्ति पर,
हम अभिनव निर्माण करें ।
सिद्धान्तों को अटल निभाते,
निज-पर का कल्याण करें ।20

कवि अपने आराध्य को सम्बोधित करते हुए वर्तमान समय में श्री श्रद्धा और तर्क के समन्वय की कामना कर रहे हैं । उक्त पंक्तियों में निहित संदेश दर्शनीय है-

तुम जनमें श्रद्धा के युग में,
हम हैं बौद्धिक-तार्किक युग में ।
श्रद्धा-तर्क समन्वयक का,
संगीत सुनाओ है ।21

उपर्युक्त संक्षिप्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि आचार्य तुलसी के काव्य में संस्कृति के संरक्षण, प्रसार और सामयिक दृष्टि का विशेष प्रयास हुआ है, जिसमें सांस्कृतिक चेतना लोगों में जाग्रत हुई और राष्ट्र की सांस्कृतिक गरिमा में वृद्धि हुई । इसका प्रमाण है- सैकड़ों जैनों-अजैनों का अणुव्रत-आन्दोलन से जुड़ना और उसका जीवन में रूपान्तरण करना । 
संदर्भ-
1. डॉ. रामजी उपाध्याय, भारतीय संस्कृति, पृ.17
2. क्या धर्म बुद्धिगम्य है? पृ. 58
3. डॉ. राजेन्द्र, आचार्य तुलसी का काव्य-साधना, पृ. 210
4. एक बूंद एक सागर, पृ.1680
5. तेरापंथ प्रबोध, पृ.108
6. भरत-मुक्ति, पृ.23
7. एक बूंद एक सागर, पृ.1403
8. नन्दन-निकुंज, पृ.47
9. माणक-महिमा, पृ.47
10. समणी कुसुमप्रज्ञा, आचार्य तुलसी साहित्यःएक पर्यवेक्षण, पृ.50
11. कालु यशोविलास, पृ.132
12. शासन-सुषमा, पृ.47
13. जैन भारती, 22 जून, 1986
14. सम्बोध, पृ.37
15. तेरापंथ प्रबोध, पृ.143
16. प्रवचन पाथेय, भाग-11, पृ.109
17. सम्बोध, पृ.122
18. शासन-सुषमा, पृ. 95
19. एक बूंदः एक सागर, पृ. 785
20. शासन-सुषमा, पृ.47
21. नन्दन निकुंज, पृ.3 

पावन धरा चित्तौड़गढ़

  • डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी
(आकाशवाणी चितौड़गढ़ पर प्रसारित आलेख पाठक हित में यहाँ साभार छाप रहे हैं -सम्पादक )
छायाचित्र चितौड़ के युवा पत्रकार साथी रमेश टेलर से साभार 
अरावली की पर्वतीय उपत्यकाओं से आच्छादित, शोणित की धारा से सिंचित, गोरा-बादल और जयमल-फत्ता की हुँकारों से ऊर्जस्वित, भक्तिमती मीरा, वीरांगना पद्मिनी, त्यागमूर्ति पन्ना की पावन धरा चित्तौड़गढ़ विश्व विख्यात नगरी है । इस नगरी को जीवन रस से सिंचित किया है- गंभीरी और बेड़च ने, जिसके रस से आप्लावित यहाँ का पौरूष इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, साहित्य एवं आध्यात्मिक विरासत के पटल पर हमें अपूर्व गौरव प्रदान करता है । किसी कवि ने चित्तौड़गढ़ की प्रशस्ति  में गाया है-

वीरता के रस लिए ये झरने बह रहे हैं,
चित्तौड़ के इतिहास की कहानी कह रहे हैं ।
विजय स्तंभ कह रहा है कीर्ति स्तंभ से,
मेवाड़ भारत का मुकुट है, साक्षी दे रहे हैं ।
चित्तौड़गढ़ राजस्थान राज्य का प्रमुख शहर है । वीर भूमि मेवाड़ का यह प्रसिद्ध नगर रहा है, जो भारत के इतिहास में सिसोदिया राजपूतों की वीरगाथाओं के लिए अमर है । प्राचीन नगर चित्तौड़गढ़ रेल्वे जंक्शन  से चार कि.मी. दूर है । भूमितल से 508 फुट एवं समुद्रतल से 1338 फुट की ऊँचाई पर एक विशाल  ह्वेल आकार का दुर्ग इस नगर के गौरव का प्रमुख केन्द्र है । दुर्ग के भीतर ही चित्तौड़गढ़ का प्राचीन नगर बसा है। जिसकी लम्बाई साढ़े तीन मील और चौड़ा है एक मील है । किले के परकोटे की परिधि 12 मील है ।  कहा जाता है कि चित्तौड़गढ़ से 8 मील उत्तर की ओर नगरी नामक प्राचीन बस्ती है जो महाभारतकालीन माध्यमिका है । चित्तौड़गढ़ का निर्माण इसी के खंडहरों से प्राप्त सामग्री से किया गया था ।
चित्तौड़गढ, वह वीरभूमि है, जिसने समूचे भारत के सम्मुख अपूर्व शौर्य, विराट बलिदान और स्वातंत्र्य प्रेम का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया । बेड़च की लहरों में यहाँ के असंख्य राजपूत वीरों ने अपने देश तथा धर्म की रक्षा के लिए असिधारा रूपी तीर्थ में स्नान किया । वहीं राजपूत वीरांगनाओं ने कई अवसर पर अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने बाल-बच्चों सहित जौहर की अग्नि में प्रवेश कर आदर्श उपस्थित किए । स्वाभिमानी देशप्रेमी योद्धाओं से भरी पड़ी यह भूमि पूरे भारत वर्ष के लिए प्रेरणा स्रोत बनकर देश प्रेम का ज्वार उत्पन्न करने में अपनी भूमिका आज भी अदा करती है । वीरांगनाओं की स्मृति स्वरूप खड़े दुर्ग के ये स्मारक अपनी मूक भाषा में अतीत की गौरव गाथाएँ सुनाते दिखाई पड़ते हैं ।
मरू प्रदेश को प्रकृति द्वारा प्रदत्त जीवनदायिनी जलधाराएँ प्रदान करने वाली बेड़च और गंभीरी नदियाँ चित्तौड़गढ शहर के मध्य से गुजरती हैं । अतीत के जिस गौरव पर हम अभिमान करते हैं, यह गौरव-रस इन्हीं नदियों के किनारे फलित हुआ और संभवतः वैभवशाली इतिहास का साक्षी भी बना । इन दोनों नदियों ने चित्तौड़वासियों को फलने-फूलने का सदैव अवसर दिया और आज भी दे रही हैं । उदयपुर की गोगुन्दा-पहाड़ियों से निकलने वाली बेड़च राजस्थन की प्राचीन नदी है । अब तक यह जीवनदायिनी नदी किसानों की फसलों को सींचने के साथ, भूजल में वृद्धि करने वाली रही है, जिसके कारण कुओं और नलकूपों के माध्यम से आमजन की प्यास बुझती आई है । चित्तौड़वासियों के लिए यह मातृ-स्वरूपा रही है । गंभीरी ने भी यही कर्तव्य निभाया । इन दोनों नदियों का मिलन चित्तौड़गढ जिले में ही होता है । 
चित्तौड़गढ गंभीरी और बेड़च के मध्य स्थित है । यातायात के बढ़ते दबाव को सुगम बनाने की दृष्टि से शहर में गंभीरी नदी पर पन्नाधाय सेतु एवं बेड़च नदी पर नवीन पुल का निर्माण किया गया है, लगभग नौ करोड़ की लागत से बने पुल से शहर के विकास में नया अध्याय जुड़ गया है और इन दोनों नदियों को नया कलेवर भी । ये दोनों नदियाँ प्रवाहित होकर बीसलपुर बांध तक जाती हैं, जो राजधानी जयपुर की प्यास बुझाता है । 
समय के साथ चित्तौड़गढ शहर ने औद्योगिक विकास की राह पकड़ ली और वर्तमान में प्रमुख औद्योगिक शहर के रूप में विकसित होता हुआ प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहा है । प्रगति के दौर में आर्थिक महत्त्वाकांक्षाएँ हावी होना स्वाभाविक हैं, किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि हम अपना मौलिक कर्तव्य भूल रहे हैं । वह मौलिक कर्तव्य है- इन दोनों नदियों के स्वच्छ जल को बचाने का कर्तव्य ।
यह सच है कि शहर का विकास इन दो नदियों के केन्द्र में है, उसका अतीत साक्षी है और भावी विकास में भी इन दोनों नदियों की सदैव आवष्यकता रहेगी । फिर भी हमारा ध्यान इस ओर नहीं है कि ये नदियाँ किस सीमा तक प्रदूषित हो चुकी हैं और इस प्रदूषण को रोकने के हमारे द्वारा किये गये प्रयास क्या हैं ? औद्योगिक विकास से रासायनिक कचरों का निष्पादन और उससे इन नदियों का बचा रहना आवष्यक है, किंतु पर्यावरणीय मानकों का निर्वाह कहीं भी दिखाई नहीं देता । औद्योगिक कचरे से जहाँ भूमि बंजर हो रही है, वहीं इन नदियों का पानी भी विषैला हो रहा है । यह कितना भयावह है, यह तो आने वाला समय बताएगा ।
औद्योगिक कचरे के साथ शहरवासियों की नालियों का गंदा पानी कहाँ जा रहा है ? इस विषय पर भी हमारा ध्यान नहीं गया है । यह गंदा पानी घूम-फिरकर इन्हीं नदियों में मिश्रित हो रहा है, जो अन्ततः हमारे ही शरीर में पुनः जहर घोल रहा है । जहरीले पानी से मछलियों का मरना आम बात है, तो सफेद होती चट्टानें, बंजर होती भूमि, जहरीली घास का पैदा होना, तटीय गाँवों में चर्मरोगों का बढ़ना कहीं इनके प्रदूषित होने का प्रमाण तो नहीं है । समय रहते यदि इस ओर हमारा ध्यान नहीं गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी। 
बेड़च और गंभीरी का कलकल की ध्वनि से निरन्तर बहते रहना और निर्मल धाराओं की श्वेतकणिकाओं से हरीतिमा का अवलोकन करना चित्तौड़गढ की विरासत का बिम्ब रहा है । यह बिम्ब सदैव मुग्धकारी रहा है और भविष्य में भी रहना चाहिए, आवश्यकता  है तो मात्र सजग प्रहरी के रूप में हमारे दायित्व बोध की । औद्योगिक समूह पर्यावरणीय मानकों का निर्वाह करे, शासकीय अभिकरण सजग निगरानी रखे और जनता स्वयं चेतनावान बनकर अपने जीवन-रक्त को जहर से बचाये, तो वह दिन स्वर्णिम होगा जब पुनः यह शहर समूचे वैभव के साथ अरावली के अंष को हरितिमा से आच्छादित करता रहेगा और जीवन-रथ को प्रगति के पथ पर अग्रसर करेगा ।

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