कविता की रचना प्रक्रिया


कविता की रचना प्रक्रिया 



             आचार्य शुक्ल के अनुसार जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती हैउसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा  कहलाती है,हृदय की  इसी  मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है,उसे कविता कहते हैं। अर्थात आत्म की अभिव्यक्ति ही रचना की प्रथम प्रक्रिया है, लेकिन जब तक यह संवेदना से नहीं जुड़ती तब तक संपूर्ण सृष्टि से नहीं जुड़ पाती ।

        वाचिक परंपरा के रूप में जन्म लेने वाली कविता वर्तमान में लिखित रूप में मौजूद है। सारी जटिलता के बावजूद कविता हमारी संवेदना के निकट होती हैI संवेदना ही कविता का मूल है। इसे राग-तत्व भी कहा जाता हैI यही संवेदना समस्त चराचर जगत से जुड़ने और उसे अपना लेने का सार्थक प्रयास करती है।

      तीव्र संवेदना के कारण ही क्रौंच युगल की मृत्यु के बाद महाकवि वाल्मीकि का आदिकाव्य प्रकट होता है।पक्षी की पीड़ा के साथ कवि की संवेदना जाग्रत होकर इस प्रकार प्रकट होती है-

मा निषाद ! प्रतिष्ठाम त्वंगम: शाश्वती समाः ।
यत्क्रौंच मिथुनादेकमवधी: काममोहितम ।।

     वस्तुतः रचनाकार जगत में घटित घटनाओं को देखता है और अपनी  तीव्र संवेदना से वह उन्हें आयत्त कर लेता है, उसी के धरातल पर खड़ा होकर जब वह अपनी वाणी प्रकट करता है, तो वे विचार आम हो जाते हैं।

      आचार्य भरतमुनि के रस सूत्र को अभिनवगुप्त ने स्पष्ट करते हुए कहा कि रस अभिव्यक्त होता है, अर्थात कवि की वाणी को सुनकर सहृदय के  मन में स्थित स्थायी भाव जाग्रत होकर रस रूप में परिणत हो जाते हैं, ऐसी स्थिति में रचनाकार की क्षमता श्रोता के हृदय  में भाव जगाने की होनी चाहिए,जो कि  राग तत्त्व से ही संभव है।

       कविता एक ऐसी कला है जिसमें किसी भी  उपकरण की मदद नहीं ली जा सकती, उसे मात्र  भाषा की मदद मिलती है। इस प्रकार कविता की दुनिया का पहला उपकरण है-शब्द। शब्दों का मेलजोल कविता की पहली शर्त हैI जब रचनाकार कविता की दुनिया में प्रवेश करता है,तो उसे पहले शब्दों से खेलना पड़ता है, इससे नाद और ध्वनि से संगीतात्मकता प्राप्त होती है। शब्दों का यह खेल धीरे धीरे उसे आगे ले जाता है और एक व्यवस्था निर्मित करता है,जिससे कविता रचना आसान होता जाता है।

       कविता की  दूसरी अनिवार्य शर्त है-बिम्ब निर्माण I हमारे पास दुनिया को जानने का एकमात्र सुलभ साधन इन्द्रियाँ  ही हैं। बाहरी संवेदना मन के स्तर पर बिम्ब  के रूप में बदल जाती हैI जब कुछ विशेष शब्दों को सुनकर अनायास मन के भीतर कुछ चित्र उभर आते हैं यह स्मृति चित्र ही शब्दों के सहारे कविता का बिम्ब  निर्मित करते हैं । कविता में बिम्बों का विशिष्ट महत्व है। जयशंकर प्रसाद प्रकृति का मानवीकरण करते हुए बिम्ब प्रस्तुत करते हुए उषा का चित्र खींच देते हैं-

बीती विभावरी जाग री
अम्बर पनघट में डुबो रही ,
ताराघट उषा नागरी ।

        कविता में चित्रों या बिम्बों का प्रभाव अधिक पड़ता है Iकवि ने यहाँ उषाकालीन वेला को पनघट पर जल भरती हुई स्त्री के रूप में चित्रित किया है। अतः कविता कि रचना करते समय दृश्य और बिम्ब कि सम्भावना तलाश करनी चाहिए।  ये बिम्ब सभी को आकर्षित करते हैं । बिम्ब हमारी ज्ञानेन्द्रियों को केंद्र में रखकर निर्मित होते हैं ,जैसे- चाक्षुष, घ्राण, आस्वाद्य, स्पर्श्य और श्रव्य । चाक्षुष बिम्ब का उदाहरण द्रष्टव्य है –

है अमानिशा ,उगलता गगन घन अन्धकार ,
खो रहा दिशा का ज्ञान ,स्तब्ध है पवन-चार ,
अप्रतिहत गरज रहा,पीछे अम्बुधि विशाल,
भूधर ज्यों ध्यानमग्न,केवल जलती मशाल ।

          इन पंक्तियों में वातावरण की भयंकरता के साथ राम के मन कि दशा का भी बिम्ब उभर आता है ।

        आधुनिक कविताएँ  अतुकांत होती है, परंतु उसमें भी आतंरिक लय  होना जरूरी है। मुक्त छंद की कविता लिखने के लिए भी अर्थ की लय  निर्वाह जरूरी हैI कवि को भाषा के संगीत की पहचान होनी चाहिए। आधुनिक कविता में आंतरिक लय का निर्वाह इन पंक्तियों में द्रष्टव्य है –

वह तोड़ती पत्थर,
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर,
वह तोड़ती पत्थर I

           यहाँ पर कोई छंद न होते हुए भी ‘र’ की आवृत्ति से लय उत्त्पन्न हो गई है।

            परिवेश के साथ-साथ कविता के सभी घटक परिवेश के सन्दर्भ  से परिचालित होते हैंI नागार्जुन की  कविता ‘अकाल और उसके बाद’ में परिवेश को नई भाषा ,बिम्ब छंद और संरचना के साथ प्रस्तुत किया गया है ,यथा-

कई दिनों तक चूल्हा रोया ,चक्की रही उदास ,
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास ,
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त ,
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।

         यहाँ चूल्हा,चक्की ,कुतिया,भीत आदि शब्दों में ग्रामीण परिवेश की हालत प्रकट होती है । ‘कई दिनों तक’ के बार–बार दोहराव से अकाल की गंभीरता ध्वनित होती है । इसी प्रकार ‘गश्त’और ‘शिकस्त’ शब्द में भाषागत आकर्षण है ।

        कवि की  वैयक्तिक  सोच ,दृष्टि और दुनिया को देखने का नजरिया कविता की भाव-संपदा बनती है। कवि की इस वैयक्तिकता में  भी सामाजिकता मिली होती है।  इसी कारण उसकी निजी अनुभूतियाँ  भी सामाजिक अनुभूतियाँ  बन जाती है। इन्हीं तत्त्वों  को उजागर करने का कार्य प्रतिभा करती है। इसे कविता का मूल हेतु माना गया है ,जिसके माध्यम से कवि अपनी रचना कर पाता हैI अतः कविता की रचना एक प्रक्रिया से गुजरने के बाद प्रभावकारी बन जाती है।

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