राष्ट्रीय चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' का काव्य।

राष्ट्रीय चिंतन के परिप्रेक्ष्य में बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' का काव्य 

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साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश द्वारा  'साक्षात्कार' पत्रिका में प्रकाशित

                             आधुनिक हिन्दी कविता में द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मकता, आदर्शवादिता, स्थूलता की परिणति छायावादी आत्मनिष्ठता, ऐन्द्रियता और सूक्ष्मता में हुई। इसी कालखंड में दो धाराएँ समानांतर रूप से विकसित हुई, जिन्हें राष्ट्रीय­सांस्कृतिक काव्यधारा और प्रणयवादी धारा के नाम से जाना जाता है। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की मूल चेतना और व्यक्तित्व छायावादी आत्मनिष्ठता के अनुकूल नहीं था, अतः उनकी वाणी में राष्ट्रप्रेम का स्वर मुखर रूप में व्यक्त हुआ, जो कि मैथिलीशरण गुप्त, सियाराम शरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर दिनकर की परम्परा में प्रकट होता है। ‘नवीन’ की रचनाओं का मूल्यांकन इसी दृष्टि से पूर्णता को प्राप्त करता है।

                               बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की प्रमुख काव्य-रचनाओं में ‘उर्मिला’(1934 ई.) स्वच्छंदतावादी गीति प्रधान काव्य है, जो आचार्य द्विवेदी की प्रेरणा का प्रतिफल है। ‘कुंकुम’ (1936 ई.) का मूल स्वर ‘राष्ट्रप्रेम’ है, जहाँ कवि का रक्त उबलता हुआ ओजस्वी स्वर में प्रकट होता है। ‘रश्मिरेखा’(1951 ई.) में प्रणय­विरह की अनुभूतियाँ हैं तो ‘अपलक’ और ‘क्वासि’ में भक्ति­भावना का मूल स्वर है। कविताओं में विविधताओं के होते हुए भी ‘नवीन’ की पहचान राष्ट्रीयता के कवि के रूप में हैं, उसका कारण यह है कि उन्होंने समय को पहचान कर जनमानस की मौन वाणी को मुखर रूप में व्यक्त किया। उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता ही है कि जो राष्ट्रप्रेम के संस्कार उन्हें मिले, वैसा ही उनके जीवन का संघर्ष, वैसा ही कार्य क्षेत्र, वैसा ही जीवन और वैसी ही कविता भी। विप्लव गान, हम अनिकेतन, प्राप्तव्य, असिधारापथ शीर्षक युक्त कविताएँ स्वाधीनता­आन्दोलन की ऊर्जा को घनीभूत करने में सफल रहीं।

                        ‘नवीन’ जी की कविताओं में स्वदेश धर्म का निर्वाह, कारागार के शून्य जीवन में भी सार्थकता, मातृभूमि के प्रति अपार लगाव, कवि की अन्तर्चेतना तक जागरण की ध्वनि पहुँचाने की क्षमता और राष्ट्र के प्रति एकनिष्ठ प्रेम से उन्हें कालजयी बनाने का अवसर प्राप्त होता है। ‘नवीन’ जी के बारे में राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ लिखते हैं- “जब उस नर­शार्दूल के बोलने की बारी आती तो बादलों में दरारें पड जातीं, छतें चरमराने लगतीं और सत्य का प्रकाश खुलकर अपने स्वाभाविक रूप में सामने आ जाता।” राष्ट्रीयता से ओत प्रोत निडर वाणी से उनका कवि­व्यक्तित्व अमर हो गया। उन्होंने अपने समय को पहचाना, तदनुरूप रचना­कर्म का निर्वाह किया, जो तत्कालीन युगीन परिवेश को सार्थकता प्रदान करने वाला था, यही प्रखरता, चिरकाल तक स्मरणीय है।

                                                राष्ट्रधर्म की रक्षा तत्कालीन समय की मांग थी। अंग्रेजों के समक्ष निडरता से हृदय की अभिव्यक्ति को प्रकट करना साहस भरा कार्य था। ‘नवीन’ जी ने राष्ट्रीय भावों को काव्य का विषय बनाकर भारतीय जनता की स्वातंत्र्य  चेतना को विकसित किया। विदेशी दासता के विरूद्ध शंखनाद करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

                       कोटि­कोटि कंठों से निकली, आज यही स्वर­धारा है।
                       भारत वर्ष हमारा है यह, हिन्दुस्थान हमारा है



                                   मातृभूमि को प्रणम्य बनाने का संकल्प और उसके लिए प्राणों का अर्पण की भावाभिव्यंजना पराधीन राष्ट्र के लिए चेतना की संवाहक होती है। ‘नवीन’ जी स्वाधीनता आंदोलन के मात्र व्याख्याता नहीं, बल्कि सेनानी हैं। दासता की शृंखलाओं के विरूद्ध संघर्ष करते हुए कई बार जेल­यात्रा ने उनके व्यक्तित्व को निखार दिया। किसी कवि के जीवन में इतनी लम्बी जेल­यात्राओं का दुर्लभ संयोग दिखाई नहीं देता। जेल को ही अपना घर मानते हुए उन्होंने लिखा-

                             हम संक्राति काल के प्राणी बदा नहीं सुख भोग।
                                 घर उजाड़ कर जेल बसाने का हमको है रोग।।



                              अंग्रेजी अत्याचारों से  निडरता पूर्वक सामना करना, प्रतिकार करना और यहाँ तक कि उन्हें क्षणिक आतंक की संज्ञा दे देना ‘नवीन’ जी के ओजस्वी व्यक्तित्व का ही परिणाम था। भारतीय दर्शन की अनश्वरता विषयक विचारों को सामने रखकर अंग्रेजों को ललकारा और कहा कि तुम्हारा क्षणिक आतंक भी भय की भीत्ति पर टिका है, तुम कितने ही शक्तिवान् हो, पर अनश्वर नहीं। वे अंग्रेजों को स्पष्ट शब्दों में कहते हैं-


                                   क्या बिगाड़ेगा तुम्हारा यह क्षणिक आतंक?
                                   क्या समझते हो कि होंगे नष्ट तुम अकलंक?
                                       यह निपट आतंक भी है भीति­ओत­प्रोत।
                                  और तुम? तुम हो चिरंतन अभयता के स्रोत।



                      कवि ‘नवीन’ जी ने गांधीजी के प्रत्येक आन्दोलन में सक्रियता से भाग लिया। असहयोग आन्दोलन नमक सत्याग्रह फिर भारत छोड़ो आन्दोलन में संघर्षमयी जीवन यात्रा रही। यह भी विलक्षण संयोग है कि उनकी श्रेष्ठतम रचनाएँ जेलों में ही रची गईं। कारागार के शून्य कक्ष में कवि की आत्मोत्सर्ग करने की भावना उद्वेलनकारी है। जीवन के मादक क्षणों को उन्होंने राष्ट्रप्रेम पर न्योछावर कर दिया था, फलतः स्वयं को जन्म से ही ‘विषपायी’ कहकर अपने आपको प्रेरित किया-


सरद जुन्हाई अब कहाँ, कहाँ बसंत उछाह।
जीवन में अब बीच रह्यौ चिर निदाघ कौ दाह।
हम विषपायी जनम के सहैं अबोल-कुबोल।
मानत नैंकु न अनख हम, जानत अपनो मोल

                                               मानव जीवन सर्वोपरि है। मनुष्य अपने कर्मों से महान बनता है। उसके पुरुषार्थ के समक्ष स्वर्ग  का वैभव तुच्छ है। कवि का दृष्टिकोण है कि मनुष्य अपार क्षमतावान है, स्वर्ग की लालसा उसका उद्देश्य नहीं हो सकता। उसकी सामर्थ्य उससे अधिक है। उसे तो इस धरती को ही स्वर्ग बनाने का स्वप्न देखना चाहिए। मनुष्य यदि चाहे तो धरती को ही मोक्ष­स्थल बना सकता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। मनुष्य की क्षमता को रेखांकित करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

और स्वर्ग तो भोग­लोक है
तदुपरांत बस रोग­शोक है
हमें भूमि को योग­लोक का
नव अपवर्ग बनाना है।
जो कि देव दुर्लभ है, उसको इस धरती पर लाना है।

                        सैनिक राष्ट्र के प्रहरी होते हैं। उनके देश की सीमाएँ व हम सुरक्षित रहते हैं। देश के नागरिकों के मन में उनके प्रति श्रद्धाभाव सदैव विद्यमान रहना चाहिए। कवि ने सैनिकों को भी अपनी क्षमताओं से अवगत कराते हुए कहा कि यदि उसकी रगों में बहता शोणित ठण्डा हो गया, तो पराजय निश्चित है। कवि अपने सैनिकों की आँखों में निराशा भाव नहीं देख सकता। वह प्रबोधन देते हुए कहता है-
सैनिक बोल, रगों में तेरी शोणित है या ठंडा पानी।
लुंज बुढौती या कि जवानी। 
यदि तेरी नस नस में बहती, वेगवती शोणित की धारा।
राख हुआ है नहीं अभी यदि, तेरे यौवन का अंगारा।
तो क्यों झाँक रही है तेरे, नयनों से यह निपट निराशा।।

                                 राष्ट्रीय आन्दोलन में यायावर की भाँति घर का सुख छोड़कर भटकते रहना ही कवि की नियति बन गया था। उसके लिए सांसारिक विलास, महल, धन-संपदा इत्यादि कुछ मूल्य नहीं रखते। कवि स्वयं स्वीकार करता है कि कभी भी सांसारिक आकर्षण उन्हें अपने लक्ष्य से विमुख नहीं कर सका। ‘हम अनिकेतन’ कविता में अपनी फकीरी का कुछ ऐसा ही वर्णन करते हैं-


देखे महल, झोंपड़े देखे, हास­विलास मजे के।
संग्रह के सब विग्रह देखे, जँचे नहीं कुछ अपने लेखे।

लालच लगा कभी पर हिय में, मच न सका शोणित उद्वेलन।

हम अनिकेतन, हम अनिकेतन ।

                                          बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का जीवन मातृभूमि की स्वाधीनता में लगा था, वहीं उनका कवि­कर्म इसमें लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग बना रहा था। वे केवल स्वयं ही नहीं, बल्कि अन्य रचनाकारों को भी संदेश दे रहे थे कि युगीन सत्य की उपेक्षा न करें। वर्तमान समय संघर्ष का है तो कवि की वाणी में भी उथल­पुथल भरी भावाभिव्यक्ति आवश्यक है, क्योंकि उसकी वाणी से ही जनता जाग्रत होगी और स्वाधीनता की हिलोंरें उठने लगेगी। कवि मन को संबोधित करते हुए वे कहते हैं-


कवि कुछ ऐसी तान सुनाओे, जिससे उथल-पुथल मच जाए।
शांति दंड टूटे उस महारुद्र का सिंहासन थर्राए।

उसकी श्वासोच्छवास दाहिका, विश्व के प्रांगण में घहराए।

नाश! नाश! हा महानाश! की प्रलयंकारी आँख खुल जाए।

                                       बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की सक्रियता स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी यथावत रही। वे पत्रकारिता से जुडे हुए थे, ऐसी परिस्थितियों में उनके ओजस्वी शब्दावली  युक्त लेख भी लोगों को प्रेरित करते थे। ‘शिमला समझौते में निराशा का अवतरण’, ‘मुसलमान भाइयों की खिदमत में’, ‘तुम्हारे उपवास की चिन्ता’, ‘एक ही थैली के चट्टे-बट्टे’ आदि शीर्षकों से अनेक लेख ‘प्रताप’, ‘प्रभा’ आदि पत्रों के माध्यम से प्रकाशित होकर जनता को जाग्रत कर रहे थे। गणेशशंकर विद्यार्थी की ओजस्वी शैली का उन पर बड़ा प्रभाव पड़ा था। संपादन का दायित्व निर्वहन करते हुए ‘प्रभा’ का झंडा अंक द्वारा राष्ट्रीय जागरण करते हुए पत्रकारिता को भी राष्ट्रीयता के रंग में रंग दिया। ‘नवीन’ जी का संदेश स्पष्ट था-


भारतखंड के तुम, हे जन-गण।
चमक रहे हैं तब शोणित में, इस भारत माता के रज-कण।

                                       ‘नवीन’ जी की इतिहास दृष्टि में भी राष्ट्रीय -सांस्कृतिक बोध भरा हुआ है। वे मानते थे कि समाज जिस भौतिकवादी उन्माद में आगे बढ़ रहा है, उसका विनाश निश्चित है। यदि मनुष्य ने अपने हृदय की बात नहीं सुनी तो बुद्धिवाद की प्रचंड अग्नि उसे भस्मीभूत कर देगी। कवि की यह धारणा उन युवाओं और तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए थी, जिन्होंने सिर्फ स्वयं की उन्नति को ही अपने जीवन का हेतु मान लिया था। मनुष्यता के पतन को रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा-


आ पहुँचा है जिस और मनुष्य, उस ठौर आज है सर्वनाश।
यदि वह अपने हिय को मथकर, कर ले न आज अपना विकास।।

                                     वस्तुतः बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ एक सिद्धान्तवादी-राष्ट्रवादी रचनाकार थे। आदर्शवाद उनके संस्कारों में था। राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभाषा प्रेम और राष्ट्रीय-संस्कृति प्रेम उनके जीवन में सबसे बड़ा मूल्य था। उन्हें जीवन में जनता का प्यार मिला। ‘पदमभूषण’ सम्मान भी मृत्युशय्या पर पड़े महारथी के सम्मान की औपचारिकता मात्र थी। फिर भी जन-जन के कंठहार बनकर ‘नवीन’ जी की वाणी वर्तमान संदर्भों में भी चेतना की संवाहक बनी हुई है।
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ई-लोक चौपाल-5

मधुमती, दिसंबर,2017 अंक में प्रकाशित
गतांक से निरन्तर....
डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी
               
                     हिन्दी कविता और कवि सम्मेलन दोनों का पारस्परिक अन्तःसंबंध अतीत में प्रगाढ रहा है। समय के साथ कवि सम्मेलनों में कविता कम और फूहड हास्य अधिक हो गया है। इस पर पुनीत बिसारिया की टिप्पणी है- ‘‘एक समय था, जब निराला, पन्त, दिनकर, बच्चन जैसे कवि कवि-सम्मेलनों की शान हुआ करते थे। साहित्यिकता से ओत-प्रोत इनकी कविताएँ सुनकर लोग भाव विभोर हो जाया करते थे। इसके बाद प्रयोगवाद और अकविता का दौर आया और गीतिकाव्य पर इसकी सर्वाधिक मार पडी, परिणाम स्वरूप कविता से गेयता की छुट्टी हो गई। उस दौर में गीतकारों ने गीतों को बचाने के लिए नवगीत लिखने शुरु किए, जो मंच और साहित्य जगत दोनों स्थलों पर सराहे गए, लेकिन अतुकांत कविता ने फिर भी उस समय तक मंच के कवि सम्मेलनों का काफी नुकसान कर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि मंच पर तथाकथित कविता पढने वाले कवियों ने कविता से पहले ढेर सारे चुटकुले और किस्से या फिर फूहड हास्य पैदा करने हेतु साथी कवियों पर फब्तियाँ कसने, सहयोगी कवियित्रयों पर अशोभनीय टिप्पणियाँ करने को मंच पर कविता पढने में सफलता की गारण्टी मान लिया।
                 रचनाकार के कृतित्व पर उसका व्यक्तित्व अवश्य झलकता है। उसे सत्व गुण संपन्न होना आवश्यक भी माना गया है। यदि रचनाकार निर्मल है, तब ही उसकी रचना प्रवाहकारी होगी। डॉ. विजेन्द्र का अभिमत है- ‘‘रचनाकार को एक नेक इन्सान होना पहली शर्त है। अगर हम अपने जीवन में गिरते हैं तो उसका असर लेखन पर पडता है, लेकिन हम उसे अनुभव नहीं कर पाते। समाज एक लेखक को तभी आदर देगा, जब उसे यकीन हो कि लेखक जो कह रहा है, उसे अपने जीवन में भी चरितार्थ कर पा रहा है। समाज लेखक से अपेक्षा करता है कि वह उसे एक अनुकरणीय इन्सान की तरह देख सके। लेखक को यह भ्रम न हो कि समाज उसे देख-समझ नहीं रहा है। मेरा लम्बा अनुभव है। हम चाहे जहाँ हों, समाज हमें देखता परखता है। हम रचना से जितना छल करेंगे, वह हमसे उतनी ही दूर होती जायेगी। रचना हर साँस का लेखा-जोखा अपने पास रखती है। इसीलिए हमारे महर्षि साहित्य को साधना कहते रहे हैं।’’
              रामकथा भारतीय परम्परा की चिंतन धारा में अपना अमूल्य स्थान रखती है। वाल्मीकि से लेकर आधुनिक रचनाकारों ने किसी न किसी रूप में रामकथा से प्रभावित हुए हैं। इसी क्रम में डॉ. राजेश श्रीवास्तव रामकथा को एक संहिता के रूप में स्वीकार करते हुए लिखते हैं- ‘‘रामकथा एक संहिता है। संभवतः आप मेरे इस तर्क से सहमत नहीं होना चाहेंगे। लेकिन मैं मानना चाहता हूँ। प्रमाण इतिहास की आवश्यकता है, साहित्य संवेदनाओं को संजोता है और मिथक हमारे संस्कारों को पल्लवित करते हैं, किन्तु संहिताएँ इन सबसे आगे बढकर हमारी उस मनःस्थिति का चित्रण है, जिसे हम अपने समय, आवश्यकता और विश्वास के अनुरूप गढना चाहते हैं। उन कथाओं में नए इतिहास रचने, उन मिथकों को नए भाव देने और उस साहित्य को युग की आकांक्षाओं के अनुकूल बनाने में संहिताओं की ही भूमिका होती है। संहिताकार को मानव जाति के सर्वोत्तम स्वरूप के अनुसार इतिहास के उन बिन्दुओं को निष्काषित करने का भी अधिकार होता है, जिसे आज का मानव मन नहीं स्वीकारता। धर्म की बदलती स्थितियों के कारण आस्था, विश्वास और मान्यताओं का संरक्षण करते हुए संहिताएँ अपनी गति और दिशा में समयमान रहती है। यह लोक जीवन और मनुष्य की केन्द्रीय शक्ति होती है।’’
                 भारतीय भाषाओां का समृद्ध इतिहास रहा है। विपुल साहित्य भारतीय वाङ्मय की समृद्धि है। यह साहित्य देवनागरी सहित अनेक लिपियों में उपलब्ध है। डॉ. शिबन कृष्ण रैना कश्मीरी भाषा का परिचय देते हुए स्पष्ट करते हैं- ‘‘आज से लगभग ६०० वर्ष पूर्व कश्मीरी भाषा शारदा लिपि में लिखी जाती थी। १४वीं शताब्दी के आसपास जब फारसी कश्मीर की राजभाषा बनी, तो कश्मीरी के लिए फारसी लिपि का प्रयोग बढने लगा। वर्तमान में इसी लिपि का तनिक परिवर्तन। परिवर्धन के साथ प्रयोग होता है और इसे पर्शियो- ऐरेविक ‘नसतालिक’ लिपि के नाम से जाना जाता है। इस लिपि को राजकीय मान्यता भीप्राप्त है। कश्मीरी के अधिकांश धार्मिक तथा कर्मकांड संबंधी बहुमूल्य ग्रंथ/शास्त्र शारदा में ही लिखे गए हैं। शारदा लिपि लिखने का तरीका देशी थाजो मूल ब्राह्मी से विकसित हुआ था। वैसे शारदा ब्राह्मी का ही कश्मीरी-संस्करण है। इस लिपि का प्रयोग कश्मीरी पंडित (पुरोहित वर्ग) द्वारा जन्म पत्री लिखने के लिए भी किया जाता रहा है। साथ ही, कश्मीरी भाषा के लिए शारदा के अलावा देवनागरी लिपि, रोमन आदि लिपियों का प्रयोग भी होता रहा है।.... कश्मीरी को देवनागरी में लिपिबद्ध करने का श्रेय सर्वप्रथम श्रीकंठ तोषखानी जी को जाता है। इसके बाद श्री जियालाल कौल जलाली तथा श्री पृथ्वीनाथ पुष्प ने भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास किये। देवनागरी की यह विलक्षण विशेषता है कि वह किसी भी भाषा को सफलतापूर्वक लिपिबद्ध करने में सक्षम है।’’
                  परिचित लेखिका ममता कालिया को वर्ष २०१७ का प्रतिष्ठित ‘व्यास सम्मान’ देने की घोषणा हुई। उपन्यास ‘दुक्खम-सुक्खम’ के लिए यह सम्मान दिया जाएगा। प्रो. कैलाश कौशल ने उपन्यास की संवेदना को रेखांकित करते हुए लिखा- ‘‘दुक्खम-सुक्खम’’ जीवन के जटिल यथार्थ में गुँथा एक बहुअर्थी पद है। रेल का खेल खेलते बच्चों की लय में दादी जोडती है ‘कटी जिन्दगानी कभी दुक्खम कभी सुक्खम। यह खेल हो सकता है, किन्तु इस खेल की त्रासदी, विडंबना और विसंगति तो वही जान पाते हैं जो इसमें शामिल हैं। परम्पराओं रूढियों में जकडे मध्यवर्गीय परिवार की दादी का अनुभव है- ‘इसी गृहस्थी में बामशक्कत, कैद, डंडाबेडी, तन्हाई जाने कौन कौनसी सजा काट ली। एक तरह से यह उपन्यास शखला की बाहरी-भीतरी कडियों में जकडी स्त्रियों के नवजागरण का गतिशील चित्र और उनकी मुक्ति का मानचित्र है।’’
                                 ‘जीवन की भारतीय दृष्टि’ विषय पर भोपाल में आयोजित संगोष्ठी के प्रमुख वक्तव्य ई-लोक पर प्रसारित हुए हैं। जे.नन्द कुमार ने कहा कि विश्व में भारतीय जीवन दृष्टि है, जहाँ स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं माना गया है।यहाँ स्त्री पुरुष की रचना एवं कल्पना एक साथ एक ही तत्त्व से मानी जाती है। हमारे यहाँ शक्ति के बिना शिव का महत्त्व नहीं। विश्व शांति के लिए भारतीय दर्शन को जानना महत्त्वपूर्ण है।’ पद्मश्री डॉ. नरेन्द्र कोहली ने कहा- ‘‘हमारे इतिहास में दो शब्द आते हैं- ऋषि एवं राक्षस। जो लोगों को बाँटने का काम करते हैं, वह राक्षस हैं। जबकि जो लोगों को जोडते हैं, उन्हें ऋषि कहते हैं। ऋषि अपनी संस्कृति व राष्ट्र की रक्षा करता है। ऋषि का अर्थ है- बुद्धिजीवी। बुद्धिजीवी वह है, जो जानता है, इसलिए मानता है और जिसे नहीं जानता, उसे जानने का प्रयास करता है। दूसरी ओर राक्षस वह है, जो जानता नहीं, इसलिए मानता नहीं और जानना भी नहीं चाहता। जो लोग अपने सामर्थ्य का उपयोग लोगों का शोषण करने के लिए करते हैं, वह राक्षस हैं। आतंकवादियों ने सीरिया में महिलाओं के साथ जो व्यवहार किया, वैसा तो राक्षस भी नहीं कर पाएँगे।’’ प्रो. सुनील कुमार ने गीता को विज्ञान के साथ जोडते हुए कहा- ‘‘भारतीय योग, पूजा पद्धति के साथ भारतीय विज्ञान गीता में उपस्थित है, जो सही मायने में भारतीय जीवन दृष्टि का एक रूप है।’’
                                      ‘मुक्तिबोध’ पर वैचारिक बहस हिन्दी आलोचना का महत्त्वपूर्ण अध्याय दशकों से चल रहा है। मधुमती के नवम्बर अंक का संपादकीय मुक्तिबोध पर केन्द्रित था। इसी संदर्भ में डॉ. सुरेन्द्र डी. सोनी ने टिप्पणी की है- ‘‘मुक्तिबोध के जन्म का शताब्दी वर्ष है। उनको नए नजरिए से देखना असली-नकली सभी प्रगतिशील मित्रों का धर्म था। उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे शायद मुक्तिबोध को पूरा दुह चुके। उनके हिसाब तो साहित्य का अंत ही हो चुका है। यह अंत स्वीकार कर लेना उन्हें न इधर का छोडता है, न उधर का। इस परिस्थिति में डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’ ने मधुमती के संपादकीय लेख में कुछ मुक्तिबोधीय मिथकों को तोड दिया है- वह भी सलीके से...!??
एफ-६-७, रजत विहार, निम्बाहेडा, ३१२६०१ (राज.)
मो. ९८२८६०८२७० 

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