प्रिय प्रवास का महाकाव्यत्व

 

प्रिय प्रवास का महाकाव्यत्व


ललित काव्य की एक विधा का रूप धारण कर महाकाव्य ‘साहित्यशास्त्र‘ का विषय बन गया और आचार्यों ने इसे भी लक्षणबद्ध कर दिया। भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-शास्त्रीय परम्परा में इसका पर्याप्त विवेचन हुआ है। आधुनिक संदर्भों में ‘महाकाव्य‘ पद में ‘महा‘ विशेषण कृति के विपुल-व्यापक आकार, महान् कलेवर, उत्कृष्ट विषय-वस्तु तथा प्रतिपाद्य विषय की रचनात्मक गरिमा का द्योतक है। महाकाव्य की कथावस्तु, नायकत्व, चरित्र-चित्रण, युगीन परिवेश, वस्तुवर्णन, भाव एवं रस निरूपण तथा शैली की उन्नत गरिमा रहती है। महाकाव्य में आकार की व्यापकता होती है। अर्थात् उसमें जीवन का सर्वांग चित्रण रहता है। महान् पुरूष का जीवन-चरित्र होने से अनायास ही वह देश-काल की सीमा से विस्तारित हो जाता है। अंततः महत्तर मानव-मूल्यों की प्रतिस्थापना करने में महाकाव्य की सफलता निश्चित होती है।

द्विवेदी युग के कवियों ने हिंदी कविता को ब्रजभाषा के मोह से मुक्त कर खड़ी बोली की शक्ति से परिचित कराया। इस दिशा में 'हरिऔध' जी का 'प्रिय प्रवास' (1914) एक मील का पत्थर है। महाकाव्य की परंपरा संस्कृत साहित्य से प्रारंभ होकर हिंदी के भक्ति और रीति काल से गुजरती हुई यहाँ एक नया मोड़ लेती है। 'प्रिय प्रवास' ने सिद्ध किया कि खड़ी बोली भी गंभीर और कोमल भावों के निर्वाह में सक्षम है। खड़ी बोली हिंदी के प्रथम महाकाव्य के रूप में प्रसिद्ध यह कृति न केवल शास्त्रीय मानदंडों पर खरी उतरती है, बल्कि पौराणिक कथाओं को आधुनिक, मनोवैज्ञानिक और लोकोपकारी धरातल प्रदान करती है इस दृष्टि से ‘प्रिय प्रवास‘ खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। अप्रतिम वस्तु सौन्दर्य, उत्कृष्ट रचना-विधान एवं परम औदात्य का निर्वहन होनेसे ‘हरिऔध‘ की यह कृति उनकी अद्भुत प्रतिभा एवं गहन अनुभूति का प्रमाण है।

प्रियप्रवास का आरंभ संध्या के सौन्दर्य वर्णन से आरंभ होता है। दूसरे सर्ग में गोकुलवासियों का कृष्ण से विरह होने के बाद उनका व्यथित होना दिखाया गया है। तीसरे सर्ग में बाबा नन्द की व्याकुलता एवं माँ यशोदा के द्वारा भगवान् श्री कृष्ण की कुशलता के लिए की गई मनौतियों का वर्णन है तो चौथे सर्ग में राधा के सौंदर्य का चित्रण है। पाँचवें सर्ग में गोकुल के विरह का वर्णन है साथ ही राधा और माता यशोदा की व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति है। छठे सर्ग में कृष्ण और यशोदा का वात्सल्य तथा सातवें सर्ग में नन्द के मथुरा से लौटने पर माता यशोदा के अपने पुत्र श्री कृष्ण के विषय में प्रश्नों का मार्मिक वर्णन है। आठवें सर्ग में गोकुलवासियों के कृष्ण साथ बिताए गए पलों का वर्णन है। नौवें सर्ग में श्री कृष्ण का गोकुल की यादों में विस्मृत स्थिति का वर्णन है। दसवें और ग्यारहवें सर्ग उद्धव प्रसंग के हैं। बारहवें सर्ग में श्री कृष्ण का जननायक के रूप और तेरहवें सर्ग में कृष्ण का समाजसेवी रूप निकलकर आता है। चौदहवें सर्ग में गोपी उद्धव संवाद व पन्द्रहवें सर्ग में श्री कृष्ण-विरह में गोपियों के विरह का वर्णन है। सोलहवें सर्ग में राधा-उद्धव संवाद है। सत्रहवें सर्ग में यह बताया गया है कि विश्व का प्रेम व्यक्तिगत प्रेम से ऊपर है।

‘प्रियप्रवास’ का कथानक श्रीकृष्ण के मथुरा गमन और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न ब्रजवासियों के विरह पर आधारित है। यद्यपि कथा सीमित प्रतीत होती है, किंतु उसके भाव अत्यंत व्यापक हैं। इसमें केवल राधा-कृष्ण का प्रेम नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रज की सामूहिक संवेदना अभिव्यक्त हुई है। सत्रह सर्गों में विभक्त ‘प्रिय प्रवास‘ की कथावस्तु श्रीकृष्ण के मथुरा गमन के वृतान्त पर आधारित है। विरह-व्यथित ब्रजवासियों ने श्रीकृष्ण का गुणगान करते हुए उनके कर्तृत्व का वर्णन भी किया है, जैसे- पूतना वध, शकठासुर वध, कालिया नाग वध, बकासुर वध आदि। इससे कथानक सुसंगठित रूप में प्रकट होता है। कथा-संधियों, अर्थ-प्रकृतियों एवं कार्यावस्थाओं के विधान से प्रिय-प्रवास ने यशोदा-विलाप, पवन-दूती प्रसंग, राधा-उद्धव संवाद आदि के माध्यम से कथावस्तु में मार्मिक-स्थलों की पहचान भी की है। कथानक के नायक ‘श्रीकृष्ण‘ की महानता लौकिक पुरुष के रूप में चित्रित है, जिसमें आदर्श, नैतिकता, लोकसेवा एवं मानवता का कल्याण परम उद्देश्य है। श्रीकृष्ण के चरित्र का युगीन चित्रण विलक्षण है।

महाकाव्य परम्परानुसार प्रिय प्रवास के नायक-नायिका श्रीकृष्ण एवं राधा हैं, जो पौराणिक काल के आदर्श हैं। श्रीकृष्ण महान् पुरूष एवं राधा उदात्त नायिका के रूप में चित्रित हैं। श्रीकृष्ण जो केवल प्रेमी नहीं बल्कि लोकनायक हैं। वे लोककल्याण के लिए ब्रज छोड़ते हैं। राधा का चरित्र त्याग, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। यशोदा का वात्सल्य, गोपियों का प्रेम तथा ब्रजवासियों की करुण दशा अत्यंत मार्मिक बन पड़ी है। राधा का प्रेम व्यक्तिगत न होकर सार्वभौमिक एवं आध्यात्मिक रूप ग्रहण कर लेता है। यही उदात्तता महाकाव्य का प्रमुख गुण है। राधा-कृष्ण परम ब्रह्म न होकर मानव-मानवी हैं। कृष्ण अलौकिक शक्तियों से संपन्न अवतार नहीं, बल्कि एक महामानव हैं। वे प्रजा की रक्षा के लिए गोवर्धन उठाते हैं और कंस के अत्याचारों को समाप्त करने हेतु मथुरा जाते हैं। उनका धीर-वीर और गंभीर व्यक्तित्व उन्हें महाकाव्य का श्रेष्ठ नायक बनाता है। श्रीकृष्ण के लोकसेवक रूप का चित्रण द्रष्टव्य है -

जो  होता  निरत तप  में मुक्ति की कामना से।

आत्मार्थी है, न कह सकते हैं उसे  आत्मत्यागी।

जी से प्यारा जगत-हित औ लोक-सेवा जिसे है।

प्यारी सच्चा अवनि-तल में आत्म त्यागी वही है।।

श्रीकृष्ण लोक सेवक एवं राधा लोक सेविका है। इन दोनों के माध्यम से कवि ने मानवीय प्रेम को धीरे-धीरे इतनी उच्च भूमि पर ले जाकर प्रतिष्ठित किया है कि वह व्यक्ति, परिवार, ग्राम और समाज की सीमाओं को पार करता हुआ विश्व-प्रेम में परिवर्तित हो जाता है। राधा सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति, मृदुभाषिणी एवं श्रीकृष्ण की अनन्य प्रेयसी है। राधा का विरह केवल निजी नहीं है। वे कहती हैं कि यदि कृष्ण विश्व-कल्याण के लिए गए हैं, तो वे अपनी व्यथा सहने को तैयार हैं। लोक सेवा के लिए वह प्रिय-वियोग को स्वीकार कर लेती हैं। सामान्य मानव-जनित उद्गार प्रकट करने में भी वह संकोच नहीं करती। वह नारी की मनोव्यथा को प्रकट करती हुई स्पष्ट रूप से कहती है -

मेरे  प्यारे,  पुरुष, पृथिवी-रत्न और शान्त-धी हैं।

सन्देशों  में   तदपि  उनकी, वेदना व्यंजिता है।

मैं  नारी हूँ,   तरल-उर हूँ, प्यार से व्यंचिता हूँ।

जो होती हूँ विकल विमना, व्यस्त वैचित्र्य क्या है?

राधा-कृष्ण के अतिरिक्त नन्द, यशोदा, उद्धव आदि का चरित्रांकन भी यथानुकूल हुआ है। यशोदा का मातृत्व और नछ की आदर्शमय भूमिका दर्शनीय है। अपने पुत्र के वियोग में यशोदा का निरन्तर अश्रुपात भाव-विह्वल करने वाला है-

सहकर कितने ही कष्ट औ संकटों को।

बहु यजन  कराके पूज के निर्जरों को।

यक सुअन मिला है जो मुझे यत्न द्वारा।

प्रियतम! वह मेरा कृष्ण प्यारा कहाँ है ?

 प्रिय, प्रवास का अंगी रस ‘वियोग-शृंगार‘ है। साथ ही वात्सल्य रस का भी सुन्दर चित्रण हुआ है। वीर, रौद्र, भयानक रस भी कथा अनुरूप हैं। रस-व्यंजना में महाकाव्य के लक्षणों का सम्यक् निर्वाह हुआ है। विरोधी रसों से बचने का प्रयास है। भाव-शांति, भाव-शबलता के साथ भाव-निरूपण भी सफलता पूर्वक है। राधा का श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम ‘वियोग शृंगार‘ की रसमयता के साथ व्यंजित हुआ है -

 

रो-रो चिन्ता सहित दिन को राधिका थीं बिताती।

आँखों को थीं सजल रखतीं उन्मना थीं दिखाती।

शोभावाले जलद-वपु की,  हो रही चातकी  थीं।

उत्कंठा थी परम प्रबला,  वेदना  वर्द्धिता  थीं।।

 महाकाव्य में प्रकृति-वर्णन का विशेष महत्व होता है। ‘प्रियप्रवास’ में ब्रज की प्राकृतिक छटा, ऋतु-वर्णन, यमुना तट, वन-उपवन आदि का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है। प्रकृति यहाँ केवल सजावट नहीं, बल्कि पात्रों की मनःस्थिति की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। प्रिय-प्रवास का प्रकृति-चित्रण अपूर्व है। प्राणी-प्रकृति के अटूट संबंधों को प्रथम सर्ग से ही व्यक्त कर दिया, जहाँ ब्रजवासी प्रकृति के साथ सहज भाव से पले-बढ़े। ‘पवन-दूत‘ के माध्यम से राधिका का संदेश प्रकृति के साथ गहरे तादात्म्य का प्रमाण है। प्रकृति का आलम्बन, उद्दीपन, अलंकार एवं भाव-प्रकटीकरण की दृष्टि से सुन्दर निरूपण हुआ है। विषाद, खिन्नता, शोक आदि भावों को प्रकृति-चित्रण के साथ प्रकटीकरण अत्यन्त मोहक रूप में व्यक्त होता है, जैसे- 

समय  था  सुनसान निशीथ का,

अटल  भूतल में  तम राज्य था।

प्रलय काल  समान   प्रसुप्त हो,

प्रकृति - निश्चल नीरव शांत थी।।

 इस काव्य में भारतीय ग्राम्य संस्कृति, गोपाल जीवन, पारिवारिक संबंध तथा लोकजीवन का सुंदर चित्रण हुआ है। ब्रज संस्कृति का चित्रण अत्यंत स्वाभाविक एवं हृदयग्राही है। ‘प्रियप्रवास’ भारतीय संस्कृति के प्रेम, त्याग, करुणा और लोकमंगल जैसे आदर्शों को प्रतिष्ठित करता है। महाकाव्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं होता, बल्कि समाज को आदर्श प्रदान करना भी होता है। ‘प्रियप्रवास’ में प्रेम को लोकमंगल और त्याग से जोड़ा गया है। कृष्ण का ब्रज त्याग व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि व्यापक कल्याण के लिए है।

प्रिय-प्रवास का मूल लक्ष्य विश्व-मैत्री, विश्व-प्रेम, विश्व-कल्याण है। श्रीकृष्ण के चरित्र को मानवीय रूप देकर लोकसेवा में तत्पर दिखाया है। इसके साथ स्थायी मानव-संबंधों का सम्यक विवेचन हृदय तत्त्व के साथ किया है, जहाँ माता-पिता, प्रेमी-प्रेमिका, सखा-सखी निरन्तर सुख-दुःख में साथ देते हैं और पथ की बाधा नहीं बनते, वरन् लोकसेवा को परम उद्देश्य मानते हुए सहभागी बनते हैं। आधुनिक मानव में मानवीय मूल्यों का संचार हों तथा स्वयं के लिए नहीं बल्कि लोक के लिए जीने की अमूल्य प्रेरणा है। श्रीकृष्ण का यह कथन इसी उद्देश्य को प्रकट करता है-

है आत्मा का न सुख किसको विश्व के मध्य प्यारा।

सारे  प्राणी  स-रूचि  इसकी माधुरी  में बँधे हैं।

जो  होता है  न वश इसके  आत्म-उत्सर्ग द्वारा।

ऐ  कान्ते हैं सफल  अवनी-मध्य  आना उसी का।

 

कला-विधान में कुछ नवीनता भी है। मंगला चरण के स्थान पर ‘प्रकृति-वर्णन‘ से काव्य का आरंभ है। नायक-नायिका आधुनिक मानव-मानवी हैं। काव्य-ग्रंथ का नाम ‘चरित्र प्रधान‘ न होकर ‘घटना-प्रधान‘ है। भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा में चित्रमयता व बिम्ब विधान आकर्षक है, यथा-

दिवस का अवसान  समीप था,

गगन था कुछ लोहित हो चला।

तरुशिखा  पर थी अब राजती,

कमलिनी कुल बल्लभ की प्रभा।

 ‘प्रिय-प्रवास‘ में सर्वत्र वर्णिक छन्द प्रयुक्त हुए हैं, वे हैं - द्रुत विलम्बित, वंशस्थ, मालिनी, मन्दाक्रांता, शार्दूल विक्रीड़ित, वसन्ततिलका, शिखरिणी आदि। संस्कृत काव्य ग्रंथों की भाँति अतुकांत और अन्त्यानुप्रास रहित है। अलंकार सशक्त, स्वाभाविक एवं भावों की अभिव्यक्ति करने वाले हैं। शब्दालंकारों व अर्थालंकारों का उचित आधान, अनुप्रासिक लालित्य, कोमलकांत पदावलियाँ अत्यधिक प्रभावोत्पादक बन पड़ी हैं। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टांत, निदर्शन, संदेह, प्रतीप, उत्प्रेक्षा, अपह्नुति, व्यतिरेक आदि अलंकार यत्र-तत्र प्रयुक्त हैं। आलंकारिक विधान, कोमलकांत पदावली व आनुप्रासिक भाषा का निदर्शन द्रष्टव्य है -

‘रूपोद्यान-प्रफुल्ल प्राय  कलिका, राकेन्दु-बिंबानना।

तन्वंगी,  कलहासिनी, सुरसिका, क्रीड़ा-कला पुत्तली।।

शोभा-वारिधि की अमूल्य मणि-सी, लावण्य लीलामयी।

श्री राधा मृदुभाषिणी, मृगदृगी,  माधुर्य-सन्मूर्त्ति  थीं।।

‘प्रियप्रवास’ हिन्दी का गौरवग्रन्थ है। इसे आधुनिक हिन्दी का प्रथम महाकाव्य होने की भी गरिमा प्राप्त है। वस्तुतः प्रखर मनीषा के धनी कविशिरोमणि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने ‘प्रियप्रवास’ महाकाव्य की रचना कर न केवल अपनी सर्जना-सामर्थ्य का परिचय दिया, बल्कि हिन्दी साहित्य को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित भी किया। ‘प्रियप्रवास’ महाकाव्य का विषय है श्रीकृष्ण की मथुरा-यात्रा। इसमें यात्रा की विशिष्टताओं के साथ नटनागर श्रीकृष्ण की ब्रजलीलाओं एवं कमनीय प्रसंगों को बड़े ही लालित्यपूर्ण शैली में उद्घाटित एवं चित्रित किया गया है। मथुरा-यात्रा के प्रसंग में श्रीकृष्ण की अपूर्व आभा एवं लालित्य का बड़ा ही मनभावन चित्रण हुआ है इस महाकाव्य में। फलस्वरूप लालित्य, सरसता एवं संवेदना के मानो स्त्रोत ही फूट पडे़ हैं इसके छन्दों में। यह महाकाव्य पाठक-मन को अहर्निश बाँधे रखता है तथा पाठोपरान्त भी दीर्घकाल तक इसकी गूँज उसके मन-मानस में बनी रहती है। महाकवि ‘हरिऔध’ का यह महाकाव्य पठनीय ही नहीं रमनीय और मननीय भी है।

वस्तुतः 1914 ई. में रचित हिन्दी खड़ी बोली का प्रथम काव्य युगान्तरकारी घटना है। महत् विषय, उदात्त चरित्र, महान् उद्देश्य, खड़ी बोली, संस्कृत छंद, भिन्न तुकान्त में महाकाव्य की रचना विलक्षण है। कुछ आलोचकों का मत है कि ‘प्रियप्रवास’ में महाकाव्य जैसी व्यापक घटनाएँ और युद्ध-चित्रण नहीं हैं, अतः इसे पूर्ण महाकाव्य नहीं कहा जा सकता। किंतु आधुनिक महाकाव्य की दृष्टि से इसका मूल्यांकन करने पर स्पष्ट होता है कि भावात्मक व्यापकता, चरित्रों की उदात्तता तथा सांस्कृतिक चेतना इसे सफल महाकाव्य सिद्ध करती है। ‘विश्वम्भर मानव‘ के अनुसार- ‘‘प्रिय प्रवास भारतीय नव-जागरण काल का ही महाकाव्य नहीं, वह जीवन के श्रेष्ठतम मानव-मूल्यों का कीर्ति-स्तंभ भी है। वैज्ञानिक युग की विभीषिका में मानवतावाद का विजयघोष है। कृष्ण को केन्द्र बनाकर इसमें जो कथा वर्णित है, उससे मनुष्य की महत्ता, जीवन की सुन्दरता, प्रेम की शक्ति और सबसे अधिक मानवीय संबंधों की अनुपम कोमलता पर प्रकाश पड़ता है।‘‘

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि प्रियप्रवास हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण आधुनिक महाकाव्य है। इसमें महाकाव्य के आवश्यक तत्त्व—उदात्त कथानक, महान चरित्र, रसात्मकता, प्रकृति-वर्णन, सांस्कृतिक चेतना तथा लोकमंगल की भावना—पूर्ण रूप से विद्यमान हैं। खड़ी बोली हिंदी को महाकाव्यात्मक गरिमा प्रदान करने में इस कृति का ऐतिहासिक योगदान है। 'प्रिय प्रवास' हिंदी साहित्य की एक ऐसी उपलब्धि है जिसने महाकाव्य की परिभाषा को 'देवत्व' से हटाकर 'मनुष्यत्व' पर केंद्रित किया। 'हरिऔध' जी ने शास्त्रीय पद्धति का निर्वाह करते हुए भी युगीन समस्याओं और आदर्शों को स्थान दिया। यही कारण है कि यह खड़ी बोली का न केवल प्रथम, बल्कि एक कालजयी महाकाव्य है। इसमें भक्तिकालीन-रीतिकालीन प्रवृत्ति का चिह्न दिखाई नहीं देता, बल्कि युगानुकूल संदेश के साथ भारतीय नव जागरण की दिशा में श्रेष्ठतम मानव-मूल्यों का वर्जन करने वाला है। वैज्ञानिक युग की विभीषिका में मानवतावाद का जयघोष है। यह मनुष्य की महत्ता, जीवन की सुन्दरता, प्रेम की शक्ति, मानवीय संबंधों की तरलता एवं भारतीय सांस्कृतिक विरासत को गति प्रदान करने वाली रचना है।

सहायक ग्रंथ सूची

1.  प्रिय-प्रवास, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध‘, कविताकोश। 

2.  हिन्दी साहित्य का सर्वेक्षण, विश्वंभर मानव, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1979 प्रथम संस्करण। 

3.  हिन्दी के आधुनिक प्रतिनिधि कवि, डॉ. सुरेश अग्रवाल, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, 1998। 

4.  आधुनिक काव्य सोपान, डॉ. सत्येन्द्र पारीक, पुनीत प्रकाशन, जयपुर, 2014। 

5.  काव्यांग परिचय, डॉ. राजेन्द्र सिंघवी, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, 2017।

=========================================================

 

“ महादेवी वर्मा की दृष्टि में भारतीय नारी ”


“ महादेवी वर्मा की दृष्टि में भारतीय नारी ”

छायावादी प्रकृति, तरल, सरल सौन्दर्य पर प्रेम, विरह और वेदना का स्वर संधान कर, उस विरह वेदना को रहस्यमयी अध्यात्म चेतना की अंतरंग अनुभूतियों से सजा-संवार कर, अपने काव्यमय स्वरों में जिसने महनीय, काम्य एवं ग्राह्य बना दिया, उस महान् विभूति का नाम है - श्रीमती महादेवी वर्मा ।1 इनका साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है, क्योंकि वह काव्य, रेखाचित्र, निबंध और आलोचना साहित्य से निर्मित हुआ है । वस्तुतः इनके द्वारा सृजित साहित्य की दो धुरियाँ हैं । एक धुरी उनका काव्य है, जिसमें करूणा और वेदना की अजस्र धारा प्रवाहित हुई है । दूसरी धुरी गद्य साहित्य है, जिसमें उनकी सामाजिक यथार्थ दृष्टि एवं सामाजिक चिंतनधारा है । उनके सामाजिक चिंतन का उत्कर्ष ‘शृंखला की कड़ियाँ’ (1942) निबंध संग्रह में संगृहीत निबंधों में देखा जा सकता है, जिसमें भारतीय नारी विषयक चिंतन व्यवस्थित है । 

इन निबंधों में प्रमुख हैं - हमारी शृंखला की कड़ियाँ, युद्ध और नारी, नारीत्व का अभिशाप, आधुनिक नारी, हिन्दू स्त्री का पत्नीत्व, स्त्री के अर्थ स्वातंत्र्य का प्रश्न आदि । इनमें भारतीय नारी की परवशता का रेखांकन दृष्टिगोचर होता है, किन्तु उन्होंने जिन सवालों को उठाया है, वहां आक्रोश नहीं है, वरन् एक प्रकार की शालीनता है । इसलिए कि वे सृजन पर विश्वास करती हैं और उनका ध्वंस के द्वारा पुनर्सृजनपर विश्वास नहीं है । इससे स्पष्ट होता है कि वे भारतीय समाज की विकृतियों को सृजन के द्वारा मिटाना चाहती हैं, जिनसे  भारतीय नारी प्रारंभ से ही अनेक कठिनाइयों का सामना कर रही है ।२

महादेवी वर्मा का नारी चिंतन समाज केन्द्रित है, फलतः तटस्थ और निष्पक्ष है । वे नारी जीवन की विडम्बनाओं के लिए पुरूषों को ही दोषी नहीं ठहराती, बल्कि महिलाओं को भी समान रूप से उत्तरदायी ठहराती है । ‘अपनी बात’ में वह कहती है, “समस्या का समाधान समस्या के ज्ञान पर निर्भर करता है और यह ज्ञान ज्ञाता की अपेक्षा रखता है । अतः अधिकार के इच्छुक व्यक्ति को अधिकारी भी होना चाहिए । सामान्यतः भारतीय नारी में इसी विशेषता का अभाव मिलेगा ।”3 भारतीय नारी की अदृष्ट विडम्बना को उजागर करते हुए उन्होंने लिखा कि एक ओर तो वह देवी के प्रतिष्ठापूर्ण पद पर शोभित है तो दूसरी ओर परवश भी । उनका कथन है, “ वह पवित्र देव मन्दिर की अधिष्ठात्री देवी भी बन चुकी है और अपने गृह के मलिन कोने की बन्दिनी भी ।”4 

श्रीमती वर्मा ने समाज की पूर्णता हेतु पुरूष एवं नारी के स्वतंत्र व्यक्तित्व को आवश्यक माना । उनकी दृष्टि में नारी को पुरूष की छाया मात्र मानना नारी जाति के लिए अभिशाप है। प्राचीन भारती की विदुषी मैत्रेयी, सीता, यशोधरा आदि के साथ महाभारतकालीन स्त्रियों के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए लिखा, “महाभारत के समय की कितनी ही स्त्रियाँ अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व तथा कर्तव्यबुद्धि के लिए स्मरणीय रहेंगी । उनमें से प्रत्येक संसार पथ में पुरूष की संगिनी है, छाया मात्र नहीं ।”5 उन्होंने नारियों को पुरूषोचित अनुकरण वृत्ति को उचित नहीं माना, क्योंकि इससे सामाजिक शृंखला शिथिल तथा व्यक्तिगत बंधन और संकुचित होते हैं । इसीलिए वे भारतीय समाज में नारी की दयनीय स्थिति के लिए नारी के अर्थहीन अनुसरण और अनर्थमय अनुकरण को जिम्मेदार ठहराती है- “पुरूष के अन्धानुकरण ने स्त्री के व्यक्तित्व को अपना दर्पण बनाकर उसकी उपयोगिता को सीमित कर ही दी, साथ ही समाज को भी अपूर्ण बना दिया ।”6 दोनों की तुलना करते हुए वह कहती हैं- “पुरूष समाज का न्याय है, स्त्री दया, पुरूष प्रतिशोधमय क्रोध है, स्त्री क्षमा, पुरूष शुष्क कर्त्तव्य है, स्त्री सरस सहानुभूति और पुरूष बल है, स्त्री हृदय की प्रेरणा ।”7 इस प्रकार उनकी दृष्टि में स्त्री-पुरूष के प्राकृतिक मानसिक वैपरीत्य द्वारा ही समाज  सामंजस्यपूर्ण व अखण्ड हो सकता है । 

श्रीमती वर्मा ने सामाजिक बंधनों को उनके वैयक्तिक विकास में बाधक माना । चूंकि वह भी समाज का आधा हिस्सा है, अतः उसकी उपेक्षा के प्रति सचेत करते हुए लिखा, “ जो देश के भावी नागरिकों की विधाता हैं, उनकी प्रथम और परम गुरू हैं, जो जन्म भर अपने आपको मिटाकर, दूसरों को बनाती रहती हैं, वे केवल तभी तक आदरहीन मातृत्व तथा अधिकार शून्य पत्नीत्व स्वीकार करती रह सकंगी, जब तक उन्हें अपनी शक्तियों का बोध नहीं होता । बोध होने पर वे बन्दिनी बनाने वाली शंृखलाओं को स्वयं तोड़ फेकेंगी ।”8 ‘युद्ध ओर नारी’ विषयक लेख में उन्होंने नारी को अहिंसा प्रिय बताया तथा युद्ध को नारी के विकास में भी बाधक बताया”, स्त्री केवल शारीरिक और मानसिक दृष्टि से ही युद्ध के अनुपयुक्त नहीं रही, वरन् युद्ध उसके विकास में भी बाधक रहा है ।’9 

नारी के महान् से महान् त्याग को भी संसार ने उच्च दृष्टि से स्वीकार न कर उसे उसकी दुर्बलता माना । ‘नारीत्व के अभिशाप’ विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा, “क्या नारी के बड़े से बड़े त्याग को, आत्मनिवेदन को, संसार ने अपना अधिकार नहीं, किंतु उसका अद्भुत दान समझकर नम्रता से स्वीकार किया है? कम से कम इतिहास तो नहीं बताता कि उसके किसी बलिदान को पुरूष ने उसकी दुर्बलता के अतिरिक्त कुछ और समझने का प्रयत्न किया ।”10 उन्हें इस बात का भी क्षोभ है कि नारी ने अपनी शक्ति को समझने का कभी प्रयास ही नहीं किया । वह स्वयं अपनी वेदना के कारणों को नहीं जानती और न अपने असह्य कष्ट के प्रतिकार की भावना से परिचित है । वे नारी की कोमलताजनित दुर्बलता को भी अभिशाप मानती हैं, जिसके कारण वह उसे जीवन की स्वाभाविकता मान लेती है- “वह अपनी प्रकृति-जनित कोमलता को त्रुटि चाहे मानती हो, परन्तु उसे स्वाभाविक अवश्य समझती है, अन्यथा उसके इतने प्रयास का कोई अर्थ न होता ।”11 
आधुनिक नारियों की स्वच्छन्द प्रवृत्ति व निरूद्देश्य गंतव्य को अनुचित ठहराते हुए उन्होंने प्राचीन नारियों के योगदान को तुलनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया । आधुनिक नारी ओर प्राचीन नारी के बारे में वे कहती हैं, “आज की सुन्दर नारी भी पुरूष के निकट और कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती । उसे स्वयं भी इस कटु सत्य को बोध होता है, परंतु वह उसे परिस्थिति का दोषमात्र समझती है ।.........  पहले की नारी जाति केवल रूप और वय का पाथेय लेकर संसार यात्रा के लिए नहीं निकली थी । उसने संसार को वह दिया जो पुरूष नहीं दे सकता था, अतः उसके अक्षय वरदान का वह आज तक कृतज्ञ है ।”12 

महादेवी जी ने नारी के घर और बाहर के कर्त्तव्यों एवं अधिकारों की कठिनाइयों पर भी चिंतन किया है । उनका मानना है कि युगों से नारी का कार्यक्षेत्र घर तक सीमित रहा है, किंतु आधुनिक काल में उसके कर्त्तव्यों का विस्तार हुआ है । वे कहती हैं, “वास्तव में स्त्री भी अब केवल रमणी या भार्या नहीं रही, वरन् घर के बाहर भी समाज का एक विशेष अंग तथा महत्त्वपूर्ण नागरिक है, अतः उसका कर्त्तव्य भी अनेकाकार हो गया है, जिसके पालन में कभी-कभी ऐसे संघर्ष के अवसर आ पड़ते हैं, जिसमें किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाना पड़ता है ।”13 महादेवी जी ने पुरूषों की इस धारणा को नकार दिया है कि आधुनिक शिक्षा प्राप्त स्त्रियाँ अच्छी गृहणियों का बाहर आकर इस क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता देनी होगी । वे लिखती हैं, “जब तक हम अपने यहाँ गृहणियों को बाहर आकर इस क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता न देंगे, तब तक हमारी शिक्षा में व्याप्त विष बढ़ता ही जाएगा ।”14 

महीयसी महादेवी जी ने हिन्दू स्त्री के पत्नीत्व की भी चर्चा की है और बताया है कि हमारे समाज में उसके जीवन का प्रथम लक्ष्य पत्नीत्व तथा अंतिम मातृत्व समझा जाता रहा है ।  यहाँ वे समाज से प्रश्न करती हैं- “समाज की स्थिति के लिए मातृत्व पूज्य हैं, व्यक्ति की पूर्णता के लिए सहधर्मिणीत्व भी श्लाघ्य है, परंतु क्या यह माना जा सकता है कि सौ में से सौ स्त्रियों की शारीरिक तथा मानसिक स्थिति केवल इन्हीं दो उत्तरदायित्वों के उपयुक्त होगी? ”15 शिक्षा की दृष्टि से नारियों की सामाजिक यथार्थ की स्थिति का सटीक चित्रण करते हुए कहा, “प्रथम तो माता-पिता कन्या की शिक्षा के लिए कुछ व्यय ही नहीं करना चाहते, दूसरे यदि करते भी हैं तो विवाह की हाट में उनका मूल्य बढ़ाने के लिए, कुछ उनके विकास के लिए  नहीं ।”16 किन्तु उनका मानना है कि स्त्री के विकास की चरम सीमा उसके मातृत्व में हो सकती है, बशर्ते कि उसकी इच्छा-अनिच्छा, योग्यता-अयोग्यता का पूरा ध्यान रखा गया हो । 

महादेवी जी ने वार-वनिताओं की विडम्बनाओं पर भी गहरा चिंतन किया है । उनका मानना है कि गर्वित समाज, जिन्हें पतित नारी की संज्ञा देता है, वस्तुतः ऐसी नारियों ने पुरूष वासना की वेदी पर घोरतम बलिदान किया है । वे कहती हैं, “उनके नारीत्व को दूसरों के मनोरंजन मात्र का ध्येय मिला है तथा उनके जीवन का तितली जैसे कच्चे रंगों से शृंगार हुआ है, जिसमें मोहकता है, परंतु स्थायित्व नहीं ।”17 दूसरी ओर साधारणतः महान् दुराचारी पुरूष भी परम सती स्त्री के चरित्र का आलोचक ही नहीं, न्यायकर्ता भी बना रहता है । ऐसी स्थिति में पतित स्त्रियों के जीवन में परिवर्तन लाने का स्वप्न सत्य नहीं हो सकता ।

महादेवी वर्मा ने आदिम युग से लेकर सभ्यता के विकास तक भारतीय समाज में स्त्री की दयनीय दशा का वर्णन किया है । उनकी दृष्टि में इसका कारण स्त्री और पुरूष के अधिकारों की विचित्र विषमता है । वे कहती है, “पुरूष ने उसके अधिकार अपने सुख की तुला पर तोले, उसकी विशेषता पर नहीं, अतः समाज की  सब व्यवस्थाओं में उसके और पुरूष के अधिकारों में एक विचित्र विषमता मिलती है ।... एक ओर सामाजिक व्यवस्थाओं ने स्त्री को अधिकार देने में पुरूष की सुविधा का विशेष ध्यान रखा है, दूसरी ओर उसकी आर्थिक स्थिति भी परावलम्बन से रहित नहीं रही । भारतीय स्त्री के संबंध में पुरूष का भर्ता नाम जितना यथार्थ है, उतना संभवतः और कोई नाम नहीं ।”18 इसीलिए वे अपनी बात स्पष्ट रूप से कहती हैं कि आर्थिक रूप से जो स्थिति स्त्री की प्राचीन समाज में थी, उसमें अब तक परिवर्तन नहीं हो सका है । 

वास्तव में स्त्री केवल पत्नी के रूप में समाज का अंग नहीं है । महादेवी जी की दृष्टि में उसके भिन्न-भिन्न रूपों में व्यापक तथा सामान्य गुणों द्वारा ही समझना समाज के लिए आवश्यक तथा उचित हे । वे लिखती हैं, “आज की हमारी सामाजिक परिस्थिति कुछ और ही है । स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर प्राण-प्रतिष्ठा चाहती है ।... आज उसके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरूष को चुनौती देकर अपनी शक्ति की परीक्षा देने का प्रण किया है और उसी में उतीर्ण होने को जीवन की चरम सफलता समझती है ।”19 वर्तमान समाज में नारी के साथ होने वाले व्यवहार पर उन्होंने बेबाक टिप्पणी की है- “ जैसे-जेसे हमारा समाज अपने आधे सदस्यों से अधिकारहीन बलिदान ओर आत्म-समर्पण लेता जा रहा है, वैसे-वैसे वह भी अपने अधिकार खोता जा रहा है, यह समाज के असंतोषपूर्ण वातावरण से प्रकट है ।”20 
वस्तुतः साठोत्तरी चिंतन में नारी चिंतन की दिशा बदल सी गई है । जहाँ भारतीय समाज की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए एक आधुनिक एवं पुरूष से परे तथा उसके समानांतर स्त्री की छवि गढ़ी जा रही है, इसके विपरीत महादेवी वर्मा का लेखन भारतीय संस्कृति की परिधि में स्त्रियों की महत्ता की प्रतिस्थापना है, साथ ही स्त्री की सामाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता पर चिंतन भी है । ‘शृंखला की कड़ियाँ’ पुस्तक में स्त्री समाज की समस्याओं पर विचार के बहाने उन संदर्भों और संकेतों का सामाजिक रूप भी प्रस्तुत किया गया है, जिनसे स्त्री-समाज के अंदर हो रहे परिवर्तन और विकास की प्रक्रियाओं को समझा जा सकता है । देवेन्द्र चौबे के मतानुसार, ‘शृंखला की कड़ियाँ’ मात्र एक पुस्तक नहीं है, बल्कि इसमें स्त्री के सामाजिक इतिहास लेखन के से स्रोत मौजूद हैं, जो स्त्री विषयक इतिहास लेखन की दशा और दिशा को तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं ।”21 

महादेवी वर्मा ने 1935 में ‘चाँद’ पत्रिका के विदुषी अंक का संपादन किया था । पत्रिका के संपादकीय में आधुनिक महिला जगत् की स्थिति पर उनकी टिप्पणी थी, “अवश्य ही आज की नारी प्राचीन नारी जगत् की वंशज नहीं जान पड़ती, इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि वह स्वयं अपनी शक्ति और दुर्बलता दोनों से अनभिज्ञ है ।”22 विश्वंभर मानव के अनुसार, “भारतीय नारी का मुख्य दोष महादेवी जी ने यह बतलाया है कि उसमें व्यक्तित्व का अभाव है। उसे न अपने स्थान का ज्ञान है, न कर्त्तव्य का । जो लोग उसकी सहायता करना चाहते हैं, वह उन्हीं का विरोध करती है ।”23 डॉ. रामचन्द्र तिवारी ने लिखा है, “महादेवी ने नारी को केन्द्र में रखकर ही समस्याओं पर दृष्टिपात किया है । इन निबंधों में उनका भारतीय नारी के प्रति सहानुभूति से भरा हुआ मन उन सामाजिक तत्वों के प्रति क्षुब्ध है जो नारी के लिए ‘शृंखला की कड़ियाँ’ बन गए हैं । महादेवी शृंखला की कड़ियों को काट फेंकने के लिए नारी को उद्बुद्ध करना चाहती हैं, किंतु वे यह भी चाहती हैं कि विद्रोहिणी नारी अपने नारीत्व के मूलभूत आधारों को भी सुरक्षित रखे ।”24 

वस्तुतः महादेवी जी का नारी चिंतन कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है । क्योंकि यह उस समय का है जब भारतीय नारी का 90 प्रतिशत हिस्सा निरक्षर था तथा सामाजिक चेतना नही ंके बराबर थी । आज तो नारी साहित्य लेखन के भी केन्द्र में आ गई है । ‘नारी-विमर्श’ के नाम पर अंतहीन बहसें भी हो रही है, जहां कभी देहवाद की चर्चा होती है तो कहीं उसे स्वैराचार की अनुमति दी जाती है । कहीं उसकी पुरूषों से तुलना कर उसकी मौलिकता को खतरे में डाला जा रहा है, फिर भी ऐसा नहीं लगता है कि भारतीय समाज में नारी की स्थिति में कोई विशेष सुधार आया है । भले ही आज सरकारी आरक्षण से नारी की सामाजिक गति बढ़ी है, किंतु अपने परिवार के भीतर उसकी स्थिति पूर्ववत् ही है । ‘स्त्री-विमर्श’ के इस दौर में नारी जाति के गौरव को पुनः दिलाना तो दूर, बल्कि उसके स्वाभाविक गुणों को भी नेस्तनाबूद किया है । यह सब पाश्चात्य-मानसिकता का फल है । 

परंतु महादेवी जी का नारी-चिंतन भारतीय परिवेश को ध्यान में रखकर है, अतः कई अर्थ भी रखता है । यह किसी प्रकार की प्रभुता की आकांक्षा नहीं करता, बल्कि इसका स्वर नपा-तुला और सामंजस्यपूर्ण है ओर उन बुनियादी सवालों को उठाता है, जिसका परिवार से लेकर राष्ट्र निर्माण में महत्त्व असंदिग्ध है ।उनका चिंतन परम्परा के बंधनों से जकड़ी नारी के लिए देह की मुक्ति की बजाय सत्ता को चुनौती देता है । इसीलिए यह चिंतन आधी नागरिक जाति को अपने अधिकारों और कर्त्तव्यों की याद दिलाता है और उन्हें पाने और दिलाने के लिए संघर्ष की प्रेरणा देता है, जिसका अंतिम ध्येय सभ्य और सुसंस्कृत समाज का पुनर्निर्माण करना है । इस तरह उनका नारी विषयक चिंतन स्त्री विषयक इतिहास लेखन की दशा और दिशा को तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.यदि आज के ‘नारी-विमर्श’ के केन्द्र में महादेवी का चिंतन भी सम्मिलित कर लिया जाए तो उस विमर्श के सार्थक परिणाम आ सकते हैं । 

संदर्भ ग्रंथ-
1. हिन्दी के आधुनिक प्रतिनिधि कवि-डॉ. सुरेश अग्रवाल, अशोक प्रकाशन, दिल्ली सं.1998, पृष्ठ 251
2. आजकल, मार्च 2007, पृष्ठ 68
3. शृंखला की कड़ियाँ- महादेवी वर्मा लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं.2004 पृ.10
4. पूर्ववत्, पृष्ठ 11
5. पूर्ववत्, पृष्ठ 13
6. पूर्ववत्, पृष्ठ 15
7. पूर्ववत्, पृष्ठ 15
8. पूर्ववत्, पृष्ठ 24
9. पूर्ववत्, पृष्ठ 32-33
10. पूर्ववत्, पृष्ठ 36
11. पूर्ववत्, पृष्ठ 44
12. पूर्ववत्, पृष्ठ 46
13. पूर्ववत्, पृष्ठ 56
14. पूर्ववत्, पृष्ठ 66
15. पूर्ववत्, पृष्ठ 77
16. पूर्ववत्, पृष्ठ 85
17. पूर्ववत्, पृष्ठ 88
18. पूर्ववत्, पृष्ठ 99-100
19. पूर्ववत्, पृष्ठ 121
20. पूर्ववत्, पृष्ठ 140
21. आजकल, मार्च 2007, सं. प्रवीण उपाध्याय, पृ.56
22. पूर्ववत्, पृष्ठ 22
23. हिन्दी साहित्य का सर्वेक्षण, सं. विश्वंभर मानव, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद,पृ..सं.1977, पृ.155
24. हिन्दी का गद्य साहित्य, सं. रामचन्द्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, पुनमुर्द्रण,1999, पृ.630

Search This Blog