भक्ति साहित्य का पाठालोचन और डॉ. ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल

भक्ति साहित्य का पाठालोचन और डॉ. ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल


पाठालोचन वह शास्त्र है जिसके माध्यम से किसी प्राचीन या मध्यकालीन ग्रंथ के मूल रूप को खोजकर पुनर्निर्मित करने का प्रयास किया जाता है। प्रतियों की प्राचीनता, उनकी लिपि, लेखक का समय और जिस स्थान पर प्रति मिली है, उसके महत्त्व को रेखांकित करते हुए आलोचक का दायित्व लेखक की भाषा-शैली, व्याकरण, छंद-योजना और उस समय की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के साथ पाठ की संगति का अध्ययन करना भी आवश्यक होता है। शुद्ध पाठ तक पहुँचने के लिए उपलब्ध प्रतियों का वर्गीकरण करना और यह देखना कि कौन सी प्रति किस 'वंश' की है। उसके बाद पाठ-परीक्षण करते हुए विभिन्न प्रतियों के अंतर को समझना और यह तय करना कि कहाँ लेखक की भूल है और कहाँ प्रतिलिपिकार की। फिर तर्क सहित पाठ शोधन करते हुए विषय-वस्तु के ज्ञान के आधार पर मूल पाठ का अनुमान लगाना महत्त्वपूर्ण कार्य है। वस्तुतः यह वैज्ञानिक विश्लेषण और साहित्यिक सूझ-बूझ का संगम है। इस दृष्टि से हिन्दी आलोचना में एक सुदीर्घ परंपरा रही है, जिसमें बाबू श्यामसुंदर दास, डॉ. माताप्रसाद गुप्त, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, परशुराम चतुर्वेदी, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, धीरेन्द्र वर्मा, मुनि जिनविजय आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इसी परंपरा में डॉ. ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल वर्तमान हिन्दी पाठालोचन की विधा को प्रामाणिक रूप में आगे बढाते हुए निरंतर नवीन स्थापनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। 

ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल का जन्म 23 नवम्बर, 1956 को गंगापुरसिटी, जिला सवाईमाधोपुर, राजस्थान में हुआ। वे निर्गुणी सन्त-साहित्य, विशेषकर रामस्नेही सम्प्रदाय और दादूपंथ  सहित अनेक सन्त-भक्त सम्प्रदायों के साहित्य और इतिहास तथा प्राग्‌आधुनिक हिन्दी साहित्य के अधिकारी विद्वान हैं। उन्होंने संस्कृत साहित्य,  सन्त-वाणियों और वेदान्त-ग्रंथों का विशेष अध्ययन किया है। उनकी शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें प्रमुख हैं- श्रीरामचरण चरितामृत, श्रीसुरतराम चरितामृत श्रीसुरतरामवाणी पूर्वार्द्ध (सटीक), श्रीरामप्रतापवाणी (पूर्वार्द्ध), रामस्नेही मत-सिद्धान्त-दर्पण (पूर्वार्द्ध), श्रीरामनिवास-वाणी, आचार्य हरिदास-वाणी, आचार्य हिम्मतराम ग्रन्थावली (सटीक), श्रीरामसेवकवाणी, श्रीपोहकरदास वाणी, श्रीमुरलीरामवाणी, श्रीजगन्नाथ-ग्रंथावली (सभूमिका), श्रीहरिराम-वाणी, मीरां -चरितामृत, वषनांवाणी (सटीक), टीला पदावली (सटीक), नाम-प्रतीत-भगतमाला (सटीक), नरसीजी रो माहेरो, ग्रंथ संतोष सुरतरु (सटीक), कन्हड्दास वाणी, सूफी दरवेश बाबा शेख फरीद जीवन और वाणी (सटीक), कान्हा-ग्रंथावली (सटीक), रज्जब की सरबंगी (सभूमिका), ब्रह्मदास (भगतराम शिष्य), वाणी (सटीक), मारवाड़ी दरियावसाहब जीवनी और वाणी, ब्रह्मदास (रामजन-शिष्य) वाणी राजस्थान में नरसी मेहता पर रचित साहित्य (नरसीजी रो माहेरी) आदि। इनके अतिरिक्त दो सौ से अधिक शोध-लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. सिंहल के इस योगदान का रेखांकन कतिपय उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया जा रहा है- 

मीरांबाई का साहित्य लंबे समय तक मौखिक परंपरा में रहा, जिस कारण उनमें बहुत अधिक क्षेपकों की संभावना थी। सिंहलजी द्वारा मीरांबाई के पदों के पाठालोचन में प्राचीनतम प्रतियों की खोज की  गई जो राजस्थान, गुजरात, ब्रज में बिखरी  हुईं  थी । उन्होंने केवल उन प्रतियों को आधार बनाया जो ऐतिहासिक रूप से प्राचीन थीं। उन्होंने हस्तलिखित ग्रंथों की खोज कर उन पाठों को वरीयता दी जो मीरां  के कालखंड के सबसे निकट थे। मीरांबाई की मूल भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रज थी। सिंहलजी ने पाठालोचन करते समय उन पदों को संदिग्ध माना जिनमें आधुनिक शब्दावली या ऐसी भाषा का प्रयोग था जो मीरां  के समय (16वीं शताब्दी) में प्रचलित नहीं थी। उन्होंने राजस्थानी के प्राचीन व्याकरणिक रूपों को ही प्रामाणिक माना।

‘मीरा’ अथवा ‘मीरां’ नामकरण की भ्रांतियों का निवारण करते हुए वे लिखते हैं, “नाभाजी का भक्तमाल, उसकी प्रियादास व बालकराम की टीकाएँ, राघवदासजी का भक्तमाल, उसकी चतुरदास की टीका, ये सभी ब्रज-भाषा में हैं। इन सभी में मीरां शब्द 'मीरां ' ही लिखा मिला है। नैणसी री ख्यात में भी 'मीरां' शब्द ही लिखा मिला है। राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार कविराजा श्यामलदास, मुंशी देवीप्रसाद, गौ.ही. ओझा, जगदीशसिंह गेहलोत, डॉ. गोपीनाथ शर्मा, रायबहादुर हरविलास सारदा, पं. विश्वेश्वरनाथ रेउ आदि अनेक विद्वानों ने मीरां को 'मीरां ' ही लिखा है। अतः राजस्थानी मीरां का वास्तविक नाम ‘मीरा’  न होकर 'मीरां ' ही है। इसे 'मीरां' ही लिखा, पढ़ा और बोला जाना चाहिये।“ यह कथन पाठ-परीक्षण करते हुए लेखकीय भूलों को भी उजागर करता है जो कि पाठालोचन की अनिवार्य शर्त है। 

इसी तरह मीरां के गुरु रैदास थे अथवा नहीं, इस संबंध में अलग-अलग मत हैं। डॉ. सिंहल ने  अनेक ग्रंथों का संदर्भ देते हुए अपना मत दिया है कि रैदास मीरां के गुरु नहीं थे-“सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात, मीरां को मेवाड़ में अनेक कष्ट दिये गये। प्रारंभ में वह उन कष्टों से विचलित नहीं हुई किन्तु जब राणा कष्ट दर कष्ट देता ही चला गया तब उसका धैर्य टूट गया और उसने मेवाड़ को छोड़ने का निर्णय कर लिया। यदि रैदास या रैदासपंथी कोई संत-महंत मीरां के गुरु होते तो वह ब्रजक्षेत्र और ब्रजक्षेत्र से द्वारका न जाकर सीधे काशी जाती जहाँ रैदासियों का मठ, गद्दी तथा महंताई की परंपरा है किन्तु मीरां तो पूरे जीवनभर कभी काशी गई ही नहीं। इस तर्क से भी यही सिद्ध होता है कि मीरां का रैदास या रैदासपंथी किसी भी संत से कोई सम्बन्ध नहीं था।”[2] डॉ. सिंहल ने आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के मत की विवेचना भी की है जिसमें भक्तमाल के पद के आधार पर रैदासपंथी विट्ठलदास से मीरां को दीक्षित  होना बताया गया है-

"बिठलदास हरि भक्ति के दुहू हाथ लाडू लिया॥ 

आदि अंत निर्वाह भक्त पद रज सिर धारी। 

रह्यौ जगत से ऐंड तुच्छ जानें संसारी॥ 

प्रभुता पति की पधति प्रगट कुल दीप प्रकासी॥ 

महंत सभा में मान जगत जानें रैदासी।

पद पढत भई परलोक गति गुरु गोविन्द जुग फल दिया।

बिठलदास हरि भक्ति के दुह हाथ लाडू लिया॥[3]

डॉ. सिंहल के अनुसार इस छप्पय से बिठ्ठलदास की निम्न विशेषताएँ ज्ञात होती हैं जिनसे सिद्ध होता है कि विठ्ठलदास ‘रैदासी’ मीरां के गुरु नहीं थे ---  (क) वे साधु संतों की चरण-धूलि को अपने मस्तक पर रखते थे अर्थात् वे संत मात्र को पूज्य और वंदनीय मानकर उनकी तन-मन से अभ्यर्थना करते थे। (ख) वे भगवद्विग्रह के समक्ष पद गाते हुए नृत्य करते थे। (ग) वे रैदासी-रैदास की जाति में उत्पन्न हुए थे जिसके कारण वे रैदासी कहलाते थे। (घ) वे संसार से सर्वथा और सर्वदा उदासीन ही रहे क्योंकि उन्होंने संसार को असत्य जान लिया था। (ङ) वे साधुओं की बड़ी-बड़ी सभाओं में भी सम्मान पाते थे। (च) प्रभुता (लक्ष्मी) के पति विष्णु अर्थात् लक्ष्मीनारायण की पद्धति वाले संप्रदाय रूपी कुल को प्रकाशित करने वाले कुलदीपक थे। (छ) भगवद्विग्रह के समक्ष पद गाते समय भगवद्भावापन्न होकर वहीं निज इष्ट में लीन हो गये। इस तरह अपने मत का तर्क के साथ प्रस्तुतीकरण इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करता है और इसे स्वीकार्य बनाता है।

नाथ-सम्प्रदाय भारत का एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक पंथ है जिसका उदय मध्ययुग में हुआ। हठयोग की साधना-पद्धति पर आधारित इस पंथ में बौद्ध, शैव तथा योग परम्पराओं का अद्भुत समन्वय है। गुरु गोरखनाथ के पूर्व यद्यपि अनेक गुरु हुए किन्तु इस पंथ के मुख्य आराध्य के रूप में गोरखनाथ की ही प्रतिष्ठा है। उन्हें यह श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने सम्प्रदाय की योग-विद्याओं का एकत्रीकरण किया। ब्रजेंद्र कुमार सिंहल ने गोरखनाथ और नाथ साहित्य के पाठालोचन पर अत्यंत गंभीर और मौलिक विचार व्यक्त किए हैं। उनका मानना है कि गोरखनाथ का साहित्य हिंदी भाषा के क्रमिक विकास को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।

डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने 'गोरखबानी' का संपादन किया था, लेकिन सिंहलजी ने इसमें पाठालोचन की और अधिक सूक्ष्म पद्धतियों के प्रयोग पर बल दिया। उनका मानना है  कि गोरखनाथ के नाम से प्रचलित बहुत सी रचनाएँ परवर्ती काल की हैं। उन्होंने आंतरिक साक्ष्य के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि गोरखनाथ के वास्तविक पाठों में 'योग' की पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग अत्यंत सटीक और संयमित है। सिंहलजी मानते हैं कि गोरखनाथ का साहित्य केवल धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि वह 'अनुभव की कविता' है। उन्होंने कहा कि गोरखनाथ ने हठयोग के कठिन सिद्धांतों को जनभाषा में जिस तरह ढाला, वह उनके उच्च कोटि के कवि और संपादक होने का प्रमाण है। गोरखनाथ का साहित्य सदियों तक जोगियों द्वारा गाकर सुरक्षित रखा गया। 

‘जाग मछंदर गोरख आया’- पंक्ति लोक में प्रसिद्ध है। गोरखनाथ और उनके गुरु मछिंद्रनाथ से जुड़ी एक पौराणिक और आध्यात्मिक पंक्तियाँ हैं। यह गोरखनाथ द्वारा अपने गुरु को सांसारिक मोह से जगाने के लिए कही गई उक्ति है। इसकी प्रामाणिकता को सिद्ध करते हुए डॉ. सिंहल स्पष्ट रूप से लिखते हैं, “अन्तः साक्ष्यों से स्पष्ट है कि गुरु मछिन्द्रनाथ कामिनियों के व्यामोह में फँसकर एक बार वृद्धावस्था में पथ-भ्रष्ट हुए थे जिनको गोरखनाथ ज्ञानोपदेश देकर उनको, उनके अतीत को बताकर, पुनः 'शैव-सिद्धामृत-योगमार्ग' में लौटा लाए। अतः गोरख द्वारा मछिन्द्रनाथ को चेतन करने की घटना शत-प्रतिशत सही व प्रामाणिक है।“[4] इस कथन में पूर्व के शोध को मान्यता प्रदान करने का भाव है, जो आलोचना धर्म का निर्वाह है तथा पाठालोचन की गंभीरता को व्यक्त करता है। 

चार युगों में चार स्थानों पर गोरखनाथ के अवतरित होने की बात को स्पष्ट करते हुए  डॉ. सिंहल इसकी मौलिक अवधारणा प्रस्तुत करते हैं, “बहुत सम्भव है, यह चार युगों की बात न होकर, गोरखनाथ के जीवन के चार पड़ावों की गाथा है। वे जन्मे टिल्ला, पेशावर पंजाब में, प्रकट हुए गोरखपुर में अर्थात् यहाँ आकर उनका योगमार्गी साधक का रूप परिपक्व रूप में सामने आया। तत्पश्चात् वे हुरमुज में जाकर अपने सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार में और भी ज्यादा तीव्रता से अग्रसर हुए और अन्त में काठियावाड़ सौराष्ट्र की धरती में रहे। यह क्षेत्र संयुक्त पंजाब सिंध से ज्यादा दूर नहीं। आज भी कच्छ काठियावाड़ में सिंधियों की अच्छी बसावट है। सम्भव है, गोरखनाथ इसीलिए अन्तिम समय में काठियावाड़ के क्षेत्र में रहे हों।“[5] यह प्रकटीकरण भविष्य के शोध को आधारभूमि प्रदान करता है।

डॉ. सिंहल गोरखनाथ का काल निर्णय करते समय अपना मत प्रामाणिक रूप से लिखते हुए नई स्थापना प्रदान करते हैं। वे स्पष्ट रूप से लिखते हैं, “आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ऐसी हो दो-तीन मोटी-मोटी गल्तियाँ लिख गए हैं जिनको परवर्तियों ने बिना ऐतिहासिक ग्रंथों को पढे  व जाने यथारूप अपनी उस्तकों में उद्धृत किया है जबकि ऐतिहासिक पुस्तकों में उनके सम्बन्ध में पुष्कल चर्चाएँ बीसवीं शताब्दी के प्रथम द्वितीय चरण से ही हिन्दी- अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं।  एक उदाहरण राजेन्द्र चोल के समय के सम्बन्ध में है। दूसरा उदाहरण प्रबन्ध-चिन्तामणि के आधार पर कंथड़ी व मूलराज सोलंकी सम्बन्धी विवरण है। आश्चर्य है कि प्रबन्ध-चिन्तामणि के अनुवादक स्वयं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं।“[6]

चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास' ग्रंथ को पूर्व में भी अन्यान्य बिंदुओं की चर्चा करते समय उद्धृत कर चुके हैं। यह ग्रंथ अभी तक नाथ-पंथ के अध्येताओं के नोटिस में नहीं आया। यह ग्रंथ अनेक वर्षों तक चूरू-मंडल के गाँव-गाँव, ढाणी-ढाणी, जगह-जगह का कई-कई बार सर्वेक्षण करके विलक्षण प्रतिभा के धनी श्रीगोविन्द अग्रवाल के द्वारा लिखा जाकर 'लोक-संस्कृति-शोध संस्थान, नगरश्री चूरू द्वारा सन् 1974 में प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक के पृष्ठ-389 पर एक शिलालेख, जो लेखक व उनके अग्रज श्रीसुबोधकुमार अग्रवाल स्वयं ने नाथपंथी नोहर-मठ में जाकर देखा व जिसकी फोटो भी 28.08.1971 को उतारकर लाए और पुस्तक के उक्त पृष्ठ पर यथारूप छापा, नाथ-सम्प्रदाय के अध्येताओं के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और इससे गोरखनाथ का समय निश्चित् करने में महनीय प्रामाणिक सहायता मिलती है। यह शिलालेख नाथपंथ के मठ जो नोहर नामक गाँव,  गंगानगर जिले, हनुमानगढ़ तहसील में पड़ता है, में है।

डॉ. सिंहल का मत है, “मुझे ऐसा लगता है कि अमरनाथ, गोरखनाथ के साक्षात् शिष्य न होकर परम्परया शिष्य रहे होंगे. कम से कम 1-2 पीढी बाद के, तब ही तो शिलालेख पूरी परम्परा याद न होने के कारण नहीं लिखी गई और केवल नाथैक्य होने वाल नाथ व गुमट चढ़ाने वाले नाथ का तिथि मिति युक्त उल्लेख किया गया है। अतः हमारे पास इस शिलालेख के आधार पर यह निश्चित् प्रमाण है कि गोरखनाथ वि.सं. 1102 के बाद के ही नहीं, लगभग संवत 1075 के बाद के भी किसी कीमत पर नहीं हो सकते। यह समय सीमा रेखा गोरखनाथ के समय को निर्धारित करने के लिये अन्तिम सीमा है। इसके आगे जाने का कोई आधार नहीं है। इस बिन्दु को सबसे प्रथम लिखने का उद्देश्य भी यही है कि गोरखनाथ का समय हमको यदि वि.सं. 1075 के बाद का किसी आधार पर ज्ञात हो तो वह किसी भी स्थिति में मान्य नहीं हो सकता।“[7] यह स्पष्ट स्वीकारोक्ति पाठालोचन को स्वीकार्य बनाती है। 

ब्रजेंद्र कुमार सिंहल ने दादूदयाल और उनके द्वारा स्थापित 'दादू पंथ' के साहित्य पर जो कार्य किया है, वह हिंदी पाठालोचन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। सिंहल जी दादू दयाल को राजस्थान का सबसे बड़ा "समन्वयकारी संत" मानते हैं । सिंहल जी ने यह रेखांकित किया कि दादू ने अपने पंथ का नाम पहले 'परब्रह्म संप्रदाय' रखा था, जो उनकी निर्गुण उपासना का प्रतीक था। उनका मत है  कि दादू कबीर की तुलना में अधिक "मृदु" और "उदार" थे। जहाँ कबीर की भाषा में 'फटकार' है, वहीं दादू की वाणी में 'पुकार' और 'अनुरोध' है। उपलब्ध ग्रंथों का वर्गीकरण करते हुए अन्य लेखकीय प्रतियों का स्पष्ट उल्लेख करते हुए निरपेक्ष भाव से प्रकट किया। जगन्नाथ कृत ‘मोह-मर्द-राजा की कथा’ कृति पर अपना मत प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं- “मेरे पास उपलब्ध कई हस्तलेखों सहित दादूपंथ के अनेक हस्तलेखों में यह ग्रंथ लिखा मिलता है। जब ग्रंथांत को पढते हैं, तब ज्ञात होता है कि यह ग्रंथ बनाया तो संत जगन्नाथजी ने ही है, किन्तु ये जगन्नाथजी, दादू-शिष्य जगन्नाथजी न होकर, 'तुरसीदासजी' के शिष्य 'जन जगन्नाथजी' हैं।“[8] ये तुलसीदासजी व जन जगन्नाथजी रामानंदी संप्रदाय के संत थे। यह तटस्थ दृष्टि उनके पाठ आलोचना को समृद्ध बनाती है। 

ब्रजेंद्र कुमार सिंघल का रज्जब के पदों पर आधारित 'सरबंगी'  पाठालोचन की दृष्टि से एक अमूल्य कोश है। उनका विचार है  कि रज्जब ने केवल अपनी रचनाएँ ही नहीं लिखीं, बल्कि अपने समय के अन्य संतों की वाणियों का भी जिस कुशलता से संपादन और संग्रह किया, वह उन्हें मध्यकाल का एक महान 'संपादक' सिद्ध करता है। उन्होंने रज्जब के पाठालोचन के दौरान यह रेखांकित किया कि उनके पदों में अन्य कवियों की तुलना में पाठ-विकृति कम है, क्योंकि रज्जब की शिष्य-परंपरा ने उनकी वाणियों को लिखित रूप में सुरक्षित रखने पर विशेष बल दिया था। 

रज्जब के निवास और साधना स्थल के भ्रम का निवारण करते हुए वे स्पष्ट करते हैं, ”दादूदयाल को साँगानेर में निमंत्रित करने वालों के नाम उक्त वर्णन में (१) चाटसू निवासी हरिदास (२) ऊधौदास (३) नारायनदास (४) कारू (५) कुंभा व (६) दूसरा नारायण आये हैं। इनमें संत रज्जब का नाम कहीं भी नहीं आया है। यदि रज्जब सांगानेर में स्थाई रूप से रहते होते तो उनका व उनके शिष्यों का नाम उक्त विवरण में अवश्य आता। इससे भी हमारे उस कथन को बल मिलता है जिसमें हमनें कहा है कि रज्जब संतप्रवर दादूदयाल की संनिधि में आमेर में ही रहे। सांगानेर में नहीं रहे। मारवाड़ की रामत प्रारम्भ हो जाने पर रज्जब संतप्रवर दादूदयाल के साथ रामत में ही रहे। नरायना आ जाने पर नरायना आ गए। अंततः वि०सं० १६६२ के मेले में सन्त सुन्दरदास 'बूसर' के प्रसंग में गरीबदासजी से विवाद हो जाने पर इन्होंने नरायना सदा-सदा के लिए छोड़ दिया और ये पूरे ३० वर्ष पश्चात् १६९२ विक्रमसम्वत् में सन्त सुन्दरदास बूसर, पं० जगजीवनदास दौसा वालों के साथ नरायना पुनः गए जिसकी परिणति वि०सं० १६९३ में आचार्य गरीबदासजी के ब्रह्मलीन होने के रूप में सामने आई। जैसा हम पूर्व में लिख आये हैं, डॉ० कलेवर्ट की यह स्थापना निराधार है, जिसमें उन्होंने रज्जब को साँगानेर में ही रहकर साधना करते हुए दर्शाया है और मारवाड़ की रामत के समय दादूदयाल का शिष्य बनना लिखा है। उक्त विवरण से यह निष्कर्ष स्पष्ट तौर पर निकलता है कि स्वामीजी से साँगानेर आने के लिए निवेदन करने में हरिदास चाटसू निवासी तथा जनगोपाल के शिष्य चैनदास आदि का ही महत्वपूर्ण हाथ था।“[9] यह अन्वेषण पाठालोचन की सार्वकालिकता सिद्ध करता हैं, जहाँ आक्षेपों का स्थान नहीं रहता। 

डॉ. सिंहल ने रामस्नेही संप्रदाय के साहित्य और उसकी पांडुलिपियों के संरक्षण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। चूंकि यह संप्रदाय राजस्थान की धरती से उपजा और इसकी परंपरा मुख्य रूप से हस्तलिखित ग्रंथों और मौखिक गायन पर आधारित रही, इसलिए सिंहल  जी का कार्य यहाँ और भी चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण हो जाता है। रामस्नेही संप्रदाय की चार प्रमुख शाखाएँ हैं: शाहपुरा, रेण, सींथल और खेड़ापा। सिंहल जी ने इन चारों केंद्रों के 'वाणी-संग्रहों' का गहराई से अध्ययन किया। उनका मत है  कि शहपुरा के  रामस्नेही संतों ने अपनी रचनाओं को व्यवस्थित रखने के लिए 'वाणीजी' के रूप में जो संकलन तैयार किए, वे पाठालोचन की दृष्टि से बहुत शुद्ध हैं क्योंकि इस संप्रदाय में गुरु-शिष्य परंपरा अत्यंत अनुशासित रही है। रामस्नेही संप्रदाय में 'राम' नाम निर्गुण निराकार का प्रतीक है। सिंहलजी ने पाठालोचन के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि संप्रदाय के कवियों (जैसे स्वामी रामचरणजी) के पाठों में जहाँ 'राम' शब्द आता है, वहाँ उसका अर्थ दशरथ-पुत्र राम से भिन्न है। उन्होंने पाठ-शोधन करते समय उन प्रतियों को अधिक महत्व दिया जिनमें निर्गुण दर्शन की स्पष्टता है । उनका मानना है  कि 'अणभै वाणी' केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं है, बल्कि यह राजस्थानी और हिंदी के शब्द-सामर्थ्य का खजाना है।

शाब्दिक अर्थ की लाक्षणिकता को स्पष्ट किए बिना पाठालोचन को पूर्णता प्राप्त नहीं होती। इसी क्रम में एक स्थान पर उन्होंने पद्धति का अर्थ ‘पीढ़ी’ का समर्थन करते हुए तुलनात्मक विवरण देकर अपना मत प्रस्तुत किया- 'पीढ़ी' अर्थ लेने पर स्पष्टतः श्रीस्वामी रामानंदाचार्य, श्रीस्वामी रामानुजाचार्य की शिष्य-परंपरा में आ जाते हैं जबकि 'अर्चना-पद्धति', 'सिद्धान्त-पद्धति' अर्थ लेने से 'श्रीरामानुजाचार्य जैसे सिद्धान्त वाले श्रीरामानंदाचार्य हुए' शिष्य-परंपरा से अलग भी माने जा सकते हैं तथा परंपरा में भी माने जा सकते हैं। व्यक्ति किसी से सम्बद्ध अथवा असम्बद्ध विचारों से माना जाता है, वेश-भूषा से माना जाता है, आचार-व्यवहार से माना जाता है। श्रीरामानुजाचार्य एवं श्रीरामानंदाचार्य का विचार-दर्शन तथा आचार-दर्शन समान है। अतः हमारे विचार से पद्धति का अर्थ पीढ़ी ही करना समीचीन किम्वा न्यायोचित है। हमारे द्वारा यहाँ उपस्थित विस्तृत विवेचन से भी यही सिद्ध होता है कि पद्धति का तात्पर्य पीढ़ी ही होना चाहिये क्योंकि श्रीरामानंदाचार्य, श्रीरामानुजाचार्य की शिष्य-परंपरा में ही आते हैं।“[10] इससे शब्द की सार्थकता विषय-सापेक्ष प्रकट होती है, जो कि पाठ की आलोचना का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। 

हस्तलिखित प्रतियों का सम्पादन करते हुए पूर्व के लेखन की समीक्षा आवश्यक होती है। कई बार नवीन प्रति हाथ में आने पर आलोचक का विस्मित होना स्वाभाविक है। सूफी रचनाकार श्री रोहेल साहब की हस्तलिखित प्रतियों का सम्पादन करते हुए उनकी टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है- “यह आश्चर्य का विषय है कि धुर सिंधु-देश के रहने वाले, इन मुस्लिम धर्मानुयायी परिवार में जन्मे दरवेशों ने सिंधी-प्रभावित ब्रजभाषा के छन्दों सहित सिन्धु-देश में प्रचलित काफी, रेखते एवं विभिन्न रागों के पदों में अपनी रचनाएँ लिखी हैं। इनकी भाषा प्रायः ब्रजी, मारवाड़ी और सिंधी है। कुछ सी-हरफियाँ व एक-दो काफियाँ पंजाबी-भाषा में भी हैं। लिपि अरेबिक-सिंधी है और यही कारण है कि वर्तमान समय तक इनकी रचनाएँ न तो हिन्दी क्षेत्र के विद्वानों के संज्ञान में आईं और न सिंधी विद्वान् ही अभी तक इनकी समग्र रचनाओं की खोजबीन कर इनको प्रकाशित कर सके। संभवतः इसका प्रधान कारण यही है कि इनकी रचनाओं की सीमित हस्तलिखित प्रतियों का मिलना व आजकल हस्तलेखों को पढ़कर पाठ-सम्पादन करने वालों का प्रायः अभाव-सा होता जा रहा है।“[11] इस कथन से यह भाव प्रकट होता है कि लेखन और समालोचना दोनों पूरक हैं। 

उक्त विवेचन से यह भाव प्रकट होता ही कि डॉ. सिंहल ने पाठ की आलोचना के क्षेत्र में नए मानदंड स्थापित करते हुए परिश्रमपूर्वक साक्ष्यों को जुटाकर प्रमाणपुष्ट कार्य सम्पन्न किया है। भाग, प्रभाग, कंडिका, उपकंडिका जैसे उपनामों से संबोधित विषय-सामग्री को प्रखंडों में विभाजित कर विवेचना सुग्राह्य बनाया है। सोपानीकरण के आधार पर निर्मित इस वृहद् कार्य को सुलभ कराने में लेखक ने सम्पूर्ण कार्य में एक आन्तरिक अन्विति की संरचना की है। विश्लेषण को प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत कर निष्कर्ष निरूपण जैसी शैलियों का आश्रय लिया है, जिससे पाठालोचन में वैज्ञानिक दृष्टि समाविष्ट हुई है।

संदर्भ ग्रंथ 

[1] मीरांबाई: प्रामाणिक जीवनी एवं मूल पदावली, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, सं. 2025, पृष्ठ, 21

[2] मीरांबाई: प्रामाणिक जीवनी एवं मूल पदावली, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, सं. 2025, पृष्ठ, 72-73

[3] नाभा कृत भक्तमाल का छप्पय क्रमांक 177 

[4] महायोगिराज गोरखनाथ, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2024, पृष्ठ, 137

[5] महायोगिराज गोरखनाथ, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2024, पृष्ठ, 237

[6] महायोगिराज गोरखनाथ, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2024, पृष्ठ, 202-203

[7] महायोगिराज गोरखनाथ, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2024, पृष्ठ, 204

[8] गुणगंजनामा, श्री दादूपंथी साहित्य शोध संस्थान, जयपुर सं. 2021, पृष्ठ 65

[9] रज्जब की सरबंगी, प्रकाशक ब्रजमोहन साँवड़िया, रायगढ़, सं. 2010, पृष्ठ, 15

[10] आचार्य परंपरा, अंतरराष्ट्रीय राम सनेही संप्रदाय, शाहपुरा, सं. 2076 वि. 

[11] रोहल साहब ग्रंथावली, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, भोपाल, भूमिका


जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान

 


जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान

साहित्य परिक्रमा के जनवरी-मार्च, 2026 अंक में प्रकाशित

राजस्थान की समृद्ध साहित्यिक विरासत में जैन साहित्य का एक विशिष्ट स्थान है। यह साहित्य केवल धार्मिक उपदेशों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के इतिहास, उसकी सामाजिक संरचना और भाषायी परम्परा को समझने के लिए एक अमूल्य स्रोत के रूप में कार्य करता है। जैन मुनियों, आचार्यों और श्रावकों द्वारा रचित इस साहित्य ने जैन धर्म के सिद्धांतों, तीर्थंकरों की महिमा, मंदिरों के उत्सवों और संघ यात्राओं का विस्तृत वर्णन किया है। इसकी विशालता और विविधता उल्लेखनीय है। जैन समुदाय की ज्ञान-संरक्षण और साहित्य सृजन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के कारण इसने अन्य समकालीन साहित्यिक परंपराओं की तुलना में अधिक मात्रा में साहित्य का निर्माण करने में सक्षम बनाया। जैन समुदाय की संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण है कि चातुर्मास में साधुओं द्वारा चिंतन, मनन और प्रवचन के साथ-साथ लेखन-पठन के कार्य पर दिए गए महत्व के कारण विपुल साहित्यिक धरोहर प्राप्त हुई। भारतीय परंपरा में जैन दर्शन और संस्कृति अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है। यह स्थिति प्राकृत, संस्कृत, राजस्थानी और विभिन्न स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध विपुल जैन साहित्य से प्रमाणित होती है। यह साहित्य आगम, पुराण, कथा, चरित्र, काव्य और निबंध जैसे विविध रूपों में उपलब्ध है, जो इसकी बहुआयामी प्रकृति को दर्शाता है ।

राजस्थानी जैन साहित्य में समालोचनात्मक लेखन की एक सुदृढ़ परंपरा रही है, जिसमें 'टीका', 'बालावबोध' और 'टब्बा' जैसे शब्द प्रमुखता से प्रयुक्त होते हैं। इन तीनों का मूल उद्देश्य ग्रंथों को स्पष्ट करना था, किंतु उनकी प्रकृति और विस्तार में भिन्नता थी। टीकाएँ मूलतः संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश जैसी भाषाओं में रचित जटिल धार्मिक और उपदेशात्मक ग्रंथों को जनसाधारण के लिए सुगम बनाने के उद्देश्य से लिखी गईं। जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति और नैतिक उत्थान आदि को प्राप्त करने के उद्देश्य से इन टीकाओं का विकास हुआ। यह ज्ञान की सर्वव्यापकता और जटिल दार्शनिक अवधारणाओं को सरल एवं व्यावहारिक रूप में जन सामान्य तक पहुँचाने की एक अनुपम पहल थी, जिससे धर्म अधिक प्रभावशाली और उपयोगी बन सके।

‘टीका’ मूलतः किसी संस्कृत, प्राकृत या अपभ्रंश ग्रंथ पर लिखी गई एक विस्तृत व्याख्या या भाष्य होती थी। इसका लक्ष्य मूल पाठ के गहन अर्थों, दार्शनिक अवधारणाओं और संदर्भों को विश्लेषित करना था, जो प्रायः विद्वानों और गंभीर अध्येताओं के लिए होती थी। ‘बालावबोध’ बालकों या सामान्य गृहस्थों के लिए मूल रचना का विस्तृत और सरल स्पष्टीकरण होता था। जैन कवियों का उद्देश्य जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति पैदा करना था और तत्त्वज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती का समाधान करने के लिए बालावबोध एक सरल, सरस, सहज और बोधगम्य शैली में लिखा जाता था, जिससे जैन धर्म के सिद्धांतों को जनसाधारण तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सके। ‘ टब्बा’ मूल रचना के स्पष्टीकरण के लिए पत्र के किनारों पर लिखी गई संक्षिप्त टिप्पणियाँ होती थीं। ये त्वरित संदर्भ और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में सहायक होती थीं।

वस्तुतः मूल जैन आगम ग्रंथ प्रायः प्राकृत या संस्कृत में थे, जो सामान्य जन के लिए कठिन थे। इस कठिनाई को दूर करने के लिए, विभिन्न स्तरों की व्याख्याएँ आवश्यक थीं। टीकाएँ विद्वानों की सन्दर्भ सहायिका थीं, बालावबोध जटिल दार्शनिक और धार्मिक अवधारणाओं को सरल बनाकर व्यापक जनता तक पहुँचाते थे और टब्बा त्वरित स्पष्टीकरण प्रदान करते थे। इन विविध व्याख्यात्मक पद्धतियों का प्रयोग यह दर्शाता है कि जैन विद्वानों ने ज्ञान के प्रसार के लिए एक बहु-स्तरीय और समावेशी दृष्टिकोण अपनाया। यह केवल एक प्रकार की व्याख्या नहीं थी, बल्कि विद्वानों से लेकर सामान्य पाठकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक सुविचारित शैक्षणिक संरचना थी, जिससे जैन दर्शन की गहराई और व्यापकता सभी स्तरों पर समझी जा सके। यह दृष्टिकोण जैन विद्वानों समालोचना दृष्टि को दर्शाता है, जिसने धार्मिक ज्ञान को केवल एक विशिष्ट वर्ग तक सीमित न रखकर साहित्यिक उपागम बनाकर जनव्यापी बनाया।

राजस्थानी जैन टीका साहित्य का विकास विभिन्न शताब्दियों में अनेक प्रतिभाशाली विद्वानों और संतों के योगदान से हुआ। इन टीकाकारों ने न केवल जैन धर्म के सिद्धांतों को स्पष्ट किया, बल्कि अपने लेखन के माध्यम से तत्कालीन समाज, संस्कृति और इतिहास का भी महत्त्वपूर्ण चित्रण किया। जैन संस्कृति की दृष्टि से राजस्थान में अभूतपूर्व साहित्य लिखा गया। 5वीं शती में आचार्य सिद्धसेन ने जैन-दर्शन पर आधारित ग्रंथ ‘सम्मई सूत्र’ की रचना की। यह ग्रंथ राजस्थान का प्राकृत भाषा में रचित प्रथम ग्रंथ है। उद्योतन सूरि ने 835 विक्रम संवत में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ की रचना की। यद्यपि यह ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखा गया था,  इसमें ‘मरुभाषा’  अर्थात् राजस्थानी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मरुभाषा का यह प्रारंभिक उल्लेख यह दर्शाता है कि राजस्थानी भाषा का साहित्यिक उपयोग बहुत प्रारंभिक काल से ही हो रहा था और जैन विद्वान इसके विकास में अग्रदूत थे। यह भाषा और धर्म के बीच एक अन्योन्याश्रित संबंध स्थापित करता है, जहाँ धार्मिक उपदेशों के प्रसार ने स्थानीय भाषा के साहित्य का मानकीकरण किया।

इसी तरह षटखंडागम’ ग्रंथ पर आधारित आचार्य वीरसेन रचित ‘धवला’ नामक टीका अद्वितीय है। इसमें 72000 श्लोक संस्कृत और प्राकृत भाषा में है। आठवीं शती के जैन आचार्य हरिभद्रसूरि ने कथाउपदेशयोगदर्शन आदि से संबंधित 1444 ग्रंथों की रचना की तथा संस्कृत-प्राकृत में एक लाख पचास हजार श्लोक लिखे। प्रमुख ग्रंथों में समराइच्च कहा’, ‘शास्त्र वार्ता समुच्चय’, ‘धूर्ताख्यान’, ‘योग शतक’, ‘योग बिंदु, ‘योग दृष्टि समुच्चय’, ‘संबोध प्रकरण’ आदि उल्लेखनीय हैं। 10वीं शताब्दी में सिद्धर्षि नामक संत कवि ने भीनमाल में ‘उपमिति भव प्रपंच कहा’ नामक एक महत्वपूर्ण रूपक ग्रंथ की रचना की। इसके अतिरिक्त  जिनप्रभ सूरि द्वारा प्रणित ‘तीर्थकल्प’ और मुनि चन्द्र का ‘अमर अरित’ भी राजस्थानी जैन साहित्य की सुदृढ़ नींव निर्मित करती है।

यह साहित्य मुख्यतः धार्मिक और नैतिक होने के बावजूद, इसका व्यापक प्रभाव केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। इसमें तत्कालीन सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों को भी इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षित किया गया। यह दर्शाता है कि धार्मिक साहित्य केवल उपदेशात्मक नहीं होता, बल्कि अपने समय के जीवन का एक महत्वपूर्ण दर्पण भी बन जाता है, जिससे शोधकर्ताओं को बहुआयामी अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए, ‘जयधवला टीका’, ‘गद्य कथामृतक’ और ‘उत्तर पुराण’ जैसे ग्रंथों में प्राचीन राष्ट्रकूट या राठौड़ वंश के शासकों का इतिहास मिलता है। इसी प्रकार समराइच्च कहा में पृथ्वीराज चौहान कालीन प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था का उल्लेख है और ‘कुवलय माला’ में प्रतिहार शासक वत्सराज के शासन और समाज का वर्णन है। इस प्रकार जैन विद्वानों ने, अपने धार्मिक लेखन के माध्यम से, अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक जीवन का एक मूल्यवान अभिलेख प्रस्तुत किया जिससे यह साहित्य इस प्रकार धार्मिक और लौकिक ज्ञान की अनुपम छटा प्रस्तुत करता है।

12वीं शताब्दी से राजस्थानी जैन साहित्य में प्रबंध-काव्य, फागु और चौपाई जैसे नए काव्य रूप प्रमुखता से उपलब्ध होने लगे। इस काल में साहित्यिक प्रयोगशीलता बढ़ी, और जैन कवियों ने विभिन्न शैलियों में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। 13वीं शताब्दी में ‘जिनदत्त चौपई’ (सं.1354) जैसी हिंदी पद्य रचनाएँ भी मिलती हैं, जो इस काल में भाषायी विविधता को दर्शाती हैं। मध्यकाल (विक्रम संवत 1600 से 1900) राजस्थानी जैन साहित्य के लिए अत्यंत उर्वर काल था। इस युग में कुशललाभ, हीरकलश, समयसुंदर, हेमरत्न, जटमल, लब्धोदय, मोहनविजय, विनय-लाभ, दामोदर, लाभवर्धन, विनयप्रभ, भतिकुशल, राजविजय, कल्याण कलश, रामचंद, रिखसाधु, वीरविजय, उत्तमविजय और हुलासचंद जैसे शताधिक जैन कवियों ने महत्वपूर्ण रचनाएँ कीं। इन कृतियों का महत्त्व राजस्थानी साहित्य के लिए ये मूल्यवान हैं ।

पार्श्वचंद्र सूरि (16वीं शताब्दी) के एक प्रमुख जैन संत टीकाकार के रूप में ख्यातिप्राप्त हुए। उन्होंने ही सबसे पहले राजस्थानी गद्य में भाषा टीकाएँ लिखना प्रारंभ कीं, जिसका आगे चलकर बहुत प्रचार हुआ। यह एक युगांतरकारी कदम था जो जैन साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण  भाषायी और शैलीगत परिवर्तन को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति केवल अनुवाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह जटिल आगम ग्रंथों को सीधे और सरल राजस्थानी गद्य में व्याख्यायित करके ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने की एक सचेत पहल थी, जिससे मौखिक परंपराओं से लिखित, व्याख्यात्मक गद्य की ओर उन्मुख हुआ। इस नवाचार ने धार्मिक ज्ञान का लोकतंत्रीकरण किया तथा इसे विद्वानों की व्याख्या या काव्यात्मक प्रस्तुति के दायरे से निकालकर स्थानीय भाषा में स्पष्टीकरण के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाया, जिससे राजस्थानी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिला। इसी कालखंड में खरतरगच्छ के संत कवि महोपाध्याय पुण्यसागर ने वि. सं. 1604 में ‘सुबाहु संधि’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें 89 पद्य हैं। उनके शिष्य पद्मराज की ‘अभयकुमार चौपई’ एक प्रसिद्ध रचना है, जो वि.सं. 1650 में में लिखी गई थी।

इसी परम्परा में दौलतराम काजीवाल, टोडरमल, गुमानीराम, दीपचन्द्र कासलीवाल, जयचन्द्र शांघड़ा, सदासुख कासलीवाल का नाम जैन टीकाकारों में उल्लेखनीय हैं। ये 18वीं और 19वीं शताब्दी के प्रमुख विद्वान थे, जिन्होंने टीका लेखन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से अधिकांश हिंदी के विद्वान थे। 18वीं-19वीं शताब्दी में इन विद्वानों का उदय यह दर्शाता है कि जैन टीका लेखन परंपरा भाषायी रूप से गतिशील और अंतर-क्षेत्रीय थी। यह केवल राजस्थानी तक सीमित नहीं थी, बल्कि हिंदी के माध्यम से एक व्यापक बौद्धिक संवाद का हिस्सा थी। यह प्रवृत्ति जैन विद्वानों की बहुभाषी दक्षता और उनके ज्ञान को विभिन्न भाषायी समुदायों तक पहुँचाने की प्रतिबद्धता को उजागर करती है, जिससे जैन साहित्य की पहुँच और प्रभाव का विस्तार हुआ।

जैन विद्वानों ने न केवल धार्मिक ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं, बल्कि व्याकरण, छंद, अलंकार, काव्य, वैद्यक और गणित जैसे विविध धर्मेतर शास्त्रों पर भी महत्वपूर्ण समालोचनात्मक कार्य किया। व्याकरण-शास्त्र अंतर्गत 'बाल शिक्षा', 'उक्ति रत्नाकर', 'पंच-सन्धि बालावबोध', 'हेम व्याकरण भाषा टीका', 'सारस्वत बालावबोध'; छंद शास्त्र में 'पिंगल शिरोमणि', 'दुहा चन्द्रिका', 'राजस्थानी गीतों का छन्द ग्रंथ', 'वृत्त रत्नाकर बालावबोध' और अलंकार-शास्त्र सम्बंधित 'वाग्मट्टालंकार बालावबोध', 'विदग्ध मुखमंडन बालावबोध', 'रसिक प्रिया बालावबोध'; काव्य टीकाओं में 'भर्तृहरिशतक-भाषा टीका त्रय', 'अमरुशतक', 'लघुस्तव बालावबोध', 'किसन-रुक्मणी की टीकाएँ', 'धूर्ताख्यान कथासार', 'कादम्बरी-कथा सार'; वैद्यक-शास्त्र आधारित 'माधवनिदान टब्बा', 'सन्निपात कलिका टब्बाद्वय', 'पथ्यापथ्य टब्वा', 'वैद्य जीवन टब्बा', 'शतश्लोकी टब्बा' तथा गणित-शास्त्र पर 'लीलावती भाषा चौपाई', 'गणित सार चौपाई' आदि टीकाएँ राजस्थानी समालोचना की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

राजस्थानी जैन टीका साहित्य की विशालता और महत्व को देखते हुए, इसकी पांडुलिपियों का संरक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। राजस्थान में जैन शास्त्र भंडारों की संख्या सर्वाधिक है, जो लगभग सभी प्रमुख नगरों और कस्बों में पाए जाते हैं। इन भंडारों में संस्कृत, अपभ्रंश, हिंदी और राजस्थानी भाषाओं में सैकड़ों अज्ञात और दुर्लभ ग्रंथ प्राप्त हुए हैं। यद्यपि इन भंडारों की पूरी सूची अभी तक तैयार नहीं हो पाई है, अनुमान है कि राजस्थान में दिगंबर और श्वेतांबर शास्त्र भंडारों की संख्या 200 से अधिक हैं। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर एवं  जैन विश्व भारती, लाडनूं का योगदान स्मरणीय है। इसके अतिरिक्त जयपुर  और जैसलमेर के जैन शास्त्र भण्डार में  सैकड़ों अज्ञात ग्रंथ और पांडुलिपियाँ शोध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

जैन टीका साहित्य का महत्त्व एक साहित्यिक विधा के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार आंदोलन के रूप में भी स्थापित करता है। यह साहित्य अपने समय में एक प्रभावी माध्यम था जिसने जैन सिद्धांतों को जनसाधारण के नैतिक आचरण और जीवनशैली में एकीकृत किया। 'जन-शैलीऔर 'सरल, सरस, सहज एवं बोधगम्य शैलीको अपनाने का निर्णय एक सचेत प्रयास था ताकि जटिल सिद्धांतों को लोगों के दैनिक जीवन में आत्मसात किया जा सके। इस व्यावहारिक अनुप्रयोग और व्यापक पहुँच ने एक विशिष्ट 'जैन शैली' का विकास किया, जो स्पष्ट, नैतिक और सुलभ धार्मिक प्रवचन का पर्याय बन गई।

समग्रतः राजस्थानी भाषा में लिखित जैन टीका साहित्य एक असाधारण रूप से समृद्ध और बहुआयामी साहित्यिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इस साहित्य ने न केवल जैन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को संरक्षित और प्रसारित किया, बल्कि राजस्थानी भाषा के विकास, स्थानीय लोक संस्कृति के संरक्षण और तत्कालीन सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भों के दस्तावेजीकरण में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैन विद्वानों ने विविध काव्य रूपों जैसे-रास, चौपाई, फागु का उपयोग करके धार्मिक ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पार्श्वचंद्र सूरि जैसे अग्रदूतों द्वारा राजस्थानी गद्य में टीका लेखन की शुरुआत ने भाषायी नवाचार को प्रेरित किया और स्थानीय बोलियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में विकसित किया। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास, प्रशासन और सामाजिक जीवन के लिए ये ग्रन्थ अमूल्य प्राथमिक स्रोत प्रदान करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक लेखन भी अपने समय के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य का एक मूल्यवान अभिलेख बन सकता है।

आधार ग्रन्थ

1.      पं. अम्बालाल प्रे. शाह, जैन साहित्य का वृहद् इतिहास, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संसथान, वाराणसी, सं. 1969

2.      डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन शास्त्र भंडारों की ग्रन्थ सूची, भारतीय श्रुति-दर्शन केंद्र, जयपुर, सं. 1957

3.      डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन संत, श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, महावीरजी, जयपुर, सं. 1967

4.      डॉ. नरेन्द्र भानावत (सं.), जैन संस्कृति और राजस्थान, जिनवाणी विशेषांक, सम्यग्ज्ञान प्रचारक में डल, जयपुर, सं. 1975

5.   डॉ. नरेन्द्र भानावत, जैन दर्शन तथा साहित्य का भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा पर प्रभाव, श्री जिनदत्तसूरि में डल, दादावाडी, अजमेर, सं.1980

6.      नाथूराम प्रेमी, जैन साहित्य और इतिहास, हिंदी ग्रन्थ रत्नाकर लिमिटेड, बम्बई, सं. 1956

7.      नाहटा, कासलीवाल, भानावत एवं सेठिया, राजस्थान का जैन साहित्य, प्राकृत भारती, जयपुर, सं. 1977

8.      डॉ. मनमोहनस्वरूप माथुर, राजस्थानी जैन साहित्य, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, सं.1999

9.      डॉ. हीरालाल जैन, भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान, मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद्, भोपाल, सं. 1962


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