सांस्कृतिक विमर्श के पथ पर राजेन्द्र कुमार सिंघवी

सांस्कृतिक विमर्श के पथ पर राजेन्द्र कुमार सिंघवी 

(हिंदी आलोचना कोश-दशम खंड में प्रकाशित)

डॉ. प्रवीण कुमार जोशी 
सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग 
माणिक्यलाल वर्मा राजकीय महाविद्यालय, 
भीलवाड़ा (राज.) पिन-311001 
ई मेल- praveenkumarjoshi561@gmail.com
मोबाइल- 9829250561



इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य तीव्र गति से वैश्विक धरातल पर अपनी पहचान बनाने में सफल रहा है। साहित्य-रचना के मानक अब परम्परागत साँचे में नहीं है, उन पर तात्कालिकता का प्रभाव अधिक है। साहित्य अब भूमण्डलीकरण के साथ अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में आलोचना भी साहित्यिक वातावरण के साथ कदमताल कर रही है, जहाँ किसी सैद्धान्तिक परिमाप से रचना का मूल्यांकन न करके रचनाशीलता की पहचान पर बल है। ऐसे विरल समय में जब भारतीय सांस्कृतिक मूल्य वैश्विक दिशाबोध की ओर गतिमान हैं और सम्पूर्ण मानव जाति के लिए वरेण्य हैं, तब आलोचना में भारतीय सांस्कृतिक प्रतिमान केंद्रित विवेचना आकर्षित करती है। वर्तमान समय में जब वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद नई सांस्कृतिक चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, तब सांस्कृतिक समालोचना साहित्य की सामाजिक उपयोगिता और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का सशक्त माध्यम बन गई है।

सांस्कृतिक समालोचना वह आलोचनात्मक दृष्टिकोण है, जिसके माध्यम से साहित्य को उस समाज और संस्कृति के संदर्भ में देखा जाता है, जिसमें वह उत्पन्न हुआ है। इसका दृष्टिकोण है कि साहित्य किसी निर्जन सौंदर्यलोक का नहीं, बल्कि जीवित संस्कृति का हिस्सा है। यह आधुनिक साहित्यिक आलोचना की एक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति है, जिसमें साहित्य को केवल सौंदर्यबोध या रचनात्मक आनंद की दृष्टि से नहीं, बल्कि उसके सांस्कृतिक, सामाजिक, वैचारिक और ऐतिहासिक संदर्भों में समझा जाता है। यह आलोचना की वह दृष्टि है जो साहित्य को जीवन से जोड़ती है और संस्कृति को शक्ति-संरचना के रूप में देखती है। इसका मूल उद्देश्य यह समझना है कि साहित्य केवल कल्पना की उपज नहीं, बल्कि किसी समाज की संस्कृति, परंपरा और जीवन मूल्यों का प्रतिबिंब है।

विगत दो दशकों से सक्रिय लेखन में संलग्न डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी की आलोचनात्मक दृष्टि सांस्कृतिक विमर्श केंद्रित रही है। ‘आचार्य तुलसी की काव्य-साधना’ (2005), ‘साहित्य का सांस्कृतिक पक्ष’ (2018), ‘राष्ट्रबोध, संस्कृति एवं साहित्य’ (2019), ‘हिन्दी आलोचना: निकष एवं प्रतिमान’ (2020), ‘कबीर: दृष्टि एवं आधार’ (2022), ‘साहित्यिक निबंध’ (2023) आदि पुस्तकों में इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय-सांस्कृतिक भावबोध आधारित साहित्य की व्याख्या करना, सिद्धान्त निर्माण करना, रचना को मानकता की कसौटी पर परखना और युग-सापेक्षता तय करते हुए भारतीय सांस्कृतिक प्रतिमानों पर आधारित मूल्यांकन किया है। इसके  अतिरिक्त समकालीन साहित्य, गवेषणा, गगनांचल, साक्षात्कार, अक्षरा, वीणा, मधुमती, हिन्दी अनुशीलन, आधुनिक साहित्य, समवेत, शब्दघोष, तुलसी प्रज्ञा, विविधा, मीरायन, अपनी माटी, जनकृति, कला समय, भावक, साहित्य परिक्रमा, जागती जोत, आधारशिला साहित्यम् जैसी प्रतिनिधि साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित आलोचनात्मक लेखों, समीक्षाओं, ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाओं, संपादित पुस्तकों में प्रकाशित अध्यायों तथा साहित्यिक संगोष्ठियों दिए गए व्याख्यानों में डॉ. सिंघवी की प्रतिभा हिन्दी आलोचना के सांस्कृतिक विमर्श को सुदृढ़ करती है। 

साहित्य समाज की संस्कृति, परंपरा और मानसिकता को अभिव्यक्त करता है। एकात्म जीवन-दर्शन भारतीय संस्कृति का प्राण है। भिन्न-भिन्न विचार समूहों के प्रवाह को गांगेय प्रवाह का रूप दे देना ही भारतीय संस्कृति के टिकने का सबसे बड़ा आधार रहा है। संस्कृति मनुष्य के चित्त की खेती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने संस्कृति को मनुष्य के चिन्तन की उपज कहा है। संस्कृति के मूलभूत तत्त्व नैतिकता, सदाशयता, सहनशीलता, शरणागत की रक्षा, आचरण की पवित्रता और समभाव की उच्चत्ता में इसकी शक्ति निहित है। ‘सांस्कृतिक एकात्म एवं भारतीय चिंतन’ विषय पर डॉ. सिंघवी ने भारतीय संस्कृति के एकात्म भाव को रेखांकित करते हुए लिखा, “चिंतन की स्वतंत्रता और उपास्य की अनेकता, वेश-भूषा और खान-पान के विविध स्वरूप के बावजूद अनेकता में एक तत्त्व की प्रधानता ही आर्यावर्त की संस्कृति का सबसे बड़ा सम्बल है। हमारा चिंतन मात्र देह तक सीमित नहीं है। स्थूल जगत् से परे हम यह विचार करते हैं कि मैं कौन हूँ? हमारा प्रत्यभिज्ञा दर्शन स्वयं की पहचान पर बल देता है।“[1] वस्तुतः सम्यक् कृति ही संस्कृति है। विराट मूल्यों पर आधारित यह सांस्कृतिक वैभव भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर है। अतः आलोचना के केंद्र में सांस्कृतिक विमर्श ही समग्रता को प्रकट कर सकता है। 

भारतवर्ष भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विविधता युक्त रहा है, उसी अनुरूप भाषायी विविधता भी विद्यमान रही। एक ओर भारोपीय परिवार से जन्म लेने वाली भाषाएँ यथा- संस्कृत, हिंदी, मराठी, बांग्ला, उड़िया, असमिया, गुजराती आदि में साहित्य रचना हुई तो दूसरी ओर द्रविड़ परिवार की भाषाओं- तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ आदि में विपुल साहित्य रचा गया। इसी वैशिष्ट्य को उजागर करते हुए सिंघवी जी ‘भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य का आतंरिक-प्रवाह’ आलेख में समान आधारभूमि की पहचान करते हैं। वे लिखते हैं, “यह अचरज का विषय है कि भारत की भाषाओं का परिवार एक नहीं होते हुए भी उनके साहित्य की आधारभूमि समान रही है। भारतीय भाषाओं के साहित्य पर प्राचीन ग्रंथ- रामायण, महाभारत, उपनिषद् पुराण, भागवत् का आधार रहा है, परवर्ती संस्कृत ग्रंथों ने भी साहित्य की धारा को प्रभावित किया। उसमें कालिदास, बाण, भवभूति, जयदेव आदि का साहित्य केन्द्र में रहा। काव्यशास्त्र से संबंधित ग्रंथों ने सभी का पोषण किया, जैसे- भरत का ‘नाट्यशास्त्र‘, आनंदवर्द्धन का ‘ध्वन्यालोक‘, मम्मट का ‘काव्यप्रकाश‘, विश्वनाथ का ‘साहित्य दर्पण‘ आदि ग्रंथ सभी भाषाओं के मूल में रहे।“[2] इससे स्पष्ट होता है कि अपने प्रादेशिक वैशिष्ट्य एवं सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखते हुए समग्र साहित्य ने अनंत विस्तार ग्रहण किया, परन्तु उसके व्यक्तित्व में एक-दूसरे का प्रभाव अवश्य रहा। यही आत्मतत्त्व साहित्यिक विमर्श को भव्य बनाता है। 

साहित्य के माध्यम से संस्कृति की अभिव्यक्ति सर्वप्रथम वाल्मीकि रामायण में हुई है। वाल्मीकि कृत रामायण से आधुनिक हिन्दी साहित्य तक राम काव्य की सुदीर्घ परम्परा रही है। छान्दस वाङ्मय से निःसृत होने वाली रामकाव्य की धारा संस्कृत वाङ्मय को पार करती हुई प्राकृत वाङ्मय में प्रवेश करती है। ‘सांस्कृतिक मूल्यों के पुनरुत्थान का काव्य: आधुनिक हिन्दी राम काव्य’ विषय पर विवेचना करते हुए सिंघवी जी ने आधुनिक हिन्दी रामकथा धारा  में संस्कृति के तत्त्वों को नवीन आलोक में देखा है। उनका मत है, “मानवता के चरम विकास में इस काव्य का अमूल्य योगदान रहा है। आधुनिक रामकाव्य परम्परा की अनुभूति नहीं है, उसमें नवीन युगानुकूल जीवन के प्रतिमानों, मूल्यों को वहन करने की शक्ति भी है।“[3] सांस्कृतिक मूल्यों को समकालीन समय की आवश्यकता अनुरूप परिष्कृत रूप में प्रस्तुति विमर्श को प्रगति पथ पर आरूढ़ करती है। इस दृष्टि से सामाजिक कुरीतियों का खंडन, सामाजिक समानता का पोषण, पारिवारिक आदर्शों की प्रतिस्थापना, नारी की प्रतिष्ठा, आर्थिक समानता, श्रम का महत्त्व आदि परम्परित मूल्यों को नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रतिस्थापित किया गया। साथ ही शोषण की निंदा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राष्ट्रप्रेम, पाश्चात्य भोगवादी, साम्राज्यवादी नीति की निंदा, अधिकार चेतना जैसे नवीन मूल्यों की भी प्रतिष्ठा आधुनिक हिन्दी राम काव्य में की गई है।

भारतीय संस्कृति सनातन, समृद्ध और जीवन्त है। इसकी परम विशेषता रही है कि उसने पदार्थ को आवश्यक माना पर उसे आस्था का केन्द्र नहीं, शस्त्र-शक्ति का सहारा लिया, लेकिन उसमें त्राण नहीं देखा। यहाँ जीवन का लक्ष्य विलासिता नहीं, आत्म-साधना रहा, लोभ-लालसा नहीं, त्याग-तितिक्षा रहा। ‘सांस्कृतिक प्रतिमान और अज्ञेय की  दृष्टि’ विषय पर अज्ञेय के निबंधों पर विचार करते हुए डॉ. सिंघवी ने लिखा, “अज्ञेय ने मार्क्सवाद को एक सीमा तक ही महत्त्व दिया। वे उसे पूर्ण जीवन-दर्शन नहीं मानते। वे मनुष्य की निर्भयता, विवेक और स्वतंत्रता के विश्वासी हैं। ‘वे वैदिक आर्यों की ‘अभीता नो स्याम’ अथवा ‘एषा में प्राण या विभेः' को मनुष्य की चरम आकांक्षा का प्रतीक मानते हैं। वे संपूर्ण सत्य को ग्रहण करना चाहते हैं और उसे रागदीप्त करके कला का रूप देना चाहते हैं।“[4] इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दी आलोचना में अज्ञेय के साहित्य का विवेचन सांस्कृतिक विमर्श आधारित होना अपेक्षित है अन्यथा पाश्चात्य आलोक में एकांगी दृष्टि ही प्रस्तुत होगी।

भारतीय चिन्तन को हिन्दी-साहित्य में प्रसारित करने एवं उसे जीवन-दृष्टि का अंग बनाने में जैन धर्म एवं उसमें रचित साहित्य का विशेष योगदान रहा है। जिसका प्रामाणिक, साहित्यिक एवं गरिमायुक्त रूप वर्तमान में हिन्दी-साहित्य की निधि है। ‘आचार्य तुलसी के काव्य में भारतीय सांस्कृतिक मूल्य‘ विषय पर लिखित आलेख में डॉ. सिंघवी कहते हैं, “आचार्य तुलसी का चिन्तन है कि भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन ही नहीं, समृद्ध भी है, अतः किसी भी राष्ट्रीय समस्या का हल हमें अपने सांस्कृतिक तत्वों के द्वारा ही खोजना चाहिए क्योंकि हमारा अतीत अत्यन्त वैभवशाली रहा है।“[5] जैन आचार्य तुलसी ने कहा था कि हिन्दू संस्कारों की जमीन छोड़कर आयातित संस्कृति के आसमान में उड़ने वाले लोग दो-चार लम्बी उड़ानों के बाद जब अपनी जमीन पर उतरने या चढ़ने का सपना देखेगें, तो उनके सामने अनेक प्रकार की मुसीबतें खड़ी हो जाएँगी। वस्तुतः जैन साहित्य में सत्यं, शिवं व सुन्दरं को रूपायित करने वाले विषय-वस्तुओं को आधारभूमि में रखा, गिरते सांस्कृतिक मूल्यों को पुनः प्रतिस्थापित किया, जीवन मूल्यों को साहित्य के माध्यम से लोक-जीवन में संचारित किया तथा हिन्दी साहित्य के कोष को निरंतर समृद्ध किया है।

साहित्य के नाम से प्राचीनतम सर्जनाएँ प्रकृति से ही आरंभ होती है। ऋग्वेद के अनेक सूक्त, रामायण एवं महाभारत के आख्यान, सम्पूर्ण संस्कृत वाङ्मय और उसके पश्चात् समकालीन साहित्य परम्परा विद्यमान है। आदिकवि वाल्मीकि ने जब प्रकृति के दो निर्द्वन्द्व प्राणियों को मुक्त विहार करते देखा तो उनकी आत्मा भाव-विह्वल हो उठी, जब दूसरे ही क्षण एक को व्याध के बाण से आहत देखा तो करुणा का क्रन्दन फूट पड़ा। ‘प्रकृति एवं भारतीय साहित्य’ विषयक आलेख में इस घटना को सिंघवी जी भारतीय संस्कृति के मूल आधार में प्रकृति के महत्त्व को उजागर करते हैं। वे लिखते है, “विशिष्टता यह है कि प्रकृति के स्निग्ध रूप पर कवि मोहित है तो भाव-विह्वल होकर रचना करता है और यदि उस पर संकट है तो वह आभास ही नहीं देता, वरन् उसकी संरक्षा के लिए अपने रचनाकर्म को समर्पित कर देता है।“[6] प्रकृति के प्रति यह कवि-प्रेम अनादि काल से अनवरत जारी है। यह वर्णन कभी स्वतंत्र आलंबन रूप में, कभी हृदयगत भावों को उद्दीप्त करने अथवा आगे की घटनाओं की पृष्ठभूमि के रूप में होता है। कई बार यह वर्णन बिम्ब-प्रतिबिम्ब, उपदेश, रहस्य या मानवीकरण रूप में दृष्टिगोचर होता है।

नदी, नारी और संस्कृति का प्रवाह शाश्वत होता है। नारी का एक प्रकृष्ट रूप माँ होती है। वह शास्त्र से बड़ी और गुरु से भी अधिक पूज्य होती है। शास्त्र जब निःशब्द हो जाते है तब माँ की बात ही अंतिम होती है। वह संस्कृति की प्रतीक होती है। नदी भी उसी का रूप है। न नारी वृद्ध होती है और न संस्कृति। इन दोनों का अविरल प्रवाह साहित्य में दिखता है। लोक और संस्कृति के अनन्य संबंधों को सांस्कृतिक परिधि में बांधते हुए ‘मिथकीय चेतना एवं लोकमन’ आलेख में भारतीय समाज का नदियों के साथ सांस्कृतिक सम्बन्ध लोकगीतों सहित लोककथाओं के महत्त्व को प्रकट करता है। वे लिखते हैं, “लोककथाएँ वाचिक परम्परा का साहित्य है। ये पीढ़ी दर पीढ़ी यात्रा करती हुई अपना अस्तित्व कायम रखती हैं। मौखिक परम्परा ने अपने श्रुत-कौशल और विवेक से इसे आगे बढ़ाया है।“[7] ‘रेणु की कहानियों में लोकतत्त्व’ की पड़ताल करते हुए उसमें जीवन की सहजता और उसमे छिपे मूल्यों की खोज करते हैं। सिंघवी जी लिखते हैं, “रेणु एक ऐसे कथाकार के रूप में हिन्दी साहित्य का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ लोक के आदर्श और लोक के यथार्थ दोनों समंजित रूप में प्रकट होते हैं। जीवन के केन्द्रीय तत्त्व और मूल्य कहीं पर विचलित नहीं होते। तमाम विसंगतियों के बावजूद उन्हें यह लगता है कि लोक जीवन में अभी भी मूल्य शेष हैं, जिन्हें वे लगभग हर कहानी में सहेजते नज़र आते हैं।“[8] यहाँ स्पष्ट होता है कि  स्थान के अनुसार भी लोक कथाओं में पात्र और परिस्थितियाँ स्थानीय रूप धारण कर लेते हैं। इन कथाओं में सम्पूर्ण समाज के मंगल का विधान निहित होता है। सामाजिक विश्वास, मान्यताएँ और आस्थाएँ इनमें आसानी से ढूँढी जा सकती हैं। जो हमारी धरोहर है।

फादर बुल्के को तुलसी की भक्ति में जो एक विशेषता विशेष रूप से आकर्षित करती है वह है-परहित भावना। आचार्य शुक्ल ने इसे 'लोकमंगल' के रूप में निरूपित किया, लेकिन कामिल बुल्के इस दृष्टिकोण को तुलसी की महत्त्वपूर्ण  उपलब्धि मानते हैं। उनकी दृष्टि में यह महाकवि तुलसी की मौलिकता है, जिसमें मनुष्य की सेवा महत्त्वपूर्ण  है। ‘फ़ादर डॉ. कामिल बुल्के की दृष्टि में रामचरित मानस की सार्वकालिकता’ विषय पर विचार करते हुए डॉ. सिंघवी विवेचना करते हैं, “तुलसी का प्रभु-भक्त न केवल नैतिक आचरण करने वाला और परहित निरत व्यक्ति है, बल्कि वह प्रपत्ति और आत्मदैन्य भावापन्न व्यक्ति भी है। वह पूरी श्रद्धा से भगवान का विधान स्वीकार करता है और भरत की तरह यह मानता है कि प्रभु की आज्ञा के पालन से बढ़कर उसकी और कोई सेवा नहीं है।“[9] वस्तुतः कामिल बुल्के की दृष्टि में रामचरितमानस की प्रासंगिकता सार्वकालिक है। उसके दो बड़े कारण हैं- तुलसी की भक्ति और उनका कवित्व। उनकी भक्ति केवल वर्णाश्रम धर्म तक सीमित न होकर विश्वजनीन है। वह मानव मात्र को समान निरूपित करने वाले और जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर प्रत्येक मनुष्य की सेवा को परम धर्म मानने वाले 'परहित' को अपने विचार व्यवस्था में जो महत्त्व देते हैं, वह इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। 

डॉ. धर्मवीर भारती प्रयोगवादी और नई कविताओं की संक्रांतिकालीन बेला के साक्षी रहे हैं। तत्कालीन परिस्थितियों में जहाँ एक ओर युद्धजनित त्रासदियों की शिकार मानवता है, तो दूसरी ओर अंधकारमय वातावरण में भी जीवन के प्रति उत्कट भाव-प्रवणता भी है। इस संधिकालीन समय में कवि भारती के मन में दुविधा, संशय और भय के साथ-साथ आस्था का स्वर भी अंकुरित होता है। ‘आस्थावादी दृष्टि का विस्तार एवं धर्मवीर भारती का काव्य’ विषय पर शोधपरक टिप्पणी करते हुए सिंघवी जी लिखते हैं, “डॉ. धर्मवीर के काव्य में युगीन विद्रुपताओं, वेदना व पीड़ा की गाथाओं, युद्ध जनित विषमताओं, मानवता को त्रास पहुँचाने वाली कई घटनाओं के चित्रण के बावजूद वे अपनी आस्था का स्वर कभी ‘लघुमानव’ में तलाश करते हैं, तो कभी अश्वत्थामा के हृदय परिवर्तन में। ‘कनुप्रिया’ के कांत सम्मित उपदेश में यही दृष्टि दिखाई देती है । इस संपूर्ण रचना-प्रक्रिया में आस्था और अनास्था के द्वंद्व में आस्थावादी दृष्टि का आकर्षण- पाठकों को सदैव आकर्षित करता है और भावी मूल्यों के निर्माण की प्रेरणा भी देता है।“[10] यहाँ स्पष्ट होता है कि मूल्य-विहीन होने पर पतनशीलता निश्चित है। धर्मवीर भारती ने धर्म, दर्शन, समाज की शोषित करने वाली रूढ़ि, मृत परम्परा व सड़े-गले मूल्यों को चुनौती दी है, अशिव को जन्म देने वाली मान्यताओं के प्रति अनास्था बरती है, किंतु मानवतावादी पक्षों को ध्यान में रखकर आस्था व विश्वास को भी उसी निष्ठा से सृजित किया। 
सम्पूर्ण सृष्टि में कोई एक चिरन्तन निर्विकार सत्ता है, जो प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है। उसी की आत्मगत अनुभूति को ‘ब्रह्म’ कहा गया है। इसके तीन रूप लोक में हैं-आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक। पश्चिमी सभ्यता ने ब्रह्म को ‘आधिभौतिक’ रूप में ही स्वीकार किया, फलतः संपूर्ण चिन्तन पदार्थवादी रहा। ‘कबीर का ब्रह्म-रहस्य’ विषय पर सिंघवी जी लिखते हैं, “कुछ विद्वानों ने कबीर की एकेश्वरवादी धारणा को देख करके यह विचार या अभिमत व्यक्त किया कि कबीर इस्लाम के एकेश्वरवाद से प्रभूत रूप से प्रभावित थे, लेकिन तत्त्वतः विचार करने पर यह निराधार प्रतीत होता है। कबीर का एकेश्वर वाद मूलतः अद्वैतवादी है। क्योंकि उपनिषद् में स्पष्ट घोषणा की है कि ‘एकमेव द्वितीयोनास्ति।‘[11] इस प्रकार कबीर की वाणी देश काल की सीमा से परे, सार्वकालिक एवं समकालीन समाज को दिशा प्रदान करने वाली रही है। कबीर का जीवन-दर्शन जिसमें युगानुकूल कवि-धर्म निर्वाह, प्रखर व्यक्तित्व और विराट कवि-हृदय का दिग्दर्शन होता है।

सन् 1920 ई. के लगभग भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन जनव्यापी बन रहा था, किन्तु जातीय भेद, साम्प्रदायिक वैमनस्य, भाषायी विविधता आदि ऐसे कई तत्त्व थे, जो राष्ट्रीय-एकता में बाधक थे। इन विभेदक तत्त्वों को पहचानते हुए हिन्दी की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा के कवियों ने राष्ट्रीय-भावना को मुखरित किया। उनमें राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखन लाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, पं. सोहन लाल द्विवेदी के नाम उल्लेखनीय हैं। इनकी पहचान राष्ट्रीयता के कवि के रूप में हैं, उसका कारण यह है कि उन्होंने समय को पहचान कर जनमानस की मौन वाणी को मुखर रूप में व्यक्त किया। ‘सोहनलाल द्विवेदी की कविता में राष्ट्रबोध’ विषय पर विवेचना करते हुए सिंघवी जी पं द्विवेदी जी के बारे में लिखते हैं, “कवि की वाणी समाज, राष्ट्र, संस्कृति, मानवता इत्यादि के व्यापक फलक को चेतनावान बनाने में सफल रही है। यथार्थ रूप से देखा जाए तो आज भारतीय जन-मन सांस्कृतिक परतंत्रता से मुक्ति चाहता है, सशक्त राष्ट्र के साथ स्वाभिमान पूर्वक जीवन की अभिलाषा रखता है। उस दृष्टि से कवि की रचनाएँ नया मार्ग निर्मित करती हैं।“[12] इसी तरह बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के रचना संसार पर टिप्पणी करते हुए उनका कथन है, “नवीन जी की इतिहास दृष्टि में भी राष्ट्रीय-सांस्कृतिक बोध भरा हुआ है। वे मानते थे कि समाज जिस भौतिकवादी उन्माद में आगे बढ़ रहा है, उसका विनाश निश्चित है। यदि मनुष्य ने अपने हृदय की बात नहीं सुनी तो बुद्धिवाद की प्रचंड अग्नि उसे भस्मीभूत कर देगी। कवि की यह धारणा उन युवाओं और तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए थी, जिन्होंने सिर्फ स्वयं की उन्नति को ही अपने जीवन का हेतु मान लिया था।“[13] सांस्कृतिक चेतना को जाग्रत करने की दृष्टि से यदि अवलोकन किया जाय तो ज्ञात  होता है कि इन कवियों ने भारतीय सांस्कृतिक गौरव का गुणगान करते हुए सनातन भारतीय चिंतन को विशेष महत्त्व दिया, मूल्यों के परिष्करण और हस्तांतरण पर जोर दिया और भारतीय जीवन मूल्यों से अनुप्राणित जीवन-शैली निर्मित करने का आह्वान किया।

औपनिवेशिक शक्तियाँ सर्वप्रथम प्राचीन संस्कृति के उद्धार के बहाने उसकी रचनात्मकता, सनातनता और प्रेरक परम्पराओं को निशाना बनाती है तथा अपने ज्ञान-विज्ञान से शासित वैचारिक नेतृत्व प्रदान करती है। यह मानसिक उपनिवेशीकरण सांस्कृतिक प्रभुत्व में परिवर्तित होकर बुद्धिजीवियों की समझ को भी कुंद कर देता है। अन्ततः पराधीन जन-मानस उसकी ही वाणी में बोलकर गर्व  का अनुभव करता है और औपनिवेशिक प्रभाव में स्वयं का विलयन कर तदनुसार ही व्यवहार करने लग जाता है। आलोचनात्मक संदर्भ में ‘कविता का वर्तमान एवं औपनिवेशिकता’ विषय पर समकालीन हिन्दी कविता मे व्यक्त इस भाव दृष्टि पर सिंघवी जी ने अपना मत दिया है, “औपनिवेशिक दासता से मुक्ति में राष्ट्रवाद एकमात्र विकल्प प्रतीत होता है। यह अतीत से ऊर्जा ग्रहण कर वर्तमान संदर्भों में उसकी पुनर्व्याख्या करता है। साथ ही महान् सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन मूल्यों के सहारे चेतना का निर्माण कर अपने सांस्कृतिक औजारों से कुचक्रों को नष्ट करता है।“[14] अतः इस पुनीत कार्य में साहित्य की भूमिका अनिर्वचनीय है।

औपनिवेशिकता का दंश भारतीय समाज अच्छी तरह से जानता है, परन्तु आदिवासियों ने इसका जिस तरह से सामना किया है, वह एक दारुण यथार्थ है। ‘नई सदी के हिंदी उपन्यासों में आदिवासी जीवन के अनुत्तरित प्रश्न’ विषय पर डॉ. सिंघवी टिप्पणी करते हैं, “आदिवासी जीवन आधारित हिन्दी उपन्यासों का जब अध्ययन करते हैं तो स्पष्ट होता है कि उपन्यासकारों ने उन पहलुओं को उजागर किया है, जिन पर अब तक किसी ने प्रकाश नहीं डाला था। हिंदी उपन्यासकार स्पष्ट करते हैं कि आजादी के बाद भी इन्हें उपेक्षितों का जीवन जीना पड़ रहा है। उन्हें यहाँ की समाज व्यवस्था ने हाशिये पर रखकर आज भी आदिम रूप में जंगलों में रहने के लिए बाध्य किया है। आदिवासी लेखन में उपन्यासकारों ने कुछ ऐसे चित्र उपस्थित किए हैं, जो सभ्य समाज के विपरीत है। जब कभी मानव सभ्यता चाँद को छूने के लिए ब्रह्मांड को चीरती है तब ये चित्र मानव को आदिम युग में ले जाते है, जो शर्मनाक है। मनुष्यता के कलंक से विमुक्ति का प्रयास आदिवासी जीवन के प्रति एकात्म भाव से ही संभव है, अन्यथा विकास की गति केवल छलावा है।“[15] हिन्दी उपन्यास परम्परा का अवदान इस दृष्टि से स्तुत्य है। यह एक सुखद संयोग है कि आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर भारतीय गणतन्त्र के सर्वोच्च पद पर आदिवासी प्रतिनिधित्व है, इससे यह प्रतीत होता है कि यह वर्ग अब मुख्यधारा में स्थान पा रहा है। इससे सिद्ध होता है कि यह सांस्कृतिक चेतना के मूल्यांकन का समय है। 

भारत में भाषाओं के सर्वेक्षण करने वाले प्रथम भाषा-वैज्ञानिक सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन हिन्दी जगत् में अमर हैं। भारत की संस्कृति से अगाध श्रद्धा रखने वाले ग्रियर्सन ने नव्य भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया और उन्हें वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया, इस दृष्टि से उन्हें बीम्स, भांडारकर और हार्नली के समकक्ष माना जाता है। ‘ग्रियर्सन का हिंदी को अवदान’ विषयक आलेख में डॉ. सिंघवी का अभिमत है, “ग्रियर्सन ने जिस तटस्थता व प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर हिन्दी भाषा तथा साहित्य का अवगाहन किया, वह अतुल्य है। लगभग तीस वर्षों की अनवरत साधना से हिन्दी भाषा का स्वरूप निर्धारित किया और उसके साहित्य को भारतीय आस्था की दृष्टि से देखा। यहाँ तक कि लोक-संस्कृति में डूबकर उसे भी गौरवान्वित किया। हिन्दी साहित्य का इतिहास और भाषा-सर्वेक्षण ने ‘नींव के पत्थर’ की तरह कार्य किया, जिस पर आज हिन्दी का महल खड़ा है।“[16]  इसी तरह ‘आचार्य शिवपूजन सहाय की दृष्टि में हिन्दी-उर्दू का रिश्ता’ आलेख में हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओँ को भारत की आत्मा बताते हुए वे टिप्पणी करते हैं, “जब गिलक्राइस्ट ने भारतीय भाषा-शब्दावली को दो वर्गों में बाँटा था, उस समय अनजाने में ही हिन्दी और उर्दू को धार्मिक पहचान दे दी। धीरे-धीरे सांप्रदायिक रंग में रंगती हुई दो पृथक् भाषाओं के रूप में दिखाई देने लगी, परन्तु आत्मा की दृष्टि से देनों की अंतरंगता आज भी विद्यमान है। आचार्य शिवपूजन सहाय ने दोनों भाषाओं के रिश्तों को याद करते हुए भारतीयता के दृष्टिकोण को उजागर किया है।“[17] भाषाई संदर्भ में हिन्दी के विस्तार की चर्चा करते हुए ‘हिन्दी का वैश्विक धरातल एवं विस्तार’ विषयक लेख में सिंघवी जी लिखते हैं, “हिन्दी में साहित्य-सृजन परम्परा एक हजार वर्ष से भी पूर्व की है। आठवीं शताब्दी से निरन्तर हिन्दी भाषा गतिमान है। पृथ्वीराज रासो, पद्मावत, रामचरित मानस, कामायनी जैसे महाकाव्य अन्य भाषाओं में नहीं हैं। संस्कृत के बाद सर्वाधिक काव्य हिन्दी में ही रचा गया। हिन्दी का विपुल साहित्य भारत के अधिकांश भू-भाग पर अनेक बोलियों में विद्यमान है, लोक-साहित्य व धार्मिक साहित्य की अलग संपदा है और सबसे महत्त्वपूर्ण यह महान् सनातन संस्कृति की संवाहक भाषा है, जिससे दुनिया सदैव चमत्कृत रही है।“[18] देखा जाए तो उन्नीसवीं शती के पश्चात् आधुनिक गद्य विधाओं में रचित साहित्य दुनिया की किसी भी समृद्ध भाषा के समकक्ष माना जा सकता है। साथ ही दिनों-दिन हिन्दी का फलक विस्तारित हो रहा है, जो इसकी महत्ता को प्रमाणित करता है। 

रचनागत मूल्यांकन में भारतीय मूल्यों की गहनता प्रकट हो रही है, तो पश्चिमी अवधारणाएँ इसे नया कलेवर दे रही हैं। रचनाओं की विपुल मात्राओं, विविध वैचारिक पक्षों के उदय से आलोचना की गंभीरता बढ़ती जा रही हैं। ऐसे समय में डॉ. हरेराम पाठक जी ने हिन्दी आलोचना कोश के ग्यारह खंडों का संपादन कर हिन्दी के अध्येताओं को हिन्दी आलोचना के विविध आयामों से तार्किक ढंग से परिचित कराने, आलोचना की प्रक्रिया एवं दिशा से अवगत होने तथा पूर्ववर्ती आलोचकों के समृद्ध योगदान से प्रेरणा ग्रहण करने का अवसर प्रदान किया है। इसकी समीक्षा करते हुए सिंघवी जी लिखते हैं, “आज का लेखन साम्प्रदायिकता के दौर से गुजर रहा है। अपने सीमाबद्ध खेमों में आबद्ध लेखक निहित स्वार्थों को साहित्य के माध्यम से प्रकट कर रहा है। अत. साहित्य की सार्वकालिकता और सर्वजनहिताय की मंगलकामना बाधित हो रही है, न्याय कहीं दब-सा रहा है। ऐसी स्थिति में संपादक ने आलोचना के लिए महर्षि गौतम के न्याय सूत्र को आधार बनाकर उसके व्यावहारिक पक्ष को केंद्र में रखते हुए कृतियों की आलोचना करने की बात उठाई है।“[19] स्वयं संपादक की दृष्टि यह रही है कि वेद, उपनिषद, भर्तृहरि, पतंजलि एवं बौद्ध भाषा-चिंतन के विभिन्न सूत्रों को नये संदर्भ में व्याख्यायित किया जाए और शास्त्रीय आलोचना के निरंतर कमजोर होते जा रहे पहलुओं को मजबूती प्रदान की जाए। यह दृष्टि सांस्कृतिक विमर्श को गतिमान बनाती है। 

समकालीन हिन्दी आलोचना बहुमुखी धाराओं के साथ आगे बढ़ रही है। आलोचना की मात्रा तो बहुत अधिक है, परन्तु उसके लेखन के प्रतिमान निश्चित नहीं हैं। रचना के तथ्यों का आलोचक वर्णन करके आगे बढ़ जाता है, जहाँ रचना की प्रशंसा तो है, परन्तु मूल्यांकन नहीं। इस बारे में डॉ. सिंघवी का मत है, “हिन्दी आलोचना में आज सर्वाधिक आवश्यकता समकालीन रचनाशीलता की प्रवृत्तियों की पहचान कर आलोचना के प्रतिमान निर्मित किए जाने की है, ताकि आलोचना की भावी दिशा सही गंतव्य की ओर बढ़ सके। इससे भारतेन्दुकाल से जन्मी, शुक्ल काल में विकसित और शुक्लोत्तर काल में चरम तक पहुँची हिन्दी आलोचना वैश्विक साहित्यिक आलोचना के समकक्ष स्तर को प्राप्त कर सके।“[20] अतः यह चिंतन का विषय है कि हमारी सांस्कृतिक परिधि में रचनागत मूल्यांकन सभ्यता के विकास के साथ श्रेयकारी रहेगा।

समग्रतः मानवीय चेतना भाव और तथ्य के किनारों को स्पर्श करती हुई प्रवाहित होती है। जब वह ‘भाव’ को स्पर्श करती है तब काव्य और कला की सृष्टि होती है और जब यह तथ्य को स्पर्श करती है तो दर्शन और विज्ञान का विकास होता है। साहित्य के इतिहास को मनुष्य-जीवन के अखंड प्रवाह का इतिहास माना है। काव्य, साहित्य, ज्ञान, विज्ञान, कला, दर्शन के मूल में मानवीय चेतना को लक्षित किया जाना अपेक्षित है। आलोचना में सांस्कृतिक बोध विषय पर गंभीर चिंतन आवश्यक है। डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी जी ने अपनी आलोचनात्मक दृष्टि को उस ओर उन्मुख किया है। अतः सांस्कृतिक विमर्श को आधुनिक आलोचना में समृद्ध करने का यह प्रयास स्तुत्य है।

संदर्भ 
1. समवेत, उदयपुर, जुलाई-दिसम्बर, 2021
2. हिंदी अनुशीलन, प्रयागराज, अक्टूबर-दिसंबर, 2023
3. राष्ट्रबोध, संस्कृति एवं साहित्य, पृष्ठ 55
4. साहित्यिक निबंध, पृष्ठ 84 
5. आचार्य तुलसी की काव्य-साधना, पृष्ठ 236 
6. साहित्य का सांस्कृतिक पक्ष, पृष्ठ 118 
7. समवेत, उदयपुर, जुलाई-दिसम्बर, 2025 
8. मधुमती, उदयपुर, मार्च, 2021 
9. गगनांचल, नई दिल्ली, जनवरी-अप्रैल, 2024 
10.भावक, आगरा, अक्तूबर-दिसम्बर, 2022 
11.कबीर: दृष्टि एवं आधार, पृष्ठ 57 
12.अपनी माटी, चित्तौड़गढ़, जनवरी-मार्च, 2024
13.साक्षात्कार, भोपाल, जनवरी, 2018 
14.साहित्यिक निबंध, पृष्ठ 126  
15.वही, पृष्ठ 133 
16.गवेषणा, आगरा, अक्टूबर-दिसंबर, 2020 
17.हिन्दी अनुशीलन, प्रयागराज, जनवरी-मार्च, 2018
18.मधुमती, उदयपुर, सितंबर, 2024  
19.शब्दघोष, जयपुर, जुलाई-सितंबर, 2024
20.हिन्दी आलोचना: निकष एवं प्रतिमान, पृष्ठ 1 
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जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान

 


जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान

साहित्य परिक्रमा के जनवरी-मार्च, 2026 अंक में प्रकाशित

राजस्थान की समृद्ध साहित्यिक विरासत में जैन साहित्य का एक विशिष्ट स्थान है। यह साहित्य केवल धार्मिक उपदेशों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के इतिहास, उसकी सामाजिक संरचना और भाषायी परम्परा को समझने के लिए एक अमूल्य स्रोत के रूप में कार्य करता है। जैन मुनियों, आचार्यों और श्रावकों द्वारा रचित इस साहित्य ने जैन धर्म के सिद्धांतों, तीर्थंकरों की महिमा, मंदिरों के उत्सवों और संघ यात्राओं का विस्तृत वर्णन किया है। इसकी विशालता और विविधता उल्लेखनीय है। जैन समुदाय की ज्ञान-संरक्षण और साहित्य सृजन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के कारण इसने अन्य समकालीन साहित्यिक परंपराओं की तुलना में अधिक मात्रा में साहित्य का निर्माण करने में सक्षम बनाया। जैन समुदाय की संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण है कि चातुर्मास में साधुओं द्वारा चिंतन, मनन और प्रवचन के साथ-साथ लेखन-पठन के कार्य पर दिए गए महत्व के कारण विपुल साहित्यिक धरोहर प्राप्त हुई। भारतीय परंपरा में जैन दर्शन और संस्कृति अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है। यह स्थिति प्राकृत, संस्कृत, राजस्थानी और विभिन्न स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध विपुल जैन साहित्य से प्रमाणित होती है। यह साहित्य आगम, पुराण, कथा, चरित्र, काव्य और निबंध जैसे विविध रूपों में उपलब्ध है, जो इसकी बहुआयामी प्रकृति को दर्शाता है ।

राजस्थानी जैन साहित्य में समालोचनात्मक लेखन की एक सुदृढ़ परंपरा रही है, जिसमें 'टीका', 'बालावबोध' और 'टब्बा' जैसे शब्द प्रमुखता से प्रयुक्त होते हैं। इन तीनों का मूल उद्देश्य ग्रंथों को स्पष्ट करना था, किंतु उनकी प्रकृति और विस्तार में भिन्नता थी। टीकाएँ मूलतः संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश जैसी भाषाओं में रचित जटिल धार्मिक और उपदेशात्मक ग्रंथों को जनसाधारण के लिए सुगम बनाने के उद्देश्य से लिखी गईं। जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति और नैतिक उत्थान आदि को प्राप्त करने के उद्देश्य से इन टीकाओं का विकास हुआ। यह ज्ञान की सर्वव्यापकता और जटिल दार्शनिक अवधारणाओं को सरल एवं व्यावहारिक रूप में जन सामान्य तक पहुँचाने की एक अनुपम पहल थी, जिससे धर्म अधिक प्रभावशाली और उपयोगी बन सके।

‘टीका’ मूलतः किसी संस्कृत, प्राकृत या अपभ्रंश ग्रंथ पर लिखी गई एक विस्तृत व्याख्या या भाष्य होती थी। इसका लक्ष्य मूल पाठ के गहन अर्थों, दार्शनिक अवधारणाओं और संदर्भों को विश्लेषित करना था, जो प्रायः विद्वानों और गंभीर अध्येताओं के लिए होती थी। ‘बालावबोध’ बालकों या सामान्य गृहस्थों के लिए मूल रचना का विस्तृत और सरल स्पष्टीकरण होता था। जैन कवियों का उद्देश्य जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति पैदा करना था और तत्त्वज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती का समाधान करने के लिए बालावबोध एक सरल, सरस, सहज और बोधगम्य शैली में लिखा जाता था, जिससे जैन धर्म के सिद्धांतों को जनसाधारण तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सके। ‘ टब्बा’ मूल रचना के स्पष्टीकरण के लिए पत्र के किनारों पर लिखी गई संक्षिप्त टिप्पणियाँ होती थीं। ये त्वरित संदर्भ और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में सहायक होती थीं।

वस्तुतः मूल जैन आगम ग्रंथ प्रायः प्राकृत या संस्कृत में थे, जो सामान्य जन के लिए कठिन थे। इस कठिनाई को दूर करने के लिए, विभिन्न स्तरों की व्याख्याएँ आवश्यक थीं। टीकाएँ विद्वानों की सन्दर्भ सहायिका थीं, बालावबोध जटिल दार्शनिक और धार्मिक अवधारणाओं को सरल बनाकर व्यापक जनता तक पहुँचाते थे और टब्बा त्वरित स्पष्टीकरण प्रदान करते थे। इन विविध व्याख्यात्मक पद्धतियों का प्रयोग यह दर्शाता है कि जैन विद्वानों ने ज्ञान के प्रसार के लिए एक बहु-स्तरीय और समावेशी दृष्टिकोण अपनाया। यह केवल एक प्रकार की व्याख्या नहीं थी, बल्कि विद्वानों से लेकर सामान्य पाठकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक सुविचारित शैक्षणिक संरचना थी, जिससे जैन दर्शन की गहराई और व्यापकता सभी स्तरों पर समझी जा सके। यह दृष्टिकोण जैन विद्वानों समालोचना दृष्टि को दर्शाता है, जिसने धार्मिक ज्ञान को केवल एक विशिष्ट वर्ग तक सीमित न रखकर साहित्यिक उपागम बनाकर जनव्यापी बनाया।

राजस्थानी जैन टीका साहित्य का विकास विभिन्न शताब्दियों में अनेक प्रतिभाशाली विद्वानों और संतों के योगदान से हुआ। इन टीकाकारों ने न केवल जैन धर्म के सिद्धांतों को स्पष्ट किया, बल्कि अपने लेखन के माध्यम से तत्कालीन समाज, संस्कृति और इतिहास का भी महत्त्वपूर्ण चित्रण किया। जैन संस्कृति की दृष्टि से राजस्थान में अभूतपूर्व साहित्य लिखा गया। 5वीं शती में आचार्य सिद्धसेन ने जैन-दर्शन पर आधारित ग्रंथ ‘सम्मई सूत्र’ की रचना की। यह ग्रंथ राजस्थान का प्राकृत भाषा में रचित प्रथम ग्रंथ है। उद्योतन सूरि ने 835 विक्रम संवत में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ की रचना की। यद्यपि यह ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखा गया था,  इसमें ‘मरुभाषा’  अर्थात् राजस्थानी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मरुभाषा का यह प्रारंभिक उल्लेख यह दर्शाता है कि राजस्थानी भाषा का साहित्यिक उपयोग बहुत प्रारंभिक काल से ही हो रहा था और जैन विद्वान इसके विकास में अग्रदूत थे। यह भाषा और धर्म के बीच एक अन्योन्याश्रित संबंध स्थापित करता है, जहाँ धार्मिक उपदेशों के प्रसार ने स्थानीय भाषा के साहित्य का मानकीकरण किया।

इसी तरह षटखंडागम’ ग्रंथ पर आधारित आचार्य वीरसेन रचित ‘धवला’ नामक टीका अद्वितीय है। इसमें 72000 श्लोक संस्कृत और प्राकृत भाषा में है। आठवीं शती के जैन आचार्य हरिभद्रसूरि ने कथाउपदेशयोगदर्शन आदि से संबंधित 1444 ग्रंथों की रचना की तथा संस्कृत-प्राकृत में एक लाख पचास हजार श्लोक लिखे। प्रमुख ग्रंथों में समराइच्च कहा’, ‘शास्त्र वार्ता समुच्चय’, ‘धूर्ताख्यान’, ‘योग शतक’, ‘योग बिंदु, ‘योग दृष्टि समुच्चय’, ‘संबोध प्रकरण’ आदि उल्लेखनीय हैं। 10वीं शताब्दी में सिद्धर्षि नामक संत कवि ने भीनमाल में ‘उपमिति भव प्रपंच कहा’ नामक एक महत्वपूर्ण रूपक ग्रंथ की रचना की। इसके अतिरिक्त  जिनप्रभ सूरि द्वारा प्रणित ‘तीर्थकल्प’ और मुनि चन्द्र का ‘अमर अरित’ भी राजस्थानी जैन साहित्य की सुदृढ़ नींव निर्मित करती है।

यह साहित्य मुख्यतः धार्मिक और नैतिक होने के बावजूद, इसका व्यापक प्रभाव केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। इसमें तत्कालीन सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों को भी इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षित किया गया। यह दर्शाता है कि धार्मिक साहित्य केवल उपदेशात्मक नहीं होता, बल्कि अपने समय के जीवन का एक महत्वपूर्ण दर्पण भी बन जाता है, जिससे शोधकर्ताओं को बहुआयामी अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए, ‘जयधवला टीका’, ‘गद्य कथामृतक’ और ‘उत्तर पुराण’ जैसे ग्रंथों में प्राचीन राष्ट्रकूट या राठौड़ वंश के शासकों का इतिहास मिलता है। इसी प्रकार समराइच्च कहा में पृथ्वीराज चौहान कालीन प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था का उल्लेख है और ‘कुवलय माला’ में प्रतिहार शासक वत्सराज के शासन और समाज का वर्णन है। इस प्रकार जैन विद्वानों ने, अपने धार्मिक लेखन के माध्यम से, अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक जीवन का एक मूल्यवान अभिलेख प्रस्तुत किया जिससे यह साहित्य इस प्रकार धार्मिक और लौकिक ज्ञान की अनुपम छटा प्रस्तुत करता है।

12वीं शताब्दी से राजस्थानी जैन साहित्य में प्रबंध-काव्य, फागु और चौपाई जैसे नए काव्य रूप प्रमुखता से उपलब्ध होने लगे। इस काल में साहित्यिक प्रयोगशीलता बढ़ी, और जैन कवियों ने विभिन्न शैलियों में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। 13वीं शताब्दी में ‘जिनदत्त चौपई’ (सं.1354) जैसी हिंदी पद्य रचनाएँ भी मिलती हैं, जो इस काल में भाषायी विविधता को दर्शाती हैं। मध्यकाल (विक्रम संवत 1600 से 1900) राजस्थानी जैन साहित्य के लिए अत्यंत उर्वर काल था। इस युग में कुशललाभ, हीरकलश, समयसुंदर, हेमरत्न, जटमल, लब्धोदय, मोहनविजय, विनय-लाभ, दामोदर, लाभवर्धन, विनयप्रभ, भतिकुशल, राजविजय, कल्याण कलश, रामचंद, रिखसाधु, वीरविजय, उत्तमविजय और हुलासचंद जैसे शताधिक जैन कवियों ने महत्वपूर्ण रचनाएँ कीं। इन कृतियों का महत्त्व राजस्थानी साहित्य के लिए ये मूल्यवान हैं ।

पार्श्वचंद्र सूरि (16वीं शताब्दी) के एक प्रमुख जैन संत टीकाकार के रूप में ख्यातिप्राप्त हुए। उन्होंने ही सबसे पहले राजस्थानी गद्य में भाषा टीकाएँ लिखना प्रारंभ कीं, जिसका आगे चलकर बहुत प्रचार हुआ। यह एक युगांतरकारी कदम था जो जैन साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण  भाषायी और शैलीगत परिवर्तन को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति केवल अनुवाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह जटिल आगम ग्रंथों को सीधे और सरल राजस्थानी गद्य में व्याख्यायित करके ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने की एक सचेत पहल थी, जिससे मौखिक परंपराओं से लिखित, व्याख्यात्मक गद्य की ओर उन्मुख हुआ। इस नवाचार ने धार्मिक ज्ञान का लोकतंत्रीकरण किया तथा इसे विद्वानों की व्याख्या या काव्यात्मक प्रस्तुति के दायरे से निकालकर स्थानीय भाषा में स्पष्टीकरण के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाया, जिससे राजस्थानी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिला। इसी कालखंड में खरतरगच्छ के संत कवि महोपाध्याय पुण्यसागर ने वि. सं. 1604 में ‘सुबाहु संधि’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें 89 पद्य हैं। उनके शिष्य पद्मराज की ‘अभयकुमार चौपई’ एक प्रसिद्ध रचना है, जो वि.सं. 1650 में में लिखी गई थी।

इसी परम्परा में दौलतराम काजीवाल, टोडरमल, गुमानीराम, दीपचन्द्र कासलीवाल, जयचन्द्र शांघड़ा, सदासुख कासलीवाल का नाम जैन टीकाकारों में उल्लेखनीय हैं। ये 18वीं और 19वीं शताब्दी के प्रमुख विद्वान थे, जिन्होंने टीका लेखन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से अधिकांश हिंदी के विद्वान थे। 18वीं-19वीं शताब्दी में इन विद्वानों का उदय यह दर्शाता है कि जैन टीका लेखन परंपरा भाषायी रूप से गतिशील और अंतर-क्षेत्रीय थी। यह केवल राजस्थानी तक सीमित नहीं थी, बल्कि हिंदी के माध्यम से एक व्यापक बौद्धिक संवाद का हिस्सा थी। यह प्रवृत्ति जैन विद्वानों की बहुभाषी दक्षता और उनके ज्ञान को विभिन्न भाषायी समुदायों तक पहुँचाने की प्रतिबद्धता को उजागर करती है, जिससे जैन साहित्य की पहुँच और प्रभाव का विस्तार हुआ।

जैन विद्वानों ने न केवल धार्मिक ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं, बल्कि व्याकरण, छंद, अलंकार, काव्य, वैद्यक और गणित जैसे विविध धर्मेतर शास्त्रों पर भी महत्वपूर्ण समालोचनात्मक कार्य किया। व्याकरण-शास्त्र अंतर्गत 'बाल शिक्षा', 'उक्ति रत्नाकर', 'पंच-सन्धि बालावबोध', 'हेम व्याकरण भाषा टीका', 'सारस्वत बालावबोध'; छंद शास्त्र में 'पिंगल शिरोमणि', 'दुहा चन्द्रिका', 'राजस्थानी गीतों का छन्द ग्रंथ', 'वृत्त रत्नाकर बालावबोध' और अलंकार-शास्त्र सम्बंधित 'वाग्मट्टालंकार बालावबोध', 'विदग्ध मुखमंडन बालावबोध', 'रसिक प्रिया बालावबोध'; काव्य टीकाओं में 'भर्तृहरिशतक-भाषा टीका त्रय', 'अमरुशतक', 'लघुस्तव बालावबोध', 'किसन-रुक्मणी की टीकाएँ', 'धूर्ताख्यान कथासार', 'कादम्बरी-कथा सार'; वैद्यक-शास्त्र आधारित 'माधवनिदान टब्बा', 'सन्निपात कलिका टब्बाद्वय', 'पथ्यापथ्य टब्वा', 'वैद्य जीवन टब्बा', 'शतश्लोकी टब्बा' तथा गणित-शास्त्र पर 'लीलावती भाषा चौपाई', 'गणित सार चौपाई' आदि टीकाएँ राजस्थानी समालोचना की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

राजस्थानी जैन टीका साहित्य की विशालता और महत्व को देखते हुए, इसकी पांडुलिपियों का संरक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। राजस्थान में जैन शास्त्र भंडारों की संख्या सर्वाधिक है, जो लगभग सभी प्रमुख नगरों और कस्बों में पाए जाते हैं। इन भंडारों में संस्कृत, अपभ्रंश, हिंदी और राजस्थानी भाषाओं में सैकड़ों अज्ञात और दुर्लभ ग्रंथ प्राप्त हुए हैं। यद्यपि इन भंडारों की पूरी सूची अभी तक तैयार नहीं हो पाई है, अनुमान है कि राजस्थान में दिगंबर और श्वेतांबर शास्त्र भंडारों की संख्या 200 से अधिक हैं। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर एवं  जैन विश्व भारती, लाडनूं का योगदान स्मरणीय है। इसके अतिरिक्त जयपुर  और जैसलमेर के जैन शास्त्र भण्डार में  सैकड़ों अज्ञात ग्रंथ और पांडुलिपियाँ शोध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

जैन टीका साहित्य का महत्त्व एक साहित्यिक विधा के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार आंदोलन के रूप में भी स्थापित करता है। यह साहित्य अपने समय में एक प्रभावी माध्यम था जिसने जैन सिद्धांतों को जनसाधारण के नैतिक आचरण और जीवनशैली में एकीकृत किया। 'जन-शैलीऔर 'सरल, सरस, सहज एवं बोधगम्य शैलीको अपनाने का निर्णय एक सचेत प्रयास था ताकि जटिल सिद्धांतों को लोगों के दैनिक जीवन में आत्मसात किया जा सके। इस व्यावहारिक अनुप्रयोग और व्यापक पहुँच ने एक विशिष्ट 'जैन शैली' का विकास किया, जो स्पष्ट, नैतिक और सुलभ धार्मिक प्रवचन का पर्याय बन गई।

समग्रतः राजस्थानी भाषा में लिखित जैन टीका साहित्य एक असाधारण रूप से समृद्ध और बहुआयामी साहित्यिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इस साहित्य ने न केवल जैन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को संरक्षित और प्रसारित किया, बल्कि राजस्थानी भाषा के विकास, स्थानीय लोक संस्कृति के संरक्षण और तत्कालीन सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भों के दस्तावेजीकरण में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैन विद्वानों ने विविध काव्य रूपों जैसे-रास, चौपाई, फागु का उपयोग करके धार्मिक ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पार्श्वचंद्र सूरि जैसे अग्रदूतों द्वारा राजस्थानी गद्य में टीका लेखन की शुरुआत ने भाषायी नवाचार को प्रेरित किया और स्थानीय बोलियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में विकसित किया। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास, प्रशासन और सामाजिक जीवन के लिए ये ग्रन्थ अमूल्य प्राथमिक स्रोत प्रदान करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक लेखन भी अपने समय के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य का एक मूल्यवान अभिलेख बन सकता है।

आधार ग्रन्थ

1.      पं. अम्बालाल प्रे. शाह, जैन साहित्य का वृहद् इतिहास, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संसथान, वाराणसी, सं. 1969

2.      डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन शास्त्र भंडारों की ग्रन्थ सूची, भारतीय श्रुति-दर्शन केंद्र, जयपुर, सं. 1957

3.      डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन संत, श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, महावीरजी, जयपुर, सं. 1967

4.      डॉ. नरेन्द्र भानावत (सं.), जैन संस्कृति और राजस्थान, जिनवाणी विशेषांक, सम्यग्ज्ञान प्रचारक में डल, जयपुर, सं. 1975

5.   डॉ. नरेन्द्र भानावत, जैन दर्शन तथा साहित्य का भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा पर प्रभाव, श्री जिनदत्तसूरि में डल, दादावाडी, अजमेर, सं.1980

6.      नाथूराम प्रेमी, जैन साहित्य और इतिहास, हिंदी ग्रन्थ रत्नाकर लिमिटेड, बम्बई, सं. 1956

7.      नाहटा, कासलीवाल, भानावत एवं सेठिया, राजस्थान का जैन साहित्य, प्राकृत भारती, जयपुर, सं. 1977

8.      डॉ. मनमोहनस्वरूप माथुर, राजस्थानी जैन साहित्य, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, सं.1999

9.      डॉ. हीरालाल जैन, भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान, मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद्, भोपाल, सं. 1962


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