युवा कवि और उनकी कविताएँ

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका 
अपनी माटी
 अक्टूबर-2013 अंक 
              
युवा कवि और उनकी कविताएँ

विपुल शुक्ला  -क्षणिकाएँ, मैं और मैं, बात, बुधिया
        अखिलेश औदिच्य - अभिशप्त, गुड़िया, चाँद-रोटी, पिता, दंगों पर
         माणिक - गुरूघंटाल, माँ-पिताजी, त्रासदी के बाद आदिवासी ।



यदि इन कविताओं का मूल्यांकन किसी बने बनाये साँचे में न किया जाय, तो ऐसा लगेगा कि यही कविता का वर्तमानहै। इन कविताओं की छोटी-छोटी पंक्तियों के बीच केमरे के फ्लेश की भांति हमारे बीच का समय गुजरता हुआ दिखाई देता है। छोटे-छोटे संकेत भयावह विडम्बनाओं की ओर इशारा करते हैं तो आदमी को पंगु बनाने की कोशिश के प्रतिरोध में तीखी प्रतिक्रिया भी मिलती है।यहाँ सपनों की उड़ान नहीं, बल्कि हकीकत के धरातल पर बेबाक टिप्पणियों से झिंझोड़ने की तरूण कोशिश है। विचारों को परोसने का अंदाज़ इतना लज़ीज है, कि पता ही नहीं चलता कि खूबसूरती भाव में है या भाषा में।


इस सच से कोई भी इनकार नहीं करेगा कि भूख और शोषण आज भी मानवता का सबसे बड़ा कलंक बनकर हमारे सामने खड़ा है। सदियों से चली आ रही परम्परा जीवो जीवस्य भोजनम्की मौन-स्वीकृति संवेदनशील व सृजनशील इंसान को विद्रोह पर उतारू करने के लिए काफी है। यदि रामैया को काम नहीं मिला तो थाली में रोटी की जगह चाँद दिखेगा और रोटी आसमान में टंगी रह जाएगी । इस दर्द भरे दृश्य के बाद भी रामैया के सब्र की पराकाष्ठा हमारी चेतना को कैसे सोने दे सकती है-


जिस दिन चाँद आता है थाली में

ना जाने क्यों उस दिन

भूख ही नहीं लगती ।                ( चाँद-रोटी )


दूसरा दृश्य, बुधिया जैसी बच्ची अपने परिवार को पाल रही है, बीमारी से अब मरणासन्न है । छुटकी को आभास है कि यह जिम्मेदारी उसे ढोनी है, पर काम पर जाने के लिए उसके पास कपड़े नहीं है । छुटकी का यह कथन हमारा खून सुखा देने के लिए काफी है-


सच ! मैं सब कर लूँगी

सबको संभाल लूँगी ।

बस जब जीजी मर जाए

तो उसके कपड़े उतार कर

चुपके से मुझे दे देना ।                (बुधिया)


इतना ही नहीं इसी भूख और शोषण का कहर आदिवासी जीवन पर भी आ गिरा है, जो कभी अभी अपनी सीमाओं में जीवन जीता रहा, जंगलों, पहाड़ों, गुफाओं में उल्लसित रहा । उसी को अब इस सभ्य समाज ने नहीं छोड़ा, तो परिणाम सामने है-


लकीरें खींच गई हैं उनके माथों पर

कुछ सालों से

हाथों में आ गए हैं उनके अनायास

तीर कमान और देसी कट्टे

अपने बचाव में/तन गए हैं ये सभी ।        (आदिवासी)


ज्यों-ज्यों हम भू-मण्डल की ओर उन्मुख होते हैं, बाजार का घेरा फाँस लगाकर अपनी ओर खींचता है। अर्थसे लकदक इस दुनिया में यदि हमने कुछ खोया है तो वह है- रिश्तों की बुनियाद। बुजुर्गों से भरी हुई कोलोनियाँ, पोते-पोतियों, नवासों को तरसती दादी-नानी की सूनी गोदियाँ इसकी गवाह हैं। लेकिन इस पीड़ा को आज का यह तरूण कवि पहचान रहा है, जो सुनहले स्वप्न का आभास देती है, वह कहता है-


माँ के लिए स्व हूँ मैं,

और माँ/दुनिया में सबसे बड़ी स्वार्थी है ।        (क्षणिकाएँ)


और पिता के वात्सल्य में डूबा हुआ बचपन की यादों को ताजा करती हुई पंक्तियाँ-


जब नींद नहीं आती थीं मुझे

आप चिपका लिया करते/अपने सीने से

और थपकियाँ देते

गुनगुनाते थे हमेशा एक ही

अपना पसंदीदा धुन ।                    (पिता)


परन्तु, हम गाँव छोड़कर शहर में आ गए हैं। माँ-बाप पथराई आँखों से इंतजार करते हैं और हमें वक्त ही नहीं मिलता। तब-


उनके पास सब्र रखने के सिवाय

अब कोई रास्ता भी तो नहीं रहा अफ़सोस

वे मेरे आने का सिर्फ़ इंतज़ार ही कर सकते

वे दोनों के दोनों ।

खुद से ही पूछते होंगे, बार-बार मेरे आने की खबर,

फिर देर तक चुप हो जाते होंगे ।        

(माँ-पिताजी)


नई पीढ़ी समसामयिक घटनाओं पर मुखर है । दंगों को देखकर आक्रोशित है, उत्तराखंड की त्रासदी के बाद विचलित है तो धर्म के नाम पर ढोंग की बखिया उधेड़ने में पीछे नहीं है । वह साफगोई से स्वीकार करता है-


भगवान है/पहचानता हूँ ।

भगवान सब कर सकता है/मानता हूँ ।

भगवान कुछ नहीं करता/जानता हूँ ।      (क्षणिकाएँ)


साथ ही भगवान से शिकायत भी करता है-


ओ मेरे खुदा । 



डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

युवा समीक्षक

महाराणा प्रताप राजकीय

 स्नातकोत्तर महाविद्यालय

चित्तौड़गढ़ में हिन्दी

प्राध्यापक हैं।

आचार्य तुलसी के कृतित्व

और व्यक्तित्व

पर शोध भी किया है।

स्पिक मैके ,चित्तौड़गढ़ के

उपाध्यक्ष हैं।

अपनी माटी डॉट कॉम में

नियमित रूप से छपते हैं।

शैक्षिक अनुसंधान और समीक्षा 

आदि में विशेष रूचि रही है।


मो.नं. +91-9828608270

डाक का पता:-
सी-79,प्रताप नगर,

चित्तौड़गढ़
अब थोड़ा वक्त निकाल भी लो,

इंसान को/अपने ही खून की

लत लग गई है ।                (दंगों पर)



जब भगवान के नाम पर मठ खोलकर गुरू-घंटाल अपनी दुकानें चलाते हैं और धर्म के नाम पर भोली जनता को गुमराह करते हैं तो वह कह उठता है-


हम गुरू नहीं कहला सके इस सदी में

मुआफ़ करना हम नहीं जमा सके

अपनी झाँकी/ न हम खरे उतर सके

तुम्हारे तेल-मालिश-चंपी के मापदंडों पर ।        (गुरू-घंटाल)


भावों को संवारने का काम भाषा करती है। उस भाषा में आँचलिक शब्दावली की सौंधी गंध प्रविष्ट हो जाय तो रस की धारा बहने लगती है, बिम्ब आँखों के सामने उतरने लगता है।आँचलिक शब्दावली से युक्त कुछ पंक्तियाँ हैं-


(1) इस पहले तेवार भी बैठने आए थे

   गाँव गुवाड़ी के मोतबीर लोग आदतवश

(2) बाप तो दारूखोर है ।

(3) जमात इकट्ठी हुई, दिहाड़ी मजदूरों की ।

(4) गले में लटकाए चटकों की मालाएँ ।



इसी तरह बिम्बात्मक पदावलियाँ-


(1) वाकई खुदा बड़ा व्यस्त है ।

(2) चश्मे में पिरोई धुंधलाई आँखें ।

(3) चौराहे की तरह पड़ा हूँ सड़क पर ।

(4) होक वाली चाँदी या भोडर की राखियाँ ।


सच यह है कि इन युवा कवियों की ये ताजा कविताएँ चाहे किसी वर्ग की धारा हो या न हो, इनमें किसी बड़े कवि की छाया हो या न हो, किसी बड़ी पत्रिका में छपने का इनका माद्दा हो या न हो, पर आम आदमी की धड़कन को उसी के अंदाज़ में स्वर देने का साहस इन्हें ऊँचाई तक पहुँचाएगा ।



'माटी के मीत-2' आयोजन रिपोर्ट


चित्तौड़गढ़ 29 सितम्बर,2013

राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर और अपनी माटी के संयुक्त तत्वाधान में 29 सितम्बर,2013 को सेन्ट्रल अकादमी सीनियर सेकंडरी स्कूल,सेंथी,चित्तौड़गढ़ में माटी के मीत-2 आयोजन के बहाने सौ रचनाकारों और बुद्धिजिवियों वर्तमान परिदृश्य पर चिंतन किया।


प्रख्यात पुरातत्त्वविद मुनि जिनविजय की स्मृति में हुए इस विमर्श प्रधान कार्यक्रम के पहले सत्र में शिक्षाविद डॉ ए एल जैन ने मुनिजी के त्यागमयी जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला।बकौल डॉ ए एल जैन एक सादा आदमी जीवन पर्यन्त अपने पढने-लिखने के अनुभवों सहित किस कदर समाज में यथायोग्य अधिकतम दे सकता है इसका सशक्त उदाहरण है मुनि जिनविजय। सतत घुमक्कड़ी के बीच भी प्राच्य विद्या से जुड़े दो सौ ज्यादा ग्रंथों को संपादित कर प्रकाशित करवाया।मुनी जी ने अपने चौतरफा संपर्क से धार्मिक उत्थान के साथ ही इतिहास के सन्दर्भ में भी बहुत मायने वाले कार्य किए हैं।

इस अवसर पर कवि,चिन्तक और निबंधकार डॉ सदाशिव श्रोत्रिय ने पहले सत्र के मूल विषय की प्रस्तावना में यह बात रखी कि एक इंसान को अपनी बेहद ज़रूरी आवश्यकताओं  के पूरे हो जाने के बाद उसे एक पहचान की तलब लगती है।इस प्रक्रिया में एक लेखक कई दौर से गुज़रता है।एक वो ज़माना था जब सम्पादक बड़े मुश्किल से छापने को राजी होते थे और अब हालात यह कि हर कोई लेखक है।असल साहित्य को पहचान पाना जितना मुश्किल काम है उतना ही मुश्किल काम है इन अनगिनती के साहित्यकारों में सही की पहचान पाना।हमारे लिए इस युग में साहित्य और साहित्यकार अब इतना अमहत्वपूर्ण नहीं रह गया है।जीवन को रसमय और गहरा बनाने का दायित्व भी इसी साहित्य के खाते में आता है।अगर सूर,मीरा,शमशेर,तुलसी नहीं होते तो हम कितना नीरस जीवन जी रहे होते।एक बात और कि कम से कम साहित्यकार,लेखक और कवि हो जाना कोई करिअर बनाना तो नहीं ही है।एक अच्छी कविता सुनना और लिखना एक अनुभव संसार से गुज़रना है।

अलवर से आये आलोचक डॉ जीवन सिंह ने बतौर मुख्य वक्ता कहा कि यह समय बड़ी चालाकी से हमें जड़विहीन कर रहा है।इस बाज़ार ने लेखक से लेकर किसान तक को इस कदर मजबूर कर दिया है कि इधर लेखक अभिजात्य संस्कृति का जीवन जीते हुए नीचे तबके के दर्द को हुबहू अनुभव नहीं कर पा रहा है और उधर वंचित वर्ग के आगे आत्महत्या के सिवाय कुछ भी चारा नहीं रहा। यह बड़ी विडंबना का वक़्त है जिसमें अब एक सार्थक विचार की ज़रूरत है।एक और ज़रूरी बात यह कि लेखक जब दौलत से जुड़ जाता है तो वह डरपोक और कायर हो जाता है।उसके लिए विद्रोह का मतलब कविता में विद्रोह की बात तक सिमित रह जाता है। आज रचनाकार समाज धड़ों में बाँट गया है,दिल तब अधिक दर्द करता है जब एक वर्ग आभासी यथार्थ को यथार्थ समझ बैठता है।इधर हम जिस बात पर बड़े खुश है कि हमारा बेटा फला देश में बड़े पॅकेज पर नौकरी लग गया है जबकि असल में वह बाजारवाद और उपभोक्तावाद का शिकार ही है। उसने अपने जीवन को दूसरों को सौंप दिया है।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान साहित्य अकदामी अध्यक्ष वेद व्यास ने कहा कि अभी बहुत ठीक स्थितियां नहीं जब साहित्यकार ने  अपने आप को समाज से अलग कर लिया है।उसने अपना पक्ष तक रखना बंद कर दिया है।इस रवैये को देखकर हमारी यह यात्रा बड़ी घातक हो चली है।इन सालों में एक भी लेखक ऐसा नहीं मिला जिसने सत्ता के विरोध में अपना बयान दिया हो या फिर नौकरी गंवाई हों।इस व्यवस्था का दबाव जब तक लेखक पर रहेगा वह सच नहीं कह पाएगा।जब तक रचनाकार समाज में एक व्यापक समझ विकसित नहीं होगी तब तक लेखक होना नहीं होना कोई मायने नहीं रखता है।प्रश्न पूछने और संवाद कायम करने की आदत हमारे इस लेखक समाज में ख़त्म हो गयी है यहीं पर बड़ी गलती हुयी है। मगर घबराने की ज़रूरत नहीं है इस बाज़ार की उम्र पचास साल से ज्यादा नहीं है,हमें लौटकर फिर वहीं आना है।इस पहले सत्र का संचालन युवा समीक्षक डॉ कनक जैन ने किया।सत्र के आखिर में युवा विचारक डॉ रेणु व्यास की लिखी शोधपरक पुस्तक  'दिनकर:सृजन और चिंतन' का मंचस्थ अतिथियों ने विमोचन किया।

संस्थान सचिव डालर सोनी ने बताया कि दूसरे सत्र का विषय कविता का वर्तमान था जिसमें चित्तौड़ के तीन युवा कवियों के कविता पाठ से सार्थक और रुचिकर बनाया।जहां प्रगतिशील युवा विपुल शुक्ला ने मुस्कराहट, बुधिया, सीमा  टाईटल से रचनाएं सुनाकर बिम्ब रचने के कौशल का परिचय दिया वहीं रंगकर्मी और अध्यापक अखिलेश औदिच्य ने अभिशप्त, दंगे, रोटी और भूख  और पीता सरीखी कविताओं में अपने समय और समाज की विद्रूपताओं को उकेरा। तीसरे कवि के रूप में अपनी माटी के संस्थापक माणिक ने आदिवासी, त्रासदी के बाद, गुरुघंटाल और मां-पिताजी शीर्षक से रचनाएं प्रस्तुत की जिन्हें सभी ने सराहा। इसी अवसर पर पढ़ी गयी कविताओं पर डॉ राजेन्द्र कुमार सिंघवी ने समीक्षा पाठ करते हुए कहा कि यही कविता का वर्तमान है जहां रचनाकार अपने समय की नब्ज को पहचानने की कोशिश कर रहा है।यह कविता नई पौध जनपदों से निकली रचनाओं का एक नमूना मात्र है।वक़्त के साथ उपजा नक्सलवाद एकदम नहीं उपजा है यह आदिवासी समाज की सीमाओं में हमारी गैरज़रूरी घुसपैठ का नतीजा है।कविता के इन युवा स्वरों में एक तरफ हमारे रिश्तों के बीच की गर्माहट के ठन्डे पड़ने का वर्णन है तो वहीं बाज़ार के प्रभाव में उपजे तथाकथित बाबाओं का दुकानदारी वाला कल्चर निशाने पर रहा।प्रस्तुत कविताओं में आए देशज शब्द अच्छी दिशा का संकेत है।कुलमिलाकर यहाँ आम आदमी की पीड़ा को ठीक से रचने का मंतव्य ज़रूर  पूरा हुआ है।

इसी दूसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए जोधपुर से आए लोकधर्मी आलोचक और कवि डॉ. रमाकांत शर्मा ने अपने भरेपूरे वक्तव्य से कविता के तत्वों की मीमांसा करने के साथ ही आयोजन में प्रस्तुत कविताओं को लेकर भी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ की।उन्होंने कहा कि मेरा विश्वास न भाषण में है न विमर्श में है।विकल्प में मेरी रूचि है।  मैं संवाद में आस्था रखता हूँ। सारे विमर्शों को एक तरफ रख अब असल में मनुष्य विमर्श की ज़रूरत है इसमें स्त्री ,अल्पसंख्यक, आदिवासी और दलित विमर्श अपने आप शामिल हैं।विमर्शों में बांटना अपने आप में विखंडनवाद है। खैर कविता के वर्तमान पर कहना चाहता हूँ कि कवि के चित्त का आयतन बड़ा होना चाहिए जिसमें एक रचनाकार को अपनी आलोचना सुनने के प्रति भी पर्याप्त रुचिवान होना चाहिए। वैसे भी कविता अपने आप में बड़ी ताकत है जिसे केवल केवल अलंकारबाजी समझना बड़ी गलतफहमी होगी। कविता को बनावटीपन से बाहर निकलना ज़रूरी है तभी सहज कविता आ पाएगी। एक और ज़रूरी बात कि कविता महानगरों में नहीं जनपदों में हैं। कविता के वर्तमान में दो तरह की पीढियां रचना कर रही है। एक जो केवल कलाबाज है और चौंकाने में विश्वास करती है। जो केवल शब्दों से खेलते हैं। दूसरे कवि जीवन से जुझते हुए जीते हैं उसे ही कविता में रचते हैं। कृष्ण और राधा से फुरसत मिले तो हम मुर्दे सीने वाले, तांगा चलाने वाले, घर में झाडू-पोछा करने वालों को कविता के नायक बनाएं। आज का युवा लेखक दुनियाभर के कविता संसार को पढ़े बगैर सिर्फ लिखे जा रहे हैं जो लगभग गलत दिशा में रपटना है। डॉ. रेणु व्यास ने इस सत्र का सधा हुआ संचालन किया। 

इस अवसर पर अतिथि वक्ताओं का माल्यार्पण गीतकार अब्दुल ज़ब्बार, अपनी माटी उपाध्यक्ष अश्रलेश दशोरा, स्वतंत्र पत्रकार नटवर त्रिपाठी ने किया। जिले की सात तहसीलों से आए लगभग सौ लेखक और विचारकों ने आयोजन में शिरकत सार्थक की। उपस्थितों में वरिष्ठ अधिवक्ता भंवरलाल सिसोदिया, प्रो सत्यनारायण समदानी, डॉ. श्रीप्रभा शर्मा, डॉ. सुशीला लड्ढा, महेंद्र खेरारू, रजनीश साहू, जयप्रकाश दशोरा, नवरतन पटवारी, अशोक उपाध्याय, डॉ. ए. बी. सिंह, डॉ के. एस. कंग, डॉ. अखिलेश चाष्टा, महेश तिवारी, डॉ नरेन्द्र गुप्ता, डॉ. के. सी. शर्मा, डॉ. रवींद्र उपाध्याय, डॉ. धर्मनारायण भारद्वाज, जी. एन. एस. चौहान, आनंदस्वरूप छीपा, सीमा सिंघवी, सुमित्रा चौधरी, रेखा जैन शामिल थे।

आयोजन में युवा चित्रकार मुकेश शर्मा के बनाए मॉडर्न चित्रों की प्रदर्शनी और शोधार्थी प्रवीण कुमार जोशी के निर्देशन में लगाई लघु पत्रिका प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र रही। इन दसेक मॉडर्न चित्रों और चालीस से अधिक प्रगतिशील पत्रिकाओं के प्रदर्शन से माहौल में प्रभागियों के बीच दिनभर चर्चा बनी रही। आखिर में वक्ता-श्रोता संवाद आयोजित हुआ जिसका संचालन डॉ. चेतन खिमेसरा ने किया। संवाद में प्रो भगवान् साहू, डॉ. कमल नाहर, डॉ. नित्यानंद द्विवेदी, मुन्ना लाल डाकोत, चन्द्रकान्ता व्यास, डॉ. राजेश चौधरी, कौटिल्य भट्ट ने अपनी संक्षिप्त टिप्पणियाँ दी। अपनी माटी के अध्यक्ष,समालोचक और कवि डॉ. सत्यनारायण व्यास ने आभार दिया।

रिपोर्ट माणिक,चित्तौड़गढ़ 
आयोजन की ऑडियो रिपोर्ट 

राष्ट्रीय-चिंतन के परिप्रेक्ष्य में पं. सोहन लाल द्विवेदी का काव्य

राष्ट्रीय-चिंतन का उद्देश्य समष्टि में आत्म-गौरव की भावना का निर्माण कर उसे उन्नति के पथ पर अग्रसर करने में है । राष्ट्रीय-भावना को स्पष्ट करते हुए डॉ. गोविन्द राम शर्मा ने लिखा है- “ जाति या राष्ट्र के व्यक्तियों की एक साथ मिल कर रहने और सामूहिक रूप में अपनी तथा अपने देश को उन्नत बनाने की इच्छा ही राष्ट्रीय भावना कहलाती है ।” इसमें अपने देश के लिए अगाध भक्ति, अपनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति गौरव, विदेशी शासन के प्रति घृणा और अपने देश की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक दशा में सुधार की भावना निहित होती है । 

सन् 1920 ई. के लगभग भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की बागडोर महात्मा गाँधी के पास आ गई थी । उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन जनव्यापी बन रहा था, किन्तु जातीय भेद, साम्प्रदायिक वैमनस्य, भाषायी विविधता आदि ऐसे कई तत्त्व थे, जो राष्ट्रीय-एकता में बाधक   थे । इन विभेदक तत्त्वों को पहचानते हुए हिन्दी की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा के कवियों ने राष्ट्रीय-भावना को मुखरित किया । उनमें राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ माखन लाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, पं. सोहन लाल द्विवेदी के नाम उल्लेखनीय हैं ।

 राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा के अत्यधिक ओजस्वी कवि रहे हैं। इनके भैरवी, विषपान, वासवदत्ता, कुणाल, युगान्धर, वासंती, झरना, बिगुल, चेतना आदि अनेक काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए । वासवदत्ता, कुणाल, विषपान आदि प्रबंधात्मक रचनाओं के माध्यम से पं. द्विवेदी जी ने अतीत की ओर उन्मुख देश के गौरवशाली इतिहास और भारत की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय-संघर्ष के लिए प्रेरक स्रोत बनाया । 

पं. द्विवेदी ने राष्ट्रीयता का मुक्त कंठ से गान किया था । “भैरवी” के विप्लवी गीतों में कवि के प्राण राष्ट्रीय भावना में बहते हुए से दिखाई देते हैं । राष्ट्र की चेतना को संपूर्ण रूप में प्रस्तुत करते हुए कवि ने स्वयं अपने स्वरों को राष्ट्र-प्रेम पर समर्पित कर उत्साह का संचार किया, यथा-

वन्दना के इन स्वरों में,
एक स्वर मेरा मिला दो ।
वंदिनी माँ को न भूलो,
राग में जब मत झूलो ।
अर्चना के रत्न कण में,
एक कण मेरा मिला लो।।
(भैरवी)

‘युगान्धर’ की सभी कविताओं में राष्ट्रीय-चेतना की जागृति का स्वर विद्यमान है । इसमें बापू के प्रति, रेखाचित्र, बापू गाँधी, गाँधी-ग्राम, सेवाग्राम, भ्रमण, गीत, उगता राष्ट्र, हलधर से, मजदूर, जागो हुआ विहान, हमको ऐसे युवक चाहिए, जो तरूण, ओ नौजवान, प्रयाण-गीत, अभियान-गीत, जागरण, कणिका, बेतवा का सत्याग्रह, विश्राम, कैसी देरी, अनुरोध, गृह त्याग, राजबंदी राष्ट्रकवि, दीनबंधु ऐंड्रज के प्रति, उद्बोधन, राष्ट्रध्वजा, क्रांतिकुमारी, भारतवर्ष शीर्षक कविताओं का संग्रह है, जो राष्ट्रीय-चेतना का संचार करने में सहायक रही है । अभियान-गीत शीर्षक कविता की उक्त पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

सत्याग्रही बने वह, जिसका देश प्रेम से नाता हो ।
प्राणों से भी प्यारी जिसको अपनी भारत माता हो।।
-  -  -  -  -  -
बलिवेदी पर भीड़ लगी है, आज अमर बलिदानों की ।
आज चली है सेना फिर से, धीर-वीर मस्तानों की।।
(युगांधर)

पं. द्विवेदी का काव्य-संग्रह ‘प्रभाती’ में भी राष्ट्रीय जागरण का स्वर मुखरित हुआ है । इस कृति में उन्होंने साहित्य-सृजन पर टिप्पणी करते हुए कहा,“शताब्दियों से उपेक्षित, तिरस्कृत और बहिष्कृत जनता के लिए हम लिखें ओर उसकी भाषा में लिखें, जिसे वह समझ सके । आज हमारे राष्ट्र की माँग यही है कि हम जनता के लिए साहित्य-सृजन करें ।” उन्होंने स्वयं जन-भाषा में प्रभात-फेरी के गीत लिखे, जो जनता का जागरण करते थे तथा देश-प्रेम की भावना का संचार करते थे । ‘प्रभात-फेरी’ कविता की उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं- 
‘संतान शूरवीरों की हैं, हम दास नहीं कहलायेंगे ।


या तो स्वतंत्र हो जायेंगे, या तो हम मर मिट जायेंगे ।
हम अगर शहीद कहायेंगे,
हम बलिवेदी पर जायेंगे,
जननी की जय-जय गायेंगे।।
(प्रभाती)

कविवर सोहन लाल द्विवेदी ने स्वतंत्रता सेनानियों के चरित्र का गुणगान भी किया, ताकि जनता उनसे प्रेरणा लें । ‘भैरवी’, ‘चेतना’, ‘सेवाग्राम’ आदि काव्य-संग्रहों में महान् राष्ट्रनायकों का गुणगान हुआ है । ‘लौह-पुरूष’ सरदार पटेल को समर्पित कवि की निम्न पंक्तियाँ दर्शनीय हैं-

‘लौह पुरूष सरदार! करूँ वन्दन तेरा किन शब्दों में ।
राष्ट्र-पुरूष तुमसे मिलते हैं किसी राष्ट्र के अब्दों में ।।
तेरा गर्जन एक, कि निर्बल में नवीन बल आता है ।
तेरा वर्जन एक, कि बैरी बढ़ पीछे मुड़ जाता है ।।
(चेतना)

राष्ट्रकवि पं. सोहनलाल द्विवेदी की कविताओं में स्वतंत्रता पश्चात् भी राष्ट्रीय-जागरण के स्वर दिखाई देते हैं । ‘चेतना’ और ‘मुक्तिगंधा’ काव्य-कृतियों में जहाँ उत्सव और उल्लास की कविताएँ हैं, वहीं सम-सामयिक परिस्थितियों और समस्याओं को भी उठाया गया है । युवक और युवतियों को प्रगति-पथ के वरण का संदेश भी दिया है । स्वतंत्रता की ध्वजा को सुरक्षित रखने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा-

शुभारंभ जो किया देश में, नव चेतनता आई है ।
मुरदा प्राणों में फिर से, छायी नवीन तरूणाई है । 
स्वतंत्रता की ध्वजा न झुके, यही ध्रुव ध्यान करो ।
बढ़ो, देश के युवक-युवतियों, आज पुण्य प्रस्थान करो ।।
(मुक्तिगंधा)

‘मुक्तिगंधा’ के पुरोवाक् में कवि ने लिखा है- “स्वातंत्र्योत्तर काल में देश जिन आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक गतिविधियों के मोड़ से गुजरा है, जनता पर जो उसकी प्रतिक्रिया हुई है, उसकी मानसिक आशा, निराशा, आकांक्षा, आक्रोश के भाव साकार होकर आपसे साक्षात्कार करना चाहते हैं ।” इसमें प्रकाशित ‘जागरण-गीत’ के माध्यम से कवि ने सजग रहने एवं कर्तव्य के प्रति जाग्रत रहने का संदेश दिया है, पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

‘अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे,
गीत गाकर, मैं जगाने आ रहा हूँ ।
-   -   -
विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूँगा,
प्रगति के पथ पर बढ़ाने आ रहा हूँ।’
(मुक्तिगंधा)

पं. द्विवेदी जी को हिन्दी अनन्य प्रेम था । वे किसी भी परिस्थिति में विदेशी भाषा को स्वीकार्य नहीं मानते थे । उन्होंने अंग्रेजों के साथ ही विदेशी भाषा अंग्रेजी को समाप्त कर अपनी भाषा और संस्कृति को अपनाने का आह्वान किया । ‘पुण्य-प्रयाण’ शीर्षक गीत में कवि का स्वर चिंतन योग्य है-

यही समय है, जागो अपनी भाषा के ओ सम्मानी ।
यही समय है, जागो अपनी संस्कृति के ओ अभिमानी ।
यही समय है, जागो अपनी जननी के ओ बलिदानी ।
तुमको समय पुकार रहा है, आज अमर अभियान में ।
चलो साथियों । चलो साथियों । पावन पुण्य-प्रयाण में ।।
(मुक्तिगंधा)

समग्रतः राष्ट्रीय-चेतना के गायक कवि पं. सोहन द्विवेदी का गुणगान करते हुए प्रत्येक भारतवासी गौरव का अनुभव करता है, क्योंकि उन्होंने अपने कलम के साथ राष्ट्रीय-आन्दोलन को दिशा व गति प्रदान की । उन्होंने न केवल अपने कवि जनित कर्तव्य का निर्वाह किया, वरन् राष्ट्रप्रेमी सेनानी बनकर दूसरों को प्रेरित किया । अपने युग के महान् कवि को मेरा शत-शत नमन् ।’
(संस्कृति समन्वय पत्रिका, दिसंबर,2017 में प्रकाशित)
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अज्ञेय की प्रयोगधर्मिता


अज्ञेय 
हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक रचनाकार एवं बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ हिन्दी-काव्य क्षेत्र में ‘प्रयोगवाद के जनक’ के रूप में विख्यात है । ‘अज्ञेय’ जी का जन्म 7 मार्च, 1911 को उत्तर प्रदेश के कुशीनगर स्थान पर हुआ । पिता की नौकरी पुरातत्त्व विभाग में होने के कारण उनका बचपन अनेक स्थानों पर रहते हुए गुजरा । वे स्वतंत्रता सेनानी होने के कारण जेल में रहे । ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’, ‘प्रतीक’, ‘दिनमान’, ‘नवभारत टाइम्स’ आदि पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया तथा अमेरिका व जोधपुर में उन्होंने अध्यापन कार्य भी किया ।

वे कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार, निबंधकार एवं पत्रकार के रूप में अपनी प्रतिभा का परिचय देते रहे । हिन्दी-काव्य में ‘तारसप्तक’ के प्रकाशन के साथ प्रयोगवादी कविता का उन्होंने सूत्रपात किया । अज्ञेय जी की प्रसिद्ध काव्य-कृतियाँ हैं- ‘इत्यलम’, ‘हरीघास का पर क्षण भर’, ‘इन्द्रधनुष रौंदे हुए ये’, ‘अरी ओ करूण प्रभामय’, ‘आँगन के पार द्वार’, ‘सुनहले शैवाल’, ‘कितनी नावों में कितनी बार’ एवं ‘महावृक्ष के नीचे’ आदि कृतियाँ उल्लेखनीय हैं । प्रस्तुत आलेख में अज्ञेय जी काव्य-संवेदना को उजागर करने प्रयास किया गया है ।

‘अज्ञेय’जी छायावादोत्तर काल के प्रमुख कवि थे । उनकी प्रसिद्धि प्रयोगशील कवि के रूप में रही क्योंकि उन्होंने काव्य के परम्परागत बंधनों से मुक्त एक ऐसा माध्यम स्थिर करने के लिए प्रयोग किए, जो नई परिस्थितियों, नवीनतम अनुभूतियों तथा नये विचारों को महत्त्वपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त कर सके । अतएव उनका काव्य-संसार भी नवीन खोज एवं नवशिल्प के अन्वेषण का माध्यम रहा है । ‘तार-सप्तक’ की भूमिका में भी उन्होंने अपने आपको एवं प्रयोगवादी कवियों को ‘राहों के अन्वेषी’ बताया । 

यद्यपि अज्ञेय जी व्यक्तिवादी चेतना के कवि माने जाते हैं, तथापि सामाजिक सरोकारों को एवं उसके महत्त्व को स्वीकार भी किया । ‘नदी’ को ‘समाज’ का एवं ‘द्वीप’ को ‘व्यक्ति’ का प्रतीक बताकर उन्होंने अपने विचारों को इस प्रकार व्यक्त किया-

“हम नदी के द्वीप हैं ।
हम नहीं कहते कि हमको
छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाये
वह हमें आकार देती है ।”

अज्ञेय जी की मान्यता रही है कि जीवन में दुःख को प्रेरक के रूप में स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि वह हमारे विकारों का परिष्करण करता है । दुःख के महत्त्व को रेखांकित करती कवि की उक्त पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

“दुःख सबको माँजता है
और.....................................
चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने,
किन्तु जिनका माँजता है,
उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रखे ।”

वर्तमान शहरी जीवन में जटिलता आ गई है, परिणामस्वरूप शहरी जीवन की विसंगतियों ने मनुष्य को स्वार्थी, अहंकारी एवं अनीतिवान बना दिया है । शहरियों के आचरण को अज्ञेय जी ने ‘साँप’ कविता के माध्यम से इस प्रकार व्यक्त किया-

“साँप तुम सभ्य तो हुए नहीं, न होंगे
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया
एक बात पूछूँ (उत्तर दोगे)
फिर कैसे सीखा डसना
विष कहाँ पाया ?”

आज के वैज्ञानिक युग में मनुष्य मशीन बन गया है, फलतः उसके जीवन में समय का अभाव व्याप्त हो गया है । कवि की मान्यता है कि काल के अनवरत प्रवाह में क्षण का अत्यधिक महत्त्व होता है अतः मनुष्य को प्रत्येक क्षण का महत्त्व समझते हुए उसमें लीन होना चाहिए तथा अपने भीतर की आवाज को सुनना चाहिए, यथा-

“सुनें, गूँज भीतर के सूने सन्नाटे में 
किसी दूर सागर की लोल लहर की 
जिसकी छाती की हम दोनों
छोटी-छोटी सी सिहन हैं-
जैसे सीपी सदा सुना करती है ।”

प्रकृति का चित्रण करते समय कवि अज्ञेय का मन पूर्वाग्रहों से मुक्त रहा है । उन्होंने प्रकृति के विराट् सौन्दर्य में अपने जीवन को तल्लीन करने की कामना व्यक्त की है । शरद्कालीन चाँदनी में कवि की निमग्नता दर्शनीय है, यथा-

“शरद चाँदनी बरसी
अँजुरी भर कर पी लो
ऊँघ रहे हैं तारे सिहरी सरसी
औ प्रिय, कुमुद ताकते अनझिप ।”

अज्ञेय जी ने जहाँ कविता के वर्ण्य विषय में नये प्रयोग किए, वहीं शिल्प के क्षेत्र में उनके प्रयोग युगान्तरकारी सिद्ध हुए । उन्होंने भाषा का बनावटीपन दूर किया । अप्रस्तुत योजना, बिम्ब एवं प्रतीक विधान में नवीनता को प्रश्रय दिया । नये उपमानों ओर प्रतीकों का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा-

“वे उपमान मैले हो गए हैं,
देवता इन प्रतीकों के
कर गए हैं कूच ।”

निष्कर्षतः अज्ञेय जी का काव्य विविधताओं का मिश्रण है । उनके काव्य में व्यक्ति और समाज, प्रेम एवं दर्शन, विज्ञान एवं संवेदना, यातना बोध एवं विद्रोह, प्रकृति एवं मानव तथा बुद्धि एवं हृदय का साहचर्य दिखाई देता है । उनकी कविताएँ आधुनिक युग का दर्पण मानी जाती है। यही कारण है कि हिन्दी काव्य धारा में अज्ञेय जी का व्यक्तित्व आज भी समालोचकों की दृष्टि में अज्ञेय ही प्रतीत होता है । 
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'किले में कविता' रिपोर्ट

अपनी माटी की काव्य गोष्ठी 
किले में कविता
(औपचारिक हुए बगैर भी सार्थक होने की गुंजाईश)

'किले में कविता' अपनी माटी का यह ऐसा आयोजन है जिसमें किसी ऐतिहासिक दुर्ग या इमारत के आँगन/परिसर में बिना किसी औपचारिकता के पचड़े में पड़े कविता सुनना-सुनाना और कविता पर विमर्श किया जा सकता है। सार्थक होने के लिए किसी भी रूप में औपचारिक होना ज़रूरी नहीं है। लगातार औपचारिक हो रहे हमारे दैनंदिन जीवन में कुछ तो हार्दिक हो। एक विचार के अनुसार अतीत बोध के साथ कविता पर बात-विचार करने के इन अवसरों में यथायोग्य उसी परिसर में आखिर में श्रमदान करने की भी रस्म शामिल की गयी है। 

रिपोर्ट:मनुष्य होने की शर्त है साहित्य- डॉ सत्यनारायण व्यास
चित्तौड़गढ़ चार अगस्त,2013

घोर कविता विरोधी समय में कवि होना और लगातार जनपक्षधर कविता करना बड़ा मुश्किल काम है।वैसे मनुष्य साहित्य का लक्ष्य है और मनुष्य होने की शर्त है साहित्य। एक तरफ जहां आज व्यवस्था की दूषित काली घटाएँ तेज़ाब बरसा रही हैं वहीं जल बरसाने वाली घटाएँ तो कला और साहित्य की रचनाएँ ही हैं।तमाम मानवीय मूल्यों की गिरावट का माकूल जवाब है कला और साहित्य का सृजन।ये दोनों हमें अर्थकेन्द्रित और धन-पशु होने से बचाने वाली चीज़ें है। एक और ज़रूरी बात ये कि साहित्य और संस्कृति लगातार परिवर्तनशील धाराएँ हैं। अत: देश काल और समाज सापेक्ष नवाचार का हमेशा स्वागत करना चाहिए। वैज्ञानिक, तकनीकी और साइबर महाक्रान्ति के साथ कला और साहित्य को अपना तालमेल बैठाकर विकास करना होगा।

यह विचार साहित्य और संस्कृति की मासिक ई पत्रिका अपनी माटी के कविता केन्द्रित आयोजन किले में कविता के दौरान वरिष्ठ कवि डॉ सत्यनारायण व्यास ने कहे। चार अगस्त की शाम दुर्ग चित्तौड़ के जटाशंकर मंदिर परिसर में कवि शिव मृदुल की अध्यक्षता में आयोजित काव्य गोष्ठी में जिले के लगभग सत्रह कवियों ने पाठ किया। शुरू में आपसी परिचय की रस्म हुई। आगाज़ गीतकार रमेश शर्मा के गीत घर का पता और तू कहती थी ना माँ सरीखे परिचित गीतों से हुआ। प्रगतिशील कविता के नाम पर विपुल शुक्ला की कविता लड़कियाँ और हम मरे बहुत सराही गई।इस अवसर पर कौटिल्य भट्ट ने दो मुक्कमल गज़लें कहकर हमारे आसपास के ही वे दृश्य पैदा किए जो हम अक्सर नज़रअंदाज कर जाते हैं।सालों से लिख रहे रचनाकारों में जिन्होंने पहली मर्तबा सार्वजनिक रूप से पाठ किया उनमें किरण आचार्य का गीत बादलों पर हो सवार और माँ शीर्षक से प्रस्तुत रचनाएं और मुन्ना लाल डाकोत की पद्मिनी मेल रो भाटो ने ध्यान खींचा। राजस्थानी रचनाओं में नंदकिशोर निर्झर,नाथूराम पूरबिया के गीतों से माहौल खूब जमा। 

जहां सत्यनारायण व्यास ने मेट्रो शहरों के जीवन पर केन्द्रित कविता फुरसत नहीं और ईगो के ज़रिए व्यंग्य कसे वहीं उनकी कविता माँ का आँचल ने अतीत बोध की झलक के साथ संवेदनाओं के लेवल पर सभी को रोमांचित कर दिया। इसी संगोष्ठी में आकाशवाणी चित्तौड़ के कार्यक्रम अधिकारी योगेश कानवा ने अपनी स्त्री विमर्श से भरी हाल की लम्बी कविता का पाठ किया। डॉ रमेश मयंक ने अपनी जल चिंतन रचना से किसी एक शहर के बीच नदी के अस्तित्व को उकेरते हुए जीवन के कई पक्ष हमारे सामने रखे।जानेमाने गीतकार अब्दुल ज़ब्बार ने अपनी परिचित शैली में चंद शेर पढने के बाद अपना पुराना गीत मौड़ सकता है तू ज़िंदगी के चलन  ने एक  बार फिर छंदप्रधान रचनाओं का महत्व जता दिया। संगोष्ठी के सूत्रधार अध्यापक माणिक ने गुरूघंटाल नामक कविता सुनाकर तथाकथित बाबा-तुम्बाओं की दोगली जीवन शैली पर कटाक्ष किया। वहीं शेखर चंगेरिया, विपिन कुमार, मुरलीधर भट्ट, भगवती बाबू और भरत व्यास ने भी कविता पाठ किया। आखिर में शिव मृदुल ने शिव वंदना प्रस्तुत की। 

संगोष्ठी में बतौर समीक्षक डॉ राजेश चौधरी, डॉ रेणु व्यास, डॉ राजेंद्र सिंघवी, डॉ अखिलेश चाष्टा और महेश तिवारी मौजूद थे।आकाशवाणी से जुड़े स्नेहा शर्मा, महेंद्र सिंह राजावत और पूरण रंगास्वामी सहित नंदिनी सोनी, चंद्रकांता व्यास, सुमित्रा चौधरी, सतीश आचार्य और कृष्णा सिन्हा ने भी अंश ग्रहण किया।श्रमदान के साथ ही गोष्ठी संपन्न हुई। 

रिपोर्ट-माणिक,चित्तौड़गढ़

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