लोकधर्म और कविता का लोकतंत्र

“ लोकधर्म और कविता का लोकतंत्र ”
(संदर्भ-बेघर का बना देश)
                                                     
मनुष्यता की मातृभाषा के रूप में कविता की प्रतिस्थापना ने लोकधर्म को सदैव केन्द्र में रखा है । यह धर्म कविता व मनुष्य के समानान्तर अनादिकाल से आज तक विद्यमान रहा है। इसीलिए जब कभी मनुष्य के स्वाधीन होने का प्रश्न उठा, कविता ने उसे रास्ता दिखाया । मनुष्य ने अपने जीवन में स्वातंत्र्य के मूल अर्थात् लोकतंत्र को पहचाना या नहीं, किंतु कविता की बहुआयामी दृष्टि ने जीवन की वास्तविकता को सदैव प्रस्तुत किया । इसी कारण कविता की आलोचना मनुष्यता के घेरे में ही संभव है । वस्तुतः कविता का कोई देश नहीं होता, वह तो सार्वभौमिक होती है, उसमें मनुष्य की संवेदना अभिव्यक्त होती है । यह संवेदना दूसरे भू-भाग के निवासी को भी समान रूप से प्रभावित करती है । कविता का यह लोकधर्म ही उसकी लोकतंत्रात्मक व्यवस्था का आधार तय करता है । 

बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में कविता का स्वर अपने इतिहास से कुछ अधिक मुखर है । कविता की अन्तर्वस्तु में तीव्रगामी बदलाव आया है । कवि के समक्ष जब इस कालखण्ड में विस्मयकारी यथार्थ उपस्थित हुए, तो कविता का स्वर भी लोक की पीड़ा को सामने रखने हेतु आतुर हो गया, यद्यपि व्यवस्था उसके पक्ष में नहीं थी । समकालीन कविता के यथार्थ के बारे में डॉ. परमानंद श्रीवास्तव लिखते हैं,“प्रासंगिकता और सृजनशीलता, प्रतिबद्धता और अजनबीपन, जादुई और क्रांतिकारी, यथार्थ और अयथार्थ, तात्कालिक और मिथकीय, सपाट और काव्यात्मकता के तनाव में आज की कविता हमारे समय का मार्मिक साक्ष्य बन चुकी है । उसके अनुभव संसार और स्थापत्य का सामना हमें आज की जटिल स्थितियों के प्रति जागरूक बना सकता है ।” (समकालीन कविताः नये प्रस्थान, पृ.7) 

भूमंडलीकरण के दौर में पूँजीवादी सभ्यता का जादू जब आम आदमी के सिर पर चढ़कर बोल रहा हो, उसकी मस्तिष्क की खिड़कियाँ बंद हो गई हों, बाजार की चमक में उसकी आँखें विमुग्ध हों; ऐसे समय में लोकधर्म के गुरूत्तर दायित्व को वहन करने हेतु कविता का यथार्थ भी स्पष्ट होना आवश्यक है । स्वप्निल श्रीवास्तव के अनुसार, “खासकर यदि हम यथार्थ की बाद करें, तो आज का यथार्थ मारक और अविश्वसनीय हैं । वह फैंटेसी के आगे का यथार्थ है । आज के यथार्थ का चेहरा रक्त-रंजित और अमानवीय है । यथार्थ हमारे सामने विस्मयकारी दृश्य प्रस्तुत करता है, जो कल्पनातीत है ।” (आलोचना, अप्रेल-जून 2003, पृ.32)

लोकधर्म  को चुनौती देने वाले, विस्मयकारी यथार्थ के रूप में जो कारक वर्तमान समय में उपस्थित हुए हैं, उनमें प्रमुख हैं- मुक्त बाजारवाद, विकृत उपभोक्तावाद, राजनीतिक अधिनायकवाद, पूँजीवादी प्रभुता, भ्रष्ट आचरण, श्रम का अपमान, मूल्यों का विघटन, हिंसक वृत्तियों का उभार, जातीय-धार्मिक उन्माद आदि । यद्यपि ये कारक वैश्विक हैं, किंतु उनकी फाँस में आम भारतीय बुरी तरह आ गया है । दूसरी ओर साहित्यिक जगत् वैचारिक अतिवाद से ग्रस्त होकर लोक को पीड़ित करने वाले इन तत्त्वों का सामना करने के बजाय वामपंथी-दक्षिणपंथी खेमे में उलझकर भटकाव की ओर बढ़ रहा है । उपस्थित चुनौतियों का सामना करते हुए आने वाले समय का मार्ग तय करने हेतु कविता का स्वर निराला, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल की भाँति स्पष्ट अभिव्यक्ति का हो, यह आवश्यक है ।

विकट-समय में कविता-जगत् के बड़े हस्ताक्षर कविवर विजेंद्र हमारे समय के अग्रगामी कवि हैं । उनकी उपस्थिति कवि-पीढ़ियों के बौद्धिक रक्त-संचार को चेतनावान बनाने में सक्षम है । ‘त्रास’, ‘जनशक्ति’, ‘कठफूला बाँस’, ‘चैत की लाल टहनी’ जैसी कृतियों से चर्चित विजेंद्रजी द्वारा रचित इस दशक की महत्त्वपूर्ण काव्य-कृतियाँ हैं- ‘घना के पाँखी’, ‘तुम्हारा पहले खिलना’, ‘वसन्त के पार’, ‘कवि ने कहा’, ‘भीगे डैनों वाला गरूण’, ‘बनते-मिटते पाँव रेत में’, ‘मैंने देखा पृथ्वी को रोते हुए’, ‘बेघर का बना देश’ आदि । इसके अतिरिक्त काव्य-नाटक, सौंदर्यशास्त्र और समकालीन समीक्षा पर प्रकाशित आलेख कविता के युगधर्म को स्पष्ट करने में सहायक रहे । 

कविवर विजेंद्र के काव्य पर कालिदास से लेकर वाल्ट व्हिटमेन का प्रभाव दिखाई देता है तो त्रिलोचन का लोकानुराग और मुक्तिबोध की परम्परा का निर्वहन भी है । ज्ञानेंद्रपति लिखते हैं- “विजेंद्र के कवि की बनावट  में परम्परा और समकालीनता के बोध की युगपत् उपस्थिति को पहचानना जरूरी है । एक ओर तो उसकी जड़ें हमारे क्लैसिक्स में है, साथ ही लोक-संस्कृति में; दूसरी ओर उनकी दृष्टि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के विज्ञान से माँजी गई है । जन-हितैषणा उसकी कवि-मुद्रा नहीं, आत्मिक चिंता है ।” (कृति ओर, अंक 68-70, पृ.77) स्वयं विजेंद्र को ‘लोक का जाप’ करना प्रिय रहा है । उनका कथन है- “पिछले दिनों हमारे कुछ साहित्यिक मित्रों ने हमको ‘लोक का जाप’ करने वाला कहकर जो गौरव प्रदान किया है, उसके लिए हम बड़ी विनम्रता से उनके आभारी है । भले ही बहुत देर से कहा । पर दुरूस्त कहा । कैसा सुखद संयोग है कि कुछ दिनों पहले संसद से गाँव की पगडंडियों तक जनता लोक तथा जन का ही जाप करती रही । हमें लगा अब ये दोनों शब्द एक भौतिक शक्ति का रूप ले रहे हैं ।” (कृति और, अंक 62, पूर्व कथन, पृ.19)

अपनी लम्बी काव्य-यात्रा में कविवर विजेंद्र का सद्य-प्रकाशित काव्य-संकलन ‘बेघर का बना देश’ समय के सच का सामना करता हुआ दिखाई देता है । संकलित कविताओं में एक ओर दुखार्तानां, श्रमार्तानां तथा लोकार्तानां श्रेणी के लिए संघर्ष का लोकधर्म है, तो दूसरी ओर समय के साथ उपस्थित विध्वंसकारी शक्तियों का सामना करते हुए कविता के क्षेत्र में लोकतंत्र की प्रतिस्थापना का आग्रह दृष्टिगोचर होता है । कविताओं में नये सौंदर्यशास्त्र के साथ भाषा का नया मुहावरा खोजा गया है, जो अधुनातन है । कविता से विलुप्त होती लय को पुनः केन्द्र में लाने का अभिनव प्रयास इस कविता-संग्रह को विशिष्ट बनाता है । इन कविताओं में परिवेश की खूबियों को भावी संकेत के साथ उकेरा गया है, जहाँ उनके चित्रकार का व्यक्तित्व उभर कर आता है । यह कविता-संग्रह विवेचनीय है । 

विक्षुब्ध लोक के जीवन में बदलाव लाने हेतु कवि ने ‘लोक का जाप’ किया है । कवि का निष्कर्ष यह है कि प्रगतिशील लोकतांत्रिक भारत में श्रम का अभी तक सम्मान नहीं हुआ है। सामंती व्यवस्था भले ही न रही हों, लेकिन मनोवृत्ति में कुछ खास बदलाव नहीं आया है । ‘अँधेरे की दस्तकें’ में कवि ने श्रम का प्रतिष्ठा प्रदान करते हुए फसलों भरी पगडंडियों से गुजरने को तीर्थयात्रा बताया है । वहीं ‘विरल क्षणों का गाान’ में कवि पसीने की हर बूंद का हिसाब माँग रहा है-

देखा है मैंने/झौंपड़ियाँ उजड़ते/फिर राख के
ढेरों पर उठी भव्य इमारतें/तुम्हें देना होगा हिसाब
पसीने की हर बूँद का/लूट-खसोट की इस आँच में/
झुलसा है गरीब ही ।     (पृ.110)

‘तलछट’ कविता में पुलिस के डंडे खाते निर्दोष किसानों को कनपटी से बहते खून को पौंछते देखता है जो अपनी जमीन का हक माँग रहे हैं । दूसरी ओर बहुमूल्य खनिज सम्पदा के लुटेरों को ‘पसीना’ में अनअघाये दस्यू कहकर पसीना को आत्मा का सत बताया है । समाज की कुत्सित मनोवृत्ति को उजागर करते हुए कवि ने निरन्तर दमन के बाद भयानक परिणामों की ओर संकेत किया है । श्रमनिष्ठ समाज का शोषण एक दिन प्रतिशोध लेने को विवश कर देता है, जिसे समय पर पहचानना जरूरी है । यदि सामंती मनोवृत्ति में परिवर्तन नहीं आता है, तो कवि स्पष्ट रूप से कह देता है-

पृथ्वी के गर्भ में लावा/उबाल खाता मैग्या/फूट कर 
जब निकलेगा एक दिन/नहीं रोक पायेंगे सैलाब
आदिवासियों का/उफनता ज्वार/पछाड़ें खाता सागर/
वे होने को हैं तत्पर/धनुष-बाण उठाने को/
आने लगी हैं ध्वनियाँ/वृक्ष वन घासों से/मरेंगे,
मारेंगे/ जमीन नहीं छोड़ेंगे ।
(सामंत अभी जीवित है, पृ.100)

समाजशास्त्रीय विश्लेषण में जिन वंचित वर्गों की समस्याओं को उठाया गया, उनमें किसान को अभी तक न्याय नहीं मिला । कवि की दृष्टि में कविता में ‘धरती जोतने वालों से संवाद’ नहीं हो रहा है । लड़ना ही उनकी नियति बन चुकी है । कवि ने किसान की अन्तर्व्यथा को, उसकी गरीबी को, उसके खुश्क चेहरे को देखने का तथा उसकी पीड़ा को व्यक्त करने का कार्य ‘मेरे चुप रहने की परीक्षा’, ‘अपराध गरीबी का’, ‘धरती जोतने वालों से संवाद’, ‘देखता हूँ खुश्क चेहरा’ आदि कविताओं में किया है । कवि की दृष्टि है कि भूमि को उर्वर बनाये रखने का अदम्य कार्य करता हुआ किसान भूखा है, आत्महत्या करता है । श्रम से प्रेम करने वाला अभावग्रस्त है । उसकी पसीनों की बूंदों की चमक के साथ किसानों की व्यथा को स्वर देते हुए कवि कहता है-

अंकुरित बीज में/चमकता किसान का पसीना/गहरे
आघातों के दुख में/तपा हृदय का शांत विक्षोभ/
मल मूत्र में जन्म लेते शिशु का रूदन/हत्यारों के 
काँपते हाथ/गरीबी में नहीं देता कोई भी साथ ।
(देखता हूँ खुश्क चेहरा, पृ.83)

समाजवाद की कल्पना और उसके आने की आशा अब स्वप्न प्रतीत होने लगी है । समय की गति के साथ शैतानी पूँजीवादी समाज यांत्रिक-सभ्यता के साथ उपस्थित हुआ है, जिसमें लोक के श्रमनिष्ठ प्रहरी श्रमिक, किसान, दलित, आदिवासी वर्ग सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। ‘बे-घरों के घर’ कविता में कवि का ध्यान रामचरण पर जता है जो बापू के जन्मदिन पर राजभवन पथ पर पतला चिथड़ा बिछाकर दिनभर की थकान के बाद सोने की तैयारी कर रहा है । कवि का ‘रामचरण’ भगवत रावत की ‘बैलगाड़ी’ में बैठा हुआ मनुष्य है, जो महानगरीय भीड़ में सभ्यता का आखिरी इंसान प्रतीत होता है । 

पूँजीवादी यांत्रिक सभ्यता ने पूरी दुनिया को ‘शापिंग काम्पलेक्स’ में बदल दिया है । कुमार अंबुज ने जिसे मनुष्यों की बजाय वस्तुओं में बहुत अधिक निवेश माना है । (वागर्थ, जनवरी, 2005) यह सत्ता निर्मम होती है, जहाँ आम आदमी को हर बार बेघर होना पड़ता है- 

गहन दुख में भी/सत्ता का वर्चस्व निर्मम/
सालता हरदम/गड्ढों से भरा गँदला जल/
रम्मन, खुदा बख्श, अलीहसन/जो हुए हैं
बेघर हर बार ।
(दिखाओ मुझे कविता, पृ.81)

पूँजी के प्रभाव का चित्र कवि ने ‘रहने दो अंधेरे’ में खींचते हुए लिखा-

क्या करूँ/इन गगन चुंबी कोठियों का/ आ रही
गंध पकवान की/पसलियाँ दिखती कमेरे इंसान की/
टोटा पड़ा रोटियों का/बेलबूटे, पच्चीकारी, शब्दकारी,
शिल्पकारी में/दिखती नहीं धरती की गहन पीड़ा ।
(पृ.70)

वैश्विक स्तर पर आर्थिक उदारीकरण आधारित नई विश्व-व्यवस्था, उच्च तकनीक, जनसंचार का प्रसार, विश्व ग्राम के जन्नत की हकीकत को पूरी दुनिया देख रही है । कभी-कभी यह महसूस होता है कि यह साम्राज्यवादी शक्तियों का नव-उपनिवेशवादी संस्करण तो नहीं है । ‘शांतिदूत’ में कवि उनकी मनोवृत्ति को समझ जाता है जो स्वर्णभरी मुद्राओं की जेबें भरकर आता है और हमें पीड़ाओं को गर्व में धकेल जाता है । इन शोषकों के माथे पर मनुष्य की विनाश लीलाएँ हैं और शब्दों में ध्वंस की राख झड़ती है । 

‘अनार का पेड़ आँगन में’, ‘भू तत्त्वीय आसमान’, ‘दैत्य को पछाड़ो’ आदि कविताओं में कविवर विजेंद्र ने नव उपनिवेशवादी शक्तियों के दुष्चक्र को उजागर किया है । यही नहीं कवि को अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक आदि गरीबों के शत्रु प्रतीत होते हैं, उन्हें पछाड़ने का आह्वान करता है-

वह बहुत ताकतवर है/क्रूर कुचाली और महाकपटी /
विश्व बैंक उसका घातक अस्त्र है । अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष
उसका कुचक्र/विश्व व्यापार संगठन उसका इंद्रजाल/
वह किसी का मित्र नहीं है। जो भी उसके पंजे से
दबा है/वह सबसे बड़ा शत्रु है/पूरी दुनिया के गरीबों का ।
(दैत्य को पछाड़ो, पृ.64)

कविवर विजेंद्र की कविता सीधे जनपद से आती है, फलतः कविता में ग्रामीण जीवन की सौंधी महक विद्यमान है । जहाँ कवि का बचपन बीता, सुख-दुःख का साक्षी बना और संघर्ष की प्रेरणा बनी । ‘फरीदाबाद की भोर’ में कवि को अब फलदार दरख्त, नदी, ताल, प्रपात, दूब, नीम आदि नज़र नहीं आते । मनुष्य की उद्दाम लालसाओं का शिकार यह ग्रामीण जीवन भी हो गया है । ‘तलछट’ में कवि के मन की अन्तर्व्यथा उजागर हुई है, जहाँ जीवन में न केवल संघर्ष रहा है, बल्कि स्वाधीन भारत में लोगों की दुर्दशा का जीवन्त चित्रण भी है । ‘सुबह’ कविता में कवि को जीवन के रहस्य गुफाओं में नहीं, बल्कि लड़ते हुए आदमी की क्रियाओं में दिखाई देते हैं । साथ ही कवि ने आशा नहीं छोड़ी है, वह घोषणा करता है- 

वो समय जरूर आयेगा, जरूर/दुनिया
के लोग जानेंगे/दुनिया में लोग कितने त्रस्त हैं ।
कितने भूखे-प्यासे/कुपोषण से मरते हुए ।
(बेघर का बना देश, पृ.46)

कवि की जिजीविषा, अदम्य साहस और सतत् संघर्ष का स्वर ‘खुलेंगे कपाट’, ‘सुबह’, ‘धातुक खनक’ में दिखाई देता हे । इसके साथ ही आने वाले समय को आशावादी दृष्टि से देखने वाली कविताएँ ‘इतनी धुमैली रोशनी में’, ‘सोचने से पहले देखो’, ‘पवन गीता का अवसान’ आदि हैं । ‘तमस द्रव्य ऊर्जा’ में कवि प्रत्येक क्षण में जीवन के नये प्रतिरूप का दर्शन करता है। जहाँ कभी जन्म रूकता नहीं, निर्द्वन्द्व आगे बढ़ता है । ‘खुलेंगे कपाट’ में कवि मुक्ति के स्वर तलाश रहा है- 

सुनूँगा हर बार/ लहरों में बजती/तारों की घंटियाँ/
मेरे पाँव सने दलदल में/हाथों में कालोंच/नमक
के पानी में घुलने का सन्नाटा/जल पाँखियों
की प्रजनन आतुर चीखें/ मेरी मुक्ति के लिए
खुलेंगे जंग लगे कपाट ।
(पृ.75)

कविवर विजेंद्र ने अपने आंतरिक उद्गारों को प्रकट करने से पूर्व कविता से संवाद स्थापित किया है । उनकी अभिव्यक्ति में कविता लोकतंत्र की पर्याय बनकर उभरती है । वह संघर्ष की गाथा के रूप में कविता को ही स्वीकार करता है । कवि ने स्वयं के जन्म के साथ शब्द के जन्म को स्वीकार कर अपनी रगों में कविता की जड़ों को तलाश करने का प्रयत्न ‘मेरा जन्म’ कविता में किया है । साथ ही ‘कविताएँ जो मुझे प्रिय हैं’ में कवि की उत्कट इच्छा है कि वह लोक से जुड़ा रहे, क्योंकि यह लोक से जुड़ाव ही उसे गतिशील बनाये रख सकता है । ‘तलछट’ कविता में कवि अपने आँसू दिखाना नहीं चाहता, बल्कि अपना एक ध्वनि-राग बनाना चाहता है जो अपनी धरती और देश को बचाये रखे । कवि सरस्वती से आह्वान करता है-

ओ कविता की देवी/तुम सोई हो कहीं/निविड़
अँधेरी छाँह में/या कहीं धरती की कोख में/
तुम जागो/कवि छंद खो चुका हैं/भूखा है
झूठे यश को/मुट्ठी भर सिक्कों में/बेचता 
ईमान को । /
(मुझे जगाने दो सरस्वती को, पृ.15)

कविताओं की भाषा में विविधता है । परम्परागत प्रतीकों के स्थान पर कवि ने अपने लक्ष्य की पहचान करने वाले उदाहरण प्रस्तुत किए हैं । नये सौंदर्य का बोध कराने वाली भाषा चलताऊ भाषा से बिल्कुल अलग है । आक्रोश के क्षणों में बिम्बवान स्वाभाविक पीड़ा को उजागर करती तिक्त शब्दावली भी कविता की अर्थवत्ता बढ़ा देती है । जहाँ कहीं कवि भाव-विभोर है, तो संबोधन शैली में आत्म-साक्षात्कार भी बिम्बमय हो गया है, जैसे-

ओह! कितना गहन है अवसाद/सुनता हूँ
अँधेरे के छलकते से प्यालों में तिरती रात
की ग्रेनाइट छायाएँ । (पृ.113)

अथवा
प्रतिमानों के भगनावशेष में/सिर धुन रही कविता/
खण्डहरों में चीखते पत्थर/रहूँगा अभी सहने को ।
(पृ.79)

समकालीन कविता में ‘लय’ की जिस तरह उपेक्षा हुई है, उसे न्यायोचित नहीं कहा जा सकता । कवि और आलोचक बोधिसत्व की यह टिप्पणी द्रष्टव्य है, “छंद और रस का जितना नाश तथाकथित राजनैतिक कवियों ने किया उतना और किसने किया होगा । इस पूरी पीढ़ी ने कुल पच्चीस छंदबद्ध कविताएँ भी न लिखी होंगी । इस पीढ़ी के द्वारा किया गया हिंदी काव्य का काव्यात्मक अपकार अगले कई सालों में शायद ही मिटाया जा सके ।” (वागर्थ, दिसम्बर 2012) लेकिन कविवर विजेंद्र के शब्द हैं कि कविता में काव्यलय को मैं बहुत महत्त्वपूर्ण मानता हूँ । यह दृष्टि उनकी प्रत्येक कविता में दिखाई देती है, जहाँ आन्तरिक लय विलुप्त नहीं हुई है । कतिपय पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

समझते हम पशु जिन्हें
कहने लगे हालात अपने
सुनकर लगा दिया कँपने ।
(पृ.86)

इसी तरह-
चाहिए अन्न हर पेट को
रोशनी हर आँख को
आकाश हर पाँख को ।(पृ.94)

समग्रतः विजेंद्र रचित कविताओं का स्वर व्यवस्थागत विद्रुपताओं पर आक्रोश व्यक्त कर चुप रहना नहीं है, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए नए आयाम प्रस्तुत करना रहा है । आज जब हिन्दी कविता को लोक की सामुदायिक भावना से तोड़ने और छिन्न भिन्न करने की कोशिश की जा रही है और जब हिंदी कविता में जब जनमानस की अभिव्यक्ति नहीं है, तब कविवर विजेंद्र की कविताएँ आश्वस्त करती हैं कि ये मात्र बौद्धिक जुगाली या वैचारिक समस्याओं का अरण्यरोदन करने वाली नहीं, बल्कि लोकधर्म की रक्षा करने वाली और कविता के भीतर लोकतंत्र की स्थापना करने वाली है ।

                               डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी
प्राध्यापक ‘हिन्दी’
महाराणा प्रताप
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
चित्तौडगढ़(राजस्थान)
मो. 09828608270


समीक्षा:भूमण्डलीकरण से बदलता हमारा परिवेश/डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी

            साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
'अपनी माटी'
          वर्ष-2 ,अंक-15 ,जुलाई-सितम्बर,2014                       
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चित्रांकन:उत्तमराव क्षीरसागर,बालाघाट 
कविता को मनुष्यता की मातृभाषा माना जाता है। कविता की जब कभी आलोचना होती है, तब मनुष्य की उपेक्षा संभव नहीं है। इसी कारण कविता को लोकसापेक्ष माना गया है। इसके अभाव में कविता का कोई अस्तित्व नहीं है। बीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध कविता के कालखण्ड में विशिष्ट स्थान रखता है। यह समय भारत में आर्थिक उदारवाद का रहा, जिसने न केवल आर्थिक ढाँचे को बल्कि हमारे सामाजिक ताने-बाने को बहुत हद तक प्रभावित किया। कवित हरीश पाठक का कविता संग्रह ‘पहले ऐसा नहीं था’ भूमंडलीकरण जनित आर्थिक परतंत्रता और बाजारवादी शक्तियों के उन परिणामों का संकेत करता है, जो मानव-जीवन को प्रभावित कर रही हैं।


यह सच है कि भूमंडलीकरण से उत्पन्न पूँजीवादी व्यवस्था का जब हमारे जीवन में प्रवेश होता है, तब बाजार का घेरा आम आदमी को अपनी फाँस में ले ही लेता है। ‘वे कह रहे हैं उजाड़कर’, ‘रेत का जहाज’, ‘पहले ऐसा नहीं था’ आदि कविताओं में कवि स्पष्ट संकेत देता है कि सब कुछ उजाड़कर हम बाजार की नुमाइश में शामिल हो रहे हैं - वे कह रहे हैं उजाड़कर। चलो वहाँ दूर चलें / वहँा कपड़ों की चीजों की खूबसूरत अजीज़ों की/ नुमाइश लगी है....। (वे कह रहे हैं उजाड़कर, पृ. 27)

पूंजीवादी व्यवस्था के प्रवेश के साथ ही हमारा जीवन यंात्रिक सभ्यता में बदल दिया गया है। इस सभ्य बाज़ार में मनुष्यों की बजाय वस्तुओं में अधिक निवेश किया गया है। इस स्थिति में हमारे पास अब क्या बचा है? ‘फिर वही जंगल’, ‘अभावस में मर गए हैं पेड़’, ‘धुएँ में’, ‘फिर वहीं जंगल’, नीम का पेड़ आदि कविताओं में कवि का दर्द उभर आया है। - सायरन बज रहा है/ नाला बन रहा है/ उठती हैं इमारतें / सड़क चल रही है / बूढ़ा खाँसता है / आँखें ढूँढ रही  हैं /नीम का पेड़/ और पक्का चबूतरा / खो गया इमारतों की भीड में। (नीम का पेड, पृ. 11)

 आर्थिक उदारीकरण के बाद आवारा पूँजी के प्रभाव में यदि हमने कुछ खोया है तो वह है - रिश्तों की बुनियाद। शहरों में चारों ओर कंक्रीट के जंगल उग गये हैं। मानवीय रिश्ते इतिहास की वस्तु बनते जा रहे हैं। बुजुर्गों से भरी शहरी कॉलोनियाँ उसकी गवाह हैं। ‘घर-सफर’, ‘माँ तुम्हें याद है ना’, ‘मैं उन्हें दुनिया दिखाना चाहता हूँ’, ‘भीतर से बाहर तक’ कविताएँ सामयिक यथार्थ की अभिव्यक्ति करती हैं। जहाँ कवि कह उठता है - बहुत कुछ कहना चाहता है वह / मगर कहे किससे / उसके आस-पास अब/ सब कुछ उजाड़ है। (पहले ऐसा नहीं था, पृ. 22) यह उजाड़ रिश्तों की हकीकत बयां करता है।

आज भागदौड़ भरी जिन्दगी में विश्राम नहीं है। मानवीय रिश्ते स्वार्थ में बदल रहे हैं, हिंसक वृत्तियाँ उभर रही हैं। कवि को लगता है कि अब तो सभ्यताओं को भी धर्म का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है, जहाँ प्रेम, भाईचारा नहीं है। आपसी द्वेष की आँच एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच रही है। इसीलिए कवि को अब सावन की मोहक बूँदों में काना सावन नज़र आता है, क्योंकि उसकी स्मृति में इसी दिन पिछले बरस गोलियाँ चली थी, शेष है। एक माँ का यह कथन इस पीड़ा को उजागर कर देता है - सुन / पार साल, कितने घायल हुए थे सावन में / कितनों को गोलियाँ लगी / कितनों पर पेड़ गिर पड़े / कितने धारा में बह गये। (कहाँ जाऊँ खेलने, पृ. 12) कवि यहाँ प्रश्न खड़े करता है। खासकर प्रयोगवादियों से, जिन्होंने कविता को समाज से काटकर व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित कर दिया। वह पूछता है - कवि, / कितनी नावों में / कितनी बार / सफर किये तुमने। (ऐसा क्यों है कवि, पृ. 78) यह कहकर तत्काल कवियों की शाब्दिक अठखेलियों पर व्यंग्य करता हुआ उस कविता को निरूद्देश्य बताता है जो लोकधर्म की रक्षा न कर सका।



डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

युवा समीक्षक

हिन्दी प्राध्यापक हैं।

स्पिक मैके,चित्तौड़गढ़ के

उपाध्यक्ष


मो.9828608270
सी-79,प्रताप नगर,
चित्तौड़गढ़
परन्तु, यह कवि अब नई सदी में प्रविष्ट हो रहा  है। वह समाजशास्त्री बनकर कभी नये मूल्यों को स्वीकार कर रहा है, तो कभी एक्टिविस्ट बनकर नया पथ निर्मित कर रहा है। जब तक परिवर्तन नहीं होता, वह चुप बैठना नहीं चाहता। वह कहता है अब ओर किसका इन्तजार किया जाये। क्रांति का आह्वान करता है - उठो / भूखे और पराजित लोगों / सपना उगाते लोगों उठो/ करोड़ों हाथ लहराकर उठो। (अब और किसका इंतजार, पृ. 69) इसके अतिरिक्त ‘चिड़िया ने गीत गाना शुरू ही किया था’, ‘न जाने कितनी नदियों का संगम है’, ‘पसीना एक शब्द है’ आदि कविताओं में श्रम के महत्व को उजागर किया है। साथ ही ‘कुत्ते की दुम एक किवंदन्ती है’, ‘दीवार’ आदि में सामाजिक सक्रियता का पक्ष लिया है। ‘भीतर वहाँ’ में कवि निराश नहीं है। वह जानता है कि जमीन खोदने पर पानी का झरना अवश्य फूटेगा।

कविता की भाषा भावों के अनुरूप हैं। परम्परागत प्रतीकों के माध्यम से सशक्त अभिव्यक्ति ही नहीं है, वरन् सम्बोधन शैली में व्यक्त कविताएँ बरबस आकर्षित करती हैं और कभी-कभी स्वाभाविक पीड़ा को उजागर करती विम्बात्मक शब्दावली चित्रमय दृश्य उत्पन्न कर देती है। यथा- जमीन में बाँस उगने लगे/ टंगने लगीं उन पर रोटियाँ/धँसती दुनिया ‘स्टिल लाइफ’ बन गई। (रेत का जहाज, पृ. 63) साथ ही कविताओं में विद्यमान आंतरिक लय आश्वस्त करती है कि समकालीन कविता में पूर्ण रूप से गद्यकाव्य नहीं बना है।

समग्रतः कवि ने युगानुकूल परिदृश्य को अपनी कविता में बखूबी उकेरा है। उसका समय दो सदियों की संक्रमणकालीन परिस्थितियों का साक्षी है, जिसकी पहचान उसने कर ली है। भूमंडलीकरण के फलस्वरूप बदलते परिवेश को उसने बखूबी व्यक्त किया और उसके भावी दुष्परिणामों का संकेत कर कवि-समय का निर्वाह किया है।

पहले ऐसा नहीं थाः हरीश पाठक,(कविता संग्रह), नमन प्रकाशन,नई दिल्ली-2, पृ. 84, मूल्य-100/-

समीक्षा:‘एक देश और मरे हुए लोग’ का वर्तमान कविता परिवेश में दख़ल

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                फरवरी-2014 

चित्रांकन:इरा टाक,जयपुर 
‘अब बहुत हो गया/यह रही कलम और ये रहे छंद/
मैं जा रहा हूँ/ सदियों से राह तकते/पथरायी 
आँखों वाले/ उस आदमी के पास/(न रोको कोई, पृ. 16)

अर्थात् साहित्य अब सामाजिक सक्रियता की ओर बढ़ना चाहता है। परिवर्तन की अदम्य चाह में कवि ‘एक्टिविस्ट’ के तौर पर ‘कलम की ताकत’ को नई भूमिका में 21वीं सदी में प्रस्तुत कर रहा है। नई सदी के पहले दशक के उभरते युवा कवि ‘विमलेश त्रिपाठी’ का काव्य संग्रह ‘एक देश और मरे हुए लोग’ का आरंभ मुक्तिबोध की प्रेरणा से होता है, जहाँ ‘मर गया देश और जीवित रह गए तुम’ कवि का जीवित रहना अभिशप्त है, यदि वह विद्रुपताओं पर मौन रहे, स्वार्थ के आदर्श लिबास में हो, बौद्धिक जुगाली में व्यस्त होकर विचारहीन यांत्रिक सभ्यता का हिस्सा बन गया हो।

विमलेश त्रिपाठी का कविता संग्रह पाँच खण्डों में विभक्त हैं - इस तरह मैं, बिना नाम की नदियाँ, दुःख-सुख का संगीत, कविता नहीं तथा एक देश और मरे हुए लोग। यह कवि उस दौर का साक्षी है जहाँ मनुष्य के अमानवीकरण की गति में तीव्रता आई है। वैचारिक दृष्टि से समाजवाद का स्वप्न ध्वस्त हुआ है तो यांत्रिक सभ्यता का कहर भी विद्यमान है। मानवता को खूंटियों पर टाँग देने का प्रयास हो रहा हो, तब युवा कवि का न केवल आक्रोश व्यक्त होता है, बल्कि वह उस विचारहीनता को चुनौती देता है, जिसका संकेत मुक्तिबोध ने अपने आदर्शवादी मन को सम्बोधित करते हुए कहा था कि ‘अब तक क्या किया। जीवन क्या जिंया। उदरंभरि बन अनात्म बन गए। भूतों की शादी में कनात से तन गए।’

कवि इस सदी के उस विस्मयकारी यथार्थ का सामना करता है, जहाँ दुनियाँ ‘शॉपिंग काम्पलेक्स’ में अपनी शांति खोज रही है। पदार्थों में निवेश मनुष्य से ज्यादा हो गया है। मनुष्यता को निगलने वाला समय तेजी से आगे बढ़ रहा है। तब कवि का स्तर अपने अन्दर ‘हाँफता हुआ बूढ़ा गाँव’ तलाश करता है, जिसमें अभी तक वे सब चीजें बची हुई हैं, जो मनुष्य के लिए जरूरी है। कवि उसे बचाना चाहता है-

सपने में कोई शहर नहीं आया कभी। नींद जब खुली तो
हर बार गांव से शहर आया। मैं एक गाँव और वही रहा अब  
तक / कोलकाता नहीं बन सका.........। (एक गाँव हूँ, पृ. 10)

‘एक देश और मरे हुए लोग’ (कविता संग्रह)
- विमलेश त्रिपाठी
- बोधि प्रकाशन, जयपुर।
- प्रथम संस्करण, 2013
- मूल्य 99/-
कवि का ‘कोलकाता’ नहीं बन पाना, उस स्रोत को बनाये रखने की कोशिश है, जो जीवन का मूल रस है। इसी कारण ‘त्रिलोचन’ की ‘चंपा’ काले अक्षर चीन्हना नहीं चाहती तथा कवि को भी कलकत्ता जाने से रोकती है - कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी। कलकत्ते पर बजर गिरे।’ भूमण्डीकरण और यांत्रिक जीवन से दूर सहज मानवीय संबंधों की तलाश में कवि निकलता है तो उसे अपने गाँव की स्मृति आती है, जहाँ कभी चिड़िया के साथ उड़ता हुआ घूमना, रंगीन मछलियों के साथ तैरना अथवा हरी दूब के साथ रहना याद आता है, किन्तु कोलकाता आने के साथ अब आम के बगीचे, पानी से भरी नहर, खेत, बस्ते की धूल आदि सब पीछे छुट गए हैं और गाँव की दशा भी पूँजीवादी सभ्यता के कहर में कुछ इस तरह हो गई है-

गाँव में अब रह गए हैं सिरफ पागल और बूढे।
स्त्रियाँ गांव के चौखट पर परदेशियों के आने का अंदेशा लिए।
जवान सब चले गए दिल्ली सूरत मुंबई कोलकाता।
जंतसार की जगह गूंजता है मोबाईल का रिंगटोन।                                                                 (इस तरह मैं, पृ. 29)

आर्थिक उदारीकरण और पूँजीवादी मानस से त्रासदी का चित्रण कवि ने ‘यह नहीं शहर’, ‘खिड़की पर फदगुदिया’, ‘एक गाँव हूँ’, ‘कहीं जाऊंगा नहीं’, ‘इस तरह मैं’, आदि कविताओं में हुआ है। परंतु कवि अपनी पीड़ा को यहीं समाप्त नहीं करता, वरन् आजादी के साठ साल मनाती उस पीढ़ी से सवाल करता है-

क्या चाहिए इन बच्चों को /मोबाइल /लैपटॉप /पॉर्न किताबें /
कम्प्यूटर /या हवा और पानी / और रोटी/ जो
अब तक नहीं पहुँच पाई है साबुत /और हमें गर्व
है कि हमने पिछले साल ही / आजादी का छठवां दशक
मनाया है।     (एक देश और मरे हुए लोग, पृ. 144)

आजादी के साठ साल पूरे हो जाने पर भी हवा, पानी और रोटी की समस्या हल नहीं होना, उस भ्रष्ट तंत्र का चेहरा प्रस्तुत करता है, जिसका प्रभाव इस दशक तक जारी है। कवि का आक्रोश देर तक संयमित नहीं रह पाता। मनुष्य के राक्षस बनने की प्रक्रिया पर कवि उस विचारहीन, बेढाल, निर्द्वन्द्व अथवा मरे हुए लोगों की भाँति पीढ़ी पर व्यंग्य करता है इंतजार करता है-

मैं इंतजार में था / कि शब्द किस तरह बारूद और बंदूक 
में ढलेंगे / कब उन शक्लों में ढलेंगे /जिनका सदियों से
कर रहा मैं इंतजार।                   (वही, पृ. 136)

कवि का यह आक्रोश ‘धूमिल’ के उस प्रश्न की तरह है, जो संसद से पूछता है कि वह तीसरा व्यक्ति कौन है जो रोटी से खेलता है? संसद मौन है। कवि विमलेश त्रिपाठी का मानना है कि राजनीतिक व्यवस्था भी मरे हुए लोगों का जमघट है। इसी कारण यह दृश्य है-

गूंजता अट्टहास / होते थे चुनाव / जीतती थीं पार्टियाँ
होते थे जश्न / देश की जनता मर रही थी हर रोज /भय से
दुःख से / मक्कारी से / कि अब और कोई रास्ता नहीं
बचा था।                 (वही, पृ. 137)

नई सदी में यदि हमने कुछ खोया है तो वह है - रिश्तों की बुनियाद। दरकते रिश्ते, कम होती स्निग्धता, प्रेम और आत्मीयता, इतिहास की वस्तु बनते जा रहे हैं। कवि आने वाली पीढ़ी को रिश्तों को नदी के पानी की तरह बचाने और प्रेम-पत्रों की तरह सहेजने की बात कहता है। जब कभी रिश्ते टूटने लगे तब वह कहता है-

और पड़ने लगे /गाँठ कोई अगर / तो मेरी ओर नहीं
अपने पूर्वजों की ओर देखना  / जिनने सब सहकर भी
अपने बीच की आँच को असंख्य वर्षों तक बचाए रखा।
                                                (अंकुर के लिए, पृ. 63)

कवि की उक्त आकांक्षा ‘सपने’, ‘बहुत ज़माने पहले की ‘बारिश’, ‘ओझा बाबा को याद करते हुए’, ‘तुम्हें ईद मुबारक हो सैफूदीन’, ‘घर’, ‘हम बचे रहेंगे’, आदि कविताओं में भी प्रकट होती है।

विगत दशक में ‘स्त्री-पीड़ा’ की व्यापक चर्चा हुई है, स्त्री-चेतना की मुखर अभिव्यक्ति से कविताओं का कथ्य मौलिकता से प्रस्तुत हुआ है। भारतीय समाज की मध्यकालीन मानसिकता से बेटियों को सदैव अपनी भावनाओं को दफन करना पड़ता है। ‘बड़ी होती बेटी’ के लिए समाज के बंधनों को मदन कश्यप ने लिखा-‘कलेजे में दबा रहे दुःख /भूख और विचारों को मारना सीखो  /अपने को अपने भीतर गाड़ना सीखो।   (तद्भव, अंक 16, पृ. 108) कवि विमलेश त्रिपाठी ने उस वर्ग को ‘बिना नाम की नदियाँ’, कहा है। सदैव स्नेह, प्यार और स्निग्धता की निर्मल धारा बहाने वाली इन बेटियों को हमारे समाज ने कभी मान नहीं दिया। कवि के शब्दों में वे बिना नाम की नदियाँ हैं। सदियों से बहती आ रही सतत्। कवि उन बंधनों की समाप्ति चाहता है-

उन्हें जरूरत उस मृत्यु की /जिसके बाद सचमुच का
जीवन शुरू होता है।     (होस्टल की लड़कियाँ, पृ. 49)

कवि यह भी प्रश्न उठाता है-

क्या कभी भाईयों ने भी व्रत रखे /अपनी बहनों 
के लिए।           (बहनें, पृ. 39)

कविता संग्रह की अन्य कविताओं यथा- ‘उस लड़की की हँसी’, ‘माँ के लिए’, ‘अगर भेजना’, ‘एक स्त्री के लिए’, ‘आजी की खोई हुई तस्वीर मिलने पर’ आदि में स्त्री-पीड़ा लैंगिक भेद और स्त्री-सम्मान के प्रश्नों को उठाते हुए उसकी मार्मिक पीड़ा को अपने स्तर में प्रकट किया है। बेटी अपने बाबुल से कहती है-

भेजना मुझे तो भेजना मेरे बाबुल /उस लोहार 
के पास भेजना / जो मेरी सदियों से बेड़ियों
को पिघला सके।    (अगर भेजना, पृ. 42)

कैसी विडम्बना है कि सभ्य होने का दंभ भरने वाली यह मानव जाति इक्कीसवीं सदी में भी जातीय उन्माद, धार्मिक असहिष्णुता और नक्सली हिंसा का सामना कर रही है। यह परिणाम तथाकथित बुद्धिजीवी संकुचित मानसिकता का कारण है जो सभ्यता को धर्म और जाति के आवरण में परिभाषित करती है। आज की पीढ़ी इन बंधनों को तोड़ना चाहती है। कवि भी उस भावना को प्रकट करते हुए सैफूदीन को ईद की मुबारकबाद देने के बदले अपने पूर्वजों के मानसिक संकोच को प्रकट करता है-

मेरे पिता ने कभी सिवइयाँ नहीं खाई /तुम्हारे घर /
माँ ने हमेशा तुम्हें दूसरे कप में चाय दिया /
तुम घर के भीतर कभी नहीं गए मेरे /   (तुम्हें ईद मुबारक हो सैफूदीन, पृ. 61)

सभ्यताओं को जब ‘धर्म’ का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया गया है। अंध-श्रद्धा ने मानवीय कटूता को जन्म दे दिया। कभी अत्यधिक मांग ने किसी का हक छीना तो ‘नक्सली’ चिंताओं ने समाज की व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लगा दिए। जातीय उन्माद, प्रतिहिंसा के भाव और प्रतिशोध की चिनगारी लिए इस नई सदी का प्रवेश हुआ। सांप्रदायिक विद्वेष की परिणति को अष्टभुजा शुक्ल ने ‘बस्ती एक धीमा शहर है’ में लिखा - कि कहीं मिलता है आधा जला हुआ दुपट्टा। कहीं आधा जला हुआ खिलौना/ कहीं अधजली बीड़ी/ कहीं दमकलों के पाइप/ कहीं रिलजले/ कहीं कहीं तो केवल जलन मालूम होते हैं। (तद्भव, अंक 10)। कवि विमलेश त्रिपाठी ने सत्तर के दशक का हमारा समाज और मानवता की नियति का जो शब्द-चित्र खींचा है, वह भी कुछ कम नहीं है 

सत्तर के दशक की / एक रईस और खानदानी महिला के नाम 
के साथ / सड़क पर बेतहाशा भागते-छुपते /मासूम और तथाकथित 
नक्सलियों की लोहे की गोलियों से छलनी हुई लाशों लिखी होती हैं
सन चौरासी का डर / गुजरात की शर्म /और उस औरत का पेट लिखा होता है /
जिससे निकाल कर एक बच्चे को / एक कभी न बुझती हुई /
आग में झोंक दिया गया था।        (एक पागल आदमी की चिट्टी, पृ. 105)

ऐसे विकट दौर में बुद्धिजीवी वर्ग अनिर्णय का शिकार है। वह लाभ का सौदा दिखने पर दौड़ लगाता है। आडम्बर व खुशामद की दुनिया में अपनी मानता है। मानसिक गुलामी को वह ‘सुविधा’ समझता है, गंतव्य उसे ज्ञात नहीं, विसंगतियों पर मौन-प्रतिक्रिया देता है। तब कवि अपने आपको बुद्धिमान कहलाना पसन्द नहीं करता। त्रासद व्यंग्य करते हुए कहता है-

आज के समय में बुद्धिमान होना / बेईमान और 
बेशरम होना है / इसीलिए है भंते बुद्धिमानों  
की दुनिया में / मैं मूर्ख रहकर ही जीना चाहता हूं। 
(स्वीकार, पृ. 15)

कवि का यह दुःख ‘न रोको कोई’, ‘यदि दे सको’, ‘जिंदा रहूंगा’ ‘इस बार सच’ आदि में प्रकट होता है तो वह घोषणा भी कर देता है-

कलम बंद करो / मंच से उतरो  / चलो इस देश की
अंधेरी गलियों में / सुनो उस आदमी की बात / उसको 
भी बोलने का मौका दो कोई।    (न रोको कोई, पृ. 16)

कवि की बैचेनी स्पष्टतः महसूस की जा सकती है, उसकी पृष्ठभूमि में, राम की शक्ति पूजा के राजीव नयन, अथवा मुक्ति बोध को ‘ब्रह्मराक्षस’ दिखाई देता है। यह कवि लाचार नहीं, बल्कि व्यवस्था को बदलने के लिए आतुर नजर आता है। वह अपने क्रोध के बाहर आने की प्रतीक्षा में है-

क से अपने क्रोध के बाहर आने की /
क से कर रहा प्रतीक्षा  /       (क से कवि मैं, पृ. 76)

‘नकार’ कविता नहीं, ‘क्या करोगे मेरा’, ‘बचा सका अगर’ आदि कविताओं में कवि को शब्द-संग्राम अब अपर्याप्त लगने लगा है। उसकी दृष्टि में केवल कविता इन समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि उससे बाहर आकर कुछ करने की छटपटाहट है-

एक गुमनाम कवि मैं /अंततः /एक चौराहे पर खड़ा होकर /
जोर-जोर से चिल्लाना चाहता हूँ  /देश / देश और लोकतंत्र /
कि कविता और कविता.......!   (एक देश और मरे हुए लोग, पृ. 152)


देश को बचाने की उत्कट भावना के साथ कवि की दृष्टि पर्यावरण की त्रासदी पर भी गई है। ‘मैं एक पेड़’, ‘पेड़ से कहता हूँ’, 'धरती को बचाने के लिए’, ‘खिड़की पर फदगुरिया’, आदि कविताओं में उस भयावह संकेत को उजागर किया गया है, जब पेड़ों की जगह ‘कक्रीट के जंगल’ देखने को मिलेंगे। कवि की चिंता स्पष्ट है-

और कि आखिर /पेड़ भी गिरेगा एक दिन /
पेड़ की जगह /उग आएगी एक इमारत शानदार /
मैं देखता खड़ा रहूंगा /घर की अकेली खिड़की से।
(मैं एक पेड़, पृ. 22)

संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए एक पाठक को कवि का तिक्त जीवन, पीड़ा और गहरी संवेदना के साथ ‘मुक्ति बोध की तड़प’ महसूस होती है, बीच-बीच में प्रकृति प्रेम, वैज्ञानिक बोध भी प्रकट होता है। समस्याओं से समाधान के लिए कवि जब मंच से उतर कर लोहा लेता है तब वह कोई ‘एक्टीविस्ट’ दिखता है। कविता में सीधी-सपाट तीव्र भाव बोध वाली शब्दावली उन नए कवियों के लिए प्रेरणादायी है, जो बेवजह उसे जटिल बना रहे हैं। कभी-कभी कवि ने अपने विचारों को भावावेश के कारण एक से अधिक बार प्रकट कर दिया है अथवा अनावश्यक विस्तार भी दे दिया है। यही नहीं आक्रोश के क्षणों में ‘असंयत शब्दावली’ का भी प्रयोग किया है, जिससे बचा जा सकता था, यथा-

एक ऐसा समय था वह  / जब मंच पर एक आदमी नैतिकता 
की उल्टी करता /और रात में बन जाता एक खूंखार दैत्य /
किसी मजबूर लड़की के साथ रात बिताता।  (एक देश और मरे हुए लोग, पं. 137)

लेकिन उसे भावों की तीव्रता के क्षणों का आभास भी माना जा सकता है। कवि ने कहीं कोलाजनुमा कविता का शिल्प भी बुना है, जैसे- ‘क से कवि मैं’। इसी प्रकार लुप्त होते गीतितत्व की झलक ‘जीवन का शोक गीत’ में दिखाई देती है। लम्बी कविताएँ स्पष्टतः मुक्तिबोध की परम्परा का अनुसरण है, यहाँ तक कि निहित भावों में भी समानता है। भाषा में आँचलिकता का पुट सरसता प्रदान कर रहा है। प्रयोगवादी कविता की तरह कहीं- कहीं शब्द चमत्कार भी अधिक हो गया है, जैस कि ‘पानी’ कविता में।

अंतिम खण्ड ‘एक देश और मरे हुए लोग’ में फैंटेसी है, जिसके सहारे कवि ने अपने कथ्य को पाठकों तक गहरी और पैनी धार से पहुंचाया है। संबोधन शैली में हे भंते। आकृष्ट करता है। बहुत अच्छे ढंग से अपनी बात कहने के बाद भी कवि का यह कथन कि एक शब्द साझा करने में / करनी पड़ती सदियों की यात्राएँ / और मैं हूं कि लाख कोशिश के बाद भी / वह कर नहीं पाता’ उनकी विनम्रता का द्योतक है। ‘बोधि प्रकाशन’ का आकर्षण मुद्रण सदैव प्रशंसनीय रहता है। मूल्य मात्र 99/- है। मेरा स्पष्ट मत है कि यह कविता संग्रह वर्तमान परिवेश को बखूबी उजागर करने के साथ विसंगतियों के समाधान का विकल्प प्रस्तुत करती है।



डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी: 
युवा समीक्षकमहाराणा प्रताप राजकीय, स्नातकोत्तर महाविद्यालयचित्तौड़गढ़ में हिन्दी प्राध्यापक हैं। आचार्य तुलसी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर शोध भी किया है। स्पिक मैकेचित्तौड़गढ़ के उपाध्यक्ष हैं। अपनी माटी में  प्रबंध सम्पादक हैं। शैक्षिक अनुसंधान और समीक्षा आदि में विशेष रूचि रही है। मो.नं.+91-9828608270, डाक का पता:-सी-79, प्रताप नगरचित्तौड़गढ़ ,ब्लॉगई-मेल Print Friendly and PDF

'आंगन में कविता' पहला आयोजन

प्रेस विज्ञप्ति
अपनी माटी का आयोजन आंगन में कविता संपन्न

चित्तौड़गढ़ 2 फरवरी,2014

बदलते दौर के बीच साहित्यिक परिवेश में बहुत कुछ आशाजनक बदलाव आये हैंछपे हुए शब्दों की दुनिया के बाद हाल के सालों के इस इंटरनेटी युग में साहित्य की कई विधाओं के ई-संस्करण शुरू हो गए हैं।पढ़ने-लिखने वालों के संसार में भी यह बहुत बड़े बदलाव का सूचक समय हैंपाठकीयता बढ़ी हैकिताबें सुलभ हुयी हैंरुचियों में आये वैविध्य के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं का विस्तार पर्याप्त रूप से हुआ हैखूब बड़ी मात्रा में छप रहे इस सारे साहित्य को ही अच्छा साहित्य मान लेने की ग़लती करने के बजाय हमें विवेक के साथ चुनाव करना चाहिएइधर कविताएँ जिस ढ़ंग से लगातार लिखी जा रही है सही दिशा वाली कविताओं का चयन बड़ा मुश्किल हो रहा है।आतंरिक लय और छंद लगभग षडयंत्रकारी ढ़ंग से बिसरा दिए गए हैंकचरा अधिक है सार्थक रचनाओं और चिन्तनशील लेखकों का संकट हैइस बीच हमें अपनी पाठकीयता को बढ़ाने के लिए सधे हुए कदमों से आगे बढ़ना होगा

यह विचार दो फरवरी को अपनी माटी द्वारा विशाल अकादमी सियिनर सेकंडरी स्कूल,गांधी नगर,चित्तौड़गढ़ में आयोजित आंगन में कविता कार्यक्रम में उभरी।जहां कार्यक्रम की अध्यक्षता शिक्षाविद डॉ ए एल जैन ने की वहीं और चिन्तनशील अधिवक्ता भंवर लाल सिसोदिया ने मुख्या आतिथ्य निभाया।शुरुआती सत्र में अपनी माटी की सचिव डालर सोनी ने संस्थागत गतिविधियों पर रिपोर्ट पढ़ी।कोषाध्यक्ष सीमा सिंघवी ने आय-व्यय का व्यौरा रखा।इस अवसर पर अपनी माटी रेडियो क्लब की शुरुआत की औपचारिक घोषणा भी की गयी

आंगन में कविता की शुरुआत माणिक ने अवतार सिंह संधू पाश की कविता सबसे खतरनाक के पाठ से की।कविता पाठ का दौर बहुत आगे तक गया निराला की राम की शक्तिपूजा से लेकर मुक्तिबोध की लम्बी कविता अँधेरे में तक।गीतकार रमेश शर्मा, कौटिल्य भट्ट, अब्दुल ज़ब्बार  सरिता भट्ट, और डॉ ए एल जैन ने प्रख्यात ग़ज़लों और चुनिन्दा शेर पढ़कर फैज़ से लेकर अदम गोंडवी, निदा फाज़ली, बशीर बद्र, कैफ़ी आज़मी और दुष्यंत कुमार तक को याद किया। उपस्थित साहित्यिक बिरादरी में डॉ राजेन्द्र सिंघवी ने नागार्जुन, डॉ रेणु व्यास ने मुक्तिबोध, डॉ राजेश चौधरी ने अष्टभुजा शुक्ल, डॉ कनक जैन ने विष्णु खरे, डालर सोनी ने निर्मला पुतुल को पढ़ा। इस तरह साहित्यिक हल्के के हर युग की आवाज़ देती कविताएँ सुनायी गयी।लगभग तमाम कविताएँ आधुनिक युग का ही बोध कराती रही

इस मौके पर सभी ने त्रिलोचन, श्रीधर पाठक, ऋतुराज, रमेश तैलंग, निर्भय हाथरसी और रमानाथ अवस्थी को फिर से जिया। नवाचारी ढ़ंग से आयोजित इस कविता केन्द्रित कार्यक्रम में लगभग बाईस मित्रों ने पाठ किया जिनमें सुमित्रा चौधरी, रेखा जैन, अशोक उपाध्याय, लक्ष्मण व्यास, मुन्ना लाल डाकोत, जे पी दशोरा, राजेश रामावत और डॉ सत्यनारायण व्यास शामिल हैंआयोजन के अंत में बीते महीनों दिवंगत हुए प्रख्यात रचनाकारों को मौन रखकर याद किया गया जिनमें राजेन्द्र यादव,विजय दान देथा,नामधार ढसाल,ओम प्रकाश वाल्मीकि,परमानंद श्रीवास्तव शामिल थे

पूर्वोत्तर यात्रा

यात्रा में डॉ राजेन्द्र सिंघवी, मुन्ना लाल जी डाकोत,भावना शर्मा,और जितेन्द्र सिंघवी शामिल थे


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