कन्हैया लाल सेठिया का दार्शनिक चिंतन

कन्हैया लाल सेठिया का दार्शनिक चिंतन
(मधुमती, जनवरी-2020 में प्रकाशित)


“दृश्यतेऽनेनेति दर्शनम्‘ या‘ दृश्यते ज्ञायतेऽनेनेति दर्शन मित्यु च्यमाने”1 अर्थात् जिसके द्वारा देखा जाए, जाना जाए, उसे दर्शन कहते हैं । यह दर्शन की अनुभूति सापेक्ष परिभाषा है । दर्शन का सीधा और सरल अर्थ है- साक्षात्कार करना अर्थात् वस्तु स्वरूप का बोध करना । दूसरे शब्दों में वह सत्यानुभूति या सत्य का साक्षात्कार है ।2 

दृश्य तो सभी देखते हैं पर दृष्टि भिन्न होती है । यही दृष्टि एक सामान्य व्यक्ति से एक कवि को और एक सामान्य कवि से एक विशिष्ट कवि को अलग करती है । सेठिया जी ने जीवन को उसके मूल से शिखर तक अथ से इति तक देखा और अनुभव किया । उसमें रमे और एकाकार हुए, फलतः उनका काव्य जीवन की समग्रता का काव्य बन गया । डॉ. भगवती लाल व्यास का उक्त कथन अवलोकनीय है, “सेठिया जी के संपूर्ण काव्य पर यदि एक वाक्य में समाहारात्मक टिप्पणी का साहस किया जाय तो मेरी विनम्र मति में वह वाक्य होगा - सेठियाजी जीवन की समग्रता के दार्शनिक कवि हैं ।”३

विगत सात दशकों से निरंतर साहित्य साधना में रत कविवर सेठिया जी ने राजस्थानी और हिन्दी दोनों भाषाओं में न केवल उत्कृष्ट साहित्य का सृजन किया, बल्कि अपने जीवन में जिया भी है । अपनी आरंभिक कृतियों में, यथा- ‘वनफूल‘,‘अग्निवीणा‘, ‘आज हिमालय बोला‘, ‘मेरा युग‘ आदि के गीतों में कवि ने खण्डित समस्याओं को सामाजिक चेतना प्रदान की और राष्ट्रप्रेम का स्वर मुखरित किया । ‘दीपकिरण‘ प्रेम की पवित्रता को अभिव्यंजित करती है, जिसमें छायावादी पृष्ठभूमि का दिग्दर्शन होता है ।

‘प्रणाम‘, ‘मर्म‘ एवं ‘अनाम‘ कविताओं में कवि की आध्यात्मिक चेतना दार्शनिक गहराई के साथ प्रकट हुई है, इनमें जीवन का सत्य शाश्वत सा प्रतीत होता प्रकट हो रहा है ं उनकी दार्शनिक चेतना का भव्य रूप ‘निर्ग्रन्थ’ और ‘त्रयी‘ में बिम्बित होता है, जिसमें कवि ईश्वर से साक्षात्कार करता हुआ दृष्टिगोचर होता है । ‘स्वगत’ में कवि अन्तर्जगत की ओर उन्मुख होते हुए दिखाई देते हैं, वहीं ‘देह-विदेह’, ‘आकाश-गंगा’, ‘वामन-विराट’, निष्पत्ति’, ‘श्रेयस’ आदि रचनाओं में विराट सत्य की छवि प्रतिभासित होती है ।

श्री सेठिया जी का कवि-मन भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि से आकर्षित रहा है । उनके काव्य में समस्त भारतीय दर्शनों के मूल तत्त्व यत्र-तत्र दृष्टि में आते हैं, फिर भी उनका कवि - हृदय उनके जीवन-संस्कारों से सर्वाधिक प्रभावित हुआ है । कवि प्रवर सेठिया जी का जन्म जैन परिवार में होने से स्वाभाविक रूप से जैन-दर्शन के आध्यात्मिक तत्त्वों का प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देता है । जैन परम्परा में ‘आचारांग सूत्र’ जैसे अति प्राचीन ग्रंथ में दर्शन शब्द सामान्यतया अनुभूति के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । जैन कर्म सिद्धांत में दर्शन शब्द का प्रयोग आज भी अनुभूति के अर्थ में ही किया जाता है । सेठिया जी की काव्य-दृष्टि भी इसी रूप में प्रतिबिम्बित होती है । जिसका सम्यक् विवेचन द्रष्टव्य है । 

जैन दर्शन में मूलतः ‘तत्त्व’ दो ही माने गए हैं- 1.जीव तत्त्व, 2.अजीव तत्त्च ।4 एकांगी दृष्टि से इनके स्परूप को समझना आसान नहीं । इसी कारण ऋषियों ने इसे समझते हुए भी ‘नेति-नेति’ कह दिया और वैज्ञानिक जड़-चेतन के ऊहापोह में खो गए । जैन दर्शन की ‘अनेकांतवादी’ दृष्टि से ‘जीव-अजीव’ को समझा जा सकता है । कवि की पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

पीछे के पीछे भी कुछ हैं
आगे के आगे भी कुछ हैं ।
समझ लिया ऋषियों ने लेकिन
नेति नेति कह मौन हो गये,
जो वैज्ञानिक जड़-चेतन के
ऊहापोह के बीच खो गये,
-   -  -
आग्रह मुक्त हुए जो उन ने
अनेकांत को दर्शन माना ।
          (त्रयी)


‘मोक्ष’ जीव की उस अवस्था का नाम है, जहाँ न जन्म है न मरण । जन्म-मरण से रहित यह अवस्था बंध के कारणों के अभाव और कर्मों की पूर्ण निर्जरा से प्राप्त होती है । तत्त्वार्थ सूत्रकार ने समस्त कर्मों के क्षय का नाम मोक्ष बतलाया है ।5 कवि-मन भी जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति चाहता है, यथा-

बन न सका नवनीत, मथ रहा
कब से जाने तक्र ?
कर समग्र अब छूटे मेरा 
जन्म मरण का चक्र,
मुझे सताते हैं भव-भव के
बाँधे कर्म अनन्त !
(निर्ग्रंथ)
श्रमण के मूलगुणों में पाँच महाव्रत प्रमुख हैं । श्रमण के समस्त आचार-विचार एवं व्यवहार का नियंत्रक तत्त्व उसके महाव्रत हैं । प्राणातिपात विरमण व्रत अर्थात् अहिंसा को प्रथम महाव्रत माना गया है । दशवैकालिक सूत्र में कहा गया है, कि जगत में जितने भी त्रस और स्थावर जीव हैं, श्रमण उनकी हिंसा से विरत रहता है ।6 अहिंसा को कवि ने समग्र दर्शन का पर्याय माना है-

है अहिंसा / अपने आप में / समग्र दर्शन,
नहीं बचाने का / बचने का / निर्देशन,
दया, प्रेम, करूणा / मात्र दैहिक बोध
अनुकम्पा आत्मा का / परिशोध ।
(श्रेयस)
‘सत्य’ महाव्रत के अन्तर्गत श्रमण मन, वचन और काया तथा कृतकारित और नवकोटियों सहित असत्य का परित्याग करता है । आचारांग सूत्र में सत्य के अनुसार प्रवृत्ति करने की प्रेरणा दी गई है ।7 कवि ने सत्य का परिधान रत्न-त्रयी (चारित्र,दर्शन व ज्ञान) को माना है-

नहीं होता सत्य
किसी का अनुयायी
वह अपने में पूर्ण इकाई
वह दिगम्बर/उसका परिधान
चारित्र - दर्शन -ज्ञान ।

(त्रयी)
पाँचों इन्द्रियों के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध- ये पाँच प्रकार के विषय हैं । इनमें राग-द्वेष नहीं करना- ये ‘अपरिग्रह’ महाव्रत की भावनाएँ हैं ।8 कवि ने अपरिग्रह को ‘कैवल्य’ की भूमिका के रूप में स्वीकार किया है-

ज्ञान का नवनीत
दर्शन का अमृत
चरित्र की कौस्तुभ मणि
तप की उपलब्धि
भूति की विभूति
कैवल्य की भूमिका
अपरिग्रह ।
(निर्ग्रंथ)
जैन-दर्शन अनेकांतवादी दर्शन है । एक ही वस्तु में अनेक विरोधी धर्मों को स्वीकार करने वाले सिद्धान्त के निरूपण की पद्धति है- स्याद्वाद । अस्ति-नास्ति, नित्य-अनित्य, एक-अनेक, सम-विषय, वाच्य-अवाच्य ये वस्तु में निश्चित रूप से पाये जाने वाले विकल्प हैं । इन विरोधी युगलों को समझकर स्याद्वाद का स्वाद चखा जा सकता है ।9 कवि ने भी इसी   दृष्टि को अपनी कविता में प्रकट किया है- 

अस्ति - नास्ति हैं जुड़वाँ दोनों
सहज सत्य यह द्वन्द्व नहीं है,
नीड़ नहीं कारा है खग की 
पंखों पर प्रतिबंध नहीं है ।।
(त्रयी)
‘द्वैत-अद्वैत’ पर विचार करते हुए कवि ने अभिव्यक्ति और अनुभूति से उसका संबंध व्यक्त करते हुए स्मृति-विस्मृति का पर्याय बताया-

अभिव्यक्ति / दिवस की / जला हुआ दीप,
अनुभूति / निशा की / बुझा हुआ दीप,
स्मृति द्वैत / विस्मृति अद्वैत ।।
(आकाश गंगा)
जैन-दर्शन में ‘कैवल्य’ को चरम ज्ञान माना गया है । इस हेतु ‘रत्नत्रय’ की साधना पद्धति है । रत्नत्रय की साधना से अभिप्राय है- सम्यग्दर्शन, सम्यक् ज्ञान ओर सम्यक् चारित्र की आराधना । इसे उमास्वाति ने मोक्ष मार्ग भी बताया है ।10 कवि-प्रवर सेठियाजी ने भी कैवल्य को प्रज्ञा की क्रिया के रूप में स्पष्ट किया-

नहीं / बुद्धि की / प्रतिक्रिया
कैवल्य / वह क्रिया
प्रज्ञा की !
(आकाश गंगा)

रत्न त्रय / हुये उद्भासित
दिव्य अतिशय में
आत्मा के
अनंत चतृष्ट्य !
(निर्ग्रंथ)
‘णमोकार’ मंत्र को जैन-दर्शन में महामंत्र माना गया है । जिसमें अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय व लोक के समस्त साधुओं की वन्दना है । कवि ने भी इस मंत्र के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की है- 

नहीं किसी / याचक की प्रार्थना
कि देवता / पूरी करें कामना
-  -  -
केवल नमन / उनको
जो अरिहंत / जो संत
भले ही उनका
कोई धर्म / कोई पंथ
मात्र समर्पण की / वर्णपासना
णमोकार मंत्र !
(निर्ग्रंथ)
जैन-दर्शन के अनुसार ईश्वर विशुद्ध आत्मा है । प्रत्येक आत्मा में परमात्मा रूप बनने की शक्ति है । विष्णु, परम ब्रह्म, ईश्वर, सुगत, शिव और जिन इत्यादि सभी उसके ही नाम हैं।11 कविवर सेठिया जी के कवि मन में उस परम तत्त्व की कल्पना अवश्य है, इसी कारण वे लिखते हैं-

मैं अनादि हूँ मुझे व्यापता,
कभी नहीं इति-अथ का संशय,
मैं अरूप अनुभूत चिरंतन,
पूर्ण मात्र ही मेरा परिचय ।
(प्रणाम)
‘द्वन्द्व’ यदि जीवन का अभिशाप है, तो उससे ‘निर्द्वन्द्व’ होने का मार्ग भी दिखाई देता है। अर्थात् द्वन्द्व परमानंद का माध्यम भी बन सकता है । मुक्ति का द्वार भी कारा से अलग नहीं है, यथा-

मुक्ति / का / द्वार
अभिन्न अंग है
कारा
का !
(अनाम)
समग्रतः सेठियाजी कवित्व दार्शनिक पृष्ठभूमि पर उतर कर रहस्यमय सा हो गया है, परन्तु यह अनुभूत सत्य है, उससे विस्मृत होना संभव नहीं । कवि प्रवर का दार्शनिक मन न केवल जीवन की अर्थवत्ता सिद्ध कर रहा है, बल्कि जीवन के उस पार की भी मधुमय कल्पना कर रहा है । इसकी आधारभूमि में जैन-दर्शन की समग्रता भी उनके चिंतन का केन्द्र बन गई है, फलतः कविता की रस-धारा में दर्शन अथवा दर्शन के शुष्क धरातल पर काव्य की रसधारा प्रवाह मान है, यह निर्णय करना भी अकल्पनीय है । यह अवश्य कहना समीचीन होगा कि ‘जीवन’ व ‘मनुष्य’ के साथ ‘भारतीय संस्कार’ उनके काव्य के चरम विषय हैं, जो कि दर्शन की पृष्ठभूमि पर भारतीय ऋषि-परम्परा की भाँति मानवता के पथ का संधान कर रहे हैं । इसी कारण वे मनुष्य की नियति को रेखांकित कर पाते हैं और जीवन का गंतव्य निर्दिष्ट कर देते हैं, यथा-

नहीं / जा सकेंगे
शब्द / और आगे
करनी होगी । अकेले
सतोपंथ की यात्रा 
नहीं रहेगा साथ
लेने परीक्षा
कोई श्वान
नहीं आएगा स्वर्ग से
कोई रथ
होगा / वहाँ पहुँच
अनुभूत
केवल / असंग !
(निष्पत्ति)

-संदर्भ ग्रंथ सूची-
1. षड़दर्शन समुच्चय- हरिभद्र सूरि, पृ. 2/18, उद्धृत जैनेन्द्र सिद्धांत कोश, भाग-2, पृ. 405-406
2. डॉ. सिसोदिया, सुरेश, जैन धर्म संप्रदाय,पृ. 121
3. उद्धृत- कन्हैया लाल सेठिया, समग्र भाग-2, संपादक- जुगल किशोर जैथलिया, पृ.660 
4. (क) स्थानांग सूत्र, 2/1  (ख) प्रवचन सार, 2/35
5. तत्त्वार्थ सूत्र- 10/3
6. दशवैकालिक सूत्र- 4/42, 6/9
7. आचारांग सूत्र-1/3/3/127
8. डॉ. सिसोदिया, सुरेश, जैन धर्म संप्रदाय,पृ. 168
9. डॉ. राजेन्द्र, आचार्य तुलसी की काव्य-साधना, पृ.228
10. “सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्ष मार्ग”- तत्त्वार्थ सूत्र- 1/2
11. वृहद् द्रव्य संग्रह, संस्कृत टीका, गाथा- 14

“ रमेश उपाध्याय की कहानियों का सामाजिक यथार्थ ”

यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हुयी है वहीं से साभार यहाँ भी।

हालांकि इधर रमेश उपाध्याय जैसे सजग हस्ताक्षर के लेखन में 'त्रासदी...माई फुट!', 'प्राइवेट पब्लिक', 'ग्लोबल गाँव के अकेले' और 'हम किस देश के वासी हैं' जैसी और भी कहानियां भी बाद में आयी है है मगर उनके आने से पहले तक के सफ़र पर एक नज़र में डॉ राजेन्द्र सिंघवी ने एक आलेख हमारे पाठकों के हित लिखा है फिलहाल तो उसी का स्वागत है -सम्पादक ,'अपनी माटी डॉट कॉम' 

“ रमेश उपाध्याय की कहानियों का सामाजिक यथार्थ ”
डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी


रमेश उपाध्याय(वरिष्ठ साहित्यकार)


(एक दशक तक पत्रकार रहने के बाद तीन दशकों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन तथा साहित्य और संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका ‘कथन’ के साथ-साथ ‘आज के सवाल’ नामक पुस्तक शृंखला का संपादन। संप्रति स्वतंत्र लेखन, विविध विषयों का अध्ययन-मनन और साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन। चौदह कहानी संग्रह, पाँच उपन्यास, तीन नाटक, कई नुक्कड़ नाटक, चार आलोचनात्मक पुस्तकेंऔर अंग्रेजी तथा गुजराती से अनूदित कई पुस्तकें प्रकाशित)



साहित्य संसार के प्रति मानसिक प्रक्रिया अर्थात् विचारों व भावों की अभिव्यक्ति है । यह ‘हित का साधन’ भी करता है, अतः संरक्षणीय भी है । इसे समाज का उत्पादन भी कहा जाता है, जिससे विशाल मानव जाति की आत्मा का स्पन्दन ध्वनित होता है । साहित्य जीवन की व्याख्या भी करता है, इसी कारण उसमें जीवन देने की शक्ति भी आती है । इस प्रकार साहित्य व समाज का अन्योन्याश्रयत्व चिरकाल से रहा है । 

डॉ. रमेश उपाध्याय की कहानियों में सामाजिक यथार्थ की बिम्बमय अभिव्यक्ति हुई है । सामाजिक न्याय की अवधारणा को साहित्य में उठाया और कहा- “हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि भारतीय समाज से कुछ चीज़ें एकदम गायब हैं । उसमें से एक चीज है-बराबरी । ....... अगर हम लम्बी अवधि तक बराबरी को नकारते रहेंगे, तो एक दिन हमारा जनतंत्र खतरे में पड़ सकता  है ।”

(पहल-51, सं. ज्ञानरंजन, पृ.253)

हिन्दी के दलित लेखन में तो यह अक्सर कहा जाता है कि जाति एक वास्तविकता है और उसे स्वीकार करना ही होगा, लेकिन इस बात पर विचार नहीं किया जाता कि यदि जाति-व्यवस्था सामाजिक अन्याय की जड़ है, तो वह समाप्त कैसे होगी? इसीलिए रमेश उपाध्याय कहते हैं- “जो साहित्य सामाजिक अन्याय का विरोधी है, उसे उस भविष्य की चिंता करनी ही चाहिए ।”

(शेष इतिहास, पृ.4)

रमेश उपाध्याय जानते हैं कि नवधनिकों की उपभोक्तावादी अपसंस्कृति का परिणाम यह हुआ है कि सामाजिक विरूपता और आगे बढ़ रही है । शादी का एक दृश्य- “कारों का काफिला होते हुए भी दूल्हा घोड़ी पर चढ़ेगा । नशे में धुत्त लोग घोड़ी के सामने ‘नाच’ नामक उछलकूद करेंगें, जिसमें नृत्य की न कोई लय-ताल होगी न सार्थक भाव मुद्रा । ......... धक्का-मुक्की करते हुए लोग खाने पर इस तरह टूट पडें़गे, जैसे खाना कभी देखा नहीं ।”

(शेष इतिहास, पृ.24)

साहित्य से मनुष्य की भावनाएँ कोमल बनती हैं । उसके भीतर मानवीय गुणों का विकास होता है, शिष्टता और सभ्यता आती है । इससे समाज का विकास होता है । समय के साथ इसमें उत्तरोत्तर ह्रास हो रहा है, जिसके मूल में है- उदारवादी अर्थनीति व भूमण्डलीकरण का दौर । इसका दुष्प्रभाव यह हुआ है कि हम दिन-प्रतिदिन रिश्तों को खोते जा रहे हैं । हमारे पास डिग्रियाँ, पैसा, ऐश्वर्य सब-कुछ हैं, लेकिन रिश्ते टूट रहे हैं । हमारे समाज का आम आदमी पहले तो अपने बच्चों की परवरिश के लिए रिश्तों से दूर भागता है, परन्तु जब बच्चे बड़े होकर उन्हें छोड़ जाते हैं, तब रिश्ते याद आते हैं । बुजुर्गों से भरी कॉलोनियाँ किलकारियों की उम्मीद में तरसती रह जाती  हैं । रमेश उपाध्याय की कहानी ‘शेष इतिहास’ का यह अंश द्रष्टव्य है- “एक गरीब किसान बाप जो दूसरों के खेतों पर मजूरी करता है । एक नंगा भूखा परिवार जो सहुआ से एक बार कर्ज लेकर ब्याज चुकाते-चुकाते ही मर खप जाता है, उसका बेटा जो थोड़ा-सा पढ़ लिख गया है, शहर चला आता है ।” 

परम्परा समाज को जोड़ती है और परम्परा में जब अपसंस्कृति का मिश्रण होता है तो आडम्बर स्थान लेते हैं । आडम्बर रूढ़ि का रूप ग्रहण कर समाज को जर्जर बना देते हैं, अतः समयानुकूल परिवर्तन के लिए तैयार रहना चाहिए । डॉ. उपाध्याय की कहानी ‘शंख ध्वनि की कथा’ बताती है कि कोरे उपदेश से क्रांति संभव नहीं है । ‘राष्ट्रीय राजमार्ग’ कहानी में बताया गया कि दलित के लिए आरक्षण की सुविधा के बावजूद गरीब होने के कारण उसके लिए नौकरी प्राप्त करना दुर्लभ है और आरक्षण का लाभ भी अमीर ही उठा ले जाते हैं ।” यहाँ तक कि संस्कृति का आधार भी अर्थतंत्र हो गया है । ‘अर्थतंत्र’ कहानी में राघवन कहता है- “हमारे सामाजिक संबंध ही नहीं, सूक्ष्म और कोमल भावनाएँ भी बदल गई है । प्रेम, करूणा, सहानुभूति, सेवा और पूजा, प्रार्थना तक में अर्थतंत्र घुस गया है ।

आधुनिक युवा संक्रांतिकालीन वेला से गुजर रहा है । माता-पिता की असीम इच्छाएँ उसे कई बार विचलित कर देती हैं दूसरी ओर वह पारिवारिक सामंजस्य भी नहीं बिठा पा रहा है । रमेश उपाध्याय का मत है कि युवा पीढ़ी को अपने विचारों का गुलाम न बनाएँ । वह आपसे उतना ही स्नेह करता है, जितना आप उससे । ‘अर्थतंत्र’ कहानी में सतीश का कथन- “मैं अपना हिस्सा तो चाहता था, लेकिन परिवार से अपना संबंध समाप्त करके नहीं । अभी मैं दूर मद्रास में रहता हूँ, लेकिन यह अहसास बना रहता है कि दिल्ली में मेरा घर है ।” 

समाज का महत्त्वपूर्ण घटक ‘व्यक्ति’ वर्तमान समय में किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में है । तेल बिन्दु की भाँति समस्त जल पर छाना चाहता है । एकांगी दृष्टि के कारण वह एक-दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण कर रहा है । परिणाम स्वरूप वह स्वयं सहज नहीं, समाज सहज नहीं और जीवन में समरसता की जगह बिखराव आ रहा है । डॉ. रमेश उपाध्याय की दृष्टि में इसका समाधान साहित्य में ही है । वे लिखते हैं- “यह सच है कि सिर्फ साहित्य से दुनिया को नहीं बदला जा सकता, लेकिन मानवता के भविष्य से संबंधित नये प्रश्नों को उठाना, उनसे टकराना और उनके उत्तर खोजना उस सृजनशील कल्पना के बिना संभव नहीं है, जो साहित्य में है।”

(सम्पादकीय, कथन- जुलाई-सितम्बर,2007)

समाज की बुनियादी इकाई परिवार है। डॉ. रमेश उपाध्याय कहते हैं- “परिवार साहित्य का सबसे बड़ा सरोकार है । ......... परिवार को अच्छे ढंग से चलाने के लिए आवश्यक है कि  काम कर सकने लायक लोगों को काम मिले, बच्चों को स्वस्थ, सुपोषित, सुशिक्षित और सुसंस्कृत बनाने के साधन मिलें और वृद्धों को मानवीय गरिमा के साथ जीने के साधन उपलब्ध हों ।
   
(डॉक्यूड्रामा और अन्य कहानियाँ, पृ.47)

परिवार के केन्द्र में नारी की भूमिका को विस्मृत नहीं किया जा सकता । उसे ममता, समता व क्षमता की त्रिवेणी माना गया है । ममता से वह नई पीढ़ी का निर्माण करती है, समता से परिवार का संचालन करती है और क्षमता से विपरीत परिस्थितियों में घर की रक्षक बन जाती है । वर्तमान में उसका शोषण किसी से छिपा नहीं है । 'दर्म्यानासिंह'  कहानी में मीनाक्षी कहती है- “दरअसल इस समाज-व्यवस्था में हम स्त्रियों की बड़ी भीषण समस्या है । पूँजीवाद और सामंतवाद दोनों मिलकर हमें ऐसा पीसते हैं कि मित्रता, प्रेम, परिवार हर चीज़ में हमारा शोषण, दमन और अपमान होता है । 

रमेश उपाध्याय सामाजिक यथार्थ को प्रस्तुत कर चुप नहीं हो जाते, बल्कि समाधान की दिशा में काम करते हैं । वे कहते हैं- “यथार्थवाद के प्रथम दौर (प्रगतिशील साहित्यिक आन्दोलन) में हिन्दी कहानी समाज की एक तस्वीर पेश करती थी और पाठक को इस नतीजे पर पहुँचाती थी कि यह समाज अच्छा नहीं है, इसलिए इसे बदला जाना चाहिए । यथार्थवाद का दूसरा दौर (जनवादी साहित्यिक आन्दोलन) में कहानी समाज की ऐसी तस्वीर तो दिखाती ही है, साथ ही समाज के मूल ढाँचे को भी उघाड़कर सामने लाने की कोशिश करती है ताकि वह अपने पाठकों को यह सोचने के लिए प्रेरित कर सके कि समाज को किस तरह बदला जा सकता है।

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