हिंदी का क्रमिक विकास और भारतीय भाषाओं के साथ उसका सम्बन्ध

‘हिन्दी’ शब्द की व्युत्पत्ति का संबंध सिन्धु नदी से है । विदित है कि अधिकांश विदेशी आक्रांता उत्तर-पश्चिम सिंह द्वार से ही भारत में प्रविष्ट हुए । भारत आने वाले इन विदेशियों ने जिस देश के दर्शन किए वह ‘सिन्धु’ का देश था । ईरान (फारस) के साथ भारत के प्राचीन काल से ही संबंध थे । फारसी में संस्कृत की ‘स’ ध्वनि ‘ह’ में परिवर्तित हो जाती है अतः ईरानी ‘सिंधु’ को ‘हिन्दु’ कहते थे । कालान्तर में ‘हिन्दु’ से ‘हिन्द’ बना और स्थानवाचक संज्ञा के रूप में ‘हिन्दी’ शब्द की उत्पत्ति हिन्द देश के निवासियों के अर्थ में हुई । आगे चलकर यह शब्द ‘हिन्द की भाषा’ के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा ।
वर्तमान में ‘हिन्दी’ को जो स्वरूप हमारे समक्ष विद्यमान है, उसका समय के साथ क्रमिक विकास का आधार है । हिन्दी की आदि जननी संस्कृत है । संस्कृत पालि, प्राकृत और अपभ्रंश के मार्ग से गुजरती हुई प्रारंभिक हिन्दी का रूप ग्रहण करती है । हिन्दी भाषा के विकास का विशुद्ध आरंभ ‘अपभ्रंश’ से माना जाता है, जो हमारे देश में 500 ई. से लेकर 1000 ई. के मध्य तक समृद्ध रूप में रही । अपभ्रंश से ही आधुनिक आर्य भाषाओं का भी विकास हुआ है, जो इस प्रकार है-
अपभ्रंश के भेद-आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ-
शौरसेनी-पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती
अर्द्ध मागधी-पूर्वी हिन्दी
मागधी-बिहारी, उड़िया, बांग्ला, असमिया
खस-पहाड़ी
ब्राचड़-सिंधी
पैशाची-पंजाबी
महाराष्ट्री-मराठी
अपभ्रंश के बाद हमारे देश में विविध भाषाओं का विकास होने लगा । इन प्रमुख भाषाओं में गुजराती, बांग्ला, उड़िया, असमिया, सिंधी, पंजाबी, मराठी के साथ हिन्दी भाषा समूह का विकास हुआ । वस्तुतः ‘हिन्दी’ शब्द भाषा विशेष का पर्याय नहीं, बल्कि भाषा-समूह का नाम है। हिन्दी जिस भाषा समूह का नाम है, उसमें आज के हिन्दी प्रदेशों की पाँच प्रमुख उपभाषाएँ यथा-राजस्थानी, हिन्दी, पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी, बिहारी हिन्दी तथा पहाड़ी हिन्दी सम्मिलित हैं । इन पाँच उपभाषाओं की कुल 17 बोलियाँ इसकी संपत्ति है ।
हिन्दी भाषा-समूह व उसकी बोलियों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
उपभाषाबोलियाँ-
पश्चिमी हिन्दी-खड़ी बोली, ब्रज, बांगरू, कन्नौजी, बुंदेली 
पूर्वी हिन्दी -अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी
बिहारी हिन्दी-भोजपुरी, मैथिली, मगही
राजस्थानी हिन्दी-मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी
पहाड़ी हिन्दी-गढ़वाली, कुमाऊँनी आदि ।
इन बोलियों की विशिष्टता है कि किसी निश्चित कालखंड में इन्होंने ‘हिन्दी’ का नेतृत्व किया है, जैसे- आदिकाल में राजस्थानी, भक्तिकाल में अवधी, ब्रज आदि, रीतिकाल में ब्रज तथा आधुनिक काल में खड़ी बोली आदि ।  सुखद पहलू यह है कि अन्य बोलियों ने सहजता से दूसरे का नेतृत्व स्वीकार किया । साथ ही समस्त बोलियों का फलना-फूलना जारी रहा । आज हिन्दी का विशाल साहित्य इन्हीं बोलियों में पल्लवित साहित्य का परिणाम है । इसका क्षेत्र इतना व्यापक रहा कि स्वतंत्रता-संघर्ष में एकमात्र यही भाषा थी, जिसने पूरे भारत को एक सूत्र में बाँध दिया था ।
हिन्दी के व्यापक प्रभाव का प्रमाण कुछ उदाहरणों से पुष्ट होता है । दिल्ली के सहायक रेजिडेंट ‘मेटकॉफ’ ने फोर्ट विलियम कॉलेज के ‘हिन्दुस्तानी’ के विभागाध्यक्ष जॉन गिलक्राइस्ट को एक पत्र लिखा- “भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, कलकत्ता से लेकर लाहौर तक, कुमायूँ के पहाड़ों से नर्मदा तक, अफगानों, मराठों, राजपूतों, जाटों, सिक्खों और उन प्रदेशों के सभी कबीलों में जहाँ मैंने यात्रा की है, मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा है, जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी थी । मैं कन्याकुमारी से कश्मीर तक ........ इस विश्वास से यात्रा करने की हिम्मत कर सकता हूँ कि मुझे हर जगह ऐसे लोग मिल जायेंगे जो हिन्दुस्तानी बोल लेते होंगे ।”
इसी तरह एनीबेसेंट ने कहा था, “हिन्दी जानने वाला संपूर्ण भारतवर्ष में मिल सकता है और भारत भर में यात्रा कर सकता है ।” एशियाटिक रिसर्च के लेखक एच.टी.कोलब्रुक ने लिखा- “जिस भाषा का व्यवहार भारत में प्रत्येक प्रांत के लोग करते हैं, जो पढ़े-लिखे तथा अनपढ़ दोनों की साधारण बोलचाल की भाषा है और जिसको प्रत्येक गाँव में थोड़े बहुत लोग अवश्य समझ लेते हैं, उसी का यथार्थ नाम हिन्दी है ।” भारतीय भाषा विशेषज्ञ जार्ज ग्रियर्सन ने भी हिन्दी को भारत की सामान्य भाषा माना है ।
हिन्दी का राष्ट्रीय स्वरूप निर्मित करने में हिन्दी अहिन्दी भाषा समूह के अध्येताओं का बड़ा योगदान रहा है। बुंदेली से मैथिलीशरण गुप्त, भोजपुरी क्षेत्र से जयशंकर प्रसाद, अवधी से निराला, ब्रज से महादेवी तो मगही से दिनकर ने इस ओर प्रस्थान किया, वहीं प्रेमचंद उर्दू से हिन्दी की ओर प्रविष्ट हुए । बंगाल से क्षिति मोहन सेन, महाराष्ट्र से माचवे, तेलगु से सुंदर रेड्डी तो पंजाबी से यशपाल के आगमन ने हिन्दी को सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय गौरव दिलाया ।
किंतु सन् 1956 ई. में भाषायी आधार पर प्रांतों के उदय से, कुछ अंग्रेजी परस्त मानसिकता ने तो कुछ राजनीतिक स्वार्थ से हिन्दी का विरोध हुआ । इस विवाद का सर्वाधिक लाभ ‘अंग्रेजी’ को हुआ, जिसने राजकाज की भाषा में अपना स्थान और मजबूत कर लिया । कुछ अवसरवादी और सुविधाभोगी ताकतें अपने अस्तित्व को कायम रखने हेतु अंग्रेजी को प्रश्रय देती रहीं, परिणाम यह हुआ कि शासन-संचालन से लेकर आम जीवन में प्रभुता का वरण कर यह हमारे मानस-पटल पर छा गई । आज ‘सीसेट’ परीक्षा में हिन्दी-अंग्रेजी विवाद इसी की देन है ।
गौर करें तो स्पष्ट होगा कि देश की एक अरब जनता की आज भी शासन में भागीदारी नहीं है, क्योंकि वे अंग्रेजी नहीं जानते । बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से खर्चीली पढ़ाई कराने में वे सक्षम भी नहीं है, अतः उच्च पदों पर उनका आना एक स्वप्न ही है । विगत वर्ष में आयोजित सिविल सर्विस परीक्षा में कुल 1122 अभ्यर्थी चयनित हुए । उनमें हिन्दी माध्यम के 26 तथा अन्य भारतीय भाषाओं के 27 अभ्यर्थी चयनित हुए । यह स्थिति तो किसी गुलाम देश की भी नहीं हो सकती । यह प्रश्न मात्र हिन्दी का ही नहीं, बल्कि समस्त भारतीय भाषाओं के अस्तित्व का है । यह कैसे संभव है कि 2 प्रतिशत अंग्रेजी जानने वाला समूह 98 प्रतिशत शेष समूह पर अपनी नीतियाँ थोपे और लोकतंत्र के स्वाभाविक अधिकार पर अंकुश लगाए ।
मेरा मानना है कि अपभ्रंश से जनित अधिकांश आर्य भाषाओं का हिन्दी से खून का रिश्ता है, तो दक्षिण की भाषाओं ने अपना विराट साहित्यिक गौरव बनाये रखा है । अब प्रश्न हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं के संघर्ष का नहीं रहना चाहिए, क्योंकि हिन्दी के साथ यदि अन्य बोलियों का साहित्य फल-फूल सकता है तो अन्य भाषाओं का क्यों नहीं? मेरा मानना है कि पारस्परिक सामंजस्य से तो सभी भारतीय भाषाओं का स्नेहपरक आदान-प्रदान इन्हें समृद्ध बनाएगा और क्षेत्रीय परिधि राष्ट्रीय स्तर तक फैलेगी ।
अब समय आ गया है कि अंग्रेजी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए हिन्दी के नेतृत्व में समस्त भारतीय भाषाओं को एकजुटता दिखाते हुए अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष करना होगा । उच्च संवैधानिक संस्थाओं यथा-कार्यपालिका, न्यायपालिका या व्यवस्थापिका में भारतीय भाषाओं को यथोचित स्थान दिलाने के लिए सर्वप्रथम अंग्रेजी मानसिकता से बाहर आना होगा ।
अंग्रेजी यदि तकनीक की भाषा है, यह दिखावा है । रूस, जापान, चीन ने अपना तकनीकी विकास अपनी भाषा में किया है, अतः यह भ्रम है कि अंग्रेजी के ज्ञान के अभाव में हम पिछड़ जाएँगे । वस्तुतः यह भाव ही हमें अंग्रेजी का पिछलग्गु बना रहा है और स्वयं की भाषाओं का साहित्य, संस्कृति एवं गौरव को धीरे-धीरे हमारी पीढ़ियों के दायरे से बाहर कर रहा हैं । आशा है हिन्दी व गैर हिन्दी समूह इस प्रश्न पर अवश्य विचार करेगा । 
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तृतीय संस्करण : सामान्य हिंदी


तृतीय संस्करण : सामान्य हिंदी
आभार : राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी।
शुक्रिया : मित्र समूह एवं विद्यार्थी गण।

परिसंवाद

राजकीय महाविद्यालय, निम्बाहेड़ा में युवाओं से परिसंवाद का अवसर।

विषय:युवाओं की आकांक्षाएँ एवं सामाजिक परिदृश्य।

चित्तौड़गढ़ की साहित्यिक विरासत

द्वितीय संस्करण : सामान्य हिंदी

द्वितीय संस्करण : सामान्य हिंदी आभार : राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमीविद्यार्थियों एवं मित्रों का शुक्रिया...।

’हिन्दी काव्य में पर्यावरण चेतना’



’हिन्दी काव्य में पर्यावरण चेतना’/डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी


चित्रांकन
मानव के स्थूल भौतिक शरीर का विनिर्माण जिन पाँच तत्वों से हुआ है, वे प्रकृति के ही मूलभूत अंग हैं। अतः मानव मन में प्रकृति के प्रेम अनैसर्गिक नहीं है। वस्तुतः प्रकृति से विनिर्मित होकर, उसके तत्वों से पोषित होकर और अंत में उसी से विलीन होना मानव जीवन की नियति है। साहित्य के नाम से प्राचीनतम सर्जनाएँ प्रकृति से ही आरंभ होती है। ऋग्वेद के अनेक सूक्त, रामायण एवं महाभारत के आख्यान, सम्पूर्ण संस्कृत वाङ्मय और उसके पश्चात् समकालीन साहित्य परम्परा विद्यमान है। भारतीय वाङ्मय के आदि-ग्रंथ वेद हैं। इनमें वर्णित प्राकृतिक चित्र आर्य-संस्कृति के प्राकृतिक प्रेम को उजागर करते हैं, यथा-

ओउम् द्योः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी
शान्तिः रापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्ति र्विष्वेदेवाः
शान्ति र्ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः।
शान्ति रेव शान्तिः सा मा शान्ति रेधि।
ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।1
धर्म दर्शन, कला एवं साहित्य सभी में प्रकृति को विशिष्ट स्थान मिला है, किंतु काव्य में उसे सर्वाधिक महत्व प्राप्त हुआ है। कवि अधिक संवेदनशीलता के कारण प्रकृति के समस्त दृश्यों से अभिभूत होकर वर्णन करता है। आदिकवि वाल्मीकि ने जब प्रकृति के दो निर्द्वन्द्व प्राणियों को मुक्त विहार करते देखा तो उनकी आत्मा भाव-विह्वल हो उठी, जब दूसरे ही क्षण एक को व्याध के बाण से आहत देखा तो करुणा का क्रन्दन फूट पड़ा। परिणामस्वरूप कविता का जन्म हुआ-

‘‘मा निषाद ! प्रतिष्ठां त्वामगमः शाश्वती समः।
यत्क्रौंचयों मिथुनादेकमवधी काम मोहितम्।।’’2

प्रकृति के प्रति यह कवि-प्रेम अनादि काल से अनवरत जारी है। यह वर्णन कभी स्वतंत्र आलंबन रूप में, कभी हृदयगत भावों को उद्दीप्त करने अथवा आगे की घटनाओं की पृष्ठभूमि के रूप में होता है। कई बार यह वर्णन बिम्ब-प्रतिबिम्ब, उपदेश, रहस्य या मानवीकरण रूप में दृष्टिगोचर होता है। विशिष्टता यह है कि प्रकृति के स्निग्ध रूप पर कवि मोहित है तो भाव-विह्वल होकर रचना करता है और यदि उस पर संकट है तो वह आभास ही नहीं देता, वरन् उसकी संरक्षा के लिए अपने रचनाकर्म को समर्पित कर देता है। आदिकालीन हिन्दी-काव्य में रासो-काव्यों में प्रकृति का आलम्बन व उद्दीपन रूप में अतिशय वर्णन हुआ है। इसी काल में मैथिल-कोकिल विद्यापति रचित ‘पदावली’ प्रकृति वर्णन की दृष्टि से अद्वितीय है। ऋतुराज वसन्त का स्वागत किसी राजा के आगमन पर उल्लसित वातावरण के समान प्रदर्शित किया गया है, यह प्रकृति के प्रति ममत्व का निदर्षन है-

आएल रितुपति राज बसंत, धाओल अलिकुल माधवि-पंथ।
दिनकर किरन भेल पौगंड, केसर कुसुम धएल हेमदंड।
नृप-आसन नव पीठल पात, काँचन कुसुम छत्र धरू माथ।
मौलि रसाल-मुकुल भेल ताब, समुखहि कोकिल पंचम गाय।।3

भक्तिकालीन कवियों की साधना में आध्यात्मिक तन्मयता व एकनिष्ठता का भाव विद्यमान रहा है। कबीर, तुलसी, सूर, जायसी की रचनाओं में प्रकृति का कई स्थलों पर रहस्यात्मक वर्णन हुआ है। कहीं-कहीं वन, पर्वत, नदी, पशु-पक्षी, उपवन का स्वाभाविक व उल्लासमयी भंगिमाओं के साथ वर्णन भी है। तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में लक्ष्मण और सीता को वृक्षारोपण करते हुए दिखाया है, यथा-

‘‘तुलसी तरुवर विविध सुहाए।
कहुँ-कहुँ सिय, कहुँ लखन लगाए।’’4

इसी प्रकार सूर, मीरा, रसखान आदि भक्त कवियों ने प्रकृति के अपार व मोहक चित्र खीचें हैं। रीतिकालीन कवियों ने यद्यपि प्रकृति की छटा को आलंकारिक रूप में अधिक प्रकट किया, किंतु बिहारी, पद्माकर, देव, सेनापति ने उसके सौंदर्य को अपनत्व भी दिया। मलयानिल की शीतलता, सुगंधि का वर्णन करते हुए बिहारी ने बिम्बात्मक वर्णन किया है-

‘‘चुवत स्वेद मकरंद कन, तरु तरु तर बिरमाय।
आवंत दच्छिन देष ते थक्यौ बटोही बाय।’’5

आधुनिक हिन्दी काव्य का जन्म यूरोप के औद्योगिकीरण के समानान्तर होता है, जहाँ प्रकृति मात्र सौंदर्य का उपादान रहकर क्रूर दृष्टि का शिकार होना आरंभ हो जाती है। श्रीधर पाठक 'कश्मीर-सुषमा’ में प्रकृति की मनोमुग्धकारी छटा बिखेरते हैं, तो ‘हरिऔध’ रचित प्रिय-प्रवास में राधिका की हृदय-व्यथा में प्रकृति के उपादानों में व्यंजित होती है, तो कृष्ण भी अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति में प्राकृतिक प्रतीकों का आश्रय लेते हैं-

‘‘उत्कंठा के विवष नभ को, भूमि को पादपों को।
ताराओं को मनुज मुख को प्रायषः देखता हूँ।
प्यारी ! ऐसी न ध्वनि मुझको है कहीं भी सुनाती।
जो चिंता से चलित-चित की शान्ति का हेतु होवें।’’6

प्रकृति की छटा का सुंदर रूप मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत’, ‘पंचवटी’, ‘यशोधरा’, ‘सिद्धराज’ आदि ग्रंथों में सुन्दर रूप में अभिव्यंजित होता है। चन्द्र-ज्योत्स्ना में रात्रिकालीन वेला की प्राकृतिक छटा का मुग्धकारी वर्णन द्रष्टव्य है-

‘‘चारू चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।’’7

छायावादी काव्य शैली में प्रकृति का सूक्ष्म और उत्कट रूप दिखाई देता है। प्रकृति की भव्यता ‘पंत’, ‘प्रसाद’ और निराला’ की कविताओं में यत्र-तत्र पाई जाती है। ये कवि प्रकृति की रमणीयता में इतने मुग्ध हो जाते हैं कि प्रेयसी का प्यार भी उन्हें तुच्छ लगता है। पंत कहते हैं-

‘‘छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,
बाले, तेरे बाल-जाल में, कैसे उलझा दूँ लोचन,
भूल अभी से इस जग को।’’8

इसी तरह संध्या की छटा निराला को सुन्दरी के रूप में आभासित होती है-

‘‘दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही है।
वह संध्या सुन्दरी परी-सी,
धीरे, धीरे, धीरे।’’9

‘कामायानी’ इस काल का उत्कृष्ट काव्य है। जिसके आरंभ में प्रकृति के भयानक रूप का वर्णन है, जिसमें जल-प्रलय के पश्चात् सर्वस्व नष्ट हो जाता है। संभवतः ‘प्रसाद’ का यह संकेत उद्दाम लालसाओं से ग्रसित उन लोंगो के लिए भी है, जो प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, परिणाम स्पष्ट है-

‘‘हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर
बैठ शिला की भीतल छाँह।
एक पुरुष भीगे नयनों से,
देख रहा था प्रलय-प्रवाह।’’10

मनुष्य का प्रकृति के प्रति भोगवादी दृष्टिकोण ने जीवन को खतरे में डाल दिया है। परिणामतः अकाल, बाढ़, आदि प्राकृतिक त्रासदियों से हमें सामना करना पड़ता है। ‘बंगाल का अकाल’ इस प्राकृतिक विनाश का एक दुखान्तकारी घटनाक्रम है। नागार्जुन ने इस दृश्य का वर्णन किया है-

‘‘कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास।
कई दिनों तक कानी कुतिया, सोई उनके पास।
कई दिनों तक लगी भीत पर, छिपकलियों की गष्त।
कई दिनों तक चूहों की भी, हालत रही शिकस्त।’’11

भोगवादी दृष्टि के साथ वैज्ञानिक प्रयोगों ने भी प्रकृति को नष्ट करने का कुत्सित प्रयास किया है। युद्धों की विभीषिका में जब परमाणु त्रासदी के बाद मनुष्य नहीं बच पाता है तो प्रकृति का क्या हाल होगा? अज्ञेय ने कहा कि ‘मानव का रचा हुआ सूरज मानव को भाप बनकर सोख गया।’ उसी पृष्ठभूमि में ‘दिनकर’ ने लिखा-

‘‘बुद्धि के पवमान में उड़ता हुआ असहाय
जा रहा तू किस दिशा की ओर को निरुपाय?
लक्ष्य क्या ? उद्देश्य क्या ? क्या अर्थ ?
यह नहीं ज्ञात, तो विज्ञान का श्रम व्यर्थ।’’12

अभी मानवता उससे उबर ही नहीं पाई कि पूरे विश्व में आर्थिक उदारीकरण के नाम पर बाजार का विकास हुआ। भूमण्डलीकरण के दौर में बाजारवाद की त्रासदी का सबसे पहले शिकार बना-पर्यावरण। परिणाम स्वच्छ वायु, स्वच्छ जल, शुद्ध फल, शुद्ध भोजन का भी अभाव उत्पन्न हो गया है। इक्कीसवीं सदी का आरंभ पर्यावरण संकट के साथ उदित होता है। ऐसी परिस्थिति में रचनाकार सजग हो उठता है। ‘पानी की प्रार्थना’ में केदारनाथ सिंह ने भीषण संकट की ओर आगाह किया है-

‘‘अब देखिये न,/लम्बे समय के बाद/कल
मेरे तट पर एक चील आई/प्रभु,
कितनी कम चीलें दिखती हैं आज कल।
आपको तो पता होगा कहाँ गयीं वे?/
पर जैसे भी हो एक वह आई/जाने
कहाँ से भटक कर/और बैठ गयी मेरे बाजू में/
उसने चौंककर पहले इधर उधर देखा।
फिर अपनी लम्बी चोंच गड़ा दी/मेरे सीने में।
              $$$$

अंत में प्रभु अंतिम/लेकिन सबसे जरूरी बात
वहाँ होंगे मेरे भाई बन्धु/मंगल ग्रह या चाँद पर/
पर यहाँ पृथ्वी पर मैं/यानी आपका मुँह लगा यह पानी
अब दुर्लभ होने के कगार तक/पहुँच चुका हूँ।’’13

अंत में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारतीय साहित्य में जहाँ प्रकृति का प्रत्येक उपादान वृक्ष, नदी, फल, फूल, अनाज आदि को पूजनीय स्थलों का अधिकार बनाया, वहीं आज का यह पदार्थवादी इंसान अपने जीवन-रस को ही लूटने चला है। ऐसी स्थिति में साहित्य-जगत् को मौन रहकर तमाषा देखने के बजाय अपनी रचनाधर्मिता से मानवता को बचाने का सार्थक प्रयास करना चाहिए, क्योंकि प्रकृति से अलगाव मनुष्य के स्वार्थी होने की निशानी है-

‘‘खेतों की मेड़ों की ओस नमी मिट्टी,
जितनी देर मेरे इन पाँवों में लगी रही,
उतनी देर जैसे मेरे सब अपने रहे,
उतनी देर सारी दुनिया सगी रही,
किन्तु मैंने ज्योंही मौजे-जूते पहन लिए
जेब के पर्स का ख्याल आने लगा।’’14

संदर्भ-
1. यजुर्वेद, शान्ति सूक्त, 36/17
2. वाल्मीकि रामायण, 1/2/15
3. पदावली, विद्यापति, पृ.-295
4. रामचरितमानस, तुलसीदास, 2/236/3
5. बिहारी प्रकाश, बिहारी, पृ.-31
6. प्रिय-प्रवास, हरिऔध, उद्धृत आधुनिक काव्य सोपान, पृ.-5
7. पंचवटी, मैथिलीशरण गुप्त, उद्धृत ‘कविताकोश’ वेब पेज से ।
8. सुमित्रानंदन पंत संचयन, कुमार विमल, पृ.-51
9. ‘कवि श्री’, निराला,सं. सियारामशरण गुप्त, पृ.-11
10. कामायनी, जयशंकर प्रसाद, चिंता सर्ग, पृ.-5
11. अकाल और उसके बाद, नागार्जुन, उद्धृत कविताकोश वेब पेज से ।
12.  कुरुक्षेत्र, दिनकर, षष्ठ सर्ग, पृ.-68
13. पानी की प्रार्थना, केदारनाथ सिंह, उद्धृत कविताकोष वेब पेज से।
14. बाँस का पुल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, पृ.-30

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आलेख मौलिक अप्रकाशित अप्रसारित है।


(युवा समीक्षक, महाराणा प्रताप राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय चित्तौड़गढ़ में हिन्दी प्राध्यापक हैं।आचार्य तुलसी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर शोध भी किया है। शैक्षिक अनुसंधान और समीक्षा आदि में विशेष रूचि रही है।हाल ही में आपकी 'राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी' से 'सामान्य हिंदी' शीर्षक से व्याकरण पुस्तक चर्चा में हैं.)

घर का पता-एफ 6-7, रजत विहार,निम्बाहेड़ा, जिला-चित्तौड़गढ़,पिन कोड़-312601
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