ई-लोक चौपाल-4

ई-लोक चौपाल-4
मधुमती, अंक-नवम्बर,2017

                          भारतीय समाज सनातन काल से उत्सवधर्मी रहा है। पर्व-संस्कृति यहाँ के जन-जीवन का अटूट हिस्सा है। दीपावली का उत्सव संपूर्ण राष्ट्र में उल्लास पैदा कर देता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने अबकी बार अयोध्या में ऐतिहासिक आयोजन किया, इस पर बुद्धिजीवियों की कई प्रतिक्रियाएँ आई, कुछ ने उपहास भी उडाया। इस संदर्भ में जयपुर से अशोक आत्रेय ने लिखा- ‘‘कुछ अति-उत्साही दिशाहीन वामपंथियों को शायद किसी विभ्रमवश ऐसा लगा जैसे अयोध्या पाकिस्तान में है....जहाँ राम के वनवास के बाद उनके लौटने के प्रसंग को व्यर्थ में ही इतना महत्त्व मिल गया...। यह कितनी अजीब बात है कि बहुत सीमित लोग...मात्र दिखावे के लिए लोग हिन्दू-धर्म का इसलिए विरोध करते हैं, क्योंकि इससे उनकी तथाकथित प्रगतिशीलता पर मुहर लग जाती है और वे सभी एक झंडे के नीचे खडे रहकर एक दूसरे की पीठ थपथपा लेते हैं।’’ अयोध्या ः एक अनाम योगी के फुटनोट्स...श्ाृंखला में अपने विचार प्रकट करते हैं- ‘‘भारत में धर्म का स्वरूप समाज व्यवस्थाओं से जुडा है।
                          धर्म सामाजिक आचरण और मर्यादा को सर्वोच्च रूप है। धर्म से जुडे तमाम चरित्र और घटनाएँ मानव समाज और पर्यावरण के इर्द-गिर्द बुना वह ताना-बाना है जो हमारी आस्थाओं और मर्यादाओं को दिशा देता है, नियंत्रित करता है। वैदिक आधारों पर टिका भारतीय समाज धर्म के बिना...बिना रीढ के किसी पशु की तरह लुंज पुंज हो जाएगा।’’ छठ-पर्व पर मैत्रेयी पुष्पा और मंगलेश डबराल की टिप्पणियों से ईलोक में बहस चल पडी। यह विमर्श और आस्था के मध्य वैचारिक परिणति का केन्द्र न बनकर मात्र आरोप-प्रत्यारोप बनकर रह गई। मंगलेश डबराल ने लिखा- ‘‘मेरे खयाल से हर पर्व पर और हर दिन स्त्रियों का सिंदूर लगाना बंद हो जाना चाहिए। दरअसल, सिन्दूर में कुछ दाम्पतिक, गठबंधनात्मक, प्रवेश-निषेध सरीखे संकेतक निहित हैं, जो बहुत हद तक स्त्री-विरोधी हैं, इस तर्क के बावजूद कि स्त्रियाँ ऐसा चाहती हैं और उससे बाल जल्दी सफे द हो जाते हैं। यह भी एक मुद्दा है।’’ मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी पोस्ट हटाते हुए लिखा कि ‘‘मेरी सिंदूर-पोस्ट से छठ वाले लोगों को इतना कष्ट होगा। मुझे अन्दाजा न था कि वे स्त्रियों के सिन्दूर के लिए स्त्रियों को ही बेशुमार गालियाँ देने लगेंगे। अपमान किसी भी स्त्री का नहीं होना चाहिए।’’ इस विवाद पर कृष्ण कल्पित ने प्रतिक्रिया देते हुए लिखा- ‘‘ताजमहल और सिंदूर का विरोध करने वालों की मानसिकता एक है। उनके लिए ये दोनों गुलामी के प्रतीक हैं और इन्हें ढहा देना, पोंछ देना चाहते हैं। इसका विपुल और पवित्र सौन्दर्य इनको दिखाई नहीं देता।’’ अरुण माहेश्वरी ने लिखा- ‘‘किसी भी पारंपरिक धार्मिक पर्व या उत्सव के सांस्कृतिक पक्षों की अहमियत को न समझकर उन्हें शुद्ध विवेकवादी तर्कवाद की कसौटी पर कसने की जिद से मनुष्यों के आत्मिक संसार में से एक प्रकार के जबरिया विरेचन से अधिक शायद कुछ हासिल नहीं हो सकता है।’’ 
                                  राजस्थानी के प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक आईदान सिंह भाटी ने हिन्दी संसार में राजस्थानी की भूमिका को चिह्नित किया है। वे लिखते हैं - ‘‘राजस्थानी कविता का इतिहास और उसकी जडें हमें ‘अपभ्रंश’ के दोहों में मिलती हैं। इसका विकास ही आधुनिक रूप में दोहा साहित्य के रूप में सामने आता है। लौकिक काव्य ‘ढोला-मारू रा दूहा’ इस अपभ*ंश के दूहा काव्य का विकास है। कालांतर में राजस्थानी का एक भाषा-रूप डिंगल काव्य के रूप में विकसित हुआ, जिससे हमारी आज की हिन्दी का आदिकाल विकसित हुआ। इस डिंगल के मध्यकाल की सुप्रसिद्ध कृति ‘वेलि कृष्ण रुक्मणि री’ सुप्रसिद्ध है। इसी मध्यकाल में भक्त कवयित्री मीरां की वाणी ने राजस्थानी साहित्य को एक विशेष ऊँचाई प्रदान की। इस तरह चन्द वरदायी का ‘पृथ्वीराज रासो’ मीरां की वाणी और पृथ्वीराज राठौड की ‘वेलि कृष्ण रुक्मणी री’ की त्रयी हिन्दी-संसार में राजस्थानी का प्रतिनिधित्व करने के लिए सुख्यात रही है।’’ भारतीय साहित्य में राष्ट्रीय एकता विषयक परिसंवाद के अंशों को साझा करते हुए प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा लिखते हैं- ‘‘समकालीन हिन्दी कविता में भी राष्ट्र के सामने मौजूद संकटों और राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्वों को लेकर चिंता का स्वर उभार पर है। आज की कविता भारत की समकालीन दुरावस्था से बैचेनी का साक्ष्य देती है।
                                कवि धूमिल को यदि आजादी के भटकाव का बैचेन कर देने वाला अनुभव होता है, तो उसकी पीडा समझी जानी चाहिए या आजादी सिर्फ तीन धके हुए रंगों का नाम है। जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई खास मतलब होता है।........ आज देश पर आक्रमणकर्ताओं की निगाहें लगी हुई हैं। जब अलग-अलग प्रांत, भाषा और इलाकों के नाम पर अलगाव और विभेद के बीज बोए जा रहे हैं, तब आधुनिक कविता के जरिए उभरती राष्ट्रीय एकता की आवा*ाों को सुना जाना चाहिए।’’ आज के दौर में तथाकथित चालाक एवं घटिया लेखकों के बढते वर्चस्व पर गोरखपुर से दयानंद पाण्डे लिखते हैं- ‘‘लेखक कई तरह के होते हैं। एक हैं जो कुछ सार्थक लिखते हैं, पर सफलता के बा*ाार से गुम हैं। लेकिन पाठकों में लोकप्रिय हैं। एक हैं जो लफ्फाजी लिखते हैं। पाठकों आदि की बात करने वालों को यह प्रतिक्रियावादी कहकर खारिज कर देते हैं। एक और हैं जो लफ्फाजी ही हाँकते हैं, लफ्फाजी ही खाते हैं, लफ्फाजी ही पीते हैं। सब कुछ मौखिका विषय कोई भी हो, वह एक ही विषय पर बोलते हैं। हर जगह, हर स्थिति में एक ही बात। लेखन के बाजार में इन्हीं की चाँदी है। वाम, जनवाद, प्रगतिशील, धमनिरपेक्षता, दलित, मुस्लिम, फेस्टिवल, कार्निवल, फोटो, अखबार, बयान आदि-आदि सब इनके ही हैं। सारे विमर्श और वगैरह-वगैरह इनके ही हैं। आप भी इनको सैल्यूट कीजिए। आखिर प्रबंधन का जमाना है। वह सबकुछ प्रबंध करने में माहिर है। सो प्रबंध कर लेते हैं। ऐसे तीनों तरह के लेखक हर शहर, हर प्रांत और हर भाषा में उपस्थित हैं।’’ 
                                 विख्यात कवि विजेन्द्र ने मुक्तिबोध के बहाने अभिव्यक्ति की प्रेषणीयता पर चिंतन करते हुए अपना मत प्रकट किया है- ‘‘जहाँ तक अभिव्यक्ति का सवाल है, मैं फिर कहूँगा कि आदर्श स्थिति यही है कि हम ऐसी भाषा में लिखने की कोशिश करें, जो आम जनता तक पहुँचने में समर्थ हो।...... मैं आलोचना में रामविलास शर्मा की भाषा को आदर्श मानता हूँ। सामाजिक विषयों पर लिखने में राहुल सांकृत्यायन की भाषा को आदर्श मानता हूँ।....मुक्तिबोध का विकास बहुत पेचीदा है। एक तो यह नहीं कि मुक्तिबोध आधुनिकतावाद के शिकार थे, इसलिए उन्होंने जटिल भाषा लिखी। यह भी नहीं कि विचारधारा के मामले में वे बहुत उलझे हुए थे। मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष अपने लिए व्यक्तिगत स्तर पर उन विचारों से निपटना चाहते थे और रचनाओं के माध्यम से उनसे निपट रहे थे।’’ यह नहीं भूलना चाहिए कि मुक्तिबोध उस पूरे दौर में आन्दोलन से कटे हुए थे। अकेले जूझ रहे थे। कोई साथी नहीं था। यानी मुक्तिबोध एक ऐसी कैद में थे, बाहरी दुनियाँ से कटे हुए- इसलिए उनके लेखन में जो उलझाव मिलेगा, उसका यह भी कारण है कि जीवित आन्दोलन का अभाव था और जहाँ आन्दोलन था भी उस आन्दोलन से मुक्तिबोध का जीवित संफ रह ही नहीं पाया। ‘नक्षत्रहीन समय में’ में अशोक वाजपेयी की पंक्तियों को दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने साझा किया है।
                                   कविता की शक्ति व सामर्थ्य का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘‘कविता हमें आग और हिंसा से, नश्वरता और प्रतिकार से, घृणा और अत्याचार से, अन्याय और बाजार से बचा नहीं सकती, लेकिन वह हमें इनका तीखा एहसास करा सकती है कि ये मानवीय स्थिति और नियति के लिए अनिवार्य नहीं हैं कि इनमें से अधिकांश हम ही ने रचे और पोसे हैं, कि उनके लिए ज्यादातर हम ही जिम्मेदार हैं। कविता अंधेरे में रोशनी का दरवाजा नहीं खोलती। वह अंधेरे में हमें उसे टटोलते हुए रोशनी की ओर जा सकने की संभावना का विकल्प, अक्सर इशारे से सुझाती है। कविता रास्ता नहीं दिखाती, क्योंकि ज्यादातर तो उसे खुद रास्ते की तलाश होती है, वह इस तलाश में आपको शामिल होने का न्योता जरूर देती है।’’ गद्य को कवियों की कसौटी कहा गया है। आशुतोष कुमार ने प्रश्ा* उठाया है कि ‘‘गद्य कवीनां निकषं वदन्ति’, तो कविता को श्रेष्ठ गद्य के एक तत्त्व के रूप में क्यों स्वीकार नहीं किया जा सकता?...... गद्य मेरे जानते अनुभव की भाषा के जरिए व्यवस्थित करने की कोशिश है, जबकि कविता भाषागत व्यवस्था की निरंकुशता के खिलाफ एक बगावत। गद्य रास्ता बनाते कदम कदम चलाने की कोशिश है तो कविता एक ही उडान में आर-पार हो जाने का दुस्साहस। यानी गद्य क्रमिक यात्रा है तो कविता एक संक्रांति है। गद्य तर्क की खोज है तो कविता विक्षिप्त का साक्षात्कार। ....... क्या यह सच नहीं है कि एक सीधी रेखा खींचना सबसे मुश्किल काम है? वक्र रेखा तो एक बच्चा भी खींच लेता है। गद्य एक सरल रेखा है, कविता वक्र रेखा।’’ जय प्रकाश मानस ने हिन्दी पुस्तकों की बिक्री अत्यधिक न्यून रहने पर प्रश्न किया है- ‘‘क्या कारण है कि विश्व की तीसरी सबसे बडी भाषा होने के बाद भी हम हिन्दी के रो*ा घोषित बडे से बडे लेखक और उसकी महान-से-महान किताब बमुश्किल ह*ाार दो ह*ाार ही बिक पाती है, जबकि अन्य भाषाओं में यह संख्या लाखों तक जा पहुँचती है। हाल ही का एक उदाहरण लें- २०१५ का साहित्य की नोबेल पुरस्कार विजेता बेलारूस की स्वेतलाना अलेक्सीविच की पहली किताब ‘वार्स अनवोमैनली फेस’ की अब तक २० लाख प्रतियाँ बिक चुकी हैं।’’                                        राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष को राज्य मंत्री का दर्जा दिया। इस खबर पर साहित्य-प्रेमियों ने उल्लास से स्वागत किया। सवाई सिंह शेखावत ने अपने संदेश में लिखा- ‘‘खबर है कि अच्छे कवि, बेहतर इंसान और वर्तमान में राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष मित्र इन्दुशेखर तत्पुरुष को राजस्थान सरकार ने राज्य मंत्री का दर्जा दिया है।.... मित्र आप सफलता की शीर्ष सीढियों पर चढते हुए इसी तरह नेक और विनम्र बने रहें, यही शुभकामना है।’’ ? एफ ६-७, रजत विहार, निम्बाहेडा, जिला-चित्तौडगढ (राज.) मो. ९८२८६०८२७० ++++++++++ 2010 © Rajasthan Sahitya Academy all rights reserved.Powered by : Avid Web Solutions

ई-लोक चौपाल-3

ईलोक चौपाल(मधुमती, अक्टूबर-2017 में प्रकाशित)
डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी
गतांक से आगे....
 
                           प्रख्यात कवि एवं आलोचक विजेन्द्र ने कला और साहित्य की दृष्टि को रेखांकित करते हुए लिखा कि हमें कला-साहित्य की समृद्ध विरासत को, उनकी उत्कृष्ट परम्पराओं को आत्मसात कर लेना चाहिए। एक लेखक के रूप में हमारा उद्देश्य अपनी विशाल संघर्षशील लोक की सेवा ही होना चाहिए। लोक में कौन शामिल हैं? इसमें मजदूर, किसान, दलित, आदिवासी, सैनिक और निम्न-मध्यवर्ग तक को शामिल किया जा सकता है। ये वे वर्ग हैं जो अपने श्रम से अपने समाज के लिए उत्पादन करते हैं और समाज का निर्माण करते हैं। कविता के साकार रूप की कल्पना करते हुए अनिल पाण्डेय का मंतव्य है कि कविता में बहुत कुछ छुटकर बिखर जाने की यातना लिए एकदम से स्पष्ट कर देने की प्रतिबद्धता और बहुत कुछ को बदल देने की जिद बहुत कम कवि ही रख पाए हैं। यह उन्हीं कवियों में वर्तमान रह सका है जो तिकडमी बाज नहीं है, तुनक मिजाज नहीं है। जो बाहर हैं, अन्दर भी वही हैं। कवि-हृदय में उठ रही दुनिया सही अर्थो में ऐसे कवियों के माध्यम से ही साकार रूप ले पाती है। 
                 हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर विचार करते हुए बनारस से आशीष त्रिपाठी लिखते हैं- आज हिंदी भूमंडलीकरण की भाषा है। बाजार मनोरंजन, उद्योग और विज्ञापनों की भाषा। पतंजलि जैसे तेजी से बढते व्यापारिक समूह की भाषा। इस सबके पीछे भी अंततः निर्विकल्प एकभाषी हिन्दी जनों को संबोधित करने की व्यापारिक मजबूरियाँ प्रमुख हैं।... हिन्दी दिवस स्थापना करने का दिन नहीं है, एक रचनात्मक संकल्प लेने का दिन है कि हिन्दी भाषी अपनी भाषा और बोलियों से प्यार करे। उसमें हो रहे साहित्य-सृजन और ज्ञान-रचना को आगे बढाएँ।... हिन्दी यानी भाषाओं का संयुक्त परिवार। कोई एक रूप नहीं। अनेक रूप। 
<br/>उज्जैन से प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा का विचार है कि स्वभाषा के स्थान पर अंग्रेजी हमारी शिक्षा-व्यवस्था की प्रमुख भाषा बनती जा रही है। एक बहुत बडे भ्रम के रूप में अंग्रेजी का ज्ञान शिक्षित और सफल होने का पर्याय माना जा रहा है। सदियों से हमारी संवेदना संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान का संवहन करती आ रही भारतीय भाषाओं की निरन्तर उपेक्षा हो रही है। देश के मध्य भाग में हिन्दी के साथ ही व्यापक लोक समुदाय में प्रयुक्त मालवी, निमाडी, बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढी तथा जनजातीय क्षेत्रों में प्रचलित भीली, भिलाली, बारेली, सहरिया, गोंडी, वैगा, कोरकू, मुरिया, हल्बी, मुंडा, उरांव जैसी कई मातृभाषाएँ हमारी भाषायी सामर्थ्य के प्रमाण हैं। 
                      केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के विदेशी छात्रों को हिन्दी सिखाने वाले एक वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम में ‘गोदान’ के स्थान पर ‘निर्मला’ रखने का मुद्दा ई लोक पर चर्चित रहा। हस्तक्षेप करते हुए बनारस से अमरेन्द्र त्रिपाठी लिखते हैं कि पूरे विवाद में यह बात सिरे से गायब थी कि विदेशी विद्यार्थियों की भाषा संबंधी मुश्किल को ध्यान में रखते हुए ‘गोदान’ की जगह ‘निर्मला’ रखा गया। गोयनका जी की ख्याति प्रेमचंद के विशेषज्ञ के रूप में है, उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश प्रेमचंद साहित्य के विषय में अनुसंधान पर होम किया है। उनके उपाध्यक्ष रहते प्रेमचंद को पाठ्यक्रम से हटा देने की खबर पर कम-से-कम हिन्दी जगत के विद्वानों को तो सहज भरोसा नहीं ही करना चाहिए था। 
                                फतहपुर उ.प्र. से अनूप शुक्ल ने साहित्य के राजधानी केन्द्रित होने का प्रश्न उठाते हुए लिखा कि साहित्य इतना केन्द्रीकृत पहले कभी नहीं था, जितना आज है... आदिकाल और भक्तिकाल के कवि बिखरे हुए थे। उनका बिखराव भौगोलिक भी था और वस्तुगत व भाषागत भी था। उनमें समानता के कुछ बिन्दु भले खोज लिए जाएँ, लेकिन उनके साहित्य में पर्याप्त विविधता थी। संचारहीनता के उस युग में अपनी भौगोलिक विकेन्द्रीयता और भाषागत विविधता के चलते उन्होंने बहुत बडे जनसमुदाय को प्रभावित किया और रचनाओं के माध्यम से अपनी बात लोगों तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त की।... दिल्ली के साहित्यिक, सांस्कृतिक की विकेन्द्रीयता पर ही असर नही पडा, बल्कि कहीं न कहीं साहित्य और भाषा की विविधता भी प्रभावित हुई। पहले जो लेखक रचना में अपनी भाषा और अभिव्यक्ति के निजीपन से पहचाने जाते थे, उनमें से अधिकांश भाषा और अभिव्यक्ति के सामान्यीकरण और समानीकरण के शिकार हो गए।... इससे साहित्य की समृद्धि बही या उसका नुकसान हुआ, यह आकलन का विषय है; लेकिन यह जरूर देखा जाना चाहिए कि साहित्य के लोक से कटते जाने, साहित्य के साहित्य पाठकों के कम होते जाने और लेखकों के ही साहित्य का पाठक रह जाने के पीछे साहित्य की इस केन्द्रीयता की कोई भूमिका है या नहीं? 
                      दिल्ली से दिविक रमेश ने हिन्दी में आलोचना की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखा- ‘‘क्या आज हिन्दी में आलोचना है? क्या आलोचना का समय लद गया? क्या आलोचना की जरूरत अब नहीं रही? क्या पाठ ही सर्वोपरि है? दलित, नारी, आदिवासी, प्रवासी आदि से सम्बद्ध साहित्य-विमर्श क्या आलोचना के विकल्प हैं?... आज तो लगने यह भी लगा है कि आलोचना की कोई केन्द्रीय अवधारणा मानो बची ही नहीं है। बहुत-सी अवधारणाएँ एक दूसरे से गुत्थम गुत्था हों रही है। बहस के रूप में चुनौती तो केन्द्रीय साहित्य होने की अवधारणा को भी मिल रही है। धुमका (झारखंड) से सुशील कुमार ने रचनाकारों की महत्वाकांक्षाओं पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि लेखक, कवि कलाकार- सबके सब महत्वाकांक्षी होते हैं। वे दुखियों को दुःख नहीं बाँटते, केवल अपनी शौक और शगल को पूरा करते हैं। इसलिए इनसे समाज की तस्वीर नहीं बदलती, न जनता में कोई युगबोध जन्म लेता है। 
                     साहित्य के नोबेल सम्मान जापानी मूल के ब्रिटिश लेखक काजुओ इशिगुरो को उनके उपन्यास ‘द रिमेंस ऑफ द डे’ के लिए दिए जाने पर सवाई सिंह शेखावत ने स्वीडिश अकादमी के सचिव सारा डेनियस की टिप्पणी साझा की है- ‘‘आप जेन ऑस्टिन और फ्रेंज काफ्ता को मिला दें तो संक्षेप में इशिगुरो को पा सकते हैं, लेकिन उन्हें ठीक से पाने के लिए आपको थोडा-सा प्रॉउस्ट को भी मिलाना पडेगा उसके बाद ज्यादा न हिलाएँ तो आप उनके लेखन को पा सकते हैं- स्मृति, समय और आत्म-विमोहा इशिगुरो के लिए जीवन के खुरदरे यथार्थ के बरक्ए जीवन से जुडी वे मानवीय अनुभूतियाँ अधिक वरेण्य हैं, जो हर तरह की विपरीत जीवन स्थितियों में भी जीने का सरंजाम जुटाती है। 
                     ब्लू-व्हेल जैसे खेलों से अबोध बचपन किस प्रकार अवसाद का शिकार हो रहा है? उसे इन्दौर से सुशोभित शक्तावत ने ‘चाचा चौधरी’ जैसे पात्र से तुलना करते हुए लिखा है कि भूमंडलीकरण की कुशाग्रताओं के साथ ढाई दशक में ‘अढाई कोस’ चलने के बाद अंततः शायद हमें समझ आएं कि ‘चाचा चौधरी’ उस कम्प्यूटर से अधिक मेधावी नहीं हो सकते थे, जो युद्धों को एक खेल में तब्दील कर सकता है और आत्मनाश को नीली मछलियों के भुलावों में। फिर भी जिंदगी के कई पहलू ऐसे होते हैं, जिनमें वक्त से पिछड जाना ही बेहतर होता है और यह बात इतनी साफ-सरल है कि ‘साबू’ भी इसे बडी आसानी से समझ सकता है, जिसकी अकल उसके घुटनों में बसती थी। 
                  मथुरा से राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी ने विश्वविद्यालय की विश्वात्मकता का आधार निरूपित करते हुए लिखा है कि अध्ययन-मनन-चिंतन छोटे-छोटे दायरों से बंधा नहीं होता। संकीर्ण नहीं होता है। वहाँ कोई सीमा नहीं होती। स्वदेशो भुवनत्रयं। वह चिन्तक आकाश की भाँति उन्मुक्त होता है! बन्धन नहीं होता। वह किसी के शासन में रहकर चिंतन कर ही नहीं सकता। जैसे कवि के मनोभूमि को मधुमयी भूमिका कहा जाता है, वैसा ही चिंतक के संबंध में कहा जा सकता है। सच तो यह है कि स्वतंत्र चिंतन समाधि जैसी अवस्था में होता है, जिसमें न मैं का अस्तित्व होता है न मेरे                                                                                                     जोधपुर से नरेन्द्र मिश्र ने लिखा है कि भारत में गुवाहाटी विश्वविद्यालय एक मात्र संस्थान है, जहाँ हिन्दी का शोधपत्र अंग्रेजी में अनूदित करवाकर पढना पडता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रभाषा का क्या सम्मान रह जाता है? ऐसी घटनाओं के लिए अब हिन्दी-प्रेमियों को संकल्प की आवश्यकता है।  
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राम की शक्तिपूजा:वर्तमान संदर्भ

                      राम की  शक्तिपूजा :वर्तमान सन्दर्भ 

(आकाशवाणी चित्तौड़गढ़ से प्रसारित वार्ता)

 ‘राम की शक्ति पूजा’ सूर्य कांत त्रिपाठी ‘निराला’ की एक प्रबन्धात्मक कविता है । यह कृति निराला के व्यक्तित्व व कृतित्व का गौरव है तथा उनकी काव्य­प्रतिभा को मूल्यांकित करने का मापदण्ड भी है । इस कविता की रचना सन् 1936 ई. में हुई थी । काव्य­सौन्दर्य की दृष्टि से यह कविता आधुनिक हिन्दी काव्यधारा में छायावादी काव्य की चरम सीमा मानी जा सकती है । इसमें राम­रावण युद्ध के अवसर पर राम के मानव मन की अन्तर्द्वन्द्व का वर्णन है।

'राम की शक्ति पूजा’ की कथा बंगाल की कृत्तिवासी रामायण से ली गई है, किंतु कथा में कवि ने मौलिक परिवर्तन भी किये हैं । इस कविता में प्रमुख घटनाएँ हैं- राम­रावण युद्ध में महाशक्ति द्वारा रावण का पक्ष लेना, राम की निराशा, हनुमान के रौद्र रूप का दिग्दर्शन, सीता की स्मृति, विभीषण द्वारा वीर­भाव की उत्तेजना का प्रयास, जाम्बवान् के प्रस्ताव पर राम की शक्ति­आराधना, सात्त्विक योग क्रिया से राम का आराधनारूढ़ होना, महाशक्ति का एक पुष्प चुरा ले जाना, राम का ग्लानिजन्य निराशा में डूबना, स्वयं को राजीव नयन होने का स्मरण होना, राम का पुष्प के स्थान पर अपना नेत्र अर्पित करने के लिए सन्नद्ध होना और शक्ति का प्रकट होकर विजय का वरदान देना आदि ।

 इस कृति में निराला ने राम को मानव के रूप में चित्रित किया है । यह चरित्र विलक्षण है । तुलसी की भाँति राम को पृथ्वी के भारों का विनाश करने के लिए अवतरित नहीं किया है, वरन् समस्त संघर्षों को उनके सामने ले जाकर प्रस्तुत कर दिया है । राम के कर्तव्य परायण जीवन में जो विह्वलता और निराशा के दर्शन होते हैं, वे राम को यथार्थ मानवीय भूमि पर प्रतिष्ठित कर देते हैं । निराशा के क्षणों में राम को सीता की कुमारी छवि की स्मृति राम के मानवीय चरित्र को द्रवित कर देती है, यथा-

देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन,
विदेह का ­ प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन,
नयनों का ­ नयनों से गोपन ­ प्रिय संभाषण,
पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान­पतन ।

 विप्लव, संघर्ष और विरोध की ध्वजा लेकर भी अपनी विजय का आत्म­विश्वास कैसा होगा, इसका अनुमान वही व्यक्ति लगा सकता है, जिसने संघर्षों के पर्वतों पर खड़े होकर विजय की हरीतिमा के स्वप्न देखे हैं । निराला के राम ने यही सब कुछ देखा है । एक मानव के जीवन में इससे अधिक नाटकीयता क्या हो सकती है कि अपार पौरुष चीख उठे, इससे अधिक कला की साधना और क्या होगी कि सिंह स्वयं को असहाय समझे और जीवन की इससे अधिक विडम्बना और क्या हो सकती है कि वह कह उठे-


धिक् जीवन जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन जिसका सदा ही किया शोध ।

 ‘राम की शक्ति पूजा’ में निराला ने मात्र राम­कथा के एक खण्ड भाग का ही उदात्त चित्रण नहीं किया, बल्कि उदात्त संदेश भी संघर्षरत मानवता के लिए प्रसूत किया है । युग­युगों से विषण्ण एवं शोषण­पीड़ित मानवता को समतुल्य शक्ति की संचयन करके अन्याय, अत्याचार एवं उत्पीड़न का डटकर मुकाबला करने की चिर अमर प्रेरणा दी है । शत्रु­विजय की भावना को अत्यधिक प्रदीप्त करने के लिए विभीषण का यह कथन पर्याप्त है-

                    रघुकुल ­ गौरव लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण,
तुम फेर रहो हो पीठ हो रहा जब जय रण, 
कितना श्रम हुआ व्यर्थ, आया जब मिलन समय,
तुम खींच रहे हो हस्त, जानकी से निर्दय ।
रावण, रावण, लम्पट, खल, कल्मष, गताचार,
जिसने हित कहते किया मुझे पाद ­ प्रहार ।

 कवि ने राम के रूप में देशवासियों को स्वतंत्रता संग्राम एवं देश के निर्माण कार्यों से किसी भी रूप में पलायन न करने की प्रेरणा दी है । शत्रु हमारी निरहिता का उपहास उड़ाएँ, हमें उपेक्षित­अपमानित करके अपनी विजय के गीत गाएँ और हम अवसन्न­मन, विपर्यस्त­तन बैठ देखते रहें, यह संभव नहीं । राम अपनी अन्तर चेतना में निहारते हैं कि स्वयं महाशक्ति रावण का पक्ष लेकर सीता की प्राप्ति में बाधक बन रही है । जय­पराजय शक्ति पर आधारित है, तब जाम्बवान् का यह कथन शक्ति­संचय एवं उपयोग का विधान व्यावहारिक प्रतीत होता है-

“ विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
हे पुरुष सिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,

आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,

तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर ।”

 मौलिक शक्ति की आराधना और शक्ति का संचय अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि अन्याय के प्रतिकार और अपने मूल्यों की रक्षा का जब कोई उपाय शेष न हों । भारत की परतंत्रता के समय यह संदेश प्रेरणा का स्रोत रहा ।

 'राम की शक्ति पूजा’ काव्य की सर्जना जिस काल में हुई थी, वह देश की पराधीनता का काल था । गहन अवसाद और निराशा का युग था । विदेशियों के दमन­चक्र से अनवरत आक्रांत भारतीय किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे । ऐसे समय में कवि ने रावण की अशोक वाटिका में बन्दिनी सीता को अन्तर चेतना में पराधीन भारत माता मानकर ही चित्रित किया है । रावण अनेक प्रकार की अनीतियों, क्रूरताओं, अत्याचारों से पूर्ण अंग्रेजी शासन का प्रतीक बनकर चित्रित हुआ है, तो राम को देश की स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता व अत्याचार के विरूद्ध संघर्षरत भारतीय मानस के रूप में व्यक्त किया है । सीता के नयन राम के लिए नव प्रेरणा का अजस्र स्रोत बनकर जनक की सभा में राम के हाथ धनुर्भंग के लिए उठ जाते हैं । अर्थात् अपनी अदम्य शक्ति की गंभीरता राम के साहस­उत्साह में पुनः मचल उठती हैं-

“ हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त
फिर विश्व विजय भावना हृदय में आई भर ।”
  
विश्व विजय की इसी भावना को पराधीन भारतीयों के मन में उजागर करना प्रस्तुत कृति का उद्देश्य प्रतीत होता है ।

 
  स्वातंत्र्य आन्दोलनों के उन क्षणों में स्वातंत्र्य­चेत्ता और उस संग्राम के अग्रणी नेताओं के मन में आशा­निराशा का अनवरत द्वंद्व चलता रहता था, उसकी प्रतिच्छवि उक्त काव्य में है तो उधर निराला जी का स्वयं का जीवन भी अनेक प्रकार के वैषम्यों के कारण द्वन्द्वग्रस्त था । वे पूर्ण ईमानदारी, सजगता और सचेष्टता से अपनी विषम परिस्थितियों के साथ द्वन्द्व­संघर्ष में निरत रहे, फिर भी विजय उनकी नहीं, विपरीत शक्तियों की होती रही । यह द्वंद्व न केवल ‘राम’ का बल्कि कविवर निराला का भी है । रावण के सामने राम सृष्टियाँ भी रुधिर­क्लोत होकर रह गई और परिस्थितियों के वैषम्य के सामने कविवर निराला का रक्त भी अनवरत शोषित होता रहा । काव्य के आरंभ में ही इन्हीं वैषम्यों का विषयोद्घाटन हुआ है-

राघव­लाघव ­ रावण­कारण ­ गत­युग्म­प्रहर,
उद्धत­लंकापति ­ मर्दित ­कपि­दल विस्तर,

अनिमेष राम­विश्वजिद् दिव्य­शर­भंग­भाव­

बिद्वांग­बद्ध ­कोदण्ड ­सृष्टि­खर­रुधिर­स्राव

 वर्तमान समय भी ऐसा प्रतीत होता है कि विषम परिस्थितियों का शिकार है । अन्याय जिधर है, उधर शक्ति है । कट्टर­अंध शक्तियाँ अपने विकराल रूप में हैं और सदाचारी शक्तियाँ निराश और बेबस हैं । ‘राम की शक्ति पूजा’ में ‘राम’ ने शक्ति की मौलिक साधना कर विजय को वरण किया । इस प्रकार कविवर निराला ने दिखाया कि सत्य, न्याय, नैतिकता, सदाचरण आदि के साथ पुरुषार्थ का होना भी परम आवश्यक है । इसके द्वारा ही पाशविक शक्तियों से मुक्ति प्राप्त हो सकती है । कवि ने निष्काम कर्म का संदेश ‘राम’ के व्यक्तित्व के माध्यम से रूपायित किया है । राम का अपराजेय का आदर्श हमें प्रेरणा देता है । पराजय और दैन्य भाव को तिलांजलि देने पर ही मानवता की रक्षा संभव है, किंकर्तव्यविमूढ़ बने रहने में नहीं।

 
जिस तरह निराला अनेक संघर्षों में भी आस्तिकता, आस्थावादिता और आशा का दामन थामे रहे, उनका संदेश ‘राम की शक्ति पूजा’ में प्रणीत हुआ है । कवि का दृढ़ विश्वास है कि अडिग शक्ति एवं अदैन्य भाव से संघर्ष करने वाला व्यक्ति अंत में विजय अवश्य प्राप्त करता है । राम ने जब अपने ‘राजीव­नयन’ को अर्पण करने का निश्चय कर लिया, तो शक्ति को प्रकट होना पड़ा, पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

जिस क्षण बँध गया बेधने का दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्मंड, हुआ देवी का त्वरित उदय,

“साधु­साधु, साधक­धीर, धर्म­धन­धान्य राम!”

कह लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम ।

हाथ थामने के बाद साक्षात् भगवती ने राम को चिर विजय का अमर वरदान दिया और रावण का साथ छोड़कर राम के शरीर में लीन हो गई, यथा-


“होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन ।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन

नैराश्य पर विजय प्राप्त कर, शक्ति का संचय करें और आसुरी शक्तियों पर अपने पुरुषार्थ से विजय प्राप्त करें । ‘राम की शक्ति पूजा’ का यही निहितार्थ है ।
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कामायनी का सामयिक यथार्थ

कामायनी का सामयिक यथार्थ 

(आकाशवाणी चित्तौड़गढ़ से प्रसारित)
                        जयशंकर ‘प्रसाद’ रचित कामायनी हिन्दी जगत् की कालजयी कृति है । इसकी रचना के समय भारतीय जनमानस स्वाधीनता की आकांक्षा के साथ संघर्ष कर रहा था । राष्ट्रप्रेम की धारा में डूबा हुआ सारा देश अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियों के विरूद्ध उठ खड़ा हुआ था । सदियों की दासता से पीड़ित जनता में स्वातंत्र्य चेतना पूरी शक्ति के साथ उद्वेलित हो उठी थी। उस समय भारतीय चिंतन के क्षितिज पर अहिंसा, राष्ट्रप्रेम, सत्याग्रह आदि मूल्य उभर रहे थे । 

                     आज इक्कीसवीं सदी का प्रथम दशक भी व्यतीत हो चुका है। पूरी दुनिया ‘ग्लोबल विलेज’ में विचरण कर रही है । वैश्वीकरण के इस दौर में बाज़ार हमारे जीवन में प्रविष्ट हो चुका है । इस बाज़ार में आचार, विचार, परिधान, जीवन­शैली में परिवर्तन के साथ हमारा सांस्कृतिक तंत्र भी इस व्यवस्था की फाँस में है । मानवीय संदर्भ बदल गए हैं और चुनौतियाँ निरन्तर बढ़ रही हैं । 

                     वर्तमान समय के संदर्भ में कामायनी का अवलोकन करें तो प्रतीत होता है कि समकालीन चुनौतियों के समाधान इस कृति में यत्र­तत्र विद्यमान हैं, जो न केवल सामयिक संदर्भों में उपयोगी हैं, वरन् भविष्य के दिशा सूचक भी हैं । प्रसाद कृत कामायनी कर्मण्यता का संदेश देती है । इसकी प्रथम पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला का शीतल छाँह ।
एक पुरुष भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय­प्रवाह ।।

                     यह प्रलय­प्रवाह मनुष्य की अत्यधिक भोगवादी लालसा से घातक परिणामों की ओर संकेत करता है, जहाँ कवि ने संदेश दिया कि यह प्रवृत्ति महाविनाश की ओर ले जाने वाली है, जहाँ सिवाय ‘आँसुओं’ के कुछ नहीं बचेगा।  आज अहंकार के रथ में जुती हुई आर्थिक साम्राज्यवादी ताकतें उदारवादी अर्थ­व्यवस्था के बहाने मानवता को सामान्य प्राकृतिक अधिकारों से भी वंचित कर रही हैं । यह कृत्य शोषण का नया पर्याय है । इसके दायरे में तो लगभग सम्पूर्ण मानव­समुदाय आ गया है । अर्थ­शक्ति का यह अहंकार पतन की शुरूआत है, जिसका संकेत कामायनी में किया गया-

देव न हम थे और न ये हैं,
सब परिवर्तन के पुतले ।
हाँ कि गर्व­रथ में तुरंग­सा,
जितना जी चाहे जुत ले ।।

                    इस गर्व रथ की परिधि में बौद्धिक जगत भी आ गया है, जो विषमताओं का समाना नहीं करना चाहता । पलायनवादी मानसिकता ने अकर्मण्यता को जन्म दे दिया है, जिसससे मानवता का विकास अवरूद्ध हो रहा है। कामायनी मनुष्य को कर्म की ओर प्रवृत्त करती है, जो वर्तमान समय की नितांत आवश्यकता है । श्रद्धा का यह कथन वर्तमान परिस्थितियों में सार्थक प्रतीत होता है-

काम मंगल से मंडित श्रेय,
सर्ग इच्छा का है परिणाम ।
तिरस्कृत कर उसको तुम भूल,
बनाते हो असफल भवधाम ।।

                     पदार्थवादी दुनिया, विषमतामूलक समाज और मूल्यहीनता की ओर बढ़ती अपसंस्कृति ने मनुष्य को पंगु बनाया है । उद्दाम लालसाएँ पालने मात्र से जीवन सुखद नहीं होता, बल्कि ज्ञान और क्रिया से सामंजस्य भी स्थापित करना पड़ता है। इसके अभाव में जीवन की पूर्णता संभव नहीं । कोरी बुद्धि अथवा कोरी भावुकता सफलता का हेतु नहीं, बल्कि इनका समन्वय आवश्यक है । कामायनी कार का स्पष्ट संदेश है-

ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है,
इच्छा क्यों पूरी हो मन की ।
एक दूसरे से न मिल सके,
यह विडम्बना जीवन की ।

                        हमारा सामाजिक जीवन विसंगतियों को शिकार हो गया है । जाति, धर्म, संप्रदाय आधारित विकृत व्यवस्था नई सदी के साथ चल रही है, जिसके मूल में मात्र विद्वेष है । यह विद्वेष ही संघर्ष को जन्म दे रहा है । प्रसाद ने कहा-

द्वयता में लगी निरन्तर ही,
वर्णों की करती रहे सृष्टि ।
अनजान समस्याएँ गढ़तीं,
रचती हैं अपनी ही विनष्टि ।।

                          क्या यह विद्वेष समाप्त नहीं हो सकता? हम आधुनिक मानव एवं विकसित सभ्यता का दंभ पालने वाले ऐसे विश्व का निर्माण नहीं कर सकते, जैसा कामायनी में वर्णित है-

शापित न यहाँ है कोई, तापित पानी न यहाँ हैं ।
जीवन वसुधा समतल है, समरस है जो कि जहाँ है ।

                          यह सच है कि पूँजीवादी व्यामोह में प्रकृति के साथ सर्वाधिक खिलवाड़ हुआ है । भौतिक समृद्धि के साथ विनाश ने आने वाली पीढ़ियों के जीवन को संकट में डाल दिया है । कामायनी का कथानक भी इसी आधार पर बुना गया । वस्तुतः विलास सदैव विनाश की ओर ले जाता है । कामायनी की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

मौन, नाश, विध्वंस, अँधेरा
शून्य बना जो प्रकट अभाव ।
वही सत्य है अरी अमरते,
तुझको यहाँ कहाँ अब छाँव ।।

                          नई सदी में सबसे प्रबल चिंतनपरक विमर्श उभर कर आया है, वह है- नारीवाद । कामायनी नारी के प्रति परम्परागत दृष्टिकोण को बदलने का संदेश देती है । वह उपभोग की वस्तु मात्र नहीं, अपितु प्रेरणा का पावन उत्स है, जो पुरुष को जीवन में प्रवृत्त करती है । पुरुषों की एकाधिकार प्रवृत्ति के प्रति कवि ने सावधान किया है-

तुम भूल गए पुरुषत्व मोह में,
कुछ सत्ता है नारी की ।
समरसता है संबंध बनी,
अधिकार और अधिकारी भी ।।

                          यह स्पष्ट है कि साहित्यिक कृति कभी अप्रासंगिक नहीं होती । वे समय से आगे का सच कहती हैं । मनुष्य उनकी समय रहते पहचान कर ले तो समस्याएँ नहीं रहतीं । वर्तमान विश्व जब अपने ही बुने हुए जाल में उलझता जा रहा है । तब कामायनी मानवता को उत्कृष्ट बनाने का रास्ता बनाती है । कविवर जयशंकर प्रसाद की यह दृढ़ कामना रही कि मानव सृष्टि चेतना का इतिहास हों, अतीत की गलतियाँ दुहराई न जाए, तब दिव्य विश्व निर्मित होगा। यथा-
चेतना का सुन्दर इतिहास,
अखिल मानव भावों का सत्य ।
विश्व के हृदय­पटल पर दिव्य,
अक्षरों से अंकित हो नित्य ।।

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ई-लोक चौपाल-2

मधुमती, अगस्त,2017 में प्रकाशित।
ईलोक चौपाल-2

                         ख्यातनाम कवि एवं आलोचक हेमंत शेष ने अपने रचनाकर्म से साहित्य एवं कला जगत् को सम्मोहित किया है। फेसबुक वाल पर उन्होंने लिखा कि कैसे रचता है कोई लेखक अपनी कृति? कविता, कहानी, उपन्यास..... ये सवाल पूछना अपने रचनाकार की सीमा से कुछ बाहर निकलकर खुद से एक तटस्थ ‘वैज्ञानिक’ किस्म की तटस्थ जिज्ञासा से जुडा प्रश्न पूछना है।.... हर शुरू होने से पहले, बहुत कुछ है अज्ञात, अपूर्वमेय, अँधेरे में डूबा... एक बहुत गहरी बावडी, जिसकी सीढियाँ किसी अज्ञात अनंत की ओर उतरती है.. क्या वहाँ जल है या सिर्फ सूखी खडखडाती निस्तब्धता... कोई नहीं जानता! रचना-प्रक्रिया को रेखांकित करते हुए साफगोई से वे लिखते हैं, ‘‘हर अच्छी रचना, लिखे जाने से पूर्व एक गहरी अपूर्वमेयता का लबादा ओढे रहती है... काले भारी कम्बल को हटा सकूँ तो आकृति, कोई रूपरेखा दिखे!’’ ‘साहित्य का सच और वैचारिक प्रतिबद्धता शीर्षक प्रसंग में हेमंत शेष की टिप्पणी विचारणीय है कि इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि साहित्य के साथ जोडे गए आदर्श-उसकी सम्प्रेषणीयता ने आखिर क्या खतरे पैदा किए हैं?... कहीं इसके अति आग्रह से हमारा साहित्य कहीं सतहीपन, सरलीकरण, सामान्यीकरण में बदलता जटिल और सूक्ष्मतर गुणों से विरत होता किसी अर्थ के भौंथरेपन, कोडीफिकेशन, थोथेपन के नजदीक तो नहीं पहुँच रहा है?
                                   दिल्ली में बैठकर साहित्य रचना करने से कोई लेखक यदि भ्रम में है कि वह बडा बन गया है तो उसकी वास्तविकता से परिचय करवाते हुए अनूप शुक्ल ने व्यंग्यात्मक लहजे में टिप्पणी करते हुए लिखा-‘राजधानी दिल्ली में रहकर लिखने पढने का अपना सुख है.... दिल्ली केन्द्र है; सत्ता का भी, साहित्य का भी और साहित्य की सत्ता का भी।... प्रायः सारे महत्त्वपूर्ण लेखक दिल्ली में हैं.... साहित्य की वाचिक परम्परा के बडे-बडे स्तंभ दिल्ली में ही हैं.... वहाँ के लेखकों के वक्तव्यों की भी काफी मांग है। किसी अनर्गल विषय पर दिल्ली के अमहत्त्वपूर्ण लेखक का अप्रासंगिक मत भी महत्वपूर्ण मान लिया जाता है, जिस पर देशभर के छोटे-बडे साहित्यकार चर्चा करते हैं।.... अंत में वे सावधान करते हैं कि दिल्ली को देश की राजधानी बनाना तो ठीक, लेकिन उसे साहित्य की भी राजधानी बनाना साहित्य के भविष्य के साथ खिलवाड करना और साहित्य की समृद्धि को सीमित करना है। पुरानी कहावत है कि दुष्टों को बिखरने नहीं देना चाहिए और संत-विद्वानों को बिखेरकर रखना चाहिए, तभी मानवता का कल्याण संभव है; और शब्द-साहित्य का भी!
भारतीय सांस्कृति परम्पराओं; प्रतीकों का अपमान करना बुद्धिजीवियों की निशानी बना रहा है। राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी ने तथाकथित विचार समूहों को संकेत करते हुए लिखा कि जो यह सामझते हैं कि देश की प्राचीन-संस्कृति सामंतों और पुरोहितों की रचना है, वे बहुत घाटे में हैं। वे लोक की शक्ति की पहचान नहीं कर पाते। वे गंगा के पास जाकर भी केवल घाटों के देखकर ही लौट आये! गंगा के प्रवाह को नहीं जाना, वह निर्मल-धारा, जो प्रेम की सर्वोपरिता का अभिषेक करती है। उन्होंने अपने मन का सवाल रखते हुए वर्तमान साहित्य ‘जगत’ की दिशा पर भी प्रश्न खडा किया-मेरे मन में सवाल था कि कहीं ब्राह्मणवाद शब्द की आड लेकर भारत की समूची विद्या-परम्परा को, विद्या साधना, तप त्याग जैसे जीवन मूल्यों को नकारा तो नहीं जा रहा? भारत की संस्कृति, दर्शन, वेदपुराण-उपनिषद-साहित्य का तिरस्कार तो नहीं किया जा रहा?
                            आतंकी वारदातों के बीच अम्बिका दत्त चतुर्वेदी की अमरनाथ यात्रा रोमांचकारी रही। डल झील के गरीब नाविकों की मनः स्थिति का चित्रण करते हुए वे लिखते हैं-जब ये दीन (धर्म), राजनीति, आतंक के शिकंजे में लोभ, भय, आस्था और भ्रम की रस्सियों में जकडे कसमसाते होंगे, कैसी मुश्किल होती हेागी? जो रोज कुआँ खोदता और रोज पानी पीता है, उसके लिए एक तरफ तो रोजी रोटी, बच्चों की परवरिश के यथार्थ की हकीकत है, उससे जुडे सवाल हैं और दूसरी तरफ भ्रम, भय, आतंक, अंधविश्वास और लोभ के दाँव अपने विकराल पाश लिए खडे हैं.... लेकिन जीवन और कविता भी इन्हीं असंभव लगने वाले हालात के बीच गाया जाने वाला खुशबूदार उम्मीद का मीठा नगमा है जो हर बुरे से बुरे वक्त में, बुरे से बुरे इंसान के अन्दर बजता रहता है और जीवन को वापस लौटा लाने का काम करता है। हम उसी नगमे, उसी फूल, उसी खुशबू के लौट आने की दुआ करते हैं।
                            काठमांडू यात्रा के वृतान्त को साझा करते हुए सवाई सिंह शेखावत लिखते हैं कि नेपाल की यात्रा छोटे भाई के घर जाने जैसी है। भाषा, भूषा, मुद्रा, रीत-परम्पराएँ कुछ भी आडे नहीं आता। नेपाल के लोगों का धैर्यपूर्ण जीवन-व्यवहार भी बहुत मुतासिर करता है। सडक पर चलते हुए माला फेरने का आम रिवाज है। उसमें प्राचीन भारतीयता के साथ बुद्धत्व का असर भी साफ दिखता है। नेपाली कवि ‘सुमन पोखरेल’ की कविता ‘पेड’ का संदर्भ देकर जीवन की समग्रता को रेखांकित किया मैं देख रहा हूं पेड को/पेड टुकडों में नहीं जीता। जब तक जीता है, जिंदगी की संपूर्णता में/ अपने में समाहित कर जीता है/ धूप में धूप से संतुष्टि/बरसात में भीगने की खुशी। पेड की भूख अपने आकार से बडी कतई नहीं। जीने की दौड-धूप से परेशान मैं/दिल दिमाग और बदन से थका-माँदा मैं/उसकी छाया में लेटकर/उगती चाँदनी के साथ देखता हूँ उसे/और वह खडा है, सौम्य निडर और निश्ंचत!
                   कथा सम्राट प्रेमचंद को उनके जन्मदिन पर याद करते हुए पुनीत बिसारिया कहते हैं कि प्रेमचंद को पढना भारत की आत्मा को पढना है। उनके पात्र यहीं कहीं घूमते दिख जाएंगे। आदर्श और यथार्थ का ऐसा विरल संयोग अन्यत्र दुर्लभ है। उनके जाने के अस्सी साल बाद भी उनके पात्र आकर हमारी आँखों के सामने चुनौती देते प्रतीत होते हैं कि हो सके तो हमारी विपदा दूर करो। एक तरफ मंत्र, कफन, सद्गति, दो बैलों की कथा जैसे दुखियारे पात्र हैं तो दूसरी तरफ नमक का दारोगा, पंच परमेश्वर, ईदगाह के सच्चे निष्कलुष, निष्कलंक पात्र। कौन कह सकता है कि जालपा घीसू-माधव, सूरदास, बूढा, होरी, गोबर, मिस मालती, जुम्मन मियां, हल्कू आज के भारत में नहीं मिलेंगे। प्रेमचंद की जन्मभूमि ‘लमही’ को केन्द्र में रखकर भरत प्रसाद ने कविता ‘गाँव गाँव लमही’ साझा की-लमही नहीं है लमही में/नहीं है बनारस में/ नहीं है उत्तर प्रदेश में/ लमही के लिए / भारतवर्ष छोटा पड गया है/ लमही है तो कलम के सिपाहियों की उम्मीद/ अभी बाकी है/बाकी है पशुओं को हीरा-मोती कहने का सपना/उम्मीद है कि/अंतिम मनुष्य की मुक्ति की लडाई/फिर कोई प्रेमचंद लडेगा/वरना अब कौन कहेगा? धरती की फसलें, पानी-वानी से नहीं/किसी के खून, पसीने से लहलहाती है।
                         भाषायी दृष्टि से समृद्ध भारत में भाषा-विवाद सत्ता के गलियारे में पहुँच गया है। उषारानी राव ने इस संदर्भ में अपना मत व्यक्त करते हुए लिखा कि तेजी से बदलते संवदेशील दौर में जहाँ वैश्वीकरण विशाल संभावनाओं के नये द्वार खोलता जा रहा है, वहीं अनेक अवरोध भी। विकास उन्नति का सोपान है। चतुर्दिक विकास के द्वारा समाज असमानताओं से छुटकारा पाता है। स्थान, जलवायु एवं सभ्यता के प्रभावान्तर्गत भाषाओं की विविधता द्रष्टव्य है। अनेक भाषाओं से संपन्न उत्कृष्ट एवं समृद्ध साहित्य वाले देश में भाषाओं को समग्र स्थान देकर वैश्विक रूप से स्थापित करने के बजाय आज राजनीतिक स्वार्थ की कलुषता के कारण सरकार की नीतियाँ ऐसी बनती जा रहीं है कि हमारी भाषाओं को एक-दूसरे के सामने द्वन्द्वात्मक मुद्रा में खडी कर दिया गया है।
                    नवोदित रचनाकार विमलेश शर्मा ने आधुनिक समाज में स्त्रियों की दशा को बखूबी रेखांकित किया है- कंदील का बुझना हर जगह एक जैसा ही है... हर समाज की जाने कितनी कहानियाँ हैं... कितने पथरीले और तंग सफर हैं और जाने कितने अँधेरे कोने हैं जहाँ आँसुओं के सैलाब से मन की सीलन उघडती रहती है। जाने कितने धु*व अब भी हैं जो विषम हैं... स्त्री का मुखर होना, अपनी बात रखना... आखिर क्यों समाज को सालता है... प्रश्न सदियों से ज्यों का त्यों है.... अजीब बिडम्बना है, जिन प्रश्नों के उत्तर सबसे पहले खोजे जाने चाहिए थे, वही प्रश्न आज भी मुँह बायें खडे हैं।
                        रामकाव्य की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत ‘रामचरित मानस’ अप्रतिम हैं। डॉ. राजेश श्रीवास्तव ने दोनों की तुलना करते हुए क्रमशः शास्त्र और लोक का पर्याय बनाया है। तुलसी जयन्ती पर वे लिखते हैं कि जो शास्त्र में छूट जाता है वह लोक में मिल जाता है। शास्त्र लिखित रूप में होने के कारण अपरिवर्तनशील होता है, किंचित कठोरता के साथ; किंतु लोक बहुत लचीला एवं परिवर्तनशील होता है। लोक जनसामान्य के निकट होता है। लोक को यह अधिकार भी होता है कि वह उसमें अपने अनुसार परिवर्तन करता चले। अपने आराध्य राम की आलोचना एक हिरणी के मुख से करवाना तुलसीदास का लोकाधिकार ही है- तुम जिन भय मानहुँ मृग जाए। केचन मृग ढूँढन ये आए’’ मानस का यही लचीलापन उसे लोक प्रसिद्धि देकर शास्त्र से भी श्रेष्ठ स्थान प्रदान करता है।
विस्थापन और आतंक का लोकधर्मी सौंदर्य अग्निशेखर की कविताओं में मिलता है। सुशील कुमार ने समीक्षा करते हुए लिखा, ‘‘अग्निशेखर की कविताओं में प्रकृति के बिम्ब विस्थापन की भावभूमि पर आकर जो रूप लेते हैं, वह दुःख, भय, त्रासदी और आशा के बीच के अंतर्द्वन्द्व को जिस काव्यात्मक सौष्ठव और मेधा के साथ प्रकट करते हैं, वह पाठक के मन में कई भावों-अनुभावों का एक मिश्रित हिलोर या कम्पन (मिक्सड वाइब्रेशन) पैदा करता है-‘‘छलनी-छलनी मेरे आकाश के ऊपर से/बह रही है/स्मृतियों की नदी/ओ मातृभूमि!/क्या इस समय हो रही है/मेरे गाँव में वर्षा?/ कविता-वर्षा।
                           हिन्दी सिनेमा में गीतों के बदलते रूप पर गौरीनाथ ने टिप्पणी की है, वे मुखर रूप से लिखते हैं कि सिनेमा में गीतों का चरित्र भीषण रूप से बदला है।... म्युनिक चैनलों पर लगातार चल रहे नए गीतों में शब्द, स्वर और संगीत का महत्व उतना नहीं रह गया है, जितना देह और दृश्यों का। मानो वह गीत एक साथ देह से गाया जा रहा हो, कपडों से गाया जा रहा हो, बाथ-टब, साबुन या शो-रूम की असंख्य लग्जरी ची*ाों के माध्यम से गाया जा रहा हो! कम समय में अधिकतम प्रमोशन और विज्ञापन इन गीत-दृश्यों का प्रमुख लक्ष्य बन गया है, तभी तो बाजार-वस्तुओं की भरमार और देह के कटावों का अधिकतम इस्तेमाल यहाँ दिखता है।...
                              युवा कवि की प्रतिमा और संभावनाओं को सम्मानित करने वाला भारत भूषण पुरस्कार अच्युतानंद मिश्र को दिए जाने के समाचार के बाद ई लोक में वाद-विवाद चल ही रहा था कि कृष्ण कल्पित द्वारा कवयित्री अनामिका और अच्युतानंद पर टिप्पणी फेसबुक वाल पर लगाई, तीव्र विरोध के बाद वह हटा ली गई, लेकिन घमासान जारी है। लीना मल्होत्रा लिखती हैं कि कृष्ण कल्पित कवि कैसे भी हों, उनकी सोच बहुत घटिया है। उनकी भाषा में सामंती दृष्टि और स्त्रियों के प्रति दुराग्रह साफ दिखता है। आशीष त्रिपाठी ने लिखा-साहित्य में ऐसा विकृत मर्दवादी आचरण असल में व्यक्तिगत कुंठा से ज्यादा सामंतवादी पितृसत्तात्मक मन की अभिव्यक्ति है। जो हिन्दी में अभी भी बहुत ज्यादा जगह घेरे हुए है। मनीषा कुलश्रेष्ठ की पीडा इन शब्दों में उजागर हुई, हिन्दी जगत स्त्रियों को मिलते सम्मान को हमेशा नीचता से लेता है। बहुत स्त्री विमर्श का शोर है हिन्दी जगत में, लेकिन यहाँ सबसे ज्यादा जलील स्त्रियाँ होती रही हैं।... अब वक्त बदल चुका है। चरित्र, स्त्री लेखन की तुम्हारी परिभाषाओं पर तमाचा पड चुका है। तुम्हारी तय की गई पतनशीलता अब तुम्हारे गले की हड्डी है। अनेक साहित्यकारों ने उस टिप्पणी की निन्दा की है। इस विवाद में कुछ साहित्यकार कृष्णकल्पित के साथ भी आ जुटे हैं। देखते हैं यह घमासान कब तक चलता है। ?
शेष अगले अंक में...... 

ई-लोक चौपाल-1

(मधुमती, जुलाई,2017)में प्रकाशित।
ई लोक चौपाल


                      सूचना क्रांति के नवोन्मेषी स्फोट का समय और साहित्यिक-संवाद के लिए सशक्त मंच अब प्रत्येक व्यक्ति के पास उपलब्ध है। ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक, वाट्सअप सहित अनेक माध्यमों ने अभिव्यक्ति के बहुआयामी अवसर दिए हैं। साहित्यिक विषयों पर परिचर्चाएँ खूब लोकप्रिय हैं। ख्यातनाम साहित्यकार अथवा नवोदित साहित्य प्रेमी सभी इसमें भाग ले रहे हैं। पिछले दिनों जिन विषयों पर ‘इे लोक ‘ में चर्चाएँ हुईं, कतिपथ अंश प्रस्तुत है-
                          कृष्ण काव्य परम्परा में ‘उद्धव’ महत्वपूर्ण पात्र है। इन्दौर दो सुशोभित सक्तावत ने उद्धव के चरित्र का मौलिक दष्टि से मूल्यांकन किया है। वे लिखते हैं। ‘‘जब-जब मैं ‘‘भ्रमर गीत’’ प्रसंग सुनता हूँ।, उद्धव के प्रति करुणा से मेरा वक्षस्थल भर आता है। श्री कृष्ण का यह अनन्य सखा जब स्वयं को ही बरजकर गोपियों के समक्ष प्रेम के विरुद्ध तर्क रख रहा होता है, तो क्या वह आत्मत्याग और आत्मविलोपन के महानतम क्षणों में से एक नहीं है?’’ इसके साथ ही ‘कृष्णवल्लभा’ शीर्षक में उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया है कि ‘श्रीमद्भागवत पुराण’ के १२ स्कंध, ३३५ अध्याय और १८ हजार श्ा*ोकों में कहीं भी ‘राधारूप’ का वर्णन नहीं है। वे प्रश्ा* करते हैं ‘‘श्री कृष्ण के व्यक्तित्व में जैसी उदासीनता है, जैसा निरुद्वेग और अनासक्ति है, क्या वह राधारूप के अक्षय प्रेम के आलम्बन के बिना संभव हो सकती थी?’’
                         कश्मीरी विस्थापितों की पीडा को सशक्त ढंग से व्यक्त करने वाले कवि एवं आलोचक अगि*शेखर ने कवि मंगलेश डबराल के नाम खुला खत लिखा जिसमें कश्मीरी विस्थापितों की त्रासद स्थिति का मार्मिक एवं यथार्थ चित्र उपस्थित होता है। कविता ‘लू से मरे पिता की याद’ में उन्होंने अपना दर्द साझा किया- तपी हुई धरती पर रखे/ चिनार से मेरे पिता ने/ अपने हरे पाँव- हे राम। राशन, पानी और टेंटों के लिए / निकाले गये विस्थापितों के जुलूस में चलते हुए / कहा उन्होंने / ‘मेरी जल रही पलकें- मैंने उनके सर पर रख दी गीली रूमाल..../ पुलिस ने छोडे आँसू गैस के गोले / भाग गये विस्थापित।/ पिता बैठ गए एक गली में / खम्भे के साथ / बोले../ ‘चलो करते हैं धर्म परिवर्तन ही / और लौट जाएँगे कश्मीर / घने चिनारों की छाँह में / वही मरेंगे अपनी मातृभूमि में / ‘एक ही बार’ पिता देखते रहे धूप में आवाक/ और वहीं पर / हो
गए ढेर।
                      इन दिनों मुक्ति बोध पर काफ ी चर्चाएँ हो रही हैं। शिलांग से भरत प्रसाद ने कविता में फ ैंटेसी पर टिप्पणी करते हुए लिखा ‘अपने चरमोत्कर्ष पर फैंटेसी न अर्थ के स्तर पर कठिन रह जाती है, न भाषा के स्तर पर, न शिल्प के स्तर पर और न ही बिम्ब या प्रतीक के स्तर पर। इस स्तर की फैं टेसी को पढते जाइए और गहराई में धँस जाने वाले अर्थों से अपनी आत्मा को भरते जाइए। ‘मुक्तिबोध’ की ‘सूखे कठोर नंगे पहाड’ की पंक्तियों को उद्धृत किया-’ मार्ग तिलस्मी है, है जादुई देस...।। / निज अन्ध गुहा की छत में तान्त्रिक ने / असंख्य आत्माएँ लटका दीं चिमगादड के समूह सी उलटी...।
                               राँची से सुशील कुमार ने ‘आउटडेटेड’ काव्य-भाषा में कवि विजेन्द्र का बिम्ब मोह और लोक का नया रूपवाद प्रस्तुत किया। आलोचना कर्म पर उनकी टिप्पणी दिलचस्प है। ‘‘ जब आलोचना के टूल्स काव्य-तत्व से तय न होकर जाति व अहमन्यता से तय हो, पक्षधरता काव्यात्मक अन्तर्वस्तु को ताक पर रखकर निजी रिश्ते तय करें, प्रतिबद्धता लेखक संगठनों के एजेंडे से निसृत हो, तर्क पूर्वाग्रह द्वारा गढे गये हों तो समझ जाइए कि सहमति और असहमति के द्वन्द्व से बाहर निकलकर वह कुकवि को कवि और कवि को कुकवि बनाने पर तुला है और उसकी आलोचना अपने पथ से भटक चुकी है।
                     झाँसी से पुनीत बिसारिया ने आचार्य अभिनव गुप्त के प्रत्याभिज्ञा दर्शन की वर्तमान समय म प्रांसगिकता निरूपित करते हुए लिखा कि आज से लगभग १००० वर्ष पहले अपनी नवोन्मेष शालिनी प्रतिभा से अनेक दार्शनिक मान्यताओं का कौशलपूर्ण समन्वय करते हुए एक ऐसे दर्शन का सूत्रपात किया, जिसमें समाज की सहस्नों वर्षों से चली आ रही मान्यताओं से मुक्त होने, तथा ब्राह्मण और शूद्र दोनों को बराबरी पर ला खडा किया। उन्होंने साधना के मार्ग में जातीय श्रेष्ठता की विसंगति को दूर किया। डिग्बोई, आसाम से हरेराम पाठक ने संत कबीर का स्मरण करते हुए लिखा ‘‘संत कबीर ने हिन्दू और इस्लाम दोनों धर्मों की रूढियों एवं प्रगतिबाधक परम्पराओं की कटु आलोचना करते हुए उन्हें सद्मार्ग पर चलने एवं एक स्वस्थ समाज के नव निर्माण हेतु प्रेरित किया था। इसलिए कबीर को मात्र एक कवि, धर्म सुधारक और समाज संस्कारक के रूप ही न देखकर एक निष्पक्ष समालोचक के रूप में भी देखना चाहिए।
                       मनीषा कुलश्रेष्ठ ने ईद के अवसर पर अपनी बचपन की स्मृतियाँ साझा करते हुए कहा कि बचपन की ईद याद आ रही है। ‘हामिद का चिमटा’ ने हम सब बच्चों के लिए ईद प्यारी कर दी, कि बचपन म तरह-तरह की सिवाइयों के भरे छोटे-छोटे कटोरदान घर आते थे। सबमें स्वाद अलग। नूरजहाँ आँटी, रेहाना, इल्मास, नूरमहल स्कूल के टीचर्स के यहाँ से। वह बचपन, वो माहौल लौटा दो मुझे ईदी में। संभावना चित्तौडगढ के समाचारों में माधव हाडा का यह कथन अवलोकनीय है-‘‘ हिन्दी का आधुनिक साहित्य परम्परा से नहीं जुडता। हमारी संस्कृति और संस्कार में हमारा जातीय साहित्य नहीं है। मुनि जिनविजय का सबसे महत्वपूर्ण अवदान यह है कि वे यूरोपीय समझ के समानांतर भारतीय ज्ञान और परम्परा की पुनर्प्रतिष्ठता करते हैं।
                 राजस्थान साहित्य अकादमी के नए अध्यक्ष का स्वागत करते हुए डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल लिखते हैं ‘‘अकादमी के नए बने अध्यक्ष की छवि एक सरल, सौम्य व्यक्ति की है। राजस्थान की साहित्यिक बिरादरी उनसे यह आस रखती है कि वे प्रांत के भिन्न-भिन्न रूझानों और स्वरों वाले साहित्यकारों की बिरादरी को पूरा मान देते हुए अकादमी का खोया वैभव लौटाने के लिए काम करेंगे। तमाम वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद राजस्थान की साहित्यिक बिरादरी में जो सहजता, सदभाव और अपनापा मौजूद है, वह उन्हें उनके प्रयासों में भरपूर सहयोग देगा। ‘जीवन की पाठशाला’ शीर्षक से फेसबुक वाल पर लोकप्रिय रचनाकार सवाई सिंह शेखावत ने युवा रचनाकार को अकादमी अध्यक्ष बनाए जाने का स्वागत करते हुए कविता के मर्म में पैठती उनकी टीप साझा की। यथा- ‘अस्ति की समग्रता के स्वीकार की जगह कविता में ही संभव है। / कल्प और विकल्प/ दृश्य और अदृश्य, अनुभूत और अननुभूत/ आकृतियाँ और परछाइयाँ- इन सभी सत्ताओं की जगह कविता में सुरक्षित है।....कविता ही है जो तथ्यों और विश्वासों को, इनमें से बिना किसी एक को वरीयता देते हुए सहज ही स्वीकार कर लेती है- माँ की तरह।’
शेष आगामी अंक में.... 

हल्दीघाटी:राष्ट्रीय गौरव का आख्यान

हल्दीघाटी ; राष्ट्रीय गौरव का आख्यान 

आकाशवाणी केंद्र,चित्तौड़गढ़ से प्रसारित वार्ता----

                           
 मेवाड़ धरा के गौरव, राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक एवं मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले शूरवीर महाराणा प्रताप का व्यक्तित्व सदैव प्रेरणास्पद रहा है। श्याम नारायण पांडेय रचित खंडकाव्य ‘हल्दीघाटी’ प्रताप के जीवन-चरित्र को अमरत्व प्रदान करने वाली कृति है। हल्दीघाटी नामकरण राजस्थान की वीरभूमि के उस स्थल का नाम है, जहाँ राणा प्रताप और अकबर के मध्य भीषण संग्राम हुआ, परन्तु अकबर की मेवाड़ विजय की कामना अधूरी रही। इस कृति पर पांडेय जी को प्रतिष्ठित ‘देब’ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। अठारह सर्गों में रचित यह रचना वीर रस की ख्यातनाम रचना है। श्याम नारायण पांडेय ने अपनी ओजस्वी प्रस्तुति से इस कृति को जनव्यापी बना दिया।

                           रचना का आरंभ प्रताप और शक्तिसिंह के मध्य आखेट के कारण बाल सुलभ विवाद का चित्रण है, जिसकी परिणति राजपुरोहित की मृत्यु के रूप में होती है। तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य के साथ अकबर की साम्राज्यवादी लालसा और मेवाड़ विजय का स्वप्न कथा की पृष्ठभूमि है। उसी क्रम में मानसिंह का मेवाड़ आगमन, अतिथि के समान आदर परन्तु प्रताप के आत्म स्वाभिमान समक्ष मानसिंह को खाली हाथ लौटना पड़ा, यह प्रतिशोध आगामी घटनाओं का सूचक है। प्रताप द्वारा भीलों की सहायता से सैन्य-गठन और चंद सैनिकों के उत्साह के समक्ष मुगल सेना में प्रताप के नाम से भयानक खौफ़ का चित्रण रोमांच पैदा करता है। हल्दीघाटी में भयानक रण, प्रताप का अप्रतिम शौर्य और चेतक का अद्भुत कौशल युद्ध का दृश्य उपस्थित कर देता है। खंडकाव्य में भामाशाह की दानवीरता, मेवाड़ की शान आदि का भी चित्रण हुआ है। संपूर्ण रचना वस्तुवर्णन, प्रकृति चित्रण, मानवीय वृत्तियों का रेखांकन और वीर रस के परिपाक की दृष्टि से महाकाव्यात्मक गरिमा से ओतप्रोत है, साथ ही ओजगुण युक्त रसात्मक शब्दावली से बिम्ब-विधान का सम्यक चित्रण अद्वितीय है। 
                          ‘हल्दीघाटी’ के नायक राणाप्रताप हैं और प्रतिनायक हैं- अकबर । प्रताप राजपूताना की छोटी-सी रियासत के राणा हैं, जबकि अकबर मुगल साम्राज्य का सम्राट। उसने संपूर्ण भारत पर एकाधिकार कर लिया, परन्तु प्रताप को झुकाने में विफल रहा। यह दंश उसे रह-रहकर सालता रहता। रत्नजटित महलों में अकबर की मनःदशा का चित्रण कवि ने इस प्रकार किया-


स्वर्णिम घर में शीत प्रकाश, जलते थे मणियों के दीप।
धोते आँसू-जल से चरण, देश-देश के सकल महीप ।
तो  भी कहता  था सुल्तान, पूरा  कब होगा अरमान ।
कब  मेवाड़ मिलेगा  आन, राणा  का होना अपमान ।।


                  दूसरी तरफ राणा प्रताप तनिक भी विचलित नहीं और अकबर से किसी प्रकार का भय नहीं। अरावली की उपत्यकाओं में अपना दरबार सजाए हुए हैं । उन्हें पता है कि मानसिंह की अवज्ञा से अब रण अनिवार्य है, परन्तु मातृभूमि की अस्मिता अक्षुण्ण रहे, उसकी रक्षा का प्रण अटल है। अपनी छोटी सी सेना, भील सरदारों के प्रण और स्वाभिमानी गौरव के साथ भावी रण की तैयारियाँ वीरोचित गरिमा के साथ प्रस्तुत हुआ है-

शुचि  सजी शिला  पर राणा भी, बैठा  अहि-सा फुंकार लिए।
फर-फर  झंडा  था  फहर  रहा,  भावी  रण का  हुंकार लिए।
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तरकस  में  कस कस तीर भरे, कंधों  पर कठिन कमान लिए।
सरदार  भील भी  बैठ गए, झुक-झुक रण  के अरमान  लिए।


                प्रताप की प्रतिज्ञा कि उनके जीवित रहते हुए मेवाड़ कभी भी पराधीन नहीं होगा। इसके लिए विशाल मुगल सेना से भिड़ने का अदम्य साहस अकल्पनीय है। राणा का महान् चरित्र तत्कालीन वातावरण में उनके अटल प्रण के साथ प्रकट होकर अथाह ऊर्जा का संचार करता है। माँ भवानी का आशीष लेकर जब हल्दीघाटी के मैदान में भीषण रण हुआ, तब मानसिंह के पैर उखड़ गए। राणा की सेना के अदम्य उत्साह से भीषण प्रहार हुआ, मुगल सेना में हाहाकार मच गया। युद्ध की भीषणता का अनुमान कवि की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- 

हयरुण्ड गिरे, गजमुण्ड गिरे, कट-कट अवनि पर शुण्ड गिरे।
लड़ते-लड़ते  अरिझुण्ड गिरे, भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे।
क्षण महाप्रलय की बिजली-सी, तलवार हाथ की तड़प-तड़प।
हय-गज-रथ, पैदल भगा-भगा, लेती थी बैरी वीर हड़प।।


             हल्दीघाटी का युद्ध यदि राणा प्रताप के तेज को कालजयी बनाता है तो स्वामिभक्त चेतक के अद्भुत रण-कौशल को भी अमर कर देता है। चेतक का शौर्य कवि की दृष्टि में विस्मयकारी था। रण-क्षेत्र में स्वामी के आदेश पर चौकड़िया भरकर अरि मस्तक को रौंद रहा था। हवा से बातें करने वाला चेतक दुश्मनों पर कहर बनकर टूट रहा था, कवि ने चेतक के कौशल को इन शब्दों में प्रकट किया है-

रणबीच चौकड़ी भर-भरकर, चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से, हवा का पड़ गया पाला था।
गिरता न कभी चेतक तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था।
वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था।


                इस खंडकाव्य में राजपूती आन-बान का और मेवाडी मान का शानदार चित्रण हुआ है। अकबर का संदेश लेकर अब मानसिंह आया, तब प्रताप को पता था कि वह छली है, उसके संदेश में केवल मिथ्याभिमान है, परन्तु आज वह अतिथि है। अतिथि का स्वागत मेवाड़ की सनातन परम्परा से ही होना चाहिए। वे अमरसिंह से कहते हैं, कि मानसिंह का मेवाड़ की धरती पर यथोचित गरिमा से सम्मान करो। अमरसिंह ने भी वैसी ही तैयारियाँ की। भोजन की थाली और उसमें सज्जित व्यंजन का रसात्मक वर्णन अवलोकनीय है-

घी से सनी सजी रोटी थी, रत्नों के बरतन में।
शाक खीर नमकीन मधुर, चटनी चमचम कंचन में।
$$ $ $
तरह-तरह के खाद्य-कलित, चांदी के नये कटोरे।
भरे खराये घी से देखे, नीलम के नव खोरे।


                  अकबर की सेना का नायक मानसिंह है। प्रताप से युद्ध भी उसी का होता है, अतः प्रतिनायक मानसिंह को मानना उचित होगा। भोजन के समय राणा प्रताप को ने देखकर वह अपमानित होता है। अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए वह प्रताप से युद्ध की ठानता है। उसमें भी राजपूती रक्त का प्रवाह उतना ही उन्नत है। शोलापुर विजय पर अकबर के दरबार में सम्मान यह प्रमाणित करता है। मेवाड़ में अपने अपमान का म्लान-मुख से अकबर के समक्ष दुःख प्रकट करते हुए कहता है कि उसके साथ कुत्ते के समान व्यवहार किया गया। अब वह उसका प्रतिकार चाहता है। मानसिंह का यह कथन उसके मूल चरित्र का रेखांकन है-

मानसिंह दल बन जाएगा, जब भीषण रण-पागल।
ऐ प्रताप, तुम झुक जाओगे, झुग जाएगा सेना बल।।



                   वीर रसात्मक इस खंडकाव्य में प्रकृति का मनोरम चित्रण भी हुआ है। वन में राणा-प्रताप जब युद्ध की तैयारियों में व्यस्त थे, तब उसी अनुरूप कवि ने वन की निर्जनता, पेड़ों की सघनता, पेड़ों के झुरमुट में सूर्य की रश्मि-रेखा और उसके साथ दृश्य-विधान का मनोहारी अंकन द्रष्टव्य है-

तरु-वेलि-लता-मय, पर्वत पर निर्जन वन था।
निशि बसती थी झुरमुट में, वह इतना घोर सघन था।
पत्तों से छन-छनकर भी, आती दिनकर की लेखा।
वह भूतल पर बनती थी, पतली-सी स्वर्णिम रेखा।


                 प्रस्तुत कृति में शक्तिसिंह का पश्चात्ताप और प्रताप के प्रति भ्रातृत्व का उमड़ता प्यार कारुणिक दृश्य उपस्थित करता है। शक्तिसिंह की आँखों में जब असीम अश्रुधारा बहने लगती है, तब प्रताप का हृदय द्रवित होकर ममत्व से भर जाता है। वे विगत घटनाक्रम को भूल भाई को गले लगा लेते हैं, ऐसे क्षण प्रकृति भी मुग्ध होती है और पेड़ फूल बरसाने लगते हैं। कवि की पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

उसे उठाकर लेकर गोद, गले लगाया सजल-समोद।
मिलता था जो रज में प्रेम, किया उसे सुरभित सामोद।।
लेकर वन्य-कुसुम की धूल, बही हवा मंधर अनुकूल।
दोनों के सिर पर अविराम, पेड़ों ने बरसाये फूल।।


                हल्दीघाटी की वर्णन-वैभव चामत्कारिक है। श्रोता अथवा पाठक प्रत्येक पंक्ति पर रोमांचित होता है। उसे साक्षात् मेवाड़ी धरा के गौरव का आभास होता है। वस्तु, प्रकृति, चरित्र, युद्ध, शौर्य आदि का वर्णन बिम्बात्मक है। यह बिम्बविधान दृश्यात्मक एवं रसात्मक है। वीर, रौद्र, भयानक एवं करुण रस की व्यंजना प्रसाद गुण में कर कवि ने इसे जन-जन का कंठहार बना दिया। पात्र एवं घटना के अनुकूल शब्द-चयन, शब्दों में आंतरिक गुंजन और उसके साथ आनुप्रासिक तारतम्य अद्भुत है। कवि का भावात्मक लगाव हृदय के मस्तक पर चढ़कर प्रकट हुआ है। अतः यह रचना हमारी आन-बान-शान की प्रतीक बनकर रगों में दौड रही है। कवि अपनी श्रद्धा इस धरती के प्रति प्रकट करता है-

यह एकलिंग का आसन है।
इस पर न किसी का शासन है।
नित सिहक रहा कमलासन है।
यह सिंहासन, सिंहासन है।।

जगद्गुरु शंकराचार्य उपन्यास का शैलीगत वैशिष्ट्य

जगद्गुरु शंकराचार्य उपन्यास का शैलीगत वैशिष्ट्य 

राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा प्रकाशित 'मधुमती'पत्रिका के सितंबर,2017 के अंक में ...

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                        एक चिन्तक सामान्य मनुष्य की अपेक्षा अधिक भावुक और संवेदनशील होता है। वह अपने अनुभव को अपने तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि दूसरों तक अपने भावों को पहुँचाकर प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इस तरह उसके विचार सर्वव्यापी हो जाते हैं। जितनी अनुभूति की भाव-प्रवणता होगी, अभिव्यक्ति पक्ष उतना ही प्रखर होगा। वस्तुतः अभिव्यक्ति पक्ष की सबलता सत्य की अभिव्यंजना पर आधारित होती है, जो अन्तर्जगत को प्रकट करती है। इसका माध्यम है-शैली। 

                    शैली मूलतः लातानी शब्द ‘स्तिलुस’ से बना है, जिसका अर्थ है- कलम। उसी से अर्थ का विस्तार हुआ है- कलम की प्रयोग विधि, लेखन की विधि, अभिव्यक्ति का तरीका आदि। इसके अंतर्गत लेखक के व्यक्तित्व की प्रधानता के साथ वर्णन की प्रविधियाँ, भाषिक सौन्दर्य, शिल्पगत सजीवता एवं अभिव्यक्तिपरक मौलिकता का सन्निवेश रहता है। दीनदयाल उपाध्याय रचित उपन्यास ‘‘जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य’’ इस दृष्टि से विशिष्ट कृति है। तरुणों के मन को भारतीय गौरव एवं आदर्श जीवन-चरित से परिचित करवाने का अभीष्ट इस उपन्यास का रहा है, किंतु लेखकीय कौशल से मुग्धकारी वर्णन ने उपन्यास को कलात्मक रूप प्रदान कर दिया है। 


                  ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ उपन्यास कुल अठारह अध्यायों में विभक्त है, जिसमें शंकराचार्य की बाल्यावस्था, ध्येय, पथ, शिक्षा, दीक्षा, दिग्विजय यात्रा, राष्ट्रीयता का प्रसार तथा ध्येय सिद्धि तक की विविध घटनाओं का मर्मस्पर्शी वर्णन है। घटनाओं के वर्णन में जिन शैलियों का प्रयोग हुआ है, उनमें प्रमुख हैं- सरस काव्यात्मक शैली, अलंकृत बौद्धिक शैली, सम्बोधन शैली, वार्तालाप शैली, उपदेशात्मक शैली, प्रतीकात्मक शैली इत्यादि। उपन्यास की वर्णन शैली में भाषिक सौन्दर्य, लाक्षणिक शब्दावली और बिम्बात्मक चित्रण का महत्वपूर्ण योग है। इस दृष्टि से शैलीगत वैशिष्ट्य का विवेचन प्रासंगिक है। 


                बाह्य रूपात्मक शैलियों में वर्णन और विश्लेषण को अधिक महत्व दिया जाता है। इसके अंतर्गत सरस काव्यात्मक विषय एवं प्रवाह के अनुरूप दोनों का प्रयोग हुआ है। आचार्य शंकर ने जब तक्षशिला से कश्मीर प्रस्थान किया, तब कश्मीर की प्रकृति का मानवीकृत रूप शंकर के मार्ग में जिस तरह उपस्थित होकर भाव-विभोर करता है, वह ‘सरस काव्यात्मक शैली’ का उदाहरण द्रष्टव्य है- ‘‘आचार्य शंकर शारदा का ध्यान किए हुए मंदिर की ओर बढते जाते थे। प्रकृति नटी ने साज-श्ाृंगार करके उनको विमोहित करना चाहाः प्रस्फुटित पुरुषों ने हँसकर उनका स्वागत किया और दो बातें करनी चाही, कलियों ने चटककर धीरे से कान में अपना पे*मभरा राग सुनाया और कर स्पर्श की लालसा प्रकट की, अप्सराएँ सरोवरों में अपना स्वरूप देखने के बहाने उतर आईं, गंधर्व पक्षियों के स्वरों में गाने लगे, किंतु कोई भी आचार्य शंकर को रोक नहीं पाया।’’।१ 


               नर्मदा के भीषण प्रकोप से त्रस्त मानवता की सेवा के लिए आचार्य शंकर का मनोभाव ‘दीन’ में सर्वात्मा की तलाश कर रहा था। यह वर्णन लेखक ने ‘काव्यात्मक शैली’ में किया- ‘‘आर्त की पुकार में जिसको भगवान की वाणी नहीं सुनाई देती; उसके कान भगवान के शांत स्वर को नहीं सुन सकते, वह सर्वात्मा का क्या दर्शन कर सकेगा? मैं ढूँढता तुझे था आकाश और वन में/तू खोजता मुझे था किसी दीन के वतन में’’।२ इस तरह वर्णन में काव्यात्मक गरिमा का पुट दिखाई देता है। 


                उपन्यासकार प्रखर दार्शनिक चिंतक रहे हैं और उपन्यास भी शंकराचार्य के जीवन-चरित पर आधारित है। अतः दार्शनिक विचारों का वर्णन स्वाभाविक ही है। उपन्यास के अधिकांश स्थलों पर इन विचारों की प्रस्तुति के लिए लेखक ने ‘अलंकृत बौद्धिक शैली’ का प्रयोग किया है। इस तरह के वर्णन में दार्शनिक गूढता को भाषायी-प्रगाढता और अलंकृत शब्दावली से चमत्कार उत्पन्न कर दिया जाता है। ‘अद्वैत’ दृष्टि को व्यक्त करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं- ‘‘संसार के समान गंगा का जल सामने से भागता जा रहा था, प्रतिक्षण परिवर्तनशील किंतु अभिन्न, कितना अनित्य किंतु शांत! अनेक जलकणों का समूह सामने आता है, क्षण भर खेलता है, जिनका पहले जलकणों से भिन्न अस्तित्व है, किंतु जीवन में समानता है..... यही है भेद में अभेद, भिन्नता में अभिन्नता अनेकत्व में एकत्व....।’’३ 


                    मंडन मिश्र और शंकराचार्य के मध्य शास्त्रार्थ का दृश्य वर्णन, मध्यस्थ में मंडन मिश्र की पत्नी भारती का आसन; अलंकृत शैली में उपन्यासकार लिखते हैं- ‘‘एक ओर तो भगवान शंकर की जटाओं से स्रवित गंगा की भाँति शंकराचार्य के मुख से शुद्ध ज्ञान-मार्ग की धवल गंगा-धारा का प्रवाह था तो दूसरी ओर तमाम तरु-पुंज तमाच्छन्न तरणि-तनुजा के समान प्राची के सूर्य, यज्ञयागादि के पुरस्कर्ता, प्रकांड पंडित तथा प्रचंड कर्मकांडी मंडन मिश्र की धूमिल वाणी की नील यमुना-धारा प्रवाहित होती थी। इन दोनों के बीच में सरस्वती का अवतार भारती तो उपस्थित थी ही।’’४ आनुप्रासिक तत्सम शब्दावली एवं तीर्थराज प्रयाग का बिम्ब उपस्थित करने का सार्थक प्रयास यहाँ हुआ है। 

                  अन्तःरूपात्मक शैली में रचनाकार अपने आन्तरिक ह्रदय की भाषा में चिन्तन को अभिव्यक्त करता है। इस हेतु वह सम्बोधन, वार्तालाप, तर्क, आत्मकथ्य, उपदेश, व्यंग्य शैलियों का प्रयोग करता है। इस उपन्यास में इन शैलीयों का यत्र-तत्र प्रयोग हुआ है। 

               सम्बोधन शैली में नायक अथवा पात्र श्रोता को सम्बोधित करके अपने विचार प्रकट करता है, यह परस्पर तादात्म्य की दृष्टि से उपयुक्त शैली है। दिग्विजय यात्रा के समय शंकराचार्य ने एकत्र समुदाय को संबोधित किया- ‘‘बंधुवर्ग! आज हममें से प्रत्येक अपने तत्व सिद्धांतों का सर्वत्र प्रसार करने को उत्सुक है। पिछले १००० वर्षो में अपने धर्म की स्थिति विचित्र हो गई है। उसकी जडों को अनेक प्रकार से खोखली करने का प्रत्यन किया गया है और उसने अपनी संपूर्ण शक्ति लगाकर अपने ऊपर के आघातों का रोका है।’’५ इसी प्रकार जब उदंक ने कुमारिल भट्ट के बारे में पूछा तो शंकराचार्य ने इसी शैली में कहा-‘‘अरे कुमारिल को नहीं जानते, उदंक?.....हम लोगों के मार्ग से जिस महापुरुष ने समस्त बाधाओं का दूर किया, हम उसको न जानें, यह हमारा दुर्भाग्य ही है उंदक!’’६ 

                 कथा को गति प्रदान करने के लिए लेखक वार्तालाप शैली का प्रयोग करता है। इसमें रचनाकार दो पात्रों के मध्य हुए संवाद को प्रस्तुत करता है। शंकर और माता आर्यंबा के बीच वार्तालाप का दृश्य अवलोकनीय है-‘‘ये विद्वत्ता की बातें मैं क्या जानूँ शंकर! पर बता मेरा संस्कार कौन करेगा? सब पितरों को पानी कौन देगा?’’......‘‘मैं करुँगा संस्कार माँ, मैं करुँगा और मैं दूँगा अपने पितरों को पानी।’’ ‘‘और तेरे बाद?’’ ‘‘मेरे बाद सब हिन्दू समाज है, वह तेरा नाम लगा, तेरा गुण गाएगा, यही है असली श्राद्ध।’’७ 

                बौद्ध भिक्षुओं और शंकराचार्य के मध्य संवाद का यह दृश्य भी गतिशील है- ‘‘क्या कहा, हम बौद्ध नहीं, हिन्दू हैं।’’ एकाएक कुछ भिक्षु बोल उठे। ‘‘हाँ, आप हिन्दू हैं और बौद्ध भी, आप हिन्दू हैं और वैष्णव भी, आप हिन्दू हैं और बौद्ध भी, आप सब कुछ हैं।’’ शंकर स्वामी ने कहा।८ 

                तर्क शैली में भी संवाद का आश्रय होता है, परन्तु इसमें वक्ता अपने मंतव्य को ठोस तर्कों के आधार पर प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत उपन्यास में मंडन मिश्र की पत्नी भारती अपने स्त्रीत्व का अभिमान प्रकट करती हुई तर्क पूर्ण प्रश्न करती है- ‘‘स्त्री हूँ तो क्या हुआ आचार्य? स्त्री के क्या विचार नहीं होते? उसके मन में शंका-कुशंकाओं की आँधी नहीं उठ सकती?’’९ एक अन्य दृश्य में चांडाल का शंकराचार्य से प्रतिप्रश्न दृष्टव्य है- ‘‘सर्वात्मैक्य तथा अंद्वैत की बातें करना तथा व्यवहार में भेदभाव दिखलाना यह कौनसी रीति है, आचार्य? यह आडम्बर कैसा? क्या मैं समझूँ कि आपका संन्यास, दंड और कमंडलु सब ढोंग है। और फिर आप किसको दूर हटने को कह रहे है’’ शरीर को? वह तो नश्वर है। मेरे और आफ शरीर में क्या अंतर है?’’१० 

                 आत्मकथात्मक शैली में किसी घटनाक्रम से प्रेरित होकर स्वंय के आत्मचिंतन को व्यक्त किया जाता है। मगध में मंडन मिश्र के घर का पता जब दासी के संस्कृत-श्लोक से प्राप्त होता है तो आचार्य शंकर चिंतन करते हैं-‘‘जिसके द्वार के पंजरस्थ तोता और मैना इस प्रकार संस्कृत में चर्चा करते हों, वहाँ अवश्य ही दिन भर तत्त्व चर्चा ही रहती होगी, जिसके कारण पक्षी भी उन शब्दों तथा वाक्य समूहों का वैसा ही उच्चारण करने लग गए- कितना उद्भट विद्वान हैं, मंडन मिश्र!’’११ आत्मकथ्य के समान ही अन्तर्द्वन्द्व शैली में विचार प्रकट होते हैं, परन्तु यहाँ मन में उठने वाले परस्पर विरोधी भावों के उद्वेलन को प्रस्तुत किया जाता है, ऐसी स्थिति में पात्र स्वयं उलझन में रहता है। जब शंकराचार्य गुरु से आज्ञा लेकर यात्रा की तैयारी कर रहे थे, तब उनके भावों का उद्वेलन इस प्रकार वर्णित हुआ-‘‘अनिष्ट की आशंका से ह्रदय धडकने लगा।...अगि* शर्मा के आने का और कोई कारण नहीं हो सकता। कालटी के अनेक चित्र एक-एक करके उनकी आँखों के सामने से निकल गए।’’१२ 

               प्रतिपक्ष पर व्यंग्य से प्रहार कर अपने पक्ष को प्रबल करने हेतु व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया जाता है। इसके माध्यम से विसंगतियों पर प्रहार होता है। भारती और शंकराचार्य के मध्य संवाद के समय स्त्री के साथ शास्त्रार्थ विषय पर भारती ने शंकराचार्य से व्यंग्यात्मक स्वर में कहा- ‘‘आप प्रचलित पद्धति की दुहाई दें, यह तो बडे आश्चर्य की बात है, आचार्य!.... और आचार्य, स्त्रियों के साथ क्या शास्त्रार्थ नहीं हुए हैं? गार्गी और याज्ञवल्क्य का संवाद आपको ज्ञात नहीं है? गार्गी क्या पुरुष थी?’’१३ 

             इस प्रकार उपन्यासकार ने विविध वर्णन शैलियों के माध्यम से उपन्यास को रोचक, कमनीय और प्रवाहपूर्ण बना दिया है। प्रसंगानुसार शैली प्रयोग से दृश्य वर्णन बिम्बमय हो गया है, जिससे पाठक एकाग्रचित्त होकर द्रवीभूत हो जाता है। इसे प्रभावी रूप देने के लिए उन्होंने परिवेश अनुकूल दृश्य विधान, पात्र-योजना एवं भासिक पक्ष का तदनुसार निर्वाह किया, जिससे उपन्यास का कलेवर बहुआयामी हो गया। शैलीगत वैशिष्ट्य की दृष्टि से उक्त उपन्यास मनोहरता, कलाप्रियता और महान् गरिमा का विधान करता प्रतीत 
होता है।

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सदी का पहला दशक : हिंदी कविता

सदी का पहला दशक : हिंदी कविता
 
साहित्य की सबसे महीन विधा ‘कविता’ है । कविता का जन्म मनुष्य के जन्म के साथ माना जाता है, इसी कारण कविता को मनुष्यता की मातृभाषा कहा गया है । कविता की आलोचना मनुष्यता के घेरे में ही संभव है, किंतु उसकी मौलिकता समय के साथ निरूपित होती है । हिंदी कविता की विगत शताब्दी में गतिशील यात्रा की चर्चा करते हुए डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं, “राष्ट्रीयता से वैचारिकता, भक्ति से अध्यात्म, ब्रज से खड़ी बोली और सहजता से स्वचेतनता के ये बहुस्तरीय रूपान्तरण मिलकर कविता के समूचे स्वरूप का ही कायाकल्प करते हैं ।”1 


बीसवीं सदी का अंतिम दशक और इक्कीसवीं सदी का प्रथम दशक सामयिक यथार्थ की दृष्टि से नितान्त भिन्न है । वर्तमान समय भूमंडलीकरण का है, जिसके साथ साम्राज्यवादी शक्तियों का मानवीय जीवन के हर क्षेत्र में प्रवेश हो गया है । ऐसी स्थिति में इस समय की कविता का यथार्थ स्पष्ट होना आवश्यक है । स्वप्निल श्रीवास्तव के अनुसार, “खासकर यदि हम यथार्थ की बात करें तो आज का यथार्थ मारक और अविश्वसनीय है । वह फैंटेसी के आगे का यथार्थ है । आज के यथार्थ का चेहरा रक्त रंजित और अमानवीय है । यथार्थ हमारे सामने विस्मयकारी दृश्य प्रस्तुत करता है, जो कल्पनातीत है ।”2 


विस्मयकारी यथार्थ को प्रभावित करने वाले जो कारक पहले दशक में उपस्थित होते हैं, वे हैं- वैश्वीकरण, मुक्त बाजारवाद, विकृत उपभोक्तावाद, राजनीतिक अधिनायकवाद, मूल्यों का विघटन, संस्कृतियों का संघर्ष, पूंजीवाद का प्रभुत्व एवं भ्रष्ट आचरण आदि ।3 ये कारक तो वैश्विक हैं, किंतु भारत का आम आदमी इनकी फाँस में आ गया है । दूसरी ओर भारतीय सांस्कृतिक आदर्शों का पतन, जातीय व धार्मिक उन्माद, साहित्य जगत में वैचारिक अतिवाद के साथ वामपंथी-दक्षिणपंथी खेमे में बँटकर कवि कर्म के उद्देश्यों से भटकाव का साक्षी भी यह दशक है । सुखद पहलू यह है कि इस बीच स्त्री व दलित को कविता के केन्द्र में रखा गया है, जो वैचारिक स्तर पर संघर्ष करते हुए अपना मुकाम तय करते हैं ।   


यह संक्रमणकालीन वेला है, जहाँ पुराने सामाजिक मूल्य विघटित हो रहे हैं और नये मूल्यों को स्वीकृति नहीं मिल पा रही है । कवि समाजशास्त्री बनकर अपने रास्ते बना रहा है, जो व्यवस्था को चुनौती देता है, राजनीतिक पथ को भी वैचारिक आधार प्रदान करता है और अनुकूल व्यवस्था को निर्मित होने तक चुप नहीं बैठता । प्रस्तुत आलेख में इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में ‘तद्भव’ में प्रकाशित कविताओं के आधार पर हिन्दी कविता के यथार्थ को परखने का विनम्र प्रयास है । 


यह सच है कि सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के बिखराव से विश्व में एकमात्र विकल्प पूँजीवादी व्यवस्था रह गया है । समाजवाद का स्वप्न ध्वस्त हो गया है, परिणामस्वरूप मनुष्यता के समक्ष शैतानी पूँजीवादी यांत्रिक सभ्यता का चेहरा उपस्थित होता है । महानगरीय भीड़ में सैंकड़ों तेज रफ्तार वाले वाहनों के मध्य चलती बैलगाड़ी कवि की दृष्टि में सभ्यता का आखिरी मनुष्य है-

‘लगता है एक वही तो है/हमारी गतियों का स्वास्तिक चिह्न/
लगता है एक वही है, जिस पर बैठा हुआ है/
हमारी सभ्यता का आखिरी मनुष्य ।4’ 

पूँजीवादी यांत्रिक सभ्यता ने पूरी दुनिया को ‘शॉपिंग कॉम्प्लेक्स’ में बदल दिया है । इस बाजार में मनुष्यों की बजाय वस्तुओं में बहुत अधिक निवेश किया गया है ।5 बाजारों की इस चमक में सब कुछ चमकता हुआ दिखाई देता है । माल मंडिया, झूमते मस्तूल, लहराती हांडियाँ सब कुछ हैं, बस जीवन, हवा और पानी नहीं है-

“पृथ्वी पर लौटा है अभी-अभी/ अंतरिक्षयान
खोजकर एक ऐसी दुनिया/जिसमें न जीवन है-
न हवा-न पानी ।”6

भूमंडलीकरण एवं उदारीकरण के साथ एक अन्य विकृति ने इस दशक में जन्म लिया, वह है- धर्मोन्माद । जहाँ सभ्यताओं को भी धर्म का पर्याय बनाकर प्रस्तुत कर दिया गया है । फलतः घृणा, हिंसा और प्रतिशोध की आग में बस्तियाँ जल रही हैं और उसकी आँच एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच रही हैं । इस उन्माद के पश्चात् जो बचता है-

कि कहीं मिलता है आधा जला हुआ दुपट्टा 
कहीं आधा जला हुआ खिलौना/कहीं अधजली बीड़ी
कहीं दमकलों के पाइप/कहीं दिलजले/कहीं कहीं तो
केवल जलन मालूम होते हैं ।7

ऐसे दौर में उस सौहार्द्र की याद ताजा हो जाती है, जहाँ संगीत व कविता पर देश का सम्राट मुग्ध होता था और उनके सदके में अपना सिर झुका लेता था-

“यह जानते हुए कि बादशाहों के महलों से दूर भी/
एक सल्तनत हुआ करती है / एक साम्राज्य का खजाना
बिखरा रहता है / जहाँ कोई अकबर सादे लिबास में 
जाता है / और एक दीवानी मीरा की आवाज के
सदके में/ चुपचाप अपना सिर नवाता है ।”8 

“वैश्विक स्तर पर आर्थिक उदारीकरण आधारित नई विश्व व्यवस्था, उच्च तकनीक, जनसंचार का प्रसार, विश्वग्राम के जन्नत की हकीकत को पूरी दुनिया नव-उपनिवेशवाद के रूप में पहचानने लगी है ।”9 यह सब अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक व अमेरिकी प्रभुत्व की त्रयी का परिणाम है । जिसने आम आदमी से पानी, सड़क, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं को भी छीन लिया है-

दरअसल अनाज है इस देश में और पृथ्वी पर, बहुतायत
औषधियाँ पर्याप्त हैं, योग्य और कुशल/ हाथ और दिमाग भी/
सभी जानकारियाँ, अवसर और स्थितियाँ उपलब्ध हैं /
कम्प्यूटर और आँकड़ों में ।
$ $ $
यदि नागरिक के पास नहीं हैं, पानी, सड़क और बिजली । 
तो ये सिर्फ समस्याएँ  हैं ।10

चमकती दुनिया में मध्यम वर्ग अनिर्णय का शिकार है । लाभ का सौदा दिखते ही वह दौड़ लगाना शुरूकर देता है । गंतव्य उसे ज्ञात नहीं हैं । आडम्बर की संस्कृति को वह खुशनुमा मानता है । मौन-प्रतिक्रिया में अपनी शांति खोजता है । विसंगतियों के विरूद्ध वह चुप रह जाता है-

एक गंदी अंधेरी गली में परिवार पालता/
वह अपनी नहीं दूसरों के संघर्ष की/अंतहीन
कथा कहता है और एक दिन मर जाता है /
हम कुछ नहीं कहते ।11

इस दशक में ‘स्त्री-पीड़ा’ की व्यापक चर्चा हुई है । स्त्री-चेतना की मुखर अभिव्यक्ति से इस दशक की कविता ने समाज को जाग्रत किया है । भारतीय समाज की विद्रूपताओं में ‘नारी’ के साथ समान व्यवहार दृष्टि नहीं रही है । बड़ी होती बेटी के लिए समाज में बंधन आज भी देखे जा सकते हैं । जहाँ उसके स्वप्नों का, हँसी का, दुःख का व पीड़ा का मोल नहीं होता-

12

                स्त्री चाहे बड़े घर में हो या छोटे घर में, उसकी पीड़ाएँ समान हैं । पीड़ा की दृष्टि से उनकी एक ही जाति है- स्त्री । जिसकी नियति है-पीड़ा । यथा-

बड़े घर की बहू को कार से उतरते देखा/
और फिर देखी अपनी/ पाँव की बिवाइयाँ/
फटी जुराब से ढँकी हुई/एक बात तो मिलती थी
फिर भी उन दोनों में।/दोनों की आँख के 
पोर गीले थे ।13

बाजारवादी शक्तियों के पूर्ण प्रभाव में आकर आज का मीडिया भी सत्ता का सहयोग कर ‘कारपोरेट जगत’ को अनुकूल वातावरण दे रहा है । भूखे और नंगों की हकीकत बयां कर उसे बेचने का कर्म भी वह कर लेता है । अपने भारी-भरकम शब्दों के माध्यम से खबरों को उठाता है और फिर बेच देता है, इन्हीं व्यावसायिक घरानों के हाथ । यह व्यापार जारी है-
हम ज्ञानहीनों के बारे में ज्ञानियों के/हम गुमनामों के बारे में
नामचीनों के/शब्द छप रहे हैं/भारी भरकम शब्द
हम दुबले अबलों के बारे में/चिकने चुपड़े शब्द/
हम रूखे सूखों के बारे में/खाये/अधाये शब्द/
हम भूखे नंगों के बारे में/खबरों में छप रही है।14

             पहले दशक की उल्लेखनीय कृतियों में ज्ञानेन्द्र पति की ‘गंगातट‘, ‘संशयात्मा’, विष्णु खरे की ‘काल और अवधि के दरमियान’, अशोक वाजपेयी की ‘इबारत से गिरी मात्राएँ’, संजय पंकज रचित ‘यवनिका उठने तक’, अनूप सेठी कृत ‘जगत में मेला’, श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘जहाँ सब शहर नहीं होता’, वीरेन डंगवाल की ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’, कुमार अंबुज कृत ‘अतिक्रमण’, हेमंत कुकरेती रचित ‘नया बस्ता’, यतीन्द्र मिश्र लिखित ‘डयोढ़ी पर आलाप’, कुमार वीरेन्द्र की ‘विलाप नहीं’, राजेश जोशी रचित ‘चाँद की वर्तनी’, मदन कश्यप कृत ‘कुरूज’ आदि महत्त्वपूर्ण हैं, जिनमें विवेचित यथार्थ का चित्रण मिलता है ।

            दशक के उत्तरार्द्ध में आते-आते कवि व्यवस्थागत विद्रूपताओं के प्रति मात्र आक्रोश व्यक्त कर चुप नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए मुखर हो जाता है । सोशल मीडिया के माध्यम से वह ‘एक्टीविस्ट’ की भूमिका में दिखाई देता है जो जीवन की विषमताओं को मानवता के केन्द्र में खींचकर चर्चा करता है और लेखनी में इतना पैनापन आ गया है कि राजनीतिक व्यवस्थाएँ भी कविता के संकेतों से प्रभावित होने लग गई है । अतः आने वाला दशक संभवतः समस्याओं के अरण्यरोदन में विश्वास नहीं करेगा, बल्कि समाधान प्रस्तुत करने वाला होगा, ऐसा प्रतीत होता है ।  


संदर्भ-
1. डॉ रामस्वरूप चौधरी- आधुनिक कविता यात्रा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद,1998, भूमिका
2. आलोचना, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, अप्रेल-जून,2003, पृ.32
3. डॉ. जी.एल.शर्मा, डॉ. वाई.के.शर्मा, समाजशास्त्र के सिद्धान्त, यूनिवर्सिटी बुक हाउस प्रा.लि. जयपुर 2007,   पृ.426
4. भगवत रावत, बैलगाड़ी, तद्भव, अंक 9, पृ.155
5. द्रष्टव्य, कुमार अंबुज, वागर्थ, जनवरी,2005
6. कुंवरनारायण, कोलम्बस का जहाज, तद्भव, अंक 17, पृ.117
7. अष्टभुजा शुक्ल, बस्ती एक धीमा शहर है, तद्भव, अंक 10, पृ.113
8. यतीन्द्र मिश्र, तानसेन के बहाने, तद्भव, अंक-9, पृ.195
9. राजाराम भादू, मधुमती, फर.2003, पृ.65
10.नवल शुक्ल, संरचनाओं के बदलने का समय, तद्भव, अंक 13, पृ.160
11.ऋतुराज, हम कुछ नहीं कहते, तद्भव अंक 21, पृ.150
12.मदन कश्यप, बड़ी होती बेटी, तद्भव, अंक 16, पृ.108
13.वर्तिका नंदा, बहूरानी, तद्भव, अंक 20, पृ.132
14. हरे प्रकाश उपाध्याय, खबरें छप रही हैं, तद्भव अंक 12, पृ.122 
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भारतीय भाषाओं का साहित्यिक अन्तःसंबंध(जनकृति पत्रिका के अक्टूबर-दिसंबर,2017 अंक में प्रकाशित)

भारतीय भाषाओं का साहित्यिक अन्तःसंबंध
(जनकृति पत्रिका के अक्टूबर-दिसंबर,2017 अंक में प्रकाशित)

                           भारत वर्ष भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विविधता युक्त रहा है, उसी अनुरूप भाषायी विविधता भी विद्यमान रही। एक ओर भारोपीय परिवार से जन्म लेने वाली भाषाएँ यथा- संस्कृत, हिंदी, मराठी, बांग्ला, उड़िया, असमिया, गुजराती आदि में साहित्य रचना हुई तो दूसरी ओर द्रविड़ परिवार की भाषाओं - तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़ आदि में विपुल साहित्य रचा गया। अपने प्रादेशिक वैशिष्ट्य एवं सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखते हुए समग्र साहित्य ने अनंत विस्तार ग्रहण किया, परन्तु उसके व्यक्तित्व में एक-दूसरे का प्रभाव अवश्य रहा। यही आत्म-तत्त्व भाषायी विविधता के बाद भी भावात्मक एकता का आधार बना, जो अद्वितीय है।

                         यह गौरव का विषय है कि भारतीय भाषाओं में रचा गया साहित्य अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए हुए है, यह उसका प्रखर वैशिष्ट्य भी है और प्रादेशिक संस्कृति के प्रभाव से निर्मित उसका व्यक्तित्व भी। परन्तु एक-दूसरे की सीमाएँ कब लयबद्ध हो जाती है, पता ही नहीं चलता, जैसे - बांग्ला, असमिया व उड़िया, तमिल व तेलगू, मराठी व गुजराती, कन्नड़ तथा मलयालम, पंजाबी और सिंधी, विशेष रूप से हिन्दी में इन सभी भाषाओं से गृहीत शब्दावली। यही तत्त्व भारतीय साहित्य की अन्तः धारा को रसमय बनाए हुए हैं।

                                भारतीय साहित्य की पारस्परिक अन्तः संबद्धता तथा आधारभूत एकता को प्रतिबिम्बित करने वाले अनेक तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं, उनमें प्रमुख हैं - भाषाओं का जन्मकाल, विकास के चरण, सांस्कृतिक आन्दोलनों का प्रभाव, प्राचीन गं्रथों का आधार ग्रहण आदि में समानता। यह विवेचना का एक पक्ष हो सकता है, यथा - उर्दू और तमिल भाषा को छोड़कर समस्त भारतीय भाषाओं का जन्मकाल प्रायः समान रहा है, जैसे - कन्नड़ का प्रथम उपलब्ध ग्रंथ ‘कविराजमार्ग‘ राष्ट्रकूट वंश के नरेष ‘नृपतुंग‘ द्वारा नवीं शती में रचा गया, गुजराती का आदिग्रंथ शालिभद्र सूरि रचित ‘भरतेश्वर बाहुबलि रास‘ बारहवीं शती की रचना है। मलयालम की प्रथम कृति ‘रामचरितम‘ तेरहवीं शती में रचित हुई, तो मराठी का आदिम साहित्य भी बारहवीं शती का है। तेलगू साहित्य के प्रथम ज्ञात कवि ‘नन्नय‘ का समय भी ग्यारहवीं शती है। असमिया साहित्य में हेम सरस्वती की रचनाएँ ‘प्रह्लाद चरित्र‘ तथा ‘हरि गौरी संवाद‘ तेरहवीं शती में रचित हैं। बांग्ला में चर्यागीतों की रचना का समय दसवीं और बारहवीं शती के मध्य का माना जाता है। उड़िया के व्यास सारलादास का समय भी चौदहवीं शती का है। इसी प्रकार हिन्दी का आदिकालीन साहित्य भी ग्यारहवीं शती के आसपास का है। अतः समस्त भारतीय भाषाओं का जन्मकाल एक निश्चित अवधि में हुआ, जो इसका अन्तः वैशिष्ट्य है। 

                            भारत की विभिन्न भाषाओं का विकास क्रम भी लगभग समान रहा है। सभी भाषाओं का आदिकाल पन्द्रहवीं शती तक का है, पूर्व मध्यकाल सत्रहवीं शती के मध्य तक, जो मुगल-शासन  के वैभव तक सीमित है। उत्तर मध्यकाल अंग्रेजी शासन की स्थापना अर्थात् उन्नीसवीं शती के आरंभ तक है। उसके बाद का समय सभी भाषाओं के साहित्य में आधुनिक काल के रूप में माना गया है। यह समानांतर विकास क्रम यह इंगित करता है कि इन भाषाओं के विकास के राजनीतिक एवं सास्कृतिक आधार समान रहे हैं। भारतीय भाषाओं को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला समान कारक रहा - धार्मिक आन्दोलन। बौद्धधर्म के पतन पश्चात् जो संप्रदाय पल्लवित हुए, उनमें नाथपंथ उल्लेखनीय है। इसका प्रभाव तिब्बत से लेकर महाराष्ट्र और दक्षिण से पूर्वी घाट के प्रदेशों तक फैला हुआ था। नाथ-पंथ के सिन्द्धान्त - हठयोग, जीवन का साधना पक्ष, आत्माभिव्यक्ति व जीवन-शैली का प्रभाव भारतीय भाषाओं के विकास के प्रथम चरण में व्याप्त रहा। इनके बाद वेदांत दर्शन से प्रभावित इनके उत्तराधिकारी संत-संप्रदाय व नवागत सूफी-संतों का प्रभाव सभी भाषाओं के साहित्य पर रहा। संत और सूफी काव्य के उपरांत देश में वैष्णव आन्दोलन का तीव्र वेग से प्रचार हुआ।

                          हिन्दी-काव्य में रामकाव्य और कृष्णकाव्य धारा में साहित्य रचा गया तो तमिल प्रांत में ‘आलवार साहित्य‘ उल्लेखनीय है। वैष्णव आन्दोलन भी द्वैत, द्वैताद्वैत, विषिष्टाद्वैत, शुद्धाद्धैत आदि शाखाओं में विभक्त होकर बंगाल में चैतन्य संप्रदाय तक पहुँच गया। समस्त भारतीय भाषाओं में राम और कृष्ण की मधुर उपासना के गीत गाए गए और पूरा भारत वर्ष सगुण ईश्वर लीला गान से गुंजरित हो उठा। उसके बाद ईरानी संस्कृति से अनेक आकर्षक तत्त्व - वैभव-विलास, अलंकरण, सज्जा, राग-रंग, भोग आदि विकसित हुए, जिसे दरबारी संस्कृति कहा जा सकता है। साहित्य भी इससे प्रभावित हुआ और शृंगारिक विलास युक्त रचनाएँ विकसित हुईं। हिन्दी साहित्य का रीतिकाल इसी से प्रभावित है। इसके पश्चात् अंग्रेजों का आगमन, स्वतंत्रता आन्दोलन आदि में सभी भाषाओं के रचनागत विषय में आधारभूत समानता विद्यमान रही। 

                         यह अचरज का विषय है कि भारत की भाषाओं का परिवार एक नहीं होते हुए भी उनके साहित्य की आधारभूमि समान रही है। भारतीय भाषाओं के साहित्य पर प्राचीन ग्रंथ- रामायण, महाभारत, उपनिषद् पुराण, भागवत् का आधार रहा है, परवर्ती संस्कृत ग्रंथों ने भी साहित्य की धारा को प्रभावित किया। उसमें कालिदास, बाण, भवभूति, जयदेव आदि का साहित्य केन्द्र में रहा। प्राकृत,अपभ्रंश साहित्य पूर्व में ही सभी भारतीय भाषाओं के उत्तराधिकार में था। काव्यशास्त्र से संबंधित ग्रंथों ने सभी का पोषण किया, जैसे - भरत का ‘नाट्य शास्त्र‘, आनंदवर्द्धन का ‘ध्वन्यालोक‘, मम्मट का ‘काव्य-प्रकाष‘, विश्वनाथ का ‘साहित्य दर्पण‘ आदि ग्रंथ सभी भाषाओं के मूल में रहे। वस्तुतः भारतीय भाषाओं का संपूर्ण वाङ्गमय की परिधि असीमित है। यदि उसमें संस्कृत, प्राकृत आदि की सामग्री भी समाविष्ट कर ली जावे, तो यह भण्डार अनंत होगा। सुखद पहलू यह है कि समान सांस्कृतिक और साहित्यिक आधारभूमि पर पल्लवित साहित्य भारत की एकता को सुदृढ़ करने में समर्थ रहा। 

                आज विडम्बना यह है कि हम भाषा के पृथक् स्वरूप की विवेचना तो करते हैं, परन्तु घनिष्ठ संबंधों की चर्चा तक नहीं करते। जार्ज ग्रियर्सन के ‘भाषा-सर्वेक्षण‘ में यह कथन उल्लेखनीय है, ‘‘सामान्यतः जब तक विशेष रुप से जाति एवं संस्कृति में अंतर न हो या बड़ा पहाड़ या प्राकृतिक बाधा उपस्थित न करे, तब तक भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं।‘‘भारतीय साहित्य का प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद, जो वैदिक संस्कृत भाषा में रचा गया। उसके बाद संस्कृत पालि, प्राकृत, अपभ्रंशऔर उनसे विकसित अनेक आधुनिक भारतीय भाषाओं में साहित्य-रचना हुई। आज तीस से अधिक आुधनिक भाषाएँ व सौ से अधिक उपभाषाओं में रचित साहित्य भारतीय वाड्.मय की अमूल्य निधि है। इनका उत्स, आधार एवं विकास समान भूमि पर हुआ है, जो पारस्परिक सम्बद्धता व घनिष्ठता लिए हुए है। यह पारस्परिक घनिष्ठता हमारी पहचान है, सांस्कृतिक तत्त्वों की मधुरिमा से किसी भाषा की पृथक् पहचान उसकी विशिष्टता है, जो गौरव का विषय है। इन्हें पृथक रूप से विवेचित करने की अपेक्षा समग्र दृष्टि से देखने की आवयकता है। 

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