''संविधान की प्रस्तावना को शब्दश सच करने का लंबा रास्ता और उद्देश्य एक बड़ी जिम्मेदारी की तरह हमारे सामने है। ''-डॉ रेणु व्यास

फ्रेंड्स ऑफ़ फोर्ट चित्तौड़ के आयोजन की रिपोर्ट


दुर्भाग्य यह है कि हमारी पीढ़ी  के पास देश के लिए कोई सपना नहीं है-डॉ रेणु व्यास

डॉ रेणु व्यास
हमें ये नहीं भूलना नहीं चाहिए कि आज हम जिस गणतांत्रिक भारत में रहते है वो हमारे ही पुरखों के लम्बे संघर्ष का सुखद परिणाम है। इस वैश्विक समय में अपने ही संविधान की प्रस्तावना को शब्दश सच करने का लंबा रास्ता और उद्देश्य एक बड़ी जिम्मेदारी की तरह हमारे सामने है। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ से शुरू जनजागरण से लेकर देश की आज़ादी तक का अपना पहला संघर्ष पूरा हुआ मगर बीते चौसंठ सालों में भी हम अपनी बहुत सी व्याधियों से लड़ते रहे हैं। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी की दीवारे कमोबेश रूप में आज भी हमारे सामने अखंड खड़ी हैं। अफसोस इस नितांत व्यक्ति केन्द्रित समय में हमारी युवा पीढ़ी के पास स्वतन्त्रता सेनानियों की तरह कोई राष्ट्रीय सपना नहीं है। फिर भी हमें इस तंत्र में आमजन के हस्तक्षेप को ज्यादा मजबूत बनाने की तरफ सोचना होगा।

डॉ सत्यनारायण व्यास 
हमें गर्व होना चाहिए कि  हमने अपने ढ़ंग  से अपने राष्ट्र की परिभाषा दी है। जहां भारत में राष्ट्र का अर्थ कोई भौगोलिक सीमा से नहीं होकर समस्त मानव समाज  से है और समाज भी ऐसा जहां जाति ,नस्ल, धर्म जैसी संकीर्णता से हम परे हैं। हमारी ये परिभाषा उन यूरोपीय देशों से कई ज्यादा अच्छी है जो बहुत संकड़ी मानसिकता के कारण बाद में आगे नहीं बढ़ सके। गणतंत्र का अर्थ हमारे लिए दासता और उपनिवेशवाद से मुक्ति था  जिसके सही मायने हमें मालुम होने चाहिए। हमारे देश में संविधान की संप्रभुता हमारी जनता से है। चूँकि हम सभी में से अधिकाँश का जन्म आज़ाद भारत में हुआ है इसलिए हम संघर्ष का सही अंदाजा नहीं लगा पाए हैं। हम देश की आज़ादी के साथ मिली उपलब्धियों का असल मोल हम समझ ही नहीं पाए हैं।


ये विचार नगर की युवा विचारक डॉ रेणु व्यास ने फ्रेंड्स ऑफ़ फोर्ट चित्तौड़ जैसे अनौपचारिक समूह द्वारा चित्तौड़ दुर्ग पर स्थित विजय स्तम्भ परिसर में आयोजित एक संगोष्ठी में व्यक्त किये। 26 जनवरी के उत्सवी माहौल में सवेरे सवा ग्यारह बजे शुरुआत यहाँ में हिंदी कवि और समालोचक डॉ सत्यनारायण व्यास सहित पचास से भी अधिक नागरिकों द्वारा झंड़ारोहण किया गया। डॉ व्यास ने ऐसे कार्यक्रम दुर्ग जैसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर केन्द्रित कर उन्हें आमजन के नेतृत्व में पूरे किये जाने की महती ज़रूरत व्यक्त की। संयोजक पवन पटवारी के अनुसार जानेमाने गीतकार अब्दुल ज़ब्बार ने राष्ट्र स्तुति में गीत पढ़े। 

डॉ राजेन्द्र सिंघवी 

इस मौके पर कोलेज के हिन्दी प्राध्यापक डॉ राजेन्द्र कुमार सिंघवी ने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव लोकतांत्रिक रही है। विदेशी दासता के क्षणों में भी हमने अपने मूल सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक स्वरुप को सदैव बनाए रखा है उसी का परिणाम है कि  हम तब भी उच्च कोटि के वैचारिक साहित्य की रचना कर सके। समय के साथ इस लोकतंत्र को ज्यादा परिपक्व बनाए जाने की आवश्यकता है अन्यथा इसके भीड़तंत्र में तब्दील हो जाने की पूरी आशंका है। संगोष्ठी को भूमि विकास बैंक अध्यक्ष अनिल सिसोदिया और भास्कर ब्यूरो प्रमुख राकेश पटवारी ने संबोधित करते हुए कहा कि ये आयोजन ज्यादा सशक्त संस्थागत स्वरुप में आगे बढ़े और इसे दुर्ग से जुड़े दूसरे ज़रूरी पहलुओं पर भी  केन्द्रित कार्यक्रम करने चाहिए। 


गीतकार अब्दुल ज़ब्बार 
कुछ फ्रांसीसी पर्यटकों सहित फोटोग्राफर वेलफेयर सोसायटी के के के शर्मा,  गोपाल शर्मा, जायंट्स ग्रुप के  जगदीश चन्द्र चौखड़ा, चित्तौड़गढ़ अरबन को-ओपरेटिव बैंक के आई एम् सेठिया,  मनसुख पटवारी, वंदना वजिरानी, अमन फाउंडेशन के रामेश्वर लाल पंडया, अपनी माटी के डॉ राजेश चौधरी, कौटिल्य भट्ट, चन्द्रकान्ता व्यास, नंदिनी सोनी, दिनेश सांचोरा, दुर्ग विकास संस्थान के गौतम भड़कत्या  सहित  चित्तौड़ चेतक, जेसीस क्लब की सहभागिता से आयोजन हुआ। समापन कृष्णा सिन्हा के कविता पाठ और जगदीश चन्द्र चौखड़ा द्वारा आभार के साथ हुआ। संगोष्ठी के सूत्रधार संस्कृतिकर्मी माणिक थे। 

पवन पटवारी
आयोजन समन्वयक 
फ्रेंड्स ऑफ़ फोर्ट चित्तौड़ अनौपचारिक समूह

बाकी छायाचित्र 



संचालन करते माणिक 

शुरू में समूह फोटो 

आखिर में समूह का फोटो 



धर्माचरण की युगानुकूल व्याख्या: आज की आवश्यकता

                          यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' में प्रकाशित हुयी है।


पुस्तक समीक्षा

‘सेज पर संस्कृत’ उपन्यास जैन धर्म व जैन समाज की जीवन-शैली पर केन्द्रित यथार्थवादी उपन्यास है, जिसमें लेखिका मधु काँकरिया ने इस प्रश्न को उठाया है कि महावीर के निर्वाण के 943 वर्षों बाद सिर्फ स्मृति आधार पर लिपिबद्ध साधु आचार संहिताओं को समय की गतिशीलता के साथ परीक्षण की जरूरत क्यों नहीं है? लेखिका का कथन है- “महावीर ने जो अमृत-वचन दिए थे, वे टनों भूसों के बीच कहाँ बिला गए । क्योंकि अन्तर्जगत की समस्याएँ शाश्वत हो सकती हैं । भीतर की दुष्ट प्रवृत्तियों को शमित करने के सवाल शाश्वत हो सकते हैं, भीतर के शून्य से उपजी जिज्ञासाएँ शाश्वत हो सकती हैं; पर बाहरी आवरण, जैविक समस्याएँ एवं मानवीय नियति एवं अस्तित्व की समस्याओं के वे समाधान जिनके तार गतिशील समाज और व्यवस्था के तान-बानों से जुड़े हैं..... युगों-युगों तक कैसे अपरिवर्तित रह सकते हैं ?

उपन्यास के कथानक के केन्द्र में हैं- ‘छुटकी’ की दीक्षा, दीक्षा पूर्व आध्यात्मिक सम्मोहन, दीक्षा के बाद सांसारिक आकर्षण, साधु जीवन का परित्याग और उसके पश्चात् नारकीय जीवन । संपूर्ण कथानक को ‘द अहिंसा टाइम्स’, सेज पर संस्कृत, वजूद, अन्वेषण तथा एक असमाप्त दुस्वप्न आदि अध्यायों में विभक्त किया गया है ।

इस शाश्वत सत्य को स्वीकार करना चाहिए कि भारत की आर्हत् मार्गी धर्म-परम्परा में जैन धर्म की विशिष्टता इसकी वैज्ञानिक दृष्टि के कारण रही है । ‘अनेकांत दर्शन’ आज भी वैचारिकता के धरातल पर पूर्ण लोकतांत्रिक एवं आधुनिक है; फिर भी ‘पूर्णिमा’ जैसी श्राविका प्रत्येक जैन परिवार में मौजूद है, जो धर्म के मर्म को न समझकर अंध-श्रद्धा व आडम्बरों को प्रश्रय देकर न केवल स्वयं का, बल्कि अपनी संतान का जीवन भी दाँव पर लगा देती है । साध्वाचार भी धर्म के मूल सिद्धांतों की मौलिकता को समयानुकूल संदर्भों से दूर ले जा रहा है, फलतः समाज को भी प्रगतिगामी दिशा नहीं मिल पा रही है । लेखिका ने समयानुकूल मानवीय संवेदना से भरे हुए पक्षों को जिस साफगोई से उठाया है, वह विचारणीय है । 

प्रस्तुत उपन्यास को ‘स्त्री-विमर्श’ की परिधि में बाँधना एकांगी होगा, क्योंकि ‘छुटकी’ व ‘संघमित्रा’ की पीड़ा मात्र स्त्रीमन की पीड़ा नहीं है, बल्कि अंध-विश्वासों तथा धार्मिक जड़ताओं के व्यामोह में फँसे प्रत्येक मानव-मन की पीड़ा है । इस उपन्यास का उद्देश्य निश्चित रूप से बेहतर समाज के निर्माण का है, जहाँ ‘जीवन’ केन्द्र में है व मानवीय भावनाओं की रक्षा है । साथ ही धर्म के प्रति वितृष्णा नहीं, बल्कि युगानुकूल व्याख्या की चाह है । 

उपन्यास के कतिपय अंश जैसे- शिखरजी में डोलीवाले की पीड़ा के साथ सहानुभूति, ‘पंचम’ को अपना मकान दे देना, ‘छुटकी’ की बाल-दीक्षा का लगातार विरोध करना और अंत में “ऋषि-कन्या” के माध्यम से नवीन चेतना का लक्ष्य निर्धारित करना आदि लेखिका की प्रगतिवादी दृष्टि को अभिव्यक्त करते हैं । ‘संघमित्रा’ व ‘मालविका’ जैसी बुद्धिमती नारियाँ यदि अपने दायित्व के प्रति सजग हैं तो सामाजिक उत्थान तीव्र गति से होना तय है ।

देश-काल-वातावरण की दृष्टि से यह उपन्यास यथार्थ व कल्पना के मिश्रित रूप में है। साधु जीवन शैली व जैन परिवारों के वातावरण का चित्रमय वर्णन यथार्थपरक है, वहीं उत्तरार्द्ध में वर्णित घटनाएँ यथा- मुनि का व्यभिचार एवं उसकी हत्या अतिरंजना पूर्ण प्रतीत होती है, लेकिन संभवतः लेखिका के उक्त वर्णन के पीछे मंतव्य रहा होगा कि समय से पूर्व यदि आत्मावलोकन नहीं किया गया तो ऐसी घटनाएँ भी हो सकती हैं । उपन्यास के पात्र स्वाभाविक हैं, जो ‘अजीमगंज’ ही नहीं, किसी भी भारतीय समाज में हो सकते हैं । उनकी संवेदनाएँ व प्रतिक्रियाएँ लगभग साधारण भारतीय जन-मानस की हैं, जिनका चित्रण लेखिका ने बहुत ही गहराई से किया है । 

संवाद पात्रों के स्तर को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं, साथ में लेखिका का दृष्टिकोण भी व्यक्त होता है, इससे गतिशीलता व वैचारिकता का साथ-साथ संचलन हो रहा है । भाषायी दृष्टि से लेखिका ने जहाँ पात्रों के अनुकूल शब्दावली का प्रयोग किया है, वहीं कहीं-कहीं चलते हुए शब्दों, जिसमें आहत मन की अभिव्यक्ति होती है, को भी स्वाभाविक रूप से प्रकट कर दिया है । 

समग्रतः क्रांति कुमार जैन के उक्त कथन का समर्थन किया जाना चाहिए- 

 “मधु काँकरिया के पास धर्म और समाज को समझने की बेहद संवेदनशील दृष्टि है । वे धर्म और समाज की संधियों में छिपे झींगुरों एवं तिलचट्टों को प्रकाश में लाती है।” 

मेरी दृष्टि में यह उपन्यास जैन धर्म व समाज को एक नई दिशा दे सकता है, यदि तटस्थ दृष्टि से वर्तमान जीवन-शैली व धर्म की मूल संकल्पनाओं को आधार बनाकर स्वयं धर्माचार्य आगे आकर जैन धर्म को ‘जन धर्म’ बनाने का प्रयास करे व युगीन संदर्भों के आधार पर इसे मानव-कल्याण का वाहक बनाएँ । 


डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

महाराणा प्रताप राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय

चित्तौड़गढ़ में हिन्दी प्राध्यापक हैं।
आचार्य तुलसी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर शोध भी किया है।
स्पिक मैके ,चित्तौड़गढ़ के उपाध्यक्ष हैं।
अपनी माटी डॉट कॉम में नियमित रूप से छपते हैं। 
शैक्षिक अनुसंधानों और समीक्षा आदि में विशेष रूचि रही है।
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मो.नं. +91-9828608270

डॉ. नन्द भारद्वाज:-आदिम बस्तियों के बीच आदमी की तलाश


विजया बुक्स, 1/ 10753,
सुभाष पार्क, गली नं 3,
नवीन शाहदरा,
दिल्ली 110032
कविवर नन्द भारद्वाज का सध्य प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘आदिम बस्तियों के बीच’ वस्तुतः आदमी को तलाश करता प्रतीत होता है । रेतीले धोरों के बीच कवि ने अपना बचपन सँवारा और उदारीकरण की आर्थिक जीवन शैली में आज वह नगरीय जीवन का हिस्सा बन गया । यह कहानी हर मध्यमवर्गीय परिवार की हो सकती है । इस काव्य संग्रह में कवि का अतीत बार-बार उसे आदिम ग्रामीण जीवन शैली से जोड़ता है, जबकि कवि यह जानता है कि इस आदिम ग्रामीण जीवन शैली से मेरा जुड़ा होना न खूबी है न कैफियत । इसके बावजूद कवि को यह अहसास है कि साहित्य और संस्कृति को लेकर ऊपरी तौर पर वहाँ कोई स्वरूप या संकेत नहीं दिखाई देते, लेकिन उन संस्कारों की जड़ें उनमें गहरे पैठी है । 

कवि भारद्वाज अपने इन्हीं संस्कारों के कारण कभी अपने बचपन के घर की यादों में खो जाते हैं, कभी माता-पिता व सहोदर से संवाद कायम करने की कोशिश करते हैं तो कभी अपने बच्चों व पत्नी के प्रति दायित्व बोध को समझकर किंकर्तव्यमूढ़ भी बन जाते हैं । अपनों की तलाश में कवि की कुल अड़तीस रचनाएँ इस काव्य-संग्रह में है, जिसे आधुनिक मानव की मर्मभरी अन्तःपीड़ा माना जा सकता है जो आर्थिक बाजारीकरण से संघर्ष करती अपनी जड़ों की तलाश में है । 

डॉ. नन्द भारद्वाज
कवि का अभिमत है- रचना के भीतर मूर्त होता जीवन-यथार्थ, उसमें अन्तर्निहित मानवीय सरोकार और उसके लक्षित पाठक वर्ग से बनता रिश्ता ही यह तय कर पाता है कि कविता उसकी जीवन-प्रक्रिया में कितनी प्रासंगिक और प्रभावी रह गई है । कविता संग्रह की प्रथम कविता ‘अपना घर’ और अन्तिम कविता ‘आदिम बस्तियों के बीच’ है । जिसमें जीवन यात्रा के पड़ाव दृष्टिगोचर होते हैं । कवि अपने बचपन के उन क्षणों को याद कर विस्मृत होता है, जब वे बारिश से भीगी रेत को घरोंदे का आकार देते थे । उसमें मन चाहा आकार देते थे, जहाँ आयताकार ओरे, तिकोनी ढलवांसाल, अनाज की कोठी, बुखारी, गायों की गोर सब कुछ होती थी, पर चहार-दीवारी नहीं । पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

न जाने क्यों
वैसा अपना घर बनाते
अक्सर भूल जाया करते थे
घर को घेर कर रखने वाली 
वह चहार-दीवारी ।
( अपना घर )

आर्थिक उदारीकरण के दौर में शहरीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई है और इस प्रक्रिया में सर्वाधिक नुकसान ‘संवेदना’ का हुआ है । जहाँ व्यक्ति अपने घर को बचाने के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है । उसके सामने बच्चों को अभावों से दूर रखने की कवायद है । इसी जुगत में दिनभर हाड़तोड़ मेहनत के बाद अपने घर-संसार में प्रवेश करते आज के मध्यमवर्गीय व्यक्ति का चित्र दृष्टव्य है-

यह खयाल रखते कि संध्या-काल
अंधेरा घिर आने से पहले
लौट जो आना है घर की ओर,
झाड़ते - बुहारते - सींचते
तमाम तरह के अभावों-
और अनहोनियों के बीच 
थामे जो रहते थे अपनी जान से
कि कोई आँच न आये
बच्चों की नींद और उनके
सपनों में पलते घर - संसार में ।
(घर तुम्हारी छाँव में)

गाँवों से पलायन और शहरों में बस जाने पर भी जीवन में सहजता न होना आधुनिक मानव मन त्रासदी है । एक अजीब भय उसके मन में सदैव व्याप्त रहता है, शायद शहरी जीवन की यही चर्या भी है । इस मन को दुखाने वाली जीवन चर्या को अंगीकार करना उसकी नियति बन गई है और मजबूरी भी, यथा-

सिर्फ मैं ही नहीं जान पाता
इस जीवन-चर्या का सार,
बच्चे खुश हैं
अपनी बदलती दुनिया में,
और वह बनी रहती है
उन्हीं की इच्छाओं के पास,
वहीं से वह देख लिया करती है
हर असार में सार की संभावना ।
(जीवन-चर्या)

आर्थिक झंझावतों ने हमारी आकांक्षाओं की कमर तोड़ दी है । भावनाओं को केन्द्रित करना सीखा है और रिश्तों को भी ताक पर रख दिया है । हम सवालों से डरने लग गए हैं और अपेक्षा करते हैं कि जैसा चल रहा है उसे घर का हर सदस्य स्वीकार कर ले । यहाँ तक कि हमारी सहधर्मिणी के साथ भी अभावों की चर्चा करना मुनासिब नहीं समझते । यथा- 

पत्नी अक्सर कुछ कहते कहते
रूक जाती है
और हमसे यह तक नहीं कहते बनता
कि वह अपनी बात कहे-
अपेक्षा करते हैं
जिस हाल में हैं, उसी में मौन रहे ।
( बहस से हटकर )

समय के साथ मानवता का भी पतन हुआ है और इंसानियत की हदें पार करते हुए मनुष्य हिचकता भी नहीं है । कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि चारों ओर आदमखोर घूम रहे हैं और हमारी साँसें सुरक्षित नहीं हैं । जीवन के पटल पर असुरक्षा भाव मनुष्यता को रिस-रिस कर मार रहा है । संशय की इसी परिधि में कैद मानवीय जीवन का परिदृश्य कवि ने बखूबी अंकित किया है-

धरती की छाती पर
लोटते रहे जहरीले सांप-
खूंखार भेड़िये और आदमखोर
अपने शिकार की तलाश में
भटकते रहे,
गाँव की सुनसान गलियों में
बे आवाज -
हर सांस अकेली और असुरक्षित है
हर घात अंधा और संशयहीन ।
(गर्म राख के नीचे)

शहरी जीवन में सन्नाटों की त्रासदी है, गलियाँ गमगीन हैं, बेखौफ़ अबोलापन है जो दूसरी ओर आत्मरक्षा में उठती आवाजें चीखती रहती हैं । अमन का आशियाना कभी बसता नज़र नहीं आता । कवि इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि-

और इस दिखाऊ दहशत के बिपरीत
शहर के भीतर तह में इकट्ठा हो रहा है
फिर वही बेखौफ अबोलापन-
वह डर जाया करती है
अमूमन पीछा करती
एम आदिम परछाई से,
और बदहवास होकर
रौंदने लगती है अमन का आशियाँ । 
(उसका अहसास)

अपने बीवी-बच्चों के साथ अनजान शहर में रहने वाला व्यक्ति अपनी अतीत की यादों को मन में सहेजता, पीड़ा भोगता मौन होकर क्यों स्वीकारता है? यह प्रश्न अनुत्तरित है । अपने बूढ़े पिता के संताप को जानकर भी उसका पुत्र उससे दूर क्यों भाग जाता है, कोई नहीं बता सकता । गाँवों में बूढ़े पिता का संताप आधुनिक जीवन शैली पर व्यंग्य के रूप में अभिव्यक्त हुआ है-

धड़कते हुए कलेजे में
संजोए रखना
एक अदद कुँआरी बेटी का अवसाद
और गुजारे की खोज में
परदेस गये दुलारों का
बेचैन बैठे इन्तजार करना ।
(बूढ़े पिता का संताप)

बदलते दौर में अपना भाई भी बेगाना लगता है । उससे संवाद की गुंजाईश खत्म हो गई है । वह हर पल अपने से दूर जाता दिखाई देता है और कभी-कभी लगता है कि अब शायद ही कभी अपने साथ आ पाए । अपना लाड़ला सहोदर और उसके बारे में अपनी पीड़ा का संवाद कवि के शब्दों में -

मैं चिन्तित और हैरान हूँ-
कितनी आसानी और
बिना किसी संकोच के
नेकी और ईमान से इतनी दूर
दुनियादारी के दलदल में
उतर जाते हैं मेरे सहोदर
जहाँ से आगे नहीं दीख पड़ती 
कोई संवाद की संभावना ।
(सहोदर से संवाद)

समय के साथ समझौता करना माँ ने भी सीख लिया है, वह भी शिकायत नहीं करती । वत्सलता का सागर उमड़ाने वाली माँ आज आपसे कोई उम्मीद नहीं रखती । उसका आँचल यद्यपि आज भी ममता की छाँव है, पर उसे पता है कि वहाँ उसका लाल अब कभी आश्रय नहीं लेगा । आधुनिक जीवन का यह पहलू कवि के शब्दों में-

कहने को कुछ भी नहीं था पास उसके
न कोई शिकवा - शिकायत
न उम्मीद ही बकाया,
फकत् देखती भर रहती थी अपलक
हमारे बेचैन चेहरों पर आते उतरते रंग
हम कहाँ तक उलझाते
उसे अपनी दुश्वारियों के संग ।
(माँ की याद)

कवि इस आपाधापी के जीवन में मानवीय संवेदना के टूटते हुए दृश्य को रेखांकित करता है, जहाँ पीड़ाएँ अभिव्यक्त नहीं हो पाती । अन्तःकरण द्रवित होकर इस कगार पर आ पहुँचा है कि उसे मात्र एक ढाँचे के रूप में जीना है-

एक अवयव टूटकर बिखर गया है कहीं भीतर
लहू लुहान- सा हो गया है मेरा अन्तःकरण
पीड़ा व्यक्त होने की सीमा तक,
आकर ठहर गई है ।
(जो टूट गया है भीतर)

इंसान अपने दर्द की सकल पीड़ा को भोगते हुए भी जीवन की कोख में बना रहना चाहता है । वह जीवन से पलायन नहीं करता । एक अज़ब सी जिजीविषा उसे किंकर्तव्यविमूढ़ स्थितियों में आदिम बस्तियों के बीच बनाये रखने की कोशिश करती है, यथा-

यह समीक्षा आलेख हाल में 
जैसी लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका के 
जनवरी-मार्च-2013 के अंक में छपा है।
इससे पहले कि अंधेरा आकर
ढांप ले फलक तक फैले
दीठ का विस्तार,
मुझे पानी और मिट्टी के बीच
बीज की तरह
बने रहना है इसी जीवन की कोख में ।
(आदिम बस्तियों के बीच)

समग्रतः कवि नंद भारद्वाज ने अपने अनुभव के आवेग में ‘आदिम बस्तियों के बीच’ रहते मानव की मनःस्थिति, बदलते परिवेश में उसका रूख और मौन यथार्थ की स्वीकारोक्ति को बहुत ही सहज ढंग से अभिव्यक्त किया है । कवि की पंक्तियाँ प्रत्येक संवेदनशील प्राणी की आन्तरिक कहानी है, जिसे वह भोग रहा है । सन् अस्सी के दशक के बाद ‘रिश्तों को खोने’ की पीड़ा को कवि ने बहुत ही मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है । आशा है यह कृति विचारशील चिंतकों को रास्ता तलाशने में मदद करेगी ।

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