“जैनेन्द्र की सांस्कृतिक दृष्टि”

जैनेन्द्र की सांस्कृतिक दृष्टि
साहित्य परिक्रमा अंक जुलाई-सितंबर,2020 में प्रकाशित

‘संस्कृति’ एक व्यापक शब्द है, जिसकी धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, आर्थिक एवं साहित्यिक व्याख्या की जा सकती है । समग्र दृष्टिकोण से यह स्पष्ट है कि संस्कृति एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति, जाति, समाज, राष्ट्र और विश्व-जीवन के अंतरबाह्य उत्थान का क्रम क्रियमाण रहता है । इसका सीधा संबंध मानवीय चेतना से है, जो युग-जीवन के प्रभावों को आत्मसात् करती हुई अभ्युत्थान मूलक होती है । डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने जीवन के नानाविध रूपों के समुदाय को संस्कृति की संज्ञा दी है । मलिनोवास्की ने संस्कृति को परिभाषित करते हुए लिखा है कि इसमें पैतृक निपुणताएँ, श्रेष्ठताएँ, कलागत प्रियता, विचार, आदतें और विशेषताएँ सम्मिलित रहती हैं । अतः संस्कृति का संबंध दर्शन और धर्म से लेकर सामाजिक संस्थाओं तथा रीति-रिवाजों तक मानव-जीवन की समस्त विचारपूर्ण प्रणालियों से माना जा सकता है । 

‘भारतीय संस्कृति’ मूल रूप से सामासिक संस्कृति है । जिसके रूप-संयोजन में शताब्दियों से विश्व की अनेक संस्कृतियों का योगदान रहा है । इसने समन्वयवादी प्रवृति के कारण विश्व की समस्त संस्कृतियों को आत्मसात् कर लिया है तथापि उसका निजी रूप अक्षुण्ण और विशिष्ट रहा, इसमें कोई संदेह नहीं । जबकि आज संसार की अनेक प्राचीन संस्कृतियाँ अतीत के गर्भ में लुप्तप्रायः हो गई हैं या उनका रूप परिवर्तित हो गया है, परंतु आज भी भारतीय संस्कृति का अक्षुण्ण स्वरूप भारतीय जीवन-पद्धति, आचार-विचार, कला-काव्य एवं जाति संस्कारों में सुरक्षित है ।

महान् कथाकार जैनेन्द्रजी का कथा-साहित्य भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का संवाहक रहा है । उन्होंने अपनी संस्कृति और परंपरा के परिप्रेक्ष्य में ही भारतीय मानस का पहचान की है । उन्होंने अपने उपन्यासों ओर कहानियों में अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं मसलन- ईश्वर, आस्तिकता-नास्तिकता, बुद्धि बनाम भावना, अंतःप्रेरणा बनाम तर्क, हिंसा-अहिंसा, प्रेम और वासना, पति और पत्नी, सतीत्व, शरीर की पवित्रता, पाप-पुण्य, समर्पण आदि । ये प्रश्न निश्चय ही हमारी भारतीय संस्कृति के वर्तमान स्वरूप से संबद्ध हैं और इसलिए सामयिक भी हैं । ये प्रश्न हमारी संस्कृति, आचरण तथा जीवन-पद्धति के मूल में समाविष्ट हैं, जिनका हल होना अभी शेष है । जैनेन्द्रजी ने कथा-साहित्य में इन प्रश्नों को उठाकर जाग्रत मानस को सोचने पर विवश कर दिया है । वस्तुतः संस्कृति और समाज से संबद्ध मूलभूत प्रश्नों को उठाना और एक बौद्धिक वातावरण में हलचल पैदा करना महान् साहित्यकार का दायित्व भी होता है, जिसे जैनेन्द्रजी ने सफलतापूर्वक निभाया है ।

जैनेन्द्रजी रचित उपन्यासों और कहानियों के आधार पर उनके सांस्कृतिक चिंतन का विवेचन निम्नलिखित बिंदुओं में व्यक्त किया जा रहा है-

1. सामाजिक विषमताएँ संस्कृति को प्रभावित करती हैं, अतः युगीन सुदर्भ में उनका चित्रण और संवेदना का उद्घाटन आवश्यक हो जाता है । जैनेन्द्रजी ने समाज की विषमताओं और विसंगतियों का गहराई से अध्ययन किया, उसे अपने तर्क और मौलिकता के वातावरण में प्रस्तुत कर बौद्धिक-जगत् को समस्या पर चिंतन के लिए मजबूर कर दिया । उदाहरणार्थ- जैनेन्द्रजी के नारी-पात्र सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से पीड़ित दृष्टिगोचर होते हैं । ‘परख’ की कट्टो, ‘तपोभूमि’ की धरणी, ‘कल्याणी’ की श्रीमती असरानी, ‘त्यागपत्र’ की मृणाल आदि । ‘कट्टो’ युवती विधवा है और इसी कारण उसका प्रेमी उससे विवाह नहीं करता । ‘धरणी’ विवाह पूर्व गर्भवती हो जाती है । ‘श्रीमती असरानी’ पति द्वारा पीड़ित है, तो, ‘मृणाल’ अनमेल विवाह की नारकीय यातना भोगती है । 

इन नारी पात्रों ने समाज और संस्कृति की बलिवेदी पर अपना आत्मबलिदान किया है । जैनेन्द्रजी ने न तो इनका आदर्शवादी समाधान दिया और न ही मार्क्सवादियों की तरह क्रांति का आह्वान किया, बल्कि बुद्धिजीवी वर्ग पर ही यह प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिया । उनके ये नारी पात्र आत्म-बलिदान करते हुए पाठकीय संवेदना को जाग्रत करने में सफल हो गए हैं । यहाँ जैनेन्द्रजी ने सटीक चित्रण कर सांस्कृतिक परिष्करण को हमारे समक्ष एक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत कर दिया । इन स्त्रियों की पीड़ा सामाजिक विषमता जनित होते हुए भी उन्होंने समाज की महत्ता को स्वीकार किया । मृणाल कहती है- “ मैं समाज को तोड़ना फोड़ना नहीं चाहती । समाज टूटा कि फिर हम किसके भीतर बनेंगे या किसके भीतर बिगड़ेंगे?” अपनी ओर से नितांत निरपराध होते हुए भी वेदना और कवकलता में इन नारियों का घुलना पाठकीय संवेदना को जाग्रत करने और सहानुभूति प्राप्त करने में सफल रहा है । इससे समाज और संस्कृति की विसंगतियों को जैनेन्द्रजी ने उजागर करके भी इनके महत्त्व को नकारा नहीं । 

2. जैनेन्द्रजी के कथा साहित्य में फलक परिमित है । उनका संसार सीमित क्षेत्र में प्रस्तुत हुआ । अतः पात्र भी सीमित जगत् में ही विचरते हैं । फिर भी उनके पात्र व्यक्तिमुखी प्रतीत होते हैं, जिनके हृदय का संघर्ष उनकी अत्यधिक संवेदनशीलता का परिणाम है । त्याग, कष्ट-सहिष्णुता आदि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को उन्होंने इन पात्रों में यत्र-तत्र भर दिया है। विभिन्न स्थितियों का निर्माण करके उनके चरित्रों का प्रकाशन हुआ है । उन्होंने अपने मौलिक उद्भावना प्रकट करते हुए यह अवश्य स्पष्ट किया कि नारी प्रत्येक स्थिति में प्रेम करने के लिए स्वतंत्र है । ‘सुनीता’ ‘सुखदा’ और ‘विवर्त’ की नारी दांपत्त्य मर्यादाओं को तोड़कर प्रेम तो करती है, लेकिन यह पति की उदारता के कारण ही संभव हो सका है । अतः पुरूष प्रधान समाज में पुरूषों की भूमिका पर प्रश्न चिह्न उठाते हुए जैनेन्द्रजी ने नारी को मुक्ति देकर भारतीय संस्कृतिनिष्ठ मौलिक चिंतन प्रस्तुत किया है ।

3. भारतीय संस्कृति में अहिंसा, प्रेम और त्याग, मानवतावादी दृष्टि को अत्यंत महत्त्व दिया गया है । ‘पत्नी’ कहानी में उन्होंने आतंकवादी जीवन की व्यर्थता और उदासीनता प्रदर्शित करते हुए हिंसा का विरोध किया । ‘जयसंधि’ में घृणा और महत्त्वाकांक्षा पर प्रेम व त्याग की विजय दिखाकर अपनी मानवतावादी दृष्टि का परिचय तो दिया ही, साथ ही भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को आगे भी बढ़ाया । अध्यात्म भारतीय संस्कृति का सनातन तत्त्व है । अध्यात्मक से परे भारतीय संस्कृति शून्य-स्वरूप है । जैनेन्द्रजी की कहानियों में भारतीय दार्शनिक चिंतन की विभिन्न दृष्टियों का समावेश हुआ है । ‘तत्सत्’ उनकी दार्शनिक कहानी है, जिसमें संसार के माध्यम से ईश्वर के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है । ‘सर्ववाद’ के अनुसार जो कुछ दिखाई देता है, वह सब मिलकर ईश्वर है । इन दोनों ही कहानियों में अद्वैतवाद की प्रतिष्ठा हुई है । ‘नीलम देश की राजकन्या’ में राजकन्या को आत्मा की शाश्वत पुकार समझना न्यायसंगत होगा । इस तरह का तात्त्विक चिंतन उनके भारतीय संस्कृति से ‘प्रेम’ को प्रकट करने वाला है ।

4. भारतीय संस्कृति में नारी को पूजनीय माना गया है । कहा गया है ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।’ लेकिन समय के साथ यह स्थिति विपरीत हो गई है । नारी प्रताड़ना का शिकार हुई है । जैनेन्द्रजी ने युगीन संदर्भ को यथार्थ की पीठिका पर उतारते हुए समसामयिक चारित्रिक पतन को उजागर भी किया है, तो समाज के दोषों को भी उजागर किया है । ‘सुनीता’ और ‘मृणाल’ इसी प्रकार के औपन्यासिक पात्र हैं, जो हमारी मानसिक चेतना को हिलाकर रखनेवाले पात्र हैं । ‘सुनीता’ को लेकर साहित्य जगत् में सर्वाधिक चर्चा हुई । सबसे अधिक विवाद हरिप्रसन्न के सामने सुनीता के निर्वसन होने को लेकर हुआ । कुछ विद्वानों ने इसे भारतीय शालीनता के विरूद्ध बताया, तो कुछ ने इसे सनसनी या उत्तेजना पैदा करने वाली घटना बताते हुए नैतिकता का प्रश्न उठाया । परंतु विचारणीय यह है कि वासना लोलुप हरिप्रसन्न था न कि सुनीता । उसकी कुत्सित लालसा को विफल करने और वासना का दमन करने का उसके पास एक यही उपाय बचा था । ऐसी स्थिति में हमें यह मानना चाहिए कि जैनेन्द्रजी ने अपने कथ्य में भारतीय संस्कृति के मूल तत्त्व ‘वासना से विरक्ति’ का विधान किया है । 

5. जैनेन्द्रजी के संपूर्ण कथा-साहित्य में एक तथ्य स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि उनके पात्र भारतीय समाज से प्रेम करने वाले तथा उसके मूल्यों के प्रति समर्पित हैं । उनके लगभग सभी उपन्यासों में ‘घर’ केन्द्र में है । ‘त्यागपत्र’ की मृणाल घर छोड़कर भी भतीजे जज के माध्यम से घर से जुड़ी हुई है । देखा जाए तो उसका सारा संघर्ष ही ‘घर’ को बचाने को लेकर है । अन्य पात्रों का अवलोकन करें तो स्पष्टतः देखा जा सकता है कि घर को छोड़नेवाली ‘सुखदा’ रोगी है, घर को न बचा पाने वाली ‘कल्याणी’ मर जाती है तो दूसरी ओर घर की रक्षा करने वाली ‘सुनीता’ ओर ‘भुवनमोहिनी’ सुखी हैं । ‘जयवर्द्धन’ घर के लिए प्रधानमंत्री का पद छोड़ देते हैं । इससे स्पष्ट होता है कि जैनेन्द्र ने ‘घर’ को भारतीय संस्कृति व समाज का अभिन्न घटक माना । यही कारण है कि उनके कथा-साहित्य में आए हुए पात्र अपनी वैयक्तिक विशिष्टता रखते हुए भी समाज से कटे हुए नहीं है । 

6. साहित्य को समाज का दर्पण माना गया है । हमारे देश की जातीयता अगर कहीं प्रकट होती है, तो वे दो कथाकार हैं- प्रेमचंद और जैनेन्द्र । प्रेमचंद ने आदर्शोन्मुख यथार्थवादी दृष्टि रखी, किंतु जैनेन्द्रजी ने मनोजगत् का सहारा लेकर सूक्ष्मता से भारतीय परंपरा का निर्वहन किया । जैनेन्द्रजी के पात्र जिस अंर्तजगत् को उठाए घूमते हैं, उसके रेशे-रेशे में भारतीयता परिलक्षित होती है । ‘परख’ के बिहारी, ‘सुनीता’ के श्रीकांत, ‘सुखदा’ के स्वामीकांत, ‘विवर्त’ के नरेशचंद्र अथवा ‘जयवर्द्धन’ के जयवर्द्धन के अतिरिक्त कट्टो, सुनीता, भुवनमोहिनी, इला आदि को समझने के लिए भारतीय संस्कृति को ही आधार में रखना पड़ेगा, अन्यथा एकाकी दृष्टिकोण ही विवेचित होगा ।

7. जैनेन्द्र का समग्र कथा-साहित्य आख्यानपरक नहीं, बल्कि विमर्शपरक है । कुछ सीमा तक इन्हें विचारपरक भी कहा जा सकता है । इनमें विचारों के अनुरूप ही पात्र की कल्पना और स्थितियों की रचना की गई है, जो कि पूर्णतः भारतीय चिंतन पर आधारित है । सुनीता, परख, त्यागपत्र आदि उपन्यास उनकी विचार दृष्टि को ही रेखांकित करने वाले हैं । इनमें स्त्री-पुरूष संबंधों की जो यथार्थपरक मौलिक व्याख्या हुई है, वह विचारणीय है । यह जरूर कहा जा सकता है कि जैनेन्द्रजी की मान्यता स्त्री की स्वतंत्रता में अधिक थी, जो कि मानसिक अधिक और सामाजिक कम आँकीजा सकती है, तथापि हमें  यह भी ध्यान रखना होगा कि क्या मानसिक मुक्ति के बिना सामाजिक मुक्ति संभव है? जैनेन्द्रजी ने अपने उपन्यासों और कुछेक कहानियों में स्त्री-पुरूष संबंधों की व्याख्या की है । उन्होंने यह मौलिक प्रश्न भारतीय स्त्री के बारे में उठाया है, जो अपने परिवार, विवाह और दांपत्य के नाम पर अपनी पहचान और अस्मिता को मिटा देती है । विवाह के बाद उसका नाम व परिचय तक बदल जाता है । इस स्थिति को जैनेन्द्रजी ने ‘सुनीता’ उपन्यास में हरिप्रसन्न की जिज्ञासा के रूप में उठाया है- ‘विवाह और पत्नीत्व ऐसी क्या वस्तु है कि स्त्री अपने ऊपर छत्र लेकर उसके नीचे उसकी संपत्ति होकर रहे?’

8. यद्यपि जैनेन्द्रजी ने अपने कथा-साहित्य में अंतर्जगत् को महत्त्व प्रदान किया, किंतु उनका कोई भी पात्र सामाजिक अथवा सांस्कृतिक दृष्टि से विद्रोह करता हुआ या भिन्न नजर नहीं आता । जैनेन्द्रजी के मूल्यों में भी सबसे कटा हुआ अकेलापन मूल्य है । उदाहरणार्थ- यदि हरिप्रसन्न मुक्त रहना चाहता है तो वह उद्देश्य क्रांतिकारिता के प्रति समर्पित भी है ............. फिर भी श्रीकांत और सुनीता उसे समाज की मुख्य धारा की तरफ लाने का प्रयत्न करते हैं, उसके लिए सुनीता अपनी समस्त वर्जनाएँ भी तोड़ देती है । इससे यह तो स्पष्ट होता है कि जैनेन्द्रजी के उपन्यास यथार्थ हैं, वायवा नहीं 

9.साहित्य का उद्देश्य जैनेन्द्रजी की दृष्टि में प्रेम और अहिंसा द्वारा ऐक्य का अनुभव कराना था । उनके मतानुसार इस सनातन ऐक्य अर्थात् परमात्मा की लब्धि का साधन है-प्रेम । यह प्रेम अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग रूप में प्रकट होता है । तत्काल की सीमा का अतिक्रमण करके यह प्रेम जितना चिरस्थायी, अखिलव्यापी, सूक्ष्मजीवी तथा उत्सर्गजीवी होता है, उतना ही व्यक्ति परमात्मा के अधिक निकट पहुँचता है । किंतु यह भी सत्य है कि काल और देश के द्वंद्व में व्यक्ति उलझता ही रहता है । यह द्वंद्वावस्था ही जीवन की चेष्टा का और साहित्य का क्षेत्र है । संभवतः इसी सांस्कृतिक चिंतन की पृष्ठभूमिपर जैनेन्द्रजी का समग्र कथा-साहित्य दृष्टिगत होता है । जैनेन्द्रजी के पात्रों का संघर्ष मूलतःव्यक्ति और व्यक्ति का संघर्ष है, फिर समस्याएँ चाहे कोई भी क्यों ने हो? ‘अंतराल’, ‘विवर्त’, ‘सुखदा’ इसी प्रकार की रचनाएँ हैं ।

10. जैनेन्द्रजी महान् चिंतक थे और भारतीय मूल्यों के प्रति प्रगाढ़ आस्थावान् भी । इसी कारण उनके कथा-साहित्य में समस्याएँ मूलतः नैतिकता से और नैतिकता ईश्वर के अस्तित्व से जुड़ी हुई लगती है । किसी एक घटक को छूते ही समग्रता के सभी तार बजने शुरू हो जाते हैं । ‘अंतराल’ में पारिवारिक इकाई पर ध्यान देते हुए भी विश्व के घटक उलझे हुए हैं । दूसरी ओर ‘अनामस्वामी’ पूर्वाग्रहों को छोड़कर पढ़नेवालों के लिए वैचारिक चुनौती है । यह कृति हमारी सांस्कृतिक एवं पारिवारिक विचारधाराओं का पुनःपरीक्षण करने को उकसाती है । ‘अनामस्वामी’ व्यक्ति दर्शन नहीं अपितु संस्कृति दर्शन है, जो कि आधुनिकता के समस्त स्वस्थ उपादेय तत्त्वों से संयुक्त है । इसी प्रकार ‘मुक्तिबोध’ में जैनेन्द्रजी ने सामाजिक जीवन की कतिपय बौद्धिक जिज्ञासाओं को अभिव्यक्ति देकर प्रगल्भ मन के भावना-संसार को सहज रूप में प्रकट किया है । ‘व्यतीत’ में भी प्रेम को बहुत ऊँचे धरातल पर प्रस्थापित किया गया है । 

समग्रतः उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि जैनेन्द्र का संपूर्ण कथा-साहित्य यदि अंतर्जगत् पर केंद्रित भी है, जब भी सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षों को महत्ता प्रदान करने वाला है । डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने लिखा है- ‘यह सत्य है कि वे जीवन के कटु सत्य से दूर है, उन्होंने पतनोन्मुख मध्यवर्ग का चित्रण किया है, किंतु उन्होंने मन की जिस गहराई में प्रवेश किया है वह समाज की विषमता के कारण ही है ।’ इसी कारण उनके उपन्यास और कहानियाँ नए और अजीब ढंग से उपादेय जीवन का चित्रण हमारे समक्ष रख देते हैं । उन्होंने अपने कथा-साहित्य में भारतीय सांस्कृतिक चिंतन की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए युगानुरूप मौलिक उद्भावनाएँ कीं, जो समयानुकूल और प्रासंगिक भी हैं तथा नई दिशा की संवाहक भी ।

नारी की विसंगत स्थिति का रेखांकन, समाज का चारित्रिक पतन, मन की उद्दाम लालसाएँ, कुंठित मस्तिष्क आदि विषय उनके कथा-साहित्य में छाए रहे, किंतु इन सबसे मुक्त होने का उपाय भी उन्होंने ही दिया, जो कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा की समृद्धि का पर्याय है । संस्कृति और समाज से संबद्ध प्रश्न उठाकर उन्होंने जो भी समाधान दिए, वे हमारी संस्कृति की परिधि में ही हैं और उसकी विराट् सत्ता का उद्बोधन कराने वाले हैं ।

समष्टि रूप में जैनेन्द्र का कथा-साहित्य भारतीय संस्कृति के तत्त्वों को संरक्षण करनेवाला, युगानुरूप परिष्करण करने वाला और भावी साहित्यकारों के लिए मौलिक चिंतन के द्वार खोलने वाला रहा है । साहित्यकार के दायित्व का जैनेन्द्रजी ने निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए भारतीय सांस्कृतिक गौरव को गतिमान किया, अतः मेरी दृष्टि में वे प्रेमचंद के बाद युगांतरकारी कथाकार माने जाने चाहिए ।

रामकाव्य के नारी-पात्र

रामकाव्य के नारी-पात्र

मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम का चरित्र भारतीय संस्कृति के समष्टि रूप का पर्याय बन चुका है । सारी सृष्टि में रमे राम युग-युग से सात्विक रसिकजनों की रस-साधना व अध्यात्म-प्रिय जनता की आस्था का केन्द्र बने हैं । श्रीराम का चरित्र इतना लोकप्रिय रहा है कि भारत की विभिन्न प्रांतीय भाषाओं में ही नहीं, विश्व वाड्मय का भी अभिन्न अंग बना और राम-कथा को लेकर विशाल-साहित्य का निर्माण हुआ है । काल-प्रवाह के साथ कवियों की व्यक्तिगत रूचि और युगयुगीन सांस्कृतिक आदर्शों के अनुरूप राम-कथा नूतन साँचों में ढ़लती रही । वे महापुरूष, महात्मा, धीरोदात्त-नायक से अवतारी बन गए । हिंदुओं ने यदि उन्हें विष्णु के दशावतारों में प्रतिष्ठित किया, जो जैनों ने त्रिषष्टि में आठवें बलदेव व बौद्धों ने बोधिसतव के रूप में पूजा की । श्री राम शनैः शनैः साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों के नायक बन गए । निर्गुण व सगुण दोनों पंथों के प्रवर्तकों ने उनकी महिमा के गीत गाए । ‘कबीर’ ने श्रीराम को निर्गुण ब्रह्म के रूप में स्वीकार करते हुए उनके नाम को शक्तों के लिए सर्वस्व माना और कहा-

दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना । राम नाम का मरम है आना ।।1

तुलसीदास ने ‘रामचरित मानस’ में उनके नाम के साथ, उनके रूप, लीला और धाम की भी आरती उतारी । उन्हें कल्पतरू और मुक्ति का धाम बताया । यथा-

नामु राम को कलपतरू, कलि कल्यान निवासु ।२

इसी प्रकार साकेतकार ने कहा-

राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है ।
कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है ।।3

हरिऔध ने ‘वैदेही वनवास’ में उनकी प्रिया जानकी की करूण गाथा गायी, तो ‘साकेत संत’ के कवि ने उनके उदात्त चरित्र, तपस्वी व महाबलिदानी भाई भरत की गौरव गाथा प्रणीत की ।वर्तमान भारतीय जन-मानस में रामकथा उनकी जीवन-पद्धति का आश्रय है । उसकी प्रामाणिकता उनकी आस्था, चेतना व भक्ति में परिलक्षित होती है । वस्तुतः रामकथा भारतीय पृष्ठभूमि के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व लौकिक आदर्श का प्रतिबिम्ब बन चुकी है, इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं ।

रामकथा भारत की आदि कथा है, जिसे भारतीय संस्कृति का रूपक कह दिया जाये तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । रामकथा के सभी पात्र भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को महिमा प्रदान करते दिखाई देते हैं । विशेष रूप से नारी पात्र अपनी विशिष्टता लिए हुए हैं । उनमें भारतीय मूल्यों के प्रति असीम आस्था है, त्याग की प्रतिमूर्तियाँ हैं, आदर्श पतिव्रता हैं, विवेकवान् समर्पणशीला हैं, कर्तव्यपरायण व युग-धर्म की रक्षिका भी हैं । समय आने पर अपनी श्रेष्ठता श्री सिद्ध करती हैं । सम्पूर्ण कथानक को आदर्श मंडित करने नारी-पात्रों की विशेष भूमिका रही है । रामकथा में वर्णित पात्र हैं- सीता, कौशल्या, कैकेयी, उर्मिला, मन्दोदरी, माण्डवी, श्रुतिकीर्ति, सुमित्रा, मंथरा, शूर्पणखा, शबरी आदि ।ये नारी पात्र इतने भव्य-रूप में चित्रित हुए हैं कि पुरूष भी उन्हीं के पथ का अनुसरण करते हैं । सीता के आदर्श से प्रभावित लक्ष्मण कहते हैं-

“ मीरा का जीवन दर्शन ”


“ मीरा का जीवन दर्शन ”
('वीणा' फरवरी,2019 के अंक में प्रकाशित)

जीवन और दर्शन का अतीव घनिष्ठ संबंध है ।1 दर्शन जीवन का आधार है, तो जीवन दर्शन का प्रधान वर्ण्य विषय है । दोनों की सत्ता एक दूसरे पर आश्रित है । मनुष्य के जीवन के प्रत्येक स्तर पर दर्शन का प्रभाव होता है । अन्वेषणोपरान्त दर्शन प्रदत्त सत्य जब जीवन को प्राप्त होता है तो जीवन उसे व्यवहार में लाता है और प्रयोगोपरान्त प्रस्तुत होने वाले प्रश्नों को पुनः विचारार्थ दर्शन को सौंप देता है । जीवन को सदा उसके दर्शन रूपी हृत्पिण्ड से पल-पल विचारों की, जीवन के शाश्वत मूल्यों की शृंखला प्राप्त होती रहती है । इसी में जीवन की सत्ता है, अस्तित्व है, उपयोगिता है । सतत क्रियाशील इस प्राणदायिनी प्रणाली के अभाव में न तो दर्शन का अस्तित्व रहता है और न जीवन का । अतः जीवन को सचेष्ट, सक्रिय और सजीव बनाये रखने में दर्शन की परम भूमिका होती है ।2 

प्रेम की पीर और विरह वेदना की अमर गायिका मीरा का कृष्ण भक्ति शाखा के साधकों और कवियों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है । कृष्ण-प्रेम की कसक आज भी उसके विरह-गीतों के बोलों में कसक-कसक कर सहृदयों, संगीतकारों की हृदय की धड़कनें बढ़ा देती है । वास्तव में ‘प्रेम की पीर’ और कृष्ण विरह की अनवरत धड़कन का नाम ही मीरा है ।3 ‘नरसीजी का मायरा’, ‘गीत-गोविन्द की टीका’, ‘मीरानी गरबी’, ‘रास गोविन्द’, राग सोरठ के पद और ‘मीरा के पद’ आदि मीरा की प्रमुख रचनाएँ मानी जाती हैं । इन रचनाओं के आधार पर मीरा का जीवन और दर्शन का हमें परिचय मिलता है । 

मीराबाई दर्शन, विचार और उपासना के प्रत्येक क्षेत्र में भिन्न दिखाई देती है । यद्यपि मीरा की भक्ति किसी विशिष्ट सम्प्रदाय या दार्शनिक मतवाद की सीमा में नहीं बँधती, पर उनकी रचनाओं पर नाथपंथ, संतकाव्य, पुष्टि मार्ग, चैतन्य सम्प्रदाय, भागवत की नवधा भक्ति आदि का आंशिक प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है । डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थवाल ने मीरा पर निर्गुण प्रभाव को स्वीकार करते हुए लिखा, “यद्यपि मीराबाई व्यवहारतः सगुणोपासिका थी और कृष्ण की उपासना रणछोड़ के रूप में किया करती थी, फिर भी यह सच है कि उनके कहे जाने वाले पदों में निर्गुण विचारधारा स्पष्ट दिखती है । उन्होंने अपनी प्रेम सम्बन्धी विनय कृष्ण एव ब्रह्म दोनों के प्रति एक साथ की है ।’4 

डॉ. श्री कृष्णलाल ने मीरा के आराध्य में अनेक विरोधी रूपों की उद्भावना करके उसकी उपासना पद्धति में विरोधाभास का एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर दिया है, वे लिखते हैं- “मीरा के भगवान उनके प्रियतम गिरधर नागर हैं, जो कबीर, नानक आदि संतकवियों के निर्गुण, निराकार ब्रह्म के बहुत निकट जान पडता है ।”5 इसी प्रकार डॉ. हीरा लाल माहेश्वरी कहते हैं, “मीरा के समस्त व्यक्तित्व और काव्य में नाथ-पंथी जोगी, सगुण और निर्गुण ब्रह्म से सम्बन्धित अभिव्यक्ति की मिली जुली त्रिवेणी बह रही है । इसका रोम-रोम इसमें रम गया है।”6 वस्तुतः मीरा के भक्ति पदों में उनका प्रेमभाव ही प्रमुख है । यह प्रेमभाव इतना प्रबल है कि वह उन सभी साधनाओं को छा लेता है, जिनका प्रभाव मीरा पर लक्षित होता है ।

जहाँ तक मीरा के जीवन दर्शन का प्रश्न है, वह श्रीकृष्ण के आस-पास ही घूमता दिखाई देता है । मीरा के एकमात्र इष्ट गिरधर गोपाल ही है, जिन्हें मीरा ने अनेक रूपों में देखा है । उनके अनेक सम्बोधन हैं, यथा- नटवरनागर, नन्दलाल, मोहन, हरि, श्याम, साँवरिया, वंशीवारा, बाँके बिहारी, गोविन्द, प्रभु पिया, प्रियतम आदि । यही नहीं मीरा ने सन्त मत और योग मार्ग की ईश्वरवाची शब्दावली का भी प्रयोग किया है, जैसे-सतगुरू, जोगी, जोगिया, साहब आदि गिरधर लाल के पर्यायवाची ही हैं । किन्तु इन मिश्रित शब्दावलियों से भी भ्रमित नहीं होना चाहिए, क्योंकि मीरा जब कहती है कि ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ तब हमें भी यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि वे सहज भाव से श्रीकृष्ण को ही अपना आराध्य मानती हैं और उनका समूचा जीवन-दर्शन श्रीकृष्ण की भक्ति वे प्रेम पर ही आधारित है ।

मीरा की भक्ति-पद्धति का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि मीरा स्वतंत्र भक्त थी, वह किसी सम्प्रदाय में दीक्षित नहीं थी । यही कारण है कि उन पर कहीं निर्गुण धारा का प्रभाव व्यंजित होता है तो कहीं वैष्णवी व मधुरा भक्ति का भाव । कहीं वह वल्लभाचार्य की नवधा भक्ति की अनुगामिनी है तो कहीं चैतन्य महाप्रभु की माधुर्य भक्ति से । यद्यपि भी केन्द्र में श्रीकृष्ण ही है, फिर भी उन पर विविध धाराओं का प्रभाव अवश्य है । इससे उनका जीवन-दर्शन बहुआयामी फलक पर दृश्यमान होता है । संक्षिप्त विवेचन द्रष्टव्य है-

नाथ सम्प्रदाय का प्रभाव- नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्तक गोरखनाथ माने गये हैं । इस सम्प्रदाय की साधना पद्धति को हठयोग नाम प्राप्त हुआ है । हठयोग में ‘ह’ सूर्य का व ‘ठ’ ‘चन्द्रमा’ का प्रतीक है । सूर्य से अभिप्राय प्राणवायु से है और चन्द्रमा का अभिप्राय अपानवायु से। इस प्रकार प्राणवायु से वायु का निरोध ही हठयोग कहलाता है । मीरा के पदों में कुछ शब्द ऐसे ही प्रयुक्त हुए हैं, जो उन्हें हठयोग या नाथ संप्रदाय से जोड़ते हैं, जैसे-

जोगिया जी निसदिन जोऊँ बाट ।
पाँव न चाले पंथ दुहेलो, आड़ा औधट घाट ।
नगर आइ जोगी रम गया रे, नौ मन प्रीत न पाई ।
मैं भोली भोलापन कीन्हों, राख्यो नहीं बिलमाई ।7

उपर्युक्त पद में जोगिया, औघट, जोगी आदि ऐसे ही शब्द हैं। इसी प्रकार का एक अन्य पद भी अवलोकनीय है-

जोगी मत जा मत जा मत जा, पाँइ परूँ में तेरी चेरी हौं ।
प्रेम भगति को पैड़ों ही न्यारौ, हमकूँ गैल बना जा ।
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जल बल गई भस्म की ढेरी, अपने अंग लगा जा ।
मीरा रे प्रभु गिरधर नागर, जोत में जोत मिला जा ।।8 

कहीं कहीं जोगण बनने का विचार रखने वाली मीरा हठयोग साधना का तिरस्कार करके भाग्य की महत्ता का प्रतिपादन करती है, यथा-

तेरो मरम नहीं पायो रे जोगी । 
आसण मांड़ि गुफा में बैठो, ध्यान हरी को लगायौ ।
गल विच सेली हाथ हाजरियो, अंग भभूति लगायौ ।
मीरा के प्रभु हरि अविनासी, भाग लिख्यौ सो ही पायौ ।।9 



वस्तुतः मीरा पर जो नाथ सम्प्रदाय का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है, वह उस पंथ के प्रति श्रद्धाभाव के कारण नहीं, बल्कि भावों की स्वच्छन्द धारा में इधर-उधर बह जाने के कारण ही है।  वल्लभ संप्रदाय का प्रभाव- वैष्णव भक्ति में भागवत् में वर्णित ‘नवधा भक्ति’ को विशेष महत्त्व दिया है । इसमें प्रेमलक्षणा भक्ति की महत्ता दी गई है । इसमें भक्ति के नौ सोपान हैं- श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पदसेवा, अर्चना, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन । इनमें से अधिकांश मीरा के पदों में दृष्टिगोचर होते हैं-

कीर्तन- माई म्हाँ गोविन्द-गुण गास्याँ ।
चरणाम्रति रो नेम सकारे, नित उठि दरसण जास्यां ।
हरि मन्दिर मां निरत करास्यां, घूंघर्या छमकास्यां ।10

पाद-सेवन- मन के परस हरि के चरण ।
सुभग सीतल कँवल कोमल जगत ज्वाला हरण ।।
दासी मीरा लाल गिरधर, अगम आगम तरण ।।11 

वंदन- म्हाँ गिरधर आगां नाच्या री ।
नाच नाच म्हाँ रसिक रिझावां, प्रीत पुरातन जाँच्या री ।।12

इस तरह के अनेक पद यह प्रमाणित करते हैं कि मीरा पर वल्लभ संप्रदाय का भी प्रभाव था, परंतु हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि इस प्रकार की भक्ति भी युगीन-प्रभावयुक्त थी । कृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति से स्पष्टतः मीरा इस ओर बह गई होंगी ।

गौड़ीय संप्रदाय का प्रभाव- मीरा के पदों का यदि सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाय तो हमें ज्ञात होगा कि उनका जीवन-दर्शन न तो नाथपंथ (निर्गुण सम्प्रदाय) से प्रभावित था और न ही पुष्टिमार्ग (वल्लभ सम्प्रदाय) से । यदि कुछ पद आये हैं तो वे उस युग के प्रभाव व भक्तिमती मीरा की भावों में तरलता के कारण ही हैं । महाप्रभु चैतन्य के कंठ से भक्ति का जो स्वर निकला, वह मीरा के कंठ में आकर पूर्णता को प्राप्त हो जाता है । मधुरा भक्ति का उल्लेख पुराणों, उपनिषदों, संहिताओं, सम्मोहन तंत्र आदि में तो मिलता ही है, किंतु इसका पूर्णतः परिपाक ‘गौड़ीय सम्प्रदाय’ में ही चैतन्य महाप्रभु के नेतृत्व में हुआ था ।

‘माधुर्य भक्ति’ में भक्त अपने भगवान को ‘पति रूप’ में देखता है । यह गोपी भाव है । गोपी भाव से मीरा ने भी स्वयं को उस गिरधर को हाथों बेच दिया था । मधुर रस शृंगार प्रधान होते हुए भी लौकिक शृंगार से सर्वथा भिन्न होता है । इस रस का विषय अलौकिक होता है और उसके आलंबन स्वयं भगवान होते हैं । ‘माधुर्य भक्ति’ के तीन प्रमुख अंग होते हैं- 1.रूप वर्णन, 2. विरह वर्णन तथा 3. आत्म समर्पण । मीरा के पदों में इनका व्यापक वर्णन दिखाई देता है । संक्षिप्त विवेचन द्रष्टव्य है-

(क)रूप वर्णन- मीरा ने श्रीकृष्ण के सौन्दर्य का कई स्थलों पर वर्णन किया है । वे ‘साँवली सूरत’ और ‘मोहनी मूरत’ हैं, वे ‘पीताम्बर’ धारण किए हुए हैं । उनके सिर पर ‘मोर मुकुट’ है । माथे पर ‘केशर का तिलक’ है । कानों में ‘कुंडल’ झलक रहे हैं, उनकी ‘नासिका’ सुन्दर है । उनके दाँत दाड़िम के समान है, विशाल नेत्र कमल दल के समान हैं । चितवन बाँकी है । उनके वक्ष स्थल पर वैजयन्ती माला है । उनका यह सौन्दर्य प्रेम की जंजीर में बाँधने वाला प्रतीत होता है-

बस्याँ म्हारे नैनण माँ नन्दलाल ।
मोर मुगुट मकराक्रत कुंडल, अरूण तिलक सौहाँ भाल ।
-    -   -
अधर सुधारस मुरली राज्यां उर बैजंती माल ।
मीरा प्रभु संता सुखदायाँ, भगत बछल गोपाल ।।13 

इसी तरह प्रभु श्री कृष्ण की छवि मीरा के आँखों में किस प्रकार बस गई है, पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

आली री म्हारे नैणा बाण पड़ी ।
चित चढ़ी म्हारे माधुरी रस, टिवड़ा अणी गड़ी ।।14 

(ख)विरह वर्णन- माधुर्य भक्ति का दूसरा सोपान ‘विरह-व्यंजना’ है । मीरा की विरह दशा की उद्दीप्ति तीन भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में होती है, वे हैं-प्रिय प्रवास के कारण, वर्षाभास के कारण व मधुमास के कारण । उदाहरण हैं-

पिय बिनु सुनो छै म्हारो देस ।
ऐसो है कोई पीव कूँ मिलावै, तनम न करूँ सब पेस ।
-   -   -
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, तजि दिया नगर नरेस ।।15

इस विरह वेदना में मीरा विवश है, पिय की प्रतीक्षा कर रही है तो उसे चैन भी नहीं है। वह वदा मिनल को आतुर है । उसे पपीहे की वाणी बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती, यथा-

पपइया के पिव की बाणी न बोल 
सुणि पावेली बिरहणी के, थारो राखेली पाँख मरोड ।
चोंच कटाऊँ पपइया रे, ऊपरि कालर लूण ।
पिव मेरा मैं पीव की रे, तू पिव कहै सूँ कूण ।।16 

(ग)आत्मसमर्पण- मीरा ने अपने आपको पूर्णतया कृष्ण के प्रति समर्पित कर दिया है, अपने मन को उन्हीं का रस पीने को कहती है व उनके अतिरिक्त दूसरे किसी को स्वीकार नहीं करती, जैसे-

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई ।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई ।।17 

इसी प्रकार वह उनके नाम पर मुग्ध होकर उन्हीं के प्रति समर्पित हो गई है, यथा-

पिया तेरे नाम लुभाणी हो ।
नाम लेन तिरता सुण्या, जैसे पाहण पाणी हो ।।18
-   -   -
राम नाम रस पीजे, मनुआँ राम नाम रस पीजे ।।19 

इस प्रकार मीरा की भक्ति में माधुर्य भावना प्रतिबिम्बित होती है । मीरा कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पित है । मीरा की माधुर्य भक्ति के विषय में आचार्य शुक्ल ने कहा, “पति प्रेम के रूप में ढले हुए भक्ति रस ने मीरा की संगीत धारा में जो दिव्य माधुर्य प्रवाहित किया है, वह भावुक हृदयों को और कहीं शायद ही मिले ।”

निष्कर्षतः मीरा ने श्रीकृष्ण से प्रेम किया था, फलतः उनका सारा जीवन ही कृष्णमय हो गया था । मीरा के पदों में कतिपय पारिभाषिक शब्दों को आधार बनाकर उनके जीवन पर विभिन्न दर्शनों के मतों के प्रभाव को गई आलोचकों ने व्यंजित किया, पर मीरा तो प्रेम दिवानी थी । उसे किसी संप्रदाय विशेष की मान्यताओं के आलोक में ही देखकर मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा । मीरा का जीवन ही कृष्ण प्रेम था और दर्शन भी कृष्ण प्रेम । अतः उन्होंने कृष्ण की आराधना कांता भाव या गोपी भाव से की वे अपने आराध्य को भी प्रति मानकर ही पुकारती है, उसके विरह में व्याकुल होकर तड़पती है । इससे उनके सगुणोपासक होने में कोई संदेह नहीं रहता । संभवतः साधु-संगति के प्रभाव से उनके काव्य में निर्गुण शब्दावली आ गई हों, पर भक्ति में ‘मधुरिया भाव’ प्रमुख है । सगुण-प्रेम के विरह मिलन के प्रभाव एवं संस्पर्श अत्यधिक प्रभावी हैं । उसकी माधुर्य भावना अनेक स्थलों पर सूर और तुलसी से भी आगे दिखाई देती है । ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेम-विवश मीरा स्वयं भाव-विभोर होकर श्रीकृष्ण के साथ लीलाएँ कर रही हों । अतः यदि प्रभाव की दृष्टि से ही देखा जाय तो स्पष्ट होता है कि उन पर चैतन्य महाप्रभु की दार्शनिक मान्यताओं का सर्वाधिक प्रभाव था साथ ही उनके जीवन-दर्शन पर पड़ा । समग्र रूप से वह स्वयं ही भक्ति की मंदाकिनी बनकर जगत् को रस-आप्लावित कर गई । उस रस सृष्टि में उनका भव्य जीवन और भव्य दर्शन हमें डूबने को प्रेरित करता है ।

संदर्भ-
1. इण्डियन फिलोसोफी, भाग-2, मू.-डॉ.राधाकृष्णन, पृ.770
2. तुलसी का शिक्षा-दर्शन, डॉ. शम्भू लाल शर्मा, पृ.9
3. भक्ति काव्य सरिता, डॉ.श्याम सुन्दर दीक्षित, पृ.108
4. हिन्दी साहित्य, डॉ. चातक एवं डॉ.महर्षि, पृ.65
5. वही, पृ.65
6. वही, पृ.65
7. भक्ति काव्य सरिता, डॉ.श्याम सुन्दर दीक्षित, पृ.75
8. वहीं, पृ.76
9. मीरा पदावली, सं. परशुराम चतुर्वेदी, पद सं.63
10. वही, पद सं.31
11. वही, पद सं.1
12. वही, पद सं.17
13. वही, पद सं.3
14. वही, पद सं.14
15. भक्ति काव्य सरिता, सं.डॉ. श्याम सुन्दर दीक्षित, पृ.68
16. वही, पृ.72
17. वही, सं.73
18. वही, सं.69
19. वही, सं.69
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आचार्य तुलसी:अणुव्रत अणुशास्ता, राष्ट्रसंत एवं मानव कल्याण के पुरोधा

(यह आलेख आकाशवाणी चितौडगढ़ पर प्रसारित हो चुका है,पाठक हित में यहाँ साभार प्रकाशित किया जा रहा है.)

भारतीय संस्कृति की साहित्यिक परम्परा में सन्त साहित्य का विशिष्ट स्थान है। आचार्य तुलसी बीसवीं सदी की सन्त परम्परा के महान् साहित्य स्रष्टा युग पुरूष है उनका साहित्य परिमाण की दृष्टि से ही विशाल नहीं अपितु गुणवत्ता एवं जीवन मूल्यों को लोक जीवन में संचारित करने की दृष्टि से भी विशिष्ट है । आचार्य तुलसी ने सत्यम् शिवमं और सौन्दर्य की युगपत उपासना की है । इसीलिए उनका साहित्य मनोरंजन एवं व्यावसायिकता से उपर सृजनात्मकता को पैदा करने वाला है उनके विचार सीमा को लांघकर असीम की ओर गति करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं । आचार्य तुलसी का व्यक्तित्व किसी भी सहृदय को भाव विभोर करने में सक्षम है । उनके विराट व्यक्तित्व की उपमा नहीं की जा सकती ।

बाल वय से सन्यास के पथ पर प्रस्थित होकर क्रमशः आचार्य अणुव्रत अणुशास्ता, राष्ट्रसंत एवं मानव कल्याण के पुरोधा के रूप में विख्यात हुए हैं । काल के अनन्त प्रवाह में 80 वर्षों का मूल्य बहुत नगण्य होता है पर आचार्य तुलसी ने उद्देश्य पूर्ण जीवन जीकर जो उंचाईयां एवं उपलब्धियां हासिल की है वे किसी कल्पना के उड़ान से भी अधिक है ।  जैन धर्म एवं तेरापंथ सम्प्रदाय से प्रतिबद्ध होने पर भी आचार्य तुलसी का दृष्टिकोण असाम्प्रदायिक रहा है । वे कहते थे- “ जैन धर्म मेरी रग-रग में, नस-नस में रमा हुआ है, किन्तु साम्प्रदायिक दृष्टि से नहीं, व्यापक दृष्टि से । क्योंकि में सम्प्रदाय में रहता हूं पर सम्प्रदाय मेरे दिमाग में नहीं रहता । मैं सोचता हूं मानव जाति को कुछ नया देना है तो साम्प्रदायिक दृष्टि से नहीं दिया जा सकता । यही कारण है कि मैंने सम्प्रदाय की सीमा को अलग रखा, और धर्म की सीमा को अलग ।”



इसी व्यापक दृष्टिकोण  को ध्यान में रखकर आचार्य तुलसी ने असाम्प्रदायिक धर्म का आन्दोलन चलाया, जो जाति, वर्ण, वर्ग, भाषा, प्रान्त एवं धर्मगत संकीर्णताओं से उपर उठकर मानव जाति को जीवन मूल्यों के प्रति आकृष्ट कर सके । इस असाम्प्रदायिक मानव धर्म का नाम है अणुव्रत आन्दोलन । आचार्य तुलसी ने धार्मिकता के साथ नैतिकता की नयी सोच देकर अणुव्रत दर्शन को प्रस्तुत किया, जिसका उद्देश्य था- मानवीय एकता का विकास, सहअस्तित्व की भावना का विकास, व्यवहार में प्रामाणिकता का विकास, आत्मनिरीक्षण की प्रवृति का विकास व समाज में सही मानदण्ड़ों का विकास । आचार्य तुलसी ने कल्पना की कि 21वीं सदी के भारत का निर्माता मानव होगा और वह अणुव्रती होगा । अणुव्रती गृह सन्यासी नहीं होगा वह भारत का आम आदमी होगा ओर एक नये जीवन दर्शन को लेकर भविष्य का मार्गदर्शन तय करेगा । 

आचार्य तुलसी ने पांच अणुव्रतों की कल्पना को समाज के समक्ष रखा वे हैं- अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । वस्तुतः जैन धर्म में जिन पांच महाव्रतों की कल्पना साधु जीवन के लिए है । उन्हीं को व्यावहारिक रूप देकर सामाजिक व्यक्ति के लिए अणुव्रत का नाम दिया । जिसे कोई भी सामाजिक व्यक्ति अपने जीवन में उतार कर अपने जीवन को उन्नत बना सकता है । अणुव्रतों की व्यावहारिकता ही इनकी लोकप्रियता का कारण रहे हैं । इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- 

अहिंसा अणुव्रत की मान्यता के अनुसार कम से कम निरपराध त्रस जीव जैसे- चलने-फिरने वाले प्राणियों का हनन नहीं होना चाहिए । एक सामाजिक व्यक्ति के लिए स्थावर जीवों की हिंसा से सर्वथा बच पाना कठिन है, परन्तु उसकी सीमा की जा सकती है । अपनी काव्यमय पंक्तियों में आचार्य तुलसी ने अहिंसा अणुव्रत का परिचय इस प्रकार दिया-

है  पांच अणव्रत प्रथम अहिंसा वाणी,
हन्तव्य न इसमें निरपराध त्रस प्राणी।
स्थावर की सीमा, व्रत व्यापक बन जाये,
आतंकवाद का अन्त स्वयं आ जाये ।।

इस प्रकार कवि ने अहिंसा अणुव्रत के पालन से यह लाभ बताया कि इससे आतंकवाद की समस्या का समाधान अपने आप हो सकता है क्योंकि इस व्रत की स्वीकृति के फलस्वरूप निरपराध मनुष्यों की हत्या सहज रूप में प्रतिबन्धित हो जाती है । 

अहिंसा हो ओर सत्य न हो तो अहिंसा जीवित नहीं रह पाती इसीलिए अहिंसक श्रावक सत्य के प्रति निष्ठावान होते हैं वे विश्वस्त और आत्मस्थ रहते हुए भी अपने पाप रूपी कीचड़ का प्रक्षालन करते हैं । सत्य अणुव्रत का सन्देश उन्होंने अपनी काव्य पंक्तियों में इस प्रकार अभिव्यक्त किया-

क्या कभी अहिंसा सत्य बिना जी सकती ?
सुई धागे के बिना वस्त्र सी सकती ?
अतएव अहिंसक सत्यनिष्ठ होता है ।
विश्वस्त स्वस्थ निज पाप-पंक धोता है ।।

इस प्रकार सत्य अणुव्रत का पालन करने वाला श्रावक पुष्ठ आधार के बिना किसी पर दोषारोपण नहीं करता । क्रोध, लोभ, भय और हास्य के वश किसी के अहितकारी असत्य नहीं बोलता, किसी के गोपनीय रहस्य का उद्घाटन नहीं करता, किसी को गलत पथदर्शन नहीं देता । झूठी साक्षी नहीं देता और झूठा लेख भी नहीं लिखता इनमें से एक भी आचरण को करने वाला सत्य अणुव्रत भंग का अपराधी होता है । जो जीवन नैतिकता से शून्य होता है वह वास्तव में शून्य है । इस दृष्टि से अचौर्य अणुव्रत संजीवन है, जो शून्यता को भरने वाला है । आर्थिक घोटाले किसी भी क्षेत्र में हो उनका समावेश चोरी माना जाता है । इस अणुव्रत के अनुसार प्रामाणिकता श्रावक जीवन का सुस्थिर सिद्वान्त है । आचार्य तुलसी की पंक्तियां है- 

जो नैतिकता  से शून्य, शून्य जीवन है ।
इसीलिए अचौर्य  अणुव्रत  संजीवन है,
आर्थिक अपराधीकरण  स्वयं चोरी  है,
प्रामाणिकता श्रावक की स्थिर थ्योरी है।।

इस प्रकार अचौर्य अणुव्रत का सन्देश है कि कोई भी मनुष्य दूसरे के प्रति क्रूरता पूर्ण व्यवहार न करे । शारीरिक क्रूरता का संबंध हिंसा से व आर्थिक क्रूरता का संबंध अचौर्य अणुव्रत के साथ है । अतः चोरवृति का परित्याग ही इसका मुख्य सन्देश है । 

श्रावक का चौथा अणुव्रत है- ब्रह्मचर्य । यह अपने द्वारा अपने जीवन की सुरक्षा है । भोग लालसा को सीमित करने का सघन प्रशिक्षण इसी में निहित है । इस व्रत के श्रावक स्वदार संतोषी होते हैं । आचार्य तुलसी के शब्द है- 

है  ब्रह्मचर्य अपने से  अपना रक्षण,
भोगेच्छा-परिसीमन का सघन प्रशिक्षण।
“अपने घर   में संतुष्ट” नियम में निष्ठा,
श्रावक जीवन की सबसे बड़ी प्रतिष्ठा।।

इस प्रकार ब्रह्मचर्य व्रत आत्म सुरक्षा का सहज उपाय है और उन्मुक्त भोग की समस्या से बचने का प्रशिक्षण है।पांचवा अपरिग्रह अणुव्रत है जिसका आशय है- इच्छाओं को सीमित करना । इससे आर्थिक झंझट अपने आप समाप्त हो जाते हैं । आवश्यकता और आकांक्षा में भिन्नता है । आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है किन्तु आकांक्षाओं की पूर्ति असम्भव है। अतः आकांक्षाओं पर अंकुश इस अणुव्रत के माध्यम से लगाया जा सकता है । आचार्य तुलसी की पंक्तियां इसी सन्देश को व्यक्त कर रही है-

इच्छा  परिमाण अणुव्रत  अपरिग्रह का,
हो जाता स्वयं शमन आर्थिक विग्रह का।
आवश्यकता  आकांक्षा  एक  नहीं  है,
आकांक्षाओं पर अंकुश हो यही सही है।।

इस प्रकार अपरिग्रह अणुव्रत का पालन करने वाला केवल अर्थ के अर्जन और भोग का संयम ही नहीं करता है, बल्कि वह अर्थ की आसक्ति ओर अहम् से भी बचता है।

आचार्य तुलसी ने अणुव्रत को असाम्प्रदायिक धर्म के रूप में प्रतिष्ठित किया उनका कथन है “इतिहास में ऐसे धर्मों की चर्चा है, जिनके कारण मानव जाति विभक्त हो गयी है । जिन्हें निमित्त बनाकर लड़ाईयां लड़ी गई है किन्तु विभक्त मानव जाति को जोड़ने वाले अथवा संघर्ष को शान्ति की दिशा देने वाले किसी धर्म की चर्चा नहीं है । क्यों ? क्या कोई ऐसा धर्म नहीं हो सकता, जो संसार के सब मनुष्यों को एक सूत्र में बांध सके । अणुव्रत को मैं एक धर्म के रूप में देखता हूं पर किसी सम्प्रदाय के साथ इसका गठबन्धन नहीं है । इस दृष्टि से मुझे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है, कि अणुव्रत धर्म है पर यह किसी वर्ग विशेष का नहीं । अणुव्रत जीवन को अखण्ड बनाने की बात करता है । अणुव्रत के अनुसार ऐसा नहीं हो सकता कि व्यक्ति मन्दिर में जाकर भक्त बन जाय और दुकान पर बैठकर क्रुर अन्यायी वे मानते थे कि भारत की माटी के कण-कण में महापुरूषों के उपदेश की प्रति ध्वनियां है । यहां गांव-गांव में मन्दिर है, मठ है, धर्म स्थान है, धर्मोपदेशक है फिर भी चारित्रिक दुर्बलता का अनुत्तरित प्रश्न क्यों हमारे समक्ष आज भी आक्रान्त मुद्रा में खड़ा है।

अणुव्रत की आचार संहिता से प्रभावित होकर स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आज के युग में जबकि मानव अपनी भौतिक उन्नति से चकाचौंध होता दिखाई दे रहा है और जीवन के नैतिक व आध्यामिक तत्वों की अवहेलना कर रहा है वहां अणुव्रत आन्दोलन द्वारा न केवल मानव अपना सन्तुलन बनाये रख सकता है बल्कि भौतिकवाद के विनाशकारी परिणाम से बचने की आशा कर सकता है ।

अणुव्रत आन्दोलन ने अपने व्यापक दृष्टिकोण से सभी धर्मों के व्यक्तियों को नैतिक मूल्यों के प्रति आस्थावान बनाया है । वह किसी की व्यक्तिगत आस्था या उपासना पद्वति में हस्तक्षेप नहीं करता । आचार्य तुलसी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि अणुव्रत ने यह दावा कभी नहीं किया है वह इस धरती से भ्रष्टाचार की जड़ें उखाड़ देगा परन्तु मेरा मानना है कि यह सदाचार की प्रेरणा है और तब तक देता रहेगा जब तक हर सुबह का सूरज अन्धकार को चुनोती देकर प्रकाश की वर्षा करता रहेगा । मैं भविष्य के प्रति आशावादी हूं और यह विश्वास कर सकता हूं कि एक दिन भारत का आम आदमी अणुव्रती होगा और आदर्श समाज की रचना करेगा । उनकी काव्य पंक्तियां है-

सात्विकता, श्रद्धा, सज्जनता,
सारल्य, विनय, वात्सल्य भरा,
उंचा आचार, विचार, विमल, 
व्यवहार  समूचे  भारत में ।

इति शुभम् ।
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