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रांगेय राघव की कहानियों में मानवता के पीड़ित पक्ष



रांगेय राघव की कहानियों में मानवता का पीड़ित पक्ष

(अपनी माटी, जनवरी-मार्च, 2026 अंक में प्रकाशित)

रांगेय राघव की कहानियों का रचना-समय मनुष्यता के भयावह स्वप्नों का साक्षी है। जहाँ एक तरफ भारतीय समाज औपनिवेशिक परतंत्रता से मुक्ति का संघर्ष करते-करते यकायक विभाजनकारी षड्यंत्रों का शिकार बन स्वयं को फाँस लेता है, तो दूसरी तरफ ‘बंगाल का अकाल’ प्राकृतिक विभीषिका का चरम माना जा सकता है, जहाँ मानवता को रक्षित रखना चुनौती है। वैश्विक परिदृश्य में भारत से इतर पूरी दुनिया परमाणु त्रासदी के आतंक से विस्मित और मानवता की तलाश में व्याकुल दिखाई देती है। ऐसे अनास्थामय समय को रांगेय राघव ने अपनी कहानियों में चित्रित कर मानवता के पीड़ित स्वर को आने वाली पीढ़ियों के सामने रखा। ‘साम्राज्य का वैभव’(1947), ‘देवदासी’(1947), ‘समुद्र के फेन’(1947), ‘अधूरी मूरत’(1949), ‘जीवन के दाने’(1949), ‘अंगारे न बुझे’(1951), ‘ऐयाश मुर्दे’(1953), ‘इन्सान पैदा हुआ’(1957), ‘पाँच गंधे’(1960) तथा ‘एक छोड़ एक’(1963) कहानी-संग्रह अपने समय के सच को मानव-मूल्यों के साँचे में मूल्यांकित करते हैं।

  यह सच है कि रांगेय राघव ने अपनी कहानियों में मानवीय बर्बरता, भुखमरी, अंतहीन गरीबी, लाचारी और बेबसी को जिस प्रखरता से सामने रखा, वह मनुष्यता के नैतिक प्रतिमानों को विचलित करती है। अशोक शास्त्री लिखते हैं- “रांगेय राघव के कहानी-लेखन का मुख्य दौर भारतीय इतिहास की दृष्टि से बहुत हलचल भरा विरल कालखंड है; कम मौकों पर भारतीय जनता ने इतने स्वप्न और दुःस्वप्न एक साथ देखे थे- आशा और हताशा ऐसे अड़ोस-पड़ोस में खड़ी देखी थी।”1 ऐसे विकट समय में रांगेय राघव ने हिन्दी कहानी में उन वेदनाओं, अवसादों एवं पतित मनुष्यता की गूँज को स्थान देकर दुर्गम और कँटीले पथ की यात्रा हिन्दी जगत को करवाई। वस्तुतः इन कहानियों में मनुष्यता के प्रतिमानों से केवल टकराव नहीं, बल्कि अपने ढंग से प्रत्युत्तर है।

  रांगेय राघव के लेखन की शुरूआत पाँचवें दशक से होती है, जब दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका देख चुकी है। देश में भारत छोड़ो आन्दोलन, मजदूरों की देशव्यापी हड़तालें, विभाजन के कारण सांप्रदायिक उन्माद और ब्रिटिश साम्राज्यवादी कहर से जनता त्रस्त है। उपनिवेशवादी बर्बरता के विरोध में चेतना का स्वर उनकी कहानी ‘यह ग्वालियर है’, ‘चंगेज़ की तलवार’, ‘उपचेतना का ताण्डव’, ‘धूल की आँधी’ आदि में प्रकट होता है। ‘यह ग्वालियर है’ कहानी में मजदूरों पर बेरहमी से गोलियाँ चलाकर साम्राज्यवादी ताकतों के कहर को चित्रित करते हुए वे मजदूरों की शक्ति को चिह्नित करते हैं। मजदूरों की गरीबी में भी शक्ति को प्रकट करते हुए वे लिखते हैं- “.... यह सच है कि गरीब के पास जब तक एक ही बण्डी है तब तक जूँ उसमें रेंगती ही रहेगी। लेकिन मजदूर की उँगलियों को भूल जाना क्या ठीक होगा, जिसके बीच में कैसी भी जूँ पीस दी जा सकती है।”2

  भारत ने अथक संघर्ष के उपरांत 15 अगस्त, 1947 को आजादी तो प्राप्त कर ली, किन्तु विभाजन की त्रासदी के दंश के आघात को भी झेला। जहाँ धर्म और संप्रदाय के आधार पर मानवता का विभाजन हुआ और मनुष्यता के पतन का रक्तस्नात् चेहरा भी प्रकट हुआ। हजारों लोग बेघर, दंगे, अकाल मृत्यु, विध्वंस, द्वेष के दृश्य के साथ संवेदना का अवसान भी देखने को मिला। रांगेय राघव ने उन विभीषिकाओं का केवल ब्यौरा प्रस्तुत न कर उस मानसिकता को नंगा किया है, जो संकटकालीन स्थितियों में भी सब कुछ छीनने और मौके का फायदा उठाने की मनोवृत्ति से ग्रस्त है। ‘तबेले का धुँधलका’ कहानी तबेले में शरण के बदले अपनी बहन के कौमार्य का सौदा करने की विवशता और अपनी लाचारी का चीत्कार विघटित मानव-मूल्यों को सामने रख देती है। जब उसकी स्त्री कहती है- “ किसी को क्या मालूम? रहने को तो जगह मिल ही जाएगी।” फिर जैसे उसने मुझे सांत्वना दी- “अब पगड़ी नहीं देनी होगी। परदेश में अपनी क्या इज्जत?”3 कहानी में धुँधलका केवल उस तबेले में ही नहीं है, जो उसे अपनी बहन की अस्मत पर मिला है, बल्कि पूरा देश तबेले की भाँति जी रहा है।
मूल्यों का पतन मनुष्यता का पराभव है। 

प्रगति के रथ पर आरूढ़ भारतीय समाज में पुरातन नैतिक मूल्य निरन्तर विघटित होते देखे जा सकते हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ तत्कालीन समाज के आदर्श को बिम्बित करती है, जो भारतीय नैतिक मूल्यों का उज्जवल पक्ष है। इसी क्रम में रांगेय राघव की ‘पंच परमेश्वर’ कहानी हमें उस सामयिक यथार्थ से परिचित कराती है, जहाँ भ्रष्ट आचरण और अनैतिकता की जुगलबंदी अट्टहास करती दिखाई देती है। इस कहानी में ‘कन्हाई’ अपने सौतेले भाई चन्दा की बहू को अपने घर बिठा देता है। जब चन्दा पंचायत बुलाता है तो कन्हाई शराब की बोतल से न्याय को खरीद लेता है। इसके बाद फैसला यह होता है कि औरत मर्द की होती है। अपराधी को ‘मर्द’ कहकर महिमा मण्डित करना पतित व्यवस्था का एक दृश्य है। यहाँ तक कि फूलो का विश्वासघात भी बदलते समय का यथार्थ है। उसने जब पंचों के समक्ष कहा- “चौधरी भगवान है। पंच परमेसुर हैं। लुगाई मरद की है, मगर जो मरद ही न हो, उसकी कोई लुगाई नहीं है।”4 यह कथन समाज को विस्मित करता है। समाज भी यह मान लेता है कि ब्याह हो जाने मात्र से क्या होता है? पुरुषार्थहीन पुरुष का कोई अधिकार नहीं कि वह स्त्री को दास बना कर रखे। यह चित्र भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के पतन का है, जिसे रांगेय राघव ने चित्रित किया है।

  इसी तरह ‘भय’ कहानी में भी पंचायत अपराधी और अपराध के शिकार को एक तराजू में तौल देती है। इस कटु यथार्थ में पीड़िता ‘रतनी’ अपनी संस्कारगत जड़ता के कारण मौन और भयग्रस्त है। न्याय का आलम यह है कि सब कुछ जानकर भी पंचायत सभी पर जुर्माना डालकर अपने हाथ झाड़ लेती है। यही स्थिति नेतृत्व की है, जहाँ सुविधानुसार व्यवस्था का संचालन होता है। ‘भय’ कहानी में पंचों का न्याय द्रष्टव्य है- सरपंच ने चौधरी से कहा- “धूपो ने पाँच खरच किए, दस का दंड देगी; कुंदन ने बूढ़े और औरत को मारा सो पचास रूपये दंड देगा और तुरसी मामले को पुलिस तक ले गया जिसमें दोनों का खरचा हुआ, सो तीस रुपये दंड भरेगा और पंचों का फैसला है कि मामला यहीं खत्म हुआ।”5 यह उदाहरण पीड़ित के साथ छलावा मात्र नहीं, बल्कि उस अन्तर्चेतना का दहन है, जिसने मानवता को सहेज कर रखा था।
 
आजादी के संघर्ष में महात्मा गांधी का नायकत्व महत्त्वपूर्ण रहा। वे भारतीय जन-मानस के आदर्श बन गए थे, लेकिन आजादी प्राप्त करते ही गांधीजी को विस्मृत कर उनके नाम का दुरुपयोग राजनेता करने लग गए। ऐसे वर्ग का उभार हुआ, जिसने गांधी टोपी का उपयोग अपनी भ्रष्ट विकृतियों को ढँकने के लिए किया। ‘ईमान की फसल’, ‘बाप का दोस्त’ जैसी कहानियों के माध्यम से रांगेय राघव ने हमारी राजनीति के अवसरवादी चरित्र को उजागर किया, जो भ्रष्ट आचरण को जीवन-शैली का पर्याय मानने लगे हैं। ‘ईमान की फसल’ कहानी में कथन है- “गांधी के नाम की सफेदी उनके लिए एक नायाब चादर साबित हुई है जो उनकी भ्रष्टता और विकृतियों को ढँकने के काम आती है ..... भीतर की काली करतूत छिपाने को सफेदी चाहिए। ये लोग सफेद टोपी लगाते हैं।”6 यह आचरण आने वाले समय का चरित्र भी इंगित करता है, जहाँ निरीह और भोली जनता को ठगने के लिए किस तरह लोग आवरण बदलकर हमारे सामने आते हैं। गांधी के रूप का यह सांकेतिक दृश्य आज भी भारतीय राजनीति का हिस्सा बना हुआ है, जिसे लेखक ने पाँच दशक पूर्व प्रकट किया था।

  यह विदित है कि महत्त्वाकांक्षाओं की ऊँची उड़ान व्यक्ति को स्वार्थी बना देती है। जब तात्कालिक लाभ के व्यामोह में व्यक्ति स्वयं के साथ अपनी विरासत और भविष्य को बड़े ही भोलेपन के साथ हिंसक शक्तियों को सौंप देता है। भारतीय सांस्कृतिक चरित्र में इस बदलाव का रेखांकन रांगेय राघव ने ‘मृगतृष्णा’ कहानी में प्रतीकों के माध्यम से बखूबी किया है। कहानी में ‘मृगी’ अपनी उच्च महत्त्वाकांक्षाओं के कारण ‘मृग’ की संघर्षशीलता को मूर्खता समझती है। व्यवस्था का व्याघ्र शिकारी कुत्तों के रूप में जब उसे दबोच लेता है तो मृत्यु के समय उसे पश्चाताप होता है। उसे अपना अतीत याद आता है, जो स्वार्थ व उद्दाम आकांक्षाओं की बलि चढ़ गया है। उसे अपना पति और बच्चे याद आते हैं, जिन्हें उसने मृत्यु की दहलीज पर पहुँचा दिया है। दूसरी ओर ‘मृग’ की मृत्यु अपनों को बचाते हुए, संघर्ष करते हुए होती है। वह स्वयं मरकर भी अपने बच्चों को बचाने की कोशिश करता है, वह उम्मीद रखता है कि संघर्ष की परम्परा उसके बच्चे आगे बढायेंगे। लेकिन एक कड़वे सच से उसका सामना होता है। जब वह मरते समय अपने बच्चे से ‘मृगी’ के बारे में पूछता है तो जो कुछ भी उसे पता चलता है, वह यातनामय है। मृग का आर्तनाद इन शब्दों में प्रकट होता है- “ओ देव! यह मैं क्या सुन रहा हूँ- तू मेरा पुत्र क्यों हुआ? अभागे, जन्म लेते ही क्यों न मर गया। बिना सिखाये ही चपल सिंह तक का बच्चा जानता है कि उसे घास नहीं खानी है, चाहे प्राण भले ही चले जायें, परन्तु तू ही नहीं सीख पाया कि जाति का गौरव कैसे रखा जाय।”7 यह दृश्य तत्कालीन भारतीय समाज का है, जहाँ एक पीढ़ी साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष कर रही है तो दूसरी पीढ़ी अपने मूल्यों का नाश कर उन्हीं शक्तियों के हाथों का खिलौना बन रही है। यह हमारे पारिवारिक यथार्थ का उदाहरण भी है। ऐसी स्थिति में हमारे पूर्वजों का वह त्याग किस पीड़ा से गुज़रा होगा, इसे महसूस किया जा सकता है।

  रांगेय राघव की दृष्टि में साहित्य युगीन और सामयिक होना आवश्यक है, लेकिन वे मानते हैं कि कोई साहित्यकार सार्थक, स्थायी और महत्त्वपूर्ण साहित्य की रचना तभी कर पाता है, जब वह उसे सार्वभौम रूप देता है। अपनी कहानी ‘कुत्ते की दुम और शैतान’ की रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए वे लिखते हैं- “... यह मनुष्य के बाह्य पर जाकर सीमित नहीं हो जाती। यह युग-युग का सत्य है, क्योंकि यह उसकी भीतर की निकृष्टता को बाहर खींच लाती है। जब युग का सत्य युग-युग के सत्य से तादात्म्य करता है, तब कला का जन्म होता है।”8 यही युगीन सत्य जब रांगेय राघव ने अपनी आँखों से देखा तो उसे अपनी रचनाधर्मिता की वस्तु बनाया। रांगेय राघव की कहानियों की संख्या चाहे अधिक न हो, लेकिन उनमें अपने युग का सत्य है, जिसमें सामयिकता की रक्षा करते हुए मानवता की पृष्ठभूमि को स्थायित्व देने का प्रयास किया है। अपने लेखन की प्रासंगिकता को उन्होंने बनाये रखा है और अल्पकालीन लेखन समय की संपूर्णता को कहानियों के माध्यम से व्यक्त किया। यदि कहानी के परम्परागत चौखटों की बात करें तो रांगेय राघव ने उन्हें तोड़कर रख दिया और केवल मानव-सभ्यता के जीवन्त पक्ष को बिना किसी आग्रह के बनाये रखा, जो विलक्षण है। मानवता के विषाद पक्ष को रखने के बहाने रांगेय राघव ने नैतिक मूल्यों के पतन का बिम्ब रखते हुए भारतीय समाज को आने वाले भीषण समय की आहत से भी परिचय करवा दिया था, जिसका चित्र न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में पनप रहे विद्वेष के रूप में उपस्थित है।  

संदर्भ-
1. अशोक शास्त्री (सं.), प्रतिनिधि कहानियाँः रांगेय राघव, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2,  सं. 2017, पृ.17
2. मधुरेश, विनिबंध रांगेय राघव, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं.1987, पृ.60
3. अशोक शास्त्री (सं.), प्रतिनिधि कहानियाँः रांगेय राघव, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, सं. 2017, पृ.90
4. पूर्ववत्, पृ.29
5. पूर्ववत्, पृ.138
6. रांगेय राघव, इन्सान पैदा हुआ, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली-66, सं.1957, पृ.85
7. रांगेय राघव, पाँच गधे, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली-66, सं.1960, पृ.166
8. मधुरेश, विनिबंध रांगेय राघव, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं.1987, पृ. 63
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