हल्दीघाटी:राष्ट्रीय गौरव का आख्यान

हल्दीघाटी ; राष्ट्रीय गौरव का आख्यान
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साहित्य परिक्रमा अक्टूबर-दिसंबर, 2022 अंक में प्रकाशित

                           
 मेवाड़ धरा के गौरव, राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक एवं मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले शूरवीर महाराणा प्रताप का व्यक्तित्व सदैव प्रेरणास्पद रहा है। श्याम नारायण पांडेय रचित खंडकाव्य ‘हल्दीघाटी’ प्रताप के जीवन-चरित्र को अमरत्व प्रदान करने वाली कृति है। हल्दीघाटी नामकरण राजस्थान की वीरभूमि के उस स्थल का नाम है, जहाँ राणा प्रताप और अकबर के मध्य भीषण संग्राम हुआ, परन्तु अकबर की मेवाड़ विजय की कामना अधूरी रही। इस कृति पर पांडेय जी को प्रतिष्ठित ‘देब’ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। अठारह सर्गों में रचित यह रचना वीर रस की ख्यातनाम रचना है। श्याम नारायण पांडेय ने अपनी ओजस्वी प्रस्तुति से इस कृति को जनव्यापी बना दिया।

                           रचना का आरंभ प्रताप और शक्तिसिंह के मध्य आखेट के कारण बाल सुलभ विवाद का चित्रण है, जिसकी परिणति राजपुरोहित की मृत्यु के रूप में होती है। तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य के साथ अकबर की साम्राज्यवादी लालसा और मेवाड़ विजय का स्वप्न कथा की पृष्ठभूमि है। उसी क्रम में मानसिंह का मेवाड़ आगमन, अतिथि के समान आदर परन्तु प्रताप के आत्म स्वाभिमान समक्ष मानसिंह को खाली हाथ लौटना पड़ा, यह प्रतिशोध आगामी घटनाओं का सूचक है। प्रताप द्वारा भीलों की सहायता से सैन्य-गठन और चंद सैनिकों के उत्साह के समक्ष मुगल सेना में प्रताप के नाम से भयानक खौफ़ का चित्रण रोमांच पैदा करता है। हल्दीघाटी में भयानक रण, प्रताप का अप्रतिम शौर्य और चेतक का अद्भुत कौशल युद्ध का दृश्य उपस्थित कर देता है। खंडकाव्य में भामाशाह की दानवीरता, मेवाड़ की शान आदि का भी चित्रण हुआ है। संपूर्ण रचना वस्तुवर्णन, प्रकृति चित्रण, मानवीय वृत्तियों का रेखांकन और वीर रस के परिपाक की दृष्टि से महाकाव्यात्मक गरिमा से ओतप्रोत है, साथ ही ओजगुण युक्त रसात्मक शब्दावली से बिम्ब-विधान का सम्यक चित्रण अद्वितीय है। 
                          ‘हल्दीघाटी’ के नायक राणाप्रताप हैं और प्रतिनायक हैं- अकबर । प्रताप राजपूताना की छोटी-सी रियासत के राणा हैं, जबकि अकबर मुगल साम्राज्य का सम्राट। उसने संपूर्ण भारत पर एकाधिकार कर लिया, परन्तु प्रताप को झुकाने में विफल रहा। यह दंश उसे रह-रहकर सालता रहता। रत्नजटित महलों में अकबर की मनःदशा का चित्रण कवि ने इस प्रकार किया-


स्वर्णिम घर में शीत प्रकाश, जलते थे मणियों के दीप।
धोते आँसू-जल से चरण, देश-देश के सकल महीप ।
तो  भी कहता  था सुल्तान, पूरा  कब होगा अरमान ।
कब  मेवाड़ मिलेगा  आन, राणा  का होना अपमान ।।


                  दूसरी तरफ राणा प्रताप तनिक भी विचलित नहीं और अकबर से किसी प्रकार का भय नहीं। अरावली की उपत्यकाओं में अपना दरबार सजाए हुए हैं । उन्हें पता है कि मानसिंह की अवज्ञा से अब रण अनिवार्य है, परन्तु मातृभूमि की अस्मिता अक्षुण्ण रहे, उसकी रक्षा का प्रण अटल है। अपनी छोटी सी सेना, भील सरदारों के प्रण और स्वाभिमानी गौरव के साथ भावी रण की तैयारियाँ वीरोचित गरिमा के साथ प्रस्तुत हुआ है-

शुचि  सजी शिला  पर राणा भी, बैठा  अहि-सा फुंकार लिए।
फर-फर  झंडा  था  फहर  रहा,  भावी  रण का  हुंकार लिए।
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तरकस  में  कस कस तीर भरे, कंधों  पर कठिन कमान लिए।
सरदार  भील भी  बैठ गए, झुक-झुक रण  के अरमान  लिए।


                प्रताप की प्रतिज्ञा कि उनके जीवित रहते हुए मेवाड़ कभी भी पराधीन नहीं होगा। इसके लिए विशाल मुगल सेना से भिड़ने का अदम्य साहस अकल्पनीय है। राणा का महान् चरित्र तत्कालीन वातावरण में उनके अटल प्रण के साथ प्रकट होकर अथाह ऊर्जा का संचार करता है। माँ भवानी का आशीष लेकर जब हल्दीघाटी के मैदान में भीषण रण हुआ, तब मानसिंह के पैर उखड़ गए। राणा की सेना के अदम्य उत्साह से भीषण प्रहार हुआ, मुगल सेना में हाहाकार मच गया। युद्ध की भीषणता का अनुमान कवि की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- 

हयरुण्ड गिरे, गजमुण्ड गिरे, कट-कट अवनि पर शुण्ड गिरे।
लड़ते-लड़ते  अरिझुण्ड गिरे, भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे।
क्षण महाप्रलय की बिजली-सी, तलवार हाथ की तड़प-तड़प।
हय-गज-रथ, पैदल भगा-भगा, लेती थी बैरी वीर हड़प।।


             हल्दीघाटी का युद्ध यदि राणा प्रताप के तेज को कालजयी बनाता है तो स्वामिभक्त चेतक के अद्भुत रण-कौशल को भी अमर कर देता है। चेतक का शौर्य कवि की दृष्टि में विस्मयकारी था। रण-क्षेत्र में स्वामी के आदेश पर चौकड़िया भरकर अरि मस्तक को रौंद रहा था। हवा से बातें करने वाला चेतक दुश्मनों पर कहर बनकर टूट रहा था, कवि ने चेतक के कौशल को इन शब्दों में प्रकट किया है-

रणबीच चौकड़ी भर-भरकर, चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से, हवा का पड़ गया पाला था।
गिरता न कभी चेतक तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था।
वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था।


                इस खंडकाव्य में राजपूती आन-बान का और मेवाडी मान का शानदार चित्रण हुआ है। अकबर का संदेश लेकर अब मानसिंह आया, तब प्रताप को पता था कि वह छली है, उसके संदेश में केवल मिथ्याभिमान है, परन्तु आज वह अतिथि है। अतिथि का स्वागत मेवाड़ की सनातन परम्परा से ही होना चाहिए। वे अमरसिंह से कहते हैं, कि मानसिंह का मेवाड़ की धरती पर यथोचित गरिमा से सम्मान करो। अमरसिंह ने भी वैसी ही तैयारियाँ की। भोजन की थाली और उसमें सज्जित व्यंजन का रसात्मक वर्णन अवलोकनीय है-

घी से सनी सजी रोटी थी, रत्नों के बरतन में।
शाक खीर नमकीन मधुर, चटनी चमचम कंचन में।
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तरह-तरह के खाद्य-कलित, चांदी के नये कटोरे।
भरे खराये घी से देखे, नीलम के नव खोरे।

                   
                   वीर रसात्मक इस खंडकाव्य में प्रकृति का मनोरम चित्रण भी हुआ है। वन में राणा-प्रताप जब युद्ध की तैयारियों में व्यस्त थे, तब उसी अनुरूप कवि ने वन की निर्जनता, पेड़ों की सघनता, पेड़ों के झुरमुट में सूर्य की रश्मि-रेखा और उसके साथ दृश्य-विधान का मनोहारी अंकन द्रष्टव्य है-

तरु-वेलि-लता-मय, पर्वत पर निर्जन वन था।
निशि बसती थी झुरमुट में, वह इतना घोर सघन था।
पत्तों से छन-छनकर भी, आती दिनकर की लेखा।
वह भूतल पर बनती थी, पतली-सी स्वर्णिम रेखा।


                 प्रस्तुत कृति में शक्तिसिंह का पश्चात्ताप और प्रताप के प्रति भ्रातृत्व का उमड़ता प्यार कारुणिक दृश्य उपस्थित करता है। शक्तिसिंह की आँखों में जब असीम अश्रुधारा बहने लगती है, तब प्रताप का हृदय द्रवित होकर ममत्व से भर जाता है। वे विगत घटनाक्रम को भूल भाई को गले लगा लेते हैं, ऐसे क्षण प्रकृति भी मुग्ध होती है और पेड़ फूल बरसाने लगते हैं। कवि की पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

उसे उठाकर लेकर गोद, गले लगाया सजल-समोद।
मिलता था जो रज में प्रेम, किया उसे सुरभित सामोद।।
लेकर वन्य-कुसुम की धूल, बही हवा मंधर अनुकूल।
दोनों के सिर पर अविराम, पेड़ों ने बरसाये फूल।।


                हल्दीघाटी की वर्णन-वैभव चामत्कारिक है। श्रोता अथवा पाठक प्रत्येक पंक्ति पर रोमांचित होता है। उसे साक्षात् मेवाड़ी धरा के गौरव का आभास होता है। वस्तु, प्रकृति, चरित्र, युद्ध, शौर्य आदि का वर्णन बिम्बात्मक है। यह बिम्बविधान दृश्यात्मक एवं रसात्मक है। वीर, रौद्र, भयानक एवं करुण रस की व्यंजना प्रसाद गुण में कर कवि ने इसे जन-जन का कंठहार बना दिया। पात्र एवं घटना के अनुकूल शब्द-चयन, शब्दों में आंतरिक गुंजन और उसके साथ आनुप्रासिक तारतम्य अद्भुत है। कवि का भावात्मक लगाव हृदय के मस्तक पर चढ़कर प्रकट हुआ है। अतः यह रचना हमारी आन-बान-शान की प्रतीक बनकर रगों में दौड रही है। कवि अपनी श्रद्धा इस धरती के प्रति प्रकट करता है-

यह एकलिंग का आसन है।
इस पर न किसी का शासन है।
नित सिहक रहा कमलासन है।
यह सिंहासन, सिंहासन है।।

जगद्गुरु शंकराचार्य उपन्यास का शैलीगत वैशिष्ट्य

जगद्गुरु शंकराचार्य उपन्यास का शैलीगत वैशिष्ट्य 

राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा प्रकाशित 'मधुमती'पत्रिका के सितंबर,2017 के अंक में ...

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                        एक चिन्तक सामान्य मनुष्य की अपेक्षा अधिक भावुक और संवेदनशील होता है। वह अपने अनुभव को अपने तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि दूसरों तक अपने भावों को पहुँचाकर प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इस तरह उसके विचार सर्वव्यापी हो जाते हैं। जितनी अनुभूति की भाव-प्रवणता होगी, अभिव्यक्ति पक्ष उतना ही प्रखर होगा। वस्तुतः अभिव्यक्ति पक्ष की सबलता सत्य की अभिव्यंजना पर आधारित होती है, जो अन्तर्जगत को प्रकट करती है। इसका माध्यम है-शैली। 

                    शैली मूलतः लातानी शब्द ‘स्तिलुस’ से बना है, जिसका अर्थ है- कलम। उसी से अर्थ का विस्तार हुआ है- कलम की प्रयोग विधि, लेखन की विधि, अभिव्यक्ति का तरीका आदि। इसके अंतर्गत लेखक के व्यक्तित्व की प्रधानता के साथ वर्णन की प्रविधियाँ, भाषिक सौन्दर्य, शिल्पगत सजीवता एवं अभिव्यक्तिपरक मौलिकता का सन्निवेश रहता है। दीनदयाल उपाध्याय रचित उपन्यास ‘‘जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य’’ इस दृष्टि से विशिष्ट कृति है। तरुणों के मन को भारतीय गौरव एवं आदर्श जीवन-चरित से परिचित करवाने का अभीष्ट इस उपन्यास का रहा है, किंतु लेखकीय कौशल से मुग्धकारी वर्णन ने उपन्यास को कलात्मक रूप प्रदान कर दिया है। 


                  ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ उपन्यास कुल अठारह अध्यायों में विभक्त है, जिसमें शंकराचार्य की बाल्यावस्था, ध्येय, पथ, शिक्षा, दीक्षा, दिग्विजय यात्रा, राष्ट्रीयता का प्रसार तथा ध्येय सिद्धि तक की विविध घटनाओं का मर्मस्पर्शी वर्णन है। घटनाओं के वर्णन में जिन शैलियों का प्रयोग हुआ है, उनमें प्रमुख हैं- सरस काव्यात्मक शैली, अलंकृत बौद्धिक शैली, सम्बोधन शैली, वार्तालाप शैली, उपदेशात्मक शैली, प्रतीकात्मक शैली इत्यादि। उपन्यास की वर्णन शैली में भाषिक सौन्दर्य, लाक्षणिक शब्दावली और बिम्बात्मक चित्रण का महत्वपूर्ण योग है। इस दृष्टि से शैलीगत वैशिष्ट्य का विवेचन प्रासंगिक है। 


                बाह्य रूपात्मक शैलियों में वर्णन और विश्लेषण को अधिक महत्व दिया जाता है। इसके अंतर्गत सरस काव्यात्मक विषय एवं प्रवाह के अनुरूप दोनों का प्रयोग हुआ है। आचार्य शंकर ने जब तक्षशिला से कश्मीर प्रस्थान किया, तब कश्मीर की प्रकृति का मानवीकृत रूप शंकर के मार्ग में जिस तरह उपस्थित होकर भाव-विभोर करता है, वह ‘सरस काव्यात्मक शैली’ का उदाहरण द्रष्टव्य है- ‘‘आचार्य शंकर शारदा का ध्यान किए हुए मंदिर की ओर बढते जाते थे। प्रकृति नटी ने साज-श्ाृंगार करके उनको विमोहित करना चाहाः प्रस्फुटित पुरुषों ने हँसकर उनका स्वागत किया और दो बातें करनी चाही, कलियों ने चटककर धीरे से कान में अपना पे*मभरा राग सुनाया और कर स्पर्श की लालसा प्रकट की, अप्सराएँ सरोवरों में अपना स्वरूप देखने के बहाने उतर आईं, गंधर्व पक्षियों के स्वरों में गाने लगे, किंतु कोई भी आचार्य शंकर को रोक नहीं पाया।’’।१ 


               नर्मदा के भीषण प्रकोप से त्रस्त मानवता की सेवा के लिए आचार्य शंकर का मनोभाव ‘दीन’ में सर्वात्मा की तलाश कर रहा था। यह वर्णन लेखक ने ‘काव्यात्मक शैली’ में किया- ‘‘आर्त की पुकार में जिसको भगवान की वाणी नहीं सुनाई देती; उसके कान भगवान के शांत स्वर को नहीं सुन सकते, वह सर्वात्मा का क्या दर्शन कर सकेगा? मैं ढूँढता तुझे था आकाश और वन में/तू खोजता मुझे था किसी दीन के वतन में’’।२ इस तरह वर्णन में काव्यात्मक गरिमा का पुट दिखाई देता है। 


                उपन्यासकार प्रखर दार्शनिक चिंतक रहे हैं और उपन्यास भी शंकराचार्य के जीवन-चरित पर आधारित है। अतः दार्शनिक विचारों का वर्णन स्वाभाविक ही है। उपन्यास के अधिकांश स्थलों पर इन विचारों की प्रस्तुति के लिए लेखक ने ‘अलंकृत बौद्धिक शैली’ का प्रयोग किया है। इस तरह के वर्णन में दार्शनिक गूढता को भाषायी-प्रगाढता और अलंकृत शब्दावली से चमत्कार उत्पन्न कर दिया जाता है। ‘अद्वैत’ दृष्टि को व्यक्त करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं- ‘‘संसार के समान गंगा का जल सामने से भागता जा रहा था, प्रतिक्षण परिवर्तनशील किंतु अभिन्न, कितना अनित्य किंतु शांत! अनेक जलकणों का समूह सामने आता है, क्षण भर खेलता है, जिनका पहले जलकणों से भिन्न अस्तित्व है, किंतु जीवन में समानता है..... यही है भेद में अभेद, भिन्नता में अभिन्नता अनेकत्व में एकत्व....।’’३ 


                    मंडन मिश्र और शंकराचार्य के मध्य शास्त्रार्थ का दृश्य वर्णन, मध्यस्थ में मंडन मिश्र की पत्नी भारती का आसन; अलंकृत शैली में उपन्यासकार लिखते हैं- ‘‘एक ओर तो भगवान शंकर की जटाओं से स्रवित गंगा की भाँति शंकराचार्य के मुख से शुद्ध ज्ञान-मार्ग की धवल गंगा-धारा का प्रवाह था तो दूसरी ओर तमाम तरु-पुंज तमाच्छन्न तरणि-तनुजा के समान प्राची के सूर्य, यज्ञयागादि के पुरस्कर्ता, प्रकांड पंडित तथा प्रचंड कर्मकांडी मंडन मिश्र की धूमिल वाणी की नील यमुना-धारा प्रवाहित होती थी। इन दोनों के बीच में सरस्वती का अवतार भारती तो उपस्थित थी ही।’’४ आनुप्रासिक तत्सम शब्दावली एवं तीर्थराज प्रयाग का बिम्ब उपस्थित करने का सार्थक प्रयास यहाँ हुआ है। 

                  अन्तःरूपात्मक शैली में रचनाकार अपने आन्तरिक ह्रदय की भाषा में चिन्तन को अभिव्यक्त करता है। इस हेतु वह सम्बोधन, वार्तालाप, तर्क, आत्मकथ्य, उपदेश, व्यंग्य शैलियों का प्रयोग करता है। इस उपन्यास में इन शैलीयों का यत्र-तत्र प्रयोग हुआ है। 

               सम्बोधन शैली में नायक अथवा पात्र श्रोता को सम्बोधित करके अपने विचार प्रकट करता है, यह परस्पर तादात्म्य की दृष्टि से उपयुक्त शैली है। दिग्विजय यात्रा के समय शंकराचार्य ने एकत्र समुदाय को संबोधित किया- ‘‘बंधुवर्ग! आज हममें से प्रत्येक अपने तत्व सिद्धांतों का सर्वत्र प्रसार करने को उत्सुक है। पिछले १००० वर्षो में अपने धर्म की स्थिति विचित्र हो गई है। उसकी जडों को अनेक प्रकार से खोखली करने का प्रत्यन किया गया है और उसने अपनी संपूर्ण शक्ति लगाकर अपने ऊपर के आघातों का रोका है।’’५ इसी प्रकार जब उदंक ने कुमारिल भट्ट के बारे में पूछा तो शंकराचार्य ने इसी शैली में कहा-‘‘अरे कुमारिल को नहीं जानते, उदंक?.....हम लोगों के मार्ग से जिस महापुरुष ने समस्त बाधाओं का दूर किया, हम उसको न जानें, यह हमारा दुर्भाग्य ही है उंदक!’’६ 

                 कथा को गति प्रदान करने के लिए लेखक वार्तालाप शैली का प्रयोग करता है। इसमें रचनाकार दो पात्रों के मध्य हुए संवाद को प्रस्तुत करता है। शंकर और माता आर्यंबा के बीच वार्तालाप का दृश्य अवलोकनीय है-‘‘ये विद्वत्ता की बातें मैं क्या जानूँ शंकर! पर बता मेरा संस्कार कौन करेगा? सब पितरों को पानी कौन देगा?’’......‘‘मैं करुँगा संस्कार माँ, मैं करुँगा और मैं दूँगा अपने पितरों को पानी।’’ ‘‘और तेरे बाद?’’ ‘‘मेरे बाद सब हिन्दू समाज है, वह तेरा नाम लगा, तेरा गुण गाएगा, यही है असली श्राद्ध।’’७ 

                बौद्ध भिक्षुओं और शंकराचार्य के मध्य संवाद का यह दृश्य भी गतिशील है- ‘‘क्या कहा, हम बौद्ध नहीं, हिन्दू हैं।’’ एकाएक कुछ भिक्षु बोल उठे। ‘‘हाँ, आप हिन्दू हैं और बौद्ध भी, आप हिन्दू हैं और वैष्णव भी, आप हिन्दू हैं और बौद्ध भी, आप सब कुछ हैं।’’ शंकर स्वामी ने कहा।८ 

                तर्क शैली में भी संवाद का आश्रय होता है, परन्तु इसमें वक्ता अपने मंतव्य को ठोस तर्कों के आधार पर प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत उपन्यास में मंडन मिश्र की पत्नी भारती अपने स्त्रीत्व का अभिमान प्रकट करती हुई तर्क पूर्ण प्रश्न करती है- ‘‘स्त्री हूँ तो क्या हुआ आचार्य? स्त्री के क्या विचार नहीं होते? उसके मन में शंका-कुशंकाओं की आँधी नहीं उठ सकती?’’९ एक अन्य दृश्य में चांडाल का शंकराचार्य से प्रतिप्रश्न दृष्टव्य है- ‘‘सर्वात्मैक्य तथा अंद्वैत की बातें करना तथा व्यवहार में भेदभाव दिखलाना यह कौनसी रीति है, आचार्य? यह आडम्बर कैसा? क्या मैं समझूँ कि आपका संन्यास, दंड और कमंडलु सब ढोंग है। और फिर आप किसको दूर हटने को कह रहे है’’ शरीर को? वह तो नश्वर है। मेरे और आफ शरीर में क्या अंतर है?’’१० 

                 आत्मकथात्मक शैली में किसी घटनाक्रम से प्रेरित होकर स्वंय के आत्मचिंतन को व्यक्त किया जाता है। मगध में मंडन मिश्र के घर का पता जब दासी के संस्कृत-श्लोक से प्राप्त होता है तो आचार्य शंकर चिंतन करते हैं-‘‘जिसके द्वार के पंजरस्थ तोता और मैना इस प्रकार संस्कृत में चर्चा करते हों, वहाँ अवश्य ही दिन भर तत्त्व चर्चा ही रहती होगी, जिसके कारण पक्षी भी उन शब्दों तथा वाक्य समूहों का वैसा ही उच्चारण करने लग गए- कितना उद्भट विद्वान हैं, मंडन मिश्र!’’११ आत्मकथ्य के समान ही अन्तर्द्वन्द्व शैली में विचार प्रकट होते हैं, परन्तु यहाँ मन में उठने वाले परस्पर विरोधी भावों के उद्वेलन को प्रस्तुत किया जाता है, ऐसी स्थिति में पात्र स्वयं उलझन में रहता है। जब शंकराचार्य गुरु से आज्ञा लेकर यात्रा की तैयारी कर रहे थे, तब उनके भावों का उद्वेलन इस प्रकार वर्णित हुआ-‘‘अनिष्ट की आशंका से ह्रदय धडकने लगा।...अगि* शर्मा के आने का और कोई कारण नहीं हो सकता। कालटी के अनेक चित्र एक-एक करके उनकी आँखों के सामने से निकल गए।’’१२ 

               प्रतिपक्ष पर व्यंग्य से प्रहार कर अपने पक्ष को प्रबल करने हेतु व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया जाता है। इसके माध्यम से विसंगतियों पर प्रहार होता है। भारती और शंकराचार्य के मध्य संवाद के समय स्त्री के साथ शास्त्रार्थ विषय पर भारती ने शंकराचार्य से व्यंग्यात्मक स्वर में कहा- ‘‘आप प्रचलित पद्धति की दुहाई दें, यह तो बडे आश्चर्य की बात है, आचार्य!.... और आचार्य, स्त्रियों के साथ क्या शास्त्रार्थ नहीं हुए हैं? गार्गी और याज्ञवल्क्य का संवाद आपको ज्ञात नहीं है? गार्गी क्या पुरुष थी?’’१३ 

             इस प्रकार उपन्यासकार ने विविध वर्णन शैलियों के माध्यम से उपन्यास को रोचक, कमनीय और प्रवाहपूर्ण बना दिया है। प्रसंगानुसार शैली प्रयोग से दृश्य वर्णन बिम्बमय हो गया है, जिससे पाठक एकाग्रचित्त होकर द्रवीभूत हो जाता है। इसे प्रभावी रूप देने के लिए उन्होंने परिवेश अनुकूल दृश्य विधान, पात्र-योजना एवं भासिक पक्ष का तदनुसार निर्वाह किया, जिससे उपन्यास का कलेवर बहुआयामी हो गया। शैलीगत वैशिष्ट्य की दृष्टि से उक्त उपन्यास मनोहरता, कलाप्रियता और महान् गरिमा का विधान करता प्रतीत 
होता है।

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