कबीर का साधना मार्ग

कबीर की साधना में ज्ञान, भक्ति और योग का अद्भुत समन्वय है। यह उपनिषदों में व्यक्त ज्ञान, नाद-अनुसंधान, योग और प्रभु की अनन्य भक्ति से परिपूर्ण है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह कथन उल्लेखनीय है- “कबीर की वाणी वह लता है जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पड़ने से अंकुरित हुई है।” आशय यह है कि कबीर का साधना मार्ग योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पड़ने तथा ज्ञान के जल से सींचने से पल्लवित हुआ है।
अतः कबीर का साधना मार्ग तीन वर्गों में विभक्त है- 1.ज्ञान मार्ग 2. योग मार्ग 3. भक्ति मार्ग। इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है-
1.ज्ञान मार्ग 
भारतीय आध्यात्मिक चिंतन परम्परा में ज्ञान को बहुत महत्त्व दिया गया है। ज्ञान का अर्थ है- अद्वैत की अनुभूति, आत्मा के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति और उसमें अवस्थित रहना। कबीर ने भी अपनी आध्यात्मिक साधना में ज्ञान को महत्त्व दिया। साधक को ज्ञान प्राप्त होने पर आत्मा-परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है। आत्मा के परमात्मा बनने का मर्म शब्दातीत है। ज्ञान प्राप्ति पर ईश्वर का परिचय कबीर ने निम्न रूपक के माध्यम से किया है-
पाणीं ही तैं हिम भया, हिम ह्वै गया बिलाइ।
जो कुछ था सोइ भया, अब कछू कह्या न जाइ।।

कबीर शास्त्रीय ज्ञान का खंडन करके आत्म-ज्ञान की स्थापना करते हैं। उनकी दृष्टि में आत्मज्ञान ही ईश्वर भक्ति के निकट ले जाने का साधन है। ज्ञान इसलिए आवश्यक है कि संसार की नश्वरता और मानसिक संस्कारों का ज्ञान हो सके। कबीर के साधना मार्ग में ज्ञान के स्वरूप का वर्णन इस पद में विस्तार से किया है-
संतौं भाई आई ग्यान की आँधी रे।
भ्रम की टाटी सबै उडाँणी, माया रहै न बाँधी॥
हिति चित की द्वै थूँनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा।
त्रिस्नाँ छाँति परि घर ऊपरि, कुबधि का भाँडाँ फूटा॥
जोग जुगति करि संतौं बाँधी, निरचू चुवै न पाँणी॥
कूड़ कपट काया का निकस्या,हरि की गति जब जाँणी॥
आँधी पीछै जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ।
कहै कबीर माँन के प्रगटे उदित भया तम षींनाँ॥

कबीर के मतानुसार ज्ञान की प्राप्ति होने पर आत्मा मोह की निद्रा से जाग जाती है। उस समय जब परम तत्त्व का दैदीप्यमान स्वरूप दिखाई देता है, वह अवर्णनीय है। वाणी के माध्यम से उसका अनुमान लगाना असंभव है। उसका सौन्दर्य अनिर्वचनीय है। जो उसका दर्शन करता है, वही उसे जान सकता है-
परब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान।
कहिबैं कूँ सोभा नहीं, देख्यां ही परवान।।

ज्ञानमार्गी साधना में आत्मा और परमात्मा के एकाकार होने का कबीर ने कई जगह वर्णन किया है। वे कहते हैं कि जब मैंने जब ज्ञान रूपी प्रकाश से वस्तुस्थिति को देखा, तो मेरा संपूर्ण भ्रम रूपी अंधकार नष्ट हो गया। अहंकार और अज्ञानता के कारण मैं अब तक परमात्मा से दूर रहा, लेकिन जैसे ही यह विलीन हुआ, मुझे परमात्मा का साक्षात्कार हो गया-
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं।
सब अंधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या मांही।।

कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान को अस्वीकार कर अनुभूति परक ज्ञान को महत्त्व दिया। वे यह मानते थे कि शास्त्र ज्ञान मनुष्य को भ्रमित करते हैं-
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय।।

कबीर के विपुल साहित्य में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि उनकी अद्वैत अनुभूति का आधार उपनिषद अथवा भारतीय चिंतन परम्परा में वर्णित ज्ञान था। कबीर पर शंकर के अद्वैत का प्रभाव है, लेकिन उपनिषद के तथ्यों से भी पूर्णतः प्रभावित हैं। वृहदारण्यक उपनिषद में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का प्रभाव उनके पदों में दिखाई देता है-
हरि मरिहैं तो हमहु मरिहैं,
हरि न मरैं हम काहे कू मरिहैं।।

2. योग मार्ग
कबीर की साधना में योग भी परमात्मा को प्राप्त करने का एक मार्ग था। यह योग मार्ग हठयोगियों और नाथ पंथियों के समान कष्ट साध्य नहीं था। इसमें आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध आदि पर जोर नहीं था। राजयोगियों के समान संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात समाधि का स्थान भी कबीर के योग में नहीं था और न ही शृंगी, चिमटा आदि बाह्य  उपकरणों की आवश्यकता भी। कबीर ने सिद्धि इत्यादि के प्रदर्शन और बाह्य आडम्बरों से दूर रहने को ही श्रेयस्कर माना। उनके योग में जो आदर्श स्थिति थी, उसका वर्णन करते हुए उन्होंने कहा-
अवधू जोगी जग थैं न्यारा; 
मुद्रा निरति सुरति करि सींगी, नाद न षंडै धारा॥
बसै गगन मैं दुनीं न देखै, चेतनि चौकी बैठा।
चढ़ि अकास आसण नहीं छाड़ै, पीवै महा रस मीठा॥
परगट कंथाँ माहैं जोगी दिल मैं दरपन जीवै।
सहँस इकीस छसै धागा, निहचल नाकै पीवै॥
ब्रह्म अगनि मैं काया जारै, त्रिकुटी संगम जागै।
कहै कबीर सोई जोगेश्वर, सहज सुंनि ल्यौ लागौ॥

इस पद से स्पष्ट होता है कि कबीर बाह्य उपकरणों यथा- शारीरिक आसन, मुद्रा, प्राणायाम, धूनी लगाना, तीर्थ व्रत और कृत्रिम ध्यान इत्यादि के पक्ष में नहीं थे। इन सबका योग में आध्यात्मिक अर्थ था। उन्होंने योग-विधि का निरूपण करते हुए योग को स्पष्ट किया, जिसमें सुरति-निरति, अनाहत नाद, अजपा-जाप, मन-उनमन, षट चंक्र, सहस्रार चक्र, कुंडलिनी, सहज समाधि आदि शब्दावली प्रयुक्त हुई है। इन शब्दों के विवेचन से कबीर के योग मार्ग को समझा जा सकता है-
सुरति-निरति :
कबीर के योग को समझने के लिए सुरति-निरति शब्द को समझना आवश्यक है। इस शब्द पर अनेक मत सामने आए हैं किन्तु कबीर के पदों से इसका तात्पर्य स्पष्ट हो जाता है। ‘सुरति’ शब्द का अर्थ है- “किसी पदार्थ में इतने रस, इतने आनंद का अनुभव करना कि चित्त की चंचलता, चित्त का क्षोम शांत हो जाय।” आशय यह है कि चित्तवृति सांसारिक विषयों की ओर प्रवाहित रहती है, जब वह ईश्वरोन्मुख हो जाती है तो उसे ‘सुरति’ कहते हैं। 
‘निरति’ संपूर्ण तन्मयता की स्थिति है। पं.हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार समस्त बाह्य भ्रम-जाल से निरत होकर अन्तर्मुख होने की प्रवृत्ति ‘निरति’ है। निरति का अर्थ है- ‘पूर्ण रूप से रति’। ‘निरति’ ‘सुरति’ की चरमावस्था है, सुरति की पूर्णावस्था है, निरालम्ब है, सहज स्थिति है। गोरखबानी में सुरति को ‘साधन’ और निरति को ‘सिद्धि’ कहा गया है।
कबीर ने सुरति-निरति का शब्द का प्रयोग इसी भाव से करते हुए कहा-
सुरति समानी निरति में, निरति रही निरधार।
सुरति निरति परचा भया, तब खुले स्यंभ दुआर।।

साधक चित्तवृत्ति को अन्तर्मुखी करके निरति में लीन कर सकता है। उसके बाद सिंहद्वारा खुलता है और शिवत्व की प्राप्ति होती है। कबीर ने इसकी पुष्टि करते हुए शून्य में समाने की बात कही है-
उलटे पवन चक्र षट बेधा, सुन्नि सुरति सौ लागि।
सुन्नहि सुरति समानिया, कांसो कहिए जागि।।

2. अनाहतनाद :
संसार में कानों के माध्यम से जो नाद सुनाई पड़ता है, वह ‘आहतनाद’ है। यह नाद ध्वनि-अवयवों से टकराने से उत्पन्न होता है। जब तक साधक की वृत्ति बहिर्मुखी होती है, तब तक वह  आहतनाद ही सुन सकता है, किन्तु जब उसकी वृत्ति अन्तर्मुखी हो जाती है तो उसे ‘अनाहतनाद’ सुनाई पड़ता है। योग साधना की शब्दावली में यह ‘नादानुसंधान’ कहलाता है। 
चित्तवृत्ति के अन्तर्मुखी होने पर आरंभ में जो अन्तर्लोक में   अनेक प्रकार की आकर्षक ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं, वे वास्तविक अनाहत ध्वनियाँ नहीं हैं। वे साधक का ध्यान विचलित करने के लिए उसे अपनी ओर आकृष्ट करती हैं। इनके आकर्षण से अपने को मुक्त करके योगी साधक अपना ध्यान हृदय के अन्तर्तम प्रदेश में लीन करता है। अनाहत चक्र ही अनाहतनाद का केन्द्र है। अपनी अन्तर्मुखी चेतना को अनाहत चक्र में लीन करके योगी उस ‘शब्द ब्रह्म’ का अनुभव करता है, जो समग्र विश्व में अखण्ड रूप में व्याप्त है। 
कबीर के अनुसार ज्ञान की तरंग में मग्न होने पर सांसारिक तृष्णा का शमन होना आवश्यक है। उसके पश्चात् ही लोकातीत अनाहत शब्द में साधक का मन लीन होता है-
अवधू ग्यान लहरि धुनि मांडी रे।
सबद अतीत अनाहत राता, इहि विधि त्रिष्णा बाड़ी।।

3. इड़ा-पिंगला-सुषुम्ना :
मानव शरीर के भीतर बहुत-सी सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं, जिनमें वायु का प्रसरण होता है। ये लगभग 72000 की संख्या में हैं। इनमें से तीन नाड़ियाँ मुख्य हैं- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। इड़ा का दूसरा नाम है सूर्य और पिंगला का चन्द्र। सुषुम्ना अग्नि की प्रतीक है। 
इड़ा-पिंगला नाड़ियाँ दाहिनी ओर से बांयी ओर होती हुई मेरुदण्ड से ऊपर की ओर जाकर दोनों भौंहों के मध्य मिलती हैं। इनका सूर्य और चन्द्र नाम प्रतीकात्मक है। इड़ा प्राणवायु की वाहिनी है जबकि पिंगला अपान वायु की। प्राण अपान पर अधिकार होने से योगी कालातीत हो जाता है। 
सुषुम्ना नाड़ी मेरुदण्ड के भीतर से ऊपर की ओर जाती है और दोनों भौहों के मध्य मिलती है। तीनों ही नाड़ियों का संगम स्थल ‘त्रिकुटी’ कहलाता है। कबीर ने इसका वर्णन करते हुए लिखा-
झीनी झीनी बीनी चदरिया।
काहे कै ताना काहे कै भरनी,
कौन तार से बीनी चदरिया।।
इड़-पिंगला ताना भरनी,
सुषमन तार से बीनी चदरिया।।

4. षटचक्र :
योग-साधना में षट चक्रों की स्थिति का वर्णन आता है। सुषुम्ना के मार्ग में मुख्यतः छह चक्र हैं। सबसे नीचे ‘मूलाधार चक्र’ है, जो गुदा और लिंग के मध्य स्थित है। दूसरा ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ है, जो लिंगमूल में स्थित है। तीसरा ‘मणिपुर चक्र’ नाभि मूल में स्थित है। चौथा ‘अनाहत चक्र’ हृदय के पास है। पाँचवाँ ‘विशुद्ध चक्र’ कंठ में स्थित है। छठा ‘आज्ञा चक्र’ दोनों भौहों के मध्य स्थित है। इन चक्रों में ‘दल’ होते हैं, जिन्हें ‘कमल’ भी कहा जाता है। 
कबीर ने कहा कि साधक शिकारी जब छह चक्रों का भेदन कर लेता है तो ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित हो जाती है और विषय-विकारों का नाश हो जाता है- 
षट् चक्र कँवल बेधा, जारि उजारा कीन्हां।
काम क्रोध लोभ मोह, हाँकि स्यावज दीन्हां।।

5. सहस्रार चक्र :
षटचक्र शरीर के भीतर होते हैं परन्तु एक चक्र शून्य में अवस्थित है, वह ‘सहस्रार चक्र’ है। कबीर ने इसे ‘गगन मण्डल’ कहा है। इसे शून्यमण्डल, ब्रह्मरंध्र, निर्वाणचक्र इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। इसमें शक्ति की सहस्र किरणें हैं, अतः इसे सहस्रदल भी कहा जाता है। यह अखण्ड रूप में ब्रह्मांड में व्याप्त है। कबीर ने कहा-
उलटे पवन चक्र वेधा, मेरुदंड सरपूरा।
गगन गरजि मन सुनि समाना, बाजे अनहद तूरा।।

6. कुंडलिनी :
यह एक प्रकार की शक्ति है, जो मूलाधार चक्र के अधोभाग में स्थित है। यह सुषुम्ना का द्वार अवरुद्ध कर सर्पिणी की भाँति सोई हुई है। इड़ा और पिंगला नाड़ियों पर बहते हुए प्राण और अपान जब योग द्वारा एकीभूत हो जाते हैं, तब कुंडलिनी सुषुम्ना में प्रवेश करती है और अनाहत नाद की अभिव्यक्ति होती है।कबीर ने इस स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा-
त्रिकुटी महल में विद्या सारा, घनहर गरजें बजे नगारा ।
लाला बरन सूरज उजियारा, चतुर कंवल मंझार सब्द ओंकारा है ॥
 
7. मन-उनमन :
मन का स्वभाव है- तरह-तरह से विकल्पों को उठाना। जब तक साधक के मन में विकल्प की तंरगे उठती रहेंगी, वह परम पद का साक्षात्कार नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में उसे अपने मन पर नियंत्रण करना आवश्यक है। मन को निश्चल बनाकर, सांसारिक विषयों से विमुख कर दिव्य-चेतना में लय कर देना ‘उनमन’ है।
उनमन अवस्था में मन की सारी चंचलता समाप्त हो जाती है। जब मन ‘उनमन’ में लगता है, तब उसी में लीन हो जाता है, जैसे नमक पानी में घुलता है-
मन लागा उनमन सौं, उनमन मनहिं विलंग।
लूँण विलंगा पांणियां, पाणी लूंण विलंग।।

इस स्थिति के प्राप्त होने पर मन का पूर्णतः आध्यात्मीकरण हो जाता है। वह शुद्ध और परिष्कृत होकर शून्यावस्था तक पहुँच जाता है-
मन लागा उनमन सौं, गगन पहूँचा जाय।
8. अजपा जाप :
सामान्यतः संत साधक अपने आराध्य का नाम जिह्वा से उच्चारित करते हैं। यह नामजप की आरंभिक अवस्था है। साधना की उच्चतर स्थिति में पहुँचने पर नाम-जाप साधक का संस्कार बन जाता है। यह प्रक्रिया उसकी श्वास-प्रश्वास क्रिया के साथ निरंतर चलती रहती है। योगी उसे ‘अजपा जाप’ कहते हैं-
राम-नाम कबीर का बीज मंत्र है। इसके अजपा-जाप (सुमिरन) से कुंडलिनी जाग्रत होती है और वह सहस्रार में चढ़ती हैं कबीर के अनुसार जप की परिणति अजपा में होती है-
सुरति समांनी निरति में, अजपा माहैं जाप।
लेख समानां आलेख में, यो आपा माहें आप।।

कबीर माला लेकर जप करने में विश्वास नहीं करते थे। बिना उच्चारण किए श्वास-प्रश्वास के साथ राम का सुमिरण ही कबीर का अजपा जाप है-
कबीर पढ़िबा दूरि करि, पुस्तक देइ अहाइ।
बावन आषिर सोधि करि, ररैं ममैं चित लाइ।।

अतः ‘ररैं-ममैं’ - राम में प्रीति से चित्त लगाये रहना कबीर का अजपाजाप है।
9. सहज समाधि :
परमपद ब्रह्म की एक सहज अवस्था है। वह शून्य, निर्गुण, देश काल से अतीत है। जब योग द्वारा चित्त और प्राण का लय हो जाता है, तब उस अवस्था का अनुभव होता है, वह सहज समाधि है। इस स्थिति के बाद मन विषयों से विमुक्त हो जाता है, उसे सांसारिक आकर्षण मुग्ध नहीं करते। मन परमात्मा के रस में डूबा रहता है, समस्त साधना पूर्ण हो जाती है और चित्त सदा के लिए एकाकार हो जाता है। सहज समाधि प्राप्त होने पर साधक की स्थिति कुछ इस प्रकार हो जाती है-
लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।।

कबीर का योग ‘सहज’ है, अर्थात् क्लिष्ट नहीं है। प्रभु में अनन्य प्रेम से, निरन्तर सुमिरण से अजपाजाप से ‘सहज’ स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है। कबीर के मतानुसार सहज, उनमन, तुरीय, रामरस सब एक ही स्थिति के प्रतीक हैं-
उनमन मनुवा सुन्नी समाना, दुविधा दुर्गति भागी।
कह कबीर अनुभौ इक देख्या, रामनाम लिव लागीं।।

कबीर का मन रात दिन सहज रूप में साधना में लीन रहता है। कबीर की मौलिकता यह है कि वह साधना को सहज दिनचर्या का अंग बना लेते हैं-
सहज सहज सब कोय कहै, सहज न चीन्हे कोय।
जिहि सहजै सो हरि मिलै, सहज करावै सोय।।


3.भक्ति मार्ग
आध्यात्मिक प्रेम का नाम भक्ति है। यह प्रेमाभक्ति नारद भक्ति सूत्र के अनुसार विषय त्याग, कुसंग त्याग, अखण्ड सुमिरण, गुण कीर्तन आदि से प्राप्त होती है। 
कबीर के ब्रह्म निर्गुण, वर्णनातीत और शब्दातीत हैं। ऐसे ब्रह्म की साधना केवल ज्ञान के माध्यम से ही संभव है। कबीर ने ज्ञान की सार्थकता सत्य को पहचानने के लिए की और, मार्ग भक्ति को चुना। कबीर के बारे में नाभादास ने कहा- “वे भक्ति विमुख धर्म साधनों को अधर्म मानते थे।” कबीर ने अपनी भक्ति को भाव-भक्ति कहा। जिसका तात्पर्य है- परम तत्त्व की भावमय साधना। कबीर ने अपनी भक्ति को प्रेमाभक्ति माना। वे मानते थे कि जो भाव-भक्ति के माध्यम से हरि की साधना नहीं करता है, उसे मुक्ति नहीं मिल सकती-
भाव भगति सु हरि न अराधा।
जनम मरण की मिटी न साधा।।

कबीर की भक्ति में माधुर्य भाव का समावेश है। भक्ति में भाव-विभोर होकर आत्मा और परमात्मा के पारस्परिक वियोग का भाव विभोर वर्णन किया-
आंखड़ियाँ झांई परि, पंथ निहारि-निहारि।
कबीर की भक्ति में नारद-भक्ति-सूत्र में वर्णित समस्त आसक्तियों का वर्णन मिलता है। उन्होंने स्वयं कहा-
भक्ति नारदीय मगन सरीरा।
इह विधि भव तरि कहे कबीरा।।

नारद-भक्ति-सूत्र के अनुसार ईश्वर के प्रति प्रेम की व्यंजना ग्यारह आसक्तियों में हो सकती हैं- 1. गुणमाहात्म्य भक्ति, 2. रूपा भक्ति, 3. पूजा भक्ति, 4. स्मरणा भक्ति, 5. दास्या भक्ति, 6. संख्या भक्ति, 7. वात्सल्या भक्ति, 8. कान्ता भक्ति, 9. आत्मनिवेदन भक्ति, 10 तन्मया भक्ति और 11. परम विरहा भक्ति।
श्रीमद्भागवत् में भक्ति के नौ छंद बताये गये हैं, जिसे नवधा भक्ति कहा गया है।
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, संख्य, दास्य एवं आत्मनिवेदन। जिसे निम्न रूपों में भी व्यक्त किया जा सकता है-
श्रवणं कीर्तनं विष्णो स्मरणं पादसेवनं।
अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यं आत्मनिवेदनं।।

यदि ध्यान से देखा जाय तो नवधा भक्ति के वे नौ प्रकार नारदीय भक्तिसूत्र में समाहित किये जा सकते हैं। कबीर ने यद्यपि शास्त्रीय पद्धति से नारद-भक्ति-सूत्र की इन आसक्तियों का वर्णन नहीं किया है। फिर भी ईश्वर के प्रति प्रेम सम्बन्ध स्थापित किया है। 
1. गुणमाहात्म्य शक्ति :
सात समंद कि मसि करूँ, लेखनि सब बनराई।
धरती सब कागद करूँ, तउ हरिगुण लिख्या न जाई।।

2.रूपा भक्ति :
यद्यपि कबीर की भक्ति रूप ब्रह्म के प्रति नहीं थी, फिर भी एक स्थल पर कहा है-
साँवल सुन्दर रमइया मेरा मन लागा तोहि।
3.स्मरण भक्ति :
मेरा मन सुमिरै राम कूँ, मेरा मन रामहि आहि।
4.पूजा भक्ति :
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जानि।
दसवाँ द्वारा देहुरा, तामै ज्योति छिपानी।।

5.दास्य भक्ति :
कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाऊ।
गले राम की जेवड़ी, जित खैचे तित जाऊ।।

6.सख्य भक्ति :
पानी हूँ तै पातरा, धुवाँ हूँ तै झीन।
पवना बेगि उतावला, सो दोस्त कबीरै मीन।।

7.वात्सल्य भक्ति :
हरि जननी मैं बालक तेरा, काहे न अवगुन बकसहु मेरा।
सुत अपराध करै दिन केते, जननी कै चित रहै तेते।।


8.कान्ता भक्ति :
हरि मोर पिउ मैं हरि की बहुरिया।
9.आत्मनिवेदन भक्ति:
मेरा मुझमें कछु नहीं, जो कुछ है सो तेरा।
तेरा तुझको सौंपता, क्या लागे मेरा।।

10.तन्मया भक्ति :
तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझमें रही न रहूँ।
बारी तेरी बलि गई, जित देखौ तित तूँ।।

11.परम विरहा भक्ति :
नैना नीझर लाइयां, रहट बहै निसि जाम।
पपिहा ज्यों पिउ-पिउ कर, कब रे मिलहुगे राम।।

आसक्तियों के इन विभिन्न रूपों में कबीर ने सबसे अधिक तल्लीनता कान्ता भक्ति में दिखाई है। ईश्वर के प्रति प्रेम की इस आध्यात्मिक प्रेम को कबीर ने अकथ कहानी कहा है-
अकथ कहाणी प्रेम की कछु कहि न जाई।
वस्तुतः प्रेम के विभिन्न रूपों में दाम्पत्य प्रेम में जितनी निकटता और दर्द की अनुभूति होती है, उतनी किसी अन्य प्रेम में नहीं। विशेषतः स्वप्रिया भाव के प्रेम में जितनी गम्भीरता होती है। उतनी स्वप्रिया भाव में नहीं, इसलिये कबीर ने दाम्पत्य प्रेम को अपनाया है और अपने को बहुरिया मानकर ईश्वर रूपी प्रियतम के प्रति मिलन और वियोग की भावनाओं की अत्यन्त विह्वल और मार्मिक व्यंजना की है। प्रेम की दो स्थितियाँ होती हैं- एक मिलन और दूसरा वियोग। कबीर ने संयोग का वर्णन भी किया है। उनके संयोग वर्णन में विह्वलता है-
अब तो ही जान देहु रामपियारे, जू भावै सिद्ध होय हमारै।
बहुत दिनन थे प्रीतम आये, भाग बड़े घर बैठे आये।।

मध्ययुगीन अन्य भक्त कवियों की तरह कबीर ने विरह को अधिक महत्व दिया है क्योंकि उनकी दृष्टि में रुदन ही प्रियतम को पाने का मार्ग है-
हँसि-हँसि कंत न पाइये, जिहि पाया तिनि रोय।
जो हँसि हँसि के हरि मिलै तो नहीं दुहागिन कोय।।

जो सच्चा साधक है वह विरह को स्वेच्छा से स्वीकार करता है- 
विरह भुअंम पैसि करि, किया कलेजे घाव।
साधु अंग न मोड़ही ज्यूँ भावै तिऊ खाव।।

कबीर ने ईश्वर रूपी प्रियतम के प्रति अपनी विरहानुभूतियों की अत्यन्त मार्मिक व्यंजना की है। वे अपने शरीर रूपी दीपक में प्राणों की बाती लोहू का तेल डालकर उससे उत्पन्न प्रकाश में अपने प्रियतम को देखना चाहते हैं। रात की बिछुड़ी चकई दिन में प्रियतम से मिल जाती है। लेकिन कबीर का विरह दुख उससे भी बड़ा है, क्योंकि उन्हें उनका मिलन कभी नहीं होता। 
चकई बिछुरी रैनि परि, आई मिलै परभाति।
जे नर बिछुरे राम सो, ते दिन मिले न राति।।

विरह की अनेक अन्तर दशाएँ होती हैं। जैसे- अतृप्ति, लालसा, पश्चाताप, विवशता, शंका स्मृति, हर्ष, उन्माद आदि। यद्यपि कबीर ने राष्ट्रीय पद्धति से इन दशाओं का वर्णन नहीं किया है। लेकिन इन दशाओं का सम्बन्ध मानवीय संवेगों से है। अत्यन्त सहज रूप में इनकी अभिव्यक्ति इनके काव्यरूप में हो गई है। जैसे-
व्याकुलता :
वासर सुख न रैन सुख ना सुख सुपिनें माहि।
कबीर बिछुरे राम सु, ना सुख धूप न छाँव।।

विस्मृतियाँ :
हरि रस पिया जानिए, जे उतरै नाहि खुमारि।
मैंमंता घूमत फिरै, नाहि तन की सारि।।

   (ग)व्याधि की दशा :
आँखड़िया झाँई परी, पंथ निहारि निहारि।
जीभड़िया छाल्या पड्या, राम पुकारि पुकारि।।

कबीर की दृष्टि में भक्ति साधना अत्यन्त कठिन है। इस भक्ति के मन्दिर में वही प्रवेश कर सकता है जो अपने सर को काट कर अपने हाथ में लेने जैसी साधना करे।
कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारै हाथ सो, तब पैसे घर माहि।।

कबीर ने इसलिये सच्चे भक्त के लिये सूरवीर और सती नारी के उपमान का प्रयोग भर किया है। भक्ति के कठिन मार्ग पर चलने के लिये कबीर ने कुछ शर्तों को व्यक्त किया है। इसके लिये सबसे आवश्यक शर्त हैं ईश्वर के प्रति अनन्यता (एकाग्रता)। यह अनन्यता (एकाग्रता) वैसी ही होनी चाहिए जैसे सीप को स्वाति की  बूँद के लिए होती है-
कबीर सीय समंद की रटै पियास पियास।
समदहि तिनका वारि गिनै, एक स्वाति बूँद की आस।।

दूसरी शर्त है-निष्काम भक्ति। नारद-भक्ति-सूत्र में भी भक्ति को निष्काम बताया गया है। कबीर भी कहते हैं-
जब लगि भगति सकामता तब थल निष्काम सेव।
कहे कबीर वे क्यू मिले निहि कामी निज देव।।

तीसरी शर्त है-काम, क्रोध, लोभ, मोह, कपट, अभिमान आदि भू विकृतियों का परित्याग। भक्ति के लिये ये अत्यन्त आवश्यक हैं। कबीर कहते हैं-
भगति बिगाड़ी कामिया इन्द्रिय करै स्वादि।
हीरा खोया हाथ तै, जनमि गंवाया बाधि।।

कबीर ने ज्ञान, योग तथा भक्ति तीनों के लिये गुरु और सत्संग को बहुत महत्व दिया। कबीर की दृष्टि में गुरु गोविन्द से भी बड़ा है, क्योंकि यह गोविन्द तक पहुँचने की दृष्टि देता है-

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काकै लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपनै गोविन्द दियो बताय।।


इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कबीर की साधना में ज्ञान, योग और भक्ति तीनों ही समाविष्ट हैं।
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साहित्यिक निबंध



पुस्तक: साहित्यिक निबंध
लेखक : डॉ. राजेंद्र कुमार सिंघवी
प्रकाशक: आस्था प्रकाशन, जयपुर।
संपर्क: +91 98293 74781


पुस्तक: साहित्यिक निबंध
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हिन्दी साहित्य तीव्र गति से वैश्विक धरातल पर अपनी पहचान बनाने में सफल रहा है। साहित्य-रचना के मानक अब परम्परागत साँचे में नहीं है, उन पर तात्कालिकता का प्रभाव अधिक है। साहित्य अब भूमण्डलीकरण के साथ अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में आलोचना भी साहित्यिक वातावरण के साथ कदमताल कर रही है, जहाँ किसी सैद्धान्तिक परिमाप से रचना का मूल्यांकन न करके रचनाशीलता की पहचान पर बल है।

वर्तमान परिदृश्य में रचना की भाषायी सर्जनशीलता का बारीकी से विश्लेषण किया जाने लगा है। नये आलोचकों की मान्यता है कि किसी विचार या अनुभव को दूसरे व्यक्ति में इस रूप में संक्रमित करना कि वहाँ उसका नया विकास संभव हो, सर्जन-प्रक्रिया का आरंभिक चरण है। इस अनुभव या विचार का संक्रमण भाषा से ही संभव है। इस हेतु भाषा और अनुभूति के अद्वैत को समझना होगा। अतः आने वाले समय में आलोचना में ‘रूप तत्त्व’ को प्रश्रय मिलता दिखाई दे रहा है। जहाँ रचना को भाषिक-संरचना के आलोक में विवेचित करने का प्रयास हो रहा है। उत्तर संरचनावाद, उत्तर आधुनिकतावाद ने इस दृष्टि को और व्यापकता प्रदान की है। फलतः रचना की आलोचना में भाषा के विविध अंग- शब्द-चयन, छंद, ध्वनि-समूह, बिम्ब-विधान, प्रतीक-योजना, लय, कथन-भंगिमा, वाक्य-वक्रता, पद-विन्यास आदि के विश्लेषण पर ध्यान दिया जाने लगा है।

उत्तर-आधुनिक चिंतन व भारतीय संवैधानिक मूल्यों के निरन्तर प्रसार से अस्मिताओं के आधार पर भाषायी-चिंतन आलोचनात्मक विमर्श के केन्द्र में आया है। स्त्री, दलित, आदिवासी, किसान आदि की सामान्य बोलचाल की शब्दावली को साहित्य में प्रश्रय मिलने लगा है, जिससे उनकी सभ्यता, परम्परा व अनुभूतिजन्य पीड़ा को अभिव्यक्ति मिल सके। आलोचना में विमर्श केन्द्रित मूल्यांकन में भाषा का मूल्यांकन भी संबंधित परिवेश के संदर्भ में किया जाने लगा है।

परम्परागत साहित्य में लोकभाषा को सदैव दूसरे दर्जे पर रखा गया, किन्तु अब लोक भाषा अपना स्वाभाविक आकार गढ़ने लगी है। आँचलिक भाषाओं का साहित्य अब रचनाशीलता में स्थान बना रहा है और परम्परागत प्रतिमानों को ध्वस्त कर रहा है। सुखद पहलू यह है कि आँचलिक भारतीय भाषाओं के साहित्यिक उदय से हिन्दी और समृद्ध हो रही है। लोकगीत, लोक नाट्य, लोक वाणी की स्वीकार्यता से स्वाभाविक प्रस्तुति हो रही है।

समकालीन साहित्य में एक तरफ लोक वृत्त उभर रहा है, वहीं दूसरी तरफ रचनाएँ वैश्विक फलक पर पाँव भी प्रसार रही है। दोनों की दिशा पृथक् होते हुए भी महत्त्व भी है। एक पक्ष अपने अस्तित्व को स्थापित कर हिन्दी को समृद्ध कर रहा है, तो दूसरा पक्ष हिन्दी को वैश्विक परिदृश्य में स्थापित कर रहा है। दोनों की शृंखला नई आलोचना का विवेच्य विषय है। आज के समय में भाषायी प्रतिमान निश्चित नहीं किए जा सकते, क्योंकि उसकी दीवारें ही गिर रही हैं।

विगत दो दशकों से हमारे सामाजिक जीवन में भी व्यापक बदलाव आए हैं। वैश्विक समाज सूचना क्रांति से बहुत छोटा प्रतीत होने लगा है। परम्परागत विचार, प्रतिबद्धताएँ एवं मूल्य लगभग अप्रासंगिक होते गए व उन्मुक्त सोच की तरफ दुनिया बढ़ रही है। साहित्य भी इससे अलग नहीं है। आलोचना भी तात्कालिक समस्याओं के संदर्भ में होने लगी है, जिसे किसी घेरे में बन्द भी नहीं रखा जा सकता है। आज सोश्यल मीडिया पर हर व्यक्ति अपने विचार प्रकट करने के लिए स्वतंत्र है, अतः वहाँ साहित्यिक प्रतिमान स्थिर रहें, यह संभव भी नहीं है। देश-विदेश में घटित किसी भी घटना पर किसी रचना का जन्म और उस पर त्वरित प्रतिक्रियाओं से आलोचना के संदर्भ भी बदलते जा रहे हैं।

विगत शताब्दी की आलोचनाओं में पहले उद्देश्य निर्धारित होता था, उसके बाद सिद्धान्त निर्मित किए जाते, फिर उन सिद्धांतों के आधार पर कृति की परख की जाती थी। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर अनेक आलोचना प्रणालियों का जन्म हुआ, लेकिन विगत कुछ वर्षों से यह तकनीक भी अब स्वरूप बदल रही है। आलोचना में किसी निश्चित फलक का उपयोग दिखाई नहीं देता।

आलोचना की समकालीन परिस्थितियाँ बदलते हुए परिवेश के अनुरूप ही हैं। जहाँ ठहराव और अवकाश तो बिल्कुल भी नहीं है। अब सिद्धांतों की कसौटी पर कृति को कसने के स्थान पर सर्वप्रथम कृति के मूल कथ्य को ध्यान में रखकर सिद्धांत निर्मित किए जाते हैं, फिर एक सिरे से पुस्तक की व्याख्या या समीक्षा कर दी जाती है। सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों को समझकर रचना की संपूर्णता को परखने की प्रवृत्ति अब लुप्त होती जा रही है। कतिपय आलोचनाएँ अपवाद हो सकती हैं, किन्तु यही सामान्य प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।

आलोचना की मात्रा तो बहुत अधिक है, परन्तु उसके लेखन के प्रतिमान निश्चित नहीं हैं। रचना के तथ्यों का आलोचक वर्णन करके आगे बढ़ जाता है, जहाँ रचना की प्रशंसा तो है, परन्तु मूल्यांकन नहीं। यह कटु सत्य है कि आलोचना अब रचना केन्द्रित होने के स्थान पर रचनाकार केन्द्रित होने लगी है। आलोचक भी इसी भ्रम में हैं कि उसकी चर्चा से लेखक स्थापित हो रहे हैं और उपेक्षा से वे नगण्य, तो स्पष्टतः आलोचना के मूल्य ही विस्थापित हो रहे हैं।

एक प्रश्न उठता है कि क्या पुराने प्रतिमानों के आधार पर नई रचनाओं की समीक्षा संभव है? इस दृष्टि से तो सही उत्तर यही होगा कि पुराने प्रतिमानों के आलोक में अद्यतन रचना का मूल्यांकन संभव नहीं है। लेकिन रचना के बदलते स्वरूप के साथ आलोचना के नवीन प्रतिमान तय किए जाने अपेक्षित हैं, जो चिंता का विषय भी है। आज अनेक विमर्श केन्द्रित रचनाएँ सामने आ रही हैं, परन्तु नई आलोचना प्रणालियाँ विकसित नहीं होने से प्रतिमान भी स्थापित नहीं हो पा रहे हैं।

समकालीन रचनाओं का मूल्यांकन सम-सामयिक संदर्भों में ही किया जा सकता है और रचनाशीलता के समानांतर ही आलोचना के प्रतिमानों का निर्माण होता है। प्रत्येक समय की चुनौतियाँ होती है और उसके समाधान तात्कालिक रचनाओं में तलाशने का कार्य आलोचक का है। आलोचक ही अपनी प्रखर दृष्टि से पुराने प्रतिमानों को नया रूप दे सकता है और समय के अनुकूल प्रतिमान निर्मित भी कर सकता है।

हिन्दी आलोचना में आज सर्वाधिक आवश्यकता समकालीन रचनाशीलता की प्रवृत्तियों की पहचान कर आलोचना के प्रतिमान निर्मित किए जाने की है, ताकि आलोचना की भावी दिशा सही गंतव्य की ओर बढ़ सके। इससे भारतेन्दुकाल से जन्मी, शुक्ल काल में विकसित और शुक्लोत्तर काल में चरम तक पहुँची हिन्दी आलोचना वैश्विक साहित्यिक आलोचना के समकक्ष स्तर को प्राप्त कर सके। गंभीरता, अध्ययन-निष्ठता, पैनी दृष्टि और साहित्यिक वातावरण इस दृष्टि से निर्मित करना वर्तमान समय की प्रमुख आवश्यकता प्रतीत हो रही है।

विचारधारा रचना तथा आलोचना की रीढ़ होती है, जिसके आधार पर उसकी महत्ता, उपयोगिता एवं प्रासंगिकता सिद्ध होती है। हिन्दी आलोचना अपने आरंभ से किसी न किसी आधार को लेकर चली है, चाहे वह सैद्धांतिक हो या व्यावहारिक; किसी वाद के सिद्धान्तों के परिप्रेक्ष्य में हो अथवा विमर्श केन्द्रित अवधारणाओं पर आधारित। यह क्रम बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा। यहाँ तक कि आलोचक को भी किसी निश्चित पक्ष का विचारक मानकर निर्णय किया जाता रहा। नई सदी की आलोचना उत्तर-आधुनिक दौर में हैं, जहाँ विचारधाराओं से मुक्ति की बात कही जा रही है। यहाँ तक कि विचारधारा शब्द आलोचना में शत्रुता अथवा आतंक का प्रतीक समझा जाने लगा है।

विचारधारा साहित्यिक कृति का आन्तरिक पक्ष है, जिससे उसका व्यक्तित्व प्रतिबिम्बित होता है। यह एक प्रकार का दृष्टिकोण भी है, जो समय और परिस्थिति के संघर्ष में जन्म लेता है। इसे लेखक की चेतना का आधार कहना समीचीन होगा। विचारधारा के अभाव में वह कृति के साथ कभी न्याय नहीं कर पाएगा। वैसे विचारधारा किसी न किसी रूप में रचना में विद्यमान रहती है, जिसका सही मूल्यांकन विचारधारा के अनुसार ही हो सकता है। लेकिन वैचारिक आग्रह की प्रबलता में लेखक को अन्य पक्ष के मतों का भी सम्मान करना चाहिए। वैचारिक आग्रह कहीं दुराग्रह के कारण अच्छी कृति का भी उपहास न उड़ाए, यह आवश्यक है। विचारधारा स्वयं की दृष्टि है, दूसरों पर थोपने का विषय नहीं। हिन्दी आलोचना में अब पूर्ण गंभीरता नए परिवेश के अनुरूप आवश्यक है, जहाँ परम्परागत मूल्यों का आश्रय व विरासत के साथ नवीन प्रतिमानों का निर्धारण भी हों।

प्रस्तुत पुस्तक 'साहित्यिक निबंध' विगत पाँच वर्षों में लिखित एवं प्रतिनिधि साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित मेरे 26 आलोचनात्मक आलेखों का संकलन है। इसमें मौलिक दृष्टि से रचना की अन्तः प्रक्रियाओं के सूत्रों की तलाश करते हुए समकालीन सन्दर्भ में उसकी प्रासंगिकता को प्रकट करने का प्रयास है। आशा है शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए यह विशेष उपयोगी रहेगी। पुस्तक को सुंदर कलेवर में प्रस्तुति का श्रेय श्री राजकुमार जी शर्मा, आस्था प्रकाशन, जयपुर को है। मेरी ओर से विशेष आभार। 

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