राम की शक्तिपूजा:वर्तमान संदर्भ

                      राम की  शक्तिपूजा :वर्तमान सन्दर्भ 

(आकाशवाणी चित्तौड़गढ़ से प्रसारित वार्ता)

 ‘राम की शक्ति पूजा’ सूर्य कांत त्रिपाठी ‘निराला’ की एक प्रबन्धात्मक कविता है । यह कृति निराला के व्यक्तित्व व कृतित्व का गौरव है तथा उनकी काव्य­प्रतिभा को मूल्यांकित करने का मापदण्ड भी है । इस कविता की रचना सन् 1936 ई. में हुई थी । काव्य­सौन्दर्य की दृष्टि से यह कविता आधुनिक हिन्दी काव्यधारा में छायावादी काव्य की चरम सीमा मानी जा सकती है । इसमें राम­रावण युद्ध के अवसर पर राम के मानव मन की अन्तर्द्वन्द्व का वर्णन है।

'राम की शक्ति पूजा’ की कथा बंगाल की कृत्तिवासी रामायण से ली गई है, किंतु कथा में कवि ने मौलिक परिवर्तन भी किये हैं । इस कविता में प्रमुख घटनाएँ हैं- राम­रावण युद्ध में महाशक्ति द्वारा रावण का पक्ष लेना, राम की निराशा, हनुमान के रौद्र रूप का दिग्दर्शन, सीता की स्मृति, विभीषण द्वारा वीर­भाव की उत्तेजना का प्रयास, जाम्बवान् के प्रस्ताव पर राम की शक्ति­आराधना, सात्त्विक योग क्रिया से राम का आराधनारूढ़ होना, महाशक्ति का एक पुष्प चुरा ले जाना, राम का ग्लानिजन्य निराशा में डूबना, स्वयं को राजीव नयन होने का स्मरण होना, राम का पुष्प के स्थान पर अपना नेत्र अर्पित करने के लिए सन्नद्ध होना और शक्ति का प्रकट होकर विजय का वरदान देना आदि ।

 इस कृति में निराला ने राम को मानव के रूप में चित्रित किया है । यह चरित्र विलक्षण है । तुलसी की भाँति राम को पृथ्वी के भारों का विनाश करने के लिए अवतरित नहीं किया है, वरन् समस्त संघर्षों को उनके सामने ले जाकर प्रस्तुत कर दिया है । राम के कर्तव्य परायण जीवन में जो विह्वलता और निराशा के दर्शन होते हैं, वे राम को यथार्थ मानवीय भूमि पर प्रतिष्ठित कर देते हैं । निराशा के क्षणों में राम को सीता की कुमारी छवि की स्मृति राम के मानवीय चरित्र को द्रवित कर देती है, यथा-

देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन,
विदेह का ­ प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन,
नयनों का ­ नयनों से गोपन ­ प्रिय संभाषण,
पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान­पतन ।

 विप्लव, संघर्ष और विरोध की ध्वजा लेकर भी अपनी विजय का आत्म­विश्वास कैसा होगा, इसका अनुमान वही व्यक्ति लगा सकता है, जिसने संघर्षों के पर्वतों पर खड़े होकर विजय की हरीतिमा के स्वप्न देखे हैं । निराला के राम ने यही सब कुछ देखा है । एक मानव के जीवन में इससे अधिक नाटकीयता क्या हो सकती है कि अपार पौरुष चीख उठे, इससे अधिक कला की साधना और क्या होगी कि सिंह स्वयं को असहाय समझे और जीवन की इससे अधिक विडम्बना और क्या हो सकती है कि वह कह उठे-


धिक् जीवन जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन जिसका सदा ही किया शोध ।

 ‘राम की शक्ति पूजा’ में निराला ने मात्र राम­कथा के एक खण्ड भाग का ही उदात्त चित्रण नहीं किया, बल्कि उदात्त संदेश भी संघर्षरत मानवता के लिए प्रसूत किया है । युग­युगों से विषण्ण एवं शोषण­पीड़ित मानवता को समतुल्य शक्ति की संचयन करके अन्याय, अत्याचार एवं उत्पीड़न का डटकर मुकाबला करने की चिर अमर प्रेरणा दी है । शत्रु­विजय की भावना को अत्यधिक प्रदीप्त करने के लिए विभीषण का यह कथन पर्याप्त है-

                    रघुकुल ­ गौरव लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण,
तुम फेर रहो हो पीठ हो रहा जब जय रण, 
कितना श्रम हुआ व्यर्थ, आया जब मिलन समय,
तुम खींच रहे हो हस्त, जानकी से निर्दय ।
रावण, रावण, लम्पट, खल, कल्मष, गताचार,
जिसने हित कहते किया मुझे पाद ­ प्रहार ।

 कवि ने राम के रूप में देशवासियों को स्वतंत्रता संग्राम एवं देश के निर्माण कार्यों से किसी भी रूप में पलायन न करने की प्रेरणा दी है । शत्रु हमारी निरहिता का उपहास उड़ाएँ, हमें उपेक्षित­अपमानित करके अपनी विजय के गीत गाएँ और हम अवसन्न­मन, विपर्यस्त­तन बैठ देखते रहें, यह संभव नहीं । राम अपनी अन्तर चेतना में निहारते हैं कि स्वयं महाशक्ति रावण का पक्ष लेकर सीता की प्राप्ति में बाधक बन रही है । जय­पराजय शक्ति पर आधारित है, तब जाम्बवान् का यह कथन शक्ति­संचय एवं उपयोग का विधान व्यावहारिक प्रतीत होता है-

“ विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
हे पुरुष सिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,

आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,

तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर ।”

 मौलिक शक्ति की आराधना और शक्ति का संचय अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि अन्याय के प्रतिकार और अपने मूल्यों की रक्षा का जब कोई उपाय शेष न हों । भारत की परतंत्रता के समय यह संदेश प्रेरणा का स्रोत रहा ।

 'राम की शक्ति पूजा’ काव्य की सर्जना जिस काल में हुई थी, वह देश की पराधीनता का काल था । गहन अवसाद और निराशा का युग था । विदेशियों के दमन­चक्र से अनवरत आक्रांत भारतीय किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे । ऐसे समय में कवि ने रावण की अशोक वाटिका में बन्दिनी सीता को अन्तर चेतना में पराधीन भारत माता मानकर ही चित्रित किया है । रावण अनेक प्रकार की अनीतियों, क्रूरताओं, अत्याचारों से पूर्ण अंग्रेजी शासन का प्रतीक बनकर चित्रित हुआ है, तो राम को देश की स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता व अत्याचार के विरूद्ध संघर्षरत भारतीय मानस के रूप में व्यक्त किया है । सीता के नयन राम के लिए नव प्रेरणा का अजस्र स्रोत बनकर जनक की सभा में राम के हाथ धनुर्भंग के लिए उठ जाते हैं । अर्थात् अपनी अदम्य शक्ति की गंभीरता राम के साहस­उत्साह में पुनः मचल उठती हैं-

“ हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त
फिर विश्व विजय भावना हृदय में आई भर ।”
  
विश्व विजय की इसी भावना को पराधीन भारतीयों के मन में उजागर करना प्रस्तुत कृति का उद्देश्य प्रतीत होता है ।

 
  स्वातंत्र्य आन्दोलनों के उन क्षणों में स्वातंत्र्य­चेत्ता और उस संग्राम के अग्रणी नेताओं के मन में आशा­निराशा का अनवरत द्वंद्व चलता रहता था, उसकी प्रतिच्छवि उक्त काव्य में है तो उधर निराला जी का स्वयं का जीवन भी अनेक प्रकार के वैषम्यों के कारण द्वन्द्वग्रस्त था । वे पूर्ण ईमानदारी, सजगता और सचेष्टता से अपनी विषम परिस्थितियों के साथ द्वन्द्व­संघर्ष में निरत रहे, फिर भी विजय उनकी नहीं, विपरीत शक्तियों की होती रही । यह द्वंद्व न केवल ‘राम’ का बल्कि कविवर निराला का भी है । रावण के सामने राम सृष्टियाँ भी रुधिर­क्लोत होकर रह गई और परिस्थितियों के वैषम्य के सामने कविवर निराला का रक्त भी अनवरत शोषित होता रहा । काव्य के आरंभ में ही इन्हीं वैषम्यों का विषयोद्घाटन हुआ है-

राघव­लाघव ­ रावण­कारण ­ गत­युग्म­प्रहर,
उद्धत­लंकापति ­ मर्दित ­कपि­दल विस्तर,

अनिमेष राम­विश्वजिद् दिव्य­शर­भंग­भाव­

बिद्वांग­बद्ध ­कोदण्ड ­सृष्टि­खर­रुधिर­स्राव

 वर्तमान समय भी ऐसा प्रतीत होता है कि विषम परिस्थितियों का शिकार है । अन्याय जिधर है, उधर शक्ति है । कट्टर­अंध शक्तियाँ अपने विकराल रूप में हैं और सदाचारी शक्तियाँ निराश और बेबस हैं । ‘राम की शक्ति पूजा’ में ‘राम’ ने शक्ति की मौलिक साधना कर विजय को वरण किया । इस प्रकार कविवर निराला ने दिखाया कि सत्य, न्याय, नैतिकता, सदाचरण आदि के साथ पुरुषार्थ का होना भी परम आवश्यक है । इसके द्वारा ही पाशविक शक्तियों से मुक्ति प्राप्त हो सकती है । कवि ने निष्काम कर्म का संदेश ‘राम’ के व्यक्तित्व के माध्यम से रूपायित किया है । राम का अपराजेय का आदर्श हमें प्रेरणा देता है । पराजय और दैन्य भाव को तिलांजलि देने पर ही मानवता की रक्षा संभव है, किंकर्तव्यविमूढ़ बने रहने में नहीं।

 
जिस तरह निराला अनेक संघर्षों में भी आस्तिकता, आस्थावादिता और आशा का दामन थामे रहे, उनका संदेश ‘राम की शक्ति पूजा’ में प्रणीत हुआ है । कवि का दृढ़ विश्वास है कि अडिग शक्ति एवं अदैन्य भाव से संघर्ष करने वाला व्यक्ति अंत में विजय अवश्य प्राप्त करता है । राम ने जब अपने ‘राजीव­नयन’ को अर्पण करने का निश्चय कर लिया, तो शक्ति को प्रकट होना पड़ा, पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

जिस क्षण बँध गया बेधने का दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्मंड, हुआ देवी का त्वरित उदय,

“साधु­साधु, साधक­धीर, धर्म­धन­धान्य राम!”

कह लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम ।

हाथ थामने के बाद साक्षात् भगवती ने राम को चिर विजय का अमर वरदान दिया और रावण का साथ छोड़कर राम के शरीर में लीन हो गई, यथा-


“होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन ।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन

नैराश्य पर विजय प्राप्त कर, शक्ति का संचय करें और आसुरी शक्तियों पर अपने पुरुषार्थ से विजय प्राप्त करें । ‘राम की शक्ति पूजा’ का यही निहितार्थ है ।
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कामायनी का सामयिक यथार्थ

कामायनी का सामयिक यथार्थ 

(आकाशवाणी चित्तौड़गढ़ से प्रसारित)
                        जयशंकर ‘प्रसाद’ रचित कामायनी हिन्दी जगत् की कालजयी कृति है । इसकी रचना के समय भारतीय जनमानस स्वाधीनता की आकांक्षा के साथ संघर्ष कर रहा था । राष्ट्रप्रेम की धारा में डूबा हुआ सारा देश अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियों के विरूद्ध उठ खड़ा हुआ था । सदियों की दासता से पीड़ित जनता में स्वातंत्र्य चेतना पूरी शक्ति के साथ उद्वेलित हो उठी थी। उस समय भारतीय चिंतन के क्षितिज पर अहिंसा, राष्ट्रप्रेम, सत्याग्रह आदि मूल्य उभर रहे थे । 

                     आज इक्कीसवीं सदी का प्रथम दशक भी व्यतीत हो चुका है। पूरी दुनिया ‘ग्लोबल विलेज’ में विचरण कर रही है । वैश्वीकरण के इस दौर में बाज़ार हमारे जीवन में प्रविष्ट हो चुका है । इस बाज़ार में आचार, विचार, परिधान, जीवन­शैली में परिवर्तन के साथ हमारा सांस्कृतिक तंत्र भी इस व्यवस्था की फाँस में है । मानवीय संदर्भ बदल गए हैं और चुनौतियाँ निरन्तर बढ़ रही हैं । 

                     वर्तमान समय के संदर्भ में कामायनी का अवलोकन करें तो प्रतीत होता है कि समकालीन चुनौतियों के समाधान इस कृति में यत्र­तत्र विद्यमान हैं, जो न केवल सामयिक संदर्भों में उपयोगी हैं, वरन् भविष्य के दिशा सूचक भी हैं । प्रसाद कृत कामायनी कर्मण्यता का संदेश देती है । इसकी प्रथम पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला का शीतल छाँह ।
एक पुरुष भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय­प्रवाह ।।

                     यह प्रलय­प्रवाह मनुष्य की अत्यधिक भोगवादी लालसा से घातक परिणामों की ओर संकेत करता है, जहाँ कवि ने संदेश दिया कि यह प्रवृत्ति महाविनाश की ओर ले जाने वाली है, जहाँ सिवाय ‘आँसुओं’ के कुछ नहीं बचेगा।  आज अहंकार के रथ में जुती हुई आर्थिक साम्राज्यवादी ताकतें उदारवादी अर्थ­व्यवस्था के बहाने मानवता को सामान्य प्राकृतिक अधिकारों से भी वंचित कर रही हैं । यह कृत्य शोषण का नया पर्याय है । इसके दायरे में तो लगभग सम्पूर्ण मानव­समुदाय आ गया है । अर्थ­शक्ति का यह अहंकार पतन की शुरूआत है, जिसका संकेत कामायनी में किया गया-

देव न हम थे और न ये हैं,
सब परिवर्तन के पुतले ।
हाँ कि गर्व­रथ में तुरंग­सा,
जितना जी चाहे जुत ले ।।

                    इस गर्व रथ की परिधि में बौद्धिक जगत भी आ गया है, जो विषमताओं का समाना नहीं करना चाहता । पलायनवादी मानसिकता ने अकर्मण्यता को जन्म दे दिया है, जिसससे मानवता का विकास अवरूद्ध हो रहा है। कामायनी मनुष्य को कर्म की ओर प्रवृत्त करती है, जो वर्तमान समय की नितांत आवश्यकता है । श्रद्धा का यह कथन वर्तमान परिस्थितियों में सार्थक प्रतीत होता है-

काम मंगल से मंडित श्रेय,
सर्ग इच्छा का है परिणाम ।
तिरस्कृत कर उसको तुम भूल,
बनाते हो असफल भवधाम ।।

                     पदार्थवादी दुनिया, विषमतामूलक समाज और मूल्यहीनता की ओर बढ़ती अपसंस्कृति ने मनुष्य को पंगु बनाया है । उद्दाम लालसाएँ पालने मात्र से जीवन सुखद नहीं होता, बल्कि ज्ञान और क्रिया से सामंजस्य भी स्थापित करना पड़ता है। इसके अभाव में जीवन की पूर्णता संभव नहीं । कोरी बुद्धि अथवा कोरी भावुकता सफलता का हेतु नहीं, बल्कि इनका समन्वय आवश्यक है । कामायनी कार का स्पष्ट संदेश है-

ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है,
इच्छा क्यों पूरी हो मन की ।
एक दूसरे से न मिल सके,
यह विडम्बना जीवन की ।

                        हमारा सामाजिक जीवन विसंगतियों को शिकार हो गया है । जाति, धर्म, संप्रदाय आधारित विकृत व्यवस्था नई सदी के साथ चल रही है, जिसके मूल में मात्र विद्वेष है । यह विद्वेष ही संघर्ष को जन्म दे रहा है । प्रसाद ने कहा-

द्वयता में लगी निरन्तर ही,
वर्णों की करती रहे सृष्टि ।
अनजान समस्याएँ गढ़तीं,
रचती हैं अपनी ही विनष्टि ।।

                          क्या यह विद्वेष समाप्त नहीं हो सकता? हम आधुनिक मानव एवं विकसित सभ्यता का दंभ पालने वाले ऐसे विश्व का निर्माण नहीं कर सकते, जैसा कामायनी में वर्णित है-

शापित न यहाँ है कोई, तापित पानी न यहाँ हैं ।
जीवन वसुधा समतल है, समरस है जो कि जहाँ है ।

                          यह सच है कि पूँजीवादी व्यामोह में प्रकृति के साथ सर्वाधिक खिलवाड़ हुआ है । भौतिक समृद्धि के साथ विनाश ने आने वाली पीढ़ियों के जीवन को संकट में डाल दिया है । कामायनी का कथानक भी इसी आधार पर बुना गया । वस्तुतः विलास सदैव विनाश की ओर ले जाता है । कामायनी की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

मौन, नाश, विध्वंस, अँधेरा
शून्य बना जो प्रकट अभाव ।
वही सत्य है अरी अमरते,
तुझको यहाँ कहाँ अब छाँव ।।

                          नई सदी में सबसे प्रबल चिंतनपरक विमर्श उभर कर आया है, वह है- नारीवाद । कामायनी नारी के प्रति परम्परागत दृष्टिकोण को बदलने का संदेश देती है । वह उपभोग की वस्तु मात्र नहीं, अपितु प्रेरणा का पावन उत्स है, जो पुरुष को जीवन में प्रवृत्त करती है । पुरुषों की एकाधिकार प्रवृत्ति के प्रति कवि ने सावधान किया है-

तुम भूल गए पुरुषत्व मोह में,
कुछ सत्ता है नारी की ।
समरसता है संबंध बनी,
अधिकार और अधिकारी भी ।।

                          यह स्पष्ट है कि साहित्यिक कृति कभी अप्रासंगिक नहीं होती । वे समय से आगे का सच कहती हैं । मनुष्य उनकी समय रहते पहचान कर ले तो समस्याएँ नहीं रहतीं । वर्तमान विश्व जब अपने ही बुने हुए जाल में उलझता जा रहा है । तब कामायनी मानवता को उत्कृष्ट बनाने का रास्ता बनाती है । कविवर जयशंकर प्रसाद की यह दृढ़ कामना रही कि मानव सृष्टि चेतना का इतिहास हों, अतीत की गलतियाँ दुहराई न जाए, तब दिव्य विश्व निर्मित होगा। यथा-
चेतना का सुन्दर इतिहास,
अखिल मानव भावों का सत्य ।
विश्व के हृदय­पटल पर दिव्य,
अक्षरों से अंकित हो नित्य ।।

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