जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान

 


जैन टीकाओं का साहित्यिक अवदान

साहित्य परिक्रमा के जनवरी-मार्च, 2026 अंक में प्रकाशित

राजस्थान की समृद्ध साहित्यिक विरासत में जैन साहित्य का एक विशिष्ट स्थान है। यह साहित्य केवल धार्मिक उपदेशों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के इतिहास, उसकी सामाजिक संरचना और भाषायी परम्परा को समझने के लिए एक अमूल्य स्रोत के रूप में कार्य करता है। जैन मुनियों, आचार्यों और श्रावकों द्वारा रचित इस साहित्य ने जैन धर्म के सिद्धांतों, तीर्थंकरों की महिमा, मंदिरों के उत्सवों और संघ यात्राओं का विस्तृत वर्णन किया है। इसकी विशालता और विविधता उल्लेखनीय है। जैन समुदाय की ज्ञान-संरक्षण और साहित्य सृजन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के कारण इसने अन्य समकालीन साहित्यिक परंपराओं की तुलना में अधिक मात्रा में साहित्य का निर्माण करने में सक्षम बनाया। जैन समुदाय की संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण है कि चातुर्मास में साधुओं द्वारा चिंतन, मनन और प्रवचन के साथ-साथ लेखन-पठन के कार्य पर दिए गए महत्व के कारण विपुल साहित्यिक धरोहर प्राप्त हुई। भारतीय परंपरा में जैन दर्शन और संस्कृति अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है। यह स्थिति प्राकृत, संस्कृत, राजस्थानी और विभिन्न स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध विपुल जैन साहित्य से प्रमाणित होती है। यह साहित्य आगम, पुराण, कथा, चरित्र, काव्य और निबंध जैसे विविध रूपों में उपलब्ध है, जो इसकी बहुआयामी प्रकृति को दर्शाता है ।

राजस्थानी जैन साहित्य में समालोचनात्मक लेखन की एक सुदृढ़ परंपरा रही है, जिसमें 'टीका', 'बालावबोध' और 'टब्बा' जैसे शब्द प्रमुखता से प्रयुक्त होते हैं। इन तीनों का मूल उद्देश्य ग्रंथों को स्पष्ट करना था, किंतु उनकी प्रकृति और विस्तार में भिन्नता थी। टीकाएँ मूलतः संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश जैसी भाषाओं में रचित जटिल धार्मिक और उपदेशात्मक ग्रंथों को जनसाधारण के लिए सुगम बनाने के उद्देश्य से लिखी गईं। जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति और नैतिक उत्थान आदि को प्राप्त करने के उद्देश्य से इन टीकाओं का विकास हुआ। यह ज्ञान की सर्वव्यापकता और जटिल दार्शनिक अवधारणाओं को सरल एवं व्यावहारिक रूप में जन सामान्य तक पहुँचाने की एक अनुपम पहल थी, जिससे धर्म अधिक प्रभावशाली और उपयोगी बन सके।

‘टीका’ मूलतः किसी संस्कृत, प्राकृत या अपभ्रंश ग्रंथ पर लिखी गई एक विस्तृत व्याख्या या भाष्य होती थी। इसका लक्ष्य मूल पाठ के गहन अर्थों, दार्शनिक अवधारणाओं और संदर्भों को विश्लेषित करना था, जो प्रायः विद्वानों और गंभीर अध्येताओं के लिए होती थी। ‘बालावबोध’ बालकों या सामान्य गृहस्थों के लिए मूल रचना का विस्तृत और सरल स्पष्टीकरण होता था। जैन कवियों का उद्देश्य जन-जीवन में आध्यात्मिक जागृति पैदा करना था और तत्त्वज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती का समाधान करने के लिए बालावबोध एक सरल, सरस, सहज और बोधगम्य शैली में लिखा जाता था, जिससे जैन धर्म के सिद्धांतों को जनसाधारण तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सके। ‘ टब्बा’ मूल रचना के स्पष्टीकरण के लिए पत्र के किनारों पर लिखी गई संक्षिप्त टिप्पणियाँ होती थीं। ये त्वरित संदर्भ और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में सहायक होती थीं।

वस्तुतः मूल जैन आगम ग्रंथ प्रायः प्राकृत या संस्कृत में थे, जो सामान्य जन के लिए कठिन थे। इस कठिनाई को दूर करने के लिए, विभिन्न स्तरों की व्याख्याएँ आवश्यक थीं। टीकाएँ विद्वानों की सन्दर्भ सहायिका थीं, बालावबोध जटिल दार्शनिक और धार्मिक अवधारणाओं को सरल बनाकर व्यापक जनता तक पहुँचाते थे और टब्बा त्वरित स्पष्टीकरण प्रदान करते थे। इन विविध व्याख्यात्मक पद्धतियों का प्रयोग यह दर्शाता है कि जैन विद्वानों ने ज्ञान के प्रसार के लिए एक बहु-स्तरीय और समावेशी दृष्टिकोण अपनाया। यह केवल एक प्रकार की व्याख्या नहीं थी, बल्कि विद्वानों से लेकर सामान्य पाठकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक सुविचारित शैक्षणिक संरचना थी, जिससे जैन दर्शन की गहराई और व्यापकता सभी स्तरों पर समझी जा सके। यह दृष्टिकोण जैन विद्वानों समालोचना दृष्टि को दर्शाता है, जिसने धार्मिक ज्ञान को केवल एक विशिष्ट वर्ग तक सीमित न रखकर साहित्यिक उपागम बनाकर जनव्यापी बनाया।

राजस्थानी जैन टीका साहित्य का विकास विभिन्न शताब्दियों में अनेक प्रतिभाशाली विद्वानों और संतों के योगदान से हुआ। इन टीकाकारों ने न केवल जैन धर्म के सिद्धांतों को स्पष्ट किया, बल्कि अपने लेखन के माध्यम से तत्कालीन समाज, संस्कृति और इतिहास का भी महत्त्वपूर्ण चित्रण किया। जैन संस्कृति की दृष्टि से राजस्थान में अभूतपूर्व साहित्य लिखा गया। 5वीं शती में आचार्य सिद्धसेन ने जैन-दर्शन पर आधारित ग्रंथ ‘सम्मई सूत्र’ की रचना की। यह ग्रंथ राजस्थान का प्राकृत भाषा में रचित प्रथम ग्रंथ है। उद्योतन सूरि ने 835 विक्रम संवत में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ की रचना की। यद्यपि यह ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखा गया था,  इसमें ‘मरुभाषा’  अर्थात् राजस्थानी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मरुभाषा का यह प्रारंभिक उल्लेख यह दर्शाता है कि राजस्थानी भाषा का साहित्यिक उपयोग बहुत प्रारंभिक काल से ही हो रहा था और जैन विद्वान इसके विकास में अग्रदूत थे। यह भाषा और धर्म के बीच एक अन्योन्याश्रित संबंध स्थापित करता है, जहाँ धार्मिक उपदेशों के प्रसार ने स्थानीय भाषा के साहित्य का मानकीकरण किया।

इसी तरह षटखंडागम’ ग्रंथ पर आधारित आचार्य वीरसेन रचित ‘धवला’ नामक टीका अद्वितीय है। इसमें 72000 श्लोक संस्कृत और प्राकृत भाषा में है। आठवीं शती के जैन आचार्य हरिभद्रसूरि ने कथाउपदेशयोगदर्शन आदि से संबंधित 1444 ग्रंथों की रचना की तथा संस्कृत-प्राकृत में एक लाख पचास हजार श्लोक लिखे। प्रमुख ग्रंथों में समराइच्च कहा’, ‘शास्त्र वार्ता समुच्चय’, ‘धूर्ताख्यान’, ‘योग शतक’, ‘योग बिंदु, ‘योग दृष्टि समुच्चय’, ‘संबोध प्रकरण’ आदि उल्लेखनीय हैं। 10वीं शताब्दी में सिद्धर्षि नामक संत कवि ने भीनमाल में ‘उपमिति भव प्रपंच कहा’ नामक एक महत्वपूर्ण रूपक ग्रंथ की रचना की। इसके अतिरिक्त  जिनप्रभ सूरि द्वारा प्रणित ‘तीर्थकल्प’ और मुनि चन्द्र का ‘अमर अरित’ भी राजस्थानी जैन साहित्य की सुदृढ़ नींव निर्मित करती है।

यह साहित्य मुख्यतः धार्मिक और नैतिक होने के बावजूद, इसका व्यापक प्रभाव केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। इसमें तत्कालीन सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों को भी इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षित किया गया। यह दर्शाता है कि धार्मिक साहित्य केवल उपदेशात्मक नहीं होता, बल्कि अपने समय के जीवन का एक महत्वपूर्ण दर्पण भी बन जाता है, जिससे शोधकर्ताओं को बहुआयामी अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए, ‘जयधवला टीका’, ‘गद्य कथामृतक’ और ‘उत्तर पुराण’ जैसे ग्रंथों में प्राचीन राष्ट्रकूट या राठौड़ वंश के शासकों का इतिहास मिलता है। इसी प्रकार समराइच्च कहा में पृथ्वीराज चौहान कालीन प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था का उल्लेख है और ‘कुवलय माला’ में प्रतिहार शासक वत्सराज के शासन और समाज का वर्णन है। इस प्रकार जैन विद्वानों ने, अपने धार्मिक लेखन के माध्यम से, अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक जीवन का एक मूल्यवान अभिलेख प्रस्तुत किया जिससे यह साहित्य इस प्रकार धार्मिक और लौकिक ज्ञान की अनुपम छटा प्रस्तुत करता है।

12वीं शताब्दी से राजस्थानी जैन साहित्य में प्रबंध-काव्य, फागु और चौपाई जैसे नए काव्य रूप प्रमुखता से उपलब्ध होने लगे। इस काल में साहित्यिक प्रयोगशीलता बढ़ी, और जैन कवियों ने विभिन्न शैलियों में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। 13वीं शताब्दी में ‘जिनदत्त चौपई’ (सं.1354) जैसी हिंदी पद्य रचनाएँ भी मिलती हैं, जो इस काल में भाषायी विविधता को दर्शाती हैं। मध्यकाल (विक्रम संवत 1600 से 1900) राजस्थानी जैन साहित्य के लिए अत्यंत उर्वर काल था। इस युग में कुशललाभ, हीरकलश, समयसुंदर, हेमरत्न, जटमल, लब्धोदय, मोहनविजय, विनय-लाभ, दामोदर, लाभवर्धन, विनयप्रभ, भतिकुशल, राजविजय, कल्याण कलश, रामचंद, रिखसाधु, वीरविजय, उत्तमविजय और हुलासचंद जैसे शताधिक जैन कवियों ने महत्वपूर्ण रचनाएँ कीं। इन कृतियों का महत्त्व राजस्थानी साहित्य के लिए ये मूल्यवान हैं ।

पार्श्वचंद्र सूरि (16वीं शताब्दी) के एक प्रमुख जैन संत टीकाकार के रूप में ख्यातिप्राप्त हुए। उन्होंने ही सबसे पहले राजस्थानी गद्य में भाषा टीकाएँ लिखना प्रारंभ कीं, जिसका आगे चलकर बहुत प्रचार हुआ। यह एक युगांतरकारी कदम था जो जैन साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण  भाषायी और शैलीगत परिवर्तन को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति केवल अनुवाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह जटिल आगम ग्रंथों को सीधे और सरल राजस्थानी गद्य में व्याख्यायित करके ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने की एक सचेत पहल थी, जिससे मौखिक परंपराओं से लिखित, व्याख्यात्मक गद्य की ओर उन्मुख हुआ। इस नवाचार ने धार्मिक ज्ञान का लोकतंत्रीकरण किया तथा इसे विद्वानों की व्याख्या या काव्यात्मक प्रस्तुति के दायरे से निकालकर स्थानीय भाषा में स्पष्टीकरण के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाया, जिससे राजस्थानी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिला। इसी कालखंड में खरतरगच्छ के संत कवि महोपाध्याय पुण्यसागर ने वि. सं. 1604 में ‘सुबाहु संधि’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें 89 पद्य हैं। उनके शिष्य पद्मराज की ‘अभयकुमार चौपई’ एक प्रसिद्ध रचना है, जो वि.सं. 1650 में में लिखी गई थी।

इसी परम्परा में दौलतराम काजीवाल, टोडरमल, गुमानीराम, दीपचन्द्र कासलीवाल, जयचन्द्र शांघड़ा, सदासुख कासलीवाल का नाम जैन टीकाकारों में उल्लेखनीय हैं। ये 18वीं और 19वीं शताब्दी के प्रमुख विद्वान थे, जिन्होंने टीका लेखन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से अधिकांश हिंदी के विद्वान थे। 18वीं-19वीं शताब्दी में इन विद्वानों का उदय यह दर्शाता है कि जैन टीका लेखन परंपरा भाषायी रूप से गतिशील और अंतर-क्षेत्रीय थी। यह केवल राजस्थानी तक सीमित नहीं थी, बल्कि हिंदी के माध्यम से एक व्यापक बौद्धिक संवाद का हिस्सा थी। यह प्रवृत्ति जैन विद्वानों की बहुभाषी दक्षता और उनके ज्ञान को विभिन्न भाषायी समुदायों तक पहुँचाने की प्रतिबद्धता को उजागर करती है, जिससे जैन साहित्य की पहुँच और प्रभाव का विस्तार हुआ।

जैन विद्वानों ने न केवल धार्मिक ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं, बल्कि व्याकरण, छंद, अलंकार, काव्य, वैद्यक और गणित जैसे विविध धर्मेतर शास्त्रों पर भी महत्वपूर्ण समालोचनात्मक कार्य किया। व्याकरण-शास्त्र अंतर्गत 'बाल शिक्षा', 'उक्ति रत्नाकर', 'पंच-सन्धि बालावबोध', 'हेम व्याकरण भाषा टीका', 'सारस्वत बालावबोध'; छंद शास्त्र में 'पिंगल शिरोमणि', 'दुहा चन्द्रिका', 'राजस्थानी गीतों का छन्द ग्रंथ', 'वृत्त रत्नाकर बालावबोध' और अलंकार-शास्त्र सम्बंधित 'वाग्मट्टालंकार बालावबोध', 'विदग्ध मुखमंडन बालावबोध', 'रसिक प्रिया बालावबोध'; काव्य टीकाओं में 'भर्तृहरिशतक-भाषा टीका त्रय', 'अमरुशतक', 'लघुस्तव बालावबोध', 'किसन-रुक्मणी की टीकाएँ', 'धूर्ताख्यान कथासार', 'कादम्बरी-कथा सार'; वैद्यक-शास्त्र आधारित 'माधवनिदान टब्बा', 'सन्निपात कलिका टब्बाद्वय', 'पथ्यापथ्य टब्वा', 'वैद्य जीवन टब्बा', 'शतश्लोकी टब्बा' तथा गणित-शास्त्र पर 'लीलावती भाषा चौपाई', 'गणित सार चौपाई' आदि टीकाएँ राजस्थानी समालोचना की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

राजस्थानी जैन टीका साहित्य की विशालता और महत्व को देखते हुए, इसकी पांडुलिपियों का संरक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। राजस्थान में जैन शास्त्र भंडारों की संख्या सर्वाधिक है, जो लगभग सभी प्रमुख नगरों और कस्बों में पाए जाते हैं। इन भंडारों में संस्कृत, अपभ्रंश, हिंदी और राजस्थानी भाषाओं में सैकड़ों अज्ञात और दुर्लभ ग्रंथ प्राप्त हुए हैं। यद्यपि इन भंडारों की पूरी सूची अभी तक तैयार नहीं हो पाई है, अनुमान है कि राजस्थान में दिगंबर और श्वेतांबर शास्त्र भंडारों की संख्या 200 से अधिक हैं। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर एवं  जैन विश्व भारती, लाडनूं का योगदान स्मरणीय है। इसके अतिरिक्त जयपुर  और जैसलमेर के जैन शास्त्र भण्डार में  सैकड़ों अज्ञात ग्रंथ और पांडुलिपियाँ शोध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

जैन टीका साहित्य का महत्त्व एक साहित्यिक विधा के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार आंदोलन के रूप में भी स्थापित करता है। यह साहित्य अपने समय में एक प्रभावी माध्यम था जिसने जैन सिद्धांतों को जनसाधारण के नैतिक आचरण और जीवनशैली में एकीकृत किया। 'जन-शैलीऔर 'सरल, सरस, सहज एवं बोधगम्य शैलीको अपनाने का निर्णय एक सचेत प्रयास था ताकि जटिल सिद्धांतों को लोगों के दैनिक जीवन में आत्मसात किया जा सके। इस व्यावहारिक अनुप्रयोग और व्यापक पहुँच ने एक विशिष्ट 'जैन शैली' का विकास किया, जो स्पष्ट, नैतिक और सुलभ धार्मिक प्रवचन का पर्याय बन गई।

समग्रतः राजस्थानी भाषा में लिखित जैन टीका साहित्य एक असाधारण रूप से समृद्ध और बहुआयामी साहित्यिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इस साहित्य ने न केवल जैन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को संरक्षित और प्रसारित किया, बल्कि राजस्थानी भाषा के विकास, स्थानीय लोक संस्कृति के संरक्षण और तत्कालीन सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भों के दस्तावेजीकरण में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैन विद्वानों ने विविध काव्य रूपों जैसे-रास, चौपाई, फागु का उपयोग करके धार्मिक ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पार्श्वचंद्र सूरि जैसे अग्रदूतों द्वारा राजस्थानी गद्य में टीका लेखन की शुरुआत ने भाषायी नवाचार को प्रेरित किया और स्थानीय बोलियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में विकसित किया। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास, प्रशासन और सामाजिक जीवन के लिए ये ग्रन्थ अमूल्य प्राथमिक स्रोत प्रदान करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक लेखन भी अपने समय के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य का एक मूल्यवान अभिलेख बन सकता है।

आधार ग्रन्थ

1.      पं. अम्बालाल प्रे. शाह, जैन साहित्य का वृहद् इतिहास, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संसथान, वाराणसी, सं. 1969

2.      डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन शास्त्र भंडारों की ग्रन्थ सूची, भारतीय श्रुति-दर्शन केंद्र, जयपुर, सं. 1957

3.      डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान के जैन संत, श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, महावीरजी, जयपुर, सं. 1967

4.      डॉ. नरेन्द्र भानावत (सं.), जैन संस्कृति और राजस्थान, जिनवाणी विशेषांक, सम्यग्ज्ञान प्रचारक में डल, जयपुर, सं. 1975

5.   डॉ. नरेन्द्र भानावत, जैन दर्शन तथा साहित्य का भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा पर प्रभाव, श्री जिनदत्तसूरि में डल, दादावाडी, अजमेर, सं.1980

6.      नाथूराम प्रेमी, जैन साहित्य और इतिहास, हिंदी ग्रन्थ रत्नाकर लिमिटेड, बम्बई, सं. 1956

7.      नाहटा, कासलीवाल, भानावत एवं सेठिया, राजस्थान का जैन साहित्य, प्राकृत भारती, जयपुर, सं. 1977

8.      डॉ. मनमोहनस्वरूप माथुर, राजस्थानी जैन साहित्य, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, सं.1999

9.      डॉ. हीरालाल जैन, भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान, मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद्, भोपाल, सं. 1962


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कवित्व


'मधुमती' फरवरी-2026 में प्रकाशित 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कवित्व

भारतीय साहित्य परम्परा में अनेक ऎसे साहित्यकार हैं, जिनकी प्रतिभा बहुमुखी रही है किन्तु किसी एक पक्ष के मूल्यांकन के आधार पर विख्यात हो गए हैं । उक्त क्रम में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम उल्लेखनीय हैं । आचार्य शुक्ल आलोचना विधा के आधार स्तंभ हैं तथा एक आलोचक के रूप में विख्यात है ।काव्यके प्रति आचार्य शुक्ल की आलोचना दृष्टि परवर्ती रचनाकारों के लिए सदैव आदर्श रही। आचार्य शुक्ल एक आलोचक तो हैं ही वरन एक कवि हृदय भी हैं ।  आलोचना विधा के महानायक आचार्य शुक्ल का कवि-हृदय भी उन्नत कोटि का रहा है। यद्यपि वे आलोचक तो हैं ही, तथापि उनका विपुल काव्य उनके कवि होने का प्रमाण  हैं। उनके विपुल काव्य का संकलन मधुस्रोतनामक काव्य-संग्रह में है । मधुस्रोतमें आचार्य शुक्ल रचित 31 कविताओं का संकलन है। जिसका प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा  द्वारा 1971 .(वि.सं.2028) में किया गया। 1901 . से 1929 . तक लिखित ये कविताएँ तत्कालीन प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं- सरस्वती, आनंदकादंबिनी, बालप्रभाकर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, लक्ष्मी, इन्दु, बाल हितैषी, माधुरी, सुधा आदि में प्रकाशित हुई।  मधुस्रोतनामक काव्य-संग्रह की सम्यक् विवेचन आचार्य शुक्ल की काव्य-प्रतिभा का निदर्शन, परवर्ती आलोचक का बीजग्रंथ और समय की अनुगूँज में प्रखर व्यक्तित्व का प्रमाण देता है। प्रस्तुत शोध पत्र में समीक्षा पद्धति के आधार पर मधुस्रोत नामक काव्यसंकलन का विश्लेषण करते हुए आचार्य शुक्ल के कवित्व का मूल्यांकन किया जा रहा है । 
 
मधुस्रोतमें आचार्य शुक्ल रचित 31 कविताओं का संकलन है। जिसका प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 1971 .(वि.सं.2028) में किया गया। 1901 . से 1929. तक लिखित ये कविताएँ तत्कालीन प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं- सरस्वती, आनंदकादंबिनी, बालप्रभाकर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, लक्ष्मी, इन्दु, बाल हितैषी, माधुरी, सुधा आदि में प्रकाशित हुई। ब्रज और खड़ी बोली में रचित इन कविताओं में अपने समय की साहित्यिक चेतना का निर्वाह है, वहीं ब्रज से खड़ी बोली का काव्य-भाषा के रूप में विकास का प्रमाण भी है। 1904. में रचितबसंतमें ठेठ ब्रजभाषा का संस्कार है, तो 1913 . में प्रकाशितविरह सप्तकमें ब्रज और खड़ी बोली का मिश्रित रूप प्रकट होता है। इसके बाद की रचनाओं में खड़ी बोली का प्रयोग है। 1929 . में रचितमधुस्रोतमें परिष्कृत खड़ी बोली है, जिसे आधुनिक काव्यभाषा का रूप माना जा सकता है।

            आचार्य शुक्ल ने कविता कोहृदय की मुक्तावस्थाकहा है।कविता क्या है?’ निबंध में वे कहते हैं- “ जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।”1 कविता के मर्म को उद्घाटित करने वाली इन पंक्तियों में आचार्य शुक्ल की आलोचक-दृष्टि प्रकट होती है, वहीं इसका रूप-विधानमधुस्रोतमें दिखाई पड़ता है।मधुस्रोतमें संकलित कविताओं का वर्गीकरण वण्र्य-विषय के आधार पर निम्नानुसार किया जा सकता है-

1.         प्रकृति प्रेम-         मनोहर छटा’, ‘प्रेम-प्रताप’, ‘विरह-सप्तक’, ‘प्रकृति-प्रबोध’, ‘हर्षोद्धार’,
                                    आमंत्रण’, ‘वसन्त-पथिक’, ‘रूपमय हृदयआदि।
2.         लोक-संस्कृति-   हृदय का मधुर भार’, ‘शिशिर-पथिक’, ‘मधुस्रोतआदि।
3.         कर्म-सौन्दर्य-       गोस्वामीजी और हिन्दू जाति’, ‘आशा और उद्योग’, ‘पाखंड-प्रतिषेधआदि।
4.         राष्ट्र प्रेम-            भारत और वसन्त’, ‘रानी दुर्गावती’, ‘भारत’, ‘फूट’, ‘देशद्रोही को दुत्कार
                                    आदि।
5.         श्रद्धा भाव-         भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’, ‘भारतेन्दु जयन्ती’, ‘श्री युत बाबू देवकीनंदन खत्री का
                                    वियोग’, याचना आदि।
6.         विविध-             बाल विनय’, ‘विनती’, ‘अन्योक्तियाँ’’, ‘वन्दना’, ‘हमारी हिन्दी’, ‘सुमन-
                                    संगीत’, झलक 1-2-3 इत्यादि।
संकलित कविताओं के वर्ण्य-विषय पर टिप्पणी करते हुए डॉ.रामचंद्र तिवारी ने लिखा- “प्रकृति के रम्य चित्रों से अलग अन्य कविताओं का महत्त्व इस दृष्टि से भी मान्य है कि उनमें शुक्लजी के समय के इतिहास की अनुगूँजे सुनाई पड़ती हैं और उनके प्रति उनकी निजी प्रतिक्रियाओं की झलक भी मिलती है।”2 इससे स्पष्ट होता है कि आचार्य शुक्ल की कविताओं में भारतेन्दु युगीन प्रवृत्ति- प्रकृति-प्रेम, ग्राम्य-संस्कृति, ब्रजभाषा प्रयोग;द्विवेदी- युगीन प्रवृत्ति- राष्ट्र प्रेम, इतिवृत्तात्मकता, खड़ी बोली प्रयोग और परवर्ती छायावादी काव्य-प्रवृत्ति- परिनिष्ठित काव्य भाषा का रचनागत निर्वाह स्पष्टतः प्रकट होता है। इसी दृष्टि से आचार्य शुक्ल की रचनाओं का काव्य संग्रहमुधस्रोतके साहित्यिक सौन्दर्य का अवगाहन करना समीचीन होगा।

प्रकृति-प्रेमकवियों का सदैव प्रिय विषय रहा है। आचार्य शुक्ल की कविताओं में प्रकृति की रम्य छटा सहज प्रसन्न शैली में व्यक्त हुई है। रीतिकालीन काव्य में प्रकृति उद्दीपन रूप में प्रकट हुई, परन्तु आचार्य शुक्ल ने इसे आलंबन रूप में ही ग्रहण किया। वे प्रकृति की सत्ता को स्वतंत्र मानते थे। प्रकृति के शुद्ध रूप की उपासना के कारण उन्होंने आरोपित भावों को स्वीकार नहीं किया।मनोहर छटा’, ‘आमंत्रण’, ‘रूपमय हृदयआदि कविताओं में प्रकृति का रम्य चित्रण इसी रूप में बिम्बित है। प्रकृति के आलम्बन रूप का दृश्य-विधान इन पंक्तियों में अवलोकनीय हैं-

नव दल-गुंथित पुष्प हास यह!
शशि रेख सुस्मित विभास यह!
नभ चुवित नग निविड़-नीलिमा उठी अवनि उर की उमंग सी।
कलित विरल घन पटल-दिगंचल-प्रभा पुलकमय राग-रंग सी।3
                                                            (रूपमय हृदय)

इसी प्रकारमनोहर छटामें प्रकृति को चित्रकार की गति के रूप में अंकित कर उसमें पल्लवित जीवन और सूर्य, चंद्र, नभ, जल, पर्वत आदि की भूमिका को भी चित्रित करते हुए कवि ने कहा-

नीचे पर्वत थली रम्य रसिकन मन मोहन ।
ऊपर निर्मल चन्द्र नवल आभायुत सोहत।।4
(मनोहर छटा)

            प्राकृतिक सुषमा के साथ लोक संस्कृति की शाश्वत सौन्दर्य कवि को मुग्ध करता है। ग्राम्य-जीवन में उसे सनातन संस्कृति के प्राण दिखाई देते हैं, जहाँ समस्त चराचर जगत के प्रति स्निग्ध स्नेह भाव है। नगर से दूर, कृत्रिम सभ्यता से विरत ग्राम्य-जीवन के खुले द्वार का रेखांकन कवि को आकर्षित करता है। हरे-भरे खेत, पेड़-पौधों पर लहराते पत्ते, गाँवों के खपरैल वाले घर और श्वेत छज्जे आदि भारतीय ग्राम्य-जीवन के बिम्ब हैं। यथा-

नगर से दूर कुछ गाँव की सी बस्ती एक,
हरे भरे खेतों के समीप अति अभिराम ।
जहाँ पत्राजाल अंतराल से झलकते हैं,
लाल खपरैल, श्वेत छज्जो के सँवारें धाम।।5
(हृदय का मधुर भार)

            ग्राम्य-संस्कृति में कवि का मन इतना रम गया है कि वहाँ की सुषमा उन्हें देवलोक के समान प्रतीत होती है। यहाँ प्रकृति का खुला प्रसार है, जहाँ पशु, पक्षी, मानव सब एकात्म भाव से रहते हैं।ग्रामको खुला स्वप्न मानते हुए कवि मनुष्य जीवन में इसे मधु के समान मानकर प्रेरणा लेने का भी आह्वान करता है, यथा-

कहीं हृदय अपना समेटकर,
कोश-कीट बन जाय न तू नर।
इसी हेतु अविरल मधुधारा,
द्वार-द्वार पर टकराती है।
$  $  $
तुम भी ग्राम! खुले सपने हो,
रूप रंग में वही बने हो।6
(मधुस्रोत)

आचार्य शुक्ल ने अपने निबंधउत्साहमें कर्म सौन्दर्य के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- “कर्म में आनन्द अनुभव करने वालों ही का नाम कर्मण्य है। धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनंद भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फल-स्वरूप लगते है। अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और तुष्टि होती है, वही लोकोपकारी कर्म-वीर का सच्चा सुख है।”7वस्तुतः कर्म सौन्दर्य वह बीज है जोक्षात्रधर्मकी प्रतिष्ठा करता है। आचार्य शुक्ल ने अपने युग की ध्वनि को पहचान लिया था और स्वाधीनता आन्दोलन में रचनाकार की भूमिका को भी निर्धारित कर दिया।

            भारत और बसंतमें वंदे मातरम् का शंखनाद, ‘रानी दुर्गावतीमें नारी के शौर्यपूर्ण चरित्र का गुणगान, ‘देशद्रोही को दुत्कारमें अभिव्यक्त विचार स्वाधीनता आन्दोलन की छाया में पल्लवित हुए। राष्ट्रधर्म से विमुख लोगों को कवि ने अपने हृदय से ही निकालने की घोषणा कर दी है-

जा दूर हो अधम सन्मुख से हमारे,
हैं पाप-पुंज तब पूरित अंग सारे,
जो देश से न हट तो हृद-देश से ही,
देते निकाल हम आज तुझे भले ही।8
(देशद्रोही को दुत्कार)

            आचार्य शुक्ल ने राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मानकर अन्याय का प्रतिकार करने का आह्वान किया। अपने युग की पदचाप अनुसार उन्होंने निष्काम भाव से आगे बढ़ने का निश्चय किया। शत्रु चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, कवि अपना उद्योग छोड़ने को तैयार नहीं। अन्यायी को दण्ड देने का भाव प्रकट करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-

देश, दुःख अपमान जाति का बदला मैं अवश्य लूँगा।
अन्यायी के घोर पाप का, दण्ड उसे अवश्य दूँगा ।
यद्यपि मैं हूँ एक अकेला, बैरी की सेना भारी ।
पर उद्योग नहीं छोडूँगा, जगदीश्वर हैं सहकारी।।9
(आशा और उद्योग)

            तुलसी की भक्ति को स्पष्ट करते हुए आचार्य शुक्ल ने लिखा- “वह केवल व्यक्तिगत एकांत साधना के रूप में नहीं है, व्यवहार क्षेत्र के भीतर लोक-मंगल की प्रेरणा करने वाली है।”10 वस्तुतः शील-निरूपण की दृष्टि से उन्होंने तुलसी को हिन्दी का श्रेष्ठ कवि माना। आचार्य शुक्ल नेलोगमंगल की साधनावस्थाको आगे बढ़ाया। तुलसी ने प्रभु श्री राम के लोकरक्षक रूप का चित्रण किया तो आचार्य शुक्ल ने भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हुए नैराश्य के वातावरण में प्रभु के लोक रक्षक  रूप का वर्णन किया-

जिस दंडक वन में प्रभु  की, को दंड-चंड-ध्वनि भारी।
सुनकर कभी हुए थे कंपित, निशिचर अत्याचारी।
वहीं शक्ति वह झलक उठी, झंकार सहित भयहारी।
दहल उठा अन्याय, उठो फिर मरती जाति हमारी ।।11
(गोस्वामी और हिन्दू जाति)


आचार्य शुक्ल ने काव्य में रहस्यवाद को उचित नहीं माना। काव्य दृष्टि और रहस्यवाद के संबंध में उनके विचार हैं- “अब विचारने की बात है कि किसी अगोचर और अज्ञात के प्रेम में आँसुओं की आकाश-गंगा में तैरने, हृदय की नसों का सितार बजाने, प्रियतम असीम के संग नग्न प्रलय-सा ताण्डव मरने या मुँदे नयन-पलकों के भीतर किसी रहस्य का सुखमय चित्र देखने को ही- ‘भीतक तो कोई हर्ज न था- कविता कहना, कहाँ तक ठीक है? छोटे-छोटे कनकौवों पर भला कविता कब तक टिक सकती है? असीम और अनन्त की भावना के लिए अज्ञात  या अव्यक्त की ओर झूठे इशारे करने की कोई जरूरत नही।”12
            यद्यपिकाव्य में रहस्यवादपुस्तिका 1929 . में प्रकाशित हुई, किन्तु उनके काव्य में रहस्यवाद पर आलोचनात्मक आक्रमण पहले ही आ गया था।रूपमय हृदयमें ज्ञात के  महत्त्व को स्थापित किया तोहृदय के मधुर भारमेंरहस्यके वर्णन का विरोध किया। इसके बादपाखंड-प्रतिषेधमें काव्य में रहस्यवाद के विरूद्ध आक्रामक प्रहार किया और तत्कालीन छायावादी कवियों पर पैनी शाखा में कटाक्ष भी किया-
काव्यमेंरहस्यकोईवादहै न ऐसा, जिसे,
लेकरनिरालाकोई पंथ ही खड़ा करे।
यह तो परोक्ष रूचि-रंग की ही झाई है, जो
पड़ती है व्यक्त में अव्यक्त-बिम्बता धरे ।।13
(पाखंड-प्रतिषेध)

मर्यादावादी आचार्य शुक्ल ने इसी कविता में विलियम ब्लेक केकल्पनावादपर भी कठोर टिप्पणी करते हुएआंग्ल की भूमि बीच ब्लेक ने जो ढोंग रचारहस्य-कल्पना का विरोध किया। यद्यपि यह अलग विषय है किसुधापत्रिका में प्रकाशन के बाद ठीक अगले अंक मार्च, 1928 . में पं.मातादीन शुक्ल ने उक्त कविता के विरोध मेंपाखंड-परिच्छेदकविता लिखी, जिसमें रहस्यवाद को महिमा मंडित किया गया।निरालाने भी अपने व्यंग्य-बाणों से आचार्य शुक्ल को निशाना बनाया। यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि आचार्य शुक्ल रहस्यवादी कविताओं में भाव और व्यंजना की अत्यधिक कृत्रिमता से खिन्न थे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रत्यक्ष संघर्ष में बाधा मानते थे। उनकी रहस्यवाद के विषय में कठोर टिप्पणियों को इसी भाव से देखना चाहिए, क्योंकि छायावादी कवियों से उनके संबंध अत्यधिक मधुर थे।

आचार्य शुक्ल की आलोचना भाषा में शब्द, नाद और बिम्ब का अपूर्व संयोजन दिखाई देता है। यह उनकी काव्यात्मक भाषा से प्रभावित प्रतीत होता है। इस संदर्भ में डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी ने आचार्य शुक्ल की भाषा का विश्लेषण करते हुए लिखा- “सावधान शब्द-प्रयोग, नाद-सौंदर्य और बिम्ब-विधानसाधारणतः काव्यभाषा के ये गुण रामचंद्र शुक्ल की आलोचना भाषा में पाए जाते हैं। यथा, एक उदाहरण द्रष्टव्य है- “पर्वतों की दरी कंदराओं में, प्रभात के प्रफुल्ल पद्मजाल में, छिटकी चांदनी में, खिली कुमुदिनी में हमारी आँखें कालिदास, भवभूति आदि की आँखों में जा मिलती है। पलाश, इंगुटी, अंकोट के वनों में अब भी खड़े हैं, सरोवरों में कमल अब भी खिलते हैं, तालाबों में कुमुदिनी अब भी चाँदनी के साथ हँसती है, वनीर शाखाएँ अब भी झुककर तीर का नीर चूमती है, पर हमारी आँखें उनकी ओर भूलकर भी नहीं जाती, हमारे हृदय से मानो उनका कोई लगाव ही नहीं रह गया।”14 उपर्युक्त पंक्तियों के भाव आचार्य शुक्ल कीमधुस्रोतकविता में इस प्रकार ढले-

दिक् दिक् की आँखें मतवाली
धरती हैं किंशुक की लाली
जहाँ जहाँ ये रूप खड़े हैं
जहाँ जहाँ ये दृश्य अड़े हैं
कालिदास, भवभूति आदि के
हृदय वहाँ पर मिल जाते हैं।15
(मधुस्रोत)

हिन्दी की आरंभिक खड़ी बोली में भाषा सहनता एवं सुबोध प्रस्तुति में भी बिम्ब-विधान आकर्षित करता है। प्रकृति की रमणीयता का चाक्षुष-बिम्बमय वर्णन द्रष्टव्य है-

भूरी, हरी घास आस पास, फूली सरसों हैं,
पीली पीली बिन्दियों का चारों ओर है पसार;
कुछ दूर विरल, सघन फिर, और आगे,
एक रंग मिला चला गया पीत पारावर ।16
(हृदय का मधुर भार)

आचार्य शुक्ल की कविताओं में जहाँ एक ओर  प्रकृति-प्रेम, ग्राम्य-संस्कृति, ब्रजभाषा प्रयोग है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्र प्रेम, इतिवृत्तात्मकता, खड़ी बोली का प्रयोग देखने को मिलता है । आचार्य शुक्ल का काव्य न केवल परिनिष्ठित काव्य भाषा का रचनागत निर्वाह मात्र है  अपितु लोकमंगल की साधना, शब्द, नाद और बिम्ब का अपूर्व संयोजन भी है । उनके काव्य की विशेषता यह है कि हिन्दी कविता को संस्कृत काव्य-परम्परा के अनावश्यक निर्वाह और पाश्चात्य शैली के अंधानुकरण से मुक्त करने का प्रयास किया। हिन्दी में मौलिक लेखन का पंथ-निर्मित कर आगे की राह को सुगम किया।मधुस्रोतका भाव एवं कला सौन्दर्य निर्धारित प्रतिमानों से भिन्न तत्कालीन आवश्यकता के परिप्रेक्ष्य में विवेचनीय है। उक्त निष्कर्ष से निगमित होता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल का न केवल एक आलोचक है वरन् उन्नत कोटि के कवि भी हैं 


संदर्भ-ग्रंथ -
1.         आचार्य रामचंद्र शुक्लः चिन्तामणि भाग प्रथम, अशोक प्रकाशन, दिल्ली-6, सं.2004 पृ.सं.70
2.         रामचंद्र तिवारीः भारतीय साहित्य के निर्माता- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं. 2005, पृ.सं.29
3.         रामचंद्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि., पृ.57
4.         वही, पृ.सं.23
5.         वही, पृ.सं.30
6.         वही, पृ.सं.5
7.         आचार्य रामचंद्र शुक्लः चिन्तामणि भाग प्रथम, अशोक प्रकाशन, दिल्ली-6, सं.2004, पृ.सं.8
8.         रामचंद्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि., पृ.सं.71
9.         वही, पृ.सं.76
10.       उद्धृत, रामचंद्र तिवारीः भारतीय साहित्य के निर्माता- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं.2005, पृ.सं.29
11.       रामचंद्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 19, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि., पृ.सं.98
12.       नामवर सिंहः रामचंद्र शुक्ल संचयन, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-1, सं.2017 पृ.सं.56-57
13.       रामचन्द्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि0, पृ.सं.93
14.       रामस्वरूप चतुर्वेदीः आचार्य शुक्ल की आलोचना भाषा, आलेख, आलोचना अप्रेल-जून 1985, पृ.सं.115
15.       रामचन्द्र शुक्लः मधुस्रोत, नागरी प्रचारिणी ग्रंथमाला 79, ना.प्र.सभा, वाराणसी, सं.2028 वि.,पृ.सं.5
16.       वही, पृ.सं.30
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राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक समरसता में साहित्य की भूमिका

राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक समरसता में साहित्य की भूमिका
साहित्य-अर्चना, स्मारिका-२०२५ में प्रकाशित

राष्ट्र एक जीवन्त, जाग्रत इकाई है। राष्ट्र स्वयंभू है, सृष्टि की रचना ही इस बात का निर्धारण करती है कि किस राष्ट्र का सृजन, अभ्युदय, पतन अथवा पुनरूत्थान हो, क्योंकि राष्ट्र का भी जीवनोद्देश्य होता है। अतः प्रत्येक राष्ट्र में अस्तित्व बोध होना सहज स्वाभाविक है। राष्ट्र केवल पर्वत-नदी या समतल भूमि नहीं होता, बल्कि उस भूमिखंड में निवास तथा विकास करने वाले मानव-समूह का जीवन अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहता है। राष्ट्र और उसकी संस्कृति मिलकर समूचे विश्व में अपनी पहचान स्थापित करते हैं। राष्ट्र का निजत्व होता है, गुणधर्म होता है, उसकी पहचान, आकृति, अस्मिता और भूगोल होता है। यजुर्वेद में कहा गया कि हम राष्ट्र के पुरोहित हैं। हम भोग में भी त्याग के समान आचरण करते हैं। विश्व के सभी प्राणी सुखी हों, ऐसी उदात्त भावना है। भारतीय संस्कृति अखिल विश्व के समस्त संस्कारों, परम्पराओं, सभ्यता के विभिन्न तत्त्वों, लौकिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक मान्यताओं को समाविष्ट किए हुए हैं। इसलिए मनीषियों ने इसे ‘सा प्रथमा संस्कृति विश्वधारा’ के रूप में बोधित किया है। इसी सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय मनीषा ने राष्ट्र को भी परिभाषित किया है। 

विश्व साहित्य की प्रथम पुस्तक, जिसे यूनेस्को ने भी स्वीकार किया है, वह है- ऋग्वेद। उसमें कहा गया है- मनुर्भवः, अर्थात् मनुष्य बनो। मनुष्यता का बोध ही भारतीय संस्कृति का मूल है, जो वर्तमान और भविष्य के लिए भी जरूरी है व रहेगी। हमें यह समझना होगा कि भारतवर्ष पूर्वी-पश्चिमी सभ्यताओं का समूह नहीं, वरन मानवता का संस्कार देने के लिए ईश्वरीय योजनानुरूप इस राष्ट्र का उदय हुआ। भारत की राष्ट्रीय संस्कृति का निर्माण हजारों वर्ष में हुआ है। उसके निर्माण के कई कारक हैं। साहित्य का अवदान उसमें अन्यतम है। अपनी संस्कृति का सीधा संवाद साहित्य से होता है। भारतीय साहित्य की पारस्परिक अन्तःसंबद्धता तथा आधारभूत एकता को प्रतिबिम्बित करने वाले अनेक तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं। हम प्रकृति के सहचर हैं, जिससे हम रस ग्रहण कर जीवन को गति प्रदान करते हैं, दूसरी ओर पश्चिमी दृष्टि की धारणा है कि मनुष्य का प्रकृति पर आधिपत्य है और वह भोग के लिए है। भारतीय परम्परा का ज्ञान हमारे साहित्य ने करवाया। राम, कृष्ण, वाल्मीकि, वेदव्यास का व्यक्तित्व हमारी विरासत में साहित्य की देन है। शरीर नश्वर है, कर्म ही जीवन है, ज्ञान, इच्छा और क्रिया का समन्वय होना चाहिए यह सब हमारे साहित्य में लिखा गया और अपने-अपने समय के अनुकूल लिखा गया। भारतीय राष्ट्रीयता के लिए वन्देमातरम् का उद्घोष, शंकराचार्य का एकात्मभाव, विवेकानंद की विराट दृष्टि ने आने वाली पीढ़ियों को चमत्कृत कर दिशा दी। 

भारत की विशालता और विविधता के बावजूद उसे परस्पर जोड़ने में संस्कृत-साहित्य का अन्यतम महत्त्व हैं। वेद, उपनिषद, स्मृति, ब्राह्मण ग्रन्थ, रामायण, महाभारत, चरक, सुश्रुत इत्यादि में सांस्कृतिक चेतना का ऐसा युग-युगीन सेतु बन चुका है, जिसमें पूरा भारत वर्ष एक बना हुआ है। कालिदास का रघुवंश, महाकाव्य, भवभूति और अश्वघोष का साहित्य, माघ और भाष का चिंतन हमारी राष्ट्रीयता संवर्धक है। संस्कृति की इस चेतना को बलवती बनाने में कश्मीर के पंडितों व आचार्यों का सराहनीय महत्त्व है। आचार्य कल्हण द्वारा लिखित राजतरंगिणी इतिहास का महाभारत के बाद पहला ग्रन्थ माना जाता है। इसी प्रकार विल्हण का योगदान कम नहीं है। जिस कश्मीर में आतंक का ताण्डव चक्र रहा है वहां कभी- 8वीं से 12 वीं शती तक प्रत्यभिज्ञा दर्शन का साम्राज्य था, जिसमें शैवोपासना की संस्कृति का उज्ज्वल प्रकाश बिखरता रहता था। इसी काल के दसवीं से ग्यारहवीं शती मे आचार्य अभिनवगुप्त ने ध्वनि में रस और रस में जीवन तलाशने का भगीरथ प्रयास किया था। 
विवेकानंद ने 30 वर्ष की उम्र में अपने ज्ञान से दुनिया को विस्मित कर दिया था। उन्होंने 1200 वर्ष बाद शंकराचार्य की परम्परा को संवाहित किया और यह स्पष्ट किया कि मनुष्य श्रेष्ठ है। मनुष्य का अस्तित्व मानवता की पराकाष्ठा है एवं आत्म तत्त्व को पहचानना है। यही कारण है कि पश्चिम के विज्ञान और पूर्व के ज्ञान के समन्वय पर बल देने वाला व्याख्यान भारत को दुनिया में सिरमौर बनाता है। 1913 में गीतांजलि पर टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिलता है। मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में जन चेतना को जाग्रत करती है। 1915 में ‘उसने कहा था’ कहानी उस शाश्वत वचन को प्रमाणित करती हैं, जिसमें कहा गया है कि ‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई।‘ साकेत का यह कथन विचारणीय है- ‘संदेश नहीं मैं यहाँ स्वर्ग का लाया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।’ यह साहित्य समकाल में लिखा गया, जो हमारी परम्परा से प्रभावित था। 1936 में ‘राम की शक्ति पूजा’ भी अपने अन्दर रामत्व को जगाने का प्रयास है। प्रसाद अथवा दिनकर, अज्ञेय अथवा धर्मवीर भारती सबने उस भारतीय परम्परा को आगे बढ़ाया, जिसके सूत्र वैदिक ऋषियों से प्राप्त हुए थे। 

राष्ट्र को सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नत बनाने में साहित्य का योगदान अतुल्य है। पं. विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य और संस्कृति के अन्तःसम्बन्ध को व्याख्यायित करते हुए लिखा कि इस देश की संस्कृति सीता है, जो धरती से जनक के हल के नोक से पैदा हुई हैं। इस देश की संस्कृति गंगा है, जिन्हें भगीरथ ने अपने परिश्रम से पहाड़ खोदकर निकाला था। इस देश की संस्कृति गौरी है, जिन्होंने अपने प्रियतम को सौन्दर्य से नहीं तम से प्राप्त किया था। इस देश की संस्कृति असंख्य ग्रामीण बन्धु और वनवासी हैं, जो असंख्य बाधाओं को राम की धनुही से तोड़ने का विश्वास रखते है।

भारत के विभिन्न अंचलों में व्याप्त बोलियों का एक विशाल साहित्य है। उस विशाल लोक साहित्य में संस्कृति की अनेक तरंगे प्रस्फुटित हुई हैं। हिन्दी की तमाम उपबोलियों में, पंजाबी जुबान के साहित्य में, बंगला, उड़िया, असमिया, मलयालम, कन्नड़, तेलगु, तमिल भाषाओं में व्याप्त भारतीय संस्कृति के विविध रंगों का आस्वाद एक जैसा है। राजस्थानी लोकगीतों के प्रवाह में संस्कृति का रत्न छिपा है। कहना न  होगा कि भारत की इन भाषाओं-उपभाषाओं में संस्कृति की समझ बड़ी समृद्ध है। अनेक भावों की अंतर तरंगे अध्यात्म के महाभाव में मिलकर एक महातरंग को जन्म देती हैं। भाषा-उपभाषा में लिखित और मौखिक साहित्य की लिपि भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, उच्चारण में भेद हो सकते हैं, भौगोलिक विभिन्नताएँ हो सकती हैं, कहीं रेगिस्तान, कहीं हरियाली, कहीं मैदान तो कहीं पहाड़ हो सकते है- पर सबका भाव एक ही है। 

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में हिन्दी की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्य धारा ने भारत के आत्म-गौरव को जगाने का कार्य किया। इस धारा के कवियों में मैथिलीशरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन‘, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारीसिंह दिनकर आदि अनेक कवियों ने राष्ट्रीयता के भावों से संपन्न ऐसा साहित्य रचा कि वे स्वाधीनता आन्दोलन में जन-जागृति के प्रमुख स्रोत बन गए। यह भी उल्लेखनीय है कि स्वाधीनता संग्राम काल के इसी काल खंड में समानांतर रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में असीम मात्रा में स्फुट काव्य भी सृजित हुआ, जिसने सामान्य जन-मानस के देशप्रेम को मुखर स्वर दिया और भारतीय मनीषा को जाग्रत किया। 
सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा के अत्यधिक ओजस्वी कवि रहे हैं। वासवदत्ता, कुणाल, विषपान आदि प्रबंधात्मक रचनाओं के माध्यम से पं. द्विवेदी जी ने अतीत की ओर उन्मुख देश के गौरवशाली इतिहास और भारत की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय-संघर्ष के लिए प्रेरक स्रोत बनाया। उन्होंने राष्ट्रीयता का मुक्त कंठ से गान किया था। “भैरवी” के विप्लवी गीतों में कवि के प्राण राष्ट्रीय भावना में बहते हुए से दिखाई देते हैं। राष्ट्र की चेतना को संपूर्ण रूप में प्रस्तुत करते हुए कवि ने स्वयं अपने स्वरों को राष्ट्र-प्रेम पर समर्पित कर उत्साह का संचार किया, यथा-
वन्दना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला दो।
वंदिनी माँ को न भूलो, राग में जब मत झूलो।
अर्चना के रत्न कण में, एक कण मेरा मिला लो।।

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की कविताओं में स्वदेश धर्म का निर्वाह, कारागार के शून्य जीवन में भी सार्थकता, मातृभूमि के प्रति अपार लगाव, कवि की अन्तर्चेतना तक जागरण की ध्वनि पहुँचाने की क्षमता और राष्ट्र के प्रति एकनिष्ठ प्रेम से उन्हें कालजयी बनाने का अवसर प्राप्त होता है।  राष्ट्रधर्म की रक्षा तत्कालीन समय की मांग थी। अंग्रेजों के समक्ष निडरता से हृदय की अभिव्यक्ति को प्रकट करना साहस भरा कार्य था। ‘नवीन’ जी ने राष्ट्रीय भावों को काव्य का विषय बनाकर भारतीय जनता की स्वातंत्र्य  चेतना को विकसित किया। विदेशी दासता के विरूद्ध शंखनाद करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-
कोटिकोटि कंठों से निकली, आज यही स्वरधारा है।
भारत वर्ष हमारा है यह, हिन्दुस्थान हमारा है।

महाकवि निराला ने युगीन आवश्यकता को दृष्टिगत रखकर राष्ट्रीयता को संस्कृति के स्वरूप में ढालकर चित्रित किया। ‘भारती वंदना’, ‘यमुना के प्रति’, ‘मातृवन्दना’, ‘जागो फिर एक बार’, ‘दिल्ली’, ‘खण्डहर के प्रति’, ‘राम की शक्ति पूजा’, ‘तुलसीदास’ आदि में राष्ट्रीयता का भव्य स्वरूप दृष्टिगोचर होता है। भारत भूमि को माता मानकर स्तुति करते हुए लिखते हैं-
भारति, जय विजय करे, कनक-शस्य-कमल धरे
लंका पद-तल-शत दल, गर्जितोर्मि सागर जल
धोता शुचि चरण युगल, स्तव कर बहु अर्थ भरे।

रामधारीसिंह ‘दिनकर’, जिनके काव्य में राष्ट्र-प्रेम की पूजा है, राष्ट्रीय संस्कृति की पुनः उन्नयन की अभिलाषा है, सामाजिक चेतना की युगाभिव्यक्ति है तथा ओज और प्रसाद का मिश्रण है। उस विराट व्यक्तित्व का महत्त्व न केवल हिन्दी साहित्य में बल्कि भारतीय जन मानस के हृदय की मुखर अभिव्यक्ति में स्पष्ट परिलक्षित होती है । दिनकर अहिंसा को शक्ति और पौरूष के साथ स्वीकार करता है। उनके अनुसार त्याग करूणा और क्षमा शूरवीरों को शोभा देती है और अपमान, शोषण को सहन करना कायरता है- 
छोड़ प्रति वैर पीते मूक अपमान वे ही;
जिनमें न शेष शूरता का वह्निताप है।।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना का स्थापना काल भारत के स्वाधीनता-संघर्ष काल के समय का है। भारतीय राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के विचार को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से यह संगठन स्थापित हुआ और एक शताब्दी की यात्रा इसका प्रमाण है। जिसका उद्देश्य है-ऐसे व्यक्तियों का निर्माण जो राष्ट्र प्रेमी कर्तव्यनिष्ठ, परिश्रमी, प्रामाणिक और मूल्यों की रक्षा करने वाले हों। संघ के इस विराट उद्देश्य की प्रतिपूर्ति हेतु तथा स्वयंसेवकों को वैचारिक दृष्टि प्रदान करने के लिए संघ गीत रचे गए। इन गीतों की विषय वस्तु में मातृ-वंदना, राष्ट्र-अर्चना, ध्वज-वंदन, ध्येय-चिंतन, केशव-माधव वंदना, उद्बोधन, संचलन एवं प्रासंगिक गीत प्रमुख हैं। आज ये गीत देश के आम जन गुनगुनाते हैं। ‘वन्देमातरम‘ गीत स्वाधीनता संग्राम का महत्त्वपूर्ण प्रेरणा-गीत बनकर उभरा। इस गीत के महत्त्व को एक राष्ट्रप्रेमी व्यक्ति बहुत अच्छी तरह समझता है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक गौरव का अभियान भी है। ‘राष्ट्र की जय चेतना‘ संघ-गीत में रचनाकार की अनुभूति निम्न शब्दों में प्रकट होती है-
सृष्टि बीज मंत्र का है मर्म वन्देमातरम।
राम के वनवास का है काव्य वन्देमातरम।
दिव्य गीता ज्ञान का संगीत वन्देमातरम।
राष्ट्र की जय चेतना का गान वन्देमातरम।

किसी भी देश की संस्कृति को प्रणम्य बनाने एवं कालखंड को अमरता प्रदान करने में साहित्यकार की अहम् भूमिका होती है। भारतीय संस्कृति सनातन, समृद्ध और जीवन्त है। आज भारतीय समाज जाति-पंथ-मत आदि विषमताओं से संघर्ष कर रहा है। विदेशी ताकतें छल, भय, प्रलोभन आदि से धर्मान्तरण करने के षड़यंत्र कर रही हैं। तब भारतीय साहित्य का अवलोकन समीचीन होगा। भारतीय समाज की समन्वयात्मक दृष्टि सम्पूर्ण साहित्यिक फलक पर प्रतिभासित है। भारतीय चिंतन परम्परा व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित है। हमारे जीवन का कोई पक्ष ऐसा नहीं है, जिस पर हमारी परंपरा ने विचार नहीं किया। हमारे शास्त्रों ने जीवन के उज्ज्वल उदात्त पक्ष को ग्रहण करने पर सदैव बल दिया। इसकी परम विशेषता रही है कि उसने पदार्थ को आवश्यक माना पर उसे आस्था का केन्द्र नहीं, शस्त्र-शक्ति का सहारा लिया, लेकिन उसमें त्राण नहीं देखा, अपने लिए दूसरों का अनिष्ट हो गया, पर उसे क्षम्य नहीं माना। यहाँ जीवन का लक्ष्य विलासिता नहीं, आत्म-साधना रहा, लोभ-लालसा नहीं, त्याग-तितिक्षा रहा। 

हिन्दी का भक्ति साहित्य इस दृष्टि से अनिर्वचनीय है, जहाँ कबीर तुलसी जैसे महात्माओं ने समाज के एकात्म को गहराई से पहचाना। युगद्रष्टा कबीर ने जब इस भूमि पर अवतरण लिया, वह युग हिन्दुओं के लिए घोर निराशा का था। उनकी संस्कृति व राष्ट्र दोनों ही पद-दलित हो रहे थे। समाज दिशाविहीन था तो संक्रमणकाल में महात्मा कबीर ने भारत-भूमि के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय आदर्श को कायम रखने के लिए लोक-मानस का नेतृत्व किया और अपने प्रखर व्यक्तित्व से घोर-निराशा के दलदल में फँसी भारतीय जनता को नव-जीवन प्रदान किया। उन्हें सांस्कृतिक विरासत के संवाहक की संज्ञा से अभिहित किया जाये, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं। भारतीय जन मानस अपनी संस्कृति के प्रति निष्ठावान था, तो बाह्याडम्बरों से उसमें विकृतियाँ भी व्याप्त हो गई थी। आचरण की अपेक्षा उपासना पद्धति महत्त्वपूर्ण हो गई थी। विधर्मियों के उपहास से आहत भारतीय लोक मानस को अपने आन्तरिक आचरण को शुद्ध करने पर बल दिया और आत्म-ज्योति को जाग्रत करने का आह्वान करते हुए कहा कि इस मन को मथुरा, दिल को द्वारका और काया को काशी समझो। दस द्वारों वाला देवालय रूपी शरीर तुम्हारे पास है, उसी में आत्म-ज्योति को तलाश करो, यथा-
मन मथुरा, दिल द्वारिक, काश कासी जाँनि।
दस द्वारे का देहरा, तामें जोति पिछांनि।।

इन पंक्तियों में महात्मा कबीर ने जनता की उपासना पद्धति को परिष्कृत कर उसे भारतीय मूल्यों की ओर अग्रसर किया, जिसमें आत्म-ज्योति का अवलोकन महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक गत्यात्मकता ने रूढ़ियों को तोड़कर परम्पराओं को परिष्कृत किया। जातिगत दुर्व्यवहार से त्रस्त हिन्दू समाज को मुक्ति दिलाने में महात्मा कबीर का अद्वितीय योगदान रहा। वर्णाश्रम धर्म की मर्यादा के नाम पर जब हिन्दू समाज अस्पृश्यता के दलदल में फँस गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा-
काहै को कीजै पांडे छोति विचारा, छोति हि ते उपजा संसारा।
हमारे कैसे लोहू, तुम्हारे कैसे दूध, तुम कैसे ब्राह्मन पांडे, हम कैसे सूद।।

गोस्वामी तुलसीदास ने तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन कर उसी के अनुरूप अपने युग की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने अपने काव्य में राम जैसे आदर्श चरित्र के भीतर अपनी अलौकिक प्रतिभा एवं काव्य शास्त्रीय निपुणता के बल पर भक्ति का प्रकृत आधार खड़ा किया तथा उसमें मानव जीवन के पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक आदि सभी दशाओं के चित्रों और चरित्रों का विधान किया। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से सामाजिक विषमता और वैमनस्य को कम करने का प्रयत्न किया। विभिन्न मत-मतान्तरों में समन्वय का प्रयास किया। इसी कारण आलोचक उन्हें ‘समन्वयवादी भक्त कवि’ के रूप में सम्बोधित करते हैं। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, “तुलसीदास को जो अभूतपूर्व सफलता मिली, उसका कारण यह था कि वे समन्वय की विराट् चेष्टा है। उनके काव्य में ज्ञान और भक्ति, सगुण और निर्गुण, गार्हस्थ्य और वैराग्य, शैव और वैष्णव, राजा ओर प्रजा, शील ओर सौन्दर्य आदि के समन्वय की भावपूर्ण झाँकी देखी जा सकती है। तुलसीदास शुद्ध साधना के समर्थक थे। इसमें वह गृहस्थ और संन्यासी में किसी प्रकार के भेद को स्वीकार नहीं करते थे। उनकी दृष्टि में साधक चाहे घर में रहे या वन में, उसके लिए विषय-वासना से विमुखता आवश्यक है-
जो जन रूखे विषय-रस चिकने राम-सनेह।
तुलसी ने प्रिय राम के कानन बसहिं के गेह।।

तुलसीदास के समय में शैव और वैष्णव संप्रदाय का वैमनस्य चरम पर पहुँच गया था। शैव सम्प्रदाय शिव को तथा वैष्णव सम्प्रदाय विष्णु की भक्ति को सर्वोपरि मानते थे। रामचरित मानस में विष्णु के अवतार श्रीराम को शिव-भक्त बताकर समन्वय की धारा बहाई, यथा- 
शिव द्रोही मय दास कहावे।
ते नर मोहि सपनेहु नहिं भावे।।” 

आधुनिक रचनाकारों में प्रसाद रचित कामायनी ‘सामरस्य’ पर बल देती है। कामायनी में स्पष्ट होता है कि हमारा सामाजिक जीवन विसंगतियों को शिकार हो गया है। जाति, धर्म, संप्रदाय आधारित विकृत व्यवस्था मानवता के साथ चल रही है, जिसके मूल में मात्र विद्वेष है। यह विद्वेष ही संघर्ष को जन्म दे रहा है। प्रसाद ने कहा-
द्वयता में लगी निरन्तर ही, वर्णों की करती रहे सृष्टि।
अनजान समस्याएँ गढ़तीं, रचती हैं अपनी ही विनष्टि ।।
क्या यह विद्वेष समाप्त नहीं हो सकता? हम आधुनिक मानव एवं विकसित सभ्यता का दंभ पालने वाले ऐसे विश्व का निर्माण नहीं कर सकते, जैसा कामायनी में वर्णित है-
शापित न यहाँ है कोई, तापित पानी न यहाँ हैं।
जीवन वसुधा समतल है, समरस है जो कि जहाँ है।। 

एकात्म मानववाद की अवधारणा मनुष्य को खंड-खंड दृष्टि से नहीं देखती, बल्कि उसे केन्द्र में रखकर परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व से जोड़ती है। यह विलक्षण मानवीय चेतना आधारित दृष्टि स्वयंमेव अद्वितीय है। भारतीय मन वसुधा को ही कुटुम्ब मानता है। सुख और शांति के संदेश देने के साथ यहाँ की विचारधारा ने त्रस्त, दुःखी और व्याकुल प्राणी को सदा आश्रय दिया है। यह करुणावृत्ति मानवता का उच्च मानक है। मानवीय चेतना के प्रसार हेतु नैतिक मूल्यों का अनुसरण हों, मानवतावादी स्वरों का विस्तार हो, मानवीय मूल्यों को प्रश्रय मिले और हिन्दुत्व मानवता का कल्याण करे, इन भावों की सृष्टि संघ-गीतों में हैं। 

हमारा देश विविधताओं से भरा हुआ है। जाति, भाषा, क्षेत्र, वर्ग, दर्शन, पंथ आदि के आधार पर अनेक विभेद बाहरी रूप में दिखाई देते हैं, परन्तु अखण्ड और अमिट संस्कृति के बल पर हम एक हैं। सत्य सनातन धर्म की ध्वजा चिरन्तन काल से अब तक टिकी रही है। यद्यपि इसे मिटाने की पूरी कोशिश हुई। अब हमारी पीढ़ी का यह दायित्व है कि हम राष्ट्रभाव का जागरण करें। ‘नव चैतन्य हिलोरें लेता‘ संघ-गीत में निहित संदेश इसी भाव को प्रकट कर रहा है- 
जाति भाषा वर्ग भिन्नता, हैं कितने मिथ्या अभिमान।
क्षेत्र-क्षेत्र के स्वार्थ उभारे, ले अपनी-अपनी पहचान।
राष्ट्रभाव का करें जागरण, पाट चलेंगे सब खाई। 
नव चैतन्य हिलोरें लेता, जाग उठी है तरुणाई।। 

वर्तमान समाज प्रगतिशीलता के रथ पर आरूढ़ अवश्य है, परंतु मनुष्य के आचरण में असत का प्रवेश चिंता का विषय है। सदाचार से आस्था का विचलन होने से नैतिक व चारित्रिक पतन के लक्षण हमारे समाज में दिखाई देने लगे हैं। इस समस्या का समाधान भारतीय जीवन शैली में विद्यमान है, जहाँ व्यवहार एवं आचरण को सदाचार की कसौटी पर परखा जाता है और सामाजिक प्रतिष्ठा का मापदंड भी माना जाता है। अपने दैनिक जीवन में प्रेम के साथ सात्विकता भी आवश्यक है। यह प्रेम ही जाति, भाषा, प्रांत वर्ग आदि का भेद मिटा सकता है। संघ द्वारा भारतीय जीवन में अपेक्षा की गई है कि वह अपने जीवन में संयम आधारित जीवनशैली अपनाएँ और शुद्ध सात्विक प्रेम को अपने जीवन का अंग बनाकर आदर्श की स्थापना करे। संघ-गीत 'शुद्ध सात्विक प्रेम' में निहित स्वर इस प्रकार है-
जाति, भाषा,प्रांत आदि, वर्ग भेद को मिटाने।
दूर अर्थाभाव करने, तम अविद्या का मिटाने।
नित्य ज्योतिर्मय हमारा, हृदय स्नेहागार है।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है।।

हम अपने अहिंसक दृष्टि से अनुभवों की भयंकरता का का विनाश कर सकते हैं, अभय के द्वारा भय को नष्ट कर सकते हैं, त्याग के द्वारा संग्रह-वृत्ति को बाधित कर सकते हैं, तब किसी की ओर क्यों जाएँ? यह घोष संस्कृति और कला का प्रतीक बने तो जीवन की भी दिशा बदल सकती है। संघ-गीतों में इन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों के महत्त्व  को रेखांकित किया गया है। अप्रासंगिक रूढ़ियों के बंधन से मुक्त होकर समय अनुकूल सांस्कृतिक परिवर्तन और उसका हस्तांतरण कैसे हो? इस पर विचार किया गया है। अब समय आ गया है कि हम सांस्कृतिक आदर्शों को स्वयं के निर्माण में लगाएँ। साथ ही विश्व में भी इन मूल्यों का प्रचार करें। संघ-गीत 'हे जन्मभूमि भारत' गीत में व्यक्त भाव द्रष्टव्य हैं-
जो संस्कृति अभी तक दुर्जेय-सी बनी है।
जिसका विशाल मंदिर आदर्श का धनी है।
उसकी विजय-ध्वजा ले हम विश्व में चलेंगे।
संस्कृति-सुरभि-पवन बन हर कुंज में बहेंगे।।

वर्तमान समय संक्रमणकालीन वेला से गुजर रहा है, नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञास्फोट की प्रतिध्वनि में बौद्धिकता साहित्य के मस्तिष्क पर विलास कर रही है। हृदय पक्ष अमा-निशा के गर्त में दुबक कर बैठा है। पुरुषार्थ चतुष्ट्य की आंकाक्षी भारतीय सामाजिक परम्पराएँ विद्रुपताओं से ग्रस्त होती जा रही है। आस्था, अनास्था, नव्य-पुरातन, पौर्वात्य-पाश्चात्य के द्वन्द्व में फँसा साहित्य पटल स्वयं ‘अर्थ-वलय’ से ग्रसित है। सत्य, अहिंसा, क्षमा, सहिष्णुता, संयम, त्याग आदि हमारे सांस्कृतिक मूल्य शाश्वत रूप में विद्यमान रहे हैं। भारतीय-चिंतन विज्ञान का सम्मान करता है, किंतु एकांगी दृष्टि से नहीं। यदि सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर विज्ञान का विकास होता है तो वह सदैव श्रेयकारी होगा। पश्चिमी चिंतन ने मानवता को बहुत कष्ट दिया है, पर अब समय आ गया है कि हम अपनी विरासत से प्यार करें। उन मूल्यों को पहचाने जिससे हमारा आने वाला कल समृद्ध बने। ऐसे समय में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक भाव दृष्टि और सामाजिक समरसता निर्माण में साहित्य अपनी भूमिका सशक्त ढंग से प्रस्तुत कर सकता है।

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