राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक समरसता में साहित्य की भूमिका

राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक समरसता में साहित्य की भूमिका
साहित्य-अर्चना, स्मारिका-२०२५ में प्रकाशित

राष्ट्र एक जीवन्त, जाग्रत इकाई है। राष्ट्र स्वयंभू है, सृष्टि की रचना ही इस बात का निर्धारण करती है कि किस राष्ट्र का सृजन, अभ्युदय, पतन अथवा पुनरूत्थान हो, क्योंकि राष्ट्र का भी जीवनोद्देश्य होता है। अतः प्रत्येक राष्ट्र में अस्तित्व बोध होना सहज स्वाभाविक है। राष्ट्र केवल पर्वत-नदी या समतल भूमि नहीं होता, बल्कि उस भूमिखंड में निवास तथा विकास करने वाले मानव-समूह का जीवन अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहता है। राष्ट्र और उसकी संस्कृति मिलकर समूचे विश्व में अपनी पहचान स्थापित करते हैं। राष्ट्र का निजत्व होता है, गुणधर्म होता है, उसकी पहचान, आकृति, अस्मिता और भूगोल होता है। यजुर्वेद में कहा गया कि हम राष्ट्र के पुरोहित हैं। हम भोग में भी त्याग के समान आचरण करते हैं। विश्व के सभी प्राणी सुखी हों, ऐसी उदात्त भावना है। भारतीय संस्कृति अखिल विश्व के समस्त संस्कारों, परम्पराओं, सभ्यता के विभिन्न तत्त्वों, लौकिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक मान्यताओं को समाविष्ट किए हुए हैं। इसलिए मनीषियों ने इसे ‘सा प्रथमा संस्कृति विश्वधारा’ के रूप में बोधित किया है। इसी सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय मनीषा ने राष्ट्र को भी परिभाषित किया है। 

विश्व साहित्य की प्रथम पुस्तक, जिसे यूनेस्को ने भी स्वीकार किया है, वह है- ऋग्वेद। उसमें कहा गया है- मनुर्भवः, अर्थात् मनुष्य बनो। मनुष्यता का बोध ही भारतीय संस्कृति का मूल है, जो वर्तमान और भविष्य के लिए भी जरूरी है व रहेगी। हमें यह समझना होगा कि भारतवर्ष पूर्वी-पश्चिमी सभ्यताओं का समूह नहीं, वरन मानवता का संस्कार देने के लिए ईश्वरीय योजनानुरूप इस राष्ट्र का उदय हुआ। भारत की राष्ट्रीय संस्कृति का निर्माण हजारों वर्ष में हुआ है। उसके निर्माण के कई कारक हैं। साहित्य का अवदान उसमें अन्यतम है। अपनी संस्कृति का सीधा संवाद साहित्य से होता है। भारतीय साहित्य की पारस्परिक अन्तःसंबद्धता तथा आधारभूत एकता को प्रतिबिम्बित करने वाले अनेक तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं। हम प्रकृति के सहचर हैं, जिससे हम रस ग्रहण कर जीवन को गति प्रदान करते हैं, दूसरी ओर पश्चिमी दृष्टि की धारणा है कि मनुष्य का प्रकृति पर आधिपत्य है और वह भोग के लिए है। भारतीय परम्परा का ज्ञान हमारे साहित्य ने करवाया। राम, कृष्ण, वाल्मीकि, वेदव्यास का व्यक्तित्व हमारी विरासत में साहित्य की देन है। शरीर नश्वर है, कर्म ही जीवन है, ज्ञान, इच्छा और क्रिया का समन्वय होना चाहिए यह सब हमारे साहित्य में लिखा गया और अपने-अपने समय के अनुकूल लिखा गया। भारतीय राष्ट्रीयता के लिए वन्देमातरम् का उद्घोष, शंकराचार्य का एकात्मभाव, विवेकानंद की विराट दृष्टि ने आने वाली पीढ़ियों को चमत्कृत कर दिशा दी। 

भारत की विशालता और विविधता के बावजूद उसे परस्पर जोड़ने में संस्कृत-साहित्य का अन्यतम महत्त्व हैं। वेद, उपनिषद, स्मृति, ब्राह्मण ग्रन्थ, रामायण, महाभारत, चरक, सुश्रुत इत्यादि में सांस्कृतिक चेतना का ऐसा युग-युगीन सेतु बन चुका है, जिसमें पूरा भारत वर्ष एक बना हुआ है। कालिदास का रघुवंश, महाकाव्य, भवभूति और अश्वघोष का साहित्य, माघ और भाष का चिंतन हमारी राष्ट्रीयता संवर्धक है। संस्कृति की इस चेतना को बलवती बनाने में कश्मीर के पंडितों व आचार्यों का सराहनीय महत्त्व है। आचार्य कल्हण द्वारा लिखित राजतरंगिणी इतिहास का महाभारत के बाद पहला ग्रन्थ माना जाता है। इसी प्रकार विल्हण का योगदान कम नहीं है। जिस कश्मीर में आतंक का ताण्डव चक्र रहा है वहां कभी- 8वीं से 12 वीं शती तक प्रत्यभिज्ञा दर्शन का साम्राज्य था, जिसमें शैवोपासना की संस्कृति का उज्ज्वल प्रकाश बिखरता रहता था। इसी काल के दसवीं से ग्यारहवीं शती मे आचार्य अभिनवगुप्त ने ध्वनि में रस और रस में जीवन तलाशने का भगीरथ प्रयास किया था। 
विवेकानंद ने 30 वर्ष की उम्र में अपने ज्ञान से दुनिया को विस्मित कर दिया था। उन्होंने 1200 वर्ष बाद शंकराचार्य की परम्परा को संवाहित किया और यह स्पष्ट किया कि मनुष्य श्रेष्ठ है। मनुष्य का अस्तित्व मानवता की पराकाष्ठा है एवं आत्म तत्त्व को पहचानना है। यही कारण है कि पश्चिम के विज्ञान और पूर्व के ज्ञान के समन्वय पर बल देने वाला व्याख्यान भारत को दुनिया में सिरमौर बनाता है। 1913 में गीतांजलि पर टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिलता है। मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में जन चेतना को जाग्रत करती है। 1915 में ‘उसने कहा था’ कहानी उस शाश्वत वचन को प्रमाणित करती हैं, जिसमें कहा गया है कि ‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई।‘ साकेत का यह कथन विचारणीय है- ‘संदेश नहीं मैं यहाँ स्वर्ग का लाया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।’ यह साहित्य समकाल में लिखा गया, जो हमारी परम्परा से प्रभावित था। 1936 में ‘राम की शक्ति पूजा’ भी अपने अन्दर रामत्व को जगाने का प्रयास है। प्रसाद अथवा दिनकर, अज्ञेय अथवा धर्मवीर भारती सबने उस भारतीय परम्परा को आगे बढ़ाया, जिसके सूत्र वैदिक ऋषियों से प्राप्त हुए थे। 

राष्ट्र को सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नत बनाने में साहित्य का योगदान अतुल्य है। पं. विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य और संस्कृति के अन्तःसम्बन्ध को व्याख्यायित करते हुए लिखा कि इस देश की संस्कृति सीता है, जो धरती से जनक के हल के नोक से पैदा हुई हैं। इस देश की संस्कृति गंगा है, जिन्हें भगीरथ ने अपने परिश्रम से पहाड़ खोदकर निकाला था। इस देश की संस्कृति गौरी है, जिन्होंने अपने प्रियतम को सौन्दर्य से नहीं तम से प्राप्त किया था। इस देश की संस्कृति असंख्य ग्रामीण बन्धु और वनवासी हैं, जो असंख्य बाधाओं को राम की धनुही से तोड़ने का विश्वास रखते है।

भारत के विभिन्न अंचलों में व्याप्त बोलियों का एक विशाल साहित्य है। उस विशाल लोक साहित्य में संस्कृति की अनेक तरंगे प्रस्फुटित हुई हैं। हिन्दी की तमाम उपबोलियों में, पंजाबी जुबान के साहित्य में, बंगला, उड़िया, असमिया, मलयालम, कन्नड़, तेलगु, तमिल भाषाओं में व्याप्त भारतीय संस्कृति के विविध रंगों का आस्वाद एक जैसा है। राजस्थानी लोकगीतों के प्रवाह में संस्कृति का रत्न छिपा है। कहना न  होगा कि भारत की इन भाषाओं-उपभाषाओं में संस्कृति की समझ बड़ी समृद्ध है। अनेक भावों की अंतर तरंगे अध्यात्म के महाभाव में मिलकर एक महातरंग को जन्म देती हैं। भाषा-उपभाषा में लिखित और मौखिक साहित्य की लिपि भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, उच्चारण में भेद हो सकते हैं, भौगोलिक विभिन्नताएँ हो सकती हैं, कहीं रेगिस्तान, कहीं हरियाली, कहीं मैदान तो कहीं पहाड़ हो सकते है- पर सबका भाव एक ही है। 

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में हिन्दी की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्य धारा ने भारत के आत्म-गौरव को जगाने का कार्य किया। इस धारा के कवियों में मैथिलीशरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन‘, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारीसिंह दिनकर आदि अनेक कवियों ने राष्ट्रीयता के भावों से संपन्न ऐसा साहित्य रचा कि वे स्वाधीनता आन्दोलन में जन-जागृति के प्रमुख स्रोत बन गए। यह भी उल्लेखनीय है कि स्वाधीनता संग्राम काल के इसी काल खंड में समानांतर रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में असीम मात्रा में स्फुट काव्य भी सृजित हुआ, जिसने सामान्य जन-मानस के देशप्रेम को मुखर स्वर दिया और भारतीय मनीषा को जाग्रत किया। 
सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा के अत्यधिक ओजस्वी कवि रहे हैं। वासवदत्ता, कुणाल, विषपान आदि प्रबंधात्मक रचनाओं के माध्यम से पं. द्विवेदी जी ने अतीत की ओर उन्मुख देश के गौरवशाली इतिहास और भारत की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय-संघर्ष के लिए प्रेरक स्रोत बनाया। उन्होंने राष्ट्रीयता का मुक्त कंठ से गान किया था। “भैरवी” के विप्लवी गीतों में कवि के प्राण राष्ट्रीय भावना में बहते हुए से दिखाई देते हैं। राष्ट्र की चेतना को संपूर्ण रूप में प्रस्तुत करते हुए कवि ने स्वयं अपने स्वरों को राष्ट्र-प्रेम पर समर्पित कर उत्साह का संचार किया, यथा-
वन्दना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला दो।
वंदिनी माँ को न भूलो, राग में जब मत झूलो।
अर्चना के रत्न कण में, एक कण मेरा मिला लो।।

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की कविताओं में स्वदेश धर्म का निर्वाह, कारागार के शून्य जीवन में भी सार्थकता, मातृभूमि के प्रति अपार लगाव, कवि की अन्तर्चेतना तक जागरण की ध्वनि पहुँचाने की क्षमता और राष्ट्र के प्रति एकनिष्ठ प्रेम से उन्हें कालजयी बनाने का अवसर प्राप्त होता है।  राष्ट्रधर्म की रक्षा तत्कालीन समय की मांग थी। अंग्रेजों के समक्ष निडरता से हृदय की अभिव्यक्ति को प्रकट करना साहस भरा कार्य था। ‘नवीन’ जी ने राष्ट्रीय भावों को काव्य का विषय बनाकर भारतीय जनता की स्वातंत्र्य  चेतना को विकसित किया। विदेशी दासता के विरूद्ध शंखनाद करती उक्त पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-
कोटिकोटि कंठों से निकली, आज यही स्वरधारा है।
भारत वर्ष हमारा है यह, हिन्दुस्थान हमारा है।

महाकवि निराला ने युगीन आवश्यकता को दृष्टिगत रखकर राष्ट्रीयता को संस्कृति के स्वरूप में ढालकर चित्रित किया। ‘भारती वंदना’, ‘यमुना के प्रति’, ‘मातृवन्दना’, ‘जागो फिर एक बार’, ‘दिल्ली’, ‘खण्डहर के प्रति’, ‘राम की शक्ति पूजा’, ‘तुलसीदास’ आदि में राष्ट्रीयता का भव्य स्वरूप दृष्टिगोचर होता है। भारत भूमि को माता मानकर स्तुति करते हुए लिखते हैं-
भारति, जय विजय करे, कनक-शस्य-कमल धरे
लंका पद-तल-शत दल, गर्जितोर्मि सागर जल
धोता शुचि चरण युगल, स्तव कर बहु अर्थ भरे।

रामधारीसिंह ‘दिनकर’, जिनके काव्य में राष्ट्र-प्रेम की पूजा है, राष्ट्रीय संस्कृति की पुनः उन्नयन की अभिलाषा है, सामाजिक चेतना की युगाभिव्यक्ति है तथा ओज और प्रसाद का मिश्रण है। उस विराट व्यक्तित्व का महत्त्व न केवल हिन्दी साहित्य में बल्कि भारतीय जन मानस के हृदय की मुखर अभिव्यक्ति में स्पष्ट परिलक्षित होती है । दिनकर अहिंसा को शक्ति और पौरूष के साथ स्वीकार करता है। उनके अनुसार त्याग करूणा और क्षमा शूरवीरों को शोभा देती है और अपमान, शोषण को सहन करना कायरता है- 
छोड़ प्रति वैर पीते मूक अपमान वे ही;
जिनमें न शेष शूरता का वह्निताप है।।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना का स्थापना काल भारत के स्वाधीनता-संघर्ष काल के समय का है। भारतीय राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के विचार को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से यह संगठन स्थापित हुआ और एक शताब्दी की यात्रा इसका प्रमाण है। जिसका उद्देश्य है-ऐसे व्यक्तियों का निर्माण जो राष्ट्र प्रेमी कर्तव्यनिष्ठ, परिश्रमी, प्रामाणिक और मूल्यों की रक्षा करने वाले हों। संघ के इस विराट उद्देश्य की प्रतिपूर्ति हेतु तथा स्वयंसेवकों को वैचारिक दृष्टि प्रदान करने के लिए संघ गीत रचे गए। इन गीतों की विषय वस्तु में मातृ-वंदना, राष्ट्र-अर्चना, ध्वज-वंदन, ध्येय-चिंतन, केशव-माधव वंदना, उद्बोधन, संचलन एवं प्रासंगिक गीत प्रमुख हैं। आज ये गीत देश के आम जन गुनगुनाते हैं। ‘वन्देमातरम‘ गीत स्वाधीनता संग्राम का महत्त्वपूर्ण प्रेरणा-गीत बनकर उभरा। इस गीत के महत्त्व को एक राष्ट्रप्रेमी व्यक्ति बहुत अच्छी तरह समझता है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक गौरव का अभियान भी है। ‘राष्ट्र की जय चेतना‘ संघ-गीत में रचनाकार की अनुभूति निम्न शब्दों में प्रकट होती है-
सृष्टि बीज मंत्र का है मर्म वन्देमातरम।
राम के वनवास का है काव्य वन्देमातरम।
दिव्य गीता ज्ञान का संगीत वन्देमातरम।
राष्ट्र की जय चेतना का गान वन्देमातरम।

किसी भी देश की संस्कृति को प्रणम्य बनाने एवं कालखंड को अमरता प्रदान करने में साहित्यकार की अहम् भूमिका होती है। भारतीय संस्कृति सनातन, समृद्ध और जीवन्त है। आज भारतीय समाज जाति-पंथ-मत आदि विषमताओं से संघर्ष कर रहा है। विदेशी ताकतें छल, भय, प्रलोभन आदि से धर्मान्तरण करने के षड़यंत्र कर रही हैं। तब भारतीय साहित्य का अवलोकन समीचीन होगा। भारतीय समाज की समन्वयात्मक दृष्टि सम्पूर्ण साहित्यिक फलक पर प्रतिभासित है। भारतीय चिंतन परम्परा व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित है। हमारे जीवन का कोई पक्ष ऐसा नहीं है, जिस पर हमारी परंपरा ने विचार नहीं किया। हमारे शास्त्रों ने जीवन के उज्ज्वल उदात्त पक्ष को ग्रहण करने पर सदैव बल दिया। इसकी परम विशेषता रही है कि उसने पदार्थ को आवश्यक माना पर उसे आस्था का केन्द्र नहीं, शस्त्र-शक्ति का सहारा लिया, लेकिन उसमें त्राण नहीं देखा, अपने लिए दूसरों का अनिष्ट हो गया, पर उसे क्षम्य नहीं माना। यहाँ जीवन का लक्ष्य विलासिता नहीं, आत्म-साधना रहा, लोभ-लालसा नहीं, त्याग-तितिक्षा रहा। 

हिन्दी का भक्ति साहित्य इस दृष्टि से अनिर्वचनीय है, जहाँ कबीर तुलसी जैसे महात्माओं ने समाज के एकात्म को गहराई से पहचाना। युगद्रष्टा कबीर ने जब इस भूमि पर अवतरण लिया, वह युग हिन्दुओं के लिए घोर निराशा का था। उनकी संस्कृति व राष्ट्र दोनों ही पद-दलित हो रहे थे। समाज दिशाविहीन था तो संक्रमणकाल में महात्मा कबीर ने भारत-भूमि के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय आदर्श को कायम रखने के लिए लोक-मानस का नेतृत्व किया और अपने प्रखर व्यक्तित्व से घोर-निराशा के दलदल में फँसी भारतीय जनता को नव-जीवन प्रदान किया। उन्हें सांस्कृतिक विरासत के संवाहक की संज्ञा से अभिहित किया जाये, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं। भारतीय जन मानस अपनी संस्कृति के प्रति निष्ठावान था, तो बाह्याडम्बरों से उसमें विकृतियाँ भी व्याप्त हो गई थी। आचरण की अपेक्षा उपासना पद्धति महत्त्वपूर्ण हो गई थी। विधर्मियों के उपहास से आहत भारतीय लोक मानस को अपने आन्तरिक आचरण को शुद्ध करने पर बल दिया और आत्म-ज्योति को जाग्रत करने का आह्वान करते हुए कहा कि इस मन को मथुरा, दिल को द्वारका और काया को काशी समझो। दस द्वारों वाला देवालय रूपी शरीर तुम्हारे पास है, उसी में आत्म-ज्योति को तलाश करो, यथा-
मन मथुरा, दिल द्वारिक, काश कासी जाँनि।
दस द्वारे का देहरा, तामें जोति पिछांनि।।

इन पंक्तियों में महात्मा कबीर ने जनता की उपासना पद्धति को परिष्कृत कर उसे भारतीय मूल्यों की ओर अग्रसर किया, जिसमें आत्म-ज्योति का अवलोकन महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक गत्यात्मकता ने रूढ़ियों को तोड़कर परम्पराओं को परिष्कृत किया। जातिगत दुर्व्यवहार से त्रस्त हिन्दू समाज को मुक्ति दिलाने में महात्मा कबीर का अद्वितीय योगदान रहा। वर्णाश्रम धर्म की मर्यादा के नाम पर जब हिन्दू समाज अस्पृश्यता के दलदल में फँस गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा-
काहै को कीजै पांडे छोति विचारा, छोति हि ते उपजा संसारा।
हमारे कैसे लोहू, तुम्हारे कैसे दूध, तुम कैसे ब्राह्मन पांडे, हम कैसे सूद।।

गोस्वामी तुलसीदास ने तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन कर उसी के अनुरूप अपने युग की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने अपने काव्य में राम जैसे आदर्श चरित्र के भीतर अपनी अलौकिक प्रतिभा एवं काव्य शास्त्रीय निपुणता के बल पर भक्ति का प्रकृत आधार खड़ा किया तथा उसमें मानव जीवन के पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक आदि सभी दशाओं के चित्रों और चरित्रों का विधान किया। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से सामाजिक विषमता और वैमनस्य को कम करने का प्रयत्न किया। विभिन्न मत-मतान्तरों में समन्वय का प्रयास किया। इसी कारण आलोचक उन्हें ‘समन्वयवादी भक्त कवि’ के रूप में सम्बोधित करते हैं। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, “तुलसीदास को जो अभूतपूर्व सफलता मिली, उसका कारण यह था कि वे समन्वय की विराट् चेष्टा है। उनके काव्य में ज्ञान और भक्ति, सगुण और निर्गुण, गार्हस्थ्य और वैराग्य, शैव और वैष्णव, राजा ओर प्रजा, शील ओर सौन्दर्य आदि के समन्वय की भावपूर्ण झाँकी देखी जा सकती है। तुलसीदास शुद्ध साधना के समर्थक थे। इसमें वह गृहस्थ और संन्यासी में किसी प्रकार के भेद को स्वीकार नहीं करते थे। उनकी दृष्टि में साधक चाहे घर में रहे या वन में, उसके लिए विषय-वासना से विमुखता आवश्यक है-
जो जन रूखे विषय-रस चिकने राम-सनेह।
तुलसी ने प्रिय राम के कानन बसहिं के गेह।।

तुलसीदास के समय में शैव और वैष्णव संप्रदाय का वैमनस्य चरम पर पहुँच गया था। शैव सम्प्रदाय शिव को तथा वैष्णव सम्प्रदाय विष्णु की भक्ति को सर्वोपरि मानते थे। रामचरित मानस में विष्णु के अवतार श्रीराम को शिव-भक्त बताकर समन्वय की धारा बहाई, यथा- 
शिव द्रोही मय दास कहावे।
ते नर मोहि सपनेहु नहिं भावे।।” 

आधुनिक रचनाकारों में प्रसाद रचित कामायनी ‘सामरस्य’ पर बल देती है। कामायनी में स्पष्ट होता है कि हमारा सामाजिक जीवन विसंगतियों को शिकार हो गया है। जाति, धर्म, संप्रदाय आधारित विकृत व्यवस्था मानवता के साथ चल रही है, जिसके मूल में मात्र विद्वेष है। यह विद्वेष ही संघर्ष को जन्म दे रहा है। प्रसाद ने कहा-
द्वयता में लगी निरन्तर ही, वर्णों की करती रहे सृष्टि।
अनजान समस्याएँ गढ़तीं, रचती हैं अपनी ही विनष्टि ।।
क्या यह विद्वेष समाप्त नहीं हो सकता? हम आधुनिक मानव एवं विकसित सभ्यता का दंभ पालने वाले ऐसे विश्व का निर्माण नहीं कर सकते, जैसा कामायनी में वर्णित है-
शापित न यहाँ है कोई, तापित पानी न यहाँ हैं।
जीवन वसुधा समतल है, समरस है जो कि जहाँ है।। 

एकात्म मानववाद की अवधारणा मनुष्य को खंड-खंड दृष्टि से नहीं देखती, बल्कि उसे केन्द्र में रखकर परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व से जोड़ती है। यह विलक्षण मानवीय चेतना आधारित दृष्टि स्वयंमेव अद्वितीय है। भारतीय मन वसुधा को ही कुटुम्ब मानता है। सुख और शांति के संदेश देने के साथ यहाँ की विचारधारा ने त्रस्त, दुःखी और व्याकुल प्राणी को सदा आश्रय दिया है। यह करुणावृत्ति मानवता का उच्च मानक है। मानवीय चेतना के प्रसार हेतु नैतिक मूल्यों का अनुसरण हों, मानवतावादी स्वरों का विस्तार हो, मानवीय मूल्यों को प्रश्रय मिले और हिन्दुत्व मानवता का कल्याण करे, इन भावों की सृष्टि संघ-गीतों में हैं। 

हमारा देश विविधताओं से भरा हुआ है। जाति, भाषा, क्षेत्र, वर्ग, दर्शन, पंथ आदि के आधार पर अनेक विभेद बाहरी रूप में दिखाई देते हैं, परन्तु अखण्ड और अमिट संस्कृति के बल पर हम एक हैं। सत्य सनातन धर्म की ध्वजा चिरन्तन काल से अब तक टिकी रही है। यद्यपि इसे मिटाने की पूरी कोशिश हुई। अब हमारी पीढ़ी का यह दायित्व है कि हम राष्ट्रभाव का जागरण करें। ‘नव चैतन्य हिलोरें लेता‘ संघ-गीत में निहित संदेश इसी भाव को प्रकट कर रहा है- 
जाति भाषा वर्ग भिन्नता, हैं कितने मिथ्या अभिमान।
क्षेत्र-क्षेत्र के स्वार्थ उभारे, ले अपनी-अपनी पहचान।
राष्ट्रभाव का करें जागरण, पाट चलेंगे सब खाई। 
नव चैतन्य हिलोरें लेता, जाग उठी है तरुणाई।। 

वर्तमान समाज प्रगतिशीलता के रथ पर आरूढ़ अवश्य है, परंतु मनुष्य के आचरण में असत का प्रवेश चिंता का विषय है। सदाचार से आस्था का विचलन होने से नैतिक व चारित्रिक पतन के लक्षण हमारे समाज में दिखाई देने लगे हैं। इस समस्या का समाधान भारतीय जीवन शैली में विद्यमान है, जहाँ व्यवहार एवं आचरण को सदाचार की कसौटी पर परखा जाता है और सामाजिक प्रतिष्ठा का मापदंड भी माना जाता है। अपने दैनिक जीवन में प्रेम के साथ सात्विकता भी आवश्यक है। यह प्रेम ही जाति, भाषा, प्रांत वर्ग आदि का भेद मिटा सकता है। संघ द्वारा भारतीय जीवन में अपेक्षा की गई है कि वह अपने जीवन में संयम आधारित जीवनशैली अपनाएँ और शुद्ध सात्विक प्रेम को अपने जीवन का अंग बनाकर आदर्श की स्थापना करे। संघ-गीत 'शुद्ध सात्विक प्रेम' में निहित स्वर इस प्रकार है-
जाति, भाषा,प्रांत आदि, वर्ग भेद को मिटाने।
दूर अर्थाभाव करने, तम अविद्या का मिटाने।
नित्य ज्योतिर्मय हमारा, हृदय स्नेहागार है।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है।।

हम अपने अहिंसक दृष्टि से अनुभवों की भयंकरता का का विनाश कर सकते हैं, अभय के द्वारा भय को नष्ट कर सकते हैं, त्याग के द्वारा संग्रह-वृत्ति को बाधित कर सकते हैं, तब किसी की ओर क्यों जाएँ? यह घोष संस्कृति और कला का प्रतीक बने तो जीवन की भी दिशा बदल सकती है। संघ-गीतों में इन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों के महत्त्व  को रेखांकित किया गया है। अप्रासंगिक रूढ़ियों के बंधन से मुक्त होकर समय अनुकूल सांस्कृतिक परिवर्तन और उसका हस्तांतरण कैसे हो? इस पर विचार किया गया है। अब समय आ गया है कि हम सांस्कृतिक आदर्शों को स्वयं के निर्माण में लगाएँ। साथ ही विश्व में भी इन मूल्यों का प्रचार करें। संघ-गीत 'हे जन्मभूमि भारत' गीत में व्यक्त भाव द्रष्टव्य हैं-
जो संस्कृति अभी तक दुर्जेय-सी बनी है।
जिसका विशाल मंदिर आदर्श का धनी है।
उसकी विजय-ध्वजा ले हम विश्व में चलेंगे।
संस्कृति-सुरभि-पवन बन हर कुंज में बहेंगे।।

वर्तमान समय संक्रमणकालीन वेला से गुजर रहा है, नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञास्फोट की प्रतिध्वनि में बौद्धिकता साहित्य के मस्तिष्क पर विलास कर रही है। हृदय पक्ष अमा-निशा के गर्त में दुबक कर बैठा है। पुरुषार्थ चतुष्ट्य की आंकाक्षी भारतीय सामाजिक परम्पराएँ विद्रुपताओं से ग्रस्त होती जा रही है। आस्था, अनास्था, नव्य-पुरातन, पौर्वात्य-पाश्चात्य के द्वन्द्व में फँसा साहित्य पटल स्वयं ‘अर्थ-वलय’ से ग्रसित है। सत्य, अहिंसा, क्षमा, सहिष्णुता, संयम, त्याग आदि हमारे सांस्कृतिक मूल्य शाश्वत रूप में विद्यमान रहे हैं। भारतीय-चिंतन विज्ञान का सम्मान करता है, किंतु एकांगी दृष्टि से नहीं। यदि सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर विज्ञान का विकास होता है तो वह सदैव श्रेयकारी होगा। पश्चिमी चिंतन ने मानवता को बहुत कष्ट दिया है, पर अब समय आ गया है कि हम अपनी विरासत से प्यार करें। उन मूल्यों को पहचाने जिससे हमारा आने वाला कल समृद्ध बने। ऐसे समय में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक भाव दृष्टि और सामाजिक समरसता निर्माण में साहित्य अपनी भूमिका सशक्त ढंग से प्रस्तुत कर सकता है।

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मिथकीय चेतना एवं लोकमन (सन्दर्भ: नदी केंद्रित यात्रावृत्त)

 

मिथकीय चेतना एवं लोकमन

(सन्दर्भ: नदी केंद्रित यात्रावृत्त)

समवेत, अगस्त, २०२५ में प्रकाशित

नदियों के किनारे विकसित संस्कृतियाँ हमेशा नदियों के आँचल को ही ओढ़कर अपने अस्तित्व को प्रकट करती रही हैं। इन सरिताओं ने सदियों से अपने नाम, गुण और धर्म के कारण जनसमुदाय को आकृष्ट किया है। नदियों के पौराणिक और मिथकीय सन्दर्भ लोकमन में अपना स्थान घेरते रहे हैं। नदियों के प्रति ऐसे ही श्रद्धाभाव और सहज सौंदर्य के वशीभूत होकर भारतवर्ष के आमजन सहित अनेक लेखकों व कवियों ने भी यात्राएँ की हैं। इन्हीं यात्राओं का ब्यौरा यात्रा साहित्य में प्रकाशित हुआ है। यात्रा-पथ में आने वाली नदियों का शाश्वत सौन्दर्य और उनका पुरात्मक महत्त्व यात्रावृत्तों का वर्ण्य विषय रहा है। अनेक लेखकों ने अपनी उत्तर एवं दक्षिण भारत की यात्राओं के दौरान पथ की नदियों का विस्तारपूर्वक वर्णन पेश किया है। उन नदियों से जुड़े मिथकीय, पौराणिक, लोक कथात्मक और ऐतिहासिक प्रसंग भारतीय संस्कृति के जल तत्त्व और उसके प्रति सम्मान का बोध करवाते हैं।  

मिथक शब्द अंग्रेजी के मिथ (Myth) शब्द से लिया गया है। ‘माइथोस’ शब्द से इसकी उत्पत्ति मानी गयी है। इस शब्द का आशय ‘मुहँ से निकला हुआ’ होता है। अतः ये मौखिक कथा से सम्बंधित हैं। “भारतीय सन्दर्भ में मिथ का अर्थ ‘पुराण’ होना चाहिए। पुराण अर्थात् पुरा कथा। यह समझदारी नहीं होने के कारण हमने 'मिथक' चूँकि उक्त अर्थ में झूठी कथा है, को हमने इतिहास का पाठ नहीं माना जब कि भारतीय सन्दर्भ में मिथक झूठी कथा न होकर 'पुरा कथा' है।' जिसमें इतिहास के खोज की अनन्त संभावनाएँ हैं। वस्तुतः जहाँ इतिहास नहीं है अथवा जहाँ इतिहास खो गया है, वहाँ पुराण हमारे लिए एक पाठ का काम कर सकता है।”[1] आदिम मानव प्रकृति की शक्तियों को समझ नहीं पाया अतः उसने प्रकृति की शक्तियों को अपनी कल्पना से अतिमानवीय देवी-देवताओं के रूप दे दिए। “इस प्रकार धार्मिक विश्वास तथा मिथक में अटूट सम्बन्ध है। धार्मिक विधि-विधान से जुड़े आख्यानों ने भी मिथक का रूप ले लिया। इनके पीछे उन रहस्यमयी शक्तियों को तुष्ट करके विपत्तियों से जन-समाज की रक्षा करने की भावना प्रमुख थी।”[2] मिथक मनुष्य जाति में एकता और समाज में संसार के प्रति आस्था जगाते हैं।

मिथक प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त होते हैंये सृष्टि की उत्त्पत्ति, इसके सृजन की प्रक्रिया तथा मनुष्य के जीवन अनुभवों को विभिन्न प्रतीकों और कथाओं का सहारा लेकर व्यक्त करते हैं। मिथक का यथार्थ मनुष्य के वर्तमान भौतिक जगत् से साम्य नहीं रखता है, परन्तु यह मानव के अंतर्मन और पारलौकिक सत्य को व्यक्त करता है। मिथक को मनुष्य समाज के सामूहिक मन की सच्चाई कही जाती है। मनोविज्ञान ने भी निजी मन की गुत्थियों को सुलझाने के लिए इस सामूहिक सच का सहारा लिया है। भारत में मिथक साहित्य केवल एक विधा नहीं है बल्कि यह जीवन को संचालित करने वाली संस्कृति है। उषा पुरी विद्यावाचस्पति लिखती हैं, “प्रत्येक देश का मिथक साहित्य उस देश की संस्कृति, कला, विज्ञान, आचार-विचार आदि का आरक्षण करता है। अनैतिक कार्य करते हुए मानव पर अंकुश स्थापित करने वाला मिथक साहित्य नैतिकता को प्रोत्साहित करता है।”[3] भारतीय समाज पुरातन और आधुनिक दोनों ही रूपों में एक साथ गतिमान है। यहाँ के जीवन में मिथकीय विश्वासों के साथ विज्ञानयुक्त चिंतन भी देखा जा सकता है। समय और जीवन पद्धति में बदलावों के साथ इन मिथकों में बहुत कुछ परिवर्तन देखे गए हैं, परन्तु इन्हें नकारा नहीं गया। भारतीय मिथकों में वेद, पुराण, उपनिषदों, रामायण, महाभारत आदि की कथाओं और पात्रों को सम्मिलित किया जाता हैं।

हिन्दी यात्रा साहित्य में नदियों को केंद्र में रखकर लेखन मिथकीय चेतना और लोकमन के अवगाहन बिना पूर्ण नहीं होता। इन कृतियों में अमृत लाल वेगड़ के नर्मदा नदी केन्द्रित तीन यात्रावृत्तांत सौन्दर्य की नदी नर्मदा’, ‘अमृतस्य नर्मदाऔर तीरे तीरे नर्मदाहैं। इसी तरह विष्णु प्रभाकर का जमना-गंगा के नैहर में’, अभय मिश्र एवं पंकज रामेंदु द्वारा लिखित दर दर गंगे’, सांवरमल सांगानेरिया का ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे’, राकेश तिवारी का सफर एक डोंगी में डगमग’, श्रीराम परिहार का संस्कृति सलिला नर्मदा’, राजेश कुमार व्यास का नर्मदे हर’, अमरेन्द्र कुमार राय का गंगा तीरेऔर अर्जुनदास केसरी का एक आँख गंगा एक आँख सोनआदि अनेक यात्रावृत्त हैं, जिनमें भारतीय पौराणिक मिथकों और लोक मानस की अभिव्यक्ति सांस्कृतिक धरातल पर हुई है।

वाराणसी मोक्षदायिनी पुरी है। गंगा किनारे का यह प्रसिद्ध नगर सदियों से संस्कृति का केंद्र है। गंगा तट के घाटों में राजा हरिश्चंद्र के नाम से भी घाट है जहाँ श्मशान स्थित है। यहीं पर उन्होंने सत्य की टेक रखते हुए अपने पुत्र रोहित के शव का अंतिम संस्कार करने का भी शुल्क अपनी पत्नी से वसूल किया था। सफर एक डोंगी में डगमग  यात्रावृत्तांत के लेखक राकेश तिवारी ने राजा हरिश्चंद्र के मिथक को अपने वृत्तान्त में जगह दी है। वे लिखते हैं, आगे आया हरिश्चन्द्र की सत्यनिष्ठा बखानता चिर प्रज्वलित महाश्मशान।....भयानक श्मशान के साथ राजा की अद्वितीय सत्यनिष्ठा की कथा का योग इस स्थल के साथ रोमांच समावेशित कर इसमें चुम्बकीय आकर्षण भर देती है।[4]

गंगा नदी के जाह्नवी नाम के पीछे का मिथक बड़ा प्रसिद्ध हुआ है। गंगा नदी का जाह्नवी नाम जन्हु ऋषि के कारण पड़ता है। इसके पीछे की कथा का विवरण हमें यात्रावृत्तांत जमना-गंगा के नैहर में मिल पाता है। गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे आती हुई अपने प्रबल वेग से जह्नु ऋषि के आश्रम को बहा ले जाती है। क्रुद्ध जह्नु आचमन करके गंगा को पी जाते हैं। भगीरथ ने उनसे प्रार्थना की। इसको आगे बढ़ाते हुए वे लिखते हैं, महर्षि प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी जांघ चीरकर भागीरथी को फिर धराधाम पर जाने दिया। इसीलिए भागीरथी का एक और नाम हुआ जाह्नवी।[5] अभय मिश्र और पंकज रामेन्दु भी अपनी गंगा यात्रा में इस मिथक का जिक्र करते हैं। बिहार के भागलपुर से कुछ दूर कहलगाँव है।कहते हैं इसी जगह पर जह्नु ऋषि ने गंगा को अपनी जांघ पर रोक दिया था। बाद में भागीरथ की प्रार्थना पर उन्होंने गंगा को छोड़ दिया।[6] कहलगाँव में गंगा का नाम जाह्नवी है। सफ़र एक डोंगी में डगमग यात्रावृत्तांत में भी इसकी चर्चा लेखक ने की है यहाँ गंगा 'जाह्नवी' कहलाती है।[7] फरक्का में गंगा नदी पर बने हुए बैराज को देखते हुए लेखक को पौराणिक कथा स्मरण हो आई। फरक्का के बाद दो धाराओं में बहती गंगा पद्मा और भागीरथी के नाम से जानी जाती है। कहते हैं गोमुख से राजा भगीरथ के साथ चली गंगा को यहीं आकर... गंगा को चेताया तो मुख्य प्रवाह से एक धारा निकलकर गंगासागर की ओर चल दी जिसे 'भागीरथी' कहा गया। मुख्य धारा आज के बांग्लादेश में बहती है और पद्मा कहलाती है।[8]

      मिथकों में नदियों के किनारे के प्रमुख तीर्थों, नगरों और स्थानों आदि के नामकरण के संदर्भ भी जुड़े हुए मिलते हैं। नदी केंद्रित यात्रावृत्तांतों में ऐसे प्रसंग भी देखने में आए हैं। जैसे नारद को आशीर्वाद देने के लिए शिव के द्वारा रौद्र रूप धारण करने से रुद्रप्रयाग नाम पड़ा। कर्णप्रयाग में दानवीर कर्ण ने सूर्य भगवान की तपस्या की थी। नंद प्रयाग में कण्वाश्रम के महादेव मंदिर में रावण ने अपने दस सिर काट कर चढ़ाये थे अतः दशमौली से ही इस क्षेत्र का नाम दशौली पड़ना बताया जाता है। हरिद्वार में हरि की पौड़ी पर ही अमृत की बूँदें गिरने के कारण ही इसे ब्रह्म कुंड माना जाता है। गंगनानी के साथ वेदव्यास की माता मत्स्यगंधा और पराशर ऋषि की एक प्राचीन कथा जुड़ी हुई है। ब्रह्मपुत्र के किनारे स्थित गुवाहाटी नगर के नीलकूट पर्वत पर कामाख्या देवी की कहानी के पौराणिक संदर्भ हमें ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे के लेखक बयाँ करते हैं।

नदियों के किनारे के नगरों, प्रमुख स्थानों आदि के साथ कुछ किवदन्तियाँ और अंतर्कथाएँ भी प्रचलित होती हैं। उस क्षेत्र के अस्तित्व की पुरातनता को सिद्ध करने अथवा लोक में उसकी महत्ता बताने के लिये भी परम्परा से इनका प्रसार होते हुए देखा जा सकता है। नर्मदा नदी को चिरकुमारी माना गया है। चिरकुमारी होने के कारण नर्मदा अत्यन्त पवित्र नदी मानी गई। इसीलिए भक्तगण और साधारणजन उसकी परिक्रमा करते हैं। यह प्राचीनतम नदियों में से एक है। ऋग्वेद में भी इस नदी के प्रमाण मिलते है। जनमानस में नर्मदा के प्रति काफी सम्मान व्याप्त है। दर्शन मात्र से पाप का शमन करने वाली नर्मदा नदी के साथ शोणभद्र नद की प्रणयकथा लोक में बहुश्रुत है। वेगड़ जी ने इसके बारे में लिखा है,नर्मदा और शोणभद्र नद एक दूसरे को चाहते थे, दोनों का विवाह होने वाला था। एक बार नर्मदा ने अपनी दासी जुहिला के हाथ शोण के लिए सन्देश भेजा। काफी देर बाद भी जब जुहिला नहीं आई, तो नर्मदा स्वयं गई। उसने देखा कि शोण जुहिला से ही प्रेमक्रीड़ा कर रहा है। उसे शोण पर अत्यन्त क्रोध आया और कभी विवाह न करने की प्रतिज्ञा करके पश्चिम की ओर चल दी। निराश और हताश शोण पूर्व की ओर चल पड़ा।[9] यह कथा प्रकृति के उपादान के माध्यम से लोक में प्रेम की एकनिष्ठता को स्थापित करती दिखाई पड़ती है। श्रीराम परिहार भी अपने यात्रावृत्तांत में इसका जिक्र करते हैं, एक लोक कथा है- शोण और नर्मदा की प्रणय कथा।[10] राकेश तिवारी अपने यात्रावृत्त में जब गंगा की सहायक नदियों का जिक्र करते हैं तो उनमे सोन का नाम भी लेते हैं साथ ही इसी दंतकथा को दुहराते हैं,किसी बात पर दोनों में ठन गई। सोन तुनक के उत्तर चले और नर्बदा पश्चिम।[11]

लोक-परम्परा के अनुसार नर्मदा नदी के पैंदे से निकले शिवलिंग पूरे देश में पूजे जाते हैं। इस नदी के पत्थर सुडौल और तराशे हुए मालूम जान पड़ते हैं। इसके संदर्भ में एक पौराणिक उद्धरण राजेश कुमार व्यास देते हैं। उनके अनुसार, स्कंद पुराण में आता है, तपस्यारत शिव के शरीर से निकलने वाले स्वेद से नर्मदा की उत्पत्ति हुई।... स्वेद से उत्पन्न पुत्री ने पिता से वर माँगा, महेश्वर-पार्वती सहित उनके तट पर विराजे। शिव ने इसे स्वीकारा। इसीलिए नर्मदा के जल में स्थित सभी पाषाण शिवतुल्य कहे गए हैं। कहते भी हैं, 'नर्मदा के कंकर, सब शिवशंकर'[12] मिथक अपने भीतर सूत्र छिपाए रखते हैं। वर्तमान भौतिक जगत् में इन संदर्भों को समझना थोड़ा मुश्किल जान पड़ता हैं, परन्तु उनके भीतर के प्रतीकों के माध्यम से उनके अभिप्रायों के निकट पहुँचा जा सकता हैं। मिथक हमें नदियों के जन्म के संदर्भ भी देते हैं। उनके नामकरण के बारे में भी बताते हैं। सांवरमल सांगानेरिया के वृत्तान्त ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे में इसकी बानगी देखिए, शान्तनु मुनि को ब्रह्मा से वरदान स्वरूप उनका अग्निमय ओज प्राप्त हुआ।...उस दिव्य ओज को अपनी भार्या अमोघा के गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे एक जलस्वरूप पुत्र ने जन्म लिया। कालान्तर में वही जलधारा के रूप में प्रवाहित होने पर ब्रह्मपुत्र कहलाने लगा।[13]

इन यात्रावृत्तांतों में बड़ी और महत्त्वपूर्ण नदियों से जुड़े संदर्भ और दंतकथाओं के साथ ही सहायक और छोटी नदियों से जुड़ी किवदंतियाँ भी हमें पढ़ने को मिलती हैं। जरूरी नहीं कि ये कथाएँ प्राचीन हों ही। यथा केन नदी से सम्बंधित एक अंतर्कथा आती है जो गाँव की लड़की किनिया की प्रेम कहानी से जुड़ी है। राजेश कुमार व्यास लिखते हैं, “प्रेमी का शव देखते ही किनिया ने भी अपने प्राण त्याग दिए। वर्षा के पानी से नदी निकली और नदी का नाम किनिया हो गया।"[14] इसी तरह सरयू नदी से सम्बंधित अंतर्कथा भी पढ़ने में आती है। चंबल नदी के नामकरण पर बात करते हुए लेखक राकेश तिवारी ने उसकी उत्पत्ति के स्रोत का परिचय प्रस्तुत किया है। राजा रन्तिदेव की कथा का जिक्र करते हुए वे लिखते हैं, अग्निहोत्र नामक यज्ञ के अवसर पर उनकी पाक-शाला से मेध्य पशुओं के चमणे की राशि से चर्मण्वती नदी प्रभूत हुई। यही चर्मण्वती आज की चम्बिल, चामिल, चम्बल, चामर या चामल है।[15] उनके वृत्तान्त में चंबल किनारे के गाँव पिनहट के नामकरण के पीछे पांडु-हाट शब्द में छिपी जनश्रुति का जिक्र होता है।

कई बार स्थानीय निवासियों द्वारा भी परम्परा से चली आती कथा को नदियों के नामकरण के संदर्भ में भी स्वीकार कर लिया जाता है। लोक में पारिवारिक रिश्तों के आधार पर भी नदियों की पहचान स्थापित होती है। मानवीकरण द्वारा लोक नदियों के बारे में किसी रिश्ते से सम्बंधित कथाएँ गढ़ लेता है। इसी संदर्भ में यमुना की सहायक नदी 'ससुर-खदेरी' के नामकरण की जनश्रुति बड़ी ही रोचक लगती है। धान की रोपाई के मौके पर ससुर और बहू में शर्त लग गई, देखें कौन कितना धान रोपता है। ... शाम को जब सब लौटते तो बाजी बहू के हिस्से पड़ती। ...ससुर विस्मय में पड़ गया—'यह तो मानुस की काया में देवी लगती है। ... पैर छूने के चक्कर में ससुर पीछे दौड़ा। बहू भागती रही, ससुर खदेड़े रहा। बहू ने लज्जावश यमुना में छलांग लगा दी। बहू की मृत्यु से दुखी ससुर भी यमुना में डूब गया। बहू के भागने की जगह से यमुना तक एक पुण्य-धारा फूटकर बह चली जिसका नाम पड़ा 'ससुर-खदेरी'[16] हालाँकि आज के दौर में इन दंतकथाओं पर विश्वास करना मुश्किल होता है, पर इनके पूर्वकालिक आधारों को एकदम से नकारा भी नहीं जा सकता हैंसफ़र एक डोंगी में डगमग में गहमर गाँव के मंदिर में लड़कों से बात करने पर लेखक को एक पतली नदी के नाम के पीछे की गाथा ज्ञात हुई। यहाँ त्रिशंकु की अंतर्कथा के द्वारा इसी पतली कर्मनाशा नदी के उद्भव की बात कही गई है।

इन यात्रावृत्तांतों में नदियों से सम्बंधित मिथक, अंतर्कथाएँ और दंतकथाएँ बहुतायत में पढने को आती हैं। दरअसल नदियों के किनारे रहने वाला समाज नदियों से सम्बंधित पौराणिक सन्दर्भों को अपने मानस में उतार लेता है। समय के अनुसार इन सन्दर्भों में वह अपनी सुविधा और समझ के चलते परिवर्तन भी कर लेता है। यही बात दंतकथाओं के संदर्भ में भी सटीक बैठती हैं। कुछ अंतर्कथाएँ नदियों के किनारे स्थित गाँवों, शहरों, प्रसिद्ध स्थानों के नामकरण के बारे में भी मिलती हैं। राकेश तिवारी के यात्रावृत्त में गंगा तट पर स्थित बक्सर शहर के नाम की उत्पत्ति में छिपे मिथक से परिचय प्राप्त होता है। कहा जाता है यहाँ वेदशिरा ऋषि का आश्रम था। वेदशिरा शाप पाकर बाघ बन बहुत समय तक इसी रूप में विचरते रहे। दूसरे मुनियों से उन्हें पता चला कि निकट ही स्थित 'अधसर' में स्नान करके अनचाही मुसीबत से मुक्ति मिल सकती है। उन्होंने ऐसा ही किया और तब से तालाब व्याघ्रसर कहलाया। कालान्तर में वहाँ बसी बस्ती 'ब्याघ्रसर' व्युत्पत्ति के अनुसार 'बक्सर' कहलाई।[17] नामकरण की ये कथाएँ बुजुर्गों की स्मृतियों और उनकी बातों में उपस्थित रहती हैं। गंगा की यात्रा के दौरान लेखक राकेश तिवारी ने अपनी डोंगी में एक बुजुर्ग को बैठाया था। उसने जनश्रुति द्वारा तट के लाक्षागिरि गाँव के नामकरण की जानकारी दी।

इसी पुस्तक में गंगा तट के गाँव विंध्याचल से संबंधित लोक मान्यता का विवरण प्राप्त होता है। गंगा के प्रवाह के निकट स्थित चरणाद्रि पर्वत, जिस पर ऐतिहासिक चुनार दुर्ग निर्मित है, के संबंध में राजा बलि और भगवान् विष्णु के वामन अवतार की पौराणिक कथा का जिक्र भी सफ़र एक डोंगी में डगमग में किया गया है। कहते हैं, पुण्यात्मा बलि यहीं कहीं रहते थे और विष्णु का पहला कदम इसी चरणाकृति जैसी पहाड़ी पर पड़ा।[18] चुनार दुर्ग की तरह वे काशी नगर के नामकरण के संदर्भ भी प्रस्तुत करते हैं,राजा काश के नाम पर यह क्षेत्र काशी कहलाया। कुछ लोग काश और कुश नामक स्थानीय घास से काशी की व्युत्पत्ति मानते हैं।[19] असम को कामरूप कहे जाने के पीछे तपस्यारत भगवान् शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने के मिथक का उल्लेख ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे में मिलता है। उसकी पत्नी रति ने शिवाराधना की, तब उसे आदेश हुआ कि कामदेव की भस्मी लेकर प्राग्ज्योतिषपुर जाए। आखिर शिव-कृपा से उसे यहीं नया रूप मिला था, तब से यह क्षेत्र कामरूप कहलाने लगा।[20] इस प्रकार हम पाते हैं कि पौराणिक प्रसंगों के माध्यम से भी किसी क्षेत्र का नाम प्रचलन में आ जाता है। यह नाम चिरकाल तक स्थायी और स्वीकार्य भी रहता है

भारतीय समाज का नदियों के साथ सांस्कृतिक सम्बन्ध लोकगीतों सहित लोक कथाओं के माध्यम से भी परिलक्षित होता है। लोककथाएँ वाचिक परम्परा का साहित्य है। ये पीढ़ी दर पीढ़ी यात्रा करती हुई अपना अस्तित्व कायम रखती हैं। मौखिक परम्परा ने अपने श्रुत-कौशल और विवेक से इसे आगे बढ़ाया है। कथा कहने और सुनने के क्रम में काल के साथ कुछ परिवर्तन भी होता है। इनमें कुछ घटाव और बढाव संभव है। स्थान के अनुसार भी लोक कथाओं में पात्र और परिस्थितियाँ स्थानीय रूप धारण कर लेते हैं। इन कथाओं में सम्पूर्ण समाज के मंगल का विधान निहित होता है। सामाजिक विश्वास, मान्यताएँ और आस्थाएँ इनमें आसानी से ढूँढी जा सकती हैं।

सुदर्शन वशिष्ठ इन लोक कथाओं के बारे में लिखते हैं, “भारतीय साहित्य का परम ध्येय मंगलकामना रहने के कारण हमारी अधिकांश कथाएँ ‘और अंत में सब सुखपूर्वक रहने लगे’ के आदर्श पर आधारित हैं।”[21] इन कथाओं में कोई संदेश अथवा गूढ़ बात निहित होती है। ये लंबे अनुभव और व्यावहारिक दृष्टिकोण को अपने भीतर समाए रहती हैं। भारतीय समाज में नदियों के साथ भी लोक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। ये कहानियाँ नदियों की संस्कृति को समाज के साथ एकाकार करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। कईं बार अतिरंजित वर्णन के कारण ये विश्वास से परे होती दीखती है, लेकिन लोक अपनी छवि का दिग्दर्शन इनमें कर पाता है। इन यात्रावृत्तांतों में हमें नदियों के उद्गम, प्रवाह क्षेत्र, प्रभाव और उनके महत्त्व से जुड़ी लोक कथाओं से परिचय प्राप्त होता हैं। सफ़र एक डोंगी में डगमग यात्रावृत्तांत में हम देख पाते हैं कि लोककथा के माध्यम से जनसमाज ने कोसी नदी से सांस्कृतिक संबंध स्थापित किया। कोसी मइया की कथा घर-घर में गाई सुनी जाती है। “कोसिका महारानी नदी नहीं तिरहुत की कन्या। बंगाल में ब्याही गई। झगड़ालू सास-ननदों के अत्याचार सहते-सहते दुखी होकर लड़ पड़ी, खीझ के मारे सोरह मन के चमचमाते चाँदी के आभूषण चूर-चूर करके धूर कर डाले और चिटककर तिरहुत की ओर भागी। ननदों ने कुल्हाड़े वाले हजार दानव लेकर चलने वाली कुल्हाड़ी-आँधी और पहाड़ डुबाने वाले पहड़िया पानी पीछे लगा दिए। कोसी मइया जान छोड़कर भागी, बंगला जादू के जोर से आँधी-पानी ने पीछा पकड़ लिया। जहाँ-जहाँ कोसी भागी आँधी-पानी ने सब नष्ट कर डाला। इलाका उजाड़ हो गया। तब तक कोसी मइया की दुलारी बहिन दुलारी दाय ने एक दीया जलाकर जादू काट दिया। कोसी रुक गई।[22] इन लोक कथाओं में जीवन का उल्लास और संघर्ष दोनों मौजूद हैं। विरह और करुणा के साथ मंगल की सृष्टि भी उपस्थित रहती है।

कहा जा सकता है कि लोक कथाएँ जीवन के सभी रंग अपने भीतर रखती हैं। बहुत सी लोक कथाओं में नदियों का जिक्र आता हैं। उन कथाओं में नदियों के कारण कथानक की गति में बदलाव भी देखा जाता है। लोरिक और मंजरी की कथा में इसी तरह का वर्णन मौजूद है, जहाँ सोन नद मुख्य भूमिका में दिखाई दे जाता है। यात्रावृत्तांत एक आँख गंगा एक आँख सोन में लोककथा सोननद के साथ जुड़ी लोरकहा का चित्रण लेखक करता है। अर्जुनदास केसरी सोन नद की यात्रा में गोठाना के साथ लोरिक की ससुराल का सम्बन्ध बताते हैं। वे लिखते हैं, “पानी जांघ तक, फिर सीना तक, उसके बाद कंठ तक आने लगा। डूब जाने का भय, इसलिए गाँव के रत्थी नाई यहाँ की घटना 'लोरिकी गाकर सुनाया करते थे जिसमें लोरिक की बारात के डूबने-उबरने, झीमल मल्लाह द्वारा लोरिक की बारात को नदी पार करने और फिर मोलागत राजा से लोहा लेकर मंजरी की बिदाई कराने का विस्तृत वर्णन सुन रखा था।[23] गोठाना के लिए कहा जाता है कि यही वह अञ्चल है, जहाँ कथा-नायिका मंजरी ने जन्म लिया था और वीर लोरिक उसे ब्याहने गौरा से यहाँ सवा लाख बारातियों को लेकर आया था। राजा ओव्रागत से उसका भयंकर युद्ध हुआ था और लाशों से धरती पट गयी थी। इतना शोणित वहाँ था कि सोन खून की नदी बन गयी थी।

नदी के साथ समाज के अन्तःसंबंधों का विश्लेषण करने पर हम देखते हैं कि नदी किनारे के व्यक्ति, समाज, परिवार, रीति-रिवाज, धर्म, दर्शन, अध्यात्म, साहित्य, मिथक, पर्यावरण इत्यादि के साथ गहरा सम्बन्ध बना लेते हैं। इन सभी को नदियाँ किस प्रकार प्रभावित करती हैं और इनके भीतर किस प्रकार पैठ बनाती है, इसे लोकमन में देखा जा सकता है। मिथकों, लोकगीतों और लोक कथाओं में नदी की मौजूदगी के साथ समाज द्वारा नदियों के साथ व्यक्त की जाने वाली श्रद्धा, आस्था और विश्वास मुग्धकारी है। इस प्रकार हम देखते हैं कि नदियों पर केंद्रित यात्रावृत्तांतों में प्रयुक्त कथात्मक और मिथकीय प्रसंग भारत की नदियों के साथ यहाँ के निवासियों का अटूट संबंध व्यक्त करते हैं। ये पुरा कथाएं भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं । इनके माध्यम से हम उन तत्त्वों को पहचान सकते हैं जो भारतीय संस्कृति का संबंध जल, जल स्रोत, जल संस्कृति, नदी और तीर्थों के साथ स्थापित करती है।

संदर्भ सूची -



[1] बद्री नारायण : लोक संस्कृति और इतिहास, लोक भारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ. 87

[2] अमरनाथ : हिदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथा संस्करण,

   2016, पृ. 282

[3] उषा पुरी विद्यावाचस्पति : भारतीय मिथकों में प्रतीकात्मकता, सार्थक प्रकाशन, नई दिल्ली, 1997, पृ. 1

[4] राकेश तिवारी : सफर एक डोंगी में डगमग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ. 106

[5] विष्णु प्रभाकर : जमना-गंगा के नैहर में, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली, 1964, पृ. 112

[6] अभय मिश्र एवं पंकज रामेंदु : दर दर गंगे, पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया प्रा. लि. गुड़गाँव, 2013,  पृ. 172

[7] राकेश तिवारी : सफर एक डोंगी में डगमग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ. 165

[8] वही, पृ. 174

[9] अमृत लाल वेगड़ : तीरे-तीरे नर्मदा, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, द्वितीय संस्करण, 2018, पृ. 53

[10] श्रीराम परिहार : संस्कृति सलिला नर्मदा, आदिवासी लोक कला एवं तुलसी साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश

    संस्कृति परिषद्, भोपाल, 2006, पृ. 24

[11] राकेश तिवारी : सफर एक डोंगी में डगमग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ. 141

[12] राजेश कुमार व्यास : नर्मदे हर, पुरोवाक्, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली, 2018, पृ. 7

[13] सांवरमल सांगानेरिया : ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2015, पृ. 126

[14] राजेश कुमार व्यास : नर्मदे हर, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली, 2018, पृ. 15

[15] राकेश तिवारी : सफर एक डोंगी में डगमग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ. 42

[16] वही, पृ. 83

[17] वही, पृ. 129

[18] वही, पृ. 101

[19] वही, पृ. 107

[20] सांवरमल सांगानेरिया : ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2015, पृ. 20

[21] सुदर्शन वशिष्ठ : हिमाचल प्रदेश की लोक कथाएँ, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण, 2017,

    भूमिका, पृ. 8

[22] राकेश तिवारी : सफर एक डोंगी में डगमग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ. 166

[23] अर्जुनदास केसरी एवं शेख जैनुल आब्दीन : एक आँख गंगा एक आँख सोन, लोकवार्ता शोध संस्थान,

    राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, 1999 पृ. 3


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