जैन श्वेताम्बर तेरापंथ की आध्यात्मिक यात्रा
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ की आध्यात्मिक यात्रा
'मीरायन' दिसंबर-फरवरी,२०२५ अंक में...
धर्म एक शाश्वत और सार्वभौमिक तत्व है, जिसका मानव संस्कृति के विकास में सदैव योगदान रहा। सनातन काल से भारतीय संस्कृति की आत्मा धर्म है। इस भूमि पर अनेक धर्म पल्लवित पुष्पित हुए। इसी कारण भारतीय संस्कृति में भी धर्म की सत्ता का कभी लोप नहीं हुआ। भारतीय सांस्कृतिक धारा में अत्यंत प्राचीन काल से दो प्रमुख आध्यात्मिक संस्कृतियों का रूप विद्यमान रहा है, वह है-श्रमण संस्कृति और ब्राह्मण संस्कृति। वैदिक साहित्य में इन्हें क्रमशः आर्हत और बार्हत धर्म के नाम से संबोधित किया गया है। जैन धर्म प्राचीन काल में आर्हत धर्म के नाम से विख्यात रहा। बाद में इसे श्रमण धर्म1, निर्ग्रन्थ प्रवचन2, जिनशासन3, जिन मार्ग4 व जिनवचन5 आदि नाम से भी संबोधित किया जाने लगा। वर्तमान समय में यह जैन धर्म के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रकार जैन धर्म श्रमण परंपरा का एक प्राचीनतम धर्म है।
जैन परंपरा अनुसार संपूर्ण कालचक्र दो भागों में विभक्त है- अवसर्पिणी काल और उत्सर्पिणी काल। अवसर्पिणी की चरम सीमा ही उत्सर्पिणी का आरम्भ है। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। जैन मान्यता अनुसार प्रत्येक अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल में तीर्थंकरों के जन्म से पहले कुलकर उत्पन्न होते हैं। इस अवसर्पिणी काल में श्वेतांबर जैन मान्यता अनुसार सात कुलकर हुए- विमलवाहन, चक्षुष्मान, यशस्वी, अभिचन्द्र, प्रसेनजित, मरूदेव व नाभि।6 वर्तमान अवसर्पिणी काल में जैन धर्म का उदय भगवान ऋषभदेव के काल से माना जाता है भगवान ऋषभदेव के पिता अंतिम कुलकर नाभिराज थे व माता मरुदेवी थी। भगवान ऋषभदेव के पश्चात 23 तीर्थंकर और हुए तथा मान्यता अनुसार वर्तमान अवसर्पिणी काल के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हैं। भगवान महावीर केनिर्वाण प्राप्त होने के पश्चात गुरु परंपरा के आधार पर जैन धर्म में अनेक गण, शाखाएँ एवं कुल अस्तित्व में आए। इनमें प्रमुख आचार्य हुए, जैसे-आर्य सुधर्मा, आर्य जम्बू इत्यादि। लगभग 600 वर्षों तक आचार्य-परंपरा चलती रही। इन आचार्यों, गणों एवं कुलों की विस्तृत जानकारी का प्रामाणिक आधार श्वेतांबर परंपरा में कल्पसूत्र व नंदीसूत्र की स्थविरावलियाँ हैं तथा दिगंबर परंपरा में यह जानकारी तिलोयपन्नति में लिखित है।7
भगवान महावीर के निर्वाण पश्चात सचेलता और अचेलता के आधार पर पर श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय का जन्म हुआ। दिगंबर संप्रदाय अंतर्गत वस्त्र-पात्र आदि को परिग्रह माना जाता है, अतः इस संप्रदाय के साधु निर्वस्त्र रहते हैं और हाथ में भोजन ग्रहण करते हैं। इस संप्रदाय के अंतर्गत विभिन्न उपसंप्रदाय हैं, उनमें मूलसंघ, द्राविड़ संघ, काष्ठा संघ, देवसेन संघ, बीसपंथी वर्ग, दिगंबर तेरापंथ, टोटा पंथ, तारण पंथ, कानजी पंथ आदि प्रमुख हैं।8 श्वेतांबर संप्रदाय के अंतर्गत साधु श्वेत वस्त्र पहनते हैं तथा वस्त्र-पात्र आदि को अपरिग्रह मानते हुए मुनि धर्म का निर्वहन करते हैं। वर्तमान में इसकी दो प्रमुख धाराएँ हैं- मूर्तिपूजक धारा और अमूर्तिपूजक धारा। मूर्तिपूजक धारा तीर्थंकरों की मूर्तियाँ स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना में विश्वास करती है। इस धारा में प्रमुख गच्छ हैं- वृहद गच्छ, संडेर गच्छ, धर्म घोष गच्छ, अचल गच्छ, खरतर गच्छ, तपा गच्छ आदि।9 इसी प्रकार अमूर्तिपूजक धारा में मूर्तिपूजा का निषेध किया गया है। इसमें तप-त्याग आदि पर विशेष बल दिया जाता है। इस धारा में भी कई उपसंप्रदाय हुए हैं, जिनमें प्रमुख हैं- श्रमण संघ, साधुमार्गी संघ, श्वेतांबर तेरापंथ आदि।
अमूर्तिपूजक धारा को स्थानकवासी नाम से भी संबोधित किया जाता है। वर्तमान में यही नाम अधिक प्रचलित है। जब इस संप्रदाय के मुनि स्थानकों में रहने लगे, तब यह नाम लोक में प्रचलित हो गया। स्थानकवासी संप्रदाय में से तेरापंथ का उद्भव हुआ। इसके प्रवर्तक आचार्य भीखणजी हैं। संत भीखणजी आचार्य रुघनाथ जी के प्रिय शिष्य थे, परंतु कुछ घटनाएँ ऐसी घटीं कि संत भीखणजी को नया मार्ग चुनना पड़ा, जिसके फलस्वरूप तेरापंथ का उदय हुआ। विक्रम संवत 1815 में तत्कालीन साधुओं के शिथिल आचार से खिन्न होकर राजनगर के श्रावकों ने साधुओं की वंदना करना छोड़ दिया। आचार्य रुघनाथ जी उस समय मारवाड़ में विहार कर रहे थे। जब उन्होंने यह बात सुनी तो उन्होंने इस समस्या का समाधान करने हेतु अपने प्रिय शिष्य भीखणजी को चुना। क्योंकि वह शास्त्रज्ञ होने के साथ-साथ असाधारण रूप से बुद्धिमान भी थे। उन्होंने अपने शिष्य भीखणजी से कहा, "तुम स्वयं बुद्धिमान हो, अतः कोई ऐसा उपक्रम करना, जिससे श्रावकों की शंकाएँ मिटें और वे पुनः वंदन करने लगें।"10
संत भीखणजी ने गुरु आज्ञा को शिरोधार्य कर चातुर्मास हेतु राजनगर की ओर विहार किया। उनके साथ टोकर जी, हरनाथ जी, वीरभान जी और भारमल जी ये चार साधु भी थे। जब वे राजनगर पहुँचे तो वहाँ के श्रावक अत्यधिक प्रसन्न हुए, क्योंकि संत भीखणजी एक तत्वज्ञ और विरागी साधु के रूप में विख्यात थे। श्रावकों ने साधु समाज के आचार-विचार की दयनीय स्थिति भीखणजी के सम्मुख रखी। संतों के उद्गार सुन लेने के पश्चात संत भीखणजी ने अपने बुद्धि-चातुर्य से उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास किया। यद्यपि वे स्वयं गुरु के व्यामोह के कारण सत्य को स्वीकार नहीं कर रहे थे। श्रावकों की शंकाओं ने उन्हें आत्म-निरीक्षण के लिए बाध्य कर दिया। उनका सत्य प्रेम वस्तुतः उस समय कसौटी पर चढ़ गया। यही कारण है कि राजनगर का वह चातुर्मास उनके लिए मानसिक संघर्ष का काल रहा।11
संयोगवश उस घटना के पश्चात रात्रि के समय संत भीखणजी को बड़े जोर का ज्वर प्रकोप हुआ। ज्वर के उस आकस्मिक आक्रमण ने उनके शरीर के साथ मन को भी झकझोर डाला। आत्मग्लानि और पश्चाताप की तीव्र अनुभूति करते हुए वे सोचने लगे, "मैंने जिनेश्वर देव के वचनों को छुपाकर सच को झूठा ठहराया, यह कैसा अनर्थ कर डाला? यदि इस समय मेरी मृत्यु हो जाए, तो अवश्य ही मुझे दुर्गति में जाना पड़े। क्या ऐसी स्थिति में यह मत पक्ष और ये गुरु मेरे लिए शरणभूत हो सकते हैं?”12 इन विचारों ने उनके मन की कलुषता को समाप्त कर दिया। हृदय-मंथन की इस प्रक्रिया के बाद उन्होंने साहस और दृढ़ता के साथ प्रतिज्ञा की, "यदि मैं इस अस्वस्थता, से मुक्त हुआ तो निष्पक्ष भाव से खोजकर सत्य मार्ग को अपनाऊँगा, जिन-भाषित आगमों के अनुसार अपनी चर्या बनाऊँगा और साधुओं के लिए निर्दिष्ट मार्ग के अनुरूप आचरण करने में किसी की भी परवाह नहीं करूँगा।"13 स्वामीजी का ज्वर उस प्रतिज्ञा के पश्चात क्रमशः शांत होता गया और रात्रि के साथ ही उसका अंत हो गया। इस प्रकार सत्यान्वेषण के प्रति उनका संकल्प और दृढ़ हो गया। संत भीखणजी ने सत्य मार्ग को स्वीकार करने की प्रतिज्ञा की थी। उसका तात्पर्य यह नहीं था कि वे स्वयं आचार्य बनना चाहते थे या अपना पृथक संघ चलाना चाहते थे। उनके सामने तो केवल सत्य का ही प्रश्न था। वे आत्म-कल्याण के पथ पर शिक्षक और गुरु में कोई भेद नहीं मानते थे। किसी भी प्रकार से सत्य का पालन हो, आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो, यही उनका प्रमुख लक्ष्य था।
चातुर्मास समाप्ति के पश्चात संत भीखणजी ने अपने गुरु से शंकाओं के समाधान हेतु विनम्र प्रयास किया, परंतु मत-आग्रह बढ़ते गए। उचित अवसर देखकर उन्होंने सत्य शोध के लिए एक बार फिर अपने गुरु से निवेदन किया, " स्वामिन! भगवान महावीर के वचनों पर विचार करें। संघ में शुद्ध श्रद्धा और शुद्धाचार की पुनः प्रतिष्ठा करें। आत्म-कल्याण के लिए इस कार्य की अनिवार्य आवश्यकता है।"14 इस प्रकार विक्रम संवत 1815 के राजनगर चातुर्मास लेकर विक्रम संवत 1817 के चैत्र शुक्ला नवमी तक की अवधि में गुरु शिष्य में परस्पर अनेक बार विचार-विमर्श हुआ, चर्चाएँ हुई, परंतु समाधान नहीं हो सका। संत भीखणजी ने तब अपने चिंतन प्रभाव को दूसरी ओर मोड़ दिया। उन्होंने सोचा, "आत्म कल्याण के जिस महान उद्देश्य से घर बार छोड़कर मैं यहाँ दीक्षित हुआ, उसके कुछ भी पूर्ति नहीं हो पा रही है। इस स्थिति में संघ के व्यामोह में फंसकर निरुद्देश्य यहाँ बैठे रहना मेरे लिए शोभास्पद नहीं होगा। मुझे आत्म-कल्याण को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। उसके बिना प्रत्येक साधना केवल विराधना या विडंबना बन कर रह जाती है।“15 उक्त चिंतन क्रम में उन्होंने संघ से संबंध विच्छेद कर अभिनिष्क्रमण का निश्चय कर लिया।
विक्रम संवत 1817 चैत्र शुक्ला नवमी के दिन बगड़ी नगर, जिला पाली, राजस्थान में वे अपने दीक्षा गुरु आचार्य रुघनाथ जी से अलग हो गए। इस प्रकार 'रामनवमी' नाम से समग्र भारत में प्रख्यात यह पर्व-दिवस संत भीखण जी के लिए आत्मविजय के पथ पर अभिनिष्क्रमण का पुनीत दिन बन गया। संत भीखण जी के साथ संत टोकर जी, हरनाथ जी, वीरभान जी और भारमल जी भी थे। ये पाँचों साधु तत्काल स्थानक छोड़कर बाहर आ गए, परंतु उस शहर में उन्हें कहीं भी ठहरने का स्थान नहीं मिला। दूसरे शहर की ओर जाने का निश्चय किया तो तेज आँधी ने उनका रास्ता रोक लिया। जैन शास्त्रों के अनुसार इस परिस्थिति में विहार करना अकल्प्य है। तब वहीं पास स्थित श्मशान भूमि में बनी जैतसिंह जी की छतरी में ठहर गए। जगत जिसे अपने अंतिम मंजिल समझता है, उन्होंने उसे अपनी मंजिल का प्रथम स्थान बनाया।
संत भीखणजी अपने साथी चार साधुओं सहित बगड़ी नगर से चलकर जोधपुर पहुंचे। तब तक आठ अन्य साधु उनके सहयात्री बन गए। इस प्रकार उनकी कुल संख्या तेरह हो गई।16 जोधपुर में भी स्थान की समस्या थी। बाजार का स्थान जनसंपर्क की दृष्टि से उपयुक्त रहा। वहाँ अनेक लोगों ने उनके विचार सुने, कुछ उनके विचारों से प्रभावित हुए और उनके अनुयायी बन गए। कुछ दिन प्रवास कर संत भीखण जी ने जोधपुर से आगे की ओर प्रस्थान कर दिया। यद्यपि संत भीखणजी जोधपुर छोड़ चुके थे, परंतु उनके व्यक्तित्व और विचारों से लोग प्रभावित होकर सामूहिक रूप से बाजारों की दुकान में मिलते और धर्म उपासना करते। जोधपुर के तेरह श्रावक एक दिन बाजार की दुकान पर सामायिक, प्रतिक्रमण आदि धर्म अनुष्ठान कर रहे थे। संयोगवश जोधपुर राज्य के दीवान श्री फतेहमल जी सिंघी उधर से गुजरे। वह एक जैन श्रावक थे। स्थानक छोड़कर बाजार में सामायिक करते श्रावकों को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। तब गेरुलालजी व्यास ने संत भीखणजी का परिचय देते हुए आचार्य रुघनाथजी से स्वामी भीखणजी के पृथक होने की सारी घटना सुना दी। सारी बातों को ध्यान पूर्वक सुन लेने के पश्चात श्री सिंघीजी ने उत्सुकतावश पूछा, "इस समय कितने साधु इस विचारधारा का समर्थन कर रहे हैं?" गेरुलालजी बोले, "साधुओं की संख्या तेरह है।" उन्होंने फिर पूछा, "अपने यहाँ जोधपुर में उनका अनुसरण करने वाले कितने श्रावक हैं ?" संयोग की बात उस समय जोधपुर में उनके अनुयायियों की संख्या तेरह थी। महामंत्री श्री सिंघीजी के साथ उस समय सेवग जाति का एक कवि भी था। वह उपयुक्त सारी बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था। तेरह की संख्या ने उसके कवि मन को मुखर किया और उसने तत्काल दोहा सुनाया-
साध-साध रो गिलो करै, ते आप आपरो मन्त।
सुणज्यो रे शहर रा लोगां! ए तेरापंथी तंत।।17
अर्थात साधु-साधु आपस में खींचातान करते हैं। उनका अपना-अपना मत है। शहर के लोगों! सुनो, यह तेरापंथ बहुत सारपूर्ण है। इसमें कोई भी खींचातानी नहीं है।
संत भीखणजी के पास जब नामकरण के समाचार पहुंचे तो कवि द्वारा सहज रूप से व्यवहृत उस 'तेरापंथी' शब्द में उन्हें अपनी आंतरिक विचारधारा की प्रतिध्वनि सुनाई दी और अपने संघ की संज्ञा के रूप में स्वीकार कर लिया। राजस्थानी भाषा में संख्यावाची 'तेरह' को तेरा कहा जाता है और 'तू' सर्वनाम की संबंधवाचक विभक्ति का एकवचन भी 'तेरा' बनता है। संत भीखण जी ने दोनों ही शब्द रूपों को ध्यान में रखते हुए भगवान महावीर को नमन करते हुए व्याख्या की- "हे प्रभो! यह तेरापंथ है। हम सब निर्भ्रांत होकर इस पर चलने वाले हैं, अतः तेरापंथी हैं।"18 मूलतः कवि की भावना को तेरह की संख्या ने ही प्रेरणा प्रदान की थी। अतः संत भीखण जी ने उसे भी उतना ही महत्त्व दिया और उस शब्द का दूसरा संख्यापरक अर्थ प्रकट करते हुए कहा- "पाँच महाव्रत-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह, पाँच समितियाँ -ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेप और उत्सर्ग एवं तीन गुप्तियाँ- मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति- ये तेरह नियम जहाँ पालनीय हैं, वह तेरापंथ है।"19 तेरापंथ शब्द का उपर्युक्त अर्थ यद्यपि संत भीखणजी की प्रत्युत्पन्नमति द्वारा तत्काल प्रसूत हुआ था, फिर भी उसमें संयम के जिन तेरह नियमों का उल्लेख किया गया है, वे आगम-सम्मत तथा प्राचीन जैन आचार्यों द्वारा इसी संख्या के रूप में बहुमान्य रहे हैं।
विक्रम संवत् 1817, चैत्र शुक्ल नवमी से आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा की अवधि में संत भीखणजी के निर्दिष्ट साध्वाचार जनसाधारण में चर्चा का विषय बनते जा रहे थे। चातुर्मास काल निकट आ जाने से उन्होंने इस हेतु केलवा नामक ग्राम को चुना। जो वर्तमान में राजसमंद जिले में स्थित है वे आषाढ़ शुक्ल तेरस को वहाँ पहुँचे। इसी बीच वहाँ उनके विरुद्ध प्रचार प्रारंभ किया जा चुका था। जनता में भय व घृणा का प्रचार इस रूप में किया गया कि जब वे वहाँ पहुँचे तो उन्हें वहाँ कोई स्थान देने वाला नहीं मिला। स्थान की गवेषणा करने में संत भीखणजी को काफी परिश्रम व पूछ्ताछ करनी पड़ी। अंत में उन्होंने स्थान मिला- स्थानीय जैन मंदिर की एक अंधेरी कोठरी। वर्षों पूर्व से वह स्थान शून्य और उपेक्षित था। अतः भयप्रद भी हो गया था। जनता में यह अनुश्रुति प्रचलित थी कि जो भी वहाँ जाएगा वह भूत-प्रेत आदि से बच नहीं पाएगा। स्वामी भीखणजी ने उस कोठरी में ठहरने का निश्चय कर लिया।
प्रातःकाल परिणाम देखने के लिए उत्सुकतावश लोग वहाँ आए तो उन्हें सानंद देखकर चकित हो गए। इस घटना से वहाँ के लोगों को स्वामी भीखणजी की आत्मशक्ति पर विश्वास हो गया। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन संत भीखणजी ने अरिहंत भगवान की आज्ञा लेकर सिद्धों के साक्ष्य से सामायिक सूत्र का उच्चारण करते हुए सामायिक-चारित्र ग्रहण किया और अन्य साधुओं को भी सामायिक पाठ के द्वारा चारित्र ग्रहण करवाया। तेरापंथ की वास्तविक स्थापना स्वामी जी के भाव-संयम ग्रहण के साथ उसी दिन हुई। उसी दिन तेरापंथ नाम वैधानिक स्तर पर स्वीकार कर लिया गया।20
आचार्य भीखणजी द्वारा स्थापित तेरा पंथ संप्रदाय ने अब तक 260 वर्षों का गंतव्य तय किया है। एक धर्म संस्था के लिए यह कोई बहुत लंबा समय नहीं होता, फिर भी इस अवधि में तेरापंथ में जिस इतिहास का निर्माण किया वह अत्यंत प्रेरक और गौरवपूर्ण है। यद्यपि यह संगठन के रूप में नवीनतम संघ है, परंतु परंपरा की दृष्टि से तेरापंथी जैन परंपरा का निर्वाह कर रहा है। मुनि बुद्धमल के शब्दों में, ”तेरापंथ प्राचीनता और अर्वाचीनता का ऐसा संगम है जहाँ दोनों को ही उपयुक्त महानीयता प्राप्त हुई है। उसने दोनों को अपना शृंगार बनाया है, सिर का भार नहीं।“21 वैचारिक दृष्टि से तेरापंथ एक आचार, एक विचार और एक आचार्य की विचारधारा का पोषक है। इसका दर्शन तर्क-विज्ञान पर आधारित है।
तेरापंथ धर्म संघ में आचार्यों की यशस्वी परंपरा रही है। उत्तराधिकारी का मनोनयन स्वयं आचार्य करते हैं। चतुर्विध धर्मसंघ आचार्य के उस निर्णय को हार्दिक भाव से स्वीकार करता है। अब तक तेरापंथ संप्रदाय में ग्यारह आचार्य हुए हैं। उनके नाम हैं- आचार्य भीखण (भिक्षु), आचार्य भारीमाल, आचार्य रायचंद, आचार्य जीतमल (जयाचार्य), आचार्य मघवा, आचार्य माणक, आचार्य डालिम, आचार्य कालूराम, आचार्य तुलसी, आचार्य महाप्रज्ञ एवं वर्तमान आचार्य महाश्रमण।
आचार्य भिक्षु का युग धार्मिक विसंगतियों का काल था। असंयम की बढ़ती प्रवृत्ति, धार्मिक अनुष्ठानों का बढ़ता प्रचलन, धन का बढ़ता महत्त्व और हिंसा में भी धर्म का निरूपण किया जा रहा था। ऐसी स्थिति में उनका मन आंदोलित हो उठा। उन्होंने तत्कालीन पाखंड का विरोध करते हुए धर्म की नई कसौटियाँ स्थापित की उन्होंने कहा22-
· अहिंसा धर्म है, हिंसा धर्म नहीं है।
· संयम धर्म है, असंयम धर्म नहीं है।
· जिन आज्ञा में धर्म है, आज्ञा से बाहर धर्म नहीं है।
· हृदय परिवर्तन धर्म है, बल प्रयोग धर्म नहीं है।
· जीवन शुद्धि के लिए किया जाने वाला आचरण धर्म है, मूल्य से जो कुछ खरीदा जाता है, वह धर्म नहीं है।
साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा जी के शब्दों में, “संत भीखणजी ने धर्म की जो कसौटियाँ प्रस्तुत कीं, वे आध्यात्मिक धर्म की दृष्टि से है, लौकिक धर्म से नहीं।“23 क्योंकि लौकिक कर्तव्यों, व्यवस्थाओं, या व्यवहारों को जहाँ धर्म माना जाता है, वह लौकिक धर्म है। आध्यात्मिक धर्म और लौकिक धर्म के क्षेत्रों में काफी भिन्नता है। दोनों की अपनी उपादेयता होती है। आचार्य भारमलजी ने तेरापंथ के साधु-साध्वियों के लिए आचार संहिता का निर्माण किया। नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए अभियान चलाया। वे कुशल धर्माचार्य होने के साथ साथ एक कुशल धर्म प्रसारक तथा सुदृढ़ अनुशासक थे, परिणामस्वरूप उनके शासनकाल में तेरापंथ संघ के अच्छी प्रगति हुई। साधु-साध्वियों की वृद्धि के अतिरिक्त श्रावक-श्राविकाओं की भी बहुत वृद्धि हुई। उस वृद्धि का साधारण अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जब विक्रम संवत् 1875 में उनका चातुर्मास कांकरोली में था तब वहाँ 1700 पौषध हुए। उन्होंने भी आचार्य भिक्षु की तरह अनुशासन व मर्यादा का विशेष ध्यान रखा तथा तेरापंथ को प्रगति की ओर अग्रसर किया।
आचार्य रायचंदजी ने तम्बाकू नियंत्रण हेतु जनता में अभियान चलाया एवं उसके दुष्प्रभावों को उजागर किया। वे महान परिव्राजक थे। उनके विहार क्षेत्र में राजस्थान के तत्कालीन राज्य- मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ तो थे ही, उनके अतिरिक्त थली, मालवा, गुजरात, सौराष्ट्र और कच्छ को भी उन्होंने अपने विहार क्षेत्र में सम्मिलित किया। उनके शासनकाल में 275 दीक्षाएँ हुई। उनमें से 77 साधु और 168 साध्वियाँ थीं।
श्री जयाचार्य तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य थे। वे बड़े प्रभावशाली एवं नव-निर्माण की चेतना वाले आचार्य थे। तेरापंथ में आचार्य भिक्षु का जो स्थान है, वही जयाचार्य का भी है। आचार्य भिक्षु ने जिस तरह अपने जीवन का संपूर्ण समय तेरापंथ की जड़ों को जमा देने में लगाया, उसी तरह जयाचार्य ने अपने संपूर्ण शक्ति उसे शक्तिशाली बनाने में लगाई। तेरापंथ के विचारों तथा व्यवहारों को प्रभावशाली ढंग से उन्होंने जनता के समक्ष रखा, गाथा प्रणाली का आरंभ किया, पुस्तकों का सांघिकीकरण किया, श्रम-विभाजन का स्वरूप प्रस्तुत किया, पट्ट महोत्सव, चरम महोत्सव व मर्यादा महोत्सव का आयोजन आरंभ किया तथा प्रचुर मात्रा में साहित्य की रचना की। उनकी प्रतिभा से तेरापंथ ने जो पाया वह उसके लिए बहुत ही मूल्यवान और शक्तिशाली संबल सिद्ध हुआ। आचार्य मघवागणी अत्यंत सहज, सरल व मध्यस्थ वृत्ति के थे। अध्यात्म भाव से ओतप्रोत उनका हृदय था। अनुशासन के प्रति उतने ही सख्त थे। उन्होंने उपासना को विशेष महत्त्व दिया। विवेक और मर्यादा मिश्रित आत्मानुशासन के पक्ष में थे। उन्होंने आंतरिक जागरण पर बल दिया तथा तेरापंथ को दृढ़ आधार प्रदान करते हुए उसे पल्लवित किया।
आचार्य माणकगणी का शासनकाल अत्यंत छोटा रहा। वह अपने अंतिम समय में संघ के लिए आगामी व्यवस्था नहीं कर सके थे। यह तेरापंथ धर्म संघ के इतिहास की अनहोनी घटना थी। अपने अल्प समय में उन्होंने प्रश्नोत्तर, तत्वबोध, झीणी चर्चा और बारह व्रतों के पालन पर विशेष बल दिया। आचार्य डालिमगणी तेरापंथ संघ के सातवें आचार्य बने। उनका चयन संघ ने सर्वसम्मति से किया, कारण कि आचार्य माणकगणी का अचानक स्वर्गवास हो गया था और वह भावी आचार्य की घोषणा नहीं कर पाए थे। उन्होंने जैनत्व के संदेश को प्रचार का माध्यम बनाया और साधु जीवन की युगानुकूल व्याख्या की। डालिमगणी यशस्वी आचार्य हुए। आज्ञा और मर्यादा की अवहेलना करने वाला उनका कृपा पात्र व्यक्ति भी डांट से वंचित नहीं रहा। एक सजग और विश्वस्त व्यक्ति की भाँति उन्होंने अपने धर्म की सुरक्षा की। अंतिम समय में उन्होंने अनशन पूर्वक समाधि मरण का वरण किया। आचार्य कालूगणी तेरापंथ संघ के आठवें आचार्य बने। वह कठोर साधक थे तथा इसके द्वारा ही ज्ञान प्राप्ति के समर्थक भी थे। सामाजिक सुधार हेतु विशेष अभियान चलाया। धर्म प्रचार हेतु उन्होंने कई यात्राएँ की तथा अपने प्रवचनों के माध्यम से मूल्यों की रक्षा का प्रयास किया।
आचार्य तुलसी तेरापंथ संघ के नवम आचार्य बने। उनके कार्यकाल में तेरापंथ ने शिखर स्थान को प्राप्त किया। जैन धर्म को जन-धर्म के रूप प्रस्तुति, अणुव्रत आंदोलन, सामाजिक क्रांति एवं विराट साहित्य-साधना, प्रेक्षा-ध्यान और जीवन-विज्ञान जैसे व्यापक कार्यक्रमों से तेरापंथ संघ को यशस्वी बनाया। आचार्य तुलसी ने प्रायोगिक जीवन हेतु व्यक्तिगत और संघीय स्तर पर एक विशेष प्रयोग किया। जिसका नाम है-समण श्रेणी। साधु और श्रावक के बीच इस श्रेणी के माध्यम से अध्यात्म साधना का विकास किया, ज्ञान विज्ञान की नई विधाओं में प्रवेश हुआ और माननीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार में अभिनव योगदान दिया। उन्होंने अपने जीवन काल में विक्रम संवत 2050, माघ शुक्ला सप्तमी मर्यादा महोत्सव के अवसर पर सुजानगढ़ में महाप्रज्ञ को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित कर जैन शासन के आचार्य परंपरा में एक कीर्तिमान स्थापित किया। आचार्य महाप्रज्ञ तेरापंथ के दसवें आचार्य के रूप में संपूर्ण विश्व में प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने अणुव्रत आंदोलन को गति प्रदान की तथा प्रेक्षा ध्यान को जन-जन में लोकप्रिय बनाया। अपनी अहिंसा-यात्रा के माध्यम से भगवान महावीर के अहिंसा संदेश को विश्वव्यापी बनाने में अपना योगदान दिया। महान साहित्य सर्जना द्वारा नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने के लिए तथा उसे जीवन का अंग बनाने हेतु उनका प्रयास स्तुत्य है। वर्तमान आचार्य महाश्रमण भी तेरापंथ के उद्देश्यों को जनव्यापी बनाने की दिशा में गतिमान हैं।
वर्तमान समय में तेरापंथ धर्म संघ की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को संचालित करने हेतु कई सभा संस्थाएँ कार्य कर रही हैं। उनमें प्रमुख हैं- पारमार्थिक शिक्षण संस्था, तेरापंथ महासभा, अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद, अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल, अखिल भारतीय अणुव्रत समिति, आदर्श साहित्य संघ, जैन विश्व भारती, जय तुलसी फाउंडेशन, अणुव्रत विश्वभारती, जैन श्वेतांबर तेरापंथी स्मारक समिति आदि। इन संस्थाओं के अतिरिक्त देश भर में क्षेत्र व स्थानीय स्तर पर भी अनेक संस्थाएँ कार्य कर रही हैं। केंद्रीय स्तर की संस्थाओं द्वारा कई पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन भी हो रहा है। उनमें तुलसी प्रज्ञा, जैन भारती, अणुव्रत, युवा दृष्टि, प्रेक्षा ध्यान, तेरापंथ टाइम्स, विज्ञप्ति आदि उल्लेखनीय हैं। साहित्य के क्षेत्र में भी तेरापंथ जैन संघ ने अपना अमूल्य योगदान दिया है। अपनी मौलिक अवधारणाओं के लिए यह संप्रदाय जैन परंपरा के साहित्य का ऋणी है। वैसे इस संप्रदाय का साहित्य आगम साहित्य पर आधारित रहा है, फिर भी साहित्यिक अनुभूति और अभिव्यक्ति के धरातल पर अपनी श्रेष्ठता रखता है। इस संप्रदाय के अंतर्गत विपुल मात्रा में साहित्य रचा गया है। इस परंपरा के साधु-साध्वी, समण-समणी उच्च कोटि के रचनाकारों में गिने जाते हैं। इसी परंपरा में आचार्य भिक्षु, जयाचार्य, तुलसी और महाप्रज्ञ जैसे विलक्षण रचनाकार हुए, जिनसे संपूर्ण संत परंपरा लाभान्वित हुई।
इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि तेरापंथ का इतिहास धर्म-क्रांति का इतिहास है। आचार्य भिक्षु ने चारित्रिक विशुद्ध की नींव पर तेरापंथ का शिलान्यास किया। उस पुनीत परंपरा से जुड़ कर उत्तरवर्ती सभी आचार्यों ने धर्म संघ में आत्मविकास को नई ऊँचाइयाँ दीं। श्रद्धा, अनुशासन, संयम, समर्पण और मर्यादा को प्रखर बनाया। तेरापंथ से न केवल गौरवशाली इतिहास निर्मित हुआ, वरन उससे प्राप्त अनुभव के आधार पर अपने आप को अधिक सावधान तथा प्रगतिशील बनने की परंपरा बनी। यही कारण है कि आज युगबोध को प्रतिभासित करने वाले महान संतों की वाणी तेरापंथ से उद्भासित हो रही है।
संदर्भ ग्रंथ-
1. दशवैकालिक सूत्र, सं. मधुकर मुनि, श्री आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर, सं. 1985, सूक्त 8/42
2. व्याख्याप्रज्ञप्ति सूत्र, सं. मधुकर मुनि, श्री आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर, भाग 1-4, सं. 1982, सूक्त 9/33/30
3. दशवैकालिक सूत्र, सं. मधुकर मुनि, श्री आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर, सं. 1985, सूक्त 8/25
4. पद्मपुराण, रविषेण, अनु. पन्नालाल जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, भाग 1-2, सं. 1959, सूक्त 53/67
5. वही, सूक्त 14/251
6. व्याख्याप्रज्ञप्ति सूत्र, सं. मधुकर मुनि, श्री आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर, भाग 1-4, सं. 1982, सूक्त 5/5/6
7. जैन धर्म के संप्रदाय, डॉ. सुरेश सिसोदिया, आगम अहिंसा-समता एवं प्राकृत संस्थान, उदयपुर, सं. 1994, पृष्ठ सं. 30
8. वही, पृष्ठ सं. 100-112
9. वही, पृष्ठ सं. 62-91
10. तेरापंथ का इतिहास, खंड-1, मुनि बुद्धमल, आदर्श साहित्य संघ, चूरू, सं. 1984, पृष्ठ सं. 50
11. वही, पृष्ठ सं. 51
12. वही, पृष्ठ सं. 52
13. वही, पृष्ठ सं. 52
14. वही, पृष्ठ सं. 61-62
15. वही, पृष्ठ सं. 62
16. तेरापंथ: इतिहास और दर्शन, साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा, आदर्श साहित्य संघ, चूरू, सं. 1990, पृष्ठ सं. 6
17. तेरापंथ का इतिहास, खंड-1, मुनि बुद्धमल, आदर्श साहित्य संघ, चूरू, सं. 1984, पृष्ठ सं. 74
18. वही, पृष्ठ सं. 75
19. वही, पृष्ठ सं. 75
20. वही, पृष्ठ सं. 77-83
21. वही, पृष्ठ सं. 12
22. तेरापंथ: इतिहास और दर्शन, साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा, आदर्श साहित्य संघ, चूरू, सं. 1990, पृष्ठ सं. 12
23. वही, पृष्ठ सं. 13