अस्तित्व के अनंत-पथ पर ‘बिरहा’

 

पुस्तक समीक्षा

अस्तित्व के अनंत-पथ पर ‘बिरहा’

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मनुष्य का अस्तित्व केवल उसकी भौतिक उपस्थिति तक सीमित नहीं है। उसके भीतर संवेदनाओं, स्मृतियों, आकांक्षाओं, प्रेम और आत्मबोध का एक विस्तृत संसार विद्यमान रहता है। देह इस संसार की दृश्य अभिव्यक्ति है, हृदय उसकी संवेदनात्मक भूमि और विरह उसकी आंतरिक गहराइयों को उद्घाटित करने वाला अनुभव। जब यह अनुभव आत्मचिंतन की दिशा में आगे बढ़ता है, तब मनुष्य अपने अस्तित्व के मूल प्रश्नों से साक्षात्कार करता है। यही यात्रा उसे भारतीय दर्शन के महत्त्वपूर्ण महावाक्य ‘तत्त्वमसि’ की ओर ले जा सकती है। सद्य प्रकाशित अशोक जमनानी की कृति ‘बिरहा’ प्रेम, अस्तित्व, वियोग और आत्मबोध का ऐसा वैचारिक धरातल निर्मित करती है, जहाँ साहित्य की संवेदना और दर्शन की जिज्ञासा एक-दूसरे से संवाद करती हैं। यह यात्रा किसी बाहरी उपलब्धि की नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने और अपने अस्तित्व के अर्थ को समझने की यात्रा है। समकालीन हिन्दी कविता में जहाँ संवेदना का आवरण शून्यता की ओर है, वहाँ रागात्मक मन का ऐसा प्रस्फुटन सम्मोहित करता है। ‘बिरहा’ आत्म की अभिव्यक्ति है। इसमें कविता का संवेदना तत्त्व हृदय की निश्चलता से देह की आसक्ति से गुजरता है, फिर विरह की तपन और अंततः तत्त्वमसि की ओर एक आत्मिक यात्रा करता है।

‘बिरहा’ में संकलित एक सौ आठ कविताएँ हृदय, देह, बिरहा और तत् त्वम् असि शीर्षकों में विभक्त, किन्तु लयबद्ध रूप में कवि की यात्रा शरीर से संवेदना, संवेदना से विरह और विरह से अद्वैत-बोध तक पहुँचती है। हृदय प्रेम, करुणा, स्मृति और संवेदना का प्रतीक है। यहीं किसी दूसरे के प्रति अनुराग जन्म लेता है और ‘मैं’ के भीतर ‘तुम’ के लिए स्थान बनता है। देह प्रेम की अनुभूति को मूर्त रूप देती है। स्पर्श, निकटता और उपस्थिति के माध्यम से संबंध आकार लेता है। विरह प्रेम को बाहरी संबंध से आंतरिक अनुभव में बदलता है। यही वह बिंदु है जहाँ द्वैत के भीतर अद्वैत की संभावना दिखाई देती है। उपनिषद् का महावाक्य ‘तत्त्वमसि’ अर्थात् ‘तुम वही हो’, अद्वैत वेदांत में आत्मा और ब्रह्म के संबंध का बोध कराता है। ‘बिरहा’ की कविताएँ इसी प्रेम को आकार, अर्थ, गहराई देती हुई उसे दार्शनिक विस्तार प्रदान करती है। इसमें कवि का अंतर्मन प्रेम की संवेदनात्मक भूमि, देह की भौतिक सीमा, विरह के आत्मिक विस्तार और अद्वैत के दार्शनिक आयाम—चारों में एक साथ समाहित होता हुआ प्रतीत होता है।

अशोक जमनानी रचित ‘बिरहा’ काव्य-संग्रह का आरंभ ‘हृदय’ से है। हृदय मनुष्य की भावनात्मक चेतना का प्रतीक है। प्रेम, करुणा, अनुराग, स्मृति और समर्पण जैसी अनुभूतियाँ हृदय के माध्यम से अर्थ प्राप्त करती हैं। किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति आकर्षण जब आत्मीयता में बदलता है, तब वह केवल बाहरी सौंदर्य या शारीरिक निकटता का विषय नहीं रह जाता, बल्कि मनुष्य के आंतरिक संसार का हिस्सा बन जाता है। कवि ने अपने हृदय की दिशा उसी अनंत पथ की ओर राखी है। आरंभिक पंक्तियाँ हैं- तरुण हृदय में जो घर बनता है/ वक़्त उसमें बसकर अमर हो जाता है/ फिर वह जो जाकर भी/ कभी नहीं जाता है/ उसी अमर्त्य समय के नाम...(पृ. 7)

हृदय की विशेषता यह है कि वह अनुपस्थित व्यक्ति को भी अपने भीतर उपस्थित रख सकता है। स्मृतियों में जीवित संबंध समय और दूरी की सीमाओं से आगे बढ़ते हैं। कवि ने अपने हृदय में प्रेम के उत्स को अनेक बिंबों से उत्कीर्ण किया है। ‘अलविदा’ जैसे लफ़्ज से आरंभ होकर यह यात्रा ‘दुपट्टे का उलझना’, ’हथेली पर एक नाम का अक्षर’, ‘घर की खिड़की’, ‘सुबह का सपना’ ‘ईश्वर के लिए प्रेम’ जैसी कई स्मृतियों से कल्पना का अमूर्तपन चाक्षुष बिम्ब में प्रकट होता है। प्रेम की अनंत व्याप्ति कवि के शब्दों में कुछ इस तरह प्रकट होती है- साथ-साथ मंदिर गए थे पहली बार/ तुम नहीं चलोगे भीतर पूछा था तुमने/ नहीं मैं यहीं बुला लूंगा ईश्वर अपना/ और बिठाओगे कहाँ अपने ईश्वर को?.... (पृ. 18) इस प्रकार हृदय बाहरी संसार और आंतरिक अनुभव के बीच सेतु का कार्य करता है। वस्तुतः प्रेम की गहराई में ‘मैं’ और ‘तुम’ का संबंध एक विशेष अर्थ ग्रहण करता है। व्यक्ति दूसरे को अपने से अलग पहचानते हुए भी उसके सुख-दुःख को अपने अनुभव का हिस्सा बनाने लगता है। यह आत्मीयता मनुष्य को अपने संकुचित स्वार्थ से बाहर निकलने की प्रेरणा देती है। इसी बिंदु पर प्रेम आत्मविस्तार का माध्यम बन सकता है। कवि की यह चेतना राग की परम चेष्टा है।

देह मनुष्य के अस्तित्व का दृश्य और मूर्त पक्ष है। स्पर्श, दृष्टि, निकटता और शारीरिक उपस्थिति के माध्यम से संबंधों को अभिव्यक्ति मिलती है। प्रेम में देह का महत्त्व इसलिए है कि वह संवेदना को अनुभव की प्रत्यक्षता प्रदान करती है। कवि देह के सांसारिक यथार्थ को महसूस करता है, वह भी सात्विक निश्चल मन से। वह कहता है- साँसों की गंध घुलती है/ रोम-रोम में/ उच्छवास निःश्वास या कि सम/ पता नहीं कौन-सी साँसें थीं/ जिनमें डूब रहे थे हम/ प्राण गंध रचती है/ द्वैत से अद्वैत होने का क्रम वहाँ प्राणों का प्रणय होता है/ देह से पहले...। (पृ. 52) देह और हृदय का संबंध इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि मनुष्य एक ओर भौतिक परिस्थितियों से बँधा रहता है, दूसरी ओर उसकी संवेदना उन सीमाओं से परे भी सक्रिय रह सकती है। प्रिय व्यक्ति की अनुपस्थिति में उसकी स्मृति, उसके शब्द और उसके साथ बिताए गए क्षण मनुष्य के भीतर जीवित रहते हैं। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या प्रेम केवल देह की उपस्थिति पर निर्भर है, अथवा वह अनुपस्थिति में भी अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है? विरह का अनुभव इस प्रश्न को अधिक गहराई से सामने लाता है। देह की दूरी हृदय की अनुभूति को समाप्त नहीं करती; कई बार वही अनुभूति को अधिक तीव्र और आत्मचिंतन को अधिक व्यापक बना देती है। कवि का जीवन भी कुछ इसी तरह का है।

विरह सामान्यतः वियोग, दूरी और प्रिय के अभाव से जुड़ा हुआ है। किंतु साहित्यिक और आध्यात्मिक परंपराओं में विरह केवल दुःख की अवस्था नहीं है। वह प्रेम की परीक्षा, स्मृति की सक्रियता और आत्मचेतना के विस्तार का माध्यम भी बन सकता है। जब प्रिय सामने होता है, तब संबंध का अनुभव बाहरी उपस्थिति के माध्यम से होता है। लेकिन जब प्रिय दूर चला जाता है, तब मनुष्य उसके अस्तित्व को स्मृतियों, कल्पनाओं और आंतरिक अनुभूतियों में खोजने लगता है। इस खोज के दौरान वह केवल प्रिय के बारे में ही नहीं, बल्कि अपने भीतर की इच्छाओं, अपेक्षाओं और भावनात्मक निर्भरता के बारे में भी जानने लगता है। यकीन है कि अब लौटेगा नहीं/ कोई भी लम्हा/ तब भी झूठ बोलता हूँ खुद से कि शायद ... शायद... शायद... लौट आए/ मैं कई बार झूठ से भी कहता हूँ/ कि वह बस थोड़ी-सी देर ठहर जाए/ किसी तरह एक पहर ये गुज़र जाए/ सच तो उधेड़ता है धागा-धागा-धागा यहाँ/ पर झूठ के पास थोड़ी-सी तुरपन है जहाँ/ शुरू करता हूँ/ वहाँ से...।(पृ. 71) इससे स्पष्ट होता है कि विरह प्रेम को बाहरी प्राप्ति की आकांक्षा से आगे बढ़ाकर आत्मचिंतन का विषय बना सकता है। व्यक्ति धीरे-धीरे यह समझने लगता है कि प्रेम का अर्थ केवल किसी को अपने पास रखना नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करना और उसके प्रति अपनी संवेदना को समझना भी है।

प्रेम की शुरुआत प्रायः द्वैत से होती है—एक प्रेम करने वाला और दूसरा प्रेम का विषय। दोनों की अपनी अलग पहचान होती है। इस संबंध में आकर्षण, निकटता, अपेक्षा और मिलन की आकांक्षा सक्रिय रहती है। विरह इसी द्वैत को अधिक स्पष्ट करता है, क्योंकि वह दोनों के बीच की दूरी का अनुभव कराता है। लेकिन गहन प्रेम में कभी-कभी यह दूरी एक नए आत्मिक अनुभव को जन्म देती है। प्रिय का स्मरण व्यक्ति की चेतना में इतना गहरा स्थान बना लेता है कि उसकी अनुभूति जीवन के अनेक पक्षों में उपस्थित होने लगती है। प्रकृति, संगीत, मौन और स्मृति तक प्रिय के अर्थ से जुड़ जाते हैं। इस अवस्था को साहित्यिक अर्थ में ‘विरह का अद्वैत’ कहा जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि दोनों व्यक्तियों की वास्तविक अलग पहचान समाप्त हो जाती है। पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं- हो रहे हैं लीन/ भूमि जल अग्नि वायु/ और आकाश भी/ हो रहे हैं लीन/ गंध रस तेज स्पर्श और नाद भी/ जिसे न कहा जा सके न सुना जा सके/ वही तो बस कहता है वही तो बस सुनता है/ एक अनहद गूंजता वहाँ/ द्वार खुलता है जहाँ.. (पृ. 107) विरह इस प्रकार आत्मचिंतन का द्वार खोलता है। व्यक्ति दूसरे को खोजते हुए स्वयं के भीतर उतरता है और अपने अस्तित्व के उन पक्षों से परिचित होता है, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में वह पहचान नहीं पाता। प्रेम की यह यात्रा आत्मविस्मृति से आत्मबोध तक पहुँच सकती है।

 यदि विरह मनुष्य को आत्मचिंतन की ओर ले जाता है, तो वह अपने सीमित अहंकार और आसक्ति को पहचानने का अवसर प्रदान कर सकता है। इस दृष्टि से तत्त्वमसि उस व्यापक दार्शनिक क्षितिज का प्रतीक बनता है, जहाँ मनुष्य अपने अस्तित्व के मूल स्वरूप पर विचार करता है। ‘तत्त्वमसि’ छान्दोग्य उपनिषद् का प्रसिद्ध महावाक्य है, इसका सामान्य अर्थ है- ‘वह तुम हो’ अथवा ‘तुम वही हो’। अद्वैत वेदांत में इसकी व्याख्या आत्मा और ब्रह्म के तात्त्विक एकत्व के संदर्भ में की जाती है। यहाँ ‘तत्’ परम सत्य या ब्रह्म की ओर संकेत करता है, ‘त्वम्’ व्यक्ति के वास्तविक स्वरूप की ओर और ‘असि’ दोनों के संबंध को व्यक्त करता है। यह महावाक्य मनुष्य को अपने सीमित अहंकार, बाहरी पहचान और सतही धारणाओं से आगे बढ़कर अपने वास्तविक स्वरूप पर विचार करने की प्रेरणा देता है। हृदय से देह, देह से विरह और विरह से तत्त्वमसि तक की वैचारिक यात्रा को ‘शून्य से अनंत’ की यात्रा के रूप में भी देखा जा सकता है।

आचार्य शुक्ल के अनुसार जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा  कहलाती है,हृदय की  इसी  मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है,उसे कविता कहते हैं। अर्थात आत्म की अभिव्यक्ति ही रचना की प्रथम प्रक्रिया है, लेकिन जब तक यह संवेदना से नहीं जुड़ती तब तक संपूर्ण सृष्टि से नहीं जुड़ पाती। ‘हृदय’ संवेदना का आरंभ है, ‘देह’ उसकी मूर्त अभिव्यक्ति है, ‘विरह’ उसकी आंतरिक परीक्षा है और ‘तत्त्वमसि’ आत्मबोध के व्यापक दार्शनिक क्षितिज का प्रतीक है। उक्त कृति का मर्म यह है कि प्रेम मनुष्य को अपने से बाहर ले जाकर दूसरे से जोड़ता है, विरह उसे अपने भीतर लौटाता है और आत्मचिंतन उसके अनुभव को व्यापक अर्थ प्रदान करता है। इस प्रकार हृदय, देह और विरह के माध्यम से आरंभ हुई यात्रा आत्मबोध की दिशा में बढ़ते हुए शून्य से अनंत तक की एक संभावनापूर्ण यात्रा बन जाती है। कवि की यात्रा स्व-अनुभूति आधारित है।

समग्रतः कविता एक ऐसी कला है जिसमें किसी भी  उपकरण की मदद नहीं ली जा सकती, उसे मात्र  भाषा की मदद मिलती है। इस प्रकार कविता की दुनिया का पहला उपकरण है-शब्द। शब्दों का मेलजोल कविता की पहली शर्त है।  कविता की  दूसरी अनिवार्य शर्त है-बिम्ब निर्माण।  हमारे पास दुनिया को जानने का एकमात्र सुलभ साधन इन्द्रियाँ ही हैं। बाहरी संवेदना मन के स्तर पर बिम्ब के रूप में बदल जाती हैI ‘बिरहा’ में शब्द और बिम्ब दोनों का अद्भुत संयोजन है। अशोक जमनानी की काव्य-कृति ‘बिरहा’ ‘असाध्यवीणा’ है, वह स्वयं प्रियंवद केशकम्बली की तरह सर्जना के किरीटी-तरु को समर्पित है, अतः शब्द-स्वर की वीणा बोल उठी है। पाठक अपनी-अपनी दृष्टि से उसे तौल रहा है। यह कृति नई सदी की कविताओं में लालित्य को जन्म देती है, जहाँ भावनात्मक प्रवाह स्वतः स्फूर्त रूप में रस सृष्टि कर रहा है। पुस्तक का कलेवर हृदयेश ने कविता के अंतःसूत्रों को ध्यान में रखकर तैयार किया है। संदर्भ प्रकाशन ने इसे सुन्दर ढंग से प्रकाशित किया है और संतोष का विषय है कि कृति का मूल्य पुस्तक के आकार अनुसार है। पुस्तक की समस्त कविताएँ पाठकों को बहा जाने में सक्षम है।



पुस्तक : बिरहा

लेखक : अशोक कुमार जमनानी

प्रकाशक : संदर्भ प्रकाशन, भोपाल, पृ.119

आमंत्रण मूल्य-299/-

 

 

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