मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा

मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा




राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986 की भूमिका में शिक्षा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए लिखा गया है- “शिक्षा मानव इतिहास के आदिकाल से ही उद्विकसित होती रही है तथा विविध भाँति विकसित होकर अपनी पहुँच तथा आवरण बढ़ाती रही है। प्रत्येक देश अपनी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को प्रकट करने, बढ़ावा देने के लिए और चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी शिक्षा प्रणाली विकसित करता है।” इस दृष्टिकोण से समग्र भारतीय अवधारणा को केन्द्र में रखकर शिक्षा नीति लागू हुई। इसकी परिकल्पना में संविधान के सिद्धान्त, सामाजिक परिदृश्य, वैज्ञानिक दृष्टि और भविष्य की चुनौतियों का सामना करना मुख्य अभिप्रेत था।

शिक्षा वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का अनुपम साधन है। यही राष्ट्रीय शिक्षानीति का आधारभूत सिद्धान्त भी है। राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के अनुसार 10$2$3 के ढाँचे को व्यापक विचार-विमर्श पश्चात् पूरे देश में स्वीकार किया गया। पाठ्यचर्या में समान बिन्दुओं की राष्ट्रीय स्तर पर रूपरेखा भी निर्मित हुई और यह तय किया कि भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन, संवैधानिक जिम्मेदारियों तथा राष्ट्रीय पहचान से संबंधित अनिवार्य तत्त्व शिक्षा-व्यवस्था में रहेंगे। विभिन्न स्तरों पर शिक्षा के तौर-तरीके भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत हुएI बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा को बेहतर बनाने की दृष्टि से विशेष प्रयत्न इस नीति के अनुरूप हुए । प्राथमिक शिक्षा ऐसा आधार है, जिस पर देश तथा इसके प्रत्येक नागरिक का विकास निर्भर करता है। भारत में संसद द्वारा 2009 में ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ पारित किया गया। इसके प्रावधान अनुसार 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया।

प्रारंभिक शिक्षा की प्रथम आवश्यकता है- शिक्षण की सहजता। आशय यह है कि बच्चे तक जो कुछ भी पहुँचे, वह बहुत इत्मीनान और सहजता से पहुँचे। शुरू से ही उसे सिखाने के लिए बाल-केन्द्रित और क्रियात्मक प्रक्रियाओं को सहारा लिया जाना चाहिए। इस हेतु सर्वप्रथम विधार्थी के भाषायी कौशलों को विकसित किए जाने पर बल दिया गया। वस्तुतः मनुष्य के ज्ञानात्मक, मानसिक, भावात्मक एवं सामाजिक विकास का सशक्त माध्यम भाषा है। उच्च प्राथमिक स्तर पर विधार्थी तीन भाषाओं का अध्ययन करता है। प्रथम भाषा में उच्च प्राथमिक स्तर पर सुनना, बोलना, पढ़ना एवं लिखना आदि कौशलों को सीखने के साथ ही शिक्षार्थी उस भाषा के साहित्य से परिचित होता है। द्वितीय एवं तृतीय भाषा के अंतर्गत शिक्षार्थियों में भाषायी कौशलों का सामान्य विकास, अर्थग्रहण एवं विचाराभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करना है, साथ ही तार्किक क्षमता, संवेदनात्मकता आस्वादन, सृजनात्मक अभिव्यक्ति तथा भाषागत मानवीय व्यवहार की गरिमा का विकास करना है। स्पष्ट है कि प्रथम भाषा, जिसे मातृभाषा कहा जाता है, उसे शिक्षण में प्राथमिकता का उद्देश्य निहित रहा।

जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है, उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं। मातृभाषा, किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषायी पहचान भी होती है। विश्व में विगत 40 वर्षों में लगभग 150 अध्ययनों का निष्कर्ष यह है कि प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिए। भारत में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 में भी इसी बात पर बल दिया गया। इस दृष्टि से इस बात पर विचार होना आवश्यक है कि हमारे देश में प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम क्या है? और मातृभाषा को माध्यम क्यों बनाया जाना चाहिए?

यह सर्वविदित है कि मातृभाषा के बिना किसी भी देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है। मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश-प्रेम की भावना उत्प्रेरित करती है। मातृभाषा आत्मा की आवाज़ है। माँ के आँचल में पल्लवित हुई भाषा बालक के मानसिक विकास को शब्द व प्रथम संप्रेषण देती है। इसके माध्यम से ही मनुष्य सोचता-समझता और व्यवहार करता है। इसीलिए मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा बालक का प्राकृतिक अधिकार भी है। बच्चे का शैशव जहाँ व्यतीत है, जिस परिवेश में यह गढ़ा जा रहा है, जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएँ सीख रहा है, जहाँ विकसित हो रहा है, उस महत्त्वपूर्ण पहलू की उपेक्षा नहीं की जा सकती । 

शिक्षा का अधिकार बालक का संवैधानिक अधिकार है, ऐसी स्थिति में यह अधिकार स्वतः ही मातृभाषा से जुड़ जाता है। अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करना बच्चे का अधिकार है, उस पर दूसरी भाषा को जबरन थोप देना, उसके स्वाभाविक विकास को रोकना उसके अधिकारों का हनन है। मातृभाषा सीखने, समझने एवं ज्ञान की प्राप्ति में सरल है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने स्वयं के अनुभव के आधार पर कहा कि मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना, क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का कथन है- “यदि विज्ञान को जन-सुलभ बनाना है तो मातृभाषा के माध्यम से विज्ञान की शिक्षा दी जानी चाहिए।” इसी प्रकार महात्मा गांधी का मत है- “विदेशी माध्यम ने बच्चों की तंत्रिकाओं पर भार डाला है, उन्हें रट्टू बनाया है, वह सृजन के लायक नहीं रहे.......... विदेशी भाषा ने देशी भाषाओं के विकास को बाधित किया है।”

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में कहा गया कि अधिकांश बच्चे स्कूल जाने से इसलिए कतराते हैं कि शिक्षा का माध्यम वह नहीं है, जो भाषा घर में बोली जाती है। भाषा भावनाओं और संवेदनाओं को मूर्तरूप दिए जाने का माध्यम है न कि प्रतिष्ठा का प्रतीक। विश्व के अन्य देशों में मातृभाषा की क्या स्थिति है, इसका वैचारिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि विविध राष्ट्रों की समृद्धि और स्वाभिमान की जड़ें मातृभाषा से सिंचित हो रही हैं। मातृभाषा ही राष्ट्र की क्षमता और राष्ट्र के वैभव की समृद्धि करती हैं । संस्कार, साहित्य, संस्कृति, सोच, समन्वय, शिक्षा, सभ्यता का निर्माण, विकास एवं वैशिष्ट्य मातृभाषा में ही संभव है।

प्रो0 रामदेव भारद्वाज, पूर्व कुलपति अटलबिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल ने मातृभाषा को राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ते हुए लिखा- “मातृभाषा मात्र संवाद ही नहीं, अपितु संस्कृति और संस्कारों की संवाहिका है। भाषा और संस्कृति केवल भावनात्मक विषय नहीं, अपितु देश की शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी विकास से जुड़ा है। मातृभाषा के द्वारा ही मनुष्य ज्ञान को आत्मसात् करता है, नवीन सृष्टि का सृजन करता है तथा मेधा, पौरुष और ऋतंभरा प्रज्ञा का विकास करता है। किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा और उसकी संस्कृति से होती है। यह मानवीय सभ्यता की धरोहरों की तरह एक धरोहर है।” 

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव श्री अतुल कोठारी का अभिमत है- “यह तर्क आधारहीन है कि अंग्रेजों के बिना व्यक्ति और देश का विकास संभव नहीं है। विश्व के आर्थिक और बौद्धिक दृष्टि से संपन्न देशों- अमेरिका, रूस, चीन जापान, कोरिया, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इजराइल में गणित और विज्ञान की पढ़ाई, शिक्षा एवं शासन-प्रशासन की भाषा उनकी मातृभाषा ही है।” 1949 तक भूखमरी की प्रताड़ना भोग रहा चीन आज प्रभावशाली ढंग से विश्व में अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है। जिस तीव्रगति से चीन ने विकास किया, उसका प्रमुख कारण मातृभाषा में शिक्षण ही है। यह भी एक प्रमाणित तथ्य है कि विश्व जी.डी.पी. का प्रथम पंक्ति में जो 20 राष्ट्र हैं, उनके समग्र कार्य उस देश की मातृभाषा में ही संपादित होते हैं तथा साथ ही जो सबसे पिछड़े 20 देश हैं उनमें अध्ययन-अध्यापन एवं शोध कार्य विदेशी आयातीत भाषा में होते हैं। इससे मातृभाषा का महत्त्व स्वयमेव उजागर हो जाता है।

वर्तमान भारतीय शैक्षिक परिदृश्य का अवलोकन करें तो जो तथ्य उभरकर आते हैं, वे दुर्भाग्यपूर्ण और चिन्ताजनक हैं। प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों को मातृभाषा से विमुख कर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित करने की होड़ प्रारंभ हो गई है। गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय उग आए हैं, इससे यही संकेत मिलता है। परिणाम जो उभर कर आ रहे हैं, वे और भी घातक हैं। अब शिक्षार्थी न तो अंग्रेजी भाषा जान पा रहा है और न ही मातृभाषा। लोक भाषाओं और राष्ट्रीय भाषाओं को स्रोत सूखते जा रहे हैं और भाषा-संस्कार से हामारी आने वाली पीढ़ी विमुख भी होती जा रही है। भौतिकता और अंग्रेजी मानसिकता की अंधी दौड़ में बच्चों के बचपन का सर्वाधिक क्षरण हुआ है। 

अबोध बालक अपने शैक्षणिक जीवन के प्रथम कदम पर एक ओर विद्यालय में अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा का श्रवण करता है तो परिवार व समाज में मातृभाषा में संवाद करता है । अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति के लिए उसका मानसिक संघर्ष केवल भाषायी अनुवाद में उलझकर रह जाता है। एक तरह से वह अपने आपको कृत्रिम वातावरण में महत्त्वपूर्ण क्षणों को खो देता है, यह स्थिति विद्यार्थी के लिए और भावी नागरिक निर्माण की दृष्टि से कितनी भयावह है? इसकी कल्पना की जा सकती है। यही विभ्रम बालक के व्यक्तित्व उन्नयन और राष्ट्रीय विकास में बाधा बनकर उपस्थित हुआ है। इसी भ्रम में वैश्वीकरण की दौड़ में मातृभाषा का तिरस्कार करने एवं भाषायी विभ्रम को सच मानकर प्रतिष्ठा का सूचक विदेशी भाषा को मान लिया है। यह मिथ्या प्रचार राष्ट्रीय-संस्कृति के पतन की शुरूआत तो है ही साथ ही वैज्ञानिक चिन्तन का स्थान भी अंधानुकरण ने ले लिया, हमारी भाषा के प्रति हीनता बोध ने भाषायी उपनिवेशवाद को जन्म दे दिया है। अन्ततः हमें यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति और विकास का स्रोत मात्र पूंजी और तकनीक नहीं, अपितु उस राष्ट्र की संकल्प-शक्ति होती है और इसका जन्म मातृभाषा से होता है।

भारतवर्ष, जिसकी आबादी 125 करोड़ से अधिक है। यह देश अभूतपूर्व साहित्य, वैज्ञानिक चिन्तन, समृद्ध प्राकृतिक धरोहर और विराट चिन्तन आधारित सांस्कृतिक दृष्टि संपन्न है, परन्तु मातृभाषा में अध्ययन और शोध की दृष्टि से सर्वाधिक पिछड़ा है। यहाँ तक तो ठीक, लेकिन भारतीय भाषाओं के वनिस्पत विदेशी भाषा अंग्रेजी के प्रति अत्यधिक व्यामोह चिंताजनक है। भारत एक बहुभाषी देश है। सभी भारतीय भाषाएँ समान रूप से हमारी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता की अभिव्यक्ति करती है। यद्यपि बहुभाषी होना एक गुण है, किन्तु मातृभाषा में शिक्षण वैज्ञानिक दृष्टि से व्यक्तित्व विकास के लिए परम आवश्यक है। प्रारंभिक शिक्षण किसी विदेशी भाषा में करने पर जहाँ व्यक्ति अपने परिवेश, परम्परा, संस्कृति व जीवन-मूल्यों से करता है, वहीं पूर्वजों से प्राप्त होने वाले ज्ञान, शास्त्र, साहित्य आदि से अनभिज्ञ रहकर अपनी पहचान खो देता है।

  महामना मदनमोहन मालवीय, महात्मागांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, डॉ. राधाकृष्णन जैसे मूर्धन्य चिन्तकों से लेकर चन्द्रशेखर वेंकटरमन, प्रफुल्ल चन्द्र रॉय, जगदीश चन्द्र बसु जैसे वैज्ञानिकों, प्रमुख शिक्षाविदों तथा मनोवैज्ञानिकों ने मातृभाषा में शिक्षण को ही नैसर्गिक व वैज्ञानिक बताया है। राधाकृष्णन आयोग और कोठारी आयोग की अनुशंसाएँ भी मातृभाषा के पक्ष में रही हैं। अतः भारत के समुचित विकास, राष्ट्रीय एकात्मकता एवं गौरव को बढ़ाने हेतु शिक्षण एवं लोक व्यवहार में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा दिया जाना परम आवश्यक है। इस दृष्टि से केन्द्र व राज्य सरकारों को अपनी भाषा नीति का पुनरावलोकन कर प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा अथवा संविधान स्वीकृत प्रादेशिक भाषा में देने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही शिक्षा के साथ प्रशासन और न्याय निष्पादन की भाषा भी भारतीय हों, इसकी समुचित पहल होनी चाहिए। 

संदर्भः
1. जे.सी. अग्रवाल, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, प्रभात प्रकाशन दिल्ली।
2. डॉ.रामनाथ शर्मा, प्रमुख भारतीय शिक्षा दार्शनिक, एटलांटिक पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली। 
3. डॉ.लक्ष्मीलाल ओड़,शिक्षा की दार्शनिक  पृष्ठभूमि, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर।
4. सुभाष कश्यप,हमारा संविधान, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली।
5. प्रो.रामदेव भारद्वाज,आलेख- मातृभाषा, राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय स्वाभिमान, बंसल न्यूज,छत्तीसगढ़ ।
6. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली ।
7. शिक्षाक्रम-2002, राजस्थान राज्य पाठ्य पुस्तक मंडल, जयपुर।
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वैश्विक भाषिक प्रतिमान एवं हिन्दी


वैश्विक भाषिक प्रतिमान एवं हिन्दी

(राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा 'मधुमती 'के जुलाई -अगस्त,2018 अंक में प्रकाशित)


               नई सदी नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा-स्फोट की प्रतिध्वनि-सी प्रतीत हो रही है। वैश्वीकरण के दौर में संपूर्ण जीवन वैश्विक ग्राममें सिमट कर रह गया है। भौगोलिक दूरियाँ, प्राकृतिक दुरुहता अथवा भाषायी अवरोध अब इतिहास की किवदन्तियाँ मात्र हैं। वर्तमान में राष्ट्रों की शक्तिमत्ता का आधार  सैन्य शक्ति से अधिक आर्थिक संपन्नता है। बाज़ारनई दुनिया के केन्द्र में है, इसी कारण चीन और भारत 21 वीं सदी के नेतृत्वकर्ता बन रहे हैं। इसमें भी भारत अपनी लोकतांत्रिक विशिष्टताओं, समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं, उदारवादी-सर्वसमावेशी वृत्ति, प्रचुर प्राकृतिक सम्पदा, निपुण एवं प्रशिक्षित युवा-शक्ति के कारण दुनिया के आकर्षण का केन्द्र बन रहा है।

               जब कोई राष्ट्र अपने गौरव में वृद्धि करता है तो वैश्विक दृष्टि से उसकी प्रत्येक विरासत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। परम्पराएँ, नागरिक दृष्टिकोण और भावी संभावनाओं के केन्द्र में भाषामहत्त्वपूर्ण कारक बनकर उभरती है, क्योंकि अंततः यही संवाद का माध्यम भी है। भारतीय दृष्टि को समझने के लिए स्वाभाविक रूप से हिन्दी भाषा वैश्विक आकर्षण का केन्द्र बनी हैं। नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार हिन्दी विश्व की दूसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बन गई है। यह संकेत इसकी महत्ता को रेखांकित करते हैं कि हिन्दी आज विश्व-भाषा बनने की ओर अग्रसर है।

               जहाँ तक विश्व भाषा के स्तर को प्राप्त करने का प्रश्न है, तो उसके कुछ निश्चित प्रतिमान हैं। यथा-विश्व के अधिकांश भू-भाग पर भाषा का प्रयोग, साहित्य-सृजन की सुदीर्घ परम्परा, विपुल शब्द-संपदा, विज्ञान-तकनीक एवं संचार के क्षेत्र में व्यवहार, आर्थिक-विनिमय का माध्यम, वैज्ञानिक लिपि एवं मानक व्याकरण, अनुवाद की सुविधा, उच्च कोटि की पारिभाषिक शब्दावली एवं स्थानीय आग्रहों से मुक्त होना आदि गुण आवश्यक है। इन प्रतिमानों के आलोक में हिन्दी की विशिष्टताओं और सामथ्र्य का मूल्यांकन वर्तमान संदर्भों में समीचीन प्रतीत होता है।

               हिन्दी और विश्व भाषा के प्रतिमानों का यदि परीक्षण करें तो न्यूनाधिक मात्रा में यह भाषा न केवल खरी उतरती है, बल्कि स्वर्णिम भविष्य की संभावनाएँ भी प्रकट करती है I कुछ विशिष्टताओं का उल्लेख इस प्रकार है-

               आज हिन्दी का प्रयोग विश्व के सभी महाद्वीपों में प्रयोग हो रहा है। डाॅ. करुणा शंकर उपाध्याय के मतानुसार लगभग 140 देशों में हिन्दी का प्रचलन न्यून या अधिक मात्रा में है। सन् 1999 में टोकियो विश्वविद्यालय के प्रो. होजुमि तनाका ने मशीन ट्रान्सलेशन समिटमें भाषायी आँकड़े पेश करते हुए कहा कि विश्वभर में चीनी भाषा बोलने वालों का स्थान प्रथम, हिन्दी का द्वितीय है और अंग्रेजी तीसरे क्रमांक पर पहुँच गई है। डाॅ. जयन्तीप्रसाद नौटियाल ने भाषा शोध अध्ययन-2005 के आधार पर हिन्दी जानने वालों की संख्या एक अरब से अधिक बताई है। आज भारतीय नागरिक दुनिया के अधिकांश देशों में निवास कर रहे हैं और हिन्दी का व्यापक स्तर पर प्रयोग भी करते हैं, अतः यह माना जा सकता है कि अंग्रेजी के पश्चात् हिन्दी अधिकांश भू-भाग पर बोली अथवा समझी जाने वाली भाषा है।

               हिन्दी में साहित्य-सृजन परम्परा एक हजार वर्ष से भी पूर्व की है। आठवीं शताब्दी से निरन्तर हिन्दी भाषा गतिमान है। पृथ्वीराज रासो, पद्मावत, रामचरित मानस, कामायनी जैसे महाकाव्य अन्य भाषाओं में नहीं हैं। संस्कृत के बाद सर्वाधिक काव्य हिन्दी में ही रचा गया। हिन्दी का विपुल साहित्य भारत के अधिकांश भू-भाग पर अनेक बोलियों में विद्यमान है, लोक-साहित्य व धार्मिक साहित्य की अलग संपदा है और सबसे महत्त्वपूर्ण यह महान् सनातन संस्कृति की संवाहक भाषा है, जिससे दुनिया सदैव चमत्कृत रही है। उन्नीसवीं शती के पश्चात् आधुनिक गद्य विधाओं में रचित साहित्य दुनिया की किसी भी समृद्ध भाषा के समकक्ष माना जा सकता है। साथ ही दिनों-दिन हिन्दी का फलक विस्तारित हो रहा है, जो इसकी महत्ता को प्रमाणित करता है।

               शब्द-संपदा की दृष्टि से हिन्दी में लगभग पच्चीस लाख शब्द प्रचलन में हैं। ये शब्द संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश परम्परा से विकसित, आँचलिक बोलियों में व्यवहृत, उपसर्ग-प्रत्यय, संधि-समास से निर्मित हैं, जिसका सुनिश्चित वैज्ञानिक आधार है। साथ ही विदेशी शब्दावली के अनेक शब्द जो व्यावहारिक रूप से प्रचलन में है, उनमें अंग्रेजी, फारसी, अरबी, पुर्तगाली, स्पेनिश, फ्रेंच आदि भाषाओं से गृहीत भी हैं। यह गुण हिन्दी की उदारता को रेखांकित करता है। विश्व की सबसे बड़ी कृषि विषयक शब्दावली हिन्दी के पास है, जो वैश्विक धरोहर है। दूसरी भाषाओं के साथ तादात्म्य स्थापित करने में हिन्दी की भाषिक संरचना लोकतांत्रिक है। इसकी वाक्य-संरचना में आसानी से दुनिया की किसी भी भाषा का शब्द समायोजित होकर अर्थ प्रकट कर देता है। यह विशिष्टता हिन्दी विशालता का प्रमाण है।

               हिन्दी की लिपि-देवनागरी की वैज्ञानिकता सर्वमान्य है। लिपि की संरचना अनेक मानक स्तरों से परिष्कृत हुई है। यह उच्चारण पर आधारित है, जो उच्चारण-अवयवों के वैज्ञानिक क्रम- कंठ, तालु, मूर्धा, दंत, ओष्ठ आदि से निःसृत हैं। प्रत्येक ध्वनि का उच्चारण स्थल निर्धारित है और लेखन में विभ्रम की आशंकाओं से विमुक्त है। अनुच्चरित वर्णों का अभाव, द्विध्वनियों का प्रयोग, वर्णों की बनावट में जटिलता आदि कमियों से बहुत दूर है। पिछले कई दशकों से देवनागरी लिपि को आधुनिक ढंग से मानक रूप में स्थिर किया है, जिससे कम्प्यूटर, मोबाइल आदि यंत्रों पर सहज रूप से प्रयुक्त होने लगी है। स्वर-व्यंजन एवं वर्णमाला का वैज्ञानिक स्वरूप के अतिरिक्त केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण भी किया गया, जो इसकी वैश्विक ग्राह्यता के लिए महत्त्वपूर्ण कदम है।

               हिन्दी में पिछले कई वर्षों से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विषयक उत्तम कोटि की पुस्तकों का अभाव था, लेकिन नई सदी में अनेक विश्वविद्यालय, केन्द्रीय संस्थाओं आदि ने इस दिशा में विशेष कार्य किया। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा मानक पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण किया, ताकि लेखन में एकरूपता रहे। आज संचार के क्षेत्र में तेजी से हिन्दी शब्दावली का प्रयोग बढ़ रहा है। यहाँ तक कि उच्चारण के आधार पर यंत्रों पर मुद्रण हिन्दी के प्रसार का लक्षण है। अभियांत्रिकी एवं चिकित्सा के क्षेत्र में हिन्दी का प्रयोग निरन्तर जारी है, अच्छा साहित्य निरन्तर प्रकाशित हो रहा है। निकट भविष्य में यह अभाव भी नहीं रहेगा, ऐसी आशा की जा सकती है।

               अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक संदर्भों, आर्थिक गतिविधियों एवं सांस्कृतिक विनिमय के क्षेत्र में हिन्दी ने भारतीय उपमहाद्वीप का नेतृत्व किया है। अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर भारतीय नेताओं ने हिन्दी को समय-समय पर केन्द्र में रखा और संयुक्त राष्ट्र संघ में अब यह धारणा बनी है कि हिन्दी दुनिया की एक महत्त्वपूर्ण भाषा है। आर्थिक उन्नति की दृष्टि से भारत तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है, दुनिया के लिए एक करोड़ से अधिक का बाजार है और अपने उत्पाद के प्रचार के लिए हिन्दी भाषा उसके आर्थिक लाभ की कुंजी है, अतः विज्ञापन से लेकर आर्थिक जगत की समस्त गतिविधियों में हिन्दी को समुचित दर्जा मिला है। टेलीविजन, कम्प्यूटर, मोबाइल एवं मीडिया में हिन्दी की लोकप्रियता भविष्य के लिए अच्छे संकेत प्रदान करती है। गूगल, माइक्रोसोफ्ट एवं अन्य कंपनियों ने हिन्दी के व्यापक जनाधार को देखते हुए अनेक सॉफ्टवेयर  हिन्दी की दृष्टि से तैयार किए, परिणाम स्वरूप इंटरनेट पर हिन्दी तेजी से फैल रही है।

               वैश्विक स्तर पर किसी भाषा के स्तर निर्धारण में उसकी वैज्ञानिकता एवं मानकता का आधार महत्त्वपूर्ण होता है। इस दृष्टि से हिन्दी का मानक व्याकरण है। शब्द रचना की दृष्टि से संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, अव्यय आदि का वैज्ञानिक विवेचन है। वाक्य संरचना के निश्चित नियम है, शब्द-शिल्प प्रक्रिया का विवेचन किया गया है, साथ ही व्याकरणिक कोटियों की विशद् विवेचना की गई है। मानकता के कारण ही कम्प्यूटर आदि के लिए यह अनुकूल बन गई है। अनुवाद के लिए अच्छे साॅफ्टवेयर तैयार हो गए हैं और भाषा को समझने के लिए यह मानक व्याकरण पर्याप्त दिशा प्रदान करता है।

               हिन्दी को आज भारतीय उपमहाद्वीप के देश- नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश आदि में लोकप्रियता है, वहीं संपूर्ण भारत में यह प्रमुख संपर्क भाषा भी है। सुदूर इण्डोनेशिया, सूरीनाम, मलेशिया, मारीशस, सुमात्रा, जावा, बाली आदि देशों में बहुतायत में बोली जाती है। यूरोप एवं अमेरिका-कनाड़ा में हिन्दी भाषियों की तेजी से अभिवृद्धि हो रही है। मध्य एशिया में इसका सांस्कृतिक प्रभाव रहा है तो द.अफ्रीका आदि में राजनीतिक साहचर्य से यह समान रूप से लोकप्रिय हैं। यूनेस्को के अनेक कार्यक्रम हिन्दी में हैं। विश्व के अनेक क्षेत्र- मारीशस, सूरीनाम, लंदन, त्रिनिदाद, न्यूयार्क आदि में विश्व हिन्दी सम्मेलन सफलता पूर्वक आयोजित हो चुके हैं। इसी तरह भारतीय- सांस्कृतिक संबंध परिषद द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से हिन्दी को वैश्विक गरिमा प्रदान करने का प्रयास जारी है। महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा तथा अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल की स्थापना भी इसी दृष्टिकोण पर आधारित है। संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा में हिन्दी को स्थान दिलाने का प्रयास जारी है।

               अतः समग्र विवेचन उपरान्त यह स्पष्टतः कहा जा सकता है कि भाषायी संरचना शब्द-संपदा, मानकता, लिपि की वैज्ञानिकता, साहित्यिक उच्चता, सांस्कृतिक विशिष्टता, व्यापक विस्तार की दृष्टि से हिन्दी अपना एकाधिकार प्रमाणित कर चुकी है, जहाँ उसे वैश्विक भाषा का स्तर मिल सकता है। परन्तु विज्ञान, तकनीक एवं संचार के क्षेत्र में हिन्दी की मानक शब्दावली को और विस्तारित किए जाने की आवश्यकता है। दूसरा महत्त्वपूर्ण अवरोध भारत में राजनैतिक लाभ की दृष्टि से हिन्दी का जानबूझकर विरोध करने से वैश्विक स्तर पर इसकी गरिमा को ठेस पहुँचती है, इसे समझना होगा। यदि सर्वसम्मति से इसे संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा का अधिकार मिल जाता है तो विश्व-पटल पर यह भाषा अपना वर्चस्व स्थापित कर सकती है।
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